ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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आदिपुराण में वर्णित आर्यिकायें

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आदिपुराण में वर्णित आर्यिकायें

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प्रस्तुति - गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी

आर्यिका ब्राह्मी-सुन्दरी - भगवान् ऋषभदेव को केवलज्ञान प्राप्त होने के बाद उनकी पुत्री ब्राह्मी१ जो कि भरत की छोटी बहन थी उन्होंने भगवान के समवशरण में सर्वप्रथम आर्यिका दीक्षा ग्रहण की थी। ब्राह्मी की छोटी बहन सुन्दरी ने भी दीक्षा ग्रहण कर ली थी। ये ब्राह्मी आर्यिका तीर्थंकर ऋषभदेव के समवशरण में तीन लाख, पचास हजार आर्यिकाओं में प्रधान गणिनी हुई थीं।

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विदेहक्षेत्र की आर्यिकायें

विदेहक्षेत्र में एक पुण्डरीकिणी नाम की नगरी है। वहाँ के राजा वज्रदंत चक्रवर्ती थे। इनकी लक्ष्मीमती रानी से श्रीमती कन्या का जन्म हुआ था। इसी जम्बूद्वीप के पूर्वविदेह में पुष्कलावती देश है। उसमें उत्पलखेट नगर के राजा वज्रबाहु की रानी वसुन्धरा के वङ्काजंघ नाम का पुत्र हुआ था। इन वज्रजंघ के साथ चक्रवर्ती की कन्या का विवाह हुआ था। ये वज्रजंघ इस भरतक्षेत्र के आर्यखण्ड में युग की आदि में धर्मतीर्थ के प्रवर्तक ऋषभ तीर्थंकर हुए हैं और श्रीमती का जीव हस्तिनापुर के राजकुमार दानतीर्थ के प्रवर्तक श्रेयांसकुमार हुए हैं। चक्रवर्ती वज्रदंत ने विरक्त होकर यशोधर तीर्थंकर के शिष्य गुणधर मुनि के समीप जाकर अपने पुत्र, स्त्रियों तथा अनेक राजाओं के साथ जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण की थी। महाराज वज्रदंत के साथ साठ हजार रानियों१ ने, बीस हजार राजाओं ने और एक हजार पुत्रों ने दीक्षा धारण की थी। उसी समय श्रीमती की सखी पंडिता ने भी अपने अनुरूप दीक्षा धारण की थी-व्रत ग्रहण किए थे। वास्तव में पांडित्य वही है जो संसार से उद्धार कर दे।

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गणिनी आर्यिका अमितमती

इस जम्बूद्वीप के पूर्वविदेह क्षेत्र में एक पुण्डरीकिणी नाम की नगरी है, जो कि पुष्कलावती देश के मध्य में स्थित है। उस नगरी के राजा का नाम प्रजापाल था। राजा का कुबेरमित्र नाम का एक राजश्रेष्ठी था। कुबेरमित्र के धनवती आदि बत्तीस स्त्रियाँ थीं। इन सेठ के महल में एक कबूतर-कबूतरी का जोड़ा था जिनका नाम रतिकर और रतिषेणा रक्खा था। कुबेरदत्त के धनवती स्त्री से एक पुत्र हुआ था जिसका नाम कुबेरकान्त रखा गया था। इस कुबेरकांत का एक प्रियसेन नाम का मित्र था। उसी नगर में एक समुद्रदत्त सेठ था। इनकी बहन धनवती कुबेरमित्र को ब्याही थी और कुबेरमित्र की बहन कुबेरमित्रा इन समुद्रदत्त की भार्या थी। समुद्रदत्त सेठ के प्रियमित्रा आदि बत्तीस कन्यायें थीं।

कुबेरमित्र के पुत्र कुबेरकांत के साथ समुद्रदत्त सेठ ने अपनी प्रियदत्ता पुत्री का विवाह कर दिया। इस विवाह के समय ही विरक्त होकर राजा प्रजापाल की पुत्री गुणवती और यशस्वती ने आर्यिका अमितमती२ और अनंतमती के समीप दीक्षा धरण कर संयम ग्रहण कर लिया था। कुछ समय बाद राजा प्रजापाल ने भी अपने पुत्र लोकपाल को राज्य देकर शीलगुप्त मुनि के पास संयम धारण कर लिया तब उनकी कनकमाला आदि रानियों ने भी दीक्षा ले ली थी। किसी समय अमितमती और अनन्तमती दोनों गणिनी आर्यिकायें जो कि गृहस्थाश्रम में जगत्पाल चक्रवर्ती की पुत्री थीं सो अपनी संघस्थ आर्यिका यशस्वती और गुणवती के साथ यहाँ पुण्डरीकिणी नगरी में आई। आर्यिका के समाचार को विदित कर राजा लोकपाल और सेठ कुबेरकांत सभी लोग अपनी भार्याओं के साथ उन आर्यिकाओं के दर्शन के लिए वहाँ आये। उपदेश सुना, तत्पश्चात् उन्हें आहारदान आदि दिया। उन लोगों ने बहुत दिनों तक आर्यिकाओं से समीचीन धर्म का उपदेश प्राप्त किया तथा दान आदि शुभ कार्यों में प्रवृत्ति की। एक दिन कुबेरकांत के घर दो जंघाचारण मुनि पधारे। उस समय कुबेरकांत आदि ने बड़ी भक्ति से उनका पड़गाहन किया। उन मुनियों के दर्शन मात्र से ही कबूतरी को जातिस्मरण हो गया जिससे कबूतर युगल ने अपने पंखों से मुनिराज के चरण कमलों को स्पर्श कर उन्हें नमस्कार किया और परस्पर की प्रीति छोड़ दी। यह देखकर उन मुनियों को भी संसार की स्थिति का विचार करते हुए वैराग्य हुआ और वे बिना आहार किए ही सेठ के घर से वापस चले गए। जब राजा लोकपाल को मुनि के इस प्रकार चले जाने का कारण विदित नहीं हुआ, तब उसने गणिनी अमितमती आर्यिका के पास जाकर विनय से इसका कारण पूछा। अमितमती ने भी जैसा सुना था वैसा सुनाना शुरू किया- इसी विदेह क्षेत्र के पुष्कलावती देश में जो विजयार्ध पर्वत है, उसके निकट के वन के पास एक शोभानगर नाम का विशाल नगर है। वहाँ के राजा का नाम प्रजापाल और रानी का नाम देवश्री था। उस राजा के सामंत का नाम शक्तिषेण था और उसकी पत्नी का नाम अटवीश्री था। इन दोनों के एक पुत्र था जिसका नाम सत्यदेव था। इन सभी ने मेरे द्वारा धर्मोपदेश सुनकर मांस और मदिरा का त्याग कर दिया। शक्तिषेण ने यह नियम कर लिया कि मैं मुनियों के आहार का समय टालकर भोजन करूँगा। अटवीश्री ने अनुप्रबुद्ध कल्याण नाम का उपवास व्रत ग्रहण कर लिया तथा सत्यदेव ने साधुओं की स्तुति करने का नियम ले लिया। एक दिन शक्तिषेण मृणालवती नगरी के समीप सर्पसरोवर के तट पर ठहरा हुआ था। उसी समय एक घटना घटी सो इस प्रकार है-उस मृणालवती में एक सेठ का नाम सुकेतु था। उसकी भार्या का नाम कनकश्री था। इनके पुत्र का नाम भवदेव था किन्तु दुराचारी होने से उसे लोग दुर्मुख कहते थे। उसी नगर में श्रीदत्त सेठ थे उनकी सेठानी विमलश्री के रतिवेगा कन्या थी। यह दुर्मुख उस रतिवेगा से विवाह करना चाहता था किन्तु उसके माता-पिता ने यह कन्या सुकांत को ब्याह दी थी। दुर्मुख ने कुपित हो इन दोनों सुकांत और रतिवेगा को मारना चाहा तब ये दोनों डर कर भागे और सरोवर के तट पर ठहरे हुए शक्तिषेण के पास आ गये। यह देखकर वह दुर्मुख वापस चला गया।

इधर शक्तिषेण ने एक दिन दो चारणमुनियों को आहारदान देकर महान पुण्य संचित कर लिया था। दान की अनुमोदना से सुकांत और रतिवेगा ने भी बहुत बड़ा पुण्य प्राप्त कर लिया था। उसी के पास में एक मेरुकदत्त सेठ अपनी धारिणी भार्या और भूतार्थ, शकुनि, बृहस्पति तथा धन्वन्तरि इन चार मन्त्रियों के साथ आकर वहाँ ठहर गए थे। एक दिन ये सभी वहाँ वार्तालाप करते हुए बैठे थे कि इतने में ही वहाँ एक विकलांग पुरुष आया। उसे देखकर सेठ ने मंत्रियों से उसके हीन अंग होने का कारण पूछा। वे लोग अपनी-अपनी बुद्धि की चतुरता से कुछ न कुछ कारण बता रहे थे तभी उसका पिता खोजते हुए वहाँ आ गया। जब वह पुत्र उसके साथ नहीं गया तब उसने विरक्त होकर दीक्षा ले ली, अन्त में सन्यास विधि से मरण कर लोकपाल हो गया। उधर दुर्मुख ने एक दिन समय पाकर सुकांत और रतिवेगा को जलाकर मार डाला तब वे दोनों मरकर सेठ कुबेरकांत के घर में कबूतर-कबूतरी हुए हैं१। सेठ मेरुकदत्त और उनकी पत्नी ने भी दीक्षा ले ली थी। वे ही इस पर्याय में कुबेरकांत के माता-पिता हुए हैं और शक्तिषेण का जीव कुबेरकांत हुआ है। शक्तिषेण ने पूर्वजन्म में सर्पसरोवर के निकट डेरे में जिन दो चारण मुनियों को आहार दिया था वे ही मुनिराज इस समय कुबेरकांत के यहाँ आये थे किन्तु इन्हें कबूतर युगल को देखकर दया उत्पन्न हो गई इसलिए वे निराहार ही वापस चले गए हैं। उन्हीं के उपदेश से यह भवावली मैंने तुम्हें सुनाई है। इस पूर्वभव के विस्तार को सुनकर कुबेरमित्र की स्त्री धनवती ने तथा उन दोनों आर्यिकाओं की माता कुबेरसेना ने भी अपनी पुत्री गणिनी आर्यिका अमितमती के समीप आर्यिका दीक्षा ग्रहण कर ली२। इस प्रकार से जैनसिद्धांत में संयम की ही पूज्यता है। देखो, माता भी पुत्री से दीक्षा लेकर उनका शिष्यत्व स्वीकार कर उनके संघ में रहते हुए उन्हें पहले नमस्कार करती हैं, उनसे प्रायश्चित्त ग्रहण करती हैं और उनके अनुशासन को पालते हुए संघ की मर्यादा को निभाती हैं। दीक्षा लेने के बाद गृहस्थावस्था के माता-पिता से मुनि या आर्यिका का कोई भी संबंध नहीं रह जाता है। अतएव वे ही माता-पिता दीक्षित हुए अपने पुत्र या पुत्री को गुरु ही मानते हैं। यही प्राचीन आगमपरम्परा है और यही आज भी साधु संघों में देखने में आ रहा है।

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आर्यिका कनकश्री

जम्बूद्वीप के पूर्वविदेह क्षेत्र में एक वत्सकावती देश है। उसमें प्रभाकरी नाम की एक नगरी है। उसके राजा स्तिमितसागर की वसुन्धरा रानी से अपराजित नाम का पुत्र हुआ तथा राजा की अनुमति रानी से अनंतवीर्य पुत्र हुआ। ये दोनों भाई बलभद्र और नारायण थे। उनके यहाँ बर्बरी और चिलातिका नाम की दो नृत्यकारिणी थीं। किसी एक दिन राजसभा में उन नृत्यकारिणियों का नृत्य देख रहे थे कि इसी बीच नारदजी वहाँ आ गए। दोनों भाईयों ने नृत्य देखने में तन्मय होने से नारदजी का यथोचित आदर नहीं किया जिससे वे कुपित हुए बाहर निकल गए। वे घूमते हुए शिवमंदिर नगर के राजा दमितारि के यहाँ पहुँचे। ये राजा चक्ररत्न के स्वामी थे और तीन खण्ड पर अपना शासन कर रहे थे। नारद जी का वहाँ बहुत सम्मान हुआ। तब नारदजी ने राजा से उन नर्तकियों की बात कह दी। दमितारि ने प्रभाकरी नगरी को दूत भेज दिया। ये होनहार अपराजित और अनंतवीर्य कुछ परामर्श कर स्वयं नर्तकी का वेष बनाकर वहाँ पहुँच गए और दमितारि की सभा में नृत्य करने लगे। राजा दमितारि ने नृत्य देखकर उन नर्तकियों से कहा कि तुम मेरी पुत्री कनकश्री को नृत्यकला सिखा दो। उन दोनों ने कनकश्री को नृत्य सिखाना प्रारम्भ कर दिया। एक दिन दोनों ने गान कला में निपुण अनंतवीर्य के गुणों का वर्णन किया। तब राजपुत्री ने पूछा ये कौन हैं ? तब उसने पूरा परिचय बता दिया। कनकश्री ने पूछा क्या वह देखने को मिल सकता है। तब उन नर्तकियों ने अपना साक्षात् रूप दिखा दिया। उस कनकश्री को अपने में आसक्त देख अनंतवीर्य ने नर्तकी का वेष बनाकर उसका अपहरण कर लिया और वहाँ से निकलकर आकाशमार्ग से जाने लगे। तब राजा दमितारि को सूचना मिलते ही उसने युद्ध के लिए सेना भेज दी। बलभद्र अपराजित ने अनंतवीर्य और कनकश्री को दूर रखकर स्वयं युद्ध करके सभी योद्धा पराजित कर दिए। तब राजा दमितारि ने पता लगाया कि ये नर्तकी कौन है ? ये स्वयं प्रभाकरी के राजा अपराजित और अनंतवीर्य हैं। ऐसा ज्ञातकर स्वयं बहुत बड़ी सेना लेकर युद्ध के लिए निकल पड़ा, बहुत देर तक युद्ध चलता रहा अन्त में दुर्दैव से प्रेरित हो दमितारि ने अपना चक्र अनन्तवीर्य के ऊपर चला दिया। वह चक्र अनंतवीर्य की प्रदक्षिणा देकर उनके दाहिने कंधे पर ठहर गया जिससे अनंतवीर्य अर्धचक्रवर्ती दमितारि को मारकर आप अर्धचक्री नारायण प्रसिद्ध हो गया। इस तरह युद्ध समाप्त कर ये दोनों भाई कनकश्री को साथ लेकर आकाशमार्ग से जा रहे थे कि उनके विमान सहसा रुक गए। नीचे देखा तो समवशरण दिखाई दिया। ये उतरकर भक्ति से समवशरण में पहुँचे। वहाँ भगवान की वन्दना की । ये दमितारि के पिता कीर्तिधर थे। इन्होंने शांतिकर मुनिराज के समीप दीक्षा लेकर तपश्चरण किया। एक बार एक वर्ष का प्रतिमायोग लेकर विराजमान थे, तभी इनको केवलज्ञान प्रगट हो गया तब देवों ने आकर समवशरण की रचना की और दिव्यध्वनि के द्वारा उनका दिव्य उपदेश अगणित भव्यों ने प्राप्त किया। इन अपराजित और अनंतवीर्य ने भगवान की दिव्यध्वनि में धर्मकथायें सुनीं। कनकश्री ने अपने पितामह को भक्तिपूर्वक नमस्कार किया और पुन: प्रश्न किया-हे भगवन्! मैंने ऐसा कौन सा पाप किया था। कि जिसके कारण मेरे पूज्य पिता का मरण हो गया ? जिनेन्द्रदेव ने अपनी दिव्यध्वनि से कहना शुरु किया- इसी जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र की भूमि पर एक शंख नाम का नगर था। उसमें देविल नाम का वैश्य रहता था। उसकी बन्धुश्री नाम की स्त्री थी। उनके कई पुत्रियाँ हुर्इं जिनमें से तू बड़ी पुत्री श्रीदत्ता हुई थी जो बहुत ही सेवाभावी और सती थी। तेरी जो छोटी बहनें थीं, वे कुष्ठी, लंगड़ी, टोंटी, बहरी, कुबड़ी, कानी और खंजी थीं। तू इन सबका पालन स्वयं करती थी। तूने किसी समय सर्वशैल नामक पर्वत पर विराजमान सर्वयश मुनिराज की वंदना करके मन में बहुत ही शांति प्राप्त की, उनसे अहिंसाव्रत लिया और परिणाम निर्मल करके गुरु से धर्मचक्र नाम का व्रत ग्रहण कर विधिवत् उपवास किया।

किसी दूसरे दिन तूने सुव्रता नाम की आर्यिका का पड़गाहन कर उन्हें आहारदान दिया। उन आर्यिका ने पहले उपवास किया हुआ था इसलिए आहार लेने के बाद उन्हें वमन हो गया। तब सम्यग्दर्शन न होने से तूने उन आर्यिका से घृणा की। तूने जो अहिंसा व्रत पाला था और धर्मचक्र व्रत के उपवास किए थे उसके पुण्य से तू आयु के अन्त में मरकर सौधर्म स्वर्ग में सामानिक जाति की देवी हुई और वहाँ से चलकर राजा दमितारि की मंदरमालिनी नाम की रानी से कनकश्री नाम की पुत्री हुई है। तूने जो आर्यिका से घृणा की थी उसका फल यह हुआ कि ये लोग तेरे बलवान पिता को मारकर तुझे हरण कर ले आये और तुझे पितृवियोग का दु:ख हुआ है। यही कारण है कि बुद्धिमान लोग साधुओं से घृणा नहीं करते हैं१। यह सब सुनकर कनकश्री कर्म के फल का विचार करते हुए जिनेन्द्रदेव की वंदना कर नारायण और बलभद्र के साथ प्रभाकरी नगरी में आ गई किन्तु उसके हृदय में पिता के मरने का बहुत शोक रहता था।

इधर सुघोष और विद्युद्द्रंष्ट्र कनकश्री के भाई थे। वे बल से उद्धत थे और अपने शिवमंदिर नगर में ही अनंतवीर्य के पुत्र अनंतसेन के साथ युद्ध कर रहे थे। यह सुनकर बलभद्र तथा नारायण को बहुत ही क्रोध आया, उन्होंने उन दोनों को बाँध लिया। यह सुनकर कनकश्री उनके दु:ख को सहन नहीं कर सकी और अपने पक्षबल के बिना कांतिहीन तथा क्षीण हो गई। शोक से अत्यन्त दु:खी हो उसने काम भोग की सब इच्छा छोड़ दी, वह केवल भाईयों के दु:ख को दूर करना चाहती थी। उसने बलभद्र और नारायण से प्रार्थना कर अपने दोनों भाइयों को बन्धन से छुड़वाया तथा स्वयंप्रभ नामक तीर्थंकर के समवशरण में जाकर धर्मरूपी रसायन का पान कर सुप्रभा नाम की गणिनी के पास आर्यिका दीक्षा ग्रहण कर ली। कनकश्री ने आर्यिका जीवन में घोर तपश्चरण किया। अपना सम्यग्दर्शन निर्मल किया पुन: अन्त में समाधि से मरणकर सौधर्म- स्वर्ग में देवपद को प्राप्त कर लिया है।

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आर्यिका सुमतिमती

जम्बूद्वीप के पूर्वविदेह क्षेत्र में वत्सकावती नाम का देश है। उस देश में प्रभाकरी नामकी एक नगरी है। किसी समय वहाँ पर अपराजित और अनंतवीर्य नाम के दो भाई बलभद्र और नारायण पद पर स्थित होकर तीन खण्ड वसुन्धरा पर शासन कर रहे थे। बलभद्र अपराजित के सुमति नाम की एक कन्या थी जो अतिशय गुणों से सम्पन्न और सौन्दर्य की खान थी। एक समय राजा अपराजित ने दमवर नामक चारणऋद्धिधारी मुनि को आहार दिया। उसी समय देवों ने आकाश से रत्नवृष्टि, पुष्पवृष्टि आदि पंचाश्चर्य किए। उस अवसर पर कन्या सुमति वहाँ खड़ी हुई थी। राजा की दृष्टि सहसा उस पर पड़ी और उन्होंने सोचा-पुत्री विवाह के योग्य हो गई है अत: इसके लिए उचित वर की खोज करनी चाहिए। राजा अपराजित ने अपने छोटे भाई अनन्तवीर्य नारायण से परामर्श कर स्वयंवर की घोषणा कर दी। चक्रवर्ती द्वारा निर्मित कराये गए विशाल स्वयंवर मण्डप में करोड़ों राजपुत्र उपस्थित थे। कन्या सुमति पिता की आज्ञा से रथ में बैठकर स्वयंवर मण्डप में आ गई। उसी क्षण एक देवी अपने दिव्य विमान में बैठकर आकाशमार्ग से आई और सुमति से कहने लगी-सखि! तुम्हें याद है क्या ? हम दोनों कन्यायें स्वर्ग में रहा करती थीं। उस समय हम दोनों के बीच यह प्रतिज्ञा हुई थी कि जो पृथ्वी पर पहले अवतार लेगी उसे दूसरी कन्या समझावेगी। हम दोनों के पूर्वभवों का क्या सम्बन्ध है सो बता रही हूँ, तुम ध्यान से सुनो। पुष्करार्धद्वीप में भरतक्षेत्र के नन्दनपुर नामक नगर में एक अमितविक्रम नाम का राजा था। उसकी आनंदमती नाम की रानी से हम दोनों धनश्री और अनन्तश्री नाम की कन्यायें हुई थीं। किसी एक दिन हम दोनों ने सिद्धकूट में विराजमान नन्दन नाम के मुनिराज से धर्म का स्वरूप सुना, व्रत ग्रहण किए तथा सम्यग्ज्ञान के साथ-साथ अनेक उपवास किए। किसी एक समय त्रिपुरनगर का स्वामी वज्रांगद विद्याधर अपनी वज्रमालिनी स्त्री के साथ मनोहर नामक वन में जा रहा था कि वह हम दोनों को देखकर आसक्त हो गया। वह उसी समय वापस अपनी नगरी को चला गया। वहाँ अपनी पत्नी को छोड़कर शीघ्र ही वापस आकर हम दोनों को पकड़कर आकाशमार्ग से जाने लगा कि उसी बीच में उसकी पत्नी संदिग्ध हो वहाँ आ गई। तब भय से उस वज्रांगद ने हम दोनों को वहीं से नीचे गिरा दिया। हम दोनों वंशवन में धीरे-धीरे गिर कर जमीन पर आ गर्इं। उस समय वहाँ निर्जन वन में जीवन का कोई उपाय न देखकर संन्यास विधि से मरण किया। जिससे मैं तो व्रत और उपवास के पुण्य से सौधर्म इन्द्र की नवमिका नाम की देवी हुई हूँ और तू कुबेर की रति नाम की देवी हुई थी। एक बार दोनों देवियाँ परस्पर मिलकर नन्दीश्वर द्वीप में महामह यज्ञ पूजा देखने गर्इं थीं वहाँ से लौटकर मेरु पर्वत की वंदना करने लगीं। वहीं पर वन में विराजमान धृतिषेण नामक चारणऋद्धिधारी मुनि के दर्शन किए थे अनन्तर उनसे प्रश्न किया था कि- हे भगवन्! हम दोनों की मुक्ति कब होगी ? तब मुनिराज ने बताया था कि इस भव के चौथे भव में तुम दोनों मुक्ति प्राप्त करोगी। हे बुद्धिमती सुमते! उन सारी बातों को अवधिज्ञान से जानकर मैं इस समय तुम्हें यहाँ समझाने आई हूँ, इतना सुनकर सुमति को वैराग्य हो गया। उसने उसी समय अपने पिता से आज्ञा लेकर सुव्रता नाम की आर्यिका के पास जाकर सात सौ कन्याओं के साथ आर्यिका दीक्षा ले ली।१ इस घटना से स्वयंवर में रंग में भंग हुआ देखकर सभी राजा लोग उस कन्या के ज्ञान और वैराग्य की प्रशंसा करते हुए अपने-अपने नगर को चले गये। सुमति ने आर्यिका बनकर बहुत काल तक उग्र-उग्र तपश्चरण किया और आयु के अन्त में समाधि से मरणकर सम्यक्त्व के प्रभाव से स्त्रीलिंग से छूटकर आनत नामक तेरहवें स्वर्ग के अनुदिश विमान में देवपद को प्राप्त कर लिया।

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गणिनी आर्यिका विमलमती

जम्बूद्वीप सम्बन्धी पूर्वविदेह के रत्नसंचय नामक नगर में राजा क्षेमंकर राज्य करते थे। उनकी कनकचित्रा रानी के एक पुत्र हुआ उसका नाम वज्रायुध रखा गया। पुत्र के युवा होने पर उसका विवाह लक्ष्मीमती से सम्पन्न हुआ। इस लक्ष्मीमती के पुत्र का नाम सहस्रायुध था। इन सहस्रायुध की भार्या श्रीषेणा के पुत्र का नाम कनकशांत था। इस प्रकार राजा क्षेमंकर पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र आदि परिवार से घिरे हुए राज्य कर रहे थे। किसी समय राजा क्षेमंकर को वैराग्य हुआ ज्ञातकर लौकांतिक देव आ गए और उनके वैराग्य की स्तुति करने लगे। यह क्षेमंकर महाराज तीर्थंकर थे। देवों द्वारा की गई तपकल्याणक पूजा को प्राप्त कर इन्होंने वज्रायुध पुत्र को राज्य देकर आप जैनेश्वरी दीक्षा ले ली। इधर वज्रायुध के यहाँ चक्ररत्न उत्पन्न हो जाने से ये चक्रवर्ती हो गये। इधर वहीं के विजयार्ध पर्वत की दक्षिण श्रेणी में शिवमंदिर नगर है। वहाँ के राजा मेघवाहन की रानी विमला ने एक पुत्री को जन्म दिया। उसके जन्मकाल में अनेक उत्सव मनाये गये और उसका नाम कनकमाला रखा गया। युवती होने पर उसका विवाह सहस्रायुध के पुत्र कनकशांत के साथ हुआ। किसी समय कनकशांत ने महामुनि विमलप्रभ के दर्शन करके विरक्त हो उन्हीं से दीक्षा धारण कर ली। तब कनकशांत की कनकमाला और बसंतसेना नाम की दोनों रानियों ने विमलमती१ आर्यिका के पास आर्यिका दीक्षा ग्रहण कर ली क्योंकि सनातन परम्परा में कुलीन स्त्रियों का यही कर्तव्य माना गया है। किसी समय पूर्वजन्म में बंधे हुए वैर से रानी बसंतसेना का भाई (साला) चित्रचूल विद्याधर कनकशांत महामुनि पर उपसर्ग करने लगा। महामुनि ने उपसर्ग सहन कर घातिया कर्मों का नाश कर केवलज्ञान प्राप्त कर लिया। जब वज्रायुध चक्रवर्ती को नाती (पोता) का केवलज्ञान समाचार मिला तब उन्होंने अपने पुत्र सहस्रायुध को राज्य देकर अपने पिता क्षेमंकर तीर्थंकर के समवशरण में जाकर दीक्षा ले ली। इधर इन कनकमाला आदि आर्यिकाओं ने घोर तपश्चरण कर अन्त में सल्लेखना से मरण कर स्वर्ग के वैभव को प्राप्त किया है।

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आर्यिका रामदत्ता

इसी जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र में सिंहपुर नाम का नगर है। उस नगर के राजा का नाम सिंहसेन था। उनकी रामदत्ता रानी पातिव्रत्य आदि गुणों की खान थी। उस राजा के श्रीभूति मन्त्री के सत्यवादी होने से सत्यघोष यह नाम प्रसिद्ध हो गया था। उसी देश के पद्मखण्डपुर नगर में एक भद्रमित्र सेठ रहता था। वह सेठ एक बार सत्यघोष के पास अपने कुछ रत्न रख आया और बाद में जब उसने मांगे तब सत्यघोष झूठ बोल गया कि मैं तेरे रत्नों को क्या जानूँ ? तब भद्रमित्र पागल की तरह चिल्लाने लगा। वह प्रतिदिन प्रात:काल एक वृक्ष पर चढ़कर बार-बार रत्नों के बारे में रोया करता था। प्रतिदिन उसकी एक सी बात सुनकर रानी रामदत्ता ने यह सोचा कि यह पागल नहीं है। राजा से यह बात कही कि इसका सही न्याय होना चाहिए। पुन: राजा की आज्ञा लेकर सत्यघोष मन्त्री के साथ जुआ खेलकर उसकी यज्ञोपवीत और अंगूठी जीत ली। अनंतर निपुणमती धाय के हाथ से श्रीभूति के घर भेजकर उसकी पत्नी से उस भद्रमित्र का रत्नों का पिटारा मँगवा लिया। उसमें अपने भी कुछ रत्न मिलाकर राजा ने भद्रमित्र को दिखाया। तब भद्रमित्र ने उसमें से अपने रत्नों को पहचान कर निकाल लिया। इस घटना से राजा ने श्रीभूति-सत्यघोष को दण्डित किया। वह मरकर अगंधन सर्प हो गया जो कि राजा के भांडागार में रहने लगा। इधर भद्रमित्र मरकर रानी रामदत्ता का पुत्र हुआ जिसका नाम सिंहचन्द्र रखा गया। एक दिन सत्यघोष के जीव अगंधन सर्प ने राजा को डस लिया। तब गारुड़ी ने मन्त्र से सर्व सर्पों को बुलाकर कहा कि तुम लोगों में जो निर्दोष हो वह अग्नि में प्रवेश कर परीक्षा देवे तब सभी सर्प क्रम-क्रम से अग्नि में प्रवेश कर बिना जले बाहर निकल आये किन्तु वह अगंधन सर्प अग्नि में जलकर मर गया और वन में चमरी जाति का मृग हो गया। राजा सिंहसेन भी सर्प के विष से मरकर सल्लकी वन में हाथी हो गया।

राजा के मरण के बाद सिंहचन्द्र राजा हुआ और पूर्णचन्द्र को युवराज पट्ट बाँधा गया। एक दिन राजा सिंहसेन की मृत्यु का समाचार सुनकर दांतमती और हिरण्यमती नाम की संयम धारण करने वाली आर्यिकायें रानी रामदत्ता के पास आर्इं१। रामदत्ता भी उनका धर्मोपदेश सुनकर उन्हीं से संयम ग्रहण कर आर्यिका हो गई। इधर माता के वियोग से दु:खी होकर सिंहचन्द्र ने भी मुनि से धर्मोपदेश श्रवण कर भाई पूर्णचन्द्र को राज्य देकर जैनेश्वरी दीक्षा ले ली और कुछ ही दिनों में तप के प्रभाव से आकाशचारण ऋद्धि तथा मन:पर्यय ज्ञान प्राप्त कर लिया। किसी समय रामदत्ता आर्यिका ने सिंहचन्द्र मुनिराज के दर्शन किए तो बहुत ही हर्ष हुआ। अनंतर उनसे पूछा- ‘‘हे महामुने! पूर्णचन्द्र धर्म को छोड़कर भोगों में प्रीति कर रहा है सो वह कभी धर्म को ग्रहण करेगा या नहीं ?’’ सिंहचन्द्र मुनि ने उत्तर दिया- ‘‘तुम खेद मत करो। मैं तुम्हें कुछ इतिहास सुनाता हूँ सो जाकर उसे सुनाओ और संबोधन करो वह तुम्हारे धर्मोपदेश से ही धर्म को स्वीकारेगा। मेरे पिता राजा सिंहसेन सर्प के डसने से मरकर हाथी हो गए थे। एक बार मंै सल्लकी वन में था तब वह मुझे मारने को दौड़ा।’’ मुझे आकाशचारण ऋद्धि थी अत: मैंने आकाश में स्थित होकर उसके पूर्वभव का सम्बन्ध बताकर उपदेश दिया जिससे उस भव्य ने शीघ्र ही संयासंयम-अणुव्रत ग्रहण कर लिया। वह उस वन में लगातार एक-एक माह के उपवास कर सूखे पत्तों की पारणा किया करता था। उसका शरीर तपश्चरण से अति दुर्बल हो गया था। एक बार वह नदी में पानी पी रहा था कि सत्यघोष का जीव जो मरकर सर्प हुआ था, पुन: चमरी मृग हुआ था, पुन: मरकर कुक्कुट जाति का सर्प हो गया था। उसने उस हाथी को काट खाया जिससे वह हाथी उस समय समाधिमरण से मरा और बारहवें स्वर्ग में श्रीधर नाम का देव हो गया। इधर एक बहेलिए ने उस मरे हुए हाथी के दोनों दाँत निकाले तथा उसके गण्डस्थल से मोती निकाले। उन्हें लाकर धनमित्र सेठ को दे दिया। धनमित्र ने उन दोनों वस्तुओं को लाकर राजा पूर्णचन्द्र को भेंटकर दिया। पूर्णचन्द्र ने उन दोनों दाँतों के चार पाये बनाकर अपने पलंग में लगवाये हैं और मोतियों का हार बनवाकर गले में पहन लिया है। इतना सुनकर रामदत्ता आर्यिका पुत्र के मोह से पूर्णचन्द्र के पास गई और सारी घटना सुनाई। सुनकर उसको बहुत ही दु:ख हुआ कि मैं पिता के शरीर के दाँत और मोतियों से अपने सुखोपभोग सामग्री को बनवाकर सुखी हो रहा हूँ। उसने दाँत और मोतियों की अन्त्येष्टि क्रिया की तथा श्रावक के व्रत ग्रहण कर लिए। इधर रामदत्ता ने पुत्र को धर्म का मर्म समझाकर संतुष्ट हो घोर तपश्चरण किया जिसके फलस्वरूप समाधिमरण से मरकर दशवें महाशुक्र स्वर्ग में देवपद को प्राप्त कर लिया है। यह रामदत्ता आर्यिका का जीव इससे नवमें भव में भगवान विमलनाथ का मेरु नाम का गणधर हुआ है। जिसने सात ऋद्धियों से सम्पन्न होकर उसी भव से मोक्ष को प्राप्त कर लिया है।

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आर्यिका नंदयशा

जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र के मंगलादेश में भद्रिलपुर नाम का एक नगर है। उसमें मेघरथ नाम का राजा राज्य करता था। उसी भद्रिलपुर नगर में एक धनदत्त सेठ रहता था। उसकी स्त्री का नाम नंदयशा था। इन दोनों के धनपाल, देवपाल, जिनदेव, जिनपाल, अर्हदत, अर्हद्दास, जिनदत्त, प्रियमित्र और धर्मरूचि ये नव पुत्र हुए थे तथा प्रियदर्शना और ज्येष्ठा ये दो पुत्रियाँ भी हुई थीं। किसी एक दिन सुदर्शन नाम के वन में मन्दिरस्थविर नाम के मुनिराज पधारे। राजा मेघरथ और सेठ धनदत्त अपने परिवार सहित दर्शन करने आये। उनकी वंदना, पूजा करने के बाद गुरुदेव के मुख से धर्मोपदेश सुना। राजा मेघरथ संसार से विरक्त होकर अपने पुत्र दृढ़रथ को राज्य देकर मुनि बन गये। धनदत्त सेठ भी अपने नौ पुत्रों के साथ मुनि बन गया। नंदयशा सेठानी ने भी अपनी दोनों पुत्रियों के साथ सुदर्शना नाम की आर्यिका के पास आर्यिका व्रत लेकर साध्वी बन गई। क्रम—क्रम से विहार करते हुए ये सब मुनि, आर्यिकायें बनारस आ गये और वहाँ बाहर सघन वृक्षों से युक्त प्रियंगुखण्ड नाम के वन में जाकर विराजमान हो गये। वहाँ पर सबके गुरु मंदिर—स्थविर, राजा मेघरथ और धनदत्त सेठ ये तीनों ही मुनि ध्यान कर केवलज्ञानी हो गये। इनकी गंधकुटी रचना देवों में आकर की और केवलज्ञान की पूजा करके सभा में बैठ गये। केवली भगवान ने दिव्यध्वनि से दिव्य उपदेश दिया। आयु के अन्त में राजगृह नगर के समीप सिद्धशिला से सिद्धपद को प्राप्त कर लिया है। कुछ दिन बाद धनदेव आदि नौ भाई, दोनों बहनों और नंदयशा ने उसी शिलातल पर विधिवत् संन्यास ग्रहण कर लिया। पुत्र—पुत्रियों से युक्त नंदयशा ने उन्हें देखकर निदान कर लिया कि ‘‘जिस प्रकार ये सब इन जन्म में मेरे पुत्र—पुत्रियाँ हुई हैं, उसी प्रकार परजन्म में भी ये मेरे ही पुत्र—पुत्रियाँ हों और इन सबके साथ मेरा सम्बन्ध परजन्म में भी बना रहे।’ ऐसा निदान कर उसने स्वयं संन्यास धारण कर लिया और मरकर उन सबके साथ तेरहवें आनत स्वर्ग के शातंकर नामक विमान में उत्पन्न हो वहाँ के दिव्य सुखों का अनुभव करने लगी। इधर कुशार्य देश के शौर्यपुर नगर का स्वामी राजा अन्धकवृष्टि राज्य कर रहा था। उसकी रानी का नाम सुभद्रा था। यह सुभद्रा उसी नंदयशा का जीव था। जो धनदेव आदि नौ पुत्र स्वर्ग गये थे वे क्रम—क्रम से वहाँ से च्युत होकर रानी सुभद्रा के समुद्रविजय, स्तिमितसागर, हिमवान्, विजय, विद्वान्, अचल, धारण, पूरण, पूरितार्थीच्छ और अभिनन्दन ये नौ पुत्र हुए हैं। अन्त में दशवें पुत्र का नाम वसुदेव रखा गया तथा प्रियदर्शना और ज्येष्ठा के जीव क्रम से कुंती और माद्री नाम की कन्यायें हुई थीं। ये कुंती और माद्री राजा पांडु को ब्याही गई थीं। वुंâती से युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन तथा माद्री से नकुल और सहदेव ये पुत्र हुए जो कि पाँच—पांडव कहलाये थे। किसी समय पांडु राजा ने संन्यास विधि से मरण कर सौधर्म स्वर्ग प्राप्त किया था। उसी समय पति के साथ ही माद्री ने भी संन्यास मरण से प्राण छोड़कर सौधर्म स्वर्ग प्राप्त किया था। तथा संन्यास के समय उसने अपने नकुल, सहदेव पुत्रों को कुन्ती के पास छोड़ दिया था। जब पाँचों पांडव पुत्रों ने भगवान नेमिनाथ के पादमूल में दीक्षा ली थी तब कुन्ती ने भी राजीमती आर्यिका के पास दीक्षा ले ली और घोर तपश्चरण करके सम्यक्त्व के प्रभाव से स्त्रीिंलग का छेद कर दिया तथा अच्युत नाम के सोलहवें स्वर्ग में देवपद प्राप्त कर लिया है।

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आर्यिका प्रीतिमती

पुष्करार्ध द्वीप के पश्चिम विदेक्षेत्र में गंधिला नाम का महादेश है। उसके विजयार्ध पर्वत की उत्तर श्रेणी में सूर्यप्रभ नगर है। वहाँ पर सूर्यप्रभ राजा राज्य कर रहा था। उसकी रानी का नाम धारिणी था। उनके चिंतागति, मनोगति और चपलगति नाम के तीन पुत्र थे। उसी विजयार्ध पर्वत की उत्तरश्रेणी में अरिन्दमपुर नगर है। वहाँ के राजा अिंरजय की अजितसेना रानी से प्रीतिमती नाम की कन्या उत्पन्न हुई थी। उस कन्या ने युवती अवस्था में नियम कर लिया कि मुझे जो गतियुद्ध में जीतेगा मैं उसी के गले में वरमाला डालूँगी। तब चिंतागति आदि तीनों भाइयों ने आकर मेरुपर्वत की प्रदक्षिणा में उसके साथ गतियुद्ध प्रारम्भ किया। इसमें अनेक विद्याधर राजपुत्र भी इस कन्या से पराजित हो चुके थे। इस समय पहले मनोगति ने उसके साथ मेरु की तीन प्रदक्षिणायें लगार्इं किन्तु कन्या आगे हो गई। पुन: चपलगति भी हार गया। तत्पश्चात् चिंतागति ने प्रीतिमती के साथ मेरु की प्रदक्षिणा में उसे पीछे छोड़कर आगे निकलकर उस कन्या को जीत लिया। तब प्रीतिमती चिंतागति के गले में वरमाला डालने को तैयार हुई। उस समय उसने कहा कि तू मेरे भाई के गले में माला डालकर उनका वरण कर। प्रीतिमती ने कहा-जिसने मुझे जीता है उसके सिवाय मैं अन्य के गले में यह माला नहीं डालूंगी। तब चिंतागति ने कहा-‘‘चूँकि तूने पहले उन्हें प्राप्त करने की इच्छा से ही उन मनोगति, चपलगति के साथ गतियुद्ध किया है अत: तू मेरे लिए त्याज्य है।’’ चिंतागति के इन वचनों के सुनते ही वह संसार से विरक्त हो गई और उसने विवृता नाम की आर्यिका के पास जाकर आर्यिका दीक्षा ग्रहण कर ली। कन्या प्रीतिमती के इस साहस को देखकर ये तीनों भाई भी विरक्त हो गए और उन्होंने दमवर मुनि के पास जाकर मुनिव्रत ग्रहण कर लिया। इन तीनों मुनियों ने उत्कृष्ट संयम को पालते हुए आठों प्रकार की शुद्धियों में अपना मन लगाया। अन्त में संन्यास विधि से मरकर चौथे माहेन्द्र स्वर्ग में सामानिक जाति के देव हो गए। आगे चलकर इससे सातवें भव में यह चिंतागति का जीव बाईसवाँ तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ हुआ है।

सत्यभामा आदि आठ आर्यिकायें-श्रीकृष्ण की सत्यभामा आदि आठों पट्टरानियों ने भगवान नेमिनाथ के समवशरण में श्रीवीरदत्त गणधर से अपने-अपने पूर्व भवों को पूछा था। तब गणधर देव ने क्रम से आठों रानियों के पूर्व भव सुनाये थे। सत्यभामा ने भगवान श्री नेमिनाथ के समवसरण में श्री वीरदत्त गणधर से अपने पूर्व भव पूछे। श्रीगणधर देव ने कहा- शीतलनाथ के तीर्थ में जब धर्म का विच्छेद हुआ तब भद्रिलपुर नगर में राजा मेघरथ राज्य करता था, उसकी रानी का नाम नंदा था। उस नगर में भूतिशर्मा नाम का एक ब्राह्मण था, उसकी कमला नाम की भार्या से मुण्डशालायन नाम का पुत्र हुआ था। मुण्डशालायन भोगों में आसक्त होकर राजा और प्रजा के लिए सुवर्णदान, भूमिदान आदि का उपदेश देता रहा और सच्चे तपश्चरण का विरोध करता रहा। इस पाप से मरकर वह सातवें नरक चला गया। वहां से निकलकर तिर्यंच हुआ। इसी तरह नरक तिर्यंच योनि में घूमता रहा। अनुक्रम से वह गंधमादन पर्वत से निकली गंधवती नदी के समीप भल्लकी नाम की पल्ली में भील हुआ जिसका नाम काल था। इस भील ने किसी दिन वरधर्म मुनिराज के निकट धर्मोपदेश सुनकर मद्य, मांस और मधु इन तीन मकारों का त्याग कर दिया। उसके फलस्वरूप विजयार्ध पर्वत पर अलकानगरी के राजा पुरबल और उसकी रानी ज्योतिर्माला के हरिबल नाम का पुत्र हुआ। उसने अनंतवीर्य नाम के मुनिराज के पास द्रव्यसंयम धारण कर लिया-मुनि बन गया जिसके प्रभाव से वह मरकर सौधर्म स्वर्ग में देव हो गया। वहाँ से च्युत होकर उसी विजयार्ध पर्वत पर रथनूपुर नगर के राजा सुकेतु की स्वयंप्रभा रानी से तुम सत्यभामा नाम की पुत्री हुई हो अथवा अर्धचक्रवर्ती श्रीकृष्ण की पट्टरानी हुई हो।

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आर्यिका रुक्मिणी

इसी भरतक्षेत्र संबंधी मगध देश के अन्तर्गत एक लक्ष्मीग्राम नाम का ग्राम है। उसमें सोम नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उसकी स्त्री का नाम लक्ष्मीमती था। किसी एक दिन लक्ष्मीमती दर्पण में मुख देख रही थी। इतने में ही समाधिगुप्त नाम के महामुनि भिक्षा के लिए आ गए। ‘‘इसका शरीर पसीने से लिप्त है और यह दुर्गन्ध दे रहा है।’’ इस प्रकार क्रोध करती हुई लक्ष्मीमती ने घृणा से युक्त निंदा के वचन कहे। मुनिनिंदा के पाप से उसका सारा शरीर उदुंबर नामक कुष्ठ से व्याप्त हो गया। दुर्गन्धि से युक्त जहाँ भी जाती लोग उसे कुत्ती के समान दुत्कार कर भगा देते। तब वह दु:खी हो सूने मकान में पड़ी रहती थी। अंत में पति के प्रेम में मोहासक्त हो मरकर उसी ब्राह्मण के घर दुर्गन्धयुक्त छछूंदर हुई। पूर्व स्नेह के कारण बार बार पति के ऊपर दौड़ती तब सोम ब्राह्मण ने क्रोधित हो उसे पकड़ कर बाहर ले जाकर बड़ी दुष्टता से दे पटका, जिससे वह मरकर उसी घर में साँप हो गई फिर मरकर पाप कर्म के उदय से वहीं गधा हुई। वह गधा संस्कारवश बार-बार ब्राह्मण के घर आता, तब ब्राह्मण ने कुपित हो उसे लाठी तथा पत्थर से ऐसा मारा कि उसका एक पैर टूट गया। घाव होकर उसमें कीड़े पड़ गए। जिनसे व्याकुल होकर वह कुँए में पड़ गया और वेदना से पीड़ित हुआ मर गया, फिर अंधा साँप हुआ, फिर अंधा सुअर हुआ। उस सुअर को गाँव के कुत्तों ने खा लिया। वह सुअर मरकर मंदिर नामक गांव में नदी पार कराने वाले मत्स्य नामक धीवर की मण्डूकी नाम की स्त्री से पूतिका नाम की पापिनी पुत्री हुई। उत्पन्न होते ही उसका पिता मर गया, अनंतर माता भी मर गई तब नानी ने उसका पालन किया। वह कन्या सब प्रकार से अशुभ थी और सभी लोग उससे घृणा करते थे। किसी एक दिन यह पूतिका नदी के किनारे बैठी थी। वहीं पर उसे उन समाधिगुप्त मुनिराज के दर्शन हुए जिनकी उसने लक्ष्मीमती पर्याय में निदा की थी। वे मुनि प्रतिमायोग से विराजमान थे। पूतिका की काललब्धि अनुकूल थी इसलिए वह शांतभाव को प्राप्त कर रात्रि भर मुनिराज के शरीर पर बैठने वाले मच्छर आदि दूर हटाती रही। प्रात:काल के समय प्रतिमायोग समाप्त कर मुनिराज शिलातल पर बैठ गए। मुनिराज ने उसे धर्मोपदेश दिया। उसको सुनकर प्रसन्नचित्त हो उसने पर्व के दिनों में उपवास करने का नियम ले लिया। दूसरे दिन वह जिनेन्द्रदेव के दर्शन करने जा रही थी कि वहीं उसे एक आर्यिका के दर्शन हो गए। वह उन्हीं आर्यिका के साथ दूसरे गाँव तक चली गई। वहीं पर उसे भोजन प्राप्त हो गया। इस तरह वह प्रतिदिन ग्रामान्तर से लाए हुए भोजन से अपने प्राणों की रक्षा करती और पाप से भयभीत हो अपने आचार की रक्षा करती हुई किसी पर्वत की गुफा में रहने लगी। आर्यिका जी के दर्शन करने के लिए एक श्राविका दूर से आई हुई थी। आर्यिका ने उससे कहा-देखो यह पूतिका नीचकुल में उत्पन्न होकर भी इस तरह सदाचार का पालन कर रही है यह एक आश्चर्य की बात है। आर्यिका की बात सुनकर उस श्राविका को बड़ा ही कौतुक हुआ। जब पूतिका आर्यिका की पूजा भक्ति कर चुकी तब श्राविका स्नेहवश उसकी प्रशंसा करने लगी। इसके उत्तर में पूतिका ने कहा-हे माता! मैं तो महापापिनी हूँ, मुझे आप पुण्यवती क्यों कहती हैं। इतना कहकर उसने समाधिगुप्त मुनिराज से जैसे अपने पूर्व भव सुने थे, वैसे ही सब कह सुनाये। वह श्राविका पूतिका की पूर्व भव की सखी थी। पूतिका के मुख से सारा वृत्तांत विदित कर उसने सान्त्वना देते हुए कहा- यह जीव पाप का भय होने से ही जैनधर्म को ग्रहण करता है। इस संसार में पूर्वभव में अर्जित पाप कर्म के उदय से कुरूपता, सरोगता, दुर्गन्धता और निर्धनता आदि प्राप्त हुआ करती है, इसलिए तू शोक मत कर। अब जो तूने व्रत, शील और उपवास के नियम लिए हैं, ये सब तुझे अगले जन्म में सुखी बनायेंगे। तू अब भय मत कर, इस प्रकार उस श्राविका ने उसे खूब उत्साह दिया। आगे जीवन भर पूतिका ने अपने व्रतों की रक्षा की, अंत में समाधिमरण कर अच्युत इन्द्र की अतिशय प्यारी देवी हुई और वहाँ पचपन पल्य तक सुख का अनुभव कर अन्त में च्युत हो यहाँ भरतक्षेत्र के विदर्भ देश के कुण्डलपुर नगर में वासव राजा की श्रीमती रानी से रुक्मणी पुत्री होकर श्रीकृष्ण की पट्टरानी हुई हैं।

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जाम्बवती

जम्बूद्वीप के पूर्व विदेह क्षेत्र में पुष्कलावती नाम का देश है। उसके वीतशोकनगर में दमक नामक वैश्य रहता था। उसकी स्त्री देवमती थी, उसके देविला नाम की एक पुत्री थी। वह पुत्री वसुमित्र को ब्याही गई परन्तु कुछ दिन बाद विधवा हो जाने से उसने विरक्त होकर जिनदेव नाम के मुनिराज से व्रत ग्रहण कर लिए और आयु के अन्त में मरकर मेरु पर्वत के नंदन वन में व्यंतर देवी हो गई। वहाँ की ८४ हजार वर्ष की आयु पूर्ण कर वहाँ से च्युत होकर पुष्कलावती देश के विजयपुर नगर में मधुषेण वैश्य की बंधुमती पत्नी से अतिशय सुन्दरी बंधुयशा नाम की पुत्री हुई। वहीं के एक जिनदेव सेठ की पुत्री जिनदत्ता इसकी सखी थी। उसके साथ इस बंधुयशा ने उपवास किए जिसके फल से मरणकर प्रथम स्वर्ग में कुबेर की देवांगना हो गई। वहाँ से चयकर पुण्डरीकिणी नगरी में वज्र नामक वैश्य और उसकी सुभद्रा स्त्री के सुमति नाम की कन्या हुई। इस सुमति ने एक दिन सुव्रता नाम की आर्यिका को आहारदान दिया और उनके उपदेश से रत्नावली नाम का उपवास किया, जिससे ब्रह्मस्वर्ग में श्रेष्ठ अप्सरा हुई। वहाँ की आयु पूर्ण कर इसी जम्बूद्वीप के विजयार्ध पर्वत की उत्तरश्रेणी पर जाम्बव नाम के नगर में राजा जाम्बव की रानी जंबुषेणा के जाम्बवती पुत्री हुई है और युवती होने पर श्रीकृष्ण की पट्टरानी हुई है।

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सुसीमा

धातकीखण्ड द्वीप के पूर्वार्ध भाग के पूर्व विदेह में मंगलावती देश है, उसमें रत्नसंचय नाम का एक नगर है। उस नगर के राजा विश्वदेव और रानी अनुन्दरी थी। किसी एक दिन अयोध्या के राजा ने राजा विश्वदेव को मार डाला इसलिए अत्यन्त शोक के कारण मंत्रियों के निषेध करने पर भी रानी अग्नि मे प्रवेश कर जल मरी। मरकर वह विजयार्ध पर्वत पर दश हजार वर्ष की आयु वाली व्यंतरी देवी हो गई। वहाँ की आयु पूर्ण कर वह अपने कर्मों के अनुसार संसार में परिभ्रमण करती रही। इसी जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र में एक शालिग्राम नगर है। वहाँ पर एक यक्ष नाम का वैश्य था। उसकी पत्नी देवसेना के गर्भ से वह अनुंदरी का जीव कन्या हुआ जिसका नाम यक्षदेवी रखा गया। किसी एक दिन उसने धर्मसेन मुनिराज के पास जाकर व्रत ग्रहण किए और एक समय एक माह के उपवासी मुनिराज को आहारदान दिया। यह यक्षदेवी एक दिन वनक्रीड़ा के लिए गई हुई थी, वहाँ अचानक अत्यधिक वर्षा हो जाने से वह एक गुफा में चली गई। वहाँ पर एक अजगर सर्प था उसने इसे निगल लिया किन्तु दान के प्रभाव से मरकर यह हरिवर्ष क्षेत्र की भोगभूमि में उत्पन्न हो गई। वहाँ की आयु पूर्ण कर नागकुमारी देवी हुई। फिर वहाँ से चयकर विदेह क्षेत्र के पुष्कलावती देश सम्बन्धी पुण्डरीकिणी नगरी में राजा अशोक और सोमश्री रानी के श्रीकान्ता नाम की पुत्री हुई। किसी एक दिन इसने जिनदत्ता आर्यिका के पास दीक्षा लेकर उत्तम व्रतों का पालन किया, चिरकाल तक तपस्या की और कनकावली नाम का कठिन उपवास किया। इन सबके प्रभाव से वह माहेन्द्र स्वर्ग में देवी हुई। वहाँ के दिव्य सुखों का अनुभव कर अन्त में वहाँ से च्युत होकर यहाँ भरत क्षेत्र के सुराष्ट्रवर्धन राजा की रानी सुज्येष्ठा के सुसीमा नाम की पुत्री हुई तथा श्रीकृष्ण की पट्टरानी होकर सुखों का अनुभव कर रही है।

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लक्ष्मणा

इसी जम्बूद्वीप के पूर्व विदेह क्षेत्र में एक पुष्कलावती नाम का देश है। उसके अरिष्टपुर नगर में राजा वासव की वसुमती रानी से एक सुषेण नाम का पुत्र था। किसी एक दिन राजा वासव ने विरक्त होकर सागरसेन मुनिराज के समीप जैनेश्वरी दीक्षा ले ली किन्तु पुत्रमोह के कारण रानी ने गृहवास नहीं छोड़ा। अन्त में कुत्सित भावों से मरकर भीलनी हो गई। एक दिन उसने नंदिवर्धन नामक चारण मुनि के पास जाकर श्रावक के व्रत ग्रहण कर लिए। आयु के अन्त में मरकर व्रत के प्रभाव से आठवें स्वर्ग के इन्द्र की प्यारी नृत्यकारिणी हुई। वहाँ से चयकर जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र सम्बन्धी विजयार्ध पर्वत की दक्षिण श्रेणी पर चन्द्रपुर नगर के राजा महेन्द्र की रानी अनुन्दरी के गर्भ से कनकमाला नाम की पुत्री हुई और सिद्धविद्य नाम के स्वयंवर में इसने हरिवाहन के गले में माला डालकर उसका वरण कर लिया। किसी एक दिन कनकमाला ने सिद्धकूट पर विराजमान यमधर नाम के मुनि के पास में अपने पूर्व भवों को सुना, अनंतर उन्हीं से मुक्तावली नाम का उपवास ग्रहण कर आयु के अन्त में मरकर तीसरे स्वर्ग में इन्द्र की इन्द्राणी हो गई। वहाँ पर नौ पल्यों तक दिव्य सुखों का अनुभव कर वहाँ से च्युत होकर यहाँ के सुप्राकार नगर के राजा संवर की श्रीमती रानी से लक्ष्मणा नाम की पुत्री हुई और श्रीकृष्ण की पट्टरानी हुई है।

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गान्धारी

इसी जम्बूद्वीप में एक सुकौशल नाम का देश है। उसकी अयोध्या नगरी में रुद्र नाम का राजा राज्य करता था, उसकी रानी का नाम विनयश्री था। किसी एक दिन रानी ने सिद्धार्थ वन में पधारे हुए बुद्धार्थ नाम के मुनिराज को आहारदान दिया, पश्चात् आयु के अन्त में मरकर उत्तरकुरु भोगभूमि में उत्पन्न हुई। वहाँ की आयु पूरी कर चन्द्रमा की चन्द्रवती नाम की देवी हुई। वहाँ से च्युत होकर जम्बूद्वीप के विजयार्ध पर्वत पर गगनवल्लभ नगर में राजा विद्युद्वेग की रानी विद्युद्वेगा के सुरूपा नाम की पुत्री हुई। यह विद्या और पराक्रम से सुशोभित नित्यालोकपुर के राजा महेन्द्रविक्रम को दी गई। किसी एक दिन ये दोनों सुमेरु पर्वत पर चैत्यालयों की वंदना पूजा करने के लिए गए थे। वहाँ पर विराजमान चारणऋद्धिधारी मुनि के मुख से धर्मरूपी अमृत के पान से बहुत ही तृप्त हुए। राजा महेन्द्रविक्रम ने उन्हीं मुनिराज के समीप दीक्षा ले ली। तब रानी सुरूपा ने भी सुभद्रा नाम की आर्यिका के पास जाकर संयम धारण कर दीक्षा ले ली। तब रानी सुरूपा ने भी सुभद्रा नाम की आर्यिका के पास जाकर संयम धारण कर लिया। आयु पूरी कर सौधर्म स्वर्ग में देवी हुई। वहाँ से चयकर गान्धार देश के पुष्कलावती नगर के राजा इन्द्रगिरि को मेरुमती रानी से गान्धारी पुत्री हुई तथा श्रीकृष्ण की पट्टरानी हुई है।

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पद्मावती

इसी भरतक्षेत्र की उज्जयिनी नगरी में विजय नाम के राजा थे, उनकी रानी का नाम अपराजिता था। इन दोनों के विनयश्री नाम की एक पुत्री थी। राजा ने उसे हस्तशीर्षपुर के राजकुमार हरिषेण से विवाहा था। विनयश्री ने एक बार समाधिगुप्त मुनिराज को आहारदान देकर भोगभूमि की आयु बाँध ली और आयु के अन्त में मरकर हैमवत क्षेत्र में उत्पन्न हो गई। चिरकाल तक कल्पवृक्षों के भोगों का अनुभव कर वहाँ से मरकर वह चंद्रमा की रोहिणी नाम की देवी हो गई। वहाँ से चयकर मगधदेश के शाल्मलि गाँव में रहने वाले विजय की देविला स्त्री से पद्मादेवी नाम की पतिव्रता पुत्री हुई। उसने एक बार वरधर्म नाम के मुनिराज के पास ‘‘मैं कष्ट के समय भी अनजाना फल नहीं खाऊँगा।’’ ऐसा नियम ले लिया। किसी एक समय भीलों ने उस गाँव को लूट लिया। उस समय सब लोग पद्मादेवी को एक महाअटवी में ले गए। वहाँ पर सब लोग भूख से पीड़ित हो वन के फलों को खाने लगे परन्तु पद्मादेवी ने अनजाने फल को नहीं खाया अत: वह अकेली बच गई और सभी लोग मर गये, चूँकि वे फल विषफल थे इसलिए वह आहार जल का त्याग कर मरणकर हैमवत भोगभूमि में उत्पन्न हो गई। वहाँ की आयु पूर्ण कर स्वयंप्रभद्वीप में स्वयंप्रभ नामक देव की स्वयंप्रभा नाम की देवी हुई। वहाँ से चयकर इसी जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र संबंधी जयंतपुर नगर के राजा श्रीधर और रानी श्रीमती के विमलश्री नाम की सुन्दर कन्या हुई। वह भद्रिलपुर के राजा मेघरथ की प्रिय रानी हुई। एक दिन राजा ने धर्म नाम के मुनिराज के पास दीक्षा ले ली। तब रानी विमलश्री ने भी पद्मावती नामक आर्यिका के पास आर्यिका दीक्षा ले ली और आचाम्लवर्धन नाम का उपवास किया। आयु के अन्त में मरकर उपवास आदि के फलस्वरूप वह बारहवें स्वर्ग में देवी हो गई। वहाँ से चयकर अरिष्टपुर नगर के राजा हिरण्यवर्मा की रानी श्रीमती के पद्मावती कन्या हुई पश्चात् युवती होने पर श्रीकृष्ण की पट्टरानी हुई है। जब समवसरण में श्रीकृष्ण के पूछने पर भगवान की दिव्यध्वनि खिरी-हे भद्र! बारह वर्ष बाद मदिरा का निमित्त पाकर यह द्वारावती नगरी द्वीपायन के द्वारा निर्मूल नष्ट हो जाएगी तथा जरत्कुमार के द्वारा श्रीकृष्ण का मरण होगा। तीर्थंकर भगवान का यह उपदेश सुनकर द्वीपायन तो उसी समय संयम को धारण कर दूसरे देश को चला गया तथा जरत्कुमार कौशाम्बी के वन में जा पहुंचा तथा श्रीकृष्ण ने तीर्थंकर प्रकृति के बंध की कारणभूत सोलह कारण भावनाओं में चिंतवन किया और स्त्री, बालक आदि सबके लिए घोषण कर दी कि मैं तो दीक्षा लेने में समर्थ नहीं हूँ परन्तु जो समर्थ हों-लेना चाहें उन्हें मैं रोकता नहीं हूँ। यह सुनकर श्रीकृष्ण की सत्यभामा, रुक्मिणी, जाम्बवती, सुसीमा, लक्ष्मणा, गान्धारी, गौरी और पद्मावती इन आठों महारानियों ने श्रीकृष्ण से आज्ञा लेकर भगवान के समवशरण में जाकर गणिनी आर्यिका राजीमती के पास आर्यिका दीक्षा ले ली१। हरिवंशपुराण में भी बतलाया गया है कि श्रीवरदत्त गणधर ने इन रानियों के पूर्व भव सुनाये और बतलाया कि तुम सभी इसी भव में तपश्चरण कर स्वर्ग में देवपद को प्राप्त करोगी। पश्चात् वहाँ से च्युत होकर मनुष्य पर्याय में आकर जैनेश्वरी दीक्षा धारण कर उसी भव से मोक्ष प्राप्त करोगी।२ इस प्रकार इन आठों रानियों ने आर्यिका दीक्षा लेकर सम्यक्त्व और संयम के प्रभाव से स्त्रीलिंग को छेदकर स्वर्ग में देवपद को प्राप्त कर लिया है, आगे ये तीसरे भव में नियम से मोक्ष प्राप्त करेंगी।