ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अहिंसा में भाषा की भूमिका

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अहिंसा में भाषा की भूमिका

प्रत्येक प्राणी की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि वह अपनी अनुभूतियों और भावनाओं को दूसरे प्राणियों के सम्मुख प्रकट करता है। इस प्रकार दूसरों को भी वह अपने ज्ञान, अनुभूति और भावना का सहभागी बनाता है। इस सहभागिता में शब्दों की विशिष्ट भूमिका होती है। इस प्रकार दूसरों को भी वह अपने ज्ञान, अनुभूति और भावना का सहभागी बनाता है। इस सहभागिता में शब्दों की विशिष्ट भूमिका होती है। शब्द दो प्रकार के हैं एक भाषात्मक और दूसरे उससे विपरीत अर्थात् अभाषात्मक।
अक्षर और अनक्षर के भेद से भाषात्मक शब्द दो प्रकार का है जिसमें शास्त्र रचे जाते हैं और जिससे आर्य और मलेच्छों का व्यवहार चलता है, ऐसे संस्कृत शब्द और इससे विपरीत शब्द ये सब साक्षर शब्द हैं जिससे उनके सातिशय ज्ञान के स्वरूप का पता लगता है। ऐसे दो इन्द्रिय आदि जीवों के शब्द अनक्षरात्मक शब्द हैं। ये दोनों प्रकार के शब्द प्रायोगिक और वैस्त्रसिक शब्द हैं तथा तत, वितत, धन और सौषिर के भेद से प्रायोगिक शब्द चार के हैं। चमड़े से मढ़े हुए पुष्कार, भेरी और दर्दुर से जो शब्द उत्पन्न होता है वह तत शब्द है। तांतवाले वीणा और सुघोष आदि से जो शब्द उत्पन्न होता है वह वितत शब्द है। ताल, घण्टा और लालन आदि के ताड़न से जो शब्द उत्पन्न होता है वह धन शब्द है तथा बांसुरी और शंख आदि के पूंâकने से जो शब्द उत्पन्न होता है वह सौषिर भेद है।
सामान्यतया वे सभी ध्वनि संकेतकर्ता की भावाभिव्यक्ति को श्रोता या दृष्टा तक पहुंचाते हैं और श्रोता या दुष्टा उनसे अर्थबोध प्राप्त करता है, भाषा कहलाते हैं। जैन— परम्परा में भाषात्मक ज्ञान को श्रुत कहा गया है, क्योंकि जैनाचार्यों ने श्रुत की परिभाषा देते हुए कहा है कि एक प्रकार के ज्ञान (इन्द्रिय बोध) से जो दूसरा ज्ञान (अर्थबोध) होता है, वह श्रुत ज्ञान है। श्रुत तीन प्रकार है— ाqमथ्या श्रुत, नय श्रुत और स्याद्वार श्रुत। सुना जाता है कि वह श्रुत है अर्थात् आगम है । मिथ्याश्रुत दुर्नय के अभिशाप से प्रवृत्त तीर्थिकों का होता है, क्योंकि उसका कोई विषय नहीं होता तथा हेतुभूत नयों से जो श्रुत है वह नयश्रुत है और यह अर्हदागम के अन्तर्गत है। निर्दिश्यमान धर्म से भिन्न अशेष धर्मान्तरों के संसूचक —‘ स्यात् ’ से युक्त ‘वाद’ अभिप्रेत धर्म का कथन स्याद्वाद है। तादात्मक जो श्रुत है वह स्याद्वाद श्रुत है। वह सम्पूर्ण अर्थ के निर्णय में कारण होने से सम्पूर्ण अर्थ का निश्चायक कहा जाता है। यह स्याद्वाद श्रुत शब्दात्मक है, क्योंकि समस्त वस्तु के स्वरूप का प्रतिपादन करता है और इसके द्वारा निश्चय होता है वह बोध है।
सतप्रवाद पूर्व की विषयवस्तु के प्रसंग में भाषा १२ प्रकार की कही है, वे हैं— अभ्याख्यान वचन, कलहवचन, पैशून्यवचन,अबद्धप्रलाप वचन, रतिवचन, अरतिवचन, उपधिवचन, निकृतिवचन, अप्रणतिवचन, मोषवचन, सम्यग्दर्शन और मिथ्यादर्शन वचन।
यह इसका कर्ता है, इस तरह अनिष्ट कथन करने को अभ्याख्यान भाषा कहते हैं। परस्पर विरोध बढ़ाने वाले वचनों को कलह —वचन कहते हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के सम्बन्ध से रहित वचनों को अबद्ध प्रलाप वचन कहते हैं। इन्द्रियों के शब्दादि विषयों में राग उत्पन्न करने वाले वचनों को रहित वचन कहते हैं। जिस वचन को सुनकर परिग्रह के अर्जन और रक्षण करने में आसक्ति उत्पन्न होती है, उसे उपाधि वचन कहते हैं । जिस वचन को अवधारण करके जीव वाणिज्य में ठगने रूप प्रवृत्ति करने में समर्थ होता है उसे निकृति वचन कहते हैं। जिस वचन को सुनकर तप और ज्ञान से अधिक गुण वाले पुरूषों में भी जीव नम्रीभूत नहीं होता है उसे अप्रणतिवचन कहते हैं। जिस वचन को सुनकर चौर्य कर्म में प्रवृत्ति होती है उसे मोष वचन कहते हैं। समीचीन मार्ग का उपदेश देने वाले वचन को सम्यग्दर्शन वचन कहते हैं। मिथ्या मार्ग का उपदेश देने वाले वचन को मिथ्यादर्शन वचन कहते हैं।
जहाँ कषाय है— वहां हिंसा है और असत्य भाषण कषाय से ही होता है अतएव असत्य वचन में हिंसा अवश्य होती है।समस्त लोकधर्म तथा आत्मधर्म में सत्य का अत्यन्त महत्व है। हिंसा भी मन, वचन और काय से योग से होती है। हम भले ही शरीर से दूसरे प्राणियों की हिंसा न करें, पर यदि वचन व्यवहार और चित्तगत विचार विषम और विसंतवादी है तो कायिक अहिंसा का पालन भी कठिन है। असत्य वचन के प्रकारों के अन्तर्गत आचार्य अमृतचन्द ने लिखा है कि गर्हित, सावद्य अर्थात् पाप सहित और अप्रिय के भेद से चतुर्थ असत्य तीन प्रकार का होता है जो कि वचन रूप है और भी कहा है—
पैशून्यहासगर्भ कर्वâशमसमञ्जसं प्रलपितं च ।
अन्यदपि यदुत्सूत्रं तत्सर्वं गर्हितम गदितम् ।।
(पुरूषार्थसिध्युपाय, ९६)
दृष्टता अथवा चुगली रूप हास्ययुक्त,कठोर , मिथ्याश्रद्धान पूर्ण और प्रलापरूप तथा और भी जो शास्त्रविरूद्ध वचन हैं उन सबको गर्हित अर्थात् निन्द्य वचन कहा है।
छेदनभेदनमारणकर्षणवाणिज्यचौर्यवचनादि।
तत्सावद्यं यस्मात्प्राणिवधाद्या: प्रवत्र्तयन्ते।।
(पुरूषार्थसिध्युपाय, ९७)
जो छेदने, भेदने, मारने, शोषण करने अथवा व्यापार, चोरी आदि के वचन हैं वे सब पापयुक्त वचन हैं, क्योंकि ये प्राणी हिंसा आदि पाप प्रवृत्त करते हैं।
अरतिकरं भीतिकरं खेदकरं वैरशोककलहकरम् ।
यदपरमपि तापकरं परस्य तत्सर्वमप्रियं ज्ञेयम् ।।
(पुरूषार्थसिध्युपाय, ९७)
जो वचन दूसरे जीव को अप्रीति का करने वाला, भय का करने वाला खेद का करने वाला, वैर , शौक कलह का करने वाला तथा और भी आतापों का करने वाला हो, वह सब अप्रिय जानना।
इससे स्पष्ट है कि हमें व्यवहार में ऐसे वचन प्रयोग नहीं करना चाहिए, जो दूसरों को पीड़ा या कष्ट पहँचाने में निमित्त बनते हैं। भाषा के सम्यक् व्यवहार से वातावरणमें समरसता का संचार हो जाता है तथा मिथ्या व्यवहार से उससे विपरीत स्थिति की निर्मित होती है।
जैन आचार में संवर के साधक तत्त्वों में समितियों के अन्तर्गत भाषा समिति के परिपालन पर विशेष बल दिया गया है। वाणी की सम्यक् प्रवृत्ति को भाषा समिति कहा जाता है। आवश्यकचूर्णि में भाषा समिति की तीन कसौटियां निर्धारित की हैं—हितकर बोलना , मित बोलना और असंदिग्ध बोलना।
उत्तराध्ययनचूर्णि में कहा है कि पहले देखो, समीक्षा करो, फिर वाणी का प्रयोग करो। समीक्षापूर्वक बोलना ही वाणी का विवेक या भाषा समिति है। योगशास्त्र में भाषा समिति को परिभाषित करते हुए लिखा है—
अवद्यत्यागत: सर्वजनीनं मितभाषणम् ।
प्रिया वाचंयमानां सा भाषा समितिरूच्यते ।।
सबके लिए हितकर, मित व प्रिय वचन बोलना भाषा समिति के अन्तर्गत लिखा है। श्रीमद् भगवद्गीता में लिखा है—
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मय तप उच्यते।।
(अध्ययन, १७/१५)
अर्थात् उद्वेग पैदा न करने वाला, सत्य, प्रिय, हित, वचन बोलने तथा स्वाध्याय में रत रहने का वाणी का तप भाषा का सम्यक् प्रयोग कहा है।
तत्त्वार्थवार्तिक में लिखा है ‘हितमितासन्दिग्धाभिधानं भाषा समिति:’ अर्थात् हित,मित और असन्दिग्ध वचन बोलना भाषा समिति है। मोक्षपद प्राप्त करना जिसका प्रधान फल है वह हित कहलाता है। स्वहित औ परहित के भेद से हित दो प्रकार का है । अर्थात् स्व और पर को मोक्षकी ओर ले जाने वाले वचन स्व पर हितकारक कहलाते हैं। निरर्थक बकवास रहित वचन मित कहलाते हैं। स्पुâटार्थ व्यक्ताक्षर वचन असन्दिग्ध कहलाते हैं। इसी को और स्पष्ट करते हुए लिखा है कि मिथ्याभिधान, असूया, प्रियभेदक , अल्पसार, शंकित, सम्भ्रान्त, कषायुक्त, परिहासयुक्त, असभ्य निष्ठुर, अधर्मविधायक अर्थात् धर्म विरोधी, देशविरोधी, कालविरोधी और चाटुकारिता (चापलूसी) आदि वचन दोषों से रहित भाषण करना भाषा समिति है। दशवैकालिक में लिखा है—
भाषाए दोसे य गुणे य जाणिया,
तोसे य कु दुट्ठे परिवस्जए सया।
छसु संजाए सामणिए सया जए,
वएज्ज बुद्धे हियमाणुलोमियं ।।
(अध्ययन, ७/५६)
भाषा के दोषों और गुणों को जानकर दोषपूर्ण भाषा को सदा के लिए छोड़ देने वाला, षट्काय जीवों पर संयत रहने वाला तथा श्रामण्य में सदा सावधान रहने वाला प्रबुद्ध भिक्षु हित और आनुलोमिक वचन बोले।
भगवान् महावीर ने अहिंसा की दृष्टि से सावद्य और निरवद्य भाषा का सूक्ष्म विवेचन किया है। प्रिय, हित,मित, मनोहर वचन बोलना चाहिए — यह स्थूल बात है। उसकी पुष्टि नीति के द्वारा भी होती है: किन्तु अहिंसा की दृष्टि नीति से बहुत आगे जाती है। ऋगवेद में भाषा के परिष्कार को अभ्युदय का हेतु बतलाया है।—
सत्तुâमिव तितउना पुनन्तो यत्र धीरा मनसा वाचमकत।
अत्रा सखाय: सख्यानि जानते भद्रैषां लक्ष्मीनिर्हिताधि वाचि।।
(ऋग्वेद, १०/७)
जैसे चलनी से सत्तू को परिष्कृत किया जाता है, वैसे ही बुद्धिमान लोग बुद्धि के बल से भाषा को परिष्कृत करते हैं। उस समय विद्वान् लोग अपने अभ्युदय को जानते हैं। विद्वानों के वचन में मंगलमयी लक्ष्मी निवास करती है। दशवैकालिक में भी लिखा है—
सवक्कसुद्धिं समुपेहियां मुणी,
गिरं च दुट्ठं परिवज्जए सया।
मियं अदुट्ठं अणुवीइ भासए,
सयाण मज्झे लहई पसंसणं।
विचारवान मुनि को वचन शुद्धि का भली—भांति ज्ञान प्राप्त करके दूषित वाणी सदा के लिए छोड़ देनी चाहिए और खूब सोच—विचार कर बहुत परिमित और निर्दोष वचन बोलना चाहिए। इस तरह बोलने से सत्पुरूषों में महान् प्रशंसा होती है।
जहां साधक के कल्याण के लिए इस प्रवृति का परिपालन आवश्यक है वहां समाज में भी इसका परिपालन आवश्यक है। भाषा का समस्या के समाधान में सहायक होता है। जनसम्पर्वâ भाषा के द्वारा ही सम्भव है। अत: वाणी और मधुर प्रयोग व्यवहार में मधुरता का संचार करता है। इसके ाqवपरीत व्यवहार में मधुरता का संचार करता है। इसके विपरीत व्यवहार से समाज में दौर्मनस्य का वातावरण बनता है। भाषा भावों को सम्प्रेषण का माध्यम है। वह समाज पर आरोपित नहीं की जानी चाहिए। आरोपित भाषा हिंसा का कारण बनती है। वही भााषा का वचन व्यवहार श्रेष्ठ हैं जो वक्ता और श्रोता के बीच सेतु बन सके।
एकान्त भाषा, निरक्षेप (एक धर्म को अखण्ड वस्तु कहने वाली) भाषा दोष पूर्ण है। निश्चयकारिणी भाषा जैसे ‘अमुक काम करूंगा’ आगे व काम न कर सके, इसलिए यह भी सत्य का बाधक है। आवेश, क्रोध, छल, लोभ, लालच की उग्र दशा में व्यक्ति ठीक—ठीक नहीं सोच पाता। इसलिए ऐसी स्थितियों में अयथार्थ बातें बढा—चढ़ा कर या तोड़—मरोड़ कर कही जाती हैं।
भाषा का आग्रह भी हिंसा एवं विसंवद का कारण बनता है। हमें अपनी बात को प्रस्तुत करते हुए दूसरों के विचारों एवं वचनों के प्रति भी सहिष्णु होना चाहिए अन्यथा द्वन्द्व की स्थिति बनेगी तथा कलह का वातावरण निर्मित होगा। भाषा का व्यवहार में निरक्षेप कथन से हिंसा तथा सापेक्ष कथन से अहिंसा की प्रतिष्ठा होती है। दशवैकालिक में लिखा है—
तहेव फरूसा भासा, गुरूभुओवघाइणी।
सच्चा वि सा न वत्त्व्वा जओ पावस्स आगमो।।
(अध्ययन, ७/११)
जो भाषा कठोर हो , दूसरों को भारी दु:ख पहुंचाने वाली हो, सत्य ही क्यों न हो, नहीं बोलनी चाहिए, क्योंकि उससे पाप का आस्त्रव होता है। सम्यग् भाषा व्यवहार में ही अहिंसा की प्रतिष्ठा सम्भव है। इससे विपरीत व्यवहार में हिंसा होती है।

प्रेषक: कर्मयोगी डॉ. सुरेन्द्र कुमार सैन,बुरहानपुर

जैन प्रचारक मई— २०१४