ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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सोलहकारण व्रत की जाप्य - "ऊँ ह्रीं अर्हं शक्तितस्तपोभावनायै नमः"

आठ कर्मो का स्वभाव

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आठ कर्मो का स्वभाव

ज्ञानावरण - जो आत्मा के ज्ञान गुण को ढके-प्रकट न होने दे, जैसे-देवता के मुख पर पड़ा हुआ वस्त्र।

दर्शनावरण - जो आत्मा का दर्शन न होने दे, जैसे-राजा का पहरेदार।

वेदनीय - जो जीव को सुख-दु:ख का वेदन-अनुभव करावे, जैसे-शहद लपेटी तलवार की धार।

मोहनीय - जो आत्मा को मोहित-अचेतन करे, जैसे-मदिरापान।

आयु - जो जीव को उस-उस स्थान में-पर्याय में रोक रखे, जैसे-सांकल अथवा काठ का यंत्र।

नामकर्म - जो अनेक तरह के शरीर की रचना करे, जैसे-चित्रकार।

गोत्रकर्म - जो ऊँच-नीचपने को प्राप्त करावे, जैसे-कुम्भकार|

अन्तराय - जो दाता और पात्र मे अन्तर-व्यवधान करे, जैसे-भंडारी दूसरे के लिए दान देते समय राजा को रोक देता है।

आठ कर्मों के उत्तर भेद - ज्ञानावरण के ५, दर्शनावरण के ९, वेदनीय के २, मोहनीय के २८, आयु के ४, नाम के ९३, गोत्र के २ और अन्तराय के ५, ऐसे कुल ५±९±२±२८±४±९३±२±५·१४८ भेद होते हैं।