Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें|


आज शीतलनाथ भगवान का केवलज्ञान कल्याणक हैं |

आचार्य समन्तभद्र का आप्त मीमांसा

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

विषय सूची

आचार्य समन्तभद्र का आप्त मीमांसा

जिनोपदेश को सर्वोदय तीर्थ[१] उद्धोषित करने वाले महान् र्तािकक आचार्य समन्तभद्र ने ईसा की द्वितीय—तृतीय शताब्दी में भारत भूमि को अलंकृत किया था।[२] उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व की जो विरासत हमें मिली है, उससे स्पष्ट हो जाता है कि वे अप्रतिम प्रतिभा के धनी थे। निर्दोष भक्ति भावना के उन्नायक स्तोत्रकार तो वे आज भी हैं। समीचीन धर्म को प्रसिद्ध करने वाले आचार्य समन्तभद्र को निद्र्वन्द रूप से हम जिनधर्मोन्नायक महान् श्रमण मान सकते हैं। मुक्ति मूलक पुरुषार्थ की अभिव्यञ्जना और सन्मार्ग की प्रभावना के लिये युक्त्यनुशासन के प्रस्तोता के रूप में उनकी ख्याति सदा अमर रहेगी। उनकी देशना सर्वत्र हितमितस्वरूपा और अपराजिता होने का गौरव से मंडित है। उनके भद्रार्थ का प्रद्योत जहाँ सर्वत्र ज्योतिर्मय है तो वहीं युक्तियों का प्रयोग भी सर्वथा अकाट्य माना जा सकता है। उनके द्वारा र्नििदष्ट प्रमेय प्रमाणपरिधि का उल्लंघन नहीं करते हैं और सत्यानुगुम्फित होकर मानों भद्र प्रयोजन पर केन्द्रित होते हुये प्रस्फुटित होते हैं। शायद इसीलिये ही आचार्य शुभचन्द्र ने अपने पाण्डव पुराण में उन्हें भारतभूषण के विशेषाख्यान से अभिहित किया है।[३] समन्तभद्र की रचनाओं में स्तुतिविद्या (जिनशतकम्), स्वयम्भूस्तोत्रम् (समन्तभद्रस्तोत्रम्), युक्त्यनुयनुशासनम् (वीरजिनस्तोत्रम्), आप्तमीमांसा (देवागमस्तोत्रम्) और रत्नकरण्डश्रावकाचार: (समीचीनधर्मशास्त्रम्) नामक संस्कृत रचनायें आज हमें उपलब्ध हैं।[४]

आप्तमीमांसा पर दो महान् र्तािककों

आचार्य भट्टाकलंकदेव और विद्यानन्द ने टीकायें लिखी हैं। जिनका दार्शनिक जगत् में अपना अप्रतिहत वैशिष्ट्य है। इनमें भट्टालंक ने अपनी टीका को आप्तमीमांसा भाष्य से अभिहित किया है, जो आठ सौ श्लोक प्रमाण होने से अष्टशती के नाम से विख्यात हुई। यह कृति अत्यन्त क्लिष्ट एवं गूढार्थ निवेशित है। आचार्य विद्यानंद की टीका अष्टशती के गूढ़ रहस्यों को समझ सकना संभव हुआ है। अष्टसहस्री में अष्टशती को पूर्णरूप से यथा स्थान आत्मसात कर लिया गया है। टीकाकार ने स्वयं अपनी इस टीका को आप्तमीमांसालंकृति नाम दिया है।[५] आप्तमीमांसा या देवागमस्तोत्र समन्तभद्र की अनुपलब्ध कृति गन्धहस्ति महाभाष्य का मंगलाचरण प्रतीत होता है। क्योंकि चौदहवीं शती के विद्वान् विक्रान्तकौरव के रचनाकार हस्तिमल ने देवागम स्तोत्र के उपदेशक आचार्य समन्तभद्र को तत्त्वार्थसूत्र के व्याख्यान स्वरूप गन्धहस्ति का प्रवर्तक माना है।[६] विक्रमसंवत्सर की तेरहवीं शती में हुये अष्टसहस्री के टिप्पणकार लघु समन्तभद्र ने भी अपने पादटिप्पण में आचार्य समन्तभद्र को सयाद्वादविद्या का अग्रगण्यगुरु और तत्त्वार्थधिगम स्वरूप मोक्षशास्त्र के महाभाष्य गन्धहस्ति का उपनिबन्धकत्र्ता बताया है। उनके अनुसार समन्तभद्र ने इसी गन्धहस्तिमहाभाष्य के मंगलाचरण में मंगल को पुरस्कृत करके मंगलस्तवन के विषयभूत परम आप्त अर्हन्त परमेष्ठी को अतिशय परीक्षा से उजागर या उपक्षिप्त करते हुये देवागम स्तोत्र नामक प्रवचनतीर्थ की सृष्टि (रचना) को पूरा किया था।[७]

उक्त उल्लेखों से स्पष्ट हो जाता है कि

आचार्य समन्तभद्र ने आप्तमीमांसा परक देवागमस्तोत्र को गन्धहस्ति महाभाष्य के मंगलाचरण के रूप में तत्त्वार्थसूत्र की टीका करने के लिये लिखा था। यहाँ उन्होंने अपनी परीक्षा प्रधान दृष्टि से आप्त पुरुष अर्हत्परमेष्ठी के ही अपना आराध्य घोषित किया है। ‘अर्हन्नेव सर्वज्ञ:’ की र्तािकक मीमांसा इस स्तोत्र में अत्यन्त सहज भाव से हुई है, मंगलाचरण स्वरूप लिखे गये किसी विशेष श्लोक[८] के प्रमेय को व्याख्यापित करने के लिये नहीं। आप्तमीमांसा स्तोत्र में जो प्रमेय अवतरित हुआ है, वह अत्यन्त स्पष्ट है और हमें समन्तभद्र की विलक्षण प्रतिभा का आभास करा देता है। आचार्य समन्तभद्र नानाशास्त्रों के अध्येता एवं जै्ना—जैनेतर दार्शनिक सिद्धान्तों के मर्मज्ञ विद्वान् थे। उन्होंने अपने आराध्य या उपास्य आप्त पुरुष को सर्वज्ञ स्वीकार किया है जिसकी र्तािकक सिद्धि करना ही उन्हें अभीष्ट रहा है। मोक्ष मार्ग के नेतृत्व और कर्मभूभृत् के भेतृत्त्व को सिद्ध करने वाली प्रतिपत्ति हमें यहाँ दिखाई नहीं देती है फिर हम यह कैसे कह सकते हैं कि ‘‘मोक्षमार्गस्य नेतारं भेत्तारं कर्मभूभृताम्। ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां वन्दे तद्गुणलब्ध्ये।।’’—यह मंगलाचरण समन्तभद्र के सामने था और उन्होंने उसमें प्रतिपादित आप्त की ही व्याख्या आप्तमीमांसा स्तोत्र में की है। अपने आप्त को वीतरागी, सर्वज्ञ और हितोपदेशी के रूप में जानना और समझना उन्हें केवल तत्त्वार्थसूत्र से ही नहीं तदितर वाङ्मय से भी संभव था। अत: यह कहना कि उपर्युक्त श्लोक उनके सामने था और उससे प्रेरित होकर ही उन्होंने आप्त की मीमांसा की, यह समीचीन एवं अपरिहार्य नहीं माना जा सकता है। उस श्लोक के बिना ही आप्त की मीमांसा करना समन्तभद्र के लिये असम्भव था, यह नहीं माना जा सकता है। आप्त मीमांसा स्तोत्र ११४ अनुष्टुप छन्दों में अपने प्रमेय को प्रस्फुटित करता है। जिसे विषय निरूपणा की दृष्टि से दश परिच्छेदों में विभाजित करना टीकाकारों को अभीष्ट रहा है। उसी अनुक्रम से उसकी कुछ झलक यहाँ प्रस्तुत है—

प्रथम परिच्छेद—

प्रथमपरिच्छेद का प्रमेय तेईस छन्दों में अपने अनूठे वैशिष्ट्य को लिये हुये उपस्थित हुआ है। आरम्भ के छह छन्दों में ही आचार्य समन्तभद्र न अपने आप्त पुरुष (अर्हत्परमेष्ठी) का समुल्लेख बिना किसी नामोल्लेख के कर दिया है। क्या विलक्षण शैली है उनकी ? विचार करोगे तो पायेंगे कि स्तोत्र के रूप में ख्यात उनका यह मंगलाचरण विषयक स्तवन कितनी सशक्त प्रेरणा है और कितना बहुमूल्य है। मानों हमें ही तो सचेत कर रहा है। कि अपने आराध्य या उपास्य को हम आप्त की मर्यादा में जाने और उनकी शरण में जाने से पहले भक्तिभाव प्रसूनपुञ्ज होकर भी उनके बारे में सोचें अवश्य। उनके निर्दोष व्यक्तित्व पर ही रीझें, दिखाई देने वाले बाह्य व्यक्तित्व पर ही लूट नहीं हों, परमार्थशून्य ढकोसलों में उलझें नहीं, निर्णय अवश्य करें तथा अपने निर्णय को तर्क की कसौटी पर कसकर ही किसी को आप्त मानें। देखिये समन्तभद्र क्या कह रहे हैं—‘‘देवों का आना, आकाश में गमन, छत्र चामरादिक विभूतियाँ आपकी हैं पर इस कारण से तुम महान् नहीं हो क्योंकि ये सब तो मायावियों में भी दिखाई देने लग जाती हैं। आपका दिखाई देने वाला अन्तरंग एवं बहिरंग विग्रहादि महोदय भी यद्यपि दिव्यता और सत्यता को लिये हुये हैं तथापि उनके कारण से तुम महान् नहीं हो सकते क्योंकि वे तो रागादि स्वरूप वाले स्वर्ग के देवों में भी होते हैं।’’[९]

यहाँ अभिलक्षित विग्रहादि महोदय,

चामरादि विभूतियाँ और देवागमादिक प्रवृत्तियाँ तीर्थंकरों की होती हैं, यह जानते हुये भी समन्तभद्र उनके सद्भाव से ही किसी तीर्थंकर को महान् मानने को तैयार नहीं है। इसका कारण यह है कि उस समय तक सुगत आदि अनेक तीर्थंकर प्रस्थापित हो चुके थे। किन्तु उनके तीर्थकरत्व स्वरूप समय यानि शास्त्र परस्पर विरोधी प्ररूपणा करने वाले होने से अपने तीर्थंकरों की आप्तता को सिद्ध करने में असमर्थ थे। उन तीर्थंकरों के उपदेश में की गयी वस्तु विवेचना भी पारस्परिक मतभेदों को द्योतिक कर रही थी, जिससे वे सभी के सभी तीर्थंकर आप्त नहीं हो सकते थे क्योंकि आप्त तो सत्य वस्तु का प्ररूपक होता है और सत्य वस्तु तो सर्वदा सर्वत्र सभी के लिये समान ही होती है। वह प्ररूपणकत्र्ता के भेद से बदल नहीं सकती है। यदि प्ररूपणा के आधार पर आप्त का निर्णय करें भी तो इनमें कोई एक ही तो आप्त होता। यही समन्तभद्र का कहना है—

‘‘तीर्थकृत्समयानाञ्च परस्परविरोधत:।

सर्वेषामाप्तता नास्ति कश्चिदेव भवेद्गुरु:।।’’[१०]

इसके उपरान्त समन्तभद्र की स्पष्टोक्ति[११] है कि जिनकी राग द्वेष आदि दोषों की और ज्ञान सामथ्र्य के आवरक कारणों को सम्पूर्णत: (सर्वथा) हानि हो चुकी है, उन तीर्थंकरों को आप्त माना जा सकता है। जैसे किसी पुरुष विशेष में अंतरंग और बहिरंग मलों का नाश उसके अपने कारणों के मिल जाने पर देखा जाता है वैसे ही किसी पुरुष विशेष में पाये जाने वालो दोषों और आवरणों की हानि भी उसके अपने कारण मिलने पर संभव होती है। यह हानि न्यूनाधिक भी देखी जाती है, जिससे यह अनुमान किया जा सकता है कि किसी में यह हानि सातिशय होने से सर्वाधिक या सम्पूर्ण भी होती है। रागादि दोषों की सम्पूर्ण हानि होने से वीतरागता और आवरणों (ज्ञान के आवरक की कारणों) की सम्पूर्णत: हानि हो जाने से सर्वज्ञता प्रगट हो जाती है, यही परम आप्त होने की अपरिहार्य योग्यता है। ‘‘सुगतो यदि सर्वज्ञ: कपिलो नेति का प्रमा। तावुभौ यदि सर्वज्ञौ मतभेद: कथं तयो:।। इस वचन से स्पष्ट होता है कि शास्त्रवचनों से किसी के सर्वज्ञ होने का निर्णय करना दुरुहतर कार्य है। यह अन्योन्याश्रित होने से अप्रमाण भी होगा। कोई सर्वज्ञ प्रत्यक्षत: उपलब्ध भी नहीं है। फिर कैसे कोई सर्वज्ञ होता है, यह मान लिया जाये। समन्तभद्र ने संभवत: इसी का समाधान करने के लिये निम्न करिकायें लिखीं हैं—

‘‘सूक्ष्मान्तरितदूरार्था: प्रत्यक्षा: कस्यचिद्यथा।

अनुमेयत्वतोऽग्न्यादिरिति सर्वज्ञसंस्थिति:।।
स त्वमेवासि निर्दोषो युक्तिशास्त्राविरोधिवाक्।
अविरोधो यदिष्टं ते प्रसिद्धेन न बाध्यते।।’’

यहाँ अनुमान प्रमाण से सर्वज्ञ की सिद्धि की गयी है

जो दार्शनिक जगत् में सर्वाधिक प्राचीन प्रतिपत्ति मानी जा सकती है। यहाँ ‘‘सूक्ष्मान्तरितदूरार्था: कस्यचित् प्रत्यक्षा:’’ यह प्रतिज्ञा वाक्य है। ‘‘अनुमेयत्वात्’’ यह हेतु वचन है। ‘‘यथा अग्न्यादि:’’ यह उदाहरण है। इसका मतलब यह है कि स्वभाव से विप्रकृष्ट सूक्ष्मपदार्थ परमाणु आदि, कालविप्रकृष्ट अन्तरितपदार्थ राम रावण आदि तथा देशविप्रकृष्ट दूरस्थपदार्थ मेरु पर्वत आदि किसी के लिये प्रत्यक्ष होते हैं क्योंकि वे हमारे अनुमान का विषय है। जो अनुमान का विषय होता है वह किसी के लिये प्रत्यक्ष होता है। जैसे पर्वत पर मौजूद अग्नि धूमदर्शन से अनुमेय होती है तो किसी को प्रत्यक्ष भी होती है। यहाँ सूक्ष्म पदार्थ परमाणु हमारे लिये अनुमान गोचर है। स्कन्ध की अन्यथानुत्पत्ति परमाणु के साथ है और अपना अविनाभाव सम्बन्ध द्योतित करती है। इसीलिये किसी स्कन्ध को देखकर यह परमाणुओं के मेल से बना है, यह ज्ञान होता है। इस प्रकार परमाणु अनुमेय हैं। ऐसे ही पिता से पुत्र की उत्पत्ति होती है मेरे पिता की भी पुत्र के रूप में उत्पत्ति अपने पिता से हुई होगी। उनके पिता की अपने पिता से हुई होगी। इस प्रकार सुदीर्घ पितृ परम्परा का ज्ञान हमें अनुमान से होता है, अत: वे हमें अनुमेय हैं। ऐसे ही निकटवर्ती पर्वत, नदी आदि को देखकर सुदूरवर्ती नदी आदि का अनुमान संभव है, अत: वे भी अनुमेय हैं। ये सभी हमारे अनुमेय है। इसलिये किसी के प्रत्यक्ष भी हैं। इस प्रकार सूक्ष्म अन्तरित दूरवर्ती पदार्थ जिसके प्रत्यक्ष हैं वही तो सर्वज्ञ है।

यहाँ यह भी जान लेना चाहिये कि सर्वज्ञ को हम प्रत्यक्ष से सिद्ध नहीं कर सकते हैं तो कोई भी सर्वज्ञ नहीं है, कहीं पर भी सर्वज्ञ नहीं है, कभी भी कोई सर्वज्ञ नहीं होता है—यह भी सिद्ध नहीं कर सकते हैं। सर्वकाल और सर्वदेश में सभी को जानकर ही यह कहा जा सकता है कि कोई सर्वज्ञ नहीं है। यदि बिना जाने कहेंगे कि सर्वज्ञ नहीं है तो कथन की प्रामाणिकता नहीं होगी तथा जानकर कहे जाने पर कहने वाला ही सर्वदेश और सर्वकालवर्ती सर्व को जानने वाला होने से सर्वज्ञ कहलायेगा।

इस प्रकार कोई सर्वज्ञ हो सकता है

यह सिद्ध करने के उपरान्त समन्तभद्र ने घोषणा कर दी कि हे भगवन् ! वह सर्वज्ञ तुम ही हो क्योंकि तुम निर्दोष हो। आपकी वाणी अर्थात् संसार मोक्ष और उनके कारणों का कथन करने वाली देशना भी युक्ति और शास्त्र से अविरुद्ध स्वभाव वाली है इसलिये आप युक्तिशास्त्रविरोधी वाक् हो। (युक्तिशास्त्राभ्यामविरोधिनी वाक् यस्य स त्वमेव युक्तिशास्त्राविरोधीवाक् इति) हे भगवन् ! आपके वचनों में कोई विरोध या विसंवाद भी नहीं है। इसका कारण आपके इष्ट तत्त्व अर्थात् संसार मोक्ष और उनके कारणों की प्ररूपणा करने रूप उपदेश में किसी भी प्रसिद्ध प्रमाण से बाधा नहीं आती है। किन्तु आपके उपदेशामृत से वञ्चित या आपके मत को न मानने वाले अर्थात् आपके स्याद्वाद मत से बाह्य जन जो सर्वथा एकान्तस्वरूप वस्तु की प्ररूपणा करते हैं और आप्त न होते हुये भी आप्तविभमान से दग्ध हैं। उनका स्वेष्ट प्रत्यक्ष प्रमाण से बधित हो जाता है। क्योंकि वस्तु सर्वथा नित्य है या अनित्य है—ऐसे सर्वथा एकान्त के ग्रहण से रञ्चित—रामोञ्चित या प्रसन्न होने वाले एकान्तग्रह रक्त लोग स्वपर सिद्धान्त के बैरी हैं क्योंकि एकान्त की प्ररूपणा करने से लोक विरूद्धता आ जाती है। इस प्रकार स्वपर सिद्धान्त के वैरी सर्वथैकान्तवादियों के यहाँ पुण्य—पाप कर्म एवं परलोक का होना कहीं पर किसी भी प्राणी में सिद्ध नहीं होता है जबकि पुण्यपापादिक कुशल या अकुशल कर्म लोक जीवन में स्वत: अनुभूत होकर प्रत्यक्ष प्रमाण से सिद्ध होते हैं। यह सर्वथैकान्तवादियों के माने गये स्वेष्ट को मानने में स्वानुभवगम्य या लोक प्रत्यक्ष रूप दुष्ट प्रमाण से बाधा है।

सर्वथैकान्त को मानने पर प्रत्यक्ष

गोचर लोक व्यवस्था किस प्रकार असंभव या मिथ्या हो जायेगी यह बताने के लिये आचार्य समन्तभद्र ने कहा कि भावैकान्तवाद, अभावैकान्तवाद और भावाभावैकान्तवाद को मानने पर दूषणों की प्रादुर्भूति अपरिहार्य हो जाती है। पदार्थो का सर्वथा सद्भाव धर्म ही होता है—ऐसा कहने पर अभाव धर्म का अपह्नव होता है अर्थात् वस्तु में अभाव धर्म होने पर भी उसको नहीं मानने का भ्रम खड़ा हो जाता है। सर्वथाभावैकान्त वादियों के अनुसार यदि पदार्थो को मात्र सर्वथा सत्व स्वरूप भावैकान्त मान लिया जाये तो उन पदार्थो में अभावधर्म का अपह्नव होने से हमारी बुद्धि भ्रमित हो जायेगी। यदि इस भ्रम मूलक बुद्धि को सही मान लें तो सारी वस्तु व्यवस्था ही मिथ्या हो जायेगी क्योंकि प्रत्येक वस्तु में विद्यमान अभावधर्म को अस्वीकार करने पर सभी वस्तुएं एकमेक (सर्वात्मक) हो जायेंगी। किसी वस्तु का कोई स्वरूप ही नहीं ठहरेगा। तथा सबसे बड़ी विसंगति यह खड़ी हो जायेगी कि भावैकान्तवादी को कहना पड़ेगा कि सर्वथा भावैकान्त को मानने से समुत्पन्न लोकविरोध स्वरूप प्रतिफलित वस्तु मेरी ही है, तुम्हारी नहीं। तदेवं ताववंन तावकमतावकमिति प्रतिपत्त्या न तवेदं ममेदमेव प्रसाधयति अताववं पदमिति)। पदार्थो का मात्र भाव स्वरूप ही मानने पर भावैकान्तवाद में अत्यंताभाव, प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव और अन्योन्याभाव रूप चर्तुिवध अभावधर्म का अपह्नव हो जाने से उनका यह वस्तुगत विरोध उपर्युक्त दूषणों से दूषित होकर भावैकान्तवादियों को ही स्वेष्ट हो सकता है, यथार्थवादियों को नहीं, यह स्पष्ट हो जाता है। आचार्य समन्तभद्र के निम्न श्लोकों का पर्यवलोकन भी यहाँ आवश्यक लगता है—

‘‘भावैकान्ते पदार्थानामभावानामह्नवात्।

सर्वात्मकमनाद्यन्तमस्वरूपमतावकम्।।
कार्यद्रव्यमनादि स्यात्प्रागभावास्य निह्नवे।
प्रध्वंसस्य च धर्मस्य प्रच्यवेऽनन्ततां ब्रजेत्।।
अन्यत्र समवाये न व्यपदिश्येत सर्वथा।।’’

अर्थात् सर्वथा भावैकान्त मानने पर

पदार्थो के अत्यंताभाव, प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव और अन्योन्याभाव से ज्ञापित चर्तुिवध अभावधर्म का अपह्नव हो जाने से सभी पदार्थ सर्वात्मक हो जायेंगे उन्हें अनादि अनन्त और स्वरूप रहित भी करना पड़ेगा। प्रागभाव का निह्नव मानने पर कार्यद्रव्य अर्थात् द्रव्यों में होने वाला कार्य अनादि मानना पड़ेगा और प्रध्वंस धर्म का प्रच्यव होने पर अर्थात् प्रध्वंसाभाव का अभाव मानने पर कार्यद्रव्य अनन्तता को प्राप्त हो जायेगा, उसका कभी नाश ही नहीं हो सकेगा। अन्यापोह का व्यतिक्रम अर्थात् अन्योन्याभाव न मानने पर अनन्तधर्मात्मक तत्त्व (वस्तु) सर्वात्मक या एक रूप ही हो जायेगा। तथा अत्यंताभाव के अभाव में अर्थात् अन्यत्र समवाय मानने पर (अमुक गुण का अमुकगुणी में ही समवाय होता है इसलिये गुण विशेष का कहीं अन्यत्र भी समवाय मानना अत्यंताभाव का लोप है) यह पदार्थ सर्वथा इस गुणवाला ही है यह व्यपदेश—कथन भी नहीं किया जा सकेगा।

वस्तु में भाव रूप धर्म है ही नहीं—इस प्रकार सद्भावधर्म का अपह्नव करने वालों के यहाँ सर्वथा अभावैकान्त मानने पर कुछ भी सिद्धि नहीं की जा सकती है क्योंकि उनके यहाँ न तो बोध (ज्ञान) को प्रमाण सिद्ध किया जा सकता है और न ही वाक्य को। फिर वे किससे स्वपक्ष का साधन करेंगे और परमत का दूषण दिखायेंगे। अत: अभावैकान्तवाद में कुछ भी संभव नहीं हो सकता है। यह समन्तभद्र ने स्पष्ट कर दिया है।

सर्वथाभावैकान्त और अभावैकान्त के दोषों से बचने के लिये कुछ लोग वस्तु में भाव और अभाव धर्मो को तो मानते हैं पर उन्हें सापेक्ष नहीं मानकर सर्वथा निरपेक्ष ही मानते हैं। क्योंकि सापेक्ष मानने पर उन्हें स्याद्वाद न्याय को मानना पड़ेगा। ऐसे उभयैकान्तवादियों को भी लक्षित करके आचार्य न कहा कि इस स्याद्वादन्याय के विद्वेषी जनों के यहाँ भाव अभाव सापेक्ष रूप से नहीं माने जा सकते हैं और उनका निरपेक्ष अस्तित्व उनके यहाँ बन नहीं सकता है। फिर दोनों की सर्वथा एकात्मता कैसे बनेगी ? उनमें परस्पर विरोध होने से उनकी सर्वथा एकात्मता कैसे बनेगी? उनमें परस्पर विरोध होने से उनकी सर्वथा एकात्मता मानने में विरोध आता है।१८ अत: भाव और अभाव को निरपेक्ष मानने वाला उभयैकान्तवाद भी समीचीन नहीं है।

तत्त्व सर्वथा अवाच्य है अत: उसका प्ररूपण कथमपि संभव नहीं है—ऐसा कहने वाले अवाच्यतैकान्तवादियों को भी सही नहीं माना जा सकता है क्योंकि जब तत्त्व सर्वथा अवाच्य है और किसी भी अपेक्षा से उसका कथन नहीं किया जा सकता है तो ‘तत्त्व अवाच्य है’ यह उक्ति भी सर्वथा अवाच्यतैकान्त में युक्त नहीं है। क्योंकि अवाच्य है, यह कहने पर वाच्य नहीं है इस रूप में तो तत्त्व वाच्य हो ही गया। अन्यथा उसे कहा नहीं जा सकता। इस प्रकार सर्वथा अवाच्यतैकान्त सदोष सिद्ध होता है। तत्त्व को कथञ्चित् वाच्य मानकर ही उपर्युक्त दोष से बचा जा सकता है। अत: समन्तभद्र ने कथञ्चित् भावैकान्त, कथञ्चित् अभावैकान्त, कथञ्चित् उभयैकान्त और कथञ्चित् अवाच्यतैकान्त स्वरूप तत्व को यानि वस्तु को प्ररूपित किया और उसे सिद्ध करने के लिये स्याद्वादन्याय को भी प्रतिष्ठित किया है—

‘‘कथञ्चित्ते सदेवेष्टं कथञ्चिदसदेव तत्।

तथोभयमवाच्यं च नययोगान्न सर्वथा।।
सदैव सर्व को नेच्छेत्स्वरूपादिचतुष्टयात्।
असदेव विपर्यसान्न चेन्न व्यवतिष्ठते।।
क्रर्मािपतद्वयाद् द्वैतं सहावाच्यमशक्तित:।
अवक्तव्योत्तरा: शेषस्त्र्यो भंगा: स्वहेतुत:।।[१२]

यहाँ आचार्य समन्तभद्र ने स्पष्ट कर दिया है कि

आपके अर्थात् जिन परमेष्ठी आप्त के द्वारा र्नििदष्ट जो इष्ट तत्व है वह किसी अपेक्षा से (कथञ्चित्) सत् ही है, किसी अपेक्षा से असत् ही है, किसी अपेक्षा से सत् भी है और असत् भी है, किसी अपेक्षा से अवक्तत्व है, किसी अपेक्षा से सद् अवक्तव्य है किसी अपेक्षा से असद् अवक्तव्य है और किसी अपेक्षा से सद् अवक्तव्य है किसी अपेक्षा से असद् अवक्तव्य है और किसी अपेक्षा सदसत् अवक्तव्य है। ये सब कथन विवक्षा भेद से अर्थात् नय के योग से संभव है, सर्वथा नहीं। ऐसा कौन होगा जो सभी वस्तुओं को उनके अपने द्रव्य क्षेत्र—काल—भाव रूप चतुष्टय से सत् नहीं मानेगा। स्वचतुष्टय का विपर्यास अर्थात् विलोम पर चतुष्टय है उसकी अपेक्षा से अर्थात् पर पदार्थ का द्रव्य—क्षेत्र—काल—भाव का होना स्व द्रव्य में नहीं है, इस अपेक्षा से वह असत् ही है। यदि ऐसा न माना जाये तो कोई भी तत्त्व व्यवस्थित ही नहीं माना जा सकेगा अथवा किसी भी तत्त्व की व्यवस्था का निश्चय ही नहीं हो सकेगा। इस प्रकार सत् और असत् दोनों ही धर्म प्रत्येक वस्तु में स्वपर चतुष्टय की अपेक्षा से सिद्ध हैं और कहे जा सकते हैं। इसलिये सत्त्व को कहने के समय वस्तु कथञ्चित् सत् कहलाती है और असत्त्व को कहने के समय कथञ्चित् असत्। किन्तु यदि सत्त्व असत्त्व दोनों को क्रम से कहने के समय वस्तु को कथञ्चित् उभयरूप या द्वैतस्वरूप (सत्—असदात्मक) कहा जाता है। इन दोनों धर्मो (सत्त्व—असत्त्व) का क्रम से कथन करना तो संभव होने पर भी एक साथ (युगपत्) कथन करना अशक्य होने से वस्तु अवक्तव्य या अवाच्य कहलाती हैं यहाँ तक सत्—असत् धर्मयुगल की अपेक्षा वस्तु को समझाने के लिये भंग कहे—

(१) वस्तु कथञ्चित् सत्त्व रूप है।

(२) वस्तु कथञ्चित् असत्त्व रूप है।

(३) वस्तु कथञ्चित् सदसदात्मक उभयरूप है। और

(४) वस्तु कथंचित् अवक्तव्य है।

इनकी प्रतिपत्ति कराके समन्तभद्र ने शेष तीनभंग अभी शेष हैं जिन्हें अपने—अपने हेतु से समझ लेना चाहिये। इसका मतलब स्पष्ट है कि किसी एक धर्मयुगल की मुख्यता से वस्तु को सात भंगों के बिना निद्र्वन्द समझना या कहना संभव नहीं है। इस प्रकार सात भंगों से वस्तु को समझने समझाने रूप सप्तभंगी न्याय की प्रतिष्ठा समन्तभद्र के समय तक हो चुकी थी। जैन परम्परा में सदसत् रूप परस्पर विरोधी धर्म युगल प्रत्येक वस्तु में है, यह कैसे संभव है ? इसे स्पष्ट करने हेतु समन्तभद्र कहते हैं—

‘‘अस्तित्वं प्रतिषेध्येनाविनाभाव्येकर्धिमणि।

विशेषणत्वत् साधम्र्यं यथा भेदविवक्षया।।
नास्तित्वं प्रतिषेध्येनाविनाभव्येकर्धिमणि।
विशेषणत्वाद्वैधम्र्य यथाऽभेदविवक्षया।।’’[१३]

प्रत्येक धर्मों में अस्तित्व अपने

प्रतिषेध्य (नास्तित्व) के साथ अविनाभावी है। नास्तिक अस्तित्व के होने पर ही प्रतिषेध्य रूप हो सकता है। बिना अस्तित्त्व के नास्तित्त्व नहीं होता है। अत: अस्तित्व और नास्तित्व वस्तु में वैसे ही विशेषण हैं जैसे हेतु में साधम्र्य और वैधम्र्य होते हैं। प्रत्येक धर्मी में अस्तित्व नास्तित्व का अविनाभावी है क्योंकि वह विशेषण है वह अपने धर्मो में प्रतिषेध्य धर्म का अविनाभावी होता है जैसे हेतु में साधम्र्य भेदविवक्षा से वैधम्र्य के साथ अविनाभावी है। यहाँ साधम्र्य अन्वय को तथा वैधम्र्य व्यतिरेक को कहते हैं। साध्य के साथ हेतु का अन्वय व्यतिरेकपने से अविनाभाव होता ही है वही हेतु समीचीन है जिसमें अन्वय व्यतिरेक अर्थात् साधम्र्य और वैधम्र्य दोनों घटते हों। ‘‘पर्वत पर अग्नि है, धूम होने से’। यहाँ पर्वत पर अग्नि साध्य है और धूम का होना हेतु है। अग्नि के होने पर ही धूम होता है, यह अन्वय धर्म है तथा अग्नि के नहीं होने पर धूम नहीं होता है यह व्यतिरेकधर्म है। इस प्रकार धूमहेतु में साधम्र्य वैधम्र्य घटित हो जाते हैं जिससे दोनों का परस्पर अविनाभाव सम्बन्ध भी अभिव्यक्त हो जाता है।

इसी प्रकार नास्तित्व भी अपने प्रतिषेध्य अस्तित्व के साथ प्रत्येकधर्मी में अविनाभावी है। क्योंकि नास्तित्व भी एक धर्मी का विशेषण है। यह घट है, पट नहीं है क्योंकि घटपने है पटपने नहीं। यहाँ घट का अस्तित्व रूप विशेषण ‘घटपने है’ इससे ज्ञात हो जाता है। तथा ‘पट’ नहीं है’—से नास्तित्व विशेषण ज्ञात होता है। नास्तित्व विशेषण होने से अपने प्रतिषेध्य के साथ अविनाभावी होता है। वैसे ही जैसे हेतु में अभेद विवक्षा से वैधम्र्य साधम्र्य का अविनाभावी है। यहाँ यदि यह कहा जाये कि एक धर्मी में अस्तित्व नास्तित्व विशेषण भले हों पर वे विशेष्य नहीं माने जा सकते हैं और वे अभिलाप्य भी नहीं है तो समन्तभद्र कहते हैं कि—

‘विधेयप्रतिषेध्यात्मा विशेष्य: शब्दगोचर:।

साध्यधर्मो यथा हेतुरहेतुश्चाप्यपेक्ष्या।।’[१४]

अर्थात् अस्तित्व नास्तित्व

विशेषणों से ही धर्मी विशेष्य कहलाता है तथा शब्दगोचर भी है। जैसे साध्य का धर्म अपेक्ष के भेद से हेतु भी होता है और अहेतु भी होता है। प्रत्येक वस्तु अस्तित्व (विधेय) और नास्तित्व (प्रतिषेष्य) स्वरूप वाली है। यहाँ वस्तु विशेष्य है। शब्द का विषय बनने वाली विशेष्य रूप वस्तु विधि प्रतिषेध ही होती है। अपने स्वरूप से कही जाने की विवक्षा में विधिरूप तथा पर रूप से कही जाने की विवक्षा में निषेधरूप होती है वैसे ही जैसे साध्य का धर्म सिद्ध करने में हेतु का विधि निषेध रूप होता है। ‘‘शब्दा: अनित्या: कृतकत्वात्’’ यहाँ ‘कृतकत्व’ शब्द की अनित्यता को सिद्ध करने में हेतु है किन्तु शब्द की नित्यता को सिद्ध करना हो तो अहेतु है। इस प्रकार अपेक्षा भेद से विधि प्रतिषेध रूप धर्मो और जीवादि धर्मी की यथार्थ प्रतीति संभव हो जाती है। तथा क्रमश: विधेय और प्रतिषेध्य दोनों ही धर्म वस्तु में अभिलाप्य हैं, यह सिद्ध हो जाता है। शेष तीन भंगों अर्थात् कथञ्चित् अस्ति अवक्तव्य, कथञ्चित् अस्तिनास्ति अवक्तव्य को पूर्वोक्त विवक्षाओं से समझ लेना चाहिये। अस्तित्व नास्तित्व वस्तु के विशेषण होकर परस्पर अविनाभावी है जिसे वस्तु उभयरूप और शब्द का विषय होकर वक्तव्य होती है। वक्तव्यत्व अपने प्रतिषेध्य अवक्तव्यत्व के साथ एक धर्मी में अविनाभावी है इसलिये वस्तु अवक्तव्य भी है क्योंकि अवक्तव्यत्व भी वस्तु का विशेषण हैं और अपने प्रतिषेध्य वक्तव्य का अविनाभावी है। वस्तु सदवक्तव्य है और अपने प्रतिषेध्य असदवक्तव्यत्व का अविनाभावी है। वस्तु असदवक्तव्य का अविनाभावी है। इसी प्रकार वस्तु मदमदवक्तव्य भी है इस प्रकार सातों भंग वस्तु के विशेषण होते हैं और अपने अपने प्रतिषेध्य के अविनाभावी भी। वस्तु में अनन्त धर्मयुगल पाये जाते हैं उनमें प्रत्येक धर्म युगल की अपेक्षा सात सात भंग बनते हैं। वस्तु गम अनंत धर्मो की अपेक्षा अनन्त सप्तभंगियाँ बन जाती हैं। हे जिनेन्द्र ! आपके शासन में कहीं कोई विरोध नहीं आता है। प्रत्येक वस्तु में सदसत् धर्मयुगल तादात्म्य रूप से है अत: जो वस्तु सत् है वह असत् भी है। अपेक्षा भेद से उसे मानने में कोई विरोध नहीं आता है। निम्न कारिका यहाँ द्रष्टव्य है—

शेषभंगाश्च नेतव्या: यथोक्तनययोगत:।

न च कश्चिद्विरोधोऽस्ति मुनीन्द्र तव शासने।।[१५]

वस्तु में सदसत् आदि परस्पर

विरुद्ध धर्म मानने पर विरोध, वैयधिकरण्य, अनवस्था, संकट, व्यतिकर, संशय, अप्रतिपत्ति और अभाव नामक आठों दोषों का निराकरण सप्तभंगीन्याय से संभव हो जाता है और अनेकान्तात्मक वस्तु को स्वीकार करने में कोई विरोध नहीं रहता है। यदि वस्तु को ‘सत्—असत्’ आदि अनेकान्त से युक्त नहीं मानेंगे तो वस्तु में अर्थ क्रियाकारित्व का ही अभाव हो जायेगा। अत: विधि निषेध के द्वारा अनवस्थित अर्थात् सत्व—असत्त्व में एक रूप से अवस्थित न होकर उभयरूप वस्तु ही अर्थ क्रिया करने में समर्थ होती है। यदि यह न माना जाये तो जैसे अन्तरंग बहिरंग कारणों से कार्य निष्पन्न होता है, वह नहीं बन सकेगा। भावैकान्त या अभावैकान्त या निरपेक्ष भावाभावैकान्त मानने पर वस्तु में अर्थ क्रियाकारित्व नहीं होने से कार्य संभूति का अभाव मानना पड़ेगा। अतएव जो सत् है वही असत् भी है—यह अनेकान्तात्मक वस्तु में ही सप्तभंगीन्याय से सिद्ध होता है और विधिनिषेध द्वारा उसे फलित करके समझना चाहिये अन्यथा वस्तु में अर्थक्रिया नहीं होगी। यथा—

एवं विधिनिषेधाभ्यामनवस्थितमर्थकृत।

नेति चेन्न यथा कार्यं बहिरत्नरूपाधिभि:।।[१६]

जब हम किसी अनन्तधर्म वाले धर्मी के किसी सत्त्व—असत्त्व जैसे धर्मयुगल को मुख्य करके वस्तु का कथन करते हैं तो सप्तभंगी न्याय से किया गया कथन यथार्थ अधिगम करा देता है। धर्मो। एवं धर्मी में तादात्म्य सम्बन्ध या अभिन्नत्व होने से यह नहीं कहा जा सकता है कि एक धर्म का ज्ञान होने पर उससे ही अन्य धर्मो। का भी ज्ञान हो जायेगा। क्योंकि अनन्त धर्म वाले धर्मी में प्रत्येक धर्म के बने रहने में अपना अपना अन्य ही अर्थ या प्रयोजन हैं उनमें से जब हम जिस किसी भी एक धर्म को अंगीकार करके कथन करते हैं तो अन्य धर्मो की गौणता हो जाती है। धर्म धर्मी में परस्पर अंग अंगी भाव होने से अनेकान्त के कथन में कोई विरोध नहीं रहता है। जैसा कि निम्न कारिका में परिलक्षित है—

‘‘धर्मे धर्मेऽन्य एवार्थो र्धिमणोऽनन्तधर्मण:।

अङ्गीत्वेऽन्यतमान्तस्य शेषान्तानां तदङ्गता।।’’[१७]

अन्त में प्रथम परिच्छेद का समाहार इस उपदेश से किया है कि न्याय की योजना एक—अनेक, नित्य—अनित्य आदि सभी धर्मो में नय विशारदों द्वारा नयों के योग से करनी चाहिये—

एकानेकविकल्पादावुत्तरत्रापि योजयेत्।

प्रक्रियां भंङ्गिनीमेनां नयैनयविशारद:।।[१८]

द्वितीय परिच्छेद :

इस परिच्छेद में १३ कारिकाओं में स्तोत्रकार आचार्य समन्तभद्र ने अद्वैतैकान्तवाद पृथक्त्वैकान्तवाद के दूषणों का उल्लेख कर अद्वैतवेदान्त, वैशेषिक एवं बौद्धदर्शनों को समीक्षात्मक परिधि में लाकर जानने और समझने की प्रेरणा दी है। समन्तभद्र की स्पष्ट प्रतिपत्ति है कि अद्वैतैकान्तपक्ष को स्वीकार करने पर कत्र्ता कर्म आदि कारकों का और क्रिया का जो भी भेद जगत् में प्रत्यक्ष सिद्ध है वह विरोध को प्राप्त होता है। कोई एक अद्वितीय तत्त्व या वस्तु स्वयं से उत्पन्न नहीं होती है। जगत् में तो नाना वस्तुयें हैं और उनमें प्रत्येक कार्य की उत्पत्ति भिन्न—भिन्न कारकों से ही होती हुई देखी जाती है। पदार्थो में जायमान क्रिया भी भिन्न—भिन्न ही ज्ञात होती है। कारकों में भी परस्पर अनन्तता और अनेकता है तो क्रियायों भी अन्य क्रियाओं से भिन्न जानने में आती है। इस प्रकार क्रिया और कारकों के भेद से अनेकता ही हम लोगों को अनुभव में आती है जिससे ब्रह्माद्वैत, ज्ञानाद्वैत, शब्दाद्वैत आदि प्रतीतियोग्य नहीं माने जा सकते हैं।

अद्वैतैकान्तवादों में शुभ—अशुभ कर्म, पुण्य पाप भाव या सुख—दुख रूप कर्मफल, लोक—परलोक, विद्या—अविद्या, बन्ध—मोक्ष आदि द्वैतभावों की सत्यता नहीं मानी जा सकती है। जगत् में नाना पदार्थ एवं द्वैतभावी दिखायी देने पर भी मात्र एक अद्वितीय सत्ता को सिद्ध करने के लिये अथवा द्वैतता का अभाव सिद्ध करने के लिये अनुमान प्रमाण का प्रयोग तो अद्वैतैकान्त वादियों को करना ही पड़ेगा क्योंकि प्रत्यक्ष से अद्वैतैकान्त माना ही नहीं जा सकता है। अनुमान वाक्य की प्रस्तुति साध्य और हेतु के बिना कैसे होगी अतएव वहाँ हेतु और साध्य का द्वैत सिद्ध करेंगे तो उसकी प्रामाणिकता नहीं होगी। कोई सिद्धि वचन मात्र के प्रयोग से तो हो नहीं सकती यदि मानेंगे तो अतिप्रसंग का दोष पैदा हो जायेगा। हेतु के बिना अद्वैतैकान्त ही क्यों अनेकात्वाद की सिद्धि भी वचनमात्र से ही क्यों न मान ली जाये। इस प्रकार तो अद्वैतैकान्तवाद काल्पनिक ही हो जायेगा। सर्वथा अद्वैत ही है। द्वैत की कोई सत्ता या प्रतिपत्ति सम्यक् नहीं है यह मानने वाले अद्वैतैकान्तवादियों को यह तो सोचना चाहिये कि द्वैत को माने बिना अद्वैत की सिद्धि कैसे होगी ? यदि हम केवल अद्वैत को मानना चाहते हैं तो द्वैत को मानना ही पड़ेगा क्योंकि द्वैत और अद्वैत का परस्पर अविनाभाव वैसे ही है जैसे हेतु और अहेतु के बारे में है। हेतु का आकलन किये बिना अहेतु की कल्पना सर्वथा मिथ्या होती है। पुनश्च किसी भी संज्ञी तत्त्व (जीवादिक) का प्रतिषेध—निषेध या अभाव उसके प्रतिषेध्य के बिना कैसे सम्भव है इस प्रकार कहीं पर भी जीवादिक संज्ञा से अभिहित संज्ञियों का प्रतिषेध संभव नहीं है। परिणामत: द्वैतसिद्धि अपरिहार्य हो जाती है। आचार्य समन्तभद्र के द्वारा प्रस्तुत कारिकायें इस प्रकार हैं–

‘‘अद्वैतकान्तपक्षेऽपि दृष्टो भेदो विरुध्यते।

कारकाणां क्रियायाश्च नैकं स्वस्मात् प्रजायते।।
कर्मद्वैतं फलद्वैतं लोकद्वैतञ्च नो भवेत्।
विद्याविद्याद्वयं न स्याद्बन्धमोक्षद्वयं तथा।।
हेतोरद्वैतसिद्धिश्चेद् द्वैतं स्याद्धेतुसाध्ययो:।
हेतुना चेद्विना सिद्धिद्वैतं वाङ्मात्रतो न किम्।।
अद्वैतं न विना द्वैतादहेतुरिव हेतुना।
संज्ञिन: प्रतिषेधो न प्रतिषेध्यादृते क्वचित्।।’’[१९]

एक अद्वैत सत्ता से पृथक् कुछ भी उपलब्ध नहीं है—ऐसे अद्वैतैकान्त पक्ष का निरसन करने के उपरान्त आचार्य समन्तभद्र पृथक्त्वैकान्त का निरसन करने हेतु लिखते हैं—

‘‘पृथक्त्वैकान्तपक्षेऽपि पृथक्त्वादपृथक् तु तौ।

पृथक्त्वे न पृथक्त्वं स्यादनेकस्थो ह्यासौ गुण:।।’’[२०]

इस श्लोक में नैयायिकवैशेषिकों के उस पृथक्त्वाद का खंडन है जिसमें वे गुण को गुणी से, अवयव को अवयवी से, क्रिया को क्रियावान् से, सामान्य को सामान्यवान् से और विशेष को विशेषवान् से पृथक् कहते हैं। यहाँ गुण गणी आदि में सर्वथा पृथक्त्व मानें तो प्रश्न होता है कि गुण और गुणी (द्रव्य) क्या पृथक्त्व गुण से पृथक् हैं या अपृथक? यदि पृथक्त्व गुण द्रव्य आदि से पृथक् मानेंगे तो द्रव्याश्रयाभाव के कारण वह गुण ही नहीं ठहरेगा। गुण तो किसी एक द्रव्य के आश्रय में रहता है तभी वह स्वलक्षण भी बनता है क्या अनेक द्रव्यों में स्थित मानकर भी उसे गुण कहा जाये। तथा द्वितीय पक्ष में पृथक्त्व गुण को द्रव्य आदि से अपृथक् मानें तो पृथक्त्वैकान्त को छोड़ देने से स्वमतविरोध हो गया। गुण गुणी में भेद मानने के कारण नैयायिकों वैशेषिकों के यहाँ पृथक्त्व गुण को पृथक् भूत पदार्थो से अपृथक् गुण पृथक्भूत पदार्थो से पृथक् है तो पृथक्—पृथक् पाये जाने वाले पदार्थ परस्पर के अपृथक् हो जायेंगे। फिर पृथक्त्व गुण भी पृथक्त्व नाम से नहीं जाना जायेगा (पृथक्त्वे न पृथक्त्वं) इस दोष से बचने के लिये पृथक्त्वगुण को सर्व पदार्थो में स्थित होना चाहिये जो आपके यहाँ संभव नहीं है क्योंकि गुण तो अपने गुण तो अपने गुणी में ही रहता है, सबमें नहीं। अत: पृथक्त्वगुण अपने पृथक्त्ववान् गुणी में ही रहे। पृथक्त्व गुण के कारण पदार्थो में पृथक्त्व भी मानना ठीक नहीं है। क्योंकि इससे तो सभी पदार्थ अपने गुणों से सर्वथा हो जायेंगे और यह कथन भी असम्भव हो जायेगा कि ज्ञान आत्मा का गुण है और गन्ध पृथ्वी का गुण है। बौद्ध मानते हैं कि परमाणु अपने सजातीय विजातीय परमाणुओं से पृथक् होते हैं। और सभी पदार्थ निरंश, निरन्वय और क्षणिक होते हैं। उनके इस पृथक्त्वैकान्त का निरसन आचार्य समन्तभद्र इस प्रकार करते हैं—

‘‘सन्तान: समुदायश्च साधम्र्यञ्च निरंकुश:।

प्रेत्यभावश्च तत्सर्वं न स्यादेकत्वनिह्नवे।।’’[२१]

अर्थात् जीवादिक पदार्थो में सर्वथा

पृथक्त्व यानि एकत्वपने का अभाव मानें तो संतान (जायमान पर्यायों में एकता रूप द्रव्य का अन्वय), समुदाय (एक स्कन्ध में अपने अववयों की एकता) और साधम्र्य (जिन पदार्थो के समान धर्म हैं उनके समान परिणामों की एकता) पृथक्त्वैकान्त पक्ष में निरंकुश हो जायेंगे अर्थात् खंडित या असिद्ध हो जायेंगे। तथा जीवदिकों में पायी जाने वाली बाल्य, युवा, जरा आदि अवस्थाएँ और परलोक में प्राप्त भव (प्रेत्यभाव) भी एकत्व का निह्नव करने वाले पृथक्त्वैकान्त में सम्भव नहीं रहेंगे।

पुनश्च, ज्ञान को ज्ञेयवस्तु से सत् स्वरूप की अपेक्षा सर्वथा भिन्न मानें जाने पर तो वह असत् हो जायेगा। ज्ञान को जीवसत् द्रव्य से सर्वथा भिन्न मानेंगे तो सत् के अभाव में वह ज्ञान असत् कहलायेगा। तथा घट पर आदिक बाह्य ज्ञेय की अपेक्षा ज्ञान को सर्वथा भिन्न मानेंगे तो वे बाह्य पदार्थ ज्ञेय ही नहीं कहलायेंगे। इस प्रकार पृथक्त्वैकान्त पक्ष में ज्ञान और ज्ञेय दोनों असत् हो जाते हैं। वही इस श्लोक में कहा है—

‘‘सदात्मना च भिन्नं चेज्ज्ञानं ज्ञेयाद् द्विधाप्यसत् ।

ज्ञानाभावे कथं ज्ञेयं बहिरन्तश्च ते द्विषाम्।।[२२]

बौद्धमत में शब्द सामान्य के ही वाचक हैं

उनमें विशेष का कथन नहीं किया जा सकता है। जब सामान्य का प्रतिपादन शब्द करते हैं तब सामान्य वहाँ पारर्मािथक नहीं है। यथा गोपदार्थो में कोई गोत्व सामान्य नहीं रहता है किन्तु सभी गोपदार्थ अगोपादार्थो से व्यावृत्त हैं—ऐसा बौद्ध मानते हैं। शब्द का वाच्य कोई पदार्थ तब होता है जब उस पदार्थ में संकेत ग्रहण कर लिया गया हो। अमुक शब्द अमुक अर्थ को द्योतित करता है इस प्रकार की बौद्धिक शक्ति विशेष से वक्ता या श्रोता शब्द का अर्थ में वाच्य वाचक सम्बन्ध स्वीकार कर लेते हैं, यही संकेत ग्रहण है। यहाँ शब्द वाचक और पदार्थ वाच्य कहे जाते हैं। विशेष अनन्त हैं। उन अनन्त विशेषों में संकेत संभव नहीं हो सकते हैं। इसलिये विशेष शब्द के वाच्य नहीं है। तथा संकेत काल में ज्ञात या विद्यमान विशेष क्षणिक होने से अर्थ प्रतिपत्ति के काल में नहीं रहते हैं। स्वलक्षण विशेष का जैसा स्पष्ट ज्ञान प्रत्यक्ष से होता है वैसा शब्द से सम्भव नहीं है तथा शब्दज्ञान में स्वलक्षण रूप विशेष की सन्निधि भी अपेक्षित नहीं होती है। स्वलक्षण के बिना ही शब्द ज्ञान उत्पन्न हो जाता है। अतएव कोई विशेष शब्द का वाच्य नहीं है केवल सामान्य ही शब्द का वाच्य होता है। समन्तभद्र कहते हैं कि बौद्धों का यह कथन समीचीन नहीं हो सकता है क्योंकि अपारर्मािथक सामान्य तो अवस्तुभूत ही है बौद्धमत में। यदि शब्द का वाच्य सामान्य है विशेष नहीं तो शब्द का वाच्य अवस्तुभूत कहलायेगा फिर वहाँ शब्दोच्चारण और संकेत ग्रहण की आवश्यकता कहाँ रही यदि मानेंगे तो अवस्तु का ज्ञान असमीचीन या अप्रमाणिक होगा। इस प्रकार शब्द मिथ्या हो जायेंगे। कहा भी है—

‘‘सामान्यार्था गिरोऽन्येषां विशेषो नाभिलप्यते।

सामान्याभावतस्तेषां मृषैव सकला गिर:।।’’[२३]

अद्वैतैकान्तवाद (सर्वथा अभेदैकान्त),

पृथक्त्वैकान्तवाद (सर्वथा भेदैकान्त) दोनों को जो निरपेक्ष सत्ता के रूप में स्वीकार करते हैं, उनके यहाँ अर्थात् उभयैकान्तवादियों के मत में परस्पर विरोध होने से उभयैकात्मकता नहीं मानी जा सकती है तथा उपर्युक्त तीनों के यहाँ वस्तु सिद्ध न होने पर कोई यह कहे कि वस्तु तो अवाच्य है। किन्तु इस प्रकार अवाच्य होने से सर्वथा अवाच्यतैकान्त भी ठीक नहीं है क्योंकि ‘न अवाच्यम्’ उस उक्ति से वस्तु वाच्य हो जाती है। जैसा कि कहा गया है—

विरोधान्नोभयैकात्म्यं स्याद्वादन्यायविद्विषाम्।

अवाच्यतैकान्तेऽप्युक्तिर्नावाच्यमिति युच्यते।।[२४]

इसके बाद समन्तभद्र कहते हैं कि यदि निरपेक्ष रूप से अद्वैतत्व (एकत्व) और पृथक्त्व मानने पर दोनों ही अवस्तु हो जाते हैं क्योंकि एकत्वनिरपेक्ष होने से पृथक्त्व अवस्तु है तथा पृथकक्त्व निरपेक्ष होने से एकत्व अवस्तु है। इसलिये प्रत्यक्ष से पदार्थ जैसे प्रतीत होता है उसको वैसा ही अर्थात् कथञ्चित् अभेद (अद्वैत—एकत्व) रूप तथा कथञ्चित् भेद (पृथक्त्व) रूप मानना चाहिये। उसी प्रकार जैसे हेतु एक होकर भी अपने भेदों से अनेकरूप होता है। यही कहा गया है—

‘अनपेक्षे पृथक्त्वैक्ये ह्यवस्तु द्वयहेतुत:।

तदेवैक्यं पृथक्त्वञ्च स्वभेदै: साधनं यथा।।’[२५]

जिस वस्तु में परस्पर सापेक्ष ने

एकत्व पृथक्त्व धर्म पाये जाते हैं वही वस्तु अर्थक्रिया कर सकती है। अत: सभी पदार्थ सत्ता सामान्य की अपेक्षा से एकरूप हैं अर्थात् उनमें एकपने की प्रतीति होती है और भेद की अपेक्षा से अनेक रूप है अर्थात् उनमें अनेकपने की प्रतीति होती है जैसे हेतु भेद की विवक्षा में अनेक रूप और अभेद की विवक्षा में एकरूप होता है। यथा—

‘सत्सामान्यात्तु सर्वैक्यं पृथग्द्रव्यादिभेदत:।

भेदाभेदविवक्षायामसाधारणहेतुवत्।।’[२६]

यहाँ अगर कोई यह कहे कि एक वस्तु एकत्व और पृथक्त्व यानि अभेद और भेद की विवक्षा से सिद्ध होती है किन्तु विवक्ष अविवक्षा वस्तुगत विषय नहीं है वक्ता की इच्छा मात्र हैं इससे तो वस्तु के धर्म का निर्णय होता नहीं है क्योंकि इच्छा तो असत् हो सकता है। इसका उत्तर समन्तभद्र इस प्रकार देते हैं—

‘विवक्ष चाविवक्षा च विशेष्येऽनन्तर्धिमणि।

सतो विशेषणस्यात्र नासतस्तैस्र्तिथभि:।।[२७]

अर्थात् अनन्तधर्म विशिष्ट विशेष्य धर्मो में जो विवक्षा अविवक्षा होती है वह विद्यमान (सत्) विशेषण की होती है। अविद्यमान (असत्) की नहीं। वस्तु में अद्वैतत्व (एकत्व) या पृथक्त्व को जानकर कहने की इच्छा करने वाले लोग अद्वैतत्व है या नहीं, पृथक्त्व है या नहीं ऐसी विवक्षा करते हैं अथवा वस्तु के होने पर उसे जानकर भी उसे कहने की इच्छा नहीं करते, यह अविवक्षा हैं अन्त में आचार्य स्पष्ट कर देते हैं कि प्रत्येक वस्तु अद्वैत (अभेद—एकत्व) तथा पृथक्त्व (भेद—अनेकत्व) प्रमाणभूत–वास्तवकि प्रमेय हैं काल्पनिक—औपचारिक (अपरमार्थभूत) नहीं है। गौण और मुख्य की विवक्षा में वे दोनों एक वस्तु में सिद्ध हैं, यह प्रतीति करा देते हैं। कारिका इस प्रकार है—

‘प्रमाणगोचरौ सन्तौ भेदाभेदौ न संवृती।

तावेकत्राविरुद्धौ ते गुणमुख्यविवक्षया।।’[२८]

तृतीय परिच्छेद :

यहाँ नित्यत्वैकान्त, क्षणिकत्वैकान्त, निरपेक्ष तदुभयैकान्त और अवाच्यतैकान्त की समीक्षा प्रस्तुत हुई है। नित्यत्वैकान्तवाद का प्रस्थापक सांख्य प्रस्थान को माना जा सकता है क्योंकि सांख्य सिद्धान्त में सभी पदार्थ कूटस्थ नित्य मान लिये गये हैं। जो सदा एकरूप ही रहे वह वूâटस्थ नित्य कहलाता है। सांख्य मत में प्रकृति और पुरुष ये दो मूल तत्त्व हैं जो परिणाम को प्राप्त होते हैं। किन्तु पर्याय की अपेक्षा भी वहाँ किसी भी पदार्थ की उत्पत्ति और विनाश नहीं होता है केवल परिणामों का आविर्भाव (प्रकटन) और तिरोभाव होता है। सांख्य के अनुसार सभी कार्य अपने कारणों में छिपे रहते हैं यह तिरोभाव है तथा उचित कारण सामग्री के मिलने पर प्रकट हो जाते हैं यह आविर्भाव है। आविर्भाव तिरोभाव में मूल तत्त्व प्रकृति या पुरुष सदा ही ज्यों के त्यों बने रहते हैं। यही नित्यत्वैकान्त है। आचार्य समन्तभद्र ने इसकी समीक्षा करते हुये कहा है कि पदार्थ को सर्वथा नित्य मानने पर क्रिया की उत्पत्ति नहीं हो सकती है। क्योंकि सर्वथा नित्य पदार्थ कार्योत्पत्ति से पहले और कार्योत्पत्ति के समय कारक नहीं हो सकता। कारकाभाव में पदार्थ प्रमाता नहीं हो सकता तथा प्रमातृत्व के अभाव में प्रमिति (प्रमाण का फल) का होना भी असंभव है। अतएव सर्वथा नित्यत्वपक्ष में प्रमाण कहाँ और प्रमाण का फल कहाँ माना जाये। कारिका में भी द्रष्टव्य है—

‘नित्यत्वैकान्तपक्षेऽपि विक्रिया नोपपद्यते।

प्रागेव कारकाभाव: क्व प्रमाणं क्व तत्फलम्।’[२९]

पुनश्च, व्यक्त प्रकृति से महदायिक की अभिव्यक्ति होती है।

यह अभिव्यक्ति प्रमाण द्वारा होती है तो प्रमिति कहलाती है तथा कारकों से होती है तो उत्पत्ति कहलाती है। प्रमाण और कारकों से नित्यत्वैकान्त पक्ष में विक्रिया नहीं हो सकती है क्योंकि प्रमाण और कारकों के द्वारा महदादि की प्रमिति और उत्पत्ति रूप अभिव्यक्ति भी नित्य हो जायेगी जो सांख्य सिद्धान्त में सम्भव नहीं है। यदि यहाँ प्रमाण, कारक, महदादि सभी को सर्वथा नित्य मान लें तो उनमें व्यंग्य व्यंजक भाव कैसे संभव होगा ? नहीं होगा। यह मानना ठीक नहीं है कि प्रधान कारक है और महदादि उसके कार्य हैं। कार्य सत् और असत् दोनों हो सकते हैं। यदि सत्कार्यवाद मानेंगे अर्थात् कार्य को सर्वथा सत् कहेंगे तो सर्वथा सत् होने से पुरुष के समान उसकी उत्पत्ति भी नहीं हो सकती है। जो सर्वथा सत् है वह कार्य नहीं हो सकता है यथा चैतन्य। सांख्य चैतन्य को कार्य नहीं मानते हैं क्योंकि इसलिये ही उन्हें चैतन्य स्वरूपी पुरुष को भी कार्य करना होगा। जो सर्वथा सत् होता है किसी भी प्रकार से असत् नहीं है उसमें कार्यत्व असंभव है तथा जो सर्वथा असत् है वह भी कार्य नहीं हो सकता। आकाश कुसमु किसी के भी कार्य नहीं होते हैं। सांख्य कार्य को सर्वथा असत् न मानकर सत् मानते हैं और उसकी उत्पत्ति न मानकर परिणाम की कल्पना करते हैं यह परिणाम प्रक्लुप्ति नित्यत्वैकान्तवाद की बाधिका हो जाती है। आचार्य समन्तभद्र के अनुसार सांख्यों के सर्वथा नित्यत्वपक्ष में पुण्यपाप क्रिया, उसका फल, प्रेत्यभाव और बन्धमोक्ष कुछ भी सिद्ध नहीं होते हैं।[३०]

बौद्ध दार्शनिक क्षणिवैâकान्त को सत्य समझते हैं उसकी समीक्षा करते हुये समन्तभद्र का मन्तव्य है कि क्षणिवैकान्त पक्ष में प्रेत्यभाव, बन्ध, मोक्ष आदि को मानना असंभव है क्योंकि नित्य आत्मा के अभाव में प्राणियों में प्रत्यभिज्ञान आदि का होना सम्भव नहीं है। जिसके अभाव में पुण्य पाप आदि कार्यो का आरम्भ करना नहीं होता और पुण्य पाप आदि के अभाव में प्रेत्यभाव आदि फल कैसे होंगे ? सर्वथा क्षणिवैकान्त में उनका होना सम्भव ही नहीं है।[३१] वस्तु को सर्वथा क्षणिक मानने पर उसमें सत् रूप कार्य की उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती है। वह तो असत् रहकर ही उत्पन्न होता रहता है, यह मानना भी ठीक नहीं है क्योंकि सर्वथा असत् कार्य आकाश कुसुम की तरह उत्पन्न नहीं हो सकता है। ऐसा न मानने पर उपादान कारण के होने पर कार्य की उत्पत्ति होती है, यह नियम भी क्षणिकवाद में नहीं रहेगा फिर कैसे कार्यो के होने का विश्वास किया जाये।।[३२]

क्षणिकवाद में अन्वय का सर्वथा अभाव होने से हेतुफलभाव, वास्यवासकभाव, कर्मफलभाव, प्रवृत्ति निवृत्ति आदि के भाव नहीं बनेंगे। प्रत्येक क्षणवर्ती कार्य का परस्पर में अन्वय न होने कार्यकारणपना भी नहीं माना जा सकता है। प्रत्येक कार्य सन्तति भिन्न—भिन्न ही है। इसलिये सन्तानान्तरों के समान वर्तमान क्षणवर्ती एक सन्तान सन्तानवान् के साथ अन्वय न होने से सन्तान सत्यार्थ नहीं कही जा सकती है। सत्यार्थ सन्तान के होने पर ही हेतु फल आदि का व्यवहार संभव है जो क्षणिकवाद में असंभव है। भिन्न—भिन्न क्षणों में अनन्य शब्द का व्यवहार सन्तान है या पृथक्—पृथक् क्षणों को एक मानना सन्तान है तो यह सन्तान कल्पना तो संवृति मात्र है, उपचार कथन है, वास्तविक नहीं होने से उसे मुख्य नहीं कर सकते हैं। मुख्यार्थ के अभाव में सञ्जात संवृति मिथ्या क्यों न कही जाये।

सन्तान और सन्तानवान् में एकत्व या अन्यत्व अवाच्य है क्योंकि उनके (१) सत् रूप है (२) असत् रूप, (३) सदसत् उभय रूप है और (४) सत् असत् दोनों रूप नहीं है, इन चार विकल्पों का अयोग है। इसका उत्तर देते हुये आचार्य ने कहा है कि यदि सन्तान सन्तानवान् चार कोटियों से अवक्तव्य हैं तो यह विकल्प भी उनके नहीं मानना चाहिये। जिससे सर्वविकल्पों से रहित सन्तान या सन्तानवान् अवस्तु ही ठहरेंगे, क्योंकि सभी धर्मों से रहित एवं विशेष्य विशेषण से रहित जो होता है वह अवस्तु ही तो होता है।४१ तथा जो वस्तु विशेष्य विशेषण से रहित होती है उसका प्रतिषेध करना भी नहीं बनता है। अत: अवस्तु का प्रतिषेध भी सम्भव नहीं है। यह पुष्ट करते हुये कहा गया है कि सत्तात्मक संज्ञी पदार्थ का प्रतिषेध द्रव्य क्षेत्र काल और भाव की मर्यादा में द्रव्यान्तर क्षेत्रान्तर कालान्तर और भावान्तर की अपेक्षा ही किया जा सकता है। जो सर्वथा असत् है वह विधि निषेध का स्थान नहीं हो सकता है।[३३]

इस प्रकार बौद्धाभिमत क्षणिक तत्त्व सभी

धर्मो से परिर्विजत होने से अवस्तु हैं। अवस्तु होने से अनभिलाप्य है। अनेकान्त वादियों के यहाँ वस्तु ही द्रव्य क्षेत्रकाल भावरूप प्रक्रिया के विपर्यय से अवस्तु कहलाती है। अपने धर्मो से परिर्विजत कोई वस्तु कभी होती ही नहीं है। क्षणिवैकान्त पक्ष में परमाणुओं की सिद्धि संभव नहीं है। बौद्ध लोग पाँच प्रकार के स्कन्ध मानते हैं। यथा (१) रूपस्कन्ध

(२) वेदना स्कन्ध

(३) विज्ञान स्कन्ध

(४) संज्ञा स्कन्ध और

(५) संस्कार स्कन्ध। इन स्कन्धों की सन्तति चलती रहती है। इनकी संतान संवृत्तिरूप होने से अपरमार्थभूत है। परमार्थभूत तो स्वलक्षण होता है। पदार्थ का स्वलक्षण तो स्थिति उत्पत्ति और व्यय है, जो अपरमार्थभूत स्कन्धों में सम्भव नहीं है। सर्वथा नित्यत्वैकान्त और क्षणिवैकान्त में दोष देखकर निरपेक्ष नित्यत्व और क्षणिकत्व का वस्तु में विरोध है। इस दोष से बचने के लिये यदि वस्तु को अवाच्य मानेंगे तो यह उक्ति भी ठीक नहीं है क्योंकि ‘न वाच्यम्’ इस कथन से उसके वाच्य होने का प्रसंग आ जाता है। सर्वथा नित्यत्व, क्षणिकत्व, तदुभयत्व और अवाच्यत्व आदि एकान्तों में वस्तु की सिद्धि नहीं होती है किन्तु कथञ्चित् नित्यत्व और कथञ्चित् क्षणिकत्व की प्रसिद्धि वस्तु में होती है यह बताने के लिये निम्न कारिका प्रस्तुत हुई है—

‘‘नित्यं तत्प्रत्यभिज्ञानान्नाकस्मात्तदविच्छिदा।

क्षणिकंकालभेदात्ते बुद्धयसंचरदोषत्:।।’’

वस्तु प्रत्यभिज्ञान का विषय बनती है यह आकस्मिक अर्थात् अकारण नहीं है। ‘यह वही वस्तु है’, इस प्रत्यभिज्ञान में पूर्वदृष्ट वस्तु का अविच्छेदपने ज्ञान होता है जिससे उस वस्तु को क्षणमात्र अवस्थायी ही नहीं माना जा सकता है। अतएव उसका नित्यपना है। तथा कालभेद से वस्तु अपने अपने क्षणों में तत्तद्वर्ती अवस्थाओं वाला ही होता है। वे अवस्थायें क्षणिक होती है इसलिये वस्तु क्षणिक भी है।

कोई भी वस्तु अपने सामान्य स्वरूप से न उत्पन्न होती है और न ही व्यय को प्राप्त होती है। उत्पाद विनाश शील पर्यायों में सामान्य धर्म का अन्वय पाया ही जाता है। अत: सामान्य स्वरूप की अपेक्षा वस्तु नित्य ध्रुव शाश्वत या अनादि अनन्त है। तथा विशेष पर्याय धर्म की अपेक्षा वस्तु में प्रतिक्षण उत्पाद विनाश देखा जाता है। वर्तमान पर्याय का व्यय होता है तो उसकी जगह अन्य पर्याय का उत्पाद हो जाता है यह क्रम सदा चलता रहता है। पर्याय विशेष द्रव्यसामान्य के बिना नहीं पाया जाता है तथा द्रव्य सामान्य भी कभी भी पर्यायविशेष के बिना नहीं रहता है। दोनों ही सामान्य विशेष धर्मो में परस्पर तादात्म्य सम्बन्ध है। अत: उत्पाद व्यय और स्थिति की त्रयात्मकता प्रत्येक वस्तु में सदैव होती है—ाqजससे वह सत् कहलाती है। कहा भी गया है—

‘‘न सामन्यात्मनोदेति न व्येति व्यक्तमन्वयात्।

व्येत्युदेति विशेषात्ते सहैकत्रोदयादि सत्।।’’

प्रत्येक वस्तु में पाये जाने वाले उत्पाद व्यय और ध्रौव्य कथञ्चित् भिन्न हैं और कथञ्चित् अभिन्न हैं, यह समझाने के लिये आचार्य समन्तभद स्वामी लिखते हैं—

कार्योत्पाद: क्षयो हेर्तोिनयमाल्लक्षणात्पृथक्।

न तौ जात्याद्यवस्थानादनपेक्षा ख पुष्पवत्।।

किसी भी कार्य के प्रति नियामक हेतु उपादान कारण होता है जो द्विविध है—त्रैकालिक (शाश्वत) और क्षणिक। द्रव्य के प्रत्येक गुण में प्रतिक्षण परिणमनधर्मा पर्याय होती है। प्रत्येक पर्याय का त्रिकाली उपादान उसका गुण होता है तथा पर्यायें स्वयं क्षणिक उपादान कहलाती हैं। क्षणिक उपादान पूर्वक्षणर्वित पर्याय, तत्क्षणर्वितपर्याय और उत्तरक्षणर्वितपर्याय के भेद से त्रिविध होता है किसी भी कार्य के होने में त्रिकाली उपादान अन्वय रूप से रहता है तो क्षणिक उपादान व्यय, उत्पाद और स्थिति रूप होता है। कार्य के होने में यह क्षणिक उपादान ही नियामक हेतु है। इस क्षणिक उपादान रूप हेतु के कारण ही वर्तमान क्षण में स्थित पर्याय की स्थिति होती है तथा पूर्णक्षणर्वित पर्याय का व्यय एवं उत्तर क्षणिर्वित पर्याय का उत्पाद देखा जाता है। यह प्रक्रिया सतत चलती रहती है जिससे हर क्षण उत्पाद व्यय और स्थिति का बना रहना संभव हो जाता है। अपने–अपने लक्षणों के कारण उत्पाद—व्यय पृथक््â आकलित होते हैं किन्तु जाति के अवस्थान से ये भिन्न नहीं है। इस प्रकार द्रव्य में इनकी कथञ्चित् भिन्नता और अभिन्नता निश्चित हो जाती है। निरपेक्षत: उत्पाद व्यय और स्थिति आकाशकुसुम के समान अवस्तु होते हैं तथा द्रव्य में सान्वित होने के कारण सम्यक् हैं। प्रत्येक वस्तु उत्पाद व्यय और ध्रौव्य स्वरूप वाली है यह समझाने के लिये स्तोत्रकार समन्तभद्र ने दो श्लोक उदाहरणार्थ प्रस्तुत किये हैं—

‘‘घटमौलिसुवर्णार्थी नाशोत्पादस्थितिष्वयम्।

शोक प्रमोदमाध्यस्थं जनो याति सहेतुकम्।।
पयोव्रतो न दध्यति न पयोत्ति दधिव्रत:।
अगोरसव्रतो नोभे तस्मात्तत्वं त्रयात्मकम्।।’

चतुर्थ परिच्छेद :

इस परिच्छेद में न्यायवैशेषिक दर्शन की उस मान्यता की समीक्षा हुई है जिसमें उन्होंने अवयव—अवयवी, गुण—गुणी, कार्य—कारण, सामान्य—सामान्यवान्, विशेष—विशेषवान् आदि में पृथक्त्व को स्वीकार किया है और उनके योजक पदार्थ समवाय की निरूपणा की है। आचार्य समन्तभद्र उनके पक्ष का उपस्थापन इस कारिका से करते हैं—

‘कार्यकारणानानात्वं गुणगुण्यन्यताऽपि च।

सामान्यतद्वदन्यत्वं चैकान्तेन यदीष्यते।।’

यदि नैयायिक वैशेषिकों द्वारा कार्य कारणों में नानात्व को, गुण—गुणी में अन्यता को और सामान्य—सामान्यवान् में अन्यत्व को सर्वथा एकान्त के रूप में स्वीकार किया जाता है तो वह विचारणीय माना जाना चाहिये। उन्होंने लिखा कि यह विचार कथञ्चित् एकान्त के रूप में आर्हतमत में तो स्वीकृत हो सकता है किन्तु नैयायिक वैशेषिक मत में यह संभव नहीं है। आर्हतमत में अवयव—अवयवी, गुण—गुणी आदि में तादाम्य सम्बन्ध है किन्तु नैयायिक वैशेषिक मत में उन्हें पृथक्—पृथक्मा नकर समवाय से उनका परस्पर आश्रयाश्रयी भाव बताया गया है। समन्तभद्र इसे ध्यान में रखकर लिखते हैं—

‘एकस्यानेकवृत्तिर्न भागाभावाद्वहूनि वा।

भागित्वाद्वास्य नैकत्वं दोषो वृत्तेरनार्हते।।’

अर्थात् एक अवयवी की अनेक अवयवों में,

एक गुण की अनेक गुणी पदार्थो (द्रव्यों) में, एक सामान्य की अनेक सामान्यवान् पदार्थो में वृत्ति नहीं हो सकती है क्योंकि एक अवयवी के भागों (खण्डों या अंशों) का अभाव है। यदि एक के अनेक भाग मानेंगे तो भागवाला होने से उस अवयवी के एकपना नहीं रहेगा। इस वृत्ति विकल्प के कारण अनेक दोषों को उद्भूति हो जायेगी। एक समवाय अनेक समवायियों में या भागों में बंटकर नहीं रहता है उसके भागों या अंशों का अभाव होने से अनेक में उसकी वृत्ति कैसे संभव होगी। सर्वव्यापक मानने पर किसी गुण की किसी गुणी में ही वृत्ति क्यों होती है। समवाय तो एक ही है, वह अनेकों में गुणों और गुणी पदार्थों का योजक कैसे हो सकता है ? यह विचारणीय है।

अवयव—अवयवी, गुण—गुणी आदि में पृथक्त्व (भेद) मानने पर उनमें देशभेद और कालभेद भी मानना पड़ेगा जिससे अवयव या गुण अन्यदेश में रहेंगे और अवयवी या गुणी अन्य देश में। ऐसे ही काल भेद को भी समझना होगा। जैसे दही और कुण्ड युतसिद्ध पदार्थ हैं और उनका देश काल भी भिन्न—भिन्न होता है वैसे ही अवयव अवयवी आदि में क्यों न माना जाये। जैसे मूत्र्त कारण कार्य में समान देशता नहीं होती है वैसे ही गुण—गुणी एवं अवयव अवयवी आदि के मूर्त होने से एक देश में उनकी वृत्ति नहीं बन सकती है। यही कहा गया है इस कारिका में—

‘देशकालविशेषेऽपि स्याद् वृत्तिर्युतसिद्धवत्।

समानदेशता न स्यात् मूर्तकारणकार्ययो:।।५२

टिप्पणी

  1. सर्वन्तवत्तदुणमुख्यकल्पं सर्वान्तशून्यं च मिघोऽनपैक्षम्। सर्वापदामन्तकरं निरन्तं सर्वोदयं तीर्थमिदं तवैव।। (युक्त्यनुशासनम्—६१)
  2. तीर्थंकर महावीर और उनकी आचार्य परम्परा भाग २ पृष्ठ १८३ (अखिल भारतीय दिग. जैन विद्वत्परिषद्)।
  3. समन्तभद्रो भद्राथें भातु भारतभूषण: (पाण्डवपुराण) आप्तमीमांसा की तत्वदीपिका प्रस्तावना पृष्ठ २६ (श्री गणेशवर्णी दिग. संस्थान १९७४) से उद्धृत।
  4. तीर्थ महावीर और उनकी आचार्य परम्परा भाग—२, पृष्ठ १८४।
  5. इत्याप्तमीमांसलड्कृतौर प्रथमपरिच्छेद:। —अष्टसहस्री पृष्ठ १३३।
  6. आप्तमीमांसा की तत्त्वदीपिका पृष्ठ ३६ से उद्धृत।
  7. अष्टसहस्री पृष्ठ १३४
  8. सर्वार्थसिद्धि टीका पृष्ठ १
  9. देवागमनभोयान चामरादिविभूतय: मायाविष्वपि दृश्यन्ते नातस्त्वमपि नो महान्। अध्यात्मं बहिरयेष विग्रहादि महोदय दिव्यसत्य: दिवौकस्सयास्ति रागदिमव्सु स:।।
  10. आप्तमीमांसा श्लोक ३ ११. आत्तमीमांसा, श्लोक ४
  11. अष्टसहस्री में उद्धृत पृ. ३ १३. आत्ममीमांसा ५६ १४. तदेव ७ १५. तदेव ८
  12. तदेव १४—१६
  13. तदेव १७—१८
  14. तेदव १९
  15. तदेव २०
  16. तदेव २१
  17. तदेव २२
  18. तदेव २३
  19. तदेव २४-२७
  20. तदेव २८
  21. तदेव २९
  22. तदेव ३०
  23. तदेव ३१
  24. तदेव ३२
  25. तदेव ३३
  26. तदेव ३४
  27. तदेव ३५
  28. तदेव ३६
  29. तदेव ३७
  30. तदेव ३८-४०
  31. तदेव ४१
  32. तदेव ४२
  33. तदेव ४३


प्रो. श्रीयांश कुमार सिघई, जयपुर राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, त्रिवेणी नगर, मानसरोवर, जयपुर (राजस्थान)

अनेकान्त अप्रैल—जून २०१४