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आँखों का तारा कौन

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आँखों का तारा कौन- लघु कथा

पनघट पर चार औरतें पानी भरने आईं कुछ देर इधर—उधर की बातें करने के बाद उन्होंने बातों ही बातों में अपने-अपने बेटों की प्रशंसा शुरु कर दी। एक ने कहा, मेरा बेटा बहुत सुरीली बांसुरी बजाता है। दूसरी ने कहा, मेरा बेटा बहुत बड़ा पहलवान है। तीसरी बोली-मेरा पुत्र पढ़ने—लिखने में बहुत तेज है। चौथी औरत ने कुछ नहीं कहा। तीनों ने उससे कहा, तुम भी कुछ कहो न। उसने उत्तर दिया, मेरे बेटे में कोई विशेष गुण नहीं है। वह तो अपनी पढ़ाई के बाद थोडा बहुत घर का काम कर लेता है। तभी पहली औरत का बेटा आया। उसकी माँ पानी से भरा घड़ा नहीं उठा पा रही थी। बेटे ने एक निगाह अपनी माँ पर डाली और बांसुरी बजाता हुआ, आगे निकल गया। दूसरी औरत का पहलवान बेटा कुछ दूरी पर खड़ा मुद्गर घुमा रहा था। उसकी माँ घड़ा लेकर कुएं से उतर ही रही थी कि उसका पैर फिसल गया। पहलवान ने एक बार अपनी माँ की तरफ देखा। चिल्लाकर बोला-संभलकर नहीं चल सकती क्या और फिर मुद्गर घुमा कसरत करने लगा।

तीसरी औरत का बेटा किताब पढ़ता हुआ जा रहा था। उसकी माँ ने कहा, मैं दोनों हाथों में घड़ा पकड़े हुए हूँ। रस्सी मेरे कंधे पर डाल दे। बेटे ने किताब से निगाह हटाए बिना चलते—चलते कहा, पढ़ने दो मुझे। मैं इसके अलावा कुछ और काम नहीं कर सकता। इसके बाद चौथी औरत का बेटा आया। उसने अपनी माँ के सिर से घड़ा उतारकर अपने सिर पर रख लिया और घर की ओर चल पड़ा। चौथी औरत के बेटे ने कुछ नहीं बोला था।

एक बुढ़िया सब देख—सुन रही थी। वह धीरे—धीरे चलकर महिलाओं के पास आई और उन्हें आँखों के तारे का मतलब बताया। बुढ़िया बोली, मुझे तो एक ही आँखों का तारा दिखाई पड़ रहा है—वही जो अपने सिर पर घड़ा लिए जा रहा है।