ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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आचार्यश्री के अमृत वचन

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आचार्यश्री के अमृत वचन

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दि. २२ अप्रैल, २०१४ को परमपूज्य आचार्य श्री विद्यानन्दजी मुनिराज की ९०वीं जन्म जयन्ती थी। इस अवसर पर मैं उनके द्वारा बार—बार बताये जाने वाले ९० अमृत वचनों का चिन्तन—मनन कर उन्हें अपनी विनयांजलि अर्पित करना चाहती हूँ, क्योंकि ये अमृत—वचन ही जीवन के सच्चे रत्न हैं। यथा—

‘‘पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्।

मूढै: पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।।’’

पृथ्वी पर तीन ही सच्चे रत्न हैं—जल, अन्न और सुभाषित (अमृत—वचन)। पाषाण के टुकड़ों को तो मूढ़ (अज्ञानी) लोग ‘रत्न’ कहते हैं।

१. आशावादी पुण्यात्मा है और निराशावादी पापी।

२. आपको अपना धर्म पालने की स्वतंत्रता है, परन्तु दूसरों के धर्म की निन्दा मत करो।

३. वाचन से पाचन महान है।

४. भगवान समवसरण में कमल से भी ऊपर रहकर हमें समस्त परिग्रह से दूर निर्लिप्त रहने की प्रेरणा देते हैं।

५. धर्मध्यान अमृत के समान थोड़ा भी कल्याणकारी है—‘पीयूषं न हि नि: शेषं पिबन्नेव सुखायते।’

६. भाषण हमेशा गन्ने जैसा करना चाहिए, बांस जैस नहीं।

७. मौन से सर्व प्रयोजन सिद्ध हो जाते हैं—‘मौनं सर्वार्थसाधकम्’।

८. आतंकवाद कहता है—‘मारो और मरो’, अनेकान्तवाद कहता है—‘जीयो और जीने दो।’

९. अनेकान्तवाद का सरल अर्थ है—सबके साथ समुचित समन्वय की कला।

१०. अहिंसा का सरल अर्थ है—किसी का मन व्यर्थ में मत दुखाओ।

११. स्याद्वाद का सरल अर्थ है—पहले तोलो, फिर बोलो।

१२. अपरिग्रह का सरल अर्थ है—अति लोभ खतरे की घंटी है।

१३. आत्मानुशासन का सरल अर्थ है—स्वयं का स्वयं पर अनुशासन करो।

१४. ‘शिक्षक’ शब्द का अर्थ है—शिष्ट, क्षमाशील और कर्मठ। ‘अध्यापक’ शब्द का भी अर्थ है—अध्ययन शीत, ध्याननिष्ठ, पापभीरू और कत्र्तव्यनिष्ठ।

१५. जो समय का पालन करना नहीं जानता, वह समयसार को कैसे जानेगा ?

१६. समयसार का एक अर्थ यह भी है कि जितना समय अपनी आत्मा को दिया उतना ही सारभूत है, बाकी असार है।

१७. रोज घर, दुकान, कार, जूते, कपड़े आदि सभी वस्तुओं की सफाई करते हो, मन की सफाई के लिए भी तो पाँच दस मिनट निकालो।

१८. २४ घण्टे में कम से कम २४ मिनट तो धर्मध्यान के लिए अवश्य निकालना चाहिए। १० मिनट स्वाध्याय, १० मिनट भक्ति—पूजन और ४ मिनट ध्यान सामायिक।

१९. मन को सदैव किसी न किसी सत्कार्य में व्यस्त रखो—जो व्यस्त है वह स्वस्थ है।

२०. ज्ञान का फल प्रसन्नता है, ज्ञानी कभी दु:खी नहीं होता, सदा मुस्कराता रहता है।

२१. जिसके आगे दुख पिघल जायें वह ज्ञानी और जो दुखों के आगे पिघल जाये वह अज्ञानी।

२२. धर्म बढ़े तो घन बढ़े, धन बढ़ मन बढ़ जाय।

मन बढ़ते सब बढ़त है, बढ़त बढ़त बढ़ जाय।

२३. धर्म घटे तो धन घटे, धन घट मन घट जाय। मन घटते सब घटत है, घटत—घटत घट जाय।।

२४. ज्ञानी मन्दिर में तो जाता है और दुकान पर उसे जाना पड़ता है, किन्तु अज्ञानी दुकान पर तो जाता है और मन्दिर में उसे जाना पड़ता है।

२५. धर्म का फल नकद (तत्काल) मिलता है, उधार नहीं। जिसका फल उधार (बाद में) मिले वह धर्म नहीं, वह तो कर्म है।

२६. ‘उन्नतं मानसं यस्य भाग्यं तस्य समुन्नतम्।’ अर्थात् जिसका मन ऊँचा है, उसका भाग्य भी ऊँचा है।

२७. कभी किसी काम को छोटा नहीं समझना चाहिए। जो आदमी झाडू लगाने को भी तैयार हो वही सफल हो सकता है।

२८. अध्यात्म का ज्ञान होना सभी के लिए जरूरी है, वही श्रेय प्रेय है; परन्तु यह खेद का विषय है कि आज हमारे साधुओं को भी अध्यात्म का ज्ञान नहीं है।

२९. जो भी पर के पीछे लगा, वही बरबाद हो गया। स्वर्ण मृग के पीछे राम लगे तो सीता को खो बैठे और सीता के पीछे रावण लगा तो वह अपने प्राणों तक से हाथा धो बैठा।

३०. ‘नि:स्नेहो यति निर्वाणं स्नेहात् भवति बन्धनम्।’ अर्थात् राग ही बन्ध का कारण है, राग—रहित (वीतराग) को तो निर्वाण की प्राप्ति हो जाती है।

३१. ‘संसारोऽपि सार: स्यात् दम्पत्योरेककण्ठयो:। अर्थात् यदि पति—पत्नी एक कण्ठ हैं तो संसार भी कथंचित् सारभूत है।

३२. ‘आचारहीनं न पुनन्ति वेदा:।’ अर्थात् आचार—विहीन व्यक्ति को शास्त्र भी पवित्र नहीं कर सकते।

३३. भगवान बाहुबली की र्मूित शिक्षा देती है कि जो माँ—बाप अपने बच्चों को अपने पैरों पर मजबूती से खड़ा कर दें वे ही धन्य है।।

३४. ‘वृद्धा नारी ईश्वरी’। अर्थात् वृद्धा स्त्री भगवान के समान होती है।

३५. रोज चार रोटी पचाते हो, कभी किसी के दो शब्द भी पचाना सीखो।

३६. तराजू के एक पलड़े में सारा पृथ्वीमंडल रखो और दूसरे में अकेला समयसार तो भी समयसार ही भारी पड़ेगा।

३७. क्षमा को मात्र विचार नहीं, आचार भी बनाओ।

३८. क्षमा करने वाला सुख की नींद सोता है, अक्षमावान की रात्रि जागरण में जलते बीतती है।

३९. भजन के बाद भोजन अच्छा लगता है।

४०. चींटी बनकर चीनी खाओ, हाथी बनकर गन्ने का खेत मत उजाड़ो।

४१. ‘अनुकरणप्रिया: शिष्या/बाला:। अर्थात् शिष्य गुरु का अनुकरण करते हैं अत: गुरु को सदाचारी ही होना चाहिए। और बालक भी मात—पिता का अनुकरण करते हैं, अत: माता—पिता की भी बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है।

४२.पार्श्वनाथ‎ और कमठ के जीवन—चारित्र को बार—बार पढ़कर यह निर्णय कर लेना चाहिए कि मुझे पार्श्र्वनाथ के पार्श्र्व में बैठना है या कमठ के मठ में।

४३. कभी भी किसी को दु:खी नहीं करना चाहिए, चाहे वह कोई भी हो, छोटा ही हो, क्योंकि ऐसा करने से उसके हृदय से बद्दुआ निकलती है जो हमारा बड़ा नुकसान कर सकती है।

४४. ‘स्पष्टवक्ता न वंचक:।’ अर्थात् स्पष्टवादी व्यक्ति हमें तत्काल तो बुरा लग सकता है, पर वह बुरा नहीं होता।

४५. जिस प्रकार गाड़ी चलाते समय यदि आगे दीवार आ जाये तो हम गाड़ी से उतरकर दीवार को नहीं मोड़ने लगते, अपितु अपनी ही गाड़ी मोड़ लेते हैं, उसी प्रकार दूसरों को बदलने का चक्कर छोड़कर हमें स्वयं को ही बदल लेना चाहिए। यही सुख—शांति का मार्ग है।

४६. ऋषभदेव ने अपनु पुत्रों को सुख—शान्ति से रहने के लिए ५ शिक्षायें दी थीं—स्वतंत्रता, स्वच्छन्दता नहीं, स्वावलम्बन, स्वयं को ही बदलो, सदा प्रसन्न रहो।

४७. ऋषभदेव ने ‘सादा जीवन उच्च विचार’ की शिक्षा दी थी। सच में, ऊँचे विचारों के लिए जीवन में सादगी आवश्यक है।

४८. जो सदैव मुस्कुराता रहे वही धर्मात्मा है, ज्ञानी है।

४९. अज्ञानी का गुरु बनने की बजाय ज्ञानी का शिष्य बनना अच्छा है।

५०. समयसार तो माता के दूध के समान सुपाच्य है। उसे सभी को पढ़ना चाहिए।

५१. धर्मात्मा वह है जो केवल अन्न खाकर जीवित नहीं रहता, अपितु सदा ज्ञानामृत का भोजन करता रहता है— ‘‘ज्ञानामृतं भोजनम्।’

५२. श्रीकृष्ण भी दूसरों को (कौरव—पाण्डवों को) नहीं समझा सके, हम किस पेड़ के पत्त हैं ? अत: दूसरों को सुधारने की चिन्ता छोड़कर अपना ही हित कर लेना चाहिए।

५३. अरे सुधारक जगत् के चिन्ता मत कर यार। तेरे मन ही जगत है, पहले इसे सुधार।।

५४. जो दूसरों को अपने हिसाब से चलाना चाहता है, वह एक प्रकार से आतंकवादी ही है—महामोहातक।

५५. छोटे लोग ही ऊपर बैठने की अभिलाषा करते हैं, बड़ों को ऊपर—नीचे से कोई फर्क नहीं पड़ता। देखो अक्षर बड़े हैं फिर भी नीचे होते हैं और बिन्दी छोटी होती है फिर भी उनके ऊपर लगती है।

५६. दिव्यध्वनि को केवल इसीलिए दिव्यध्वनि कहते हैं, क्योंकि वह दिव्य अर्थों की घ्वननकत्र्री है। बाकी उसमें और कोई अद्भुत चमत्कार जैसी कुछ बात नहीं होती है।

५७. भावपूजा, द्रव्यपूजा, तीर्थयात्रा आदि किसी भी बाहृय क्रिया का आलम्बन लो, पर उसका एक ही फल ‘परिणामशुद्धि’ होना चाहिए—‘केनाप्युपायेन फलं हि साध्यम्।

५८. सम्यग्दर्शन, संयम, तप, ध्यान आदि सभी धर्मभावों को दोनों प्रकार से कहा जा सकता है—सहजसाध्य भी और यत्नसाध्य भी। तीर्थंकर जैसे कुछ महापुरुषों के लिए सब कुछ सहजसाध्य होता है और प्राथमिक जीवों के लिए सब कुछ यत्नसाध्य होता है।

५९. एक—एक शब्द में बहुत गहरे भाव भरे होते हैं। स्वाध्यायी जनों को, खासकर वक्ताओं को जो रोज ही एक— एक शब्द को गूढ़ विश्लेषण करके समझने की कोशिश करनी चाहिए।

६०. जिसके पास अच्छा शब्द—भण्डार होगा, वही अच्छा वक्ता बन सकता है। जिस स्त्री के पास बाल न हों वह जूड़ा नहीं बना सकती, उसी प्रकार जिसके पास शब्द—भण्डार न हो वह वक्ता या लेखक नहीं बन सकता। देखों—‘‘कोषस्येव महीपानां कोशस्य विदुषामपि। उपयोगों महान् यस्मात्क्लेशस्तेन विना भवेत्।’’

६१. ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन नामों को हम आधुनिक युग में कुछ इस प्रकार बदल सकते हैं—१. भूदेवता, २. भूस्वामी, ३. भूकुबेर, ४. भूसेवक।

६२. अण्णोण उवयारेण जीवा। परस्परोपग्रहो जीवानाम्। बिना सहकार नहीं उद्धार।

६३. आचार्य शान्तिसागरजी महाराज कहते थे कि चलते समय दूसरों से हटने की मत कहो, स्वयं बचकर चलो। यह बड़े काम की बात है।

६४. ‘जेनूं काम तेनाथी थाय, बीजूँ करे तो गोता खाय।’ अर्थात् जो काम जिसका है, वह उसी से हो सकता है, दूसरा नहीं कर सकता।

६५. क्षेत्रपाल—पद्मावती को चाहे पूजो मत, पर उनकी निन्दा मत करो। जिनधर्म की प्रभावना में उनका सदा ही बड़ा योगदान रहा है, अत: उनके प्रति उपकार का भाव रखो।

६६. चूहे के पास न घर है, न दुकान, न कपड़ा, न बैंक बैंलेंस, न शादी—ब्याह और न बेटा—बेटी; फिर भी वह संसारी है, क्योंकि चित्त में मोह—राग, द्वेष भरे हैं। इसी प्रकार कोई भी हो, चाहे वह ध्यानमग्न ही रहता हो किन्तु यदि उसका चित्त मोह—राग—द्वेष—युक्त है तो संसारी है—‘चित्तमेव हि संसारो रागादिक्लेशवासितम्।’

६७. सैनिक को ‘शस्त्र’ और साधु को ‘शास्त्र’ सदैव अपने हाथ में रखना चाहिए। इसी में उनकी रक्षा है। अन्यथा दोनों का विनाश अवश्यंभावी है।

६८. इतिहास साक्षी है कि गलत लोगों के हाथ देश का शासनसूत्र लग जाने से अनेक देश बरबाद हो चुके हैं, अत: मतदाताओं को सोच—समझकर अपना मत अच्छे/उदार व्याक्त को ही देना चाहिए।

६९. देश की समृद्धि व महानता के सूचक मात्र ऊँचे भवन और महंगे मार्ग (रोड़) आदि नहीं होते, अपितु पढ़े— लिखे सभ्य सुसंस्कृत नागरिक होते हैं।

७०. मन्दिर जाकर हमें अपने आत्मस्वरूप का अनुसन्धान करना चाहिए। यही सच्ची भक्ति है—‘स्वस्वरूपानुसन्धानं भक्तिरित्यभिधीयते।’’

७१. दुनिया के सभी धर्मों में से जैनदर्शन की विशेषता है—स्वतन्त्रता और स्वावलंबन।

७२. जो व्यक्ति एक अरिहंत देव की ही दृढ़ श्रद्धा रखता है और शुद्ध शाकाहारी है वह पक्का जैन है।

७३. जैनदर्शन निग्र्रंथ है—इसका अर्थ यह भी कि दुनिया के सभी धर्म अपने—अपने ग्रंथ विशेष से बँधे हुए हैं, पर जैनदर्शन किसी ग्रंथ विशेष से नहीं बँधा है।

७४. समाज में दो प्रकार के लोग पाये जाते हैं—१. कैंची जैसे, जो हमेशा काटने का काम करते रहते हैं और २. सुई—धागा—जैसे, जो हमेशा जोड़ने का काम करते रहते हैं। ध्यान रखना, हमें कैंची जैसे नहीं सुई धागा जैसे बनना है।

७५. जिनवाणी के वक्ताओं को सामाजिक दृष्टि से भी बहुत सोच—समझकर अपनी जबान चलानी चाहिए। हम अल्पसंख्यक हैं, हमें दूसरों की आस्था पर चोट पहुँचाने वाले कोई शब्द सभा में नहीं कहने चाहिए। अन्यथा कभी भी हमारी समाज पर भयानक संकट आ सकता है। पहले अनेक बार आया है। इतिहास इसका साक्षी है।

७६. संगीत में महान शक्ति है। हमें प्रतिदिन थोड़ी देर अच्छा संगीत गाना या सुनना चाहिए। इससे सम्पूर्ण तनाव दूर होकर अच्छे कार्यों से चित्त एकाग्र होता है।

७७. श्रावकों के जीवन में मन्दिर का बड़ा भारी महत्त्व है। मन्दिर का कार्य घर में कदापि नहीं हो सकता है। घर ममता का प्रतीक है और मन्दिर समता का।

७८. सामाजिक संगठन के लिए भी मन्दिर की बड़ी उपयोगिता है। जिस प्रकार किसी एक स्थान पर गुड़ की भेली रख दी जाए तो चारों ओर की चाींटी—मक्खी वहीं आकर इकट्ठी हो जाती है, उसी प्रकार किसी स्थान पर मन्दिर बनाओ तो चारों ओर से सिमटकर सारी समाज वहीं आ बसती है।

७९. बच्चों को जन्म देना ही पर्याप्त नहीं है, उन्हें अच्छे संस्कार भी देना चाहिए। इस कार्य में माताओं की बहुत बड़ी भूमिका होती है, क्योंकि एक अच्छी मां १०० शिक्षकों से भी बढ़कर कही गई है—A good mother is better than hundred teachers.

८०. समाज में छोटे से बड़े तक सभी का अपना—अपना यथायोग्य स्थान होता है। किसी एक ही व्यक्ति के सहारे समाज नहीं चलता। क्या कहीं एक स्तम्भ पर पूरा महल खड़ा हो सकता है ?

८१. समाज में एकता का वातावरण होना बहुत जरूरी हैं। हमारे किसी से मतभेद हो सकते हैं, पर मनभेद नहीं होने चाहिए।

८२. प्राकृतभाषा हमारी मातृभाषा है। यदि हमने इसकी रक्षा नहीं की, आने वाली पीढ़ियों को इसकी शिक्षा नहीं दी तो हम जिन्दा नहीं रह सकेगे।

८३. यदि हमारेपास चार रोटी है तो हम एक रोटी दूसरे को भी दे सकते हैं, यदि स्वयं एम. ए. पढ़ रखा हो तो दूसरे को बी. ए. का पढ़ा सकते हैं, यदि स्वयं तैरना जानते हों तो दूसरे को तैरना सिखा सकते हैं; इसी प्रकार यदि स्वयं ने आत्म कल्याण किया हो तो दूसरे को कल्याण का मार्ग दिखा सकते हैं; परन्तु अपना आत्मकल्याण न करके दूसरों के ही कल्याण की बात सोचना भारी अज्ञानता है।

८४. जो पड़ोसी से प्यार करता है वही धर्मात्मा है। जो पड़ोसी से द्वेष रखता है वह अपने धर्म की हंसी उड़वाता है।

८५. संसार दु:खमय है। हमें इन दु:खों में भी कांटों में गुलाब की भाँति प्रसन्न रहने की कला सीखनी होगी।

८६. धर्म तो आदर्श नागरिक बनाने की फैक्ट्री है। वह झगड़े नहीं कराता। कोई उसके नाम पर झगड़ा करे तो इसमें धर्म का क्या दोष है ? अग्नि, पत्थर, शब्द आदि सभी का सदुपयोग भी हो सकता है और दुरुपयोग भी।

८७. ज्ञान का फल आनन्द है, अत: जो हर परिस्थिति में मुस्कुराता है वह ज्ञानी है। ज्ञानी कभी दुखी नहीं होता— ‘न हि विषादो विधेयात्र तद्धि वैदुष्यजं फलम।’’

८८. संसार में सब कुछ मिलना सरल है, पर सत्संगति मिलना दुर्लभ है। सत्संग: स्वर्गवास:सत्संग स्वर्ग में निवास करना है।

८९. धन प्राप्त होना आसान है, पर उस धन का अच्छे कार्यों में लगना बड़े भाग्य से होता है।

९०. ‘ज्ञानात् त्याग: त्यागात् शान्ति’ ज्ञान से त्याग होता है और त्याग से शांति प्राप्त होती है।



श्रीमती नीतू जैन'
प्राकृतविद्या अप्रैल—जून २०१४ पृ. ८२ से ८८ तक'