Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें|


President२०१८.jpgमहामहिम राष्ट्रपति श्री रामनाथ जी कोविंद का विश्वशांति अहिंसा सम्मलेन के उद्घाटन हेतु मंगल आगमन 22 अक्टूबर 2018 को ऋषभदेवपुरम में होगा |President२०१८.jpg

Diya.gif24 अक्टूबर 2018 को परम पूज्य गणिनी आर्यिकाश्री ज्ञानमती माताजी का 85वां जन्मदिन एवं 66वां संयम दिवस मनाया जाएगा ।Diya.gif

वीरसागर महाराज की पूजन

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


आचार्य श्री वीरसागर महाराज की पूजन


-प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी
1st Pattacharya Shri Veer Sagar Ji Maharaj.jpg
स्थापना-(नरेन्द्र छन्द)
Cloves.jpg
Cloves.jpg

महावीर पथ के अनुयायी, वीरसिन्धु आचार्यप्रवर।
शान्ति सिन्धु के प्रथम शिष्य, आर्यिका ज्ञानमति के गुरुवर।।
उन गुरु शिष्य की गरिमा से, लगता है यह अनुमान सहज।
तुम थे असली रत्नपारखी, दृष्टि तुम्हारी सदा सजग।।१।।

उन आचार्य वीरसागर की, पूजा आज रचाऊं मैं।
आह्वानन स्थापन करके, अपने निकट बुलाऊँ मैं।।
हे गुरुवर! मम हृदय विराजो, अभिलाषा यह है मेरी।
पुष्पों की अंजलि भरकर के, करूँ थापना मैं तेरी।।२।।

-दोहा-

गुरुपूजा बस एकली, गुरुपद देन समर्थ।
भवदधि नौका सम यही, शेष सभी कुछ व्यर्थ।।३।।

ॐ ह्रीं श्रीवीरसागराचार्यवर्य ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं श्रीवीरसागराचार्यवर्य ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं।
ॐ ह्रीं श्रीवीरसागराचार्यवर्य ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।

-अष्टक-

जग के शीतल स्वादिष्ट पेय से, प्यास नहीं बुझ पाई है।
अतएव वीतरागी गुरु के, चरणो की स्मृति आई है।।
जलधारा करने से शायद, इच्छाओं की उपशान्तीं हो।
उन तृषा परीषहजयी गुरु की, पूजा से सुख प्राप्ती हो।।

Jal.jpg
Jal.jpg

ॐ ह्रीं आचार्यश्रीवीरसागरमुनीन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

चन्दन गुलाबजल इत्रादिक, से कायउष्णता शांत हुई।
पर कर्मों की जलती ज्वाला से, आत्मा नहिं उपशांत हुई।।
चन्दन गुरु पद में लेपन से, भवताप की उपशान्ती होगी।
उन उष्णपरीषहविजयी की, पूजन से सुखप्राप्ती होगी।।

Chandan.jpg
Chandan.jpg

ॐ ह्रीं आचार्यश्रीवीरसागरमुनीन्द्राय संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।

चारों गतियों मे क्षत विक्षत, कायो में भी मैं पड़ा रहा।
अक्षय आतम नहिं पहचाना, भव चतुष्पथों पर खड़ा रहा।।

अब अक्षतपुंज सुगुरु चरणों में, अर्पण करने आया हँ।
अक्षय सुख पाने हेतु दिगम्बर, मुनि को नमने आया हूँ।।

Akshat 1.jpg
Akshat 1.jpg

ॐ ह्रीं आचार्यश्रीवीरसागरमुनीन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।

मकरध्वज ने सारे जग को, निज के आधीन बनाया है।
पर बालब्रह्मचारी के सम्मुख, वह न कभी टिक पाया है।।
अब पुष्प चढ़ाऊँ गुरु चरणों में, काम व्यथा नश जाएगी।
उन नग्न परीषह विजयी गुरु की, पूजा शान्ति दिलाएगी।।

Pushp 1.jpg
Pushp 1.jpg

ॐ ह्रीं आचार्यश्रीवीरसागरमुनीन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

रसना इन्द्रिय की लोलुपता, कितने ही पाप कराती है।
भोजन करने के बाद भी वह, लम्पटता नहिं मिट पाती है।।
अब इस नैवेद्य थाल से गुरु, पूजन कर क्षुधा शांत होगी।
उन क्षुधा परीषह विजयी मुनि, वन्दन से परमशांति होगी।।

Sweets 1.jpg
Sweets 1.jpg

ॐ ह्रीं आचार्यश्रीवीरसागरमुनीन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

सब तरह तरह के फानूसों से, महल सजाए जाते हैं।
चंचल विद्युत के नवप्रकाश, आतम के दीप बुझाते हैं।।
अब घृत के लघु दीपक से भी, गुरु आरति मोह नशाएगी।
उन प्रज्ञापरिषह विजयी गुरु की, पूजन शांति दिलाएगी।।

Diya 3.jpg
Diya 3.jpg

ॐ ह्रीं आचार्यश्रीवीरसागरमुनीन्द्राय मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

ईश्वर निंह सृष्टि का कत्र्ता, यह जैनागम बतलाते हैं।
सब जीवों के ही कर्म स्वयं, उनको सुख दुख दिलवाते हैं।।
उन कर्मों के नाशन हेतु, गुरुवर ने मुनिपथ अपनाया।
मैं भी अब धूप जलाकर चाहूँ, निज गुरु की शाश्वत छाया।।

Dhoop 1.jpg
Dhoop 1.jpg

ॐ ह्रीं आचार्यश्रीवीरसागरमुनीन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।

फल की इच्छा से ही सुभौम, चक्री की बुद्धी भ्रष्ट हुई।
नश्वर फल खाने में ही उसकी, जीवन लीला नष्ट हुई।।
मैं अविनश्वर फल हेतू अब, फल का यह थाल सजा लाया।
गुरु चरणों में फलथाल चढ़ाकर, तजूं जगत ममता माया।।

Almonds.jpg
Almonds.jpg

ॐ ह्रीं आचार्यश्रीवीरसागरमुनीन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।

यह अष्टद्रव्य की सामग्री, मेरी पूजा का साधन है।
गुरु भक्ती ही कर सकती बस दुर्गति का सहज निवारण है।।
आचार्य वीरसागर गुरु की, जो पूजा निशदिन करते हैं।
वे पूजक भी पुण्यास्रव कर, इक दिन अनघ्र्य पद वरते हैं।।

Arghya.jpg
Arghya.jpg

ॐ ह्रीं आचार्यश्रीवीरसागरमुनीन्द्राय अनघ्र्यपदप्राप्तये अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।

-दोहा-

रत्नत्रय धारक मुनी, के पद में त्रय बार।
त्रयधारा जल से करूँ, मिले रत्नत्रय सार।।
शान्तये शान्तिधारा।
गुरुवर के उद्यान से, ज्ञान पुष्प को लाय।
पुष्पांजलि पद में करूँ, ज्ञान मुझे मिल जाय।।

दिव्य पुष्पांजलि:।

RedRose.jpg

जयमाला
Veer Sagar 01.jpg
Veer Sagar 01.jpg

हे मुनिवर! तुम कुछ बोले बिन, भी मोक्षमार्ग दरशाते हो।
बिन वस्त्राभूषण के भी तुम, सुन्दर स्वरूप दरशाते हो।।
तुम ब्रह्मचर्य की महिमा का, पावन दर्शन करवाते हो।
शिशु सम अविकारी नग्न रूपधर, सबके मित्र कहाते हो।।१।।

महाराष्ट्र प्रान्त में ईर ग्राम, माँ भाग्यवती जी कहलाई।
इक दिन सुन्दर सपना देखा, तब उनकी बगिया लहराई।।
थे पिता रामसुख हुये सुखी, आषाढ़ शुक्ल पूनम तिथि में।

वह तिथी गुरूपूर्णिमा बनी, सन् अट्ठारह सौ छियत्तर में।।२।।
Veer Sagar 06.jpg
Veer Sagar 06.jpg


बचपन में हीरालाल नाम, पाया हीरा सम चमक उठे।
कचनेर में विद्याध्ययन करा, पहले ही गुरु बन दमक उठे।।
चारित्रचक्रवर्ती गुरु को, परखा फिर गुरू बनाया था।

उनकी ही प्रथम शिष्यता का, सौभाग्य तुम्हीं ने पाया था।।३।।
Veer Sagar 05.jpg
Veer Sagar 05.jpg


गुरु ने समाधि से पूर्व तुम्हें, निज पट्टाचार्य बनाया था।
सन् उन्निस सौ पचपन जयपुर में, प्रथम पट्ट अपनाया था।।
जैसे तव गुरु ने मुनि पथ को, बीसवीं सदी में दरशाया।
वैसे ही ज्ञानमती शिष्या ने, ब्राह्मी का पथ दिखलाया।।४।।

मुनि समन्तभद्राचार्य सदृश, तुम हुए परीक्षा में प्रधान।
गुरु मर्यादा की रक्षा कर, शिष्यों का रक्खा सदा ध्यान।।
तुमने इक बार कर्मप्रकृती, चिन्तन में निज को रमा दिया।

फोड़ा अदीठ का वैद्यराज, आप्रेशन करके चला गया।।५।।
Veer Sagar 02.jpg
Veer Sagar 02.jpg


सोचो तो रोम सिहरते हैं, क्या तुम पत्थर की मूरत थे।
मानव की काया में सचमुच, महावीर की सच्ची सूरत थे।।
गुरुदेव मुझे भी शक्ती दो, तन से ममता को छोड़ सकू।

संकट चाहे जितने आवें, सबसे मैं नाता तोड़ सकू।।६।।
Veer Sagar 14jpg.jpg
Veer Sagar 14jpg.jpg


सन् सत्तावन में आश्विन कृष्णा, मावस को तुम चले गये।
अपने शिष्यों को छोड़ समाधी, लिया स्वर्ग में चले गये।।
अब नहीं तुम्हारी काया है, लेकिन यशकाया जीवित है।
हम सभी तुम्हारी वंशावलि के, पत्र पुष्पमय कीरत हैं।।७।।

हे शांति सिन्धु के प्रथम शिष्य! तुमको युग का शत बार नमन।
तुम पहले पट्टाचार्य तुम्हारे, चरणों में चउसंघ नमन।।
गुणमाल आपकी पढ़कर के, मेरा मन आज हुआ पावन।

‘‘चन्दनामती’’ तुम चरणो में, धरती अम्बर भी करे नमन।।८।।
Veer Sagar 15jpg.jpg
Veer Sagar 15jpg.jpg


ॐ ह्रीं आचार्यश्रीवीरसागरमुनीन्द्राय जयमाला पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।

शान्तये शान्तिधारा, पुष्पांजलिः

-गीता छन्द-

मुनि वीरसागर के चरण में, जो सतत वन्दन करें।
निज आत्मनिधि को प्राप्त कर, वे भी रत्नत्रय निधि वरें।।
निज आत्मरस के स्वाद में हो, मग्न यदि समता धरें।
तब ‘‘चन्दनामति’’ उभय लोकों, में वही सब सुख भरें।।

Vandana 2.jpg

।। इत्याशीर्वाद:।।