ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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आगम को जाने और माने अवहेलना ना करें

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आगम को जाने और माने अवहेलना ना करें

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(प. पू. राष्ट्रसंत, युग प्रमुख, श्रमणाचार्य , गणाचार्य श्री १०८ विरागसागर जी महाराज) संघ विशेष के कतिपय साधक आम जनता को दिग्भ्रमित कर रहे हैं कि आर्यिका आदि सवस्त्रधारियों की विनय, वंदना, पूजा नहीं करना चाहिए, आगम में प्रमाण नहीं है। जो करता है सो मिथ्यादृष्टि है, उनके समाधानार्थ —आगम वाक्य—

१. आर्यिकाओं की समाचार विधि के मुनियों समान है। मू.गा.१५४

२. आर्यिकाओं में भी अप्रमादी मुनि यथायोग्य विनय करें। मू.गा.३८४

३. जिनागम में आर्यिकाओं का सम्मान निषिद्ध नहीं है — पंचाध्यायी श्लो. ७३५

४. आर्यिकाओं की वंदना/वंदामि कह विनय करना चाहिए — नीतिसार श्लो.५१

५. सीता सहित राम ने वरधर्म आर्यिका की संघ सहित पूजा की — पं.पु.सर्ग ३७ श्लो.१३८

६. राम ने आर्यिका सीता से कहा— आप धन्य हैं और हमारे द्वारा वंदनीय हैं — प.पु. पर्व १०७ श्लो.४३

७. अयोध्या वासियों ने आर्यिका सीता को — जगत वंद्य हैं धन्य हैं। ऐसा कहा — प.पु.सर्ग १०७ श्लो, ६०

८. आर्यिका यशोदा पुत्री (अपनी बहिन) की श्रीकृष्ण ने पूजा की—हरि.पु.सर्ग ४९ श्लो. २४

९. हनुमान पत्नियों ने बंधुमती आर्यिका की पूजा की — प.पु.पर्व ११३ श्लो. ३९—४१

१०. द्रोणमुख ने विशल्या की पूजा की—प.पु.सर्ग ६४ श्लोक ४७

११. सीता ने सिद्धार्थ क्षुल्लक जी की इच्छाकार पूर्वक पूजा की—प.पु.पर्व १००,श्लोक ४०—४१

१२. दमितारि चक्रवर्ती ने नारद की पूजा की—शान्तिनाथ पु.सर्ग—१, श्लोक ९१,९२

१३. चण्डमारी देवी ने क्षुल्लक अभयरूचि एवं क्षुल्लिका अभयमति माताजी की पूजा की— यशोधर चारित्र (पं. पन्नालाल जी ‘साहित्याचार्य कृत’)

१४. ऐलक, क्षुल्लक, क्षुल्लिका को इच्छाकार या इच्छामि कहें— नाीतिसार श्लो.५१

१५. इच्छाकार का अर्थ नमस्कार/वंदना है— सूत्रपाहुड टी.श्लोक १४

१६. पाद पृच्छालन करना चाहिए— हिन्दी टीका पृ.५५

१७. यदि पड़गाह ले और पग धुलाये, चौके में भक्ति सहित ले जाए और बैठाये तो संतोष सहित आहार कर ले—चामुण्डशय कृत—चारित्र धर्म प्रकाश श्लोक—७७—७८

१८. राजा भीष्म, रानी श्रीमती ने नारद के पाद—प्रक्षालन किये—द्य.च.प्र सर्ग ३ श्लोक ८—८७

१९. महाराज धरणीध्वज ने क्षुल्लक जी को अर्घ चढ़ाया—चन्द्रप्रभ चरित्र, सर्ग—६, श्लोक—७७—७८ अनंगलवण और मदनांकुश ने नारद को उच्चासन दे पूजा की—पद्म पु. पर्व १०२, श्लो.३

२०. श्री कृष्ण ने क्षुल्लक नारद के पाद—प्रक्षालन कर अर्घ चढ़ाया—प्रद्युम्न चरित्र

२१. राजा कालसंवर ने नारद के पाद—प्रक्षालन कर अर्घ चढ़ाया— प्रद्यु.चरित्र,सर्ग ८ श्लोक ४०३

२२. रानी कनकमाला ने नारद के पाद—प्रक्षालन कर अर्घ चढ़ाया—प्रद्यु.च.,सर्ग—८ श्लोक १०५

२३. रेवती रानी ने क्षुल्लक की नवधा भक्ति की—यशस्तिलक चंपू अश्वास ८

२४. जो दान नवधाभक्ति पूर्व दिया जाता है वही क्षुल्लक को ग्राह्य होता है। नवधा भक्ति के बिना नहीं—श्रावक धर्म प्रदीप —धर्म प्रकाश टीका (पं. जगन्मोहनलाल—कटनीकृत) श्लो.२७७

२५. जिनधर्मी की नवधा भक्ति ही ते परीक्षण होय है जाके नवधा भक्ति नाहीं ताके हृदय में धर्म हूँ नाही। धर्म रहित के मुनीश्वर भोजन हूँ नाहीं करें हैं। अन्य हूँ धर्मात्मा पात्र गृहस्थादिक है ते हूँ आदर बिना लोभी होय। धर्म का निरादर कराय दान वृत्ति ते भोजन कदाचित नाही ग्रहण करे है। पं. सदासुखदास कृत रत्नकरण्ड श्रा.वचनिका

२६. आगम में तो देशव्रती व अव्रती को भी पूजा का पात्र कहा है— मातंगो धनदेवश्च, वारिषेणस्तत: पर:। नीली जयश्च संप्राप्ता, पूजातिशय मुत्तमम् ।। र.श्रा.गा ६४

२७. अग्नि परीक्षा में उत्तीर्ण सीता की देवों ने पूजा की— पुण्या.क.को. कथा—२९

२८. प्रभावती की देवों ने पूजा की— पुण्या क.को.कथा—३०

२९. भरत चक्रवर्ती ने व्रतीजनों की पूजा की—आदि.पु.पर्व ३८,श्लोक २३

३०. जिनेन्द्र भक्त ने सूर्य नामक (चोर) ब्रह्मचारी की पूजा की—धर्मामृत उपगूहन अंग कथा पृ.११०

३१. नीली बाई की यक्षियों ने पूजा की—पुण्या, कथा को. कथा—३२

३२. भिल्लाराज ने अनंतमती के चरणों की पूजा की—धर्मामृत पृ. ६२—६९

३३. राजा सिंहरथ ने अनंतमती की पूजा की— धर्मामृत पृ.६२—६९

३४. सेठ सुदर्शन की यक्षी ने पूजा की—सुदर्शन चरित्र ७/१४४

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यदि इन सबको मिथ्यात्व माना जाए तो—

१.फिर तो उन्हें पूज्य लिखना भी गलत हो जायेगा क्योंकि पूज्य शब्द का अर्थ होता है, कि पूजा के योग्य ।

२. तीर्थंकरों की गर्भकल्याणक और जन्मकल्याणक पूजा भी मिथ्यात्व का कारण बन जाएगी, क्योंकि उस समय वे अव्रती वस्त्रधारी होते हैं।

३. तीर्थंकरों की पूजा में पंचकल्याणकों के अलग—अलग अर्घ चढ़ाना भी मिथ्यात्व का कारण बन जाएगा।

४. पंचकल्याणक में गर्भ—जन्म कल्याणक मनाना भी मिथ्यात्व का कारण बनेगा।

५. और उसको कराने वाले सौधर्म इन्द्र, प्रतिष्ठाचार्य तथा आचार्य परमेष्ठी मिथ्यादृष्टि सिद्ध होंगे।

जन्माभिषेक के बाद सौधर्म इंद्र ने बालक (तीर्थंकर) की अष्ट—द्रव्य से पूजा की, यथा—

गंधै: धूपैश्चदीपैश्च साक्षतै: कुसुमोद के: ।

मंत्र पूर्वे: सार्धेण सुरेन्द्र प्रभु मीजरे।। महा.पु.पर्व १३ श्लोक २०१

१. सौधर्मेन्द्र ने तीर्थंकर के माता—पिता की पूजा की—महा पु. पर्व १४ श्लोक ७८

२. भरत ने राजा राम की अर्घ देकर पूजा की— महा पु. पर्व १४ श्लोक १४

३. सभी पंचकल्याणक प्रतिष्ठा ग्रंथों में भी गर्भ, जन्म कल्याणक विधि में उक्त बालक की अष्ट द्रव्य से पूजा की जाती है।

४. समस्त पूजा व प्रतिष्ठा ग्रंथ तथा उनका वर्णन करने वाले आगम ग्रंथ एवं लेखक आचार्य भी मिथ्यादृष्टि सिद्ध हो जाएँगे।

५. दर्शन पाहुड में आचार्य कुन्दकुन्द देव ने कहा है कि— सम्यग्दृष्टि जीव को सौधर्म इंद्र भी अर्घ देता है— द.पा.गा. ३३

६. अविरत सम्यग्दृष्टि चक्रवर्तियों वे देवेन्द्रों द्वारा वंदनीय होता है—कार्तिकेयानुप्रेक्षा गा. २३६

७.प्रतिष्ठा तिलक में मरूदेवी को अनेकों जगह अर्घ चढ़ाने का विधान है—प्र.ति.पृ.१७६, १७८,१९३, २२०,२३०

८. प्रद्युम्न कुमार की अनेकों देवों ने पूजा की— प्रद्युम्न चारित्र, सर्ग—९

यदि आर्यिका सवस्त्र धारी की पूजा मिथ्यात्व है तो क्या आचार्य शांतिसागर जी, आचार्य महावीर कीर्ति जी, आचार्य वीरसागर जी, आचार्य विमलसागर जी, आचार्य शिवसागर जी, आचार्य ज्ञान सागर जी, आचार्य सुमति सागर जी, आचार्य सन्मति सागर जी, आचार्य देश भूषण महाराज जी, आचार्य बाहुबली सागर जी, आचार्य सुबल सागर जी आदि क्या मिथ्या के पोषक थे। जिनके संघ में आर्यिका पूजा होती थी।

गणिनी आर्यिका विजयमती माताजी; ग.आ.ज्ञानमती माताजी, ग.आ.सुपाश्र्वमती माताजी, गणिनी आर्यिका विशुद्धमति माताजी क्या मिथ्यात्व की पोषक थी।

आ. महावीरकीर्ति के शिष्य आचार्य ज्ञानसागर जी के संघ में क्षुल्लक शीतल सागर जी थे उनके पादप्रक्षालन होते थे तथा अर्घ चढ़ाया जाता था तो आ. ज्ञानसागर जी ने क्या इसका कभी निषेध किया ? नहीं तो वो मिथ्यात्व के पोषक ठहरे।

आचार्य ज्ञानसागर जी के शिष्य और आचार्य विद्यासागर जी के गुरु भाई आ.क.विवेक सागर जी के संघ में आर्यिकाओं (आर्यिका विशालमति, आर्यिका विज्ञानमति माताजी) की नवधा भक्ति होती थी तो क्या वे मिथ्यात्व के पोषक थे ? तथा उक्त माताजी भी क्या मिथ्यात्व की पोषक थीं। आचार्य विद्यासागर जी के दर्शनार्थ आई आ. सुपाश्र्वमति माता जी की नवधा भक्ति हुई थी तो क्या आचार्य श्री भी मिथ्यात्व के पोषक हुए। आपके अनुसार तो ज्ञात होता है कि उक्त सभी अज्ञानी थे मिथ्यादृष्टि थे। इससे आप क्या सिद्ध करना चाहते है कि केवल आप ही शास्त्रज्ञ हैं, सम्यग्दृष्टि है ? अरे भाई ऐसे सम्यग्दृष्टि मत बनो कि आप समस्त आचार्यों व आगम ग्रंथों को मिथ्यात्व पोषक कह दो। सामाजिक विसंवाद और विवाद करा दो। संघो—संघो में राग—द्वेष फैला दो। वात्सल्य गुण को समाप्त कर समाज की एकता और शांति भंग करा दो। अपने गुरु आज्ञा व अनुशासन में चलने वालों को अनुशासन विहीन बना दो, उनके संघ वा गुरु परम्परा से शिष्य को विमुख कर दो अथवा अपने गुरु की आज्ञानुशासन के पालन करने वाले यदि उक्त प्रश्नों के आगमिक प्रमाण दे सके, तो मुझे प्रसन्नता होगी और मैं समझूँगा कि आपके लिए आगम ग्रंथों का ठोस ज्ञान है अन्यथा आप एक बार ‘आगम चक्खू साहू’ ‘आर्यिका आर्यिका है श्राविका नहीं’, ‘आर्यिका’ तथा ‘क्या आर्यिका पूज्य है’ ? पुस्तकों को ध्यान से जरूर पढ़ें। लेकिन विसंवादित विषयों को छेड़कर समाज में कलह न फैलायें और न ही मतभेद बढ़ायें।

भो भव्य! उक्त आगम वाक्य एवं आचार्य परम्परा को मिथ्यादृष्टि सिद्ध करने के पहले सोचो, कहीं आगम व आचार्यों के उक्त वचनों को नहीं मानने या उनका निषेध करने से कहीं आप स्वयं तो मिथ्यादृष्टि सिद्ध नहीं हो रहे हो— जरा सोचो और समाज व संघों में फूट मत डालो।