ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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आत्मनिन्दा सबसे बड़ा प्रायश्चित्त है

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आत्मनिन्दा सबसे बड़ा प्रायश्चित्त है

लेखिका - आर्यिका श्री चंदनामती माताजी
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त्रिशला—बहन मालती ! आज आप बे टाइम कहां जा रही हैं ?

मालती—आज चतुर्दशी है न। मैं मंदिर जा रही हूं वहीं पर आर्यिका माताजी आज पाक्षिक प्रतिक्रमण कर रही होंगी।

त्रिशला—तो तुम वहां जाकर क्या करोगी ? साधु का कार्य साधु को करने दो। आओ, हम लोग तो आज पिक्चर चलेंगे।

मालती—नहीं बहन! मै तो अपने १५ दिन के दोषों का प्रायश्चित लेने जा रही हूं। मै चतुर्दशी को पिक्चर देखने कभी नहीं जाती।

त्रिशला—अरे वाह! आजकल तुम तो बड़ी भक्तन बन गई हो। अरे, गृहस्थी लोग तो प्रतिदिन न जाने कितने पाप करते हैं। कहां तक प्रायश्चित लेते रहेंगे।

मालती—अच्छा, यह बताओ कि तुम एक दिन स्नान करती हो फिर दूसरे दिन स्नान की जरूरत क्यों पड़ती है?

त्रिशला—क्योंकि चौबीस घन्टे में शरीर फिर गन्दा हो जाता है।

मालती—तो क्या हुआ! होने दो गन्दा। बार-बार घिसने, रगड़ने से क्या फायदा। वह तो फिर गन्दा होगा ही।

त्रिशला—नहीं बहन! कहीं ऐसा भी होता है। आप दूसरे दिन की बात करती हैं मैं तो दिन मे दो बार स्नान करती हूं तब कहीं साफ—सुथरी दिखती हूँ, वर्ना तो शरीर से दुर्गन्ध सी आने लगती है।

मालती—हां, इसी प्रकार से आत्मा की सफाई के लिए भी प्रतिदिन या कम से कम १५ दिन में भगवान अथवा गुरू के पास आत्मनिन्दा करके प्रायश्चित्त लेना ही चाहिए। देखो बहन! मैं तुम्हें एक पौराणिक कथा सुनाती हूं कि एक महिला ने आत्मनिन्दा से कितना गौरव प्राप्त किया।

त्रिशला—ठीक है। मैं भी आज पिक्चर का कार्यक्रम कैंसिल करके आपकी कथा अवश्य सुनूंगी।

मालती—सुनो! बनारस के राजा विशाखदत्त थे। उनकी रानी का नाम कनकप्रभा था, राजदरबार में एक चितेरा रहता था जो चित्रकला का बड़ा अच्छा जानकार था। इस चित्रकार की एक बुद्धिमती नाम की बेटी थी। एक दिन बुद्धिमती अपने पिता चित्रकार के लिए भोजन लेकर आई। उसने विनोदवश दीवार पर एक मोरपंख की पीछी का चित्र बना दिया। राजा ने जब वह चित्र देखा, उसे सच्ची पीछी समझकर उठाने के लिए आगे बढ़े।

त्रिशला—अच्छा, तो इतना बेवकूफ था वह राजा ?

मालती—वह चित्र इतना सुन्दर बना ही था कि जो भी देखता वही सचमुच की पीछी समझ लेता था। पर सुनो। जैसे तुमने उस राजा को बेवकूफ कहा, वैसे ही बुद्धिमती ने भी राजा को नासमझ ही समझा।

दूसरे दिन बुद्धिमती ने एक सुन्दर चित्र के बहाने दीवार पर दो परदे लगा दिए। जब राजा चित्र देखने आए तब उसने एक परदा उठाया, उसमें चित्र न था। तब राजा दूसरे परदे की ओर चित्र की आशा से आंखे फाड़कर देखने लगा। बुद्धिमती ने दूसरा परदा भी उठा दिया। तब चित्र को न देखकर राजा बड़ा र्शिमन्दा हुआ। राजा की इन चेष्टाओं से उसे पूरा मूर्ख समझ बुद्धिमती ने जरा हँस दिया। तब राजा और भी अचम्भे में पड़ गया। वह बुद्धिमती के अभिप्राय को समझ न सका।

त्रिशला—एक थप्पड़ लगा देना था राजा को, भला राजा को हँसने की उस छोकरी ने हिम्मत कैसे की ?

मालती—न्याय तो यही था। थप्पड़ नहीं तो डांट तो लगा ही सकते थे लेकिन बहन, राजा भी उसके रूप पर मोहित हो गए थे।

त्रिशला—अच्छा-ऽऽ ! तो यह बात थी। फिर आगे क्या हुआ ?

मालती—फिर उसने उसके साथ विवाह कर लिया। धीरे—धीरे राजा उसके मोहपाश में इतना पंâस गया कि उसे सब रानियों में पट्टरानी बना दिया। देखो! संसार में व्यक्ति के गुण ही उन्हें उन्नति के मार्ग पर पहुँचा देते हैं। राजा ने उसे पट्टरानी बना तो दिया किन्तु उससे सब रानियां बुद्धिमती की शत्रु बन गई ; जिसका नतीजा यह निकला कि वे बुद्धिमती को सताने लगीं।

त्रिशला—तब तो बुद्धिमती ने राजा से शिकायत कर दी होगी ?

मालती—नहीं, यही तो बात है कि उसने राजा से एक शब्द भी नहीं कहा। इस कष्ट और चिन्ता से वह मन ही मन घुलकर सूख सी गई। शिकायत तो वह राजा से कर सकती थी और राजा बार—बार उससे दुर्बलता का कारण भी पूछते थे किन्तु वह सोचती थी कि मेरे निमित्त से इन रानियों को कष्ट होगा, राजा उन्हें डाँटेंगे।

त्रिशला—इसका मतलब वह बड़ी सहनशील महिला थी। वैसे वह स्वयं तो पट्टरानी बनी नहीं थी, राजा ने अपनी इच्छा से बनाया था। तब तो उसका पूरा अधिकार था सब पर अनुशासन करने का।

मालती—हाँ था तो सही, लेकिन उसने कर्मसिद्धान्त समझ रखा था। अतः जिनमंदिर में जब दर्शन करने जाती तो भगवान के सामने अपने पूर्व कर्मों की निन्दा करती और प्रार्थना करती कि हे तीन लोक के नाथ! हे दया के सागर! मैंने पूर्वजन्म में कुछ ऐसे पाप किए हैं जिससे मुझे यहां कष्ट मिल रहा है। पर नाथ, इसमें दोष किसी का नहीं, मेरे ही पूर्व जन्म के पापों का उदय है। प्रभो, जो भी हो मुझे विश्वास है कि आपको जो हृदय से चाहता है, उसके सब कष्ट बहुत जल्दी नष्ट हो जाते हैं। मेरा भी कष्ट आप दूर करेंगे ही। इस प्रकार से वह प्रतिदिन भगवान के पास आत्मनिंदा करती और धैर्यपूर्वक कष्ट सहन करती।

त्रिशला—तब तो उसका कष्ट जरूर दूर हो गया होगा ?

मालती—भगवान तो खैर क्या करते। वे तो वीतरागी होते हैं। राजा ने एक दिन सोचा कि मेरी पट्टरानी के कष्ट का पता अवश्य लगाना चाहिये। बुद्धिमती प्रतिदिन की तरह आज भी मन्दिर गई थी। राजा उसे बिना बताए पहले ही मन्दिर गया था वह देखने लगा कि यह क्या—क्या पढ़ती है। भगवान के सामने बुद्धिमती ने पूर्व की भांति ही आत्मनिन्दा के शब्द कहना प्रारभ्भ किया। राजा ने वह सब सुन लिया। सुनकर वह सीधा अपने महल आया और अपनी सब रानियों को खूब फटकारा और बुद्धिमती को ही उनकी मालकिन—पट्टरानी बनाकर उन सबको उसकी सेवा के लिए बाध्य किया, तबसे वह सुखपूर्वक रहने लगी। उसके बाद उन रानियों ने उसे कभी कष्ट नहीं दिया।

त्रिशला—तो बहन! इसीलिए आप कहती हैं कि रोज मन्दिर में जाकर अपने दोषों की आलोचना करना चाहिए ?

मालती—हां, यह तो है ही । जैसे शरीर की शुद्धि के लिए प्रतिदिन स्नान किया जाता है उसी प्रकार से आत्मा को शुद्ध बनाने के लिए आचार्यों ने प्रायश्चित, विनय, वैयावृत्य आदि तप बताए हैं। इनको करते रहने से कम से कम कर्मों का कुछ भार तो हल्का होता ही है इसीलिए साधुगण तो दिन में दो बाद प्रतिक्रमण,तीन बार सामायिक प्रतिदिन करते हैं, इसके अतिरिक्त कोई छोटे—बड़े दोष हो जाने पर गुरू के सामने सारी बातें सच—सच बताकर स्वयं की आलोचना करते हैं और प्रायश्चित लेते हैं।

त्रिशला—तब तो मैं भी आपके साथ प्रत्येक चतुर्दशी को गुरू के पास चलकर अपने दोषों की आलोचना अवश्य किया करूंगी।

मालती—ठीक है। हमको, आपको और सभी को गुरू के सामने भक्तिपूर्वक आत्मनिंदा—आलोचना करना चाहिए यदि कदाचित् गुरू नहीं मिल सके तो भगवान के सामने अवश्य ही करना चाहिए ताकि कम से कम आत्मा में जो कर्मों की मैली पर्तें चढ़ी हैं वे तो हल्की होती जाएं और नवीन कर्मों का बन्ध भी अल्प होता रहे।

त्रिशला—सत्य है बहन! कर्मों के बन्ध से बचने के लिए हमें अपने दोषों की आलोचना करना ही चाहिए।

धन्यवाद! चलो अब चलें......।