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आत्मा का आनंद किनको आता है?

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आत्मा का आनंद किनको आता है?

जायंते विरसा रसा विघटते गोष्ठीकथा कौतुकं,

शीर्यन्ते विषयास्तथा विरमति प्रीति: शरीरेपि च।
जीषं वागपि धारयत्यविरतानन्दात्म शुद्धात्मन:,

चिन्तायामपि यातुमिच्छति समं दोषैर्मन: पंचताम्।

नित्य आनन्दस्वरूप शुद्ध आत्मा का चिंतवन करने पर रस नीरस हो जाते हैं, परस्पर वार्तालापरूप कथा का कौतूहल नष्ट हो जाता है, विषय समाप्त हो जाते हैं, शरीर के विषय में भी प्रेम नहीं रहता है, वचन भी मौन को धारण कर लेते हैं तथा मन भी दोषों के साथ मृत्यु को प्राप्त करना चाहता है अर्थात् आत्मा के अनुभव आने पर ये सब विषय स्वयं समाप्त हो जाते हैं।

यह अवस्था विशेष महामुनियों के ध्यान में ही हो सकती है। विषयों में फंसे हुए गृहस्थों के कभी संभव नहीं हो सकती।