ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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आओ हम सब करें वन्दना, तेरहद्वीप महान की

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आवो हम सब करें वन्दना, तेरहद्वीप महान की

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तर्ज—आओ बच्चों तुम्हें......

आवो हम सब करें वन्दना, तेरहद्वीप महान की।
चार शतक अट्ठावन मंदिर, उनके जिन भगवान की।।
सिद्धों को नमन, सिद्धों को नमन-२।। टेक.।।
तीनलोक में मध्यलोक है, द्वीप समुद्रों तक फैला ।
द्वीप असंख्यों में तेरह-द्वीपों का वर्णन है करना।।
ढाई द्वीप में पाँच मेरु हैं, अस्सी चैत्यालय संयुत।
तीर्थंकर जन्माभिषेक से, पावन हैं वे पर्वत नित्य।।
उन पावन गिरिराजों को, वंदन करते मुनिराज भी।
चार शतक अट्ठावन मंदिर, उनके जिन भगवान की।।
सिद्धों को नमन, सिद्धों को नमन-२।।१।।
तेरहद्वीपों में चउशत, अट्ठावन चैत्यालय होते।
स्वयंसिद्ध जिनप्रतिमाओं से, जिनमंदिर शोभित होते।।
इन सब मंदिर की ही पूजन, इन्द्रध्वज में करते हैं।
जिनमंदिर पर ध्वजा चढ़ाकर, प्रभु गुण कीर्तन करते हैं।।
कार्यसिद्धि के लिए अर्चना, करो सिद्ध भगवान की।
चार शतक अट्ठावन मंदिर, उनके जिन भगवान की।।
सिद्धों को नमन, सिद्धों को नमन-२।।२।।
गणिनीप्रमुख ज्ञानमती माताजी ने उसे बताया है।
हस्तिनापुर की धरती पर, उसको साकार कराया है।।
तेरहद्वीप जिनालय का, स्वर्णिम दिख रहा नजारा है।
धरती पर भूगोल जैन अब देख रहा जग सारा है।।
करे ‘‘चन्दनामती’’ वन्दना, अकृत्रिम जिनधाम की।
चार शतक अट्ठावन मंदिर, उनके जिन भगवान की।।
सिद्धों को नमन, सिद्धों को नमन-२।।३।।

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