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आचार्य देवसेन व्यक्तित्व कृतित्व

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आचार्य देवसेन व्यक्तित्व कृतित्व

लेखिका—शोध छात्रा सुनीता जैन
मेरठ विश्वविद्यालय, मेरठ

प्राचीन काल से भारत में श्रमण और सनातन दो संस्कृतियाँ प्रचलित हैं इन दोनों संस्कृतियों की र्पूित करने वाले तप:पूत ऋषियों, मर्हिषयों और मनीषियों ने पुराण, साहित्य, कथा साहित्य, आगम, अध्यात्म, व्याकरण ज्योतिष और साहित्य के अनेकानेक ग्रंथों की रचना कर वांग्मय की महती आर्पूित की है। श्रमण संस्कृति के उन्नायक विशेषत: दिगम्बराचार्य एवं मुनिगण हैं। उन्होंने स्वयं साधना कर जहाँ आत्म कल्याण किया, वहीं ग्रंथों का सृजन कर और ग्रंथों में जिनधर्म के रहस्यों को गुम्फित कर अन्य सामान्य—बुद्धि मानवों का मार्ग प्रदर्शन कर परकल्याण भी किया है। इन्हीं आचार्यों की परम्परा में परमजिनागम रहस्यज्ञाता, उभयभाषावेत्, नयचक्रसंचारक, धुरन्धर अक्षुण्णचारित्र पालनकधीर, मूलसंघ कुन्दकुन्दाम्नाय के समर्थ पोषक एवं प्रचारक महाप्राज्ञ आचार्य देवसेन एक अलौकिक ज्योतिपुंज थे। लब्ध प्रतिष्ठित उद्भट विद्वान वीतराग मर्हिष आचार्य देवसेन के नाम एवं महिमा से हम जितने परिचित हैं उनके जीवन के उतने ही अपरिचित हैं। लोकेषणा से दूर रहने वाले जैनाचार्यों की यह विशेषता रही है कि महान् से महान् ऐतिहासिक कार्य करने के बाद भी अपने व्यक्तित्व जीवन के सम्बन्ध में कहीं कुछ उल्लेख नहीं करते। आचार्य देवसेन ने भी इस परम्परा का पूर्णत: निर्वाह किया है। उन्होंने स्वयं अपने विषय में कुछ नहीं लिखा है। इनका विधिवत् परिचय तो कहीं प्राप्त प्राप्त नहीं होता किन्तु इनके द्वारा रचित ‘‘दर्शनसार’’ ग्रंथ के पुष्पिका वाक्य में प्राप्त गाथाओं के आधार पर उनके रचना—काल और रचना—स्थल पर प्रकाश पड़ता है। पूर्वाचार्य रचित गाथाओं का एकत्र संग्रह करके देवसेनश्री ने धारा नगरी में निवास करते हुए यह दर्शनसार जो कि भव्यों के लिए हाररूप है—श्री पाश्र्वनाथ जिनालय में निर्वाण संवत् ९९० की माघ सुदी दशमी को रचा है। उपर्युक्त कथन से दो बातें सिद्ध होती हैं—एक तो यह कि आचार्य देवसेन स्वयं गणी थे अर्थात् गण के नायक थे और दूसरे वि. स. ९९० में दर्शनसार की रचना की।

पुव्वारियकयाइं आहाइं सांचऊण एयत्थ।

सिरिदेव नगणिणा धाराए संवसंवेण।।४९।।

रइयो दंसणसारो हारो भव्वाण णवसए णवए।
सिरिपासणाहगेहे सुविसुद्धे माहसुद्धदसमीर।।५०।। दर्शनसार गाथा—४९, ५०

उन्होंने स्वरचित ‘‘भावसंग्रह’’ की अन्तिम गाथा में अपने को श्री विमलसेन गणधर का शिष्य बताया है। यथा— ‘‘श्री विमलसेन गणधर के शिष्य आचार्य देवसेन ने अज्ञजनों के बोधनार्थ यह भावसंग्रह सूत्र ग्रंथ रचा है। अपनी अन्य रचनाओं में उन्होंने अपना परिचय नहीं दिया है और न उन ग्रंथों के रचनाकाल आदि का ही निर्देश किया है।

आचार्य देवसेन की आम्नाय

यद्यपि इनके किसी ग्रंथ में इस विषय का उल्लेख नहीं है। कि वे किसी संघ के आचार्य थे, परन्तु दर्शनसार के पढ़ने से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि मूलसंघ के आचार्य थे दर्शनसार में उन्होंने काष्ठासंघ, द्राविड़संघ, माथुरसंघ और यापनीयसंघ आदि सभी दिगम्बर संघों की उत्पत्ति बतलाई है और उन्हें मिथ्यात्वी कहा है, परन्तु मूलसंघ के विषय में उन्होंने कुछ नहीं कहा है अर्थात् उनके विश्वासानुसार यही (मूलसंघ) मूल से चला आया है और यही वास्तविक संघ है। आचार्य देवसेनगणी कुन्दकुन्दाचार्य की आम्नाय में थे, यह तथ्य दर्शनसार के निम्न कथन से स्पष्ट हो जाता है— ‘‘यदि आचार्य पद्मनन्दि (कुन्दकुन्दस्वामी) सीमंधरस्वामी द्वारा प्राप्त दिव्य ज्ञान के द्वारा बोध न देते तो मुनिजन सच्चे मार्ग को कैसे जानते।

देवसेनाचार्य की महत्ता और पूज्यता—

‘‘द्रव्यस्वभावप्रकाश’’ नामक एक सुन्दर ग्रंथ हैं, जिसकी गाथारूप में रचना माइल्ल धवल ने की है। ये माइल्ल धवल ने की है। ये माइल्ल धवल भी उद्भट विद्वान् प्रतीत होते हैं। उन्होंने उक्त अपने ‘‘दव्वसहावपयास’’ नामक ग्रंथ में उल्लेख किया है कि देवसेन योगी के चरणों के प्रसाद से यह ग्रंथ में बनाया है। इससे स्पष्ट सिद्ध है कि आचार्य देवसेन मूलसंघ के एक महान् योगी और महान् विद्वान थे, मुनिगण और आचार्यो द्वारा पूज्य थे। नयचक्र के अन्त में यह गाथा मिलती है— ‘‘स्यात् शब्द सुनय द्वारा दुर्नय शरीरधारी दानव के विदारण करने में महान् वीर जो नयचक्र के कर्ता आचार्य देवसेन हैं उन देवसेन गुरु को नमस्कार करो।’’

सिरिविमलसेणगणहर सिस्सो णामेण देवसेणोत्ति।

अबुहजणबोहणत्थं तेणयं विरइयं सुत्तं।।१०१।। भावसंग्रह गाथा—१०१
जइ पउमणंदिणाहो सीमंधरसामि दिव्वणाणेण।
ण विवोह इतोसमणा कह सुमाणं पयाणंति।।४३।। दर्शनसार गाथा—४३
सियसद्द सुणय दुण्णय दणुदेह विदारणे वरवीरं।
तं देवसेण देवं णयचक्कयरं गुरुं णामह।।४२।। नयचक्र गाथा—४२

उपर्युक्त विवरण से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि आचार्य देवसेनगणी एक महान् उद्भट विद्वान हुए हैं। वे दसवीं शती के प्रबुद्ध मनीषी तथा कुन्दकुन्द की आम्नाय में मूलसंघ के आचार्य थे। आचार्यश्री देवसेन आचार्य विमलसेनगणी के शिष्य थे और स्वयं अनेक मुनियों के गणी हुए हैं। श्लोकर्वाितक में आचार्य विद्यानन्दि ने जिन नयों का वर्णन किया है, वह वर्णन पुरातन नयचक्र से मिलता है, जिसके नष्ट होने पर उन्होंने लघुनयचक्र रचा है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि आचार्य देवसेन आचार्य विद्यानन्दि के पश्चात् हुए प्रतीत होते हैं। आचार्य देवसेन की भगवत्कुन्दकुन्द में दृढ़ श्रद्धा थी, इस बात का उल्लेख उन्होंने दर्शनसार में किया है। उन्होंने मालवा प्रांत को बहुत काल तक अपने विहार से पवित्र किया। अध्यात्म चेतना को उद्बुद्ध करने वाली आचार्य देवसेन की रचनायें न केवल जैन वाग्मय में अपितु सम्पूर्ण भारतीय साहित्य में विशिष्ट स्थान रखती है। आचार्य प्रवर देवसेन ने दर्शन, अध्यात्म, जैन ऐतिहासिक ज्योतिष आदि विषयों पर विविध ज्वलन्त रचनायें की हैं। आचार्य देवसेन ने समन्वयानेकान्तवादी होते हुए भी अपनी कृतियों में मिथ्यात्व मत का सम्यक् खण्डन करके सत्य धर्म का प्रतिपादन स्पष्ट एवं निर्भय रूप से किया है। कृतित्व से ही व्यक्तित्व को पहचाना जाता है, यह न्यायानुसार उनकी परम पावन लेखनी—प्रसूत सुकृतियों में उनका व्यक्तित्व स्पष्ट प्रतिबिम्बत होता है। सम्प्रति उनके द्वारा रचित उपलब्ध ग्रंथ निम्नलिखित हैं—

(१) दर्शनसार,

(२) आराधनासार,

(३) तत्वसार,

(४) लघुनयचक्र,

(५) आलापपद्धति,

(६) भावसंग्रह ‘‘धर्मसंग्रह’’ नामक ग्रंथ अप्राप्य है।

इन ग्रंथों में उन्होंने दर्शन, ध्यान, अध्यात्म आदि विषयों का प्रतिपादन किया है। इन कृतियों का यहाँ दिग्दर्शन मात्र किया जा सकता है।

(१) दर्शनसार—

प्राकृत दोहा बद्ध प्रस्तुत लघु कृति में ५१ गाथाओं में आचार्यश्री देवसेन ने विविध दर्शनों की उत्पत्ति तथा जैन समाज के प्रचलित द्राविड़, काष्ठा, माथुर और यापनीय आदि संघों की उत्पत्ति कब और किस प्रकार हुई इसका उल्लेख किया है।

(२) आराधनासार—

आचार्य देवसेन की परम पावन लेखनी—प्रसूत आराधनासार ग्रंथ ११५ गाथाओं में रचित है। ‘‘भगवत आराधना’’ नाम से विख्यात आचार्य शिवाय की विस्तृत मूलाराधना का सार ग्रहण कर इसकी रचना की गई है। इसमें निश्चय एवं व्यवहार दोनों आराधनाओं का संक्षिप्त एवं मौलिक वर्णन है। निश्चयाराधना साध्य और व्यवहाराधना साधन है। व्यवहाराधना के अभाव में निश्चयाराधना नहीं हो सकती।

(३) तत्वसार—

प्रस्तुत ध्यान प्रधान ग्रंथ ७४ प्राकृत गाथाओं में रचित है। इसमें स्वतत्व, परतत्व, सविकल्प तत्व, अविकल्प तत्व, अपरमतत्व, और परमतत्वों का आध्यात्मिक भाषा में वर्णन है। प्रस्तुत महान् ग्रंथ छह पर्वों में विभक्त है। इसमें ७४ गाथाओं के माध्यय से जीवों को सबसे अधिक उपादेय शुद्ध आत्मतत्व की उपलब्धि कैसे होती है, इसका वर्णन किया है। वस्तुत: इसकी रचना इससे पूर्व रचित द्वादशांग वाणी के सारभूत ग्रंथों का सार ग्रहण करके की गई है।

(४) लघुनयचक्र—

यह ८७ प्राकृत गाथाबद्ध नयविषयक ग्रंथ है। इसमें नयों और उपनयों के स्वरूप और उदाहरण र्विणत है विशेषत: इसमें द्रव्य गुण—पर्याय का सामान्य और विशेष स्वरूप र्विणत है अन्त में रत्नत्रय स्वरूप का वर्णन है।

(५) आलाप पद्धति—

आचार्य देवसेन की संस्कृत सूत्रबद्ध यह एक मात्र कृति है। नयसिद्धांत का संक्षिप्त और सरल शैली में वर्णन आलाप—पद्धति में किया गया है। रचना पद्यरूप न होकर गद्यरूप है। ऐसा प्रतीत होता है कि आचार्य देवसेन ने अपने नयचक्र का सरलता से ज्ञान कराने हेतु इस आलाप पद्धति को अंगीकृत किया है। इसकी पुष्टि निम्न पुष्पिका वाक्य से होती है......‘‘इति सुखबोधार्थमालायपद्धति विरचिता।

(६) भावसंग्रह—

आचार्य देवसेन के स्वयं देव होने का प्रायोगिक मार्ग आचार्य देवसेन की वृहत्तम कृति यह भावसंग्रह है। यह महान् ग्रंथ ७०१ प्राकृत गाथाओं में निबद्ध है। इसमें कुशल एवं निर्भीक आचार्य देवसेन ने मिथ्या मान्यताओं एवं परम्पराओं का सशक्त कण्ठ से विरोध किया है। इसमें १४ गुणस्थानों का अवलम्बन लेकर विविध विषयों का निरूपण किया है। उक्त विवरण के आधार पर यह स्पष्ट है कि आचार्य देवसेन आगमानिष्ठ, आस्तिक्य और अनुकम्पा के अकम्पित आहार, श्रमण संस्कृति के जीवन्त प्रतीक, प्रशमर्मूित, तत्त्वज्ञ, निर्भीक प्रवक्ता, धर्मनिष्ठ, तपोधन, सरलता के साकार रूप तप:पूत साधक तथा र्तािकक मनीषी थे।


।।प्रत्युपकार अवश्य करें।।
य: कर्मव्यतिहारेण नोपकारार्णवं तरेत्।

स जीवन्नपि निर्जीवो निर्गंधप्रसवोपम:।।२२२।। (उत्तर पु. प. ६३)

जो मनुष्य बदले के कार्य से उपकार रूपी समुद्र को नहीं तिरता है अर्थात् उपकारी मनुष्य का प्रत्युपकार नहीं करता है वह गन्धरहित फूल के समान जीता हुआ भी मरे के समान है। त्याज्यं तच्चेद् गृहीत्वाऽपि प्रागेवाग्राहणं वरम्।।३०८।। (उत्तर पु. प. ६३)

प्रक्षालनाद्धि पंकस्य दूरादस्पर्शनं वरं।ं३०९।। (उत्तर पु. ६३)
जब राज्य ग्रहण कर बाद में छोड़ने के ही योग्य हैं तब उसका पहले से ही ग्रहण नहीं करता अच्छा है। लोक में कहावत है कि कीचड़ में पैर रखकर पुन: उसे धोने की अपेक्षा उसमें पैर न रखना अर्थात् उसका दूर से ही स्पर्श नहीं करना अच्छा है।