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आत्म—प्रशंसा :

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आत्म—प्रशंसा :

अप्पसंसं परिहरह सदा मा होह जसविणासयरा।

अप्पाणं थोवंतो तणलहुदो होदि हु जाणम्मि।।

—भगवती आराधना : ३५९

आत्म—प्रशंसा का सदा के लिए त्याग कर देना चाहिए। कारण यह कि आत्म प्रशंसा यश को नष्ट करने वाली है। स्वयं अपनी प्रशंसा करने वाला संसार में तिनके की तरह तुच्छ हुआ करता है।

मा अप्पयं पसंसइ जइ वि जसं इच्छसे धवलं।
—कुवलयमाला

यदि निर्मल यश चाहते हो तो अपनी प्रशंसा मत करो।