ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अहिंसा धर्म सर्वोपरि धर्म है।

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अहिंसा धर्म सर्वोपरि धर्म है।

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एक गाँव में एक झील थी, वहाँ बहुत सारी मछलियाँ निवास करती थीं, उस झील के अंदर अनेक बड़ी मछलियों में से एक मछली को सबकी सेवा करने के कारण रानी मछली बना दिया गया, बहुत दिन तक रानी मछली के रूप में उसने झील का आनन्द लिया। एक दिन उस रानी मछली के मन में समुद्र की रानी बनने का विचार आया, झील के पास से ही समुद्र की ओर रास्ता जाता था। एक दिन वह बिना किसी को बताए वहाँ चली गयी। समुद्र में जाकर जब नीचे की ओर गई तो देखती है कि दो-चार मछलियाँ उसकी ओर भागकर आ रही हैं। रानी मछली उनसे और मछलियों के न दिखने का कारण पूछती है तो समुद्र की मछलियों ने बताया कि यहाँ रहने वाली मछलियाँ मछुवारों के डर से समुद्र के नीचे जाकर बैठ जाती हैं। झील की रानी मछली ने जब समुद्र की रानी बनने का प्रस्ताव रखा तो उन मछलियों ने उसे सुझाव दिया कि अगर आप सुख-शांति से रहना चाहती हैं तो अपनी झील में वापस चली जाइए वर्ना यहाँ तो किसी भी समय आप भी काल के गाल में चली जायेंगी। वह अभी चिन्तन कर ही रही थी कि इतनी देर में उसने देखा कि सारी मछलियों में भगदड़ मच गई है, क्योंकि मछुवारे आ गये थे। उन मछलियों ने रानी मछली से कहा कि अब आपके लिए कोई सहारा नहीं है, रानी मछली घबराकर अपनी प्राणरक्षा करती हुई जल्दी-जल्दी झील में आई और अपनी मछलियों से सारी बात बताकर अपनी भूल स्वीकार की और प्रसन्न होकर रहने लगी।

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आज के इस माहौल में

आज के इस माहौल में इसलिए यह कहानी याद आ गई कि जो भारत देश अपनी आध्यात्मिक संस्कृति एवं अहिंसक नीतियों के कारण सारी दुनिया के अंदर पूजा जाता था, सोने की चिड़िया के रूप में कहा जाता था, वह भारत देश आज दुनिया में अपने नाम को अग्रणी करने के लिए, आर्थिक उपलब्धियों में स्वयं को आगे बढ़ाने के लिए किस तरह से अपनी अहिंसक नीतियों पर कुठाराघात कर रहा है। अगर सरकार यह सीख सकी कि उसी मछली की तरह समुद्र की स्वामिनी बनने के समान विश्व के मानसपटल पर नाम तो हो सकता है लेकिन अगर अपने सिद्धान्तों पर कुठाराघात करके वो नाम हमने पाया तो वह दिन दूर नहीं जब मछलियों को निगलने वाले मछुवारों की भाँति, विदेशी पश्चिमी सभ्यता हमारी भारतीय संस्कृति को निगलने के लिए आतुर हो उठेगी। क्या ही अच्छा हो कि अहिंसा को प्रचारित-प्रसारित करने वाले अनेक सेनानी इकट्ठे हो जाएं देश की सरकार को समझाने के लिए, कि आप अपनी झील में ही संतुष्ट रहें, पूरे समुद्र का स्वामी बनने का सपना नहीं देखें, तभी हमारे देश की अस्मिता की रक्षा हो सकती है।

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हमारे वक्ता खड़े होते हैं

हमारे वक्ता खड़े होते हैं, अहिंसा, सदाचार, शाकाहार के बारे में बोलते हैं, अच्छा लगता है लेकिन मैं सोचती हूँ कि इन अहिंसकों के बीच में अहिंसा की बात करने से फायदा क्या है ? अगर हम बीच बाजार में कहें, अगर हम कत्लखानों के सामने कहें, जो मछलियों के ट्रक जा रहे हैं उनको रोककर उन्हें ले जाने वालों को संदेश दें, अगर वह जो भरे रास्ते में सार्वजनिक स्थान पर पशुओं के गले पर छुरी चला रहे हैं उनको अपनी नीतियों को समझा सके तो कितना अच्छा हो, उन लोगों को नहीं समझा पाने के कारण ही दुर्दशा हो रही है। कुछ किताबें हमारे सामने आयीं। पहले तो हमने विषय दिया था कि पाठ्य पुस्तकों में जैनधर्म एवं महावीर के जीवन को विकृत करके दिखाया जा रहा है। ज्ञानमती माताजी ने वह काम हाथ में लिया, सारे विद्वानों ने, सारे संतों ने साथ दिया तो आज हम उसमें कुछ सफलता प्राप्त कर सके हैं, भगवान ऋषभदेव को उन पाठ्यपुस्तकों में ला सके हैं। ऐसा ही एक विषय है ाqक इंग्लिश मीडियम के स्कूलों में लोग अपने बच्चों को पढ़ाने में गौरव समझते हैं क्योंकि आगे उनको बच्चों के वैरियर बनाने की जरूरत रहती है। कुछ बच्चों की पुस्तके मेरे देखने में आयीं, एक पुस्तक है—An Insight into social Studies (Part 2), दूसरी है— The Joy of Science, , ऐसी अनेक पुस्तके हैं जिसके अंदर एक पाठ पढ़ाया जाता हैOur Needs नाम से, जिसमें भोजन संबंधी जानकारी रहती है। आप सबके भी बच्चे पढ़कर आते हैं और हो सकता है प्रश्न भी करते होेंगे कि मम्मी! मुझे अण्डा क्यों नहीं दिया जाता ? क्योंकि आपके घर में अण्डा नहीं आता होगा, इसलिए आप नहीं देती हैं। हो सकता है कि बच्चा आपको कहता हो कि वह fग्ेप् हमें क्यों नहीं दी जाती? ये किताबे हैं जिनके अंदर के नाम पर मछली भी दिखाई गई है, मांस का टुकड़ा भी दिखाया गया है, अण्डा भी दिखाया गया है और उन्हीं के साथ दूध दिखाया गया है तथा सेब और लौकी आदि सब्जियाँ भी दिखाई गई हैं। उन बच्चों के कोमल मस्तिष्क के ऊपर यह दबाव डाला जाता है या यूं समझिये कि में उन्हें पढ़ाया जाता है कि इन चीजों से आपको शक्ति प्राप्त होगी तो बच्चा समझता है कि जैसे दूध है ऐसे ही अण्डा है, जैसे सेब है ऐसे ही है। मैं समझती हूँ कि पशुओं का जो कत्ल हो रहा है वो तो सबके सामने है,

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लोग समझ रहे हैं कि

लोग समझ रहे हैं कि ये बूचड़खाने हैं, इन पशुओं का मांस खाने के लिए जा रहा है, खून दवाइयों के लिए जा रहा है या चमड़ा इन वस्तुओं को बनाने के लिए जा रहा है लेकिन जो धीरे-धीरे के रूप में आपके घरों के अंदर अण्डा, मांस, मछली, ब्रेड, केक, पेस्ट्री के रूप में, चाकलेट, आइसक्रीम के रूप में प्रवेश कर रहे हैं, उन्हें रोकने की आवश्यकता है। अभी एक मामला सामने आया था कि कोल्डड्रिंक के अंदर किस तरह से जहर दिया जा रहा है, कीटनाशक पदार्थ उसमें डाले जा रहे हैं पर आखिर उन पर लीपापोती करके बताया गया कि वह तनत् के अंदर ही है, ाqजतनी मात्रा उसकी होनी चाहिए बस उतने तक ही सीमित है। इसका मतलब क्या है ? मादकता लाने के लिए डाला तो जाता है अर्थात् आप मरने न पाएं, धीरे-धीरे मरें। प्रैक्टिकल रूप में इन किताबोेंं के अंदर परिवर्तन के लिए मैं कहना चाहती हूँ कि अगर प्राचीनकाल का इतिहास देखा जाए तो यह तो निश्चित है कि सदैव शाकाहारी लोग भी रहे हैं और मांसाहारी भी रहे हैं, लेकिन कम से कम शाकाहार को शाकाहार कहा गया, मांसाहार को मांसाहार कहा गया। विश्वासघात करके अण्डे को शाकाहार कहकर नहीं खिलाया गया। मछली उत्पादन को खेती कहकर लोगों को कभी गुमराह नहीं किया गया। तो कम से कम अगर इन पुस्तकों के अंदर दिया जाता है, अगर क्रिश्चियन संस्कृति या पश्चिमी सभ्यता घुसाई भी जा रही है तो उसको अलग से बताएं कि यह शाकाहारी चीजे हैं, यह मांसाहारी चीजे हैं। ऐसा पुरुषार्थ यदि पाठ्यपुस्तकों के लेखकों से निवेदन करके किया जाए कि आप शाकाहारी और मांसाहारी वस्तुओं को अलग-अलग रूप से प्रस्तुत करें और क्या ही अच्छा हो कि छोटे-छोटे बच्चों को जो किताबें पढ़ाई जाती हैं उसमें मांसाहारी चीजों को न ही प्रतिपादित किया जाए क्योंकि भारतीय संस्कृति, शाकाहार की संस्कृति रही है।

भौतिकता की चकाचौंध में, मानव निज को भूल गया है।

दुनिया की झूठी माया और वैभव में ही फूल गया है।
क्षणभंगुर लक्ष्मी की खातिर, मानवता भी आज रो रही।
दुनिया की हर सांसों में, हिंसा अधर्म की बात हो रही।।१।।
वीतराग गुरुओं की वाणी, सुनकर अपनी प्यास बुझाओ।
त्याग और संयम की ज्योती, अपने जीवन में चमकाओ।।
वीतरागता ही प्राणी के, उन्नति की आधारशिला है।
कथनी को करनी में बदलो , शुभ अवसर यह आज मिला है ।।२।।

वास्तव में यह धरती अहिंसा की धरती है, यहाँ अहिंसा का अवतार पहले हुआ, महावीर का अवतार बाद में हुआ, और इसलिए महावीर के नारे को हम ज्योतिर्मान करते हैं। हम कहते हैं कि महावीर का अमर संदेश-‘जियो और जीने दो’। उसी अहिंसा को अपने हृदय में धारण करते हुए आप सब को अवश्य ही संकल्पपूर्वक अहिंसक भारत के निर्माण में सहयोगी बनना चाहिए तभी आप सच्चे भारतीय कहलाने के अधिकारी होंगे।