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अहिंसा :

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अहिंसा :

सव्वेसिमासमाणं हिदयं गब्भो व सव्व सत्थाणं।
—भगवती आराधना : ७९०

अहिंसा सब आश्रमों का हृदय है, सब शास्त्रों का गर्भ—उत्पत्तिस्थान है।

जीववध आत्मवधो, जीवदयाऽत्मनो दया भवति।

तस्माद् सर्वजीवहिंसा, परित्यक्ताऽऽत्मकामै:।।

—समणसुत्त : १५१

जीव का वध अपना ही वध है। जीव की दया अपनी ही दया है। अत: आत्म—हितैषी (आत्म—काम) पुरुषों ने सभी तरह की जीव हिंसा का परित्याग किया है।

तुंगं न मन्दरात् , आकाशाद्विशालकम नास्ति।

यथा तथा जगति जानीहि, धर्मोऽहिंसासमो नास्ति।।

—समणसुत्त : १५८

जैसे जगत में मेरु पर्वत से ऊँचा और आकाश से विशाल और कुछ नहीं है, वैसे ही अिंहसा के समान कोई धर्म नहीं है।

सर्वेषामाश्रमाणां हृदयं, गर्भो वा सर्वशास्त्राणाम्।

सर्वेषां व्रतगुणानां, पिण्ड: सार: अहिंसा हि।।

—समणसुत्त : ३६८

अहिंसा सब आश्रमों का हृदय, सब शास्त्रों का रहस्य तथा सब व्रतों और गुणों का पिण्डभूत सार है।

रागादीममणुप्पा अिंहसगत्तं।
—सर्वार्थसिद्धि : ७-२२-३६३-१०
रागादिक का उत्पन्न न होना वस्तुत: अिंहसा है।

अत्ता चेव अहिंसा।

—भगवती आराधना : ८०३

(शुद्ध, निर्विकार) आत्मा ही अहिंसा है।