ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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आचार्य श्री शान्तिसागर महाराज के उपदेश के कतिपय अंश

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आचार्य श्री शान्तिसागर महाराज के उपदेश के कतिपय अंश

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आचार्य शान्तिसागर जी ने ३६ दिन की सल्लेखना ग्रहण की थी। सल्लेखना के २६वें उपवास के दिन उन्होंने यह सन्देश दिया था, कि अपने जीवन में संयम धारण करो इसे मत। समाधि के समय उनकी उम्र ८४ वर्ष की थी। उनकी समाधि कुन्थल गिरी पर ६ बजकर ५० मिनिट पर प्रात:काल हुई। उस दिन भाद्रपद विक्रमी सम्वत् २०१२ सन् १९५५ था। उपदेश— उनके उपदेशों के कुछ वाक्य निम्नाखित है।

१. जीव का पक्ष ग्रहण करने पर पुद्गल का घात होता है। पुद्गल का पक्ष ग्रहण करो तो आत्मा का घात होता है, परन्तु मोक्ष को जाने वाला जीव अकेला है, जीव पुदगल साथ में मोक्ष नही जाता है।

२. निरन्तर आत्मा का ध्यान करना। आत्र्तध्यान नहीं करना। लगातार आत्मध्यान होता नहीं,अत: शुभकार्यों में लगे रहना।

३. शरीर और आत्मा अलग—अलग है। अरहन्त का स्मरण करो अन्तकाल में कोई साथी नहीं है, यह जीव अकेला ही जायेगा।

४. सम्यक्त्वी—जीव आगम के अनुसार श्रद्वान करता है। वह वीतरागी आचार्यो को पक्षपाती कहने का प्रयत्न नही करता है।

५. मार्ग—च्युत साधु के विषय में समाज में विचार चले, किन्तु पत्रों में यह बात न छपे। इससे सन्मार्ग के द्वेषी लोग अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं।

६. मुनिधर्म बहुत कठिन है। मुनि होकर पैर फिसला तो भयंकर पतन होता है। नेत्रों को जागृत रखना चाहिए। ज्ञान आदि की बातों में चूक हो गई तो उतनी हानि नहीं होती, जितनी संयम पालन में प्रमाद करने पर होती है। तलवार की धार पर संभालकर पैर रखा तो ठीक, नहीं तो पैर नियम से कट जाता है। मुनिपद में चरित्र को बराबर पालना चाहिए।

७. संसार एक खेल है, आत्मा इस खेल से पृथक है इसको हम नहीं भूलते हैं। संसार के जीव मोह के कारण नाचते कूदते है।

८. हमने आत्मकल्याण के लिए मुनिपद धारण किया है। आगमानुसार प्रवृत्ति के लिए यह मुद्र धारण की है। आचार्यों ने कहा है कि २८ मूलगुणों का पालन करते हुए आत्म कल्याण करो, इसलिए मै ऐसा कहता हूँ। यश: मान, सम्मान के लिए यह पद अंगीकार नहीं किया है।आगम कहता है—मुट्ठी भर अन्न खा और जा।

९. जिस प्रकार बार—बार रस्सी की रगड़ से कठोर पाषाण में गड्ढा पड़ जाता है, इसी प्रकार अभ्यास द्वारा इन्द्रियाँ वशीभूत होकर चंचलता उत्पन्न नहीं करती।

१०.संयमी—जीवन दीर्घायुष्य का विशेष कारण है। साधु बनने पर व्यक्ति इन्द्रियों का दास नहीं रहता

डा० रमेश चन्द्र जैन

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आचार्य श्री के उपदेश से प्राप्त कुछ अनमोल मोती

१. आत्मा को बलवान करने के लिए यदि काया क्षीण होती है, तो उसकी कोई चिन्ता नहीं होनी चाहिए। इन्द्रिय रूपी हाथी को ज्ञानांकुश के अधीन रखना होगा

२. सातवें नरक या एकेन्द्रिय योनि पर्यन्त पतन होना या मोक्ष तक के शाश्वत सुख की प्राप्ति होना सब संस्कार का ही फल है। संस्कार से ही जीव धर्म से अधर्म बन जाता है और संस् —कार से ही नर का नारायण बन जाता है।

३. पहले समयसार का नही, महाबन्ध का ज्ञान चाहिए। पहले सोचो हम दुख में क्यों पड़े हैं?क्यों नीचे है?

४. गुरूमुख से प्रथम श्रावकाचार का अध्ययन करो।पश्चात् आत्मविषयक शास्त्र तथा अन्यशास्त्रों का अभ्यास करो। तीर्थंकर भगवान् से मुख्य प्रश्नकर्ता गणधर ने आठ हजार प्रश्नो में अन्तिम प्रश्न आत्मा के विषय में पूछा था। आत्मा की चर्चा बाल—क्रीड़ा के कन्दुक के सदृश समझाना उचित नहीं है।

५. जिसके पास परिग्रह की उपाधि रहती है, उन्हें चिंता होती है, उनका मन चंचल होता है।

६. व्यवहार को निभाते हुए निश् चय की ओर दृष्टि होना चाहिए व्यवहार फूल के सदृश है। वृक्ष में सर्वप्रथम फूल आता है और उसी के भीतर फल अंकुरित होता है, जैसे फल वि—कसित होता है, वैसे—वैसे फूल संकुचित होता जाता है। फल पूर्ण वृद्धि को प्राप्त होते ही फूल स्वयं पृथक् हो जाता है। ठीक ऐसी ही स्थिति व्यवहार और निश्चय के सम्बन्ध में होती है।

७. लोग कहते है जमाना खराब है। शिथिलाचार का युग है, पर मै कहता हूँ जमाना नहीं तुम्हारी बुद्धि खराब हो गयी है। प्राकृतिक नियमों में कोई अन्तर नही पड़ता है, बुद्धि में भ्रष्ट पना आया है, उसे दूर करने को, स्वच्छ करने को पापाचार के त्याग का व्रत ग्रहण करने का उपदेश आवश्यक है।

८. सुसंस्कार के प्रचारार्थ यज्ञोपवीत संस्कार आवश्यक है। वह रत्नत्रय धर्म का प्रतीक है। इस संस्कार के पश्चात् ही दान—पूजा का अधिकार प्राप्त होता है।

९. कोरा उपदेश धोबी के समान है । जब तुम्हारे पास कुछ नही तो तुम दूसरों को क्या दोगे?भव—भव में तुमने धोबी का काम किया है। दूसरों के कपड़े धोते रहे हो और अपने को निर्मल बनाने का तनिक भी विचार नहीं किया। पहले अपनी आत्मा को उपदेश दो।

१०. केश लोंच शरीर के प्रति ममत्व भाव हटाने का, आत्मा में शरीर में भिन्न प्रतीति का का प्रतीक है। इसलिए केश लोंच में कोई संक्लेश नहीं। वह दिखावे के लिए नहीं, बल्कि आत्मविकास का कारण है।

११. शिथिलाचारी साधु को श्रावक एकान्त में समझा कर उसकी स्थितिकरण करें। समझाने से काम न चले तो उसकी उपेक्षा कर उपगूहन अंग का पालन करें। पत्रों में चर्चा चलाने से धर्म की हँसी तथा अन्य मार्गस्थ साधुओं के लिए अज्ञानी लोगों द्वारा बाधा होती है।

१२. हरिजनों के प्रति हमारे मन में करूणा भाव है, रंच मात्र द्वेष नही है, पर उनके साथ भोजन करने से उनके कष्ट दूर नहीं होंगे। उनके आर्थिक कष्ट दूर करो, भूखों को रोटी दो उन्हें अच्छे उपजीवीका के साधन उपलब्ध कराओ, जिससे उन्हें हीन कार्य न करने पड़े।उनका सच्चा उद्धार उनको सदाचार पथ में लगाने में है।

१३. जब तक जीव का संसार तट निकट नहीं आता है, तब तक वह आत्मा के हित में प्रवृत्त नहीं होता। संसार के निकट आते ही वह मोक्ष मार्ग में लग जाता है। आसन्न भव्यता संसार से छूटने का बड़ा कारण है।

१४. जब तक धर्मध्यान रहे तब तक उपवास करना चाहिए। आर्त—रौद्र ध्यान उत्पन्न होने पर उपवास करना हितप्रद नहीं।

१५. सम्यक्त्वी जीव की परीक्षा अस्तिक्य गुण के द्वारा हो जाती है। प्रशम, संवेग, अनुकम्पा ये तीन ग्रण मिथ्यात्वी में भी दिखायी पड़ते है किन्तु आस्तिक्य गुण मिथ्यात्वी में नहीं पाया जाता।

१६. कर्मों की निर्जरा करना मुनि जीव का ध्येय है। मुनिपदधारे बिना कर्मनिर्जरा नहीं होती।गृहस्थ जीवन में सदा बन्ध का बोझ बढ़ता ही जाता है। उसके पास कर्मनिर्जरा के कोई साधन नही। इसलिए निर्जरा के लिए त्यागी बनना आवश्यक है।

१७. जीव अकेला है। जीव का कोई नहीं, बाबा! कोई नहीं।

१८. अनन्त आगम के एक अक्षर को, एक ॐ अक्षर को जो धारण करता है उसका कल्याण होता है। आत्म—चिन्तन से कर्म निर्जरा होती है।

१९. दर्शन मोहनीय कर्म का नाश कर सम्यकत्व प्राप्त करो। चारित्र मोहनीय कर्म का नाश कर संयम धारण करो।

२०. नय शास्त्र, अनुभव तीनों को मिलाकर विचार करो।

२१. जिनेन्द्र भगवान की वाणी पर विश्वास करो। उस वाणी के एक शब्द सुनने पर भी उससे यह जीव तिर कर मुक्ति पाएगा।

२२. सत्य अहिंसा का पालन करो। सत्य से सम्यक् त्व आ जाता है और अहिंसा से संयम होता है संयम धारण किये बिना कल्याण नहीं।

२३. बाबा! संयम धारण करने के लिए डरो नहीं! संयम धारण करो।

प्रो० (डॉ०) प्रेम सुमन जैन

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आचार्य श्री के अमर वाक्य यहाँ प्रस्तुत है,न केवल श्रावकों के लिए अपितु प्रत्येक जन साधारण के लिए माननीय है:

१. जिन मन्दिर की स्थिति से श्रावकों का अस्तित्व रहेगा। श्रावकों के अस्तित्व से मुनिधर्म रहेगा तो जैन धर्म रहेगा। अत: जिन मन्दिर सुरक्षित होने चाहिए।

२. जिनवाणी की रक्षा जैन धर्म की रक्षा है। शास्त्र रक्षा हमारे प्राणों की रक्षा है। अत: जिन बाबा हमारा प्राण है। ज्ञान के बिना समाज में धर्म नहीं टिकेगा स्वाध्यायी ज्ञानरक्षक विद्वान,ज्ञानप्रसारक साधु, सभी समाज द्वारा आदरणीय व रक्षणीय है।

३. आचार्य श्री को चारित्र चक्रवर्ती तक पहुँचने में उनके सुश्रावक माता—पिता के जीवन के संस्—कारों का प्रमुख हाथ है। घर में मुनियों के योग्य शुद्ध आहार बनने के कारण आचार्य श्री बचपन से शुद्ध आहारी रहे।

४. पिता की वैरागी वृत्ति ने आचार्य श्री को साधुवृत्ति की शिक्षा दी तथा माता सत्यवती की धार्मिकवृत्ति की शिक्षा दी तथा माता सत्यवती की धार्मिकवृत्ति ने सातगौंडा पाटील को सहन शील और निस्पृही बनाया।

५. तपस्वी साधुओं की वैयावृति ने आचार्य श्री को दिगम्बर जैन साधु का आदर्श सुरक्षित रहने की प्रेरणा प्रदान की।

६. अहिंसा और सत्य इस देश के प्राचीन जीवन का मूल्य है, जो आज भी उतने ही प्रासंगिकऔर उपयोगी है। इन्ही के पालन से यह भरत देश आज स्वतन्त्र है किन्तु इन मूल्यों को जीवन में उतारना होगा।

७. सम्यक्त्व और अहिंसा इन दो के पालन में जैन धर्म की पूर्णता आ सकती है। अहिंसा केविश्व कल्याण सम्भव है और सम्यक्त्व—पालन से आत्म कल्याण निश्चित है। श्रावक अहिंसा की पालना में और साधु सम्यक् त्व की पालना मे कभी न चूके, तो जैन धर्म की कभी हानि नहीं होगी। विश्व में शान्ति होगी। आचार्य श्री की इन और इस प्रकार की अनेक शिक्षाओं में यदि आज का श्रावक उनहें जीवन में उतारे तो साधु समाज की साधना और अधिक प्रेरणास्पद बन जायेगी। उनके समय के प्रत्यक्षदर्शी धर्मप्राण—श्रावक के द्वारा कहे गए ये वचन उनके समग्र—व्यक् ि तत्व को प्रतिबिम्बित करते हैं, ‘‘सौ बातों की एक बात है कि सैकड़ों कर्मठ—विद्वानों के सैकड़ों वर्ष पर्यन्त रात—दिन अथक—परिश्रम करने पर जो समाजोत्थान एवं समाज—कल्याण का कार्य अति—कठिनता से हो सकता था, वह त्यागमूर्ति आचार्य श्री शान्तिसागर जी के विहार से कुछ ही दिनो में सरलतया हो रहा है।’’

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शान्ति का उपाय

संकल्प—विकल्प त्यागने से शान्ति मिलती है। इससे कर्मो का क्षय होता है। परिणामों में जितनी —जितनी विशुद्धता होगी, उतनी उतनी शान्ति की उपलब्धि होगी मलिन परिणामों से शान्ति दूर होती है और अशान्ति की जागृति होती है। परिणामों की निर्मलता के लिए सत्संगति चाहिए।विषय भोग की सामग्री का त्याग भी आवश्यक है। संगति के योग्य सज्जन पुरूषो का समागम दुर्लभ रहता है। सत्समागम न मिले, तो अच्छे—अच्छे शास्त्रो का स्वाध्याय मनन करें। ग्रन्थों का अभ्यास भी सत्ससमागम ही तो है। प्रत्येक ग्रन्थ के भीतर महान ज्ञानी,संयमी, सत्पुरुष बैठे हैं। इस दृष्टिसे जिनवाणी के स्वाध्याय का बड़ा महत्व है।

त्याग के द्वारा मन शान्त रहता है।त्याग में सुख है भोग में दु:ख है। यदि शक्ति अल्प है, तो थोड़ा त्याग करो। इन्द्रियों ने जीवन को गुलाम बना रखा। इन्द्रियों के दास न बनकर इन्द्रियों को दास बनाना हितकारी है। मन के भीतर की खराबी दूर करना चाहिए। अन्र्तदृष्टि होने का प्रयत्न करते जाना चाहिए। परिश्रम पूर्वक पढ़ने वाला अज्ञानी भी विद्वान बन जाता है। आत्मा की तरफ रूचि होने पर तुम्हारा मन दूसरी तरफ नहीं जायेगा। कारण, जहाँ उसकी रूचि पाई जाती है मन की प्रवृत्ति उधर ही होती है। भोगों में अरूचि तथा आत्म—तत्व में रूचि होने पर ही परिणामों में शान्ति उत्पन्न होती है।

मुनि श्री नेमीसागर