ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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आत्मानुभव :

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आत्मानुभव :

आतम अनुभव पूâल की, नवली कोऊ रीति।

नाक न पकरै वासना, कान गहै न परतीति।।

—आनंदघन ग्रंथावली, पद :: २८

आत्मानुभव रूपी पुष्प की विलक्षणता ही कुछ निराली है। इसकी सुगंध को न नाक ग्रहण कर पाती है और न कान इसका संगीत सुन सकते हैं।

आतम अनुभौ रस कथा, प्याला अजब विचार।

अमली चाखत ही मरै, घूमै सब संसार।।

—आनंदघन ग्रंथावली, पद :: ५३

आत्मानुभव रूप रस का प्याला एक ऐसा विलक्षण रस का प्याला है, जिसका आस्वादन करते ही, व्यक्ति आत्मानुभव में लीन हो जाता है। जिसने इस रस का पान नहीं किया, वह इस संसार में ही भटकता रहता है।