ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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आचार्यभक्ति-संस्कृत

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आचार्यभक्ति

देस-कुल-जाइ-सुद्धा, विशुद्ध-मण-वयण-कायसंजुत्ता।

तुम्हं पाय-पयोरुह-मिह मंगल-मत्थु मे णिच्चं।।१।।

सग-परसमय-विदण्हू, आगम-हेदूहिं चावि जाणित्ता।
सुसमत्था जिण-वयणे, विणये सत्ता-णुरूवेण।।२।।

बाल-गुरु-बुड्ढ-सेहे, गिलाण-थेरे य खमण-संजुत्ता।
वट्टावयगा अण्णे, दुस्सीले चावि जाणित्ता।।३।।

वय-समिदि-गुत्तिजुत्ता, मुत्तिपहे ठाविया पुणो अण्णे।
अज्झावय-गुणणिलये, साहुगुणे-णावि संजुत्ता।।४।।

उत्तमखमाए पुढवी, पसण्णभावेण अच्छजल-सरिसा।
कम्मिंधण-दहणादो, अगणी वाऊ असंगादो।।५।।

गयणमिव णिरुवलेवा, अक्खोहा सायरुव्व मुणिवसहा।
एरिसगुण-णिलयाणं, पायं पणमामि सुद्धमणो।।६।।

संसार-काणणे पुण, बंभम-माणेहिं भव्यजीवेहिं।
णिव्वाणस्स हु मग्गो, लद्धो तुम्हं पसाएण।।७।।

अविसुद्ध-लेस्स-रहिया, विसुद्ध-लेस्साहि परिणदा सुद्धा।
रुद्दट्टे पुण चत्ता, धम्मे सुक्के य संजुत्ता।।८।।

उग्गह-ईहा-वाया-धारण-गुण-संपदेहिं संजुत्ता।
सुत्तत्थ - भावणाए, भाविय - माणेहिं वंदामि।।९।।

तुम्हं गुणगण-संथुदि, अजाण-माणेण जो मया वुत्तो।
देउ मम बोहिलाहं, गुरुभत्ति-जुदत्थओ णिच्चं।।१०।।


अंचलिका- इच्छामि भंते! आइरिय-भत्ति-काउस्सग्गो कओ तस्सालोचेउं,
सम्मणाण-सम्मदंसण-सम्मचारित्तजुत्ताणं पंचविहाचाराणं आयरियाणं,
आयारादि-सुदणाणो- वदेसियाणं उवज्झायाणं, तिरयण-गुणपालण-रयाणं
सव्वसाहूणं णिच्चकालं अंचेमि पूजेमि वंदामि णमंसामि दुक्खक्खओ
कम्मक्खओ बोहिलाहो सुगइगमणं समाहिमरणं जिणगुणसंपत्ति होउ मज्झं।