ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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आगम पाठ में संशोधन परम्परा कहाँ तक उचित है?

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आगम पाठ में संशोधन परम्परा कहाँ तक उचित है?

लेखिका—आर्यिका चंदनामती
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काल परिवर्तन के साथ—साथ जिनेन्द्र भगवान की वाणी में आजकल कुछ ऐसे परिवर्तन हो गए हैं जो दूध पानी की तरह इस प्रकार एक रूप हो गए हैं कि साधारण मानव तो उनकी वास्तविकता अवास्तविकता के बारे में जान ही नहीं सकता है । अनादि निधन अपराजित मंत्र णमोकार जो जिनधर्म और उसके अनुयायियों का मूलमंत्र माना जाता है उसका मूल स्वरूप ‘‘षट्खण्डागम’’ नामक आगम ग्रंथ में इस प्रकार मिलता है—

[सम्पादन] णमोकार मंत्र—

णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं ।
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं ।।

उसी ग्रंथ में टीकाकार श्री वीरसेनाचार्य ने पुस्तक एक के पृष्ठ ४५ पर ‘‘अतिशयपूजार्हत्वात् वा अर्हंत’’ इस वाक्य से ‘‘अरहंताणं’’ पद की व्याख्या करके इसे भी शुद्ध माना है तथा टिप्पण में एक ‘‘अरुहंताणं’’ पद भी दिया है किन्तु यह प्रसिद्धि में नहीं है वर्तमान में दिगम्बर जैन सम्प्रदाय में ‘‘अरिहंताणं’’ और ‘‘अरहंताणं’’ ये दोनों पाठ प्रचलित हैं । श्वेताम्बर परम्परा में प्राय: नमो अरिहंताणं’’ आदि पाठ देखा जाता है ।

इस णमोकार मंत्र को पढ़ने में भी प्राय: लोग जल्दी और प्रमाद के कारण गलती करते हैं मैंने शत प्रतिशत शुद्ध मंत्र पढ़ने वाले बहुत कम स्त्री—पुरुषों को देखा है । यही कारण है कि इस महामंत्र के उच्चारण—जाप्य—चिन्तन—मनन करने वालों को पूर्णफल की प्राप्ति नहीं हो पाती है । जनता से णमोकार मंत्र का शुद्ध उच्चारण कराने में विद्वानों को भी अवश्य ध्यान देना चाहिए । यदि इसके शुद्ध लेखन और पाठन की प्रतियोगिताएँ भी आयोजित की जावें तो अच्छे परिणाम सामने आएंगे और बच्चों—युवाओं में इसके पाठ के प्रति प्रबल संस्कार बनेंगे ।

[सम्पादन] पाठ परिवर्तन का प्रथम परिचय—

आजकल पुस्तकों में नवीन प्रकाशन के माध्यम से जन साधारण के मुंह पर चत्तारि मंगल का परिवर्तित पाठ दृष्टि गोचर हो रहा है । जैसे—‘‘अरहंता मंगलं, अरहंता लोगुत्तमा, अरहंते सरणं पवज्जामि’’ इत्यादि। किन्तु प्राचीन ग्रंथों के अनुसार विभक्ति रहित पाठ ही मान्य होना चाहिए । आचार्यश्री शुभचन्द्र स्वामी द्वारा रचित ज्ञानार्णव ग्रंथ के पृ. ३७७ पर चत्तारि मंगल का विभक्ति रहित पाठ ही आया है । यथा—चत्तारिमंगलं—अरहंत मंगलं, सिद्ध मंगलं, साहु मंगलं, केवलिपण्णत्तो धम्मो चत्तारि लोगुत्तमा। अरहन्त लोगुत्तमा, सिद्ध लोगुत्त्मा, साहू लोगुत्तमा, केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमा। चत्तारि सरणं पवज्जामि—अरहंत संरणं पवज्जामि मंगलं । सिद्ध सरणं पवज्जामि। केवलिपण्णत्तो धम्मो सरणं पवज्जामि ।

यही प्राचीन पाठ क्रिया कलाप तथा प्रतिष्ठा तिलक गंरथ में भी है । किन्तु विभक्ति सहित परिवर्तित पाठ को प्रचलित देखकर एक बार सन् १९८३ में जब मैं ब्रह्मचारिणी कु. माधुरी के रूप में भी उस समय पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने मुझसे इस विषय में अनेक साधुओं एवं विद्वानों के पास पत्राचार कराया था। उनमें से पंडित पन्नालाल जी साहित्याचार्य के पत्र से विदित हुआ कि ‘‘यह विभक्ति लगाकर संशोधित पाठ श्वेताम्बर परम्परा से आया है ।’’ तथा क्षुल्लक श्री सिद्धसागर महाराज मौजमाबाद (दीक्षित आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज) के पत्र में था कि ‘‘प्राकृत व्याकरण के अनुसार इस चत्तारि मंगल पाठ में विभक्तियाँ प्रयुक्त की गई है और ‘‘एदे छ च समाणा’’ सूत्र के अनुसार आ और अ को समान मानकर अरहंता में आ के स्थान पर अ हो गया है अत: यह विभक्ति सहित पाठ होकर भी विभक्ति रहित दिखता है एवं लाघव की दृष्टि से भी यही पाठ शुद्ध है ।’’ इत्यादि समाधानों से प्राचीन पाठ ही इष्ट लगता है अत: विद्वानों को विभक्ति रहित पाठ ही चलाना चाहिए । श्वेताम्बर संप्रदाय द्वारा मूल पाठ में किए गए परिवर्तन को हमें मान्यता नहीं देना चाहिए ।

स्व. पं. मोतीचन्द जी कोठारी—फल्टण, पंडित सुमेरचंद जी दिवाकर—सिवनी, पंडित पन्नालाल सोनी ब्यावर आदि विद्वानों से भी पूज्य माताजी की इस विषय में चर्चाएं हुई थीं उन सभी ने प्राचीन ग्रंथों के आधार पर बिना विभक्ति वाला पाठ ही उचित बताया था। अत: माताजी का कहना है कि मंत्र व्याकरण कुछ अलग ही होते हैं उसका ज्ञान हम लोगों को नहीं है इसलिए मूलमंत्रों में अपने मन से विभक्तियाँ नहीं लगाना चाहिए ।

[सम्पादन] मूलमंत्र में परिवर्तन से आँखों देखी हानि—

सन् १९८८ की बात है अप्रैल में भिण्डर (राज.) में श्रीकल्पद्रुम महामंडल विधान का विशाल आयोजन था। उन दिनों मेरा भी वहाँ जाना हुआ था। विधान के प्रारम्भिक दिनों में ही वहाँ काफी अशान्ति का वातावरण बना हुआ था। आचार्य श्री अजितसागर महाराज के संघ के साधु—साध्वी भी बड़े अशान्त थे और विधान में कोई अपना सानिध्य नहीं प्रदान करते थे। आर्यिका श्री विशुद्धमती माताजी ने भी मुझसे अनेक बातें बताईं ।। संभवत: कई विद्वान् प्रतिष्ठाचार्यों को एक साथ आमंत्रित करने के कारण भी अत्यधिक कलह और विवाद की स्थिति बन गई थी । २—३ दिन वहाँ रुकने के बाद जब मैं वहाँ से वापस आने लगी तो विधान के प्रमुख आयोजक से मेरी बात हुई वे भी बेचारे बड़े खिन्न मन से कहने लगे कि लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी विधान में कोई आनन्द नहीं आ रहा है और न जाने क्या कारण है कि वातावरण एकदम विषाक्त हो गया है । किसी कारणवश एक विद्वान् को तो रात्रि के १२ बजे गुप्तरूप से विदा कर दिया गया ।

पुन: डॉ. मूलचन्द जी शास्त्री (सनावद) ने मुझे मंत्र का एक छपा हुआ कार्ड दिखाया कि इस मंत्र की सवालाख जाप्य हो रही हैंं। मैंने मंत्र देखते ही कहा—अरे ! यह कल्पद्रुम विधान का मूलमंत्र किसने बदलने का साहस किया है ?’’ संभवत: अशान्ति का प्रमुख कारण यह संशोधित मंत्र ही है’’ यही धारणा मेरे मन में रही पुन: मैं वह कार्ड लेकर हस्तिनापुर आ गई। मैंने पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी से जब वहाँ की सारी घटना बताई तो ये भी यही कहने लगीं कि जिसने भी अपनी बुद्धि का दुरुपयोग करके इस मंत्र में परिवर्तन किया है उसे ही अशान्ति का मूल श्रेय है । दरअसल ज्ञानार्णव ग्रंथ के आधार से माताजी ने कल्पद्रुम विधान में त्रयोदश अक्षरी एक मंत्र रखा है—‘‘ऊँ अर्हत्सिद्धसयोगकेवली स्वाहा’’

इस मंत्र में वहाँ परिवर्तन करके ‘‘ऊँ ह्रीं अर्हत्सिद्धसयोगकेवलिभ्यो नम:’’ छपाया गया और उसी का अनुष्ठान हुआ था। संशोधन करने वाले विद्वान् महोदय ने एक तो अपने मन से ‘‘ह्रीं’’ का प्रयोग किया और केवली को चतुर्थी विभक्ति में ‘‘केवलिभ्यो’’ किया है एवं स्वाहा के स्थान पर नम: कर दिया अत: संशोधन और परिवद्र्धन के साथ यह मंत्र १५ अक्षरी हो गया ।

पहली बात तो आचार्य श्री शुभचन्द्र जैसे महान विद्वान् द्वारा लिखित ग्रंथ में उपलब्ध इस मंत्र में संशोधन करने का उन्हें अधिकार ही नहीं था। क्या उन आचार्यदेव को नम: या स्वाहा के योग में चतुर्थी विभक्ति प्रयोग करने का ज्ञान नहीं था ? अथवा ह्रीं और नम: का प्रयोग नहीं करके उन्होंने क्या मंत्र को अधूरा कर दिया था ? अन्यथा परिवर्तन का यह अतिसाहस क्यों किया गया ?

दूसरी बात कल्पद्रुम विधान की रचयित्री गणिनी ज्ञानमती माताजी स्वयं उन दिनों हस्तिनापुर में विराजमान थीं। मंत्र में या किसी भी संशोधन से पूर्व एक बार उनसे भी परामर्श लेना चाहिए था। वे भी व्याकरण—छन्द आदि की ज्ञाता हैं किन्तु इनका मानना है कि मंत्रों का व्याकरण अलग ही होता है पूर्वाचार्य उनके अच्छे ज्ञाता होते थे अत: हमें उनके द्वारा निर्मित मंत्रादिक में अपनी बुद्धि का प्रयोग नहीं करना चाहिए ।

यह साक्षात् देखी घटना मैंने आपको बताई है कि एक मंत्र में परिवर्तन करने से कितना अनर्थ हो सकता है । इस विषय में साधुओं तथा विद्वानों को सदैव ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी विधान आदि में एक पंक्ति का भी परिवर्तन अपने मन से नहीं करना चाहिए ।

[सम्पादन] शान्तिधारा में संशोधन—

अभिषेक पाठ में जो पुरानी शान्तिधारा प्रचलित है उसमें छिन्द—छिन्द भिन्द—भिन्द क्रिया का प्रयोग है और अन्त में एक वाक्य हैं—‘‘इत्यनेन मंत्रेण नवग्रहार्थं गन्धोदक धारा वर्षणम्’’! इन दोनों बातों के लिए एक आचार्य महाराज ने एक बार कहा कि छिन्द—छिन्द के स्थान पर ‘‘छिन्दि—छिन्दि भिन्दि—भिन्दि’’ बोलना चाहिए और ‘‘नवग्रहशान्त्यर्थ गन्धोदक धारा वर्षणम्’’ पाठ बोलना चाहिए । उन्होंने अपना अभिप्राय भी बताया कि व्याकरण के अनुसार ‘‘छिन्द—भिन्द’’ क्रिया गलत है और ग्रहों की शान्ति हेतु ही शान्तिधारा की जाती है न कि ग्रहों के लिए करते हैं अत: शान्त्यर्थं शब्द जरूर जोड़ना चाहिए ।

यद्यपि उन मुनिश्री की बात बिल्कुल सच है । छिद्—भिद् धातु से लोट् लकार मध्यम पुरुष के एक वचन में ‘‘छिन्दि—भिन्दि’’ क्रिया का रूप सिद्ध होता है किन्तु इस शांतिधारा के अतिरिक्त कुछ प्राचीन मंत्रों में भी ‘‘छिन्द—छिन्द—भिन्द—भिन्द’’ का प्रयोग देखने में आया है । हो सकता है उन लोगों को कहीं मंत्र शास्त्रों में ‘‘छिन्द—भिन्द’’ क्रिया मिली हो इसीलिए उन्होंने शान्तिधारा एवं विभिन्न मंत्रों में इस क्रिया का प्रयोग किया हो । इस विषय में पूज्य माताजी बताती हैं कि स्व.ब्र. पं. श्री लालजी शास्त्री कहा करते थे कि सभी धातुएं भ्वादि गण में भी चलाई जा सकती हैं जिससे छिन्द—छिन्द, भिन्द—भिन्द रूप भी बन सकते हैं ।

इसी शान्तिधारा में ‘‘सर्वदु:खं हन हन दह दह........ इत्यादि पाठ के ऊपर भी एक आचार्य मुनिवर की शंका का पत्र पूज्य माताजी के नाम से आया था कि हन् धातु से लोट् लकार में तो ‘‘जहि जहि’’ बनता है न कि हन हन। तब माताजी ने उनको भी यही उत्तर दिया आगम पाठ में संशोधन परम्परा कहाँ तक उचित है?

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