ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.png
Whatsappicon.png
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें |


पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर २०१६- रविवार से सीधा प्रसारण चल रहा है | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

आतंकवाद या टैरेरिज्म

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


[सम्पादन]
आतंकवाद या टैरेरिज्म


आतंकवाद का उद्भव अशिक्षा, बेकारी, बदले की भावना, स्वभाव में क्रूरता , असहिष्णुता, संस्कार हीनता जैसे कारणों से हुआ है। इस्लाम में एक शब्द है जेहाद। जेहाद का मूल शब्द है ‘‘जिह्द’’ जिसका अर्थ है धर्म को फैलाना, विस्तार करना। जैन धर्म में भी तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध कराने वाली ‘सोलह कारण भावनाओं में से एक भावना है धर्म प्रभावना कहा गया है— ‘‘धरम प्रभाव करे जो ज्ञानी तिन शिवमारग रीति पिछानी’’ शिवमारग अर्थात् मोक्षमार्ग । निश्चितरूप से इसी भावना को सभी धर्मों में बताया गया है चाहे हिन्दु धर्म हो या मुस्लिम , बौद्ध हो या ईसाई।
हमें अपने धर्म और उसके सिद्धान्तों पर श्रद्धा—आस्था रखना चाहिए। बिना श्रद्धा —आस्था के धर्म चल ही नहीं सकता। श्रद्धा जड़ है धर्म वृक्ष है और मोक्ष , बैकुण्ठ, जन्नत, स्वर्ण उस धर्म वृक्ष के फल हैं।
आस्था रखने का अर्थ है श्रद्धा रखना, दृढ़ श्रद्धा रखना पर जब यही दृढ़ता क्रूरपन में बदल जाती है तो श्रद्धा या धर्म भावना समाप्त होकर धर्मान्धता में परिवर्तित हो जाती है। अन्धा व्यक्ति तो मार्ग से भटक ही जाता है ठीक इसी प्रकार क्रूरपन व्यक्ति को धर्म के मार्ग से भटका देता है और उसके व्यक्तित्व में कठोरता, क्रोध, निर्दयता आ जाती है और फिर धार्मिक संस्कार तथा नैतिकता समाप्त हो जाता है। दया का भाव समाप्त हो जाता है। कभी—कभी अपने धर्म का प्रचार—प्रसार करने में आदमी मनुष्यता तथा धर्म के मूल सिद्धान्त दया, प्रेम, ममता, सहिष्णुता सब कुछ भूलकर शैतान बन जाता है। उसी शैतानियत का प्रभाव है आतंकवाद निर्दयता, वहशीपन जो पिछले तीस वर्षों से दुनियां भर को बहुत दुख दे रहा है। अगर भूतकाल में देखें तो लगभग ३०० वर्ष पहले एक बादशाह ने अपना धर्म फैलाने के लिये, भारत में अनादिकाल से प्रचलित धर्मों के मन्दिरों और स्मारकों की निर्दयता पूर्वक व्यापक तोड़फोड़ की, विध्वंस किया था और आश्चर्य की बात यह है कि वह बादशाह बड़ा धार्मिक तथा अपने मजहब का पक्का मानने वाला माना जाता है। दुख की बात है कि तभी से विरोधी धर्म के मानने वालों की हिंसा विध्वंस मारकाट और निर्दयता पूर्वक हत्या करना आतंक फैलाना धार्मिक क्रियाओं में सम्मिलित हो गया। करता ने धार्मिक श्रद्धा का चोला पहन लिया। मैंने स्वयं कुरान शरीफ और बाइबिल को ध्यान पूर्वक पढ़ा है। इसका कारण यह है कि धर्म फैलाने के लिये हिंसा, आतंक , भय और इन्तेहापसन्दगी पश्चिमी संस्कृति के मानने वालों तथा अरब देशों की सौगात है। उन में से कुछ लोग धर्म को फैलाने के नाम पर और अपनी बातों को मनवाने के लिये दहशतगर्दी, भय का वातावरण पैदा करके नरसंहार कर रहे है। धर्म शास्त्रों में उल्लेख है कि वृद्ध नारी तथा बच्चों पर अत्याचार और हत्या करने का निषेध है किन्तु अत्यन्त दुर्भाग्य का विषय है कि आतंकवादी विभिन्न नामों से जोहाद के मुखौटे लगाकर हत्या और आतंक फैला रहे हैं—
उम्र निकल जाती है एक घर बनाने में।
रहम नहीं आता उन्हें बस्तियां जलाने में।|
इसी दिसम्बर २०१४ में १५ दिसम्बर को आस्ट्रेलिया के शहर सिडनी में एवं १६ दिसम्बर को पाकिस्तान के शहर पेशावर में सैनिक स्कूल के १४२ बच्चों सहित कुल १६० व्यक्तियों की नृशंस हत्या कर दी गई। दिनांक २३ दिसम्बर १४ को असम के बोडोलैण्ड आतंकियों ने गांव के ४७ आदमियों को लाइन में खड़े करके गोली मार दी। । इन देशों की सरकारें स्वयं किसी न किसी नाम से इन आतंकवादियों को सहायता पहुंचाती रही हैं। यह सिलसिला सैकड़ों वर्षों से सरकारों के गले की फांस बना हुआ है । एक लम्बी लिस्ट है— अगस्त १९७८ में ईरान में ४७७ व्यक्तियों की मौत १९८५ के जून महीने की २३ तारीख को आयरलैण्ड में ३३१व्यक्तियों की हत्या अगस्त १९९८ में नैरोबी २४४ व्यक्ति मृत अक्टूबर १९८३ में लेबनान में ३०१ व्यक्ति मुम्बई में मार्च १९९३ में ३१७ मृत १४०० जख्मी ११ सित. २००१ में अमेरिका के वल्र्ड ट्रेड सेण्टर में २९९३ व्यक्तियों की मृत्यु इसके अतिरिक्त २००४ में रूस २००७ में इराक २००९ तक २०१४ में नाइजीरिया लगभग २००० व्यक्तियों की हत्या की गई । विश्व में प्रतिवर्ष लगभग १८००० व्यक्ति इन आतंकी हमलों में मारे जाते हैं और पिछले ५ वर्षों में इन हमलों में ३०ज्ञ् की वृद्धि हुई है।
प्रश्न यह है कि आतंकवाद चाहे वह किसी नाम से हो चाहे वह नक्सलवाद कहें या वोडोलैण्ड समस्या, सिमी, आई.आई. एम की विध्वंस कारी गतिविधियां। उसका मुख्य कारण क्या है और उसे वैâसे समाप्त किया जाये क्योंकि आतंकवाद मानवता के नाम पर कलंक बनता जा रहा है। दुख की बात तो यह है कि आतंकवाद ने दुनियां के सभी प्रमुख धर्मों—हिन्दू, मुस्लिम , सिख, ईसाई धर्म के मानने वालों को अपने चंगुल में पंâसा लिया है। गुजरात के दंगें, अक्षरधाम की बमबाजी, बम्बई ट्रेन धमाके, कश्मीरी आतंकवाद इन्दिरा गांधी की हत्या और पंजाब के दंगे, असम के बोडोलैण्ड और नक्सलवादी आतंकवाद इन्हीं धर्मों के मानने वालों की करतूतें हैंं। कोई कम कोई ज्यादा पर हैं तो सभी मानवता के दुश्मन।
आतंकवाद मुख्यत: धर्म के सिद्धान्तों को धार्मिक श्रद्धा के उल्टे अर्थ लगा कर उसे करपन का पर्यायवाची बना दिया गया है। वे धर्म के प्रचार—प्रसार के लिये नई उभर के गरीब अशिक्षित युवाओं को बाकायदे ट्रेनिंग देकर तैयार करते हैं उन्हें बताया जाता है कि अगर इस मुहिम में मर भी गये तो उन्हें जन्नत मिलेगी इसके लिये चाहे उन्हें हिंसा, आतंकवाद ओर आत्मघाती हमला करना पड़े। ‘‘फिदायीन’’ आत्मघाती दस्ते को कहते हैं जिसने भारत के प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी तथा धार्मिक क्रूरता के कारण प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी की हत्या करवाई थी।
धर्म तो मानवता में परस्पर प्रेम सौहार्द और जीवन के लक्ष्य मोक्ष तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त करता है। श्रद्धा बन्दूक की नाल से पैदा नहीं की जा सकती। कुरआन शरीफ के अलबक्रा की २५ वीं आयत में निर्देश है कि दीन (धर्म) में किसी का जब्र (जोर जबरदस्ती) नहीं। यही नहीं सूरये शूरा की आयत ४०-४१ में स्पष्ट निर्देश हैं कि बुराई का परिणाम बुराई हैं। बुरा करने वालों को सजा देना केवल अल्लाह के हाथ में है।
आतंकवाद और खून खराबे का एक मुख्य कारण मांसाहार है। घर में रोज—रोज मांस के लिये जानवरों को काटने से बच्चों में हत्या या खून करने का भय समाप्त हो जाता है और कत्ल या खून करना उनके लिये रोजमर्रा की घटना बन जाती है जिससे उन्हें जरा भी भय या घृणा नहीं होती। इसीलिये उन्हें कोई नाराजी होती है या उकसाया जाता है तो वे एकदम से हत्या जैसे नृशंस कर्म पर उतर आते हैं।
दूसरा कारण अशिक्षा और गरीबी है । युवकों को खूब पैसा देने का लालच दिया जाता है और अशिक्षित होने के कारण वे शराब और उन्मुक्त यौन संसर्ग के लोभ में घटना की गम्भीरता को समझ ही नहीं पाते। उन्हें झूठी देशभक्ति का पाठ पढ़ाया जाता है बोडोलैण्ड, कश्मीर, इस्लामी विश्व आदि के सब्जबाग दिखाकर उन्हें प्रलोभित कर दिया जाता है और फिर बन्दूक सौंप दी जाती है।
आतंकवाद को रोकने के उपाय|
आतंकवाद को रोकने का सर्वोत्तम उपाय तो अहिंसा धर्म के प्रति लोगों में शृ्रद्धा और विश्वास जागृत करना ही है। भगवान महावीर का अमर सन्देश जीयो और जीने दो, अहिंसा परमो धर्मों, धम्मो दया विशुद्धो ही है। जैन धर्म तथा अन्य धर्मों में बताये गये पांच महाव्रत—अहिंसा, सत्य , अचौर्य, अब्रह्म तथा अपरिग्रह अपनाने से विश्वशान्ति स्थापित की जा सकती है। इन महाव्रतों के स्थान पर गृहस्थ लोगों को अणुव्रत पालन करने का निर्देश है। अगर इन अणुव्रतों पर ईमानदारी से चला जाये और हिंसा झूठ चोरी कुशील और परिग्रह से बचा जाये तो हिंसात्मक क्रिया कलापों से भी बचा जा सकता है।
गरीबी—अमीरी की खाई और अशिक्षा का कलंक मिटा दिया जाय तो आतंकवाद की समाप्ति की जा सकती है। सबसे अन्तिम और सबसे मुश्किल उपाय है विश्व भर की सरकारें इस मुद्दे पर ईमानदारी से एक जुट होकर अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति से वोटों के प्रलोभन से ऊपर उठाकर कार्य करें तो निश्चित ही यह विश्वव्यापी समस्या दूर हो सकती है। यह सरकार की इच्छा शक्ति की कमी की है कि आतंकवादी कश्मीर की विधान सभा , भारतीय संसद दिल्ली, लाल किले पर, गुजरात के अक्षरधाम मंदिर, बम्बई की ट्रेनों में , समझौता एक्सप्रेस, सिनेमा घर, स्कूल लखनऊ, वाराणसी और फैजाबाद, अयोध्या, सी.आर.पी.एफ के हैडक्वार्टर में अगरतला, ग्वाहाटी, असम, इम्फाल आदि में सूचना दे देकर बमों से हमला कर चुके हैं और सरकारें वोट बैंक को बचाये रखने के लिये आम जनता को मरने का खतरा उठा रही है। दृढ़ इच्छा शक्ति हो तो क्या नहीं हो सकता। सच तो यह है —
जब से अहिंसा धर्म छोड़ा हिंसक जमाना हो गया।
सबके दिल से भाव करूणा का रवाना हो गया।।

रमेशचंद मनयां जैन

भोपाल
पुलकवाणी

फरवरी २०१५