ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अहिल्या की कथा

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अहिल्या की कथा

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कमला-बहन जी! सुनने में आता है कि इन्द्र ने ऋषि पत्नी अहिल्या का उपभोग करना चाहा था तथा पत्थर सदृश हो गई अहिल्या का रामचन्द्र ने उद्धार किया था सो क्या वास्तविक बात है?

अध्यापिका-जैन सिद्धान्त के अनुसार मैं तुम्हें अहिल्या की कथा सुनाती हूँ, सुनो। अिंरजयपुर नगर में वह्निवेग नामक विद्याधर राजा की वेगवती रानी से अहिल्या नाम की पुत्री का जन्म हुआ था। उस अहिल्या की युवावस्था में राजा वह्निवेग ने स्वयंवर की रचना की थी। अहिल्या के उस स्वयंवर में विजयार्ध पर्वत की श्रेणी पर रहने वाला बहुत ही पुण्यशाली इन्द्र के समान वैभव का उपभोग करने वाला ‘इन्द्र’ नाम का एक विद्याधर राजा भी आया था। समस्त विद्याधरों को छोड़कर कन्या ने चन्द्रावर्त के राजा आनन्दमाल के गले में वरमाला डाल दी। तभी से विद्याधरों का राजा इन्द्र उससे द्वेष करने लगा। यह इन्द्र मनुष्य था। नाम से और पुण्योदय के विशेष वैभव से इन्द्र कहलाता था।

किसी समय राजा आनन्दमाल ने विरक्त हो जैनेश्वरी दीक्षा ले ली और वे रथावर्त पर्वत पर प्रतिमायोग से विराजमान थे। अकस्मात् विद्याधर इन्द्र उधर से निकला। उन्हें पहचानकर द्वेष के कारण क्रीड़ा करते हुए उसने बार-बार उनकी हँसी की और बोला-‘‘अरे! काम भोगों में आसक्त तू अहिल्या का पति है। इस समय यहाँ क्यों बैठा है?’’ ऐसा कहकर उसने उन्हें रस्सियों से कसकर लपेट दिया। फिर भी उनका शरीर पर्वत के सदृश निष्कम्प रहा और वे मुनिराज तत्त्वचिन्तन में निमग्न रहे। वे मुनि तो निर्विकार रहे किन्तु पास में उनके भाई विराजमान थे जो कि ऋद्धिधारी मुनि थे। उन्होंने भाई का अनादर देखकर अपना योग संकुचित करके गरम श्वास भरकर कहा कि अरे! तूने इन निरपराध मुनिराज का तिरस्कार किया है तो तू भी बहुत बड़े तिरस्कार को प्राप्त होगा। वे मुनिराज अपरिमित श्वास से उस इन्द्र को भस्म ही कर देते किन्तु इन्द्र की पत्नी सर्वश्री ने बीच में ही क्षमायाचना, स्तुति आदि से उन्हें शान्त कर दिया। उन मुनिराज के शाप के निमित्त से अथवा आनन्दमाल मुनिराज के उपसर्ग के निमित्त से उस समय जो पाप का बन्ध हो गया था, सो उसी जन्म में रावण ने उस इन्द्र को युद्ध में बाँध लिया था। अत्यधिक तिरस्कार को प्राप्त हुए इन्द्र ने उस अपमान से खिन्न होकर और भोगों से विरक्त होकर जैनेश्वरी दीक्षा ले ली थी तथा घोर तपश्चरण करके वे मोक्ष को प्राप्त हो चुके थे।

कमला-बहन जी! जो यह चर्चा सुनने में आती है कि रावण असुर था, दानव था, उसने स्वर्ग के इन्द्र को भी युद्ध में जीत लिया था अर्थात् देव और दानवों में युद्ध हुआ था। सो क्या यह बात सही है?

अध्यापिका-बेटी! नहीं, यह ऐसी बात नहीं है। वास्तव में रावण विद्याधर राजा था और यह इन्द्र भी विद्याधर राजा था। ये दोनों ही मनुष्य थे न दानव थे और न देव थे। रावण राक्षसवंशी था और इन्द्र ने इन्द्र के समान अपने राज्य में व्यवस्था बना ली थी। कालांतर में रावण ने इन्द्र विद्याधर को जीता था। यही बात वास्तविक है और सब कपोल कल्पना है। अहिल्या के विषय में भी लौकिक कथाएँ महत्त्व नहीं रखती हैं। वास्तव में तुम्हें रामचरित्र-पद्मपुराण अवश्य पढ़ना चाहिये।

कमला-अच्छा बहन जी! अब मैं इन पुराणों का स्वाध्याय अवश्य करूँगी।