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आचार्यश्री शांतिसागर धाम : एक राष्ट्रीय स्मारक

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शाश्वत तीर्थ सम्मेदशिखर जी में सदी का महान निर्माण

आचार्यश्री शांतिसागर धाम : एक राष्ट्रीय स्मारक

प्रेरणा - गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी
-पीठाधीश स्वस्तिश्री रवीन्द्रकीर्ति स्वामी जी (अध्यक्ष)
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मुझे अपनी गुरु पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के बारे में अपनी अभिव्यक्ति प्रस्तुत करते हुए आज महान गौरव हो रहा है तथा मेरी लेखनी नि:शब्द हो रही है। क्योंकि जिस महान साध्वी ने ‘‘बाल विकास’’ जैसी छोटे बच्चों की पुस्तक का लेखन किया है, उन्हीं के करकमलों से षट्खण्डागम जैसे महान सिद्धान्त ग्रंथ का भी टीका लेखन किया गया है। इसी के साथ पूज्य माताजी ने जहाँ विभिन्न स्थानों पर विहार के दौरान गाँव, कस्बे, मोहल्ले आदि में जिनमंदिर आदि निर्माण की प्रेरणा दी, उन्हीं की अति विशिष्ट प्रेरणा से आज विश्व में सबसे ऊँची भगवान ऋषभदेव की १०८ फुट उत्तुंग विशाल प्रतिमा का निर्माण मांगीतुंगी में चल रहा है और जम्बूद्वीप, प्रयाग, कुण्डलपुर आदि तीर्थों का भव्य विकास भी समाज के समक्ष है। इन सब कार्यों की सफलता में अथ से इति तक पूज्य माताजी का आशीर्वाद एवं उनकी तपस्या का वरदान ही प्रबल निमित्त सिद्ध हुआ है। अब मुझे पुन: आप सभी को एक नई शुभ सूचना प्रदान करते हुए अत्यन्त हर्ष एवं गर्व हो रहा है कि पूज्य माताजी के मुख से अब एक नये तीर्थ निर्माण की प्रेरणा प्राप्त हुई है, जो इस बीसवीं-इक्कीसवीं शताब्दी का एक महान स्तंभ एवं राष्ट्रीय स्मारक के रूप में प्रसिद्ध होगा। ‘‘आचार्य श्री शांतिसागर धाम’’, यही है इस राष्ट्रीय स्मारक का नाम, जिसके लिए पूज्य माताजी की भावनानुसार शाश्वत सिद्धक्षेत्र सम्मेदशिखर जी में भूखण्ड क्रय करके इस योजना का क्रियान्वयन दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान के अन्तर्गत अपनी जुझारू नीति के अनुरूप ही प्रारंभ कर दिया गया है।

बीसवीं सदी के प्रथम आचार्य एवं आर्ष परम्परा के महान संरक्षक परमपूज्य चारित्रचक्रवर्ती आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज जो पूज्य माताजी के गुरूणांगुरु हैं, उनके प्रति पूज्य माताजी की अनन्त श्रद्धा भक्ति का ही यह परिचायक है कि आज हमें उन आचार्य महाराज के नाम से एक विशेष तीर्थधाम को निर्मित करने की प्रेरणा प्राप्त हुई है। आचार्य महाराज ने दक्षिण भारत से उत्तर भारत की ओर विहार करके जैनधर्म की महती प्रभावना की तथा सम्पूर्ण भारतवर्ष में मूलाचार ग्रंथ के अनुसार आर्ष परम्परा की प्राचीनता का संरक्षण करके मोक्ष मार्ग की वास्तविक चर्या को प्रगटित किया। उन्होंने दक्षिण से आकर उत्तर भारत में दिल्ली जैसी राष्ट्रीय राजधानी में चातुर्मास किया और अंग्रेजों के शासन काल में भी जन-जन में दिगम्बर जैन साधु का स्वरूप और उसकी वास्तविक चर्या को प्रस्तुत करने का महान एवं सार्थक उपक्रम किया। उनकी यह यात्रा यहीं सम्पन्न नहीं हुई अपितु सम्मेदशिखर जैसे शाश्वत तीर्थ तक उन्होंने दिगम्बर जैन साधु परम्परा के प्रति भक्तों में जागृति पैदा करके अनेक धर्मात्माओं एवं भव्यात्माओं पर अनंत उपकार किये, सच्चे गुरु का दर्शन दिया और कई भव्यात्माओं को वैराग्य के मार्ग पर अग्रसर कर जिनसंस्कृति की पताका को दिग्दिगंत बनाया।

अत: ऐसे महान आचार्य की सम्मेदशिखर यात्रा का अमर संदेश प्रदान करने के लिए स्थायित्व रूप से पूज्य माताजी की प्रेरणानुसार वहाँ ‘‘आचार्यश्री शांतिसागर धाम’’ का निर्माण प्रारंभ किया गया है। इस कार्य के लिए सम्मेदशिखर जी में बिल्कुल मेनरोड पर प्रकाश भवन के समीप ही लगभग एक एकड़ जमीन खरीदकर २१ अक्टूबर २०१३ को भूमिपूजन किया जा चुका है। पुनः पूज्य मुनिश्री पुण्यसागर जी के संघ सान्निध्य में १६ जनवरी- २०१४ को श्रीक्षेत्र का शिलान्यास भी हो चुका है । परिसर में बाउन्ड्री आदि का निर्माणकार्य चल रहा है ।

चूँकि सम्मेदशिखर जी से वर्तमानकाल में सर्वप्रथम तीर्थंकर श्री अजितनाथ भगवान ने मोक्ष प्राप्त किया था अत: पूज्य माताजी की प्रशस्त प्रेरणा व भावनानुसार ‘‘आचार्य श्री शांतिसागर धाम’’ में २७ फुट उत्तुंग भगवान अजितनाथ की लालवर्णी विशाल प्रतिमा विराजमान करने का निर्णय हुआ है, जिसके लिए पाषाण का आर्डर संस्थान द्वारा दिया जा चुका है। इसके साथ ही आचार्य महाराज के जीवन पर आधारित एक बहुमूल्य राष्ट्रीय स्मारक का निर्माण भी इस तीर्थ पर प्रस्तावित है और यात्रियों की सुविधा के लिए डीलक्स फ्लैट्स की सुंदर धर्मशाला व भोजनशाला आदि समुचित व्यवस्था का प्रबंध भी किया जायेगा।

इस योजना को साकार करने में हमें दक्षिण भारत जैन सभा के चेयरमैन प्रो. डी.ए.पाटिल-जयसिंहपुर एवं सभा के ट्रस्टी श्री श्रीपाल जैन-गेवराई, गणिनी ज्ञानमती माताजी भक्तमण्डल महाराष्ट्र के समस्त सदस्यों तथा संस्थान के स्तंभ दिल्ली के भक्तों का बहुमूल्य सहयोग प्राप्त हो रहा है अत: हमें विश्वास है कि आप सभी की सहभागिता एवं समस्त दिगम्बर जैन समाज के सहयोग से इस कार्य को शीघ्रता के साथ निर्धारित लक्ष्य पूर्ण करके आचार्य महाराज के प्रति अपनी सच्ची श्रद्धांजलि व विनयांजलि समर्पित कर सकेंगे ।