ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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अहिसा इतिहास के आलोक में

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अहिंसा इतिहास के आलोक में

हान् अहिंसक वीर का ही कत्र्तव्य हो सकता है—वही उसे माफ कर सकता है। यह है अहिंसा की महानता, अहिंसा का शौर्य—जो मानव को अमर बना देता है। अत: जो अमर जीवन चाहते हैं वे अिंहसक बनें। अहिंसा में अमरता है और हिंसा में मरण। अहिंसा जयति सर्वथा। यह निश्चित तथ्य है।[१]प्रागैतिहासिक काल के इतिवृत्त को जानने के लिये दो साधन हैं—१. धर्म शास्त्र और २. पुरातत्व, और दोनों से ही यह बात सिद्ध होती है कि आदिकाल का मानव अहिंसक था। धर्मशास्त्रों के अनुसार तो मनुष्य ही नहीं पशु भी अहिंसक था। मानव और पशु साथ—साथ रहते थे। जैनियों के महापुराण, बौद्धों के सुत्तनिपात और ब्राह्मणों के रामायण से यही पता चलता है एवं इंजील और कुरान में भी आदम और हव्वा का वर्णन यही बताता है। चीन के कनफ्यूशस ने भी यही कहा है। धर्मशास्त्रों का यह मत स्पष्ट है कि आदिमानव अिंहसक था, निरामिष भोजी था। बाद में अहंकार के कारण उसका पतन हुआ, और वह िंहसक बना।

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पुरातत्व की साक्षी—

पुरातत्व से प्राप्त सामग्री भी आदिकालीन मानव को अिंहसक सिद्ध करती है। मोहनजोदड़ों की खुदाई में सर्वप्राचीन स्तर पर केवल अन्न और फसल काटने के हंसिए मिले। उससे भी प्राचीन काल के चिन्ह मेसोपोटोमियाँ के क्रेटे नामक स्थान की खुदाई में मिले हैं, उनसे भी आदिकाल में मानव की अहिसक वृत्ति का समर्थन होता है। वहाँ से प्राप्त प्राचीन स्तर पर कोई भी घातक अस्त्र नहीं मिला और ना ही नगर की सुरक्षा हेतु प्राचीर बनाने के चिन्ह मिले हैं। ऐसे चिन्ह परिवर्ती काल में मिले हैं। इसलिए पुरातत्वविद् इलियट स्मिथ ने निर्धारित किया है कि—‘‘जब तक मानव ने खेती और सिंचाई करना नहीं सीखा था तब तक विश्व में सुख और शान्ति का स्वर्ण युग था।’[२] उस अहिसक युग में मानव भय और कायरता को जानता ही न था।

वैलाश के उत्तुंग शैल से अहिंसा का निनाद सारे लीक में फैला और उसने एक दीर्घकाल तक मानव हृदयों पर अपना प्रभाव बनाये रखा। किन्तु भगवान रामचन्द्र के समय से जब बीसवें तीर्थंकर मुनिसुव्रतनाथ का अवतरण होने वाला था, तब भारत में कुछ असुर लोग आ घुसे। उनकी पाशविक वृत्ति थी, जादू टोने के धनी थे और सुरा—सुन्दरी के सेवक। उन्होंने भारतीय ब्राह्मणों में से कुछ को बहका लिया—वेदों की ऋचाओं के मूल अर्थ को बदलकर उन्होंने पशु बलि प्रथा को जन्म दिया। तीर्थंकरों ने इसका घोर विरोध किया। भगवान राम ने अहिंसा को बढ़ाया। लेकिन उस समय से भय और आतंक का बाहुल्य हो गया। मनुष्य कायर बना। अपने साथियों से लड़ने झगड़ने लगा। भयग्रस्त हुआ। कायर मनुष्य तो अहिंसा का पालन नहीं कर सकता। वह तो अपने शरीर के मोह और स्वार्थ में अंधा हो रहा होता है। इसके विपरीत अहिंसक समरसी वीर शेरों से खेलते हुए भी नहीं डरता। दुष्यन्त—शकुन्तला का पुत्र शेर के बच्चों के साथ खेलता था। यह था प्रागैतिहासिक काल में अहिंसा का प्रभाव। तीर्थंकरों ने अहिंसा का प्रचार किया, पशु यज्ञों का विरोध किया। भगवान राम ने अहिंसा को बढ़ाया।

जब शौरीपुर में बाइसवें तीर्थंकर अरिष्टनेमि का जन्म हुआ, जो नारायण कृष्ण के चचेरे भाई थे, उस समय भारत में आमिषभोजियों की संख्या बढ़ रही थी। गोधन पर संकट आया हुआ था। तब अरिष्टनेमि ने शाकाहार अथवा फलाहार का प्रचार करके अिंहसक भाव को जनता के हृदय में जगाया। नारायण कृष्ण ने गोधन बढ़ाने के लिये लोगों को प्रोत्साहन दिया। इसका प्रसार गुजरात में द्वारिका तक हो गया। भगवान नेमि की अहिंसा का प्रभाव गुजरात में देखा जा सकता है। यहाँ की साधारण जनता निरामिष आहारी है, बड़ी दयालु है। वहां की अहिंसा के परिणाम स्वरूप ही भारत को महात्मा गाँधी जैसा महात्मा मिला, जिनकी माता जैनी और पिता वैष्णवी थे। जैन कवि श्रीमद् रायचन्द्र से जिन्होंने अहिंसा का पाठ पढ़ा और अहिंसा की शक्ति को दुनिया में चमका दिया।

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ऐतिहासिक काल के आदि में—

तीर्थंकर पाश्र्वनाथ के समय से भारत में ऐतिहासिक काल की गणना की जाती है। यद्यपि मोहनजोदड़ों और हड़प्पादि का पुरातत्व भारतीय इतिहास की रूपरेखा को ईस्वी पूर्व ४००० वर्ष तक ले जाता है। पाश्र्वनाथ के समय में वैदिक सम्प्रदाय में पुत्रेषणा, लोकेषणा और वित्तेषणा के लिये हिंसामूलक यज्ञ किये गये तथा शरीर को केवल कष्ट देने को ही तप माना जाता था। पाश्र्वनाथ ने हिंसा, अस्तेय, चोरी और परिग्रह का त्याग करना सिखाया। इसका उन्होंने भारत भर में प्रचार किया। इतने प्राचीनकाल में अहिंसा को इतना सुव्यवस्थित रूप देने का यह सर्वप्रथम उदाहरण है। ईस्वी सन् से आठ शताब्दी पूर्व जब भगवान पाश्र्वनाथ ने उपदेश दिया था वह काल अत्यन्त प्राचीन है और वह उपनिषद काल, से भी प्राचीन ठहरता है।[३]

महाभारत के युद्ध के परिणाम स्वरूप भारत अनैक्य, और अहंकार की हिंसक भट्टी में जल रहा था। बलिवेदियाँ निरपराध पशुओं के रक्त से रंजित थी, इतनी नृशंसता ही नहीं, बल्कि मानवों में ऊँच—नीच का ऐसा आतंक छाया हुआ था कि शूद्र और स्त्री के वैयक्तिक जीवन का कुछ मूल्य ही नहीं था। ऐसे हिंसक समय में तीर्थंकर महावीर ने जन्म लिया। उन्होंने अहिंसा धर्म का विज्ञान सिद्ध पाठ मानवों को पढ़ाया—‘‘जिओ और जीने दो, सबसे प्रेम करो और सेवा धर्म का पालन करो।’’ उसी समय में भगवान गौतम बुद्ध ने अहिंसा का पक्ष लिया। परिणामत: भारत में एकता का भाव जागा। सभी छोट—छोटे राज्य मगध के शासन के अंतर्गत आ गए और संगठित हुए। अनेक राज्यों के शासकगण भगवान महावीर के अनन्य भक्त हो गये। उन्होंने अहिंसा दर्शन को अपने जीवन में उतारा।

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भगवान महावीर के बाद

ई. पूर्व ५२७ में भगवान महावीर का निर्वाण पावापुर (बिहार) में हो गया। उनके अनुयायी आचार्यों, मुनियों, र्आियकाओं और श्रावकों ने सारे भारत में एवं भारत के बाहर अफगानिस्तान, अरब, ईरान एवं यूनान तक अहिंसा संदेश फैलाया। जैनाचार्य जानते थे कि मानव जीवन में शासन सत्ता का विशेष महत्व है, अत: उन्होंने सदा ही यह प्रयत्न किया कि वे शासन को अहिंसा तत्व से प्रभावित करें। तदनुसार जैनाचार्यों के प्रभाव में नंद और मौर्य वंश के अनेक राजा जैसे नन्दिवर्धन, महापद्म, चन्द्रगुप्त मौर्य रहे। चन्द्रगुप्त और महापद्म तो स्वयं जैन मुनि होकर लोक कल्याण में लगे थे। ‘मुद्राराक्षस नाटक’ से स्पष्ट है कि उस समय जैन मुनियों का जन जीवन में बड़ा प्रभाव था। वे साधारण कुटियों से लेकर राजप्रासाद तक अहिंसा का उपदेश देते हुए विचरते थे।

सिकन्दर महान तो अपने साथ मुनि कल्याण को अपने देश यूनान ले गया जिनको यूनानी जिनोसूफिस्ट कहते हैं। सिकन्दर ने अपनी दानवीय दिग्विजय की नृशंसता पर पश्चाताप् किया और मरते समय कफन से बाहर दोनों हाथ बाहर रखने का आदेश देकर दुनियाँ को बता गया कि हिंसा से दुनियाँ को हड़पने की दुर्नीति दानवता है—मानव को उससे कुछ हाथ नहीं आता। अत: सच्चा शौर्य तो अहिंसक वीर लोग बनने में हैं।

सम्राट अशोक इसलिये महान नहीं हुए कि उन्होंने कलिङ्ग का दानवी युद्ध जीता, बल्कि उन्होंने अहिंसा का संदेश सारे भारत में और भारत के बाहर पड़ोसी देशों में भेजकर जग के हृदय को जीता, इस कारण अशोक महान बने। ईरानी बादशाह दारा ने भी असि के प्रचार के लिये शाही फरमानों को पत्थर पर अशोक और सम्प्रति की तरह लिखवाया। अहिंसा के कारण ही वे महान वीर जाते हैं। अहिंसा वीरता का अभेद्य दुर्ग है।

उपरान्त जब भारत की फूट को देखकर इंडोग्रीक विजेता भारत में मथुरा से आगे तक घुस आए थे तब भी भारत को उनके आतंक से मुक्त करने के लिए कलिङ्ग के सम्राट एल खारवेल आगे बढ़े थे। फल यह हुआ कि दमत्रयस मथुरा छोड़कर भाग गया। यह सम्राट खारवेल परम अहिंसक जैन श्रावक था। अहिंसा का शौर्य इतिहास की स्वर्णगाथा है। इंडोग्रीक और कुषाण लोगों का प्राबल्य मथुरा में विशेष रहा जो जैन धर्म का केन्द्र था। जैनाचार्यों ने अनेक यवनों—ग्रीक, पार्थियन आदि को जैनधर्म में दीक्षित किया और असि का उपासक बनाया। उन्होंने अनेक मंदिर और र्मूितयाँ बनवाए थे, जो कंकाली टीला की खुदाई में मिले।

विदेशियों के साथ गंधी, माली, नट, गणिका आदि निम्न निम्न वर्ग के लोगों को भी जैनाचार्यों ने संघ में आदरणीय स्थान दिया था। उनके द्वारा प्रतिष्ठा कराई गई मूर्तियाँ भी मथुरा में मिली हैं। इस साक्षी से स्पष्ट है कि कुषाण काल में जैनधर्म जनता का जीता जागता धर्म था—उसके अनुयायी समाज के सभी वर्ग के लोग थे। जैन गुरुओं ने अहिंसा संस्कृति के रंग में सभी वर्ग के लोगों को सम्मिलित किया था जिससे समाज का नैतिक स्तर ऊँचा उठा था।

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गुप्त काल

गुप्त वंश के राजाओं ने यद्यपि पौराणिक वैदिक धर्म को प्रश्रय देकर उसे आगे बढ़ाया, तो भी जैनधर्म ने जन मन पर अधिकार जमाए रखा। गुप्त राजवंश में उसकी गति थी। प्रसिद्ध इतिहासकार हैवल का लिखना है कि—‘‘ई. की तीसरी शताब्दी तक प्राय: सभी राजकीय अथवा जनसाधारण के दान जैन और बौद्ध संस्थानों को दिये जाते थे। यद्यपि नवीन वैदिक धर्म का इस समय उत्कर्ष हुआ, फिर भी जनसाधारण में जैन और बौद्धधर्म की प्रधानता अक्षुण्ण रही थी। जैन मंदिरों, मठों में उच्च कोटि की शिक्षा प्रदान करने का प्रबंध था। इन तीनों धर्मों के विद्वानों में दार्शनिक वाद भी हुआ करता था। संस्कृत भाषा का महतीय उत्कर्ष हुआ था।[४]’’

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मुस्लिम काल

अहिंसा धर्म भीरू नहीं बनाती, धर्म वीर बनाती है। गुप्तकाल और राजपूत काल में जैन और बौद्ध अहिंसा का स्थान पौराणिक हिन्दू धर्म ने ले लिया। राजपूतों का अहंकार इतना बढ़ गया कि वे आपस में लड़ने लगे। कदाचित जयचन्द देशद्रोह न करता तो वीरवर पृथ्वीराज मुसलमानों के हाथ ने पड़ते। अभिमान के झूठे भाव ने भारतीयों को भीरू बना दिया और मुस्लिम शासन को जन्म दिया। जब सैय्यद सालारजंग अवध को जीतने के लिये गायों के झुन्ड को आगे रखकर बढ़ता हुआ श्रावस्वी (बहराइच) पहुँचा तो उस समय वहां जैन राजा सुहेलदेवराय शासनाधिकारी थे। उन्होंने अहिंसा का तात्विक रूप समझा। अत: उन्होंने गायों को तितर—बितर करके सालारजंग को मार भगाया।

बादशाह अकबर इसलिये महान माना गया कि उसने अिंहसक जीवन अपनाया। पशु—पक्षियों तक को अभयदान दिया था। अकबर से पहले सम्राट अमोघवर्ष, कुमार पाल और महाराजा राजिंसह ने भी अहिंसा ध्वज को ऊँचा किया था। परिणामत: तत्कालीन भारत लोक में सुख समृद्धि और शौर्य के लिये प्रसिद्ध रहा था।

राजपूतों का शौर्य जहाँ पारस्परिक स्पद्र्धा—हिंसा के कारण कुण्ठित रहा, वहाँ भी अहिंसा के कारण वह शौर्य सोने में सुगन्ध की उक्ति को भी चरितार्थ करता रहा। पन्ना धाय का त्याग इसी कोटि का था। यह निस्पृह, निर्मोह भाव ही महान है। पन्ना ने साहसपूर्वक शिशु राणा को बचाया और उस राणा शिशु को लेकर सरदार राजपूतों के द्वारों पर अलख जगाया, परन्तु किसी को आश्रय देने का सहास नहीं हुआ। आखिर पन्ना कमलमेर दुर्ग के शासक आशाशाह के पास पहुँचती है, जो जैन धर्मोपासक अिंहसक वीर था। उसने नि:शज्र् होकर शिशुराणा को दुर्ग में आश्रय दिया। इसे कहते हैं सच्चा, जो अहिंसा का जीता जागता प्रभाव था।

एक अिंहसक हृदय में ही निर्ममता और निर्मोह का वास हो सकता है। वही जीव रक्षा के लिये अपने प्राणों की आहुति दे सकता है। भारत के सत्याग्रह युद्ध में अिंहसक सत्याग्रहियों ने छाती पर गोलियाँ खाई, परन्तु ऊँगली तक न उठाई? इस अिंहसक शौर्य ने भारत को मुक्त कराया। और वर्तमान में भी अहिंसा की अमोघ शक्ति का प्रभाव विदेशों में फैल रहा है।

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निष्कर्ष

जब यह नितान्त सत्य है कि अहिंसा जीवन का मौलिक तत्व है—वह हमारा आत्मिक रूप है, तब हम उसे भुलाकर जीवन में सफल नहीं हो सकते। क्योंकि अहिंसा के शासन में मनुष्य अपने लिये नहीं जीता—अपने स्वार्थ को आगे रखकर वह जीवन में आगे नहीं बढ़ता। बल्कि जीओ और जीने दो के सिद्धान्त को मूर्तमान बनाकर एक विशाल समाज को जन्म देता है जिसमें सर्वत्र समता, सुख और शान्ति का साम्राज्य होता है। महावीरों का धर्म ही अहिंसा होता है—और वे सच्चे लोकजयी होते हैं—युगों युगों की जनता युगों युगों तक ही नहीं सर्वदा अिंहसक महावीरों के आगे नतमस्तक होती है।

[सम्पादन] टिप्पणी

  1. एक हंगेरियन कविता का हिन्दी रूपान्तर,
  2. The Evolution of MAn, p. 13.
  3. डॉ. हरमन जैकोबी, परिशिष्ट पर्व, पृ. ६.
  4. . History of Aryan Rule in India, p. 147-156.


रामजीत जैन
एडवोकेट, टकसाल गली, दानाओली, ग्वालियर—१ (म. प्र.)
अर्हत् वचन अक्टूबर—दिसम्बर २००२, पेज नं. ३७-४०