ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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आजादी के पचास वर्ष और भारतीय पशुधन

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आजादी के पचास वर्ष और भारतीय पशुधन

(गोरक्षा एवं माँस निर्यात के विशेष सन्दर्भ में)

यथां सर्वमिदम् व्याप्तम जगत् स्थावर जंगमम् ।

ताम् धेनु: शिरसा वन्दे भूतभव्यस्य मातरम् ।।—महाभारत

अर्थात् सम्पूर्ण चल—अचल जगत को जिसने धारण किया है, जो भूत और भविष्य की जननी है, उस गौमामा को मैं नमन करता हूँ ।

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प्रस्तावना—

भारत में पशुधन के प्रति दयाभाव, गोवंश के प्रति श्रद्धाभाव तथा गौमाता के प्रति पूज्यभाव सदा से ही रहा है और आज भी विद्यमान है। शास्त्रों में पशुपालन, पशुरक्षा, गौरक्षा के प्रति उदात्त विचार भरे पडे हैं । जैन बोद्ध हिन्दू, इसाई, इस्लाम आदि सभी धर्मों ने जीव दया एवं अहिंसा को ऊँचा स्थान देकर गोवंश को महत्वपूर्ण माना है। ऐसे धर्मप्राण देश भारत में आज पशुधन, गोवंश एवं गाय की क्या दशा है ? यह किसी से छिपी नहीं। दुनिया के अन्य देशों की तुलना में हमारे पशु बीमार, दुर्बल एवं कम दूध देने वाले हैं । पशुओं की नस्ल सुधारने और गोवंश संवर्धन करने के बजाय बूचड़खाने खोलने एवं उनके अंगों का व्यापार (निर्यात) करके विदेशी मुद्रा अर्जन करने में हम अधिक पुरुषार्थ प्रदर्शित करने लगे हैं। आजादी के बाद पशुधन एवं गोवंश का पालन कम विनाश ज्यादा तेजी से हुआ है। स्वतंत्रता के बाद भारत दुनिया के सबसे बड़े माँस निर्यात करने वाले कसाई देश के रूप में उभर रहा है । यही कारण है कि आज देश में दूध और दूध निर्मित पदार्थों का अभाव होता जा रहा है । जनता कुपोषण की शिकार होकर दीन, दुर्बल, विपन्न और गरीबी की रेखा के नीचे बनी हुई है। सरकार द्वारा अन्य तरह से गरीबी कुपोषण और बीमारी दूर करने के सारे प्रयास किये जाने पर भी समस्या हल नहीं हो पा रही है, बल्कि दिनोदिन बढ़ती ही जा रही है। संभवत: इसका कारण गोवंश (कामधेनु) की उपेक्षा और विनाश करना ही है।

गोवंश रक्षा के लिये आभरण अनशन करने वाले संत बिनोबा भावे के अनुसार ‘‘ हिन्दुस्तानी सभ्यता का नाम ही गोसेवा है, लेकिन आज हिन्दुस्तान में गायों की हालत उन देशों से भी खराब है जिन्होंने कभी गोसेवा का नाम नहीं लिया था।’’ पूज्य महात्मा गांधी ने भी इस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि ‘‘गौ सेवा के विषय में मैंने खूब अध्ययन किया है। जितनी गौशालाएँ मैंने देखी है, उतनी शायद ही किसी ने देखी हों । हिन्दू लोग गोरक्षा की बातें करते हैं, परन्तु गोसेवा की उतनी ही उपेक्षा करते हैं। दुनियां में कोई ऐसा देश नहीं देखा जहाँ गाय के वंश की हिन्दुस्तान जैसी लावारिस हालत हो।’’ '

पशुधन एवं गोवंश के प्रति उच्च दृष्टिकोण किन्तु हीनदशा की इस विचित्र विड़म्बना को देखकर विचार आता है कि आखिर ऐसी विरोधाभासी स्थिति क्यों उत्पनन हुई ? कबीरदासजी की उलटवासियों की तरह यह स्थिति ठीक वैसी ही है जैसे कि यह कहना कि ‘‘ भारत एक अमीर देश है किन्तु यहाँ गरीब बसते है’’ इस विचित्र पहेली का उत्तर खोजना और समाधान करना आज की एक महती आवश्यकता बन गई है। पशुधन का भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्व— भारतीय अर्थ व्यवस्था में पशुधन का महत्व अवर्णनीय है। अर्थव्यवस्था के विभिन्न अंगों में पशुधन और गोवंश के अनन्त उपकार है जिन्हें संक्षेप में हम निम्न शीर्षको में देख सकते हैं—

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कृषि—

भारतीय अर्थ व्यवस्था का आधार कृषि है और कृषि का आधार हमारा पशुधन है। प्राचीन समय से ही पशुधन के सहयोग से भारतीय कृषि बिना पूंजी वाला धंधा रही है। मात्र कुछ लगान, कुछ शारीरिक श्रम और शेष पशुधन के योगदान से कृषि सम्पन्न हो जाती रही, परन्तु अब महंगे इनपुट से खेती होने का परावलम्बी प्रचलन प्रारम्भ हुआ है जो देश के लिये हितकर नहीं है । पशुओं के गोबर और मूत्र के रूप में सर्वश्रेष्ठ खाद, निरापद बीज तथा बिना पेट्रोल के शक्तिसाधन के रूप में पशु, सिंचाई, हलचालन, पौधों से फसल को अलग करने, फसल की ढुलाई, परिवहन आदि करते रहे हैं और आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं।

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२. बैल बनाम ट्रेक्टर—

वर्तमान में भारत ट्रेक्टर द्वारा खेती १०ज्ञ् और बैलों द्वारा ९०ज्ञ् होती है। इस तरह वर्तमान में देश में कृषि कार्य में ८ करोड़ बैल प्रयुक्त हैं । यदि ये नहीं होगें तो हमें इनके बदले २ करोड़ ट्रेक्टर्स की आवश्यकता होगी जिनकी लागत करीब ४०० हजार करोड़ रूपये होगी। इन ट्रेक्टर्स को चलाने के लिये ६४ हजार करोड़ रुपयों का डीजल प्रतिवर्ष क्रय करना पड़ेगा। पेट्रोल के लिये विदेशी निर्भरता एवं विदेशी मुद्रा की परावलम्बनता का मूल्य भी चुकाना होगा।

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३. गोबर खाद—

भारत में नेडप पद्धति के अनुसार एक पशु के वार्षिक गोबर में बनाई गई खाद का मूल्य ३० हजार रूपये से अधिक का होता है । जबकि पशु के चारा, दाना पानी पर मात्र ६ हजार रूपये खर्च होते हैं । पशु की यह खाद गुणवत्ता और चिरकालिक असर की दृष्टि से रासायनिक खाद की तुलना में कई गुणा अधिक होती है।

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४. पशु ऊर्जा—

पशु गोबर के कण्ड़ों से बड़ी मात्रा में घरेलू एवं अन्य ऊर्जा की पूर्ति होती है। इनके अभाव में हम इस दिशा में घोर संकट में फस सकते हैं। ‘सामना’ समाचार पत्र में श्रीमती मेनका गांधी के एक लेख के अनुसार वर्ष १९८८ में भारत में २६४ मिलियन घनमीटर लकड़ी काटी गई जिसमें से २५० मिलियन घनमीटर लकड़ी सिर्पâ जलाने में प्रयोग की गई। यदि गोबर के कण्डे न होते तो र्इंधन हेतु प्रतिवर्ष ६.४० करोड़ टन लकड़ी की आवश्यकता होती जिसका परिणाम वनों की अन्धाधुंध कटाई, अनियमित वर्षा, भीषण गर्मी, प्राकृतिक असुंतलन और अन्तत: सर्वनाश होता। वर्तमान में गोबरगैस संयंत्रों द्वारा गाँव की विद्युत आपूर्ति एवं रसोई गैस की आपूर्ति भी हो रही है। पशुओं से देश को लगभग ४०,००० मेगावाट ऊर्जा भिन्न—भिन्न प्रकार से प्राप्त हो रही है। इसका वार्षिक मूल्य लगभग २७ हजार करोड़ रूपये है। इसकी तुलना में भारत भर के सभी बिजलीघरों की विद्युत उत्पादन क्षमता मात्र ५५ज्ञ् (२२,००० मेगावाट) ही है। कृषि कार्यों हेतु यदि पशु ऊर्जा के स्थान पर विद्युत ऊर्जा का उपयोग करें तो इस हेतु २५४० अरब डालर का पूंजी निवेश करना होगा जो भारत के लिये कठिन ही नहीं सर्वथा असम्भव भी है। ऐसे असम्भव विनियोग वाले प्रोजेक्ट की पूर्ति पशुओं के निष्कृष्ट अवशेष से हो रही है। इससे अधिक भारतीय पशुओं की प्रशंसा और क्या हो सकती है। (स्रोत—अन्तर्राष्ट्रीय ऊर्जा सम्मेलन नैरोबी में श्रीमती इन्दरा गांधी के वक्तव्य से)

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५. परिवहन—

देश के कृषि तथा उद्योगों के लगभग १००० मिलियन टन उत्पादन को खेतों से फैक्ट्रियों तथा फैक्ट्रियों से उपभोक्ता केन्द्रों तक ले जाना होता है । रेल्वे की ३.५८ लाख वेगनों के माध्यम से १८० मिलियन टन और २.२० लाख ट्रकों के द्वारा १२० मिलियन टन माल की ढुलाई होती है। इस तरह इन दो प्रमुख मध्यमों से ३०० मिलियन टन माल (कुल माल परिवहन का मात्र ३०ज्ञ्) की ही ढुलाई होती है। शेष ७०ज्ञ् अर्थात् ७०० मिलियन टन माल की ढुलाई १.२१ मिलियन बैलगाडियों से होती है। इस तरह पशुओं का परिवहन योगदान रेल और ट्रकों से कहीं अधिक है।

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६. आहारपूर्ति—

महर्षि दयानन्द ने अपनी पुस्तक ‘‘गौ करुणा निधि’’ में तर्वकपूर्ण विश्लेषण द्वारा गोवंश का आर्थिक महत्व प्रतिपादित किया था। उन्होंने हिसाब लगाकर यह सिद्ध किया था कि एक गाय और उसके वंश के दूध और उत्पादित अन्न से ४,१०,४४० मनुष्यों को एक बार का भोजन मिल सकता है जबकि उसके मारने पर उसके माँस से केवल ८० मनुष्य ही एक बार पेट भर सकते हैं ।

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७. गोमूत्र—

एक महत्वपूर्ण उपोत्पाद— प्रत्येक गोवंश साल में १.५ टन मूत्र देता है । जिसमें २८ किलो नाइट्रोजन २८ किलो फास्फोरस और २७.३० किलो पोटास होती है। इसके अतिरिक्त गंधक, अमोनिया, मेग्नीज, यूरिया, साल्ट, कॉपर एवं अन्य क्षार भी गोमूत्र में रहते हैं । यदि इन सभी तत्वों का यही—सही उपयोग किया जाय तो देश के सम्पूर्ण गोवंश से प्राप्त मूत्र का मूल्य ८०—९० अरब रुपये होगा।

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८. कीटनाशक एवं औषधि—

गोमूत्र एक निरापद कीटनाशक है जो फसल के हानिकारक कीड़ों का नाश तो करता ही है साथ ही भूमि की उर्वराशक्ति को भी बढ़ाता है। आयुर्वेद एवं नवीन चिकित्सा विज्ञानों की दृष्टि से गोमूत्र एक परम उपयोगी रसायन एवं पूर्ण औषधि है। चरक संहिता, राज निघन्टु, वृहत् वाग्भट्ट, अमृत सागर, अजायबल्स खलूकात (फारसी ग्रंथ), कलर हीलिंग (वैज्ञानिक एण्डर्सन) आदि ग्रन्थों में अनेक असाध्य रोगों की चिकित्सा गोमूत्र द्वारा होने का वर्णन किया गया है। विदेशों में भी गोमूत्र चिकित्सा को प्रभावी बनाने के लिये ‘‘फोटोथेरेपी’’ का सहारा लिया जा रहा है। कोढ़, बवासीर, मधुमेह, नपुंसकता, गंजापन, चर्मरोग, पुराना कब्ज, रक्तचाप, अनिद्रा, नेत्र विकार, सपेâद दाग आदि अनेक रोगों की दवा के साथ ही गोमूत्र मस्तिष्क के लिए शक्तिवर्धक टानिक की सिद्धि हुआ है।

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९. गोदुग्ध—

गाय का दूध सतोगुण प्रधान है, इससे सात्विक बुद्धि प्राप्त होती है जो स्वयं के लिए और जगत के लिए हितकारी है। यह स्पूâर्तिदायक और रोगनाशक है। जल में जैसे गंगा जल वैसे ही दुग्धाहार में गोदुग्ध सर्वोपरि, श्रेष्ठ, पवित्र और गुणकारी अन्य पशुओं का दूध यद्यपि गाय के दूध की बराबरी नहीं कर सकता किन्तु वह पुष्टिकारक,कुपोषण दूर करने वाला एक श्रेष्ठ आहार है। भारतीय जनता को गाय सहित समस्त पशुओं के दूध की परम आवश्यकता है।

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१०. देश का रक्षा कवच—

आणविक संघर्ष के इस भीषण दौर में गोवंश और पशुघन ही एक ऐसा माध्यम है जो भारत की रक्षा कर सकता है । कोई शत्रु देश यदि भारत के प्रमुख नगरों पर बम वर्षा कर दे, पुल तोड़ दे, और अरब देश पेट्रोल, डीजल की आपूर्ति रोक दें, परिवहन व्यवस्था खत्म हो जाय तो पूरा देश पंगु बन जायेगा। वैसे भी युद्ध के दौरान अधिकांश साधन सेना के लिये ही सुरक्षित हो जाते हैं ऐसी स्थिति में न तो खेतों को खाद, बिजली, पानी, डीजल आदि मिल पायेंगे और न ही अन्न , दूध आदि की आपूर्ति हो सकेगी। ऐसे घोर संकट में आशा की एक मात्र किरण हमारा पशुधन ही है जो खाद की चलती फिरती फैक्ट्री, दूध और औषधि का अक्षय भंडार और चलता फिरता (डीजल रहित) स्वावलम्बी ट्रेक्टर है। गाय का गोबर परमाणु रेडियोधर्मिता का अद्भुत रक्षाकवच भी है । जब तक भारत के पास यह रक्षाकवच रहेगा तब तक भारत दुर्जेय ही रहेगा।

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पशुधन एवं गोधन के सम्बन्ध में विभिन्न धर्मों का दृष्टिकोण—

गोधन सहित सम्पूर्ण पशुधन का महत्व समझाने के लिये उपरोक्त विश्लेषण के अतिरिक्त विभिन्न धर्मों और धर्माचार्यों के विचारों पर भी दृष्टिपात करना उपयुक्त होगा। हिन्दू धर्म— ाqहन्दू धर्म में गौ एवं सम्पूर्ण पशुधन की महत्ता विभिन्न धर्मगन्थों में विस्तार से प्रकट की गई है। महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्ण उपदेश देते हुए कहते हैं कि ‘‘माँस खाने वाले, माँस का व्यापार करने वाला, माँस के लिये जीव हत्या करने वाले ये तीनों ही दोषी एवं पापी है, जो दूसरों के माँस से अपना माँस बढाता है वह जहाँ भी रहता है कभी चैन से नहीं रह पाता।’’ हिन्दू धर्म की मान्यता है कि गाय रोम—रोम में असंख्य देवताओं का वास है। गाय की सेवा पूजा करने से अनेक देवताओं की पूजा का फल प्राप्त होता है। गाय को कष्ट देने से पाप (घोर नरक) मिलता है। इस बात की पुष्टि वृहत् पाराशर स्मृति (३/३३) द्वारा इस तरह की गई है— सर्व देवा स्थित देहे, सर्व देवमयी हि गौ: ।।‘‘ अथर्ववेद (८/६/२३) में कहा गया है—

‘‘य आम मांस मदन्नि पौरुषेय च ये कवि:।
गर्भान खादन्ति केश वास्तनित्तो नाशयामस्ति।।’’

अर्थात् जो पशु का कच्चा या पक्का मांस खाते हैं, जो गर्भ का विनाश करते हैं, उनका यहां से हम नाश करते हैं । महर्षि अरविन्द के अनुसार— ‘‘पृथ्वी पर मूर्तिमन्त गौ परमशक्ति की प्रतीक स्वरूपा है उसकी व्याख्या वेदों में भी साध्य नहीं है। गौ विश्व की माता है। महर्षि वशिष्ठ के आदेश से सम्राट दिलीप ने गौ सेवा कर रघु जैसा प्रतापी पुत्र पाया जिनके वंश में स्वयं भगवान श्रीराम अवतरित हुए। महाराज ऋतम्भर ने गौ सेवा कर महान यश प्राप्त किया। सत्यकाम जाबाल को गौ सेवा से ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हुई। साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण ने गौ सेवा करके गौ वंश का महत्व बढ़ाया । श्रीमद्भागवत में श्रीकृष्ण की गौचारण लीलाओं का व्यापक उल्लेख हिन्दू धर्म की गौ वंश एवं पशु मात्र के प्रति भक्ति भावना की चरमता प्रकट की। इस्लाम धर्म— पशुधन की सुरक्षा करने के अनेक निर्देश मुस्लिम धर्म की शिक्षाओं में प्राप्त होते हैं । ‘‘ता बयाबी दर बहिश्ते अदन जा शफ्कते बनुमांए व खल्के खुदा।’’ अर्थात् तू सदा के लिए स्वर्ग में सुख से रहना चाहता है तो खुदा की सृष्टि के साथ दया कर, प्राणियों की हत्या मत कर , उनका माँस मत खा। कुरान शरीफ में ‘‘सूर—ए—कोशर’’ प्रकरण में लिखा है कि हरा पेड़ काटने वाले, मनुष्य खरीदने वाले, गाय को मारने वाले तथा दूसरों की स्त्री से कुकर्म करने वाले खुदा के यहाँ माफ नहीं किये जावेंगे। स्वयं पैगम्बर हजरत मोहम्मद ने ‘‘नाशियात हारी’’ नामक ग्रन्थ में लिखा है कि ‘‘गाय का घी, दूध तुम्हारी तन्दुरूस्ती बढ़ाने वाला और गोश्त नुक्सान देह है। इसाई धर्म— बाइबिल में वृषभ (बैल) को देवता माना गया है । ओल्ड टेस्टामेन्ट में गौ, गौ के दूध एवं पशुधन की रक्षा का अनेक स्थानों पर वर्णन आया है। बाइबिल (लेवीटीकस ३/१७) में कहा गया है कि ‘‘तुम्हारे सम्पूर्ण निवास स्थानों के लिए तथा सभी सन्ततियों के लिए यह सनातन व्यवस्था रहेगी कि तुम चरबी और रक्त बिलकुल उपयोग न करो।’’ ईसा मसीह का कथन है— ‘‘ तू किसी को मत मार। प्राणियों का वध करके उनका माँस मत खा।’’ यहूदी धर्म— यहूदियों ने पशुधन को सर्वाधिक महत्व प्रदान किया है। प्रारंभ में यहूदी लोग प्राय: गौपालक ही थे। यहूदियों की कहावतें में उस स्थान को स्वर्ग कहा जाता है जहाँ गाय का दूध और शहद की अधिकता हो। एक स्थान पर (यशला—६५/३/४)लिखा है—‘‘जो बैलों की हत्या करता है वह मनुष्य की हत्या करता है।’’ सिक्ख धर्म— ाqसक्ख धर्म के अनुसार गुरु नानक मक्का से मदीना पहुँचे तो वहां इमाम कमालुद्दीन के साथ शास्त्र चर्चा करते हुए कहा था।

धरती गऊ स्वरूप है आहिनिस करे पुकार।

है कोई ऐसा साधजन, मैनु लए उबार।।
दुखी पुकारे रैन दिन, पाप भारी होई।

बड़ा पाप गऊ वध है, जिस पर साची लोई।।

इसी तरह दशम ग्रन्थ में गुरु गोविन्दसिंह ने कहा है—

यही देह आज्ञा तर्वक को खपांऊ।

गौघात का दुख जगत से हटाऊँ।
आस पूरण करो तुम हमारी।

मिटे कष्ट गोअन छुटे खेद भारी

जैन एवं बौद्ध धर्म— जैन एवं बौद्ध धर्म का तो मूल सिद्धान्त की अहिंसा है। जीवमात्र से प्रेम करो, यह महावीर एवं बुद्ध का प्रमुख उपदेश है। बौद्ध धर्म के प्रसिद्ध पचंशील सिद्धान्त में प्रथम एवं महत्वपूर्ण सिद्धान्त जीवों के प्रति दया एवं करुणा से सम्बन्धित हैं। जैनधर्म में कहा गया है कि हिंसा करने वालों के सभी धर्म कार्य व्यर्थ हो जाते है। पारसी धर्म— पारसियों के धर्म ग्रन्थ अवेस्ता के अनुसार जरथु्रस्त की उत्पत्ति गौरक्षा के लिए ही मानी गई है। कबीर मत— कबीरदास जी ने कहा है—

दिनभर रोजा राख के रात काटते गाय।

एक खून एक बंदगी कैसे खुशी खुदाय।

इस तरह हम देखते हैं कि विभिन्न धर्मों, पंथों व संत महात्माओं के बीच भले ही ‘‘ईश्वर’’ विषयक विचारों में मतभेद रहे हों किन्तु सभी गाय, गोवंश एवं पशुधन के महत्व के बारे में एकमत से सहमत हैं। स्वतंत्रता के पचास वर्षों में भारत में पशुधन की स्थिति: एक तुलनात्मक चित्र स्वतन्त्रता संग्राम के प्राय: सभी सेनानियों ने स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् पशु एवं गोवंश हत्या को रोकने के विचार समय—समय पर व्यक्त किए। गांधीजी ने भी स्वतंत्रता संग्राम एवं गौ हत्या विरोध की लड़ाई साथ—साथ लड़ी थी। उन्होंने १९२१ में गौ हत्या बंद नहीं करने पर अंग्रेज सरकार से असहयोग करने का प्रस्ताव पारित कराया था। बाल गंगाधर तिलक ने भी आजादी मिलने के बाद ५ मिनिट के भीतर एक कलम से गौ हत्या बंद करा देने की बात कही थी। परन्तु स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद सरकार ने संविधान की ४८वीं धारा में सिर्पâ अनुपयोगी पशुओं का ही वध किया जाय यह नियम बनाकर अपने कत्र्तव्य की इतिश्री कर ली। गांधी जी सहित समस्त स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों—पंडित मदनमोहन मालवीय, तिलक, गोखले, विनोबा भावे, लाला लाजपतराय, सुभाषचन्द्र बोस, डॉ. हेडगेवार, स्वामी श्रद्धानन्द, जगदगुरु शंकराचार्य आदि की बातों की अवहेलना की गई। गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने के बजाय नये—्नाये यांत्रिक बूचड़खाने खुलते चले गये , परिणाम स्वरूप गोवंश पर अत्याचार और कहर बढ़ता चला गया। आजादी प्राप्ति के वर्ष सन् १९४७ तथा स्वर्ण जयंती वर्ष १९९७ के बीच की स्थिति तुलनात्मक चित्र प्रस्तुत किया जा रहा है। आजादी के समय १९४७ की स्थिति आजादी के पचास वर्ष बाद १९९७ की स्थिति

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१. कत्लखाने

आजादी मिलते समय सन् १९४७ में टाइम्स ऑफ इण्डिया—नई दिल्ली, ४ अप्रेल १९९४ देश में ३०० छोटे—बड़े कत्लखाने थे। की सर्वे रिपोर्ट के अनुसार कत्लखानों की संख्या १९९४ तक बढ़कर ३६३१ हो गई थी । जो आजादी के समय की संख्या की १२ गुना से भी अधिक है। स्वर्ण जयंती वर्ष १९९७ की समाप्ति तक इन बूचड़खानों की संख्या ५००० को पार करने का अनुमान प्रकट किया जा रहा है।

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२. पशुवध—

आजादी के समय प्रतिदिन ३०,००० पशु सर्वे रिपोर्ट १९९४ के अनुसार वर्तमान में ३,५०,०० काटे जाते थे। इनमें गायों की संख्या २२०० पशु प्रतिदिन काटे जा रहे हैं। यह संख्या आजादी के करीब होती थी। वर्ष से करीब १२ गुना अधिक है। इनमें गोवंश की संख्या २९५०० शामिल है।

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३. माँस निर्यात—

आजादी के समय माँस का निर्यात अत्यन्त इकानामिक सर्वे १९९२—९३ पेज ५/९१ के अनुसार नगण्य था जो एक करोड़ रूपये से भी बहुत वर्ष १९९२ में माँस निर्यात आजादी वर्ष की तुलना में कम होता था। जो पशुवध होता था वह देशी ढाई सौ गुना बढ़कर २३१ करोड़ रूपयों का हो गया आवश्यकता की पूर्ति के लिये ही होता था। है इस प्रकार आजादी मिलने के बाद पशुवध को व्यापारिक एवं औद्योगिक रूप दिया गया ।

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४. चमड़ा निर्यात—

आजादी वर्ष १९४७ में चमड़ा निर्यात की मात्रा आजादी मिलने के बाद से १९९२ तक चमड़े का निर्यात मात्र २ करोड़ थी। मरे हुए पशुओं का चमड़ा क्रमश: बढ़ते हुए ३१२८ करोड़ रूपये हो गया। १९९७ के प्राय:देशी आवश्यकता के लिए ही प्रयुक्त किया अंत तक यह आँकडा ५००० करोड़ पार करने का अनुमान जाता था। है। (इकनामिक सर्वे रिपोर्ट १९९२—९३, ५/९१)

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५. खाल निर्यात—

१९४६—४७ में जब देश परतंत्र था मात्र आजाद होने के ८ वर्ष बाद वर्ष १९५५—५६ में पशु खालों ७,४५,००० खालें निर्यात की गई थी। के निर्यात की संख्या ८०,७०,३६३ हो गई थी।

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६. पशु— मानव अनुपात —

आजादी मिलते समय १९४७ में देश में आजादी की स्वर्ण जयंती मनाते समय प्रति हजार प्रति हजार मनुष्यों पर पशुधन की संख्या जनसंख्या पर पशुओं की संख्या घटाकर मात्र १४६ ४६० थी और १९५१ में यह ४५० रही। रह गई है। यह स्थिति यांत्रिक बूचडखाने खुलने तथा छोटे कत्लखानों की वृद्धि होने एवं जनसंख्या के बेशुमार बढ़ने के कारण संभव हुई है। यदि यह स्थिति जारी रही तो सन् २०१० तक यह मात्र २० रह जावेगी। दूध की नदियों के स्थान पर दूध की बोतलें भी खोजना मुश्किल हो जायेगा। (सेंट्रल लेदर रिसर्च इंस्टीट्यूट की अखिल भारतीय सर्वें रिपोर्ट नवम्बर १९८७)

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भारत से माँस निर्यात—

सरकार की अविवेकीकृत नीतियों, पशुधन पर बढ़ते कहर तथा यांत्रिक कत्लखानों के बढ़ने की बदौलत आज भारत विश्व का एक बड़ा माँस निर्यातक (कसाई) देश बन गया है। इकानामिक सर्वे १९९२—९३ की रिपोर्ट के अनुसार मध्य पूर्व के अरब देशों को भेजे जाने वाले माँस में ७०ज्ञ् माँस भारतीय पशुओं का होता है। वर्ष १९४७ में जहाँ माँस का निर्यात नाम मात्र का था वहाँ १९६१ में १ करोड़, १९७१ में ३ करोड़, १९८१ में ५६ करोड़ जबकि १९९१ में बढ़कर १४० करोड़ रूपये का हो गया है । बड़े—बड़े बूचड़खाने खुलने से माँस निर्यात के क्षेत्र में काफी तेजी से बढ़ोत्तरी हुई। १९९१ की तुलना में १९९२ के एक ही वर्ष में २३१—१४९ ृ ८९ करोड़ रूपये की रिकार्ड वृद्धि आंकी गई । इतनी वृद्धि पिछले १५ वर्षों में भी नहीं हुई थी किन्तु १९८९ में हैदराबाद के निकट अल—कबीर कारखाने खुल जाने से उक्त स्थिति में तेजी से परिवर्तन आया। माँस निर्यात के बढ़ते हुए आँकडे भारतीय पशुधन और भारतीय अर्थव्यवस्था के विनाश के आँकड़े हैं। इन तथ्यों को आगामी चित्रों में भली—भांति प्रर्दिशत किया गया है। माँस की र्पूित के लिये वर्तमान समय में देश में करीब ५,००० बड़े कारखाने हैं। इनमें से अनेक कारखाने आधुनिक यांत्रिक पद्धति से संचालित हैं। देश के माँस निर्यात के प्रमुख कारखानों में दिल्ली का ईदगाह बूचड़खाना, मुम्बई का देवनार कत्लगाह, कलकत्ता का टेगरा बूचड़खाना, आन्ध्रप्रदेश का अल—कबीर कारखाना प्रमुख हैं। इनके साथ ही दुर्गापुर का गार्डवीरज, मोटीग्रमा आन्ध्रप्रदेश, हैदराबाद का अल्लाना चंगीचेरला, आनन्दपुरम् मद्रास का पेराम्बुर एवं मंगगिरि, सेदाषेय कोंडगियर है। उसी प्रकार मध्यप्रदेश के ग्वालियर, सीहोर, पीलूखेड़ी, भोपाल, रायपुर, पंजाब का डेराबस्सी, हिमाचल प्रदेश का एक, केरल के तीन, उत्तरप्रदेश के चार, जम्मू—कश्मीर के दो तथा बिहार के चार नये कत्लखाने रात—दिन माँस के निर्यात हेतु उपयोगी पशुओं को अनुपयोगी बताकर काट रहे हैं। विवरण गोवंश की संख्या १९९१ गोवंश की संख्या १९९२ प्रजनन वृद्धि दर गाय बैल गाय बैल

भारत में १९.८४ ८.१३ १९.६० ७.९६ १३.३९ज्ञ् विश्व में १२९.४६ ११९.०७ १२८.९६ ११८.३३ ५.१०ज्ञ् स्रोत— प्रतियोगिता दर्पण १९९१ के लेख से । उपरोक्त सारणी में भारत में १९९१ में गायों की संख्या १९.८४ करोड़ की तुलना में १९९२ में घटकर १९.६० करोड़ रह गई। २४ लाख गायों की यह कमी की स्थिति १३.३९ज्ञ् प्रजन्न वृद्धि के बावजूद हुई है इससे अन्दाजा लगाया जा सकता है कि कितनी गायें इस वर्ष के दौरान काटी गयीं। उसी प्रकार १९९१ में ८.१३ करोड़ बैलों की तुलना में १९९२ में बैलों की संख्या घटकर ७.९६ रह गई है यह १७ लाख बैलों की कमी भी कारखानों की बलि को समर्पित हुई। सारणी में विश्व में १९९१ में गायों की कुल संख्या १२९.४६ करोड़ थी जो १९९२ में घटकर १२८.९६ करोड़ रह गई उसी प्रकार विश्व के १९९१ में बैलों की संख्या ११९.०७ करोड़ की तुलना में १९९२ में ११८.३३ करोड़ रह जाना भी इस बात का पक्का साक्ष्य है कि बैलों की भी बड़ी मात्रा में हत्या की गई है और यह कमी ५.१०ज्ञ्वृद्धि दर के बावजूद हुई है। यांत्रिक बूचड़खानों में पशुहत्या की भयानक प्रक्रिया— यांत्रिक कत्लखानों में गोवंश सहित समस्त पशुओं की कैसी भयंकर दुर्गति होती है इसका अनुमान होने पर दिल रो उठता है और रोंगटे खड़े हो जाते हैं। सामान्यत: हत्या की कार्य प्रक्रिया निम्न प्रकार होती है—

१. सबसे पहले तो कत्लखाने के एजेण्ट पशुओं को विभिन्न हाटों से खरीदकर निर्जीव सामान की तरह ट्रकों में निर्दयतापूर्वक ठूंसकर कत्लखाने के बाड़े तक ले जाते हैं। गड्डेदार सड़कों पर चलते ट्रकों की दीवार अथवा लोहे से टकराकर रास्तों में पशुओं को घाव हो जाते हैं। ऐसी लम्बी यात्राएं पशु बड़े ही कष्ट से पूर्ण करते हैं।

२. कत्लखाने में पहुंचकर पशुओं को सात—आठ दिन तक भूखा रखा जाता है ताकि उनके अनुपयोगी और मरियल होने का प्रमाण—पत्र मिलने में आसानी रहे।

३. कत्लखाने में पशुओं के स्वास्थ्य की जाँच के लिए शासकीय पशु चिकित्सक नियुक्त रहता है जो उनके अनुपयोगी होने का प्रमाण—पत्र आसानी से धनराशि लेकर देता है। जो डॉक्टर ऐसा नहीं करते उनके साथ पशुवत मार—पीट की जाती है। पिछले समय दिल्ली के ईदगाह कत्लखाने में डॉक्टर पर प्राणघातक हमला इसी बात का सबूत है।

४. अनुपयोगी होने का प्रमाण—पत्र मिलने के बाद मृतप्राय पड़े पशुओं को घसीटकर यंत्र के पास लाया जाता है वहां उन्हें मार—पीटकर खड़ा किया जाता है। मार के भय से भूखा अशक्त पशु खड़ा होकर लड़खड़ाकर गिर पड़ता है या इधर उधर जाने का प्रयास करता है, मार—पीट से करुण क्रन्दन करता पशु आत्मरक्षार्थ पुकार लगाता है, परन्तु पुकार सुनने वाला वहां कोई नहीं होता है।

५. इसके बाद उसका एक पैर लोहे की पुली से नटबोल्ट लगाकर निर्ममतापूर्वक जकड़ दिया जाता है ताकि वह इधर—उधर भाग न सके।

६. फिर उस पर जल्लादों द्वारा उबलता हुआ गर्म पानी पाईप लाइन से डाला जाता है, ताकि उसका चमड़ा नर्म और माँस व खून गरम हो जाय।

७. गर्म पानी शरीर पर गिरने से वह बिलबिलाता छटपटाता भागने की कोशिश करता है पर एक टांग बंधी होने से तड़प कर गिर पड़ता । गिरने से कभी—कभी उसकी टांग की हड्डी टूट जाती है।

८. स्नान की प्रक्रिया के बाद यांत्रिकविधि से पुली ऊपर उठने लगती है और गौमाता या पशु एक पेर से लटकने जैसी स्थिति में आ जाते हैं। स्वरयंत्र पर दबाव आने से वे चिल्ला भी नहीं पाते। एक टांग से बंधा होने के कारण पशु छटापटा भी नहीं सकता उस समय उस पर होने वाले अपार कष्ट की हम कल्पना भी नहीं कर सकते।

९. इस प्रक्रिया के बाद कसाई उल्टे लटके पशु की गर्दन की एक नश (जेगुलर बीन) काट देता है ताकि उसके जिन्दा रहते ही उसका गरम खून नीचे लगी ट्रे में एकत्रित होकर जारों में इकट्ठा हो जाय। ऐसे खून को एकत्रित कर टानिक अथवा दवाई बनाने के लिए भेज दिया जाता है।

१०. संग्रहीत करने से बचा खून नालियों मेंं बहा दिया जाता है जो भू—जल को प्रदूषित करता है । कई बार भूल से अधिक बहा ऐसा गंदा अभिशप्त खून पेयजल की पूâटी पाईपलाइनों के द्वारा लोगों के घरों के नलों तक पहुंच जाता है। ऐसी शिकायत दिल्ली के नागरिकों ने की है और समाचार—पत्रों में छपी थी।

११. यह वीभत्स प्रक्रिया पूरी होने के बाद किन्तु पशु की जान निकलने के पूर्व उसके पेट में छेद करके यंत्रों से हवा भरी जाती है ताकि चमड़ा उधेड़ने और गोश्त संग्रह करने में आसानी रहे।

१२. इसके बाद उल्टे लटके पशु की चमड़ी उधेड़ी जाती है और माँस इकट्ठा किया जाता है। सींग हड्डियाँ आदि अलग—अलग करके उन्हें पृथक—पृथक प्रोसेस में डाला जाता है । फिर यांत्रित रासायनिक क्रियाओं से माँस को डिब्बों में पैक करके विक्रय अथवा निर्यात के लिए विपणन विभाग को भेज दिया जाता है।

इस घोर पाप के जिम्मेदार माँस चमड़ा निर्यात कर लाभ कमाने वानले कारखानों के मालिक ही नहीं हत्या करने वाला जल्लाद, माँस खाने वाले चटोरे, बेचने वाले कृषक और दलाल, अनुमति देने वाली सरकारें तथा चमड़े और क्रीम पावडर के शौकीन स्त्री—पुरुष भी होते हैं । कोमल रेनेट पाउडर क्रीम बछड़ों की नरम आंतों से बनाया जाता है। इस माँग की पूर्ति के लिए हजारों लाखों बछड़े जन्म के पूर्व ही गौमात, भैसों और बकरियों के गर्भ में ही दिये जाते हैं (इकानामिक सर्वे रिपोर्ट ९२—९३ पेज ५/९१) देशभर में फैले हजारों सादे कत्लखानों में भी पशुओं के साथ यांत्रिक कत्लखानों जैसा ही व्यवहार होता है। बिना तड़पाये मारे जाने पर उनका मांस हलाल नहीं होता ऐसा अंधविश्वास भी पशुओं के कष्ट बढ़ाने में मदद देता है। कत्लखानों की यह कार्य प्रक्रिया बड़ी वीभत्स, घृणास्पद एवं मानवता के खिलाप है परन्तु सारे मानवतावादी न जाने कहाँ मर गये हैं जो आतंकवदियों के साथ सेना या पुलिस के द्वारा थोड़ी सी सख्ती करने पर तो शोर मचाते हुए घड़ियाली आँसू बहाते हैं किन्तु गौमाता और मूक पशुओं के इस उपरोक्त करुण क्रन्दन से उन्हें कोई वास्ता नहीं होता।

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पशुओं की हत्या एवं रक्षा का अर्थशास्त्र—एक तुलनापत्र

दुधारू पशुओं का कत्ल हर दृष्टि से घाटे का सौदा होता है। उदाहरण के लिए अल—कबीर यांत्रिक कत्लखाने में पिछले ५ वर्षों में मारे जाने वाले पशुओं के मांस, चमड़ा, हड्डी, सींग आदि के विक्रय एवं निर्यात से प्राप्त आय की तुलना इन मारे गए पशुओं के जीवित रहने की दशा में अर्थव्यवस्था को उनसे पहुँचे लाभ से करके यह तथ्य प्रकट किया गया है कि— पशुओं के वध करने पर स्थिति पशुओं के जीवित रहने पर स्थित आम

१. कारखाने के लेखा रिकार्ड के अनुसार १२८ करोड़ रुपये का दूधजन्य पदार्थ एवं अन्य प्राप्ति पिछले ५ वर्षों में २०० करोड़ रुपये की २२५० करोड़ रुपये खाद्यान्न उत्पादन में सहयोग, ऊर्जा प्राप्ति शुद्ध आय हुई। खाद तथा परिवहन से प्राप्ति। ९५ करोड़ रुपये स्वाभाविक रूप से मरने वाले पशु से चमड़ा सींग, हड्डी आदि से आय। २४७३ करोड़ रुपये सकल आय —१६३ करोड़ रुपये घटाया खाद्य चारा खली आदि का खर्च। २३१० करोड़ रूपये शुद्ध आय। रोजगार

२. कारखाने द्वारा इस अवधि में ३०० पशुओं को जीवित रहने की दशा में उन्हें चराने, सम्हालने, लोगों को रोजगार प्रदान किया गया। दूध वितरण करने, खेती करने, परिवहन करने, खाद तैयार करने आदि के रूप में मृत पशुओं का चमड़ा, सींग, हड्डी का औद्योगिक उपयोग करने के लिये ३, ४८, १२५ व्यक्तियों को रोजगार प्राप्त होता। (पाञ्चजन्य ९७, झंडेवाला स्टेट नई दिल्ली) इस प्रकार र्आिथक दृष्टि से भी पशु हत्या की तुलना में पशु का पालन कई गुना अधिक लाभप्रद सिद्ध होता है। गोवंश पशु रक्षा आन्दोलन का इतिहास गौवंश की रक्षा एवं पालन का आन्दोलन उतना ही पुराना है जितना कि गौ। प्राचीनकाल में कई राजा—महाराजा और प्रजाओं ने गाय की रक्षा के लिए बड़े—बड़े त्याग और बलिदान किये। महाराज दिलीप, माधांता, ऋतम्भर, पाण्डव, राजा विराट, श्रीकृष्ण, बलराम, तेजाजी महाराज, शिवाजी महाराज, रामिंसह वूâका, गुरूगोविन्द िंसह, डॉ. हेडेगेवार, जगद्गुरू शंकराचार्य, प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, रामचन्द्र वीर, हुकमचन्द सांवला आदि असंख्य महापुरुषों ने पशुओं के कल्याण के लिए आन्दोलनों के रूप में प्रयत्न किये हैं। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम १८५७ की क्रांति का कारण भी गाय की चरबी लगे कारतूस थे जिनका उपयोग करने से हमारे सैनिकों ने इंकार कर दिया था। इस इंकार में भी गौ हत्या के विरोध का स्वर ही था। महात्मा गांधी और स्वतंत्रता सेनानियों ने भी अपने स्वतंत्रता आन्दोलन के साथ ही साथ सामान्तर रूप से पशु हत्या और गोवंश के विनाश को रोकने का आन्दोलन भी चलाया। परन्तु स्वतंत्रता मिलने पर इन लोगों की भावना के अनुसार पशु हत्या रोगी नहीं जाने से १९५२ में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघ चालक गुरूजी के नेतृत्व में गौहत्या बन्दी सम्बन्धी पोने दो करोड़ (१,७५,००,०००) लोगों के हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्रप्रसाद को सौंपा गया। १९५३ में आर्यसमाज की सार्वदेशिक प्रतिनिधि सभा ने भी गौ रक्षा हेतु आन्दोलन करने का प्रस्ताव पारित किया। १९५४ में लखनऊ विधानसभा के सामने विशाल सत्याग्रह किया गया। फलत: १९५५ में बिहार सरकार ने और १९५६ में उत्तर प्रदेश सरकार ने गोवध निषेध कानून पारित किये। गोभक्तों की याचिका पर १९५८ में सर्वोच्च न्यायालय की पूरी पीठ ने एक स्वर से गौबध बन्दी के पक्ष में निर्णय दिया, परन्तु न्यायालय ने उपयोगी सांड, बैलों को छोड़कर अनुपयोगी पशुओं के वध को निर्णय से बाहर रखा। इसकी आड़ में कसाईयों ने उपयोगी पशु काटना भी शुरु कर दिये। फलत: ७ नवम्बर १९६६ को लाखों गोभक्तों ने दिल्ली में संसद के सामने प्रदर्शन किया। इसमें पुरी के शंकराचार्य, विनोबाभावे, प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, बद्रीनारायण, मेहरचन्द पाहुजा आदि ने आमरण अनशन किया। कुछ लोगों ने कानून पास होने की आशा में प्राण त्याग दिये और कुछ के अनशन आश्वासन देकर तुड़वा दिए गए। हाल ही में संवत् २०५३ वर्ष १९९५-९६ को गौरक्षा वर्ष घोषित करके गौभक्त समाज और बजरंग दल आदि ने आन्दोलन प्रारंभ किये जो बहुत ही सफल रहा।

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गोरक्षा वर्ष संवत २०५३ की उपलब्धियाँ

राष्ट्रीय गोरक्षा आन्दोलन समिति ने इन १२ माह की अवधि में २७७ जिलों में गौरक्षा समितियाँ बनाई। २४६ जिलों में गोरक्षा संयोजक नियुक्त किये। इस संगठन तंत्र द्वारा १,३०,०० गोवंश को कसाइयों के हाथ से बचाया। इनमें से ३३,००० गोवंश किसानों को वितरित कर दिया गया, शेष पूर्व स्थापित अथवा नई गौशालाओं में रखा गया। इसी वर्ष ९९ गौशालाएँ/गोसदन प्रारंभ किये गये। १७३ चारा भंडार स्थापित किये गये। लक्ष्य र्पूित हेतु ३०७ गौरक्षक चौकियां स्थापित की गई। जिनमें बजरंगदल सहित अन्य समाजसेवी स्वयंसेवक बारी—बारी से तैनात रहे। इस सम्बन्ध में ३९० मामले न्यायालयों में चले इनमें से ६१ का निपटारा हो गया। स्थापित गौशालाओं एवं शोध संस्थानों में गोमूत्र एवं गोबर से दवाइयों के निर्माण, पंचगव्य चिकित्सा पद्धति प्रारंभ की गई है। गौ नस्ल सुधारने हेतु शोध किये गये। दूध की मात्रा बढ़ाने, बाँझ गायों को प्रजननयुक्त बनाने, गोबर गैस संयंत्र लगाकर ऊर्जा निर्माण करने, हानि रहित कीटनाशक तैयार करने, आदि के प्रयोग भी चल रहे हैं। गोरक्षा वर्ष के दौरान २५ अगस्त ९६ को ३८८ स्थानों पर गौरक्षा दिवस मनाया गया तथा ४९०० स्थानों पर गोरक्षा जनजागरण सप्ताह मनाया गया जिनमें ३,७१,१८१ लोग सम्मिलित हुए। जन्माष्टमी वि. सं. २०५३ को ८१५ स्थानों पर गो पूजा हुई जिसमें एक लाख से अधिक लोगों ने भाग लिया। गोपाष्टमी पर ४५६ स्थानों पर गो पूजन कार्यक्रम हुए।

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उपसंहार

गोरक्षा आन्दोलन की लम्बी परम्परा तथा गोवंश रक्षा वर्ष के आयोजन से देश में गोरक्षा एवं पशुपालन के प्रति काफी जागृति आई, इससे काफी मात्रा में रचनात्मक सकारात्मक मैदानी कार्य हुए, किन्तु वास्तविक आवश्यकता के मान से अभी भी काफी कुछ काम करना बाकी है। आज भी हमारे स्वस्थ पशु हजारों—लाखों की संख्या में लुके—छिपे कसाईखानों में पहुंचकर कत्ल हो रहे हैं। हजारों यांत्रिक कत्लखाने दिन—रात खून की नदियाँ बहा रहे है। बचा हुआ पशुधन भी साज सम्हाल और उनके निसृत पदार्थों के उपयोगी प्रयोग हेतु भारतीय समाज की ओर आशा भरी दृष्टि से देख रहा है। इनके आंसू हमें पुकार रहे हैं। हमें इस दिशा में अभी बहुत कुछ करना शेष है। गोवंश रक्षा कानूनों को दृढ़ बनाने, सामाजिक चेतना जागृत करने, पशु प्रेमियों के संगठन बनाने, गो दुग्ध का महत्व समझाने, गोमूत्र और गोबर से दवाइयाँ बनाने तथा माँस खाने से होने वाली शारीरिक तथा सामाजिक विकृतियों का व्यापक प्रचार—प्रसार करना, गौशाला और गोसदनों का निर्माण करने और चरनोई का प्रबंध करने जैसे अनेक काम गौभक्त समाज के लिये करना शेष है जिन्हें प्राथमिकता के साथ क्रिया जाना आवश्यक है।

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संदर्भ ग्रंथ सूची

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१०. ‘‘पीपुल्स फार एनिमल’’, मेनका गांधी

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१३. कुरान

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१५. गोमाता का विनाश—सर्वनाश, लेखक : श्रीरामशंकर अग्निहोत्री

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२०. योजना, प्रधान सम्पादक देवेन्द्र भारद्वाज—निदेशक प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, पटियाला हाऊस, नई दिल्ली, १९९६

२१. अखण्ड ज्योति, सम्पादक मंडल—ब्रह्मवर्चस शांतिकुंज हरिद्वार, प्रकाशक—अखण्डक ज्योति संस्थान, मथुरा, १९९२

२२. प्रतियोगिता दर्पण, सम्पादक—महेन्द्र जैन, दिसम्बर १९९५, आगरा

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कु. गायत्री शर्मा'
डॉ. देवकरण शर्मा, १२९, बहादुरगंज उज्जैन—४५६००१'
अर्हत् वचन अक्टूबर १९९७ पे. नं. ५७-७२'