ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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आखिर कब तक ?

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आखिर कब तक ?

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एक मेढ़क को खौलते हुए पानी में डाला गया मेढक कूद कर निकल गया, कूदना मेढक का स्वभाव है, वो कूद सकता है, जहां अपनी जान पर बनी हो वहाँ तो और भी तेजी से कूदेगा, अब उसी मेंढक को एक साधारण पानी में डाला गया और पानी का तापमान धीरे—धीरे एक—एक डिग्री बढाया गया, मेढ़क ने ‘‘एडजस्ट’’ कर लिया पानी का तापमान, सोचा अभी कूदने कि जरूरत नहीं है। फिर एक डिग्री बढा फिर मेंढक ने एडजस्ट कर लीया पानी का तापमान सोचा अभी कूदने कि जरूरत नहीं है फिर एक डिग्री बढा फिर मेंढक ने एडजस्ट कर लिया, उसके बाद फिर एक डिग्री बढा पुन: एडजस्ट कर लिया, कूदना भूल गया मेंढक, अपने स्वभाव को ही भूल गया मेंढक, क्योंकि अब तो तापमान और हर परिस्थिति में खुद को एडजस्ट करना जो सीख गया है अन्तोगत्वा पानी का तापमान धीरे—धीरे इतना बढ़ गया कि पानी खौलने लग गया और मेंढक एडजस्ट ही करता रहा और नहीं कूद पाया वहीं मर गया ये कहानी नहीं है ,कोई नहीं , ये हम हैं जो एडजस्ट कर रहे हैं, इस आशा में कि पानी का तापमान अब हमारे लिए ठीक है कोई खतरा नहीं है । एडजस्ट और हमारे जीवन में कुछ ही अंतर बचा हुआ है, हम अपना स्वाभाविक स्वभाव भूल गये हैं एडजस्ट करना हमारी नियति बन चुकी है। बिल गेट्स कहते हैं कि तुम अगर गरीब पैदा हुए तो इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। अगर तुम गरीब मरते हो तो इसमें पूरी तरह तुम्हारा ही दोष है। हमें हर हाल में सर्वोत्तम का ही चुनाव करना है। एडजस्ट करके जीवन यापन नहीं करना है। एक बात याद रखना हम मेढ़क नहीं है, हम है भगवान की सबसे सुन्दर रचना इंसान, और एडजस्ट करते रहना ही हमारा स्वभाव नहीं है।