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आचार्य श्रीधर एवं उनकी कृतियाँ

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आचार्य श्रीधर एवं उनकी कृतियाँ

डॉ. अनुपम जैन एवं शैफाली जैन
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सारांश

भारतीय गणित इतिहास में आचार्य श्रीधर का महत्वपूर्ण स्थान है। आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त, महावीराचार्य एवं भास्कराचार्य के समान ही श्रीधर भारतीय गणित के देदीप्यमान नक्षत्र हैं। इनके काल एवं कर्तृत्व पर दीर्घकाल तक विवाद रहने के कारण इनके कार्य का यथेष्ट मूल्यांकन नहीं हो पाया है। प्रस्तुत लेख में इनके काल, गुरु परम्परा एवं कृतियों पर प्रकाश डाला गया है।

गणित के विकास में जिन मनीषियों का योगदान रहा है उनमें अनेक भारतीय हैं। इन विद्वानों द्वारा विकसित गणित को ही भारतीय गणित की संज्ञा प्रदान की जाती है।

भारतीय साहित्य में श्रीधर नाम के अनेक विद्वानों का उल्लेख मिलता है। श्रीधर, भट्ट श्रीधर एवं श्रीधराचार्य की संज्ञा से अभिहित किये जाने वाले इन विद्वानों की कृतियों के रूप में पाटीगणित, नवंशति, वृहत्पाटी, पाटीगणितसार, त्रिशतिका, (त्रिंशति, गणितसार), गणितपंचविंशि, ज्योतिर्ज्ञानविधि, बीजगणित, जातक तिलक, जातक पद्धति, कन्नड़ लीलावती, न्यायकन्दली, दशश्लोकीसपिण्डदीपिका,लघुखेर विधि एवं सर्वबोधिनी टीका का उल्लेख भारतीय साहित्य में है।

हमारी रुचि गणितज्ञ श्रीधर में है जिनको प्राय: श्रीधराचार्य की संज्ञा से भी अभिहित किया जाता है। नेमिचंद्र शास्त्री ने तीर्थंकर महावीर और उनकी आचार्य परम्परा में श्रीधर नामक सभी विद्वानों एवं उनकी कृतियों का संक्षिप्त परिचय दिया है। गणितज्ञ श्रीधर की कृतियों का ठीक—ठाक निर्धारण न हो पाने के कारण उनके काल निर्धारण में भी अनेक त्रुटियां हुई हैं। कुछ लोग उन्हें ८वीं एवं अन्य १०-११ वीं शताब्दी का मानते रहे हैं।

इस सन्दर्भ में निम्नांकित ३ मत प्रचलित रहे हैं—

१. ७५० ई.

२. ८५०-९५० ई.

३. ९९९-१०४९ ई.

जातक तिलक के कर्ता श्रीधर की गणितज्ञ के रूप में पहचान करने का कारण पहले इन्हें १०४९ ई. का माना जाता रहा।[१] बाद में ज्योतिर्ज्ञानविधि (७९९ ई.) के कर्ता तथा पाटीगणित के कर्ता श्रीधराचार्य को भिन्न—भिन्न व्यक्तित्व स्वीकार करने के कारण प्रो. कृपाशंकर शुक्ल उनको दशकों तक महावीराचार्य का परिवर्ती अर्थात् ८५०-९५० ई. के मध्य का स्वीकार करते रहे।[२] कुछ दशक पूर्व प्राप्त रायल एशियाटिक सोसायटी, बॉम्बे में संगृहीत गणितसार संग्रह की पांडुलिपि क्रमांक २३० के अन्त में :—

‘क्रमादित्युक्तं श्रीधराचार्येरिति भद्रं भूयात्’

इस उल्लेख के कारण यह स्पष्ट हो गया कि श्रीधराचार्य, महावीराचार्य के पूर्ववर्ती हैं।[३] आचार्य महावीर (८५० ई.) राष्ट्रकूटवंशीय नृपतुंग अमोघवर्ष—१ (८१४-८७७ ई.) के समकालीन थे। फलत: आचार्य श्रीधर ८५० ई. के पूर्ववर्ती सिद्ध होते हैं। इस प्रकार बालकृष्ण दीक्षित (१९३२), विभूतिभूषण दत्त (१९३२), सबल सिंह (१९४०), नेमिचंद्र शास्त्री (१९४७) एवं राधाचरन गुप्त (१९८७) की मान्यता के अनुरूप आचार्य श्रीधर (श्रीधराचार्य) ७५० ई. के लगभग या ज्योतिर्ज्ञान विधि के रचनाकाल ७९९ ई. में जीवित थे।[४] दुर्भाग्यवश हमें आचार्य श्रीधर की गुरुपरम्परा, जन्मस्थान एवं माता—पिता के बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं है। उनकी धार्मिक मान्यता के संदर्भ में भी पर्याप्त विवाद है। किसी भी धार्मिक परम्परा के सम्बद्ध होने से विषय के विकास में प्रदत्त उनके योगदान का अवमूल्यन नहीं होता किंतु उनके कृतित्व के निर्धारण तथा उनके द्वारा संकलित सामग्री के मूल स्रोतों को टटोलने में सहायक होने के कारण इस विषय पर भी विचार आवश्यक है। कतिपय विद्वान उन्हें जैन एवं अन्य शैव ब्राह्मण स्वीकार करते हैं। पूर्ववर्ती विद्वानों ने इस विषय पर भी काफी ऊहापोह किया है। यहाँ उनके धार्मिक विश्वास को जानने हेतु कतिपय तथ्य संकलित हैं। त्रिशतिका का सम्पादन डॉ. सुधाकर द्विवेदी ने १८९९ ई. में किया था।[५] उनकी सम्पादित प्रति में निम्न मंगलाचरण दिया हुआ है—

नत्वा शिवं स्वविरचित पाठ्या गणितस्य सारमुद्धृत्य।

लोकव्यवहाराय प्रवक्ष्यति श्रीधराचार्य:।।

यही मंगलाचरण डॉ. सुद्युम्न आचार्य द्वारा २००४ में प्रकाशित संस्करण में भी दिया गया है क्योंकि यह पूर्व प्रकाशित कृति के आधार पर तैयार की गई है।[६] इसके विपरीत भारतीय ज्ञानपीठ, काशी द्वारा प्रकाशित कन्नड़ प्रांतीय ताड़पत्रीय ग्रंथ सूची के अंतर्गत जैनमठ, मूडबिद्री के ग्रंथ भंडार में ७८१ नम्बर पर त्रिशतिका की एक प्रति का उल्लेख नेमिचन्द्र जैन, शास्त्री ने अपने लेख में किया है।[७] कन्नड़ लिपि में लिखी संस्कृत भाषा की इस कृति में ४५ ताड़पत्र है एवं प्रत्येक पत्र पर ६ पत्तियां हैं, जिनमें से प्रत्येक में ८५ अक्षर हैं। इस प्रकार प्रत्येक पेज पर ५१० अक्षर ही बल्लभ कृत तेलगू टीकायुक्त इस पूर्ण, शुद्ध किन्तु जीर्ण प्रति का मंगलाचरण निम्न प्रकार है :—

नत्वा जिनं स्वविरचित पाठ्या गणितस्य सारमुद्धृत्य।

लोकव्यवहाराय प्रवक्ष्यति श्रीधराचार्य:।।

शास्त्री के अनुसार जिनं पाठ, मूल पाठ है तथा परिवर्ती प्रतिलिपिकारों अथवा सम्पादक महोदय की त्रुटि से पाठ बदल गया है। हमें मूडबिद्री से प्राप्त ताड़पत्रीय प्रति पर प्रारम्भ में स्याही से श्रीधर कृत गणितसार लिखा है। कानड़ी से देवनागरी लिप्यांतरण होने पर ही इसका पूर्ण पाठ ज्ञात हो सकेगा। जैन गणित एवं ज्योतिष का दक्षिण में व्यापक प्रचार एवं प्रसार था किन्तु उत्तर में कम। फलत: श्रीधर के बहुत कम ग्रंथों का उत्तर में प्रचार हो पाया, जो एक—दो ग्रंथ उत्तर भारत में आये उनमें सम्प्रदाय विशेष के चिह्नभूत स्थलों को परिवर्तित कर दिया गया है। संभवत: इनमें प्रतिलिपिकार की संकीर्ण मनोवृत्तियाँ कारण रही होंगी ? शुक्ला का तर्क है कि सामान्यत: उपलब्ध प्रतियों में ‘शिवम्’ पाठ मिलता है। शास्त्री द्वारा उल्लिखित पांडुलिपि अपवाद है जो शायद किसी जैन व्यक्ति द्वारा प्रतिलिपि कर तैयार की गई है एवं उसने काफी परिवर्तन कर दिये हैं। जैन तीर्थंकर से संबंधित एक उदाहरण भी उसी व्यक्ति ने जोड़ दिया है, जो किसी अन्य प्रति में नहीं मिलता है। शुक्ला के ही शब्दों में—

The manuscript of the Trisatika referred to by N.C. Jain bears the impress of some Jaina scholars, who has made numerous alterations in the originall text and has added a large number of rules and examples (including one example relating to Jaina Gods) which are not found to occure in any other manuscript of Trisatika known to us. The reading ``Jinam is thus evidently due to him.[८]

निष्पक्ष दृष्टि से विचार करने पर दोनों संभावनायें बनती हैं, परिवर्तन अवश्य किये गये हैं किन्तु किसने किये हैं इस पर ममता अग्रवाल ने व्यापक रूप से विचार विमर्श किया है।[९] हमें आज तक एक भी ऐसी कृति देखने को नहीं मिली जिसमें किसी जैनाचार्य ने किसी अजैन कृति का मंगलाचरण बदलने का प्रयास किया है। विगत दिनों गुप्ता ने गणित—सार—संग्रह की मल्लन (११ वीं शती ई.) द्वारा लिखी गई टीका की जानकारी प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि`One netural change made by Mallan (about 1100 A.D.) was to replace the name of Mahaviracarya's deity Jina by his own deity Siva.[१०]शायद त्रिशतिका के टीकाकार ने भी इसी प्रकार परिवर्तन कर जिनं को शिवं कर दिया है। श्रीधर के व्यक्तित्व पर और अधिक प्रकाश एवं विरोधाभासों का निराकरण कृतियों के भाषा वैज्ञानिक अध्ययन एवं दक्षिण में प्राचीन प्रतियों की खोज से संभव हो सकेगा। वर्तमान में कोई निर्णय अंतिम रूप से देना जल्दबाजी होगी। अभी यह भी विचारणीय है कि क्या श्रीधर ने अपने जीवन में धर्म परिवर्तन तो नहीं किया ? क्या प्रारम्भ में वे शैव थे एवं बाद में जैन धर्मावलम्बी बन गये? हमें इस विचार की संभावना अधिक प्रतीत होती है| गणितज्ञ श्रीधर की प्रमुख कृतियां निम्नलिखित हैं—

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१. त्रिशतिका (त्रिशति या गणितसार या पाटीगणितसार)—

यह श्रीधर की सर्वाधिक चर्चित कृति है। द्विवेदी द्वारा १८९९ में इसको सम्पादित कर प्रकाशित किया गया था। त्रिशतिका या त्रिशति नाम पांडुलिपियों के अंत एवं गणितसार नाम पुष्पिकाओं के अंत एवं मंगलाचरण में प्रयुक्त है। द्विवेदी के इस संस्करण में केवल मूल ही प्रकाशित है किन्तु उसमें भी कृति के नाम के अनुरूप ३०० श्लोक नहीं हैं। वर्तमान में डॉ. सुद्युम्न आचार्य ने सुक्षेमा टीका सहित इसे राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, दिल्ली से २००४ में प्रकाशित कराया है किन्तु यह संस्करण भी द्विवेदी के संस्करण में प्रकाशित मूल पाठ पर आधारित होने के कारण अपूर्ण है। आज आवश्यकता इस बात की है कि त्रिशतिका का पूर्ण पाठ सुसम्पादित रूप में अनुवाद एवं आलोचनात्मक अध्ययन सहित प्रस्तुत किया जाये।

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२. पाटीगणित—

प्रो. कृपांशकर शुक्ल द्वारा १९५९ में इसे सम्पादित कर लखनऊ वि. वि., लखनऊ द्वारा प्रकाशित किया गया है। इस कृति का आधार रघुनाथ मंदिर, जम्मू से प्राप्त एकमात्र अपूर्ण प्रति है।

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३. नवंशति—

श्रीपति कृत सिद्धांतशेखर (१०५० ई.) ग्रंथ पर मक्खिभट्ट द्वारा लिखी टीका (१३७७ ई.) में इस कृति नवंशति से २ श्लोक उद्धृत किये हैं। इसके अतिरिक्त अभी कुछ उपलब्ध नहीं है।

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४. वृहत्पाटी—

राघवभट्ट (१४३९ ई.) ने इसका उल्लेख किया है। शुक्ला (१९५९) ने नवंशति एवं वृहत्पाटी को पाटीगणित के ही अपर नाम माने हैं किन्तु हायाशी (१९९५) ने सप्रमाण चर्चा कर इन्हें भिन्न—भिन्न कृतियाँ माना है।

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५. बीजगणित-

—भास्कर—।। ने अपने बीजगणित में श्रीधरकृत द्विघात समीकरणों को हल करने का सूत्र दिया है। इसका उद्धरण प्राप्त होने से कृति का ११५० ई. में उपस्थित होना निर्विवाद है किंतु वर्तमान में यह अनुपलब्ध है। बहुचर्चित द्विघात समीकरण को हल करने का व्यापक नियम श्रीधर के इसी बीजगणित ग्रंथ से उद्धृत है।

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६. गणितपंचविंशि-

Welcome Institute for the History of Medicine में इसकी पांडुलिपि उपलब्ध है जिसमें २५ (३१) श्लोक हैं। इसका विस्तृत परिचय हायाशी (१९९५) ने अनुवाद सहित प्रकाशित किया है।

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७. ज्योतिर्ज्ञानविधि—

इसका अपर नाम करणसूत्र भी है।[११] इस अप्रकाशित कृति की दो पांडुलिपियाँ जैन सिद्धांत भवन, आरा में उपलब्ध बताई जाती हैं। भण्डार के सूचीपत्र के अनुसार क्रमांक ५३६ की प्रति अपूर्ण है किन्तु ५३८ की पूर्ण है। यह कृति मूडबिद्री में संगृहीत कानड़ी भाषा की कृति को देवनागरी लिप्यांतरण है| ज्योतिर्ज्ञानविधि की अब तक ३ प्रतियों की जानकारी मिली है —

१. जैनमठ,मूडबिद्री प्रति—जैनमठ, मूडबिद्री के वीरवाणी विलास जैन सिद्धांत भवन में पाण्डुलिपि क्रमांक ४७ पर संग्रहीत इस कृति में ९ पत्र हैं। यह प्रति अपूर्ण किन्तु शुद्ध है।

२. उज्जैन प्रति—उज्जैन के ऐलक पन्नालाल सरस्वती भवन में संगृहीत इस पाण्डुलिपि में १६ पत्र हैं एवं क्रमांक ६६१ पर संगृहीत है। इस पाण्डुलिपि की २ छाया प्रतियाँ कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर में क्रमांक ५७५ एवं ५९२ पर संग्रहीत है। कृति स्पष्ट एवं सुवाच्य है किन्तु बीच—बीच में कुछ अंश छूट गये हैं।

३. आरा प्रति—कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ पुस्तकालय, इन्दौर में पाण्डुलिपि क्रमांक ५९३ पर संग्रहीत एक पाण्डुलिपि में ३१ पत्र हैं। यह प्रति मूल न होकर जैन सिद्धांत भवन, आरा में संगृहीत एक पाण्डुलिपि क्रमांक ५३८ (झ/१३७/१) की ही छायाप्रति है। आरा की दूसरी प्रति ५३६ (झ/१३७/२) वर्तमान में उस भण्डार में भी उपलब्ध नहीं हो पा रही है।

गणितज्ञ आचार्य श्रीधर ने ७९९ ई. में ज्योतिर्ज्ञानविधि नामक गणित ज्योतिष (Astronomy) की कृति सृजित की थी। इस कृति का रचनाकाल अंत:साक्ष्य से ७९९ ई. तय होता है।


करथिन्यूनं शकाब्दं करणाब्दं रयगुणं द्विसंस्थाप्य।

रागहृतमदोब्धं गतमांसाश्चोपरि प्रयोज्य पुन:।

संस्थाप्याधो राधागुणिते खगुणं तु वर्षादेखादि।।१।।
संत्याज्ये नीचाप्ते लब्धा वारास्तु शेषा: घटिका: स्यु:।।२।।

यहाँ पर शक संवत् ७२१ ग्रंथ रचना का समय बताया गया है। इससे कृति का रचनाकाल ७२१ शक अर्थात् ७९९ ई. तय होता है।

[सम्पादन] टिप्पणी

  1. S. Shrikant Shastri, The Date of Sridharacarya, The Jaina Antiquary, (Arrah). 13 (2), 12
  2. K.S. Shikla, Patiganita of Sridharacarya, Department of MAthematics and Astronomy. Lucknow Unicersity] 1959, Introduction, P. Xiii.
  3. . R.C. Gupta, On the Date Sridhara, Ganita Bharati (Delhi), 9 (1-4), 1987, P. 54-56.
  4. अनुपम जैन एवं ममता अग्रवाल, आचार्य श्रीधर एवं उनका गणितीय अवदान, अर्हत् वचन (इंदौर), ८ (१) १९९६ १७-२४ इस आलेख में उनके काल निर्धारण पर विस्तृत चर्चा की गई है।
  5. सुधाकर द्विवेदी, त्रिशतिका, श्रीधराचार्य विरचित, सम्पादक—सुधाकर द्विवेदी, चन्द्रप्रभा प्रेस, बनारस, १८९९
  6. त्रिशतिका (पाटीगणितसार), सम्पादन एवं अनुवाद, सुक्षेमा टीका सहित, डॉ. सुद्युम्न आचार्य, राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली—२००४
  7. नेमिचन्द्र शास्त्री, श्रीधराचार्य, जैन सिद्धान्त भास्कर (आरा), १४ (२), ३१-४२, १९४८
  8. देखें, संदर्भ—२
  9. ममता अग्रवाल, आचार्य श्रीधर एवं उनका गणितीय अवदान, ph.D. शोध प्रबन्ध, चौधरी चरणसिंह वि. वि. मेरठ, २००१
  10. R.C. Gupta, A Little known 19th Century study of Ganita-Sara-Samgraha, Arhat Vacana, (Indore) 14 (2-3), 2002, 101
  11. इति श्रीधराचार्य विरचिते ज्योतिर्ज्ञानविधे श्री करणे लग्न प्रकरणम् नाम अष्टम परिच्छेद:, ज्योतिर्ज्ञान विधि की पांडुलिपि से।


अर्हत् वचन जुलाई—सितम्बर—२०१२, पेज. न. ३५—४०