ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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आदर्शों को अपना लूँ

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आदर्शों को अपना लूँ

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रचयित्री-श्रीमती मालती जैन, बसंतकुंज, दिल्ली
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इस जग में मां की ममता हर किस्मत वालों को मिलती है।

माँ होकर भी ममता न मिले यह बात अजब सी लगती है।।
बस इसी कहानी का चित्रण इक ग्रंथ रूप बन जाता है।
जहँ नहीं ‘मालती’ ममता का, केवल समता ही नाता है।।१।।

अपने-अपने बच्चों की माँ हर घर-घर में दिख जाती हैं।
पर घर में बच्चों को छोड़ा खुद बेघर बन हरषाती हैं।।
देखो तो! खुद के बच्चों का माँ कहने पे अधिकार नहीं।
जग की माता कहलाती हैं अपने बच्चों से प्यार नहीं।।२।।

दुनिया की हर बेटी अपनी माता को माता कहती है।
पर बेटी को माता कहकर माँ छोटी बनकर रहती है।।
ये ऐसी अद्भुत बातें हैं हर कोई समझ नहीं सकता।
मैं इनको कैसे लिख सकती ब्रह्मा भी परख नहीं सकता।।३।।

शब्दों को मैं कैसे रोकू, जो लिये खड़े हैं कर में माल।
‘‘रत्नमती माँ’’ के चरणों में झुका रहे हैं अपना भाल।।
पुष्प ‘मालती’ के चुन लाई लेकिन सुन्दरता कितनी है।
नहीं जानती सौरभ कितनी (फिर भी) लिखती हूँ मेरी जननी है।।४।।

धन्य धरा उस अवध प्रान्त की जिस माटी से फुल खिला ये।
मात-पिता भी धन्य हो गये जिनको सुख सौभाग्य मिला ये।।
भारत माँ झुक गई चरण में मेरा है माँ शृँगार आपसे।
इन गौरवशाली पृष्ठों का बढ़ता है माँ सम्मान आपसे।।५।।

नाम ‘मोहिनी’ सुन्दर था और थीं भी तुम इसके अनुकूल।
लेकिन ‘मैना’ की दीक्षा से मन में थी भारी सी शूल।।
गृह बंधन से कैसे मुक्ती मिले हमेशा यही सोचती।
घर में रहकर भी ऐसे थीं जैसे रहे सीप में मोती।।६।।

गृह बन्धन यद्यपि असार है फिर भी सार्थक हुआ आपसे।
‘ज्ञानमती’ सा रत्न मिला इस भूतल को वरदान आपसे।।
बच्चों को ऐसी शिक्षा दी रुक न सके धन वैभव में भी।
सबने कदम बढ़ाना चाहा त्याग मार्ग पर शैशव में ही।।७।।

दान-मान सम्मान बाँटने की अद्भुत थी तुममें क्षमता।
हर गरीब की आवश्यकता पर सदा लुटाई तुमने ममता।।
कहती थीं ये फर्ज हमारा हम क्या कर सकते हैं दान।
मिल कर रहें बाँट कर खायें जीवन का यह लक्ष्य महान।।८।।

दिया हुआ कुछ कितने दिन तक कर सकता किसको आबाद।
लेकिन रह जाती हैं यादें और गरीबों की फरियाद।।
इससे ऊँचा उठता मानव मिट जाता है दुख संताप।
मुट्ठी भर दोगे पहाड़ सम मिल जाता है अपने आप।।९।।

घर में रहकर भी चतुराई और धर्म का जो आलम।
मिल पायेगा मुश्किल से ही सुन्दरता का वो कालम।।
श्रद्धा ज्ञान विवेक त्रिवेणी के संगम की मूरत थीं।
शुद्ध आचरण की शिक्षा की सबसे बड़ी जरूरत थीं।।१०।।

जीवन को आदर्श बनाने की पहली आधार शिला।
‘खानदान शुद्धी’ मिल जाये जो की अपने आप मिला।।
दूजी थोड़ा कष्ट साध्य है खानपान से शुद्धी हो।
जिसके घर में यह मिल जाये, समझो अच्छी बुद्धी हो।।११।।

चाह जहाँ है राह वहाँ पर ऐसा सुनती थी मैं अब तक।
दीक्षा के दिन देख रही मैं रोक रहे घर वाले जब सब।।
आखिर जीत हुई विराग की ‘‘धर्मसिंधु’’ का वो दरबार।
‘‘रत्नमती जी’’ नाम रख दिया छुटा मोहिनी का संसार।।१२।।

ममता की तुम मूरत थीं औ थीं शरीर से बिल्कुल नाजुक।
लिया आर्यिका का दुद्र्धर व्रत जग वाले सब करते ताज्जुब।।
शान्ति साधना की साधक बन समता की जो सीख सिखाई।
धर्म अर्थ अरु काम मोक्ष की सही दिशा तुमने अपनाई।।१३।।

दुनियाँ की हर शक्ती माँ तेरे चरणों में नतमस्तक है।
ऐसी माता मिले ‘‘मालती’’ मुक्ति नहीं मिलती जब तक है।।
इस भव की सुख शांती में ही जिनका केवल ध्यान नहीं है।
परभव में क्या संग जायेगा सिखा रही पहचान रही हैं।।१४।।

शब्द ‘मालती’ की यह माला चरणों में अर्पण करती हूँ।
हमको भी यह शक्ती दो माँ बार-बार वंदन करती हूँ।।
जिस पथ पर हैं कदम आपके मैं भी उस पर कदम बढ़ा लूँ।
जीवन यह पाया तुमसे है आदर्शों को भी अपना लूँ।।१५।।