ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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आत्मा का परिमल

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आत्मा का परिमल

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-ब्र. विद्युल्लता श्री हीराचंद शहा, सोलापुर

स्मृतियों का मूल्याकंन वर्तमान में पश्चाताप के सिवाय नहीं किया जाता। ‘‘अतीत’’ को स्मृति मंजूषा के बाहर निकालना ऐसा ही सुखद ज्ञान होता है कि मानों स्वाति नक्षत्र का जल बिन्दु जम जाने पर सीप से बाहर लाना। स्व. १०८ पू. आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज की पावन, प्रेरक, उद्धारक, स्मृतियाँ असंख्य महान जीवों ने ग्रंथ रूप में जीवनपट पर सुवर्णांकित की हैं। इन भाग्यशीलों में स्व. आर्यिका चन्द्रमती माताजी भी थीं। संयम से सुगंधित पुष्प के संपर्क से मिट्टी-सा मेरा जीवन भी सुरभित हो गया। पूज्य आचार्यश्री की समाधि के बाद पूज्य चन्द्रमती जी ने एक संस्मरण मुझे लिखा था। आचार्यश्री वीरसागर महाराज का चौमासा कारंजा नगर में था, तब की बात है। गृहावस्था से निवृत्त होने के भाव ज्ञात होने पर आचार्यश्री ने दीक्षा के लिए प्रेरणा दी। तब माताजी ने ७वीं प्रतिमा की याचना की।

महाराज जी ने आगे न बढ़ने के कारण मीमांसा छेड़ी। माताजी ने कहा, ‘मेरी लड़की सोलापुर श्राविकाश्रम में पढ़ती है, उसने आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत लिया है, उसकी देखभाल कौन करेगा ?’’ अनुभवी और विचारक गुरुवर्य ने सुन लिया। गंभीरता से मौन हुए। विशेष काल की परीक्षा मानो उनका विशेष गुण था। एक दिन फिर महाराज जी माताजी को कहने लगे-‘‘माँ-बेटी मिलकर आगे बढ़ना होगा।’’ उन्होंने मर्म की चार बातें खोलकर समझाया। ‘‘आत्मानुभूति के लिए ४ अनमोल चीजों पर हमेशा ध्यान खींचना आवश्यक है। १. आठों कर्मों में मोहनीय पर विजय, २. पंच महाव्रतों में शील व्रत, ३. पाँचों इन्द्रियों में रसनेन्द्रिय जीतना, ४. तीनों गुप्तियों में मनगुप्ति की सम्हाल। ये चार चीजें मुक्ति पाने में सहायक हैं। चार में अगर एक भी सम्पन्न हो, तो मुक्ति महल की चाबी खोजने में कष्ट नहीं। इसीलिए तुम्हारी लड़की का शीलरत्न का जतन तुम्हें कुछ दिन करना चाहिए, क्योंकि दुनिया में विकारो के चोर बेमालूम घूमते फिरते हैं।’’ आचार्यश्री का जीवन इन चारों किरण रत्नों से सूरज के समान तप:पूत था। माताजी ने महाराजश्री के शब्द डायरी के पन्ने पर अंकित किये, जिन्हें पढ़कर आत्मिक परिमल से आत्मा प्रसन्न होती है।

१९५६ की दीवाली की छुट्टी थी। जयपुर के खानिया मंदिर में पूज्य १०८ वीरसागर जी को आचार्यपद का किरीट कुंथलगिरि से चारित्रचक्रवर्ती आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज ने यम सल्लेखना के पूर्व ही भेजा था। वीरसागर जी के मानस पुत्र ब्र. सूरजमल जी ने बड़ी धूमधाम से गौरवपूर्ण समारोह आयोजित किया था। नूतन आचार्यश्री १०८ श्री वीरसागर जी के दर्शन की तमन्ना लेकर माताजी (ब्र. माणिकबाई) वहाँ पहुँचीं। मुझे भी शिक्षा परिषद का कारण मिला। पहली बार माँ के साथ मैंने पूज्य आचार्यश्री को ससंघ देखा। दर्शन मात्र से संघस्थ साधुवृंद की तपस्यापूर्ण ज्ञान प्रवृत्ति का, विरागी भावों का परिचय हुआ।

महाराज श्री ने मुझसे पूछा - ‘‘माँ को छुट्टी देने आई हो ? पढ़ाई पूरी हो गई ? अब माँ को आगे बढ़ने के लिए इजाजत चाहिए। ना समझ में कुछ भी अर्थबोध नहीं हुआ। मैं तो किसी शिक्षा परिषद एवं नये शहर की सैर के चक्कर में आकर गई थी। किन्तु, ‘‘माताजी’’ तो खास ठोस उद्देश्य लेकर मेरे पीछे जयपुर पधारी थीं। दिनभर संघस्थ साधुवर्ग तथा आचार्यश्री के साथ सलाह मसलत ने उनके पल्ले इष्ट चीज डाली। धीरे-धीरे माँ की ‘‘दीक्षा’’ सुनकर मेरा दिल धड़कने लगा। संघस्थ वातावरण विचारक, ज्ञानपिपासु, भव भय पीड़ितों के लिए लुभावना था। मेरे जैसे मोही अज्ञों के लिए प्रथम भीषण-मेसूर लगा। अज्ञान तिमिरांध ज्ञानांजन से दूर हो जाता है। मेरी आँखें खुल गर्इं, मैं भी संघस्थ मुनि, आर्यिका के पास बैठने लगी। खानियां में शाम सुबह दोपहर आठों पहर मानों प्रौढ़ स्वाध्याय की पाठशाला चलती थी। स्व. पूज्य शिवसागर जी, क्षु. चिदानंद जी (मुनिश्री श्रुतसागर जी), आर्यिका वीरमती जी, ज्ञानमती जी, सुमतिमती जी, ब्र. भंवरीबाई जी (आर्यिका सुपाश्र्वमती माताजी) आदि शिष्यगण स्वाध्याय तत्त्व चर्चा में ऐसे मग्न थे कि मानों परीक्षार्थी छात्र परीक्षा के समय रात का दिन बनाकर अध्ययन में रंग भरते हैं। अन्तर इतना ही मालूम होता था कि ये तपस्वी त्यागीगण ‘‘अन्ते वासिन्’’ शब्द की सार्थकता स्पष्ट करके जीवन का क्षण सुवर्णांकित करके आजन्म ज्ञान की साधना द्वारा वे आत्मानुभूति के लिए कटिबद्ध थे। परीक्षार्थी ऊपरी मल्हम पट्टी द्वारा क्षणिक पीड़ा भूलने की चेष्टा करते हैं। आचार्यश्री स्वयं एक आसन लगाकर लगातार आठों पहर ज्ञान ध्यान तपरोक्त तपस्वी के आत्म निर्भर जीवन के अपूर्व आनंद में मस्त थे। आंतरिक भावपूर्ण आत्म विशुद्धि का चिन्ह बाह्य महाव्रतादिकों की क्रियाएँ सहज दिखाई देती थीं। भावलिंग की गुप्त महामुद्रा में द्रव्यलिंग प्रस्पुटित हो रहा था। प्रतिक्रमणादि क्रियाएँ, अहिंसादि व्रतों की साधना आत्म साधना का उद्देश्य लेकर हो रही थी।

स्व. पं. खूबचंद जी जैसे उद्भट प्रकांड विद्वानों के प्रवचन सैद्धान्तिक, आध्यात्मिक तथा चारों अनुयोगों का मर्म खोलकर प्रभावी होते थे। वहाँ संक्षेप में ज्ञान वैराग्य शक्ति का साम्राज्य था। पाखंड, मिथ्या, हठवादीपना के लिए गुंजाइश मात्र स्थान नहीं था। एक दिन दोपहर में आचार्यश्री से मौका पाकर मैंने प्रश्न किया-‘‘आपके पास सारे प्रश्न क्यों लाते हैं ?’’ महाराज जी ने समझाया, ‘‘बेटी, गुरु को सताये बिना काम नहीं चलेगा। माँ को बच्चा जब सताता है, तभी माँ उसे पिलाती-खिलाती है; नहीं तो अपने ही काम में उसे देखती कहाँ है ?’’ फिर आचार्यश्री ने कहा, ‘‘तेरी माँ पहले दीक्षा लेना चाहती है, बाद में तुझे वह कुछ कह सकती है।’’ अधिक गुड़ खाने वाले नटखट लड़के से तंग आने वाली माँ की कहानी इतनी परिणाम कारक सुनाई कि मुझे चुप होने के सिवाय चारा ही न रहा था। मेरी श्रद्धा तथा भाव समझकर आचार्यश्री ने दूसरी प्रतिमा का व्रत सहज पालने की प्रेरणा दी। बाहरी नियम बंधनों का डर भगाया। उन्होंने यही कहा था कि भाव चारित्र की ज्योति जागने पर प्रतिमादिक बहिरंग क्रियाएँ सहज ही होती रहेंगी। उसके लिए कष्ट ज्ञान नहीं होते। इसलिए आचार्यश्री द्वारा कितने ही मुनि, आर्यिकाओं ने अपनी आत्मिक ज्योति उनकी जीवन ज्योति से प्रज्ज्वलित की।

मेरी साथी प्रभावती बेन (सुप्रभामती आर्यिका) के साथ खजांची की नशिया, जयपुर में एक महीना रहने का सौभाग्य मिला। आचार्यश्री को आहार देते ही भाव प्रसन्न होते थे। वे आहार क्या लेते ? केवल दो चीजें गेहूँ और दूध काम में आता था। शोधन करने पर ही मानों उनका लक्ष्य आहार के अलावा अपनी त्रिकाल ध्रुव परिणति पर केन्द्रित था। आहार लेने की क्रिया हो रही थी, पर कैसी ? कमल का भ्रमर ने स्वाद लिया, इसका पता ही कहाँ? स्वाध्याय ध्यानरत मूर्ति को देखकर अन्तरंग की जिज्ञासा जागती थी। जितेन्द्रिय वृत्ति का प्रतिबिम्ब दर्शकों के मानस-दर्पण में सहज ही अंकित होता था।

२३ सितम्बर १९५७ की डायरी देखती हूँ ‘‘गुरु वियोग का महान् दु:ख, रात भर नींद नहीं। मन उदास हुआ, किन्तु अन्तर में महान ज्योति का आलोक दिखाई पड़ा। समाधि मग्न वह आत्मा महान् थी। शान्त परिणामों की झलक अन्त में दिखाई पड़ी। शरीर हड्डी चर्म का ढांचा बाकी था। पं. खूबचंद जी तथा सूरजमल जी ने पूछा-‘‘क्या कुछ इच्छा है ?’’ जवाब मिला-‘‘मैंने आचार्य पद त्याग दिया है। अखण्ड शुद्ध चैतन्यधाम आत्मा मैं हूँ।’’ सबको जाने का इशारा किया। जीभ सूखी लकड़ी जैसी होने पर भी आत्मानन्द के रस में वह आत्मा में अपूर्व आनन्द का स्वाद लेकर प्रसन्न हो रही थी। आत्मनिर्भरता का और एक चिन्ह यह, कि अन्त में किसी से वैयावृत्य या परिचर्या करने कराने का विकल्प तक नहीं आया। जीवन की परीक्षा में सुयश पाया। स्व.पू. आचार्य महावीरकीर्ति जी की दक्षता में, भावपूर्वक, समाधिमरणपूर्वक देह त्यागा और आत्मा का अपूर्व परिमल चारों ओर पैâलाया। आचार्यश्री यथा नाम तथा गुण ‘‘वीरसागर’’ हुए। जीवन का हरेक क्षण असंख्य भाग्यशाली भव्य जीवों ने उठाकर अपने जीवन में मानो उतार दिया, क्योंकि हरेक व्यक्ति का दिल कहता है- ‘‘वे गुरु मेरे उर बसहु।’’