ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.png
Whatsappicon.png
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें |


पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर, रविवार से ११ दिसंबर २०१६, रविवार तक प्रातः ६ बजे से ७ बजे तक सीधा प्रसारण होगा | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

आद्यवक्तव्य

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


[सम्पादन]
आद्यवक्तव्य

San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
San343434 copyfgd.jpg
-प्रो. टीकमचंद जैन (प्रतिष्ठाचार्य), दिल्ली

षट्खण्डागम ग्रंथराज का परमपूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी कृत सिद्धान्तचिंतामणिटीका समन्वित संस्करण का पंचम ग्रंथ (पुस्तक) आपके समक्ष प्रस्तुत है। षट्खण्डागम जैन वाङ्मय का एक अत्यन्त प्रामाणिक ग्रंथ है। केवली की वाणी द्वारा निबद्ध द्वादशांग श्रुतस्कंध से सीधा संबंध होने के कारण इसकी प्रामाणिकता निर्विवाद है। इसकी रचना के संबंध में प्रस्तुत टीका के प्रारंभ में ही टीकाकत्र्री द्वारा सुन्दररूपेण उल्लेख किया गया है, जिसका हिन्दी अनुवाद दृष्टव्य है-

‘‘श्री महावीर स्वामी रूपी हिमगिरि-हिमवान् पर्वत के मध्य में स्थित पद्मसरोवररूपी मुखकमल से निकलकर श्री गौतमगणधर स्वामी मुखरूपी कुण्ड में गिरकर प्रवाहित हुई द्वादशांग और अंगबाह्यरूपी गंगा नदी परम पवित्र है। यह नदी आचार्य परम्परा से बहती हुई श्री धरसेन आचार्य के द्वारा स्पर्शित हुई। श्री धरसेनाचार्य की उस ज्ञानगंगा में अवगाहन करके आचार्य श्री पुष्पदन्त और भूतबली भट्टारक ने श्रुतज्ञान से अपनी आत्मा को पवित्र किया।’’

अर्थात् श्री धरसेनाचार्य के शिष्यद्वय श्री पुष्पदन्ताचार्य एवं श्री भूतबली आचार्य द्वारा छह हजार आठ सौ इकतालीस (६८४१) सूत्र प्रमाण प्राकृत भाषा में रचित सत्कर्म पाहुड़ ही षट्खण्डागम के रूप में प्रसिद्ध है। इसके क्रमश: जीवस्थान, क्षुद्रकबंध, बंधस्वामित्व विचय, वेदनाखण्ड, वर्गणाखण्ड और महाबंध नाम के छह खण्ड हैं। इनमें से प्रथम खण्ड में समाविष्ट सत्प्ररूपणा से संबंधित एक सौ सतत्तर (१७७) सूत्र आचार्य श्री पुष्पदंत द्वारा रचित हैं तथा द्रव्य प्रमाणानुगम से लेकर शेष पाँचों खण्डों के सूत्र आचार्य श्री भूतबली द्वारा रचित हैं। छठा खण्ड महाबंध विस्तृत रूप से तीस हजार (३०,०००) सूत्र प्रमाण आचार्य श्री भूतबली द्वारा ही रचित है। इसे ही महाधवल कहते हैं। यह हिन्दी अनुवाद सहित सात भागों में प्रकाशित हुआ है। षट्खण्डागम ग्रंथराज के प्रथम पाँचों खण्डों की सुप्रसिद्ध टीका ‘धवला’ की रचना श्री वीरसेनाचार्य ने अब से लगभग बारह सौ (१२००) वर्ष पूर्व बहत्तर हजार (७२,०००) श्लोक प्रमाण प्राकृत संस्कृत मिश्रित भाषा में की है। वर्तमान में यह हिन्दी अनुवाद सहित सोलह (१६) पुस्तकों (ग्रंथों) के रूप में प्रकाशित हो चुकी हैं। उसी टीका को आधार बनाकर श्री वीरसागराचार्य की शिष्या गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने लगभग बारह सौ वर्ष बाद अपनी दिव्य एवं प्रासुक लेखनी से सभी स्तर के पाठकों के हितार्थ इस महान सिद्धान्तचिंतामणि टीका को प्रस्तुत कर वर्तमान एवं भावी पीढ़ी पर महान उपकार किया है। तदर्थ युगों-युगों तक इस महान युगप्रवर्तिका को कृतज्ञ एवं आदर के भावों से स्मरण किया जाता रहेगा।

श्री धरसेनाचार्य के ही समकालीन हुए श्री गुणधराचार्य द्वारा रचित कषायपाहुड़ पर यति वृषभाचार्य ने चूर्णि सूत्र लिखे और आचार्य वीरसेन स्वामी ने टीका लिखी किन्तु वे २० हजार श्लोक प्रमाण लिखकर ही स्वर्गवासी हुए, उनके सुयोग्य शिष्य श्री जिनसेनाचार्य ने ४० हजार श्लोक प्रमाण टीका लिखकर टीका को पूरा किया। ६० हजार श्लोक प्रमाण इस टीका का नाम जयधवला है। यह भी अनुवाद सहित प्रकाशित हो चुकी है।

इस प्रकार जो धवल, महाधवल और जयधवल नाम से प्रसिद्ध ग्रंथ शताब्दियों से मात्र पूजा की वस्तु बने हुए थे, वे समस्त जिज्ञासुुओं के स्वाध्याय हेतु सुलभ हो गये। इन सिद्धान्त ग्रंथों में निहित अपार ज्ञान निधि का लाभ पाठकगण प्राप्त कर सकते हैं। आचार्य श्री वीरसेन स्वामी ने लगभग १२०० वर्ष पूर्व षट्खण्डागम ग्रंथ की धवला टीका लिखने में जो श्रम किया होगा, उसका हम आकलन नहीं कर सकते। उनकी सूक्ष्म मार्मिक बुद्धि, अपार प्रज्ञा, विशाल स्मृति और भव्यजनों के प्रति अगाध वात्सल्य, जिसके फलस्वरूप महान आचार्य ने यह अनुपम निधि प्रदान की। इस श्रुत निधि को भविष्य हेतु सुरक्षित रखने हेतु बीसवीं सदी के प्रथम प्रभावी आचार्य चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागर जी महाराज की सद्प्रेरणा से धवलादि ग्रंथों को ताम्रपत्रों के ऊपर उत्कीर्ण कराया गया, तो फलटण (महाराष्ट्र) में विराजमान हैं। पूज्य आचार्यश्री ने ही अनेक विद्वानों को हिन्दी टीका लिखने हेतु प्रेरित किया। फलत: उनका ग्रंथ रूप में प्रकाशन होकर विज्ञ पाठकों के समक्ष प्रस्तुतीकरण हुआ। उन चारित्रचक्रवर्ती आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज की कृपा से ही बीसवीं सदी में लुप्तप्राय: दिगम्बर मुनिमुद्रा के दर्शन सुलभ हुए। बीसवीं सदी की प्रथम बालयोगिनी क्षुल्लिका श्री वीरमती जी ने आचार्यश्री के पास दक्षिण भारत में जाकर अनेकानेक अमूल्य सम्बोधन प्राप्त किये। सन् १९५५ में कुंथलगिरि पर उनकी अन्तिम सल्लेखना देखी और उनकी आज्ञानुसार सन् १९५६ में भगवान पाश्र्वनाथ के गर्भकल्याणक की तिथि वैशाख कृष्णा दूज को उनके प्रथम पट्टशिष्य पूज्य आचार्य श्री वीरसागर महाराज से राजस्थान के ‘माधोराजपुरा’ नगर में आर्यिका दीक्षा धारणकर ‘आर्यिका ज्ञानमती’ इस सार्थक नाम को प्राप्त किया। पूर्वाचार्यों से प्राप्त श्रुतनिधि के संरक्षण के साथ-साथ श्रुत को अपनी दिव्य लेखनी से अभिवृद्धित करने वाली विपुल साहित्य सृजनकत्र्री, साक्षात् सरस्वती की प्रतिकृति वाग्देवी, युगप्रवर्तिका, महान तीर्थोद्धारिका, जम्बूद्वीप निर्माण की सम्प्रेरिका, चारित्रचन्द्रिका, सिद्धान्त चव्रेश्वरी, गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी के रूप में विश्व वंद्य इस जीवन निधि को प्रदान करने हेतु भावी पीढ़ियाँ आचार्यश्री के महान उपकारों के प्रति सदैव कृतज्ञ रहेंगी।

पूर्वाचार्यों के तो दर्शन वर्तमान में हमें प्राप्त नहीं हैं, किन्तु उनके ज्ञान को सरलीकरण प्रक्रिया के द्वारा वर्तमान पीढ़ी तक पहुँचाने का श्रेय जिनको प्राप्त है, ऐसी परमपूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी के दर्शन व सान्निध्य प्राप्त करने वाले निश्चित ही सौभाग्यशाली हैं। ऐसी माताजी को लगभग ५४ वर्ष पूर्व जिनने आर्यिका दीक्षा प्रदान की, वे आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज तो पूज्य हैं ही, जिस स्थान पर दीक्षा ली वह माधोराजपुरा नगर भी दीक्षास्थली के रूप में प्रसिद्ध हो गया, जिसके विकास की नींव ७-३-१९९७ को पूज्य गणिनी आर्यिका श्री के ससंघ सानिध्य में ही विशाल जनसमुदाय की उपस्थिति में रखी गई और वहाँ भगवान पाश्र्वनाथ की विशाल प्रतिमा सहित वर्तमान चौबीसी का निर्माण पूर्णता की ओर है। यह सुखद संयोग ही है कि पूज्य माताजी के ७२वें जन्मदिवस आश्विन शुक्ला पूर्णिमा, दिनाँक ८-१०-१९९५ को माताजी की कर्मभूमि तीर्थक्षेत्र हस्तिनापुर से प्रारंभ की गई जीवस्थान नामक प्रथम खण्ड की सिद्धान्तचिंतामणि टीका उनकी दीक्षाभूमि माधोराजपुरा (राज.) में ७-३-१९९७ को सम्पूर्ण हुई। ऐसी युगप्रवर्तिका की दीक्षास्थली का उत्तरोत्तर विकास करना हमारा ही उत्तरदायित्व है। क्योंकि पूज्य माताजी ने तो तीन तीर्थंकरों की जन्मस्थली हस्तिनापुर में विश्वप्रसिद्ध जम्बूद्वीप की पावन रचना, तेरहद्वीपादि, अनेक मंदिरों की रचना करवाकर इसे विश्व के प्रमुख तीर्थक्षेत्र के रूप में प्रतिष्ठित करवा दिया है। उसी शृँखला में त्रयपद के धारक भगवान शांतिनाथ, कुंथुनाथ व अरहनाथ त्रय तीर्थंकरों की ३१ फुट उत्तुंग नयनाभिराम भव्य प्रतिमाओं की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा व महामस्तकाभिषेक का आयोजन विशाल स्तर पर ११ फरवरी से २१ फरवरी २०१० तक जम्बूद्वीप स्थल हस्तिनापुर में पूज्य माताजी के ससंघ सानिध्य में है, जिसमें देश-विदेश के अनेक भक्तजन सम्मिलित होकर पुण्यार्जन करेंगे। तीर्थ विकास क्रम में अयोध्या, मांगीतुंगी जी, अहिच्छत्र, प्रयाग, कुण्डलपुर जैसे अनेक तीर्थों का जीर्णोद्धार व विकास पूज्य माताजी की ही सद्प्रेरणा का परिणाम है। प्रथम खण्ड की सिद्धान्तचिंतामणि टीका का बहुभाग मांंगीतुंगी सिद्धक्षेत्र पर ही पूर्ण हुआ जहाँ पूज्य माताजी की प्रेरणा से १०८ फुट उत्तुंग भगवान आदिनाथ की प्रतिमा का निर्माणकार्य द्रुतगति से चल रहा है।

ऐसी अनुपम व्यक्तित्व व कृतित्व की धनी पूज्य माताजी ने अपनी दिव्य लेखनी से प्रसूत लगभग २५० ग्रंथों की पुनीत शृँखला में षट्खण्डागम ग्रंथराज की सिद्धान्तचिंतामणि टीका सरल संस्कृत भाषा में लिखकर सामान्य पाठकों हेतु भी बोधगम्य बना दिया है।

पूज्य माताजी के ६२वें जन्मदिवस पर हस्तिनापुर में प्रारंभ यह महान टीका अप्रैल २००७ में हस्तिनापुर में ही पूज्य माताजी के ५२वें दीक्षा दिवस पर सम्पूर्ण हुई। इस संस्कृत टीका का हिन्दी अनुवाद पूज्य माताजी की सुशिष्या प्रज्ञाश्रमणी, मर्यादा शिष्योत्तमा, काव्य प्रतिभा और वत्तृâत्व कला की धनी, वात्सल्यमूर्ति आर्यिका श्री चंदनामती माताजी ने करके इस महान ग्रंथराज की विषयवस्तु को सभी पाठकों के लिए बोधगम्य बना दिया। विशेषार्थों के माध्यम से पूज्य चंदनामती माताजी ने विषय को अधिक रोचकता प्रदान कर दी है तदर्थ हम सब पाठकगण आभारी रहेंगे।

षट्खण्डागम ग्रंथ की सिद्धान्तचिंतामणि टीकाकत्र्री पूज्य माताजी ने स्वयं लिखा है कि प्रस्तुत टीका का आधार श्री वीरसेनाचार्य द्वारा विरचित धवला टीका ही प्रमुख है। इस टीका की भाषा को सरल करने का प्रयास किया गया है तथा अनेक ग्रंथों के उद्धरण भी लिये गये हैं। यह जो सिद्धान्तचिंतामणि नाम की टीका है वह सिद्धान्तरूपी अमृत देने में कुशल है, यह टीका अपनी आत्मा में और अन्य पाठकों की आत्मा में केवलज्ञान को उत्पन्न करने में बीजभूत होवे, ऐसी प्रार्थना टीकाकत्र्री द्वारा की गई है। उपर्युक्त पंक्तियों से स्पष्ट है कि पूज्य माताजी का आगम ज्ञान असीम होते हुए भी वे आगम की सीमा को नहीं लांघती। पूज्य माताजी ने सभी महाधिकारों के प्रारंभ में अन्तर स्थलों की संख्या तथा सूत्रों की संख्या को बतलाकर ही विषयवस्तु का शुभारंभ किया गया है ताकि स्वाध्यायी सरलता से समझ सके कि इस अधिकार में क्या विषय है। टीकाकत्र्री का यह श्रमसाध्य कार्य तो सराहनीय है ही, आगे ग्रंथ पर शोध करने वाले जिज्ञासुओं के लिए ये समुदायपातनिकाएँ वुंâजी के समान सहायक भी सिद्ध होंगी। टीकाकत्र्री का यह अभिनव प्रस्तुतीकरण अन्तर्निहित विषयवस्तु के बारे में भूमिका लेखन की आवश्यकता कम कर देता है। फिर भी प्रस्तुत पंचम ग्रंथ की विषयवस्तु की संक्षिप्त जानकारी प्रस्तुत की जा रही है।

षट्खण्डागम ग्रंथ के जीवस्थान नामक प्रथम खण्ड की सूत्र संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अन्तर, भाव और अल्पबहुत्व कुल आठ प्ररूपणाओं में प्रथम पाँच प्ररूपणाओं का वर्णन पूर्व प्रकाशित चार ग्रंथों में किया गया है। अब प्रस्तुत पंचम ग्रंथ में अवशिष्ट तीन प्ररूपणाओं क्रमश:-अन्तरानुगम, भावानुगम और अल्पबहुत्वानुगम का वर्णन समाविष्ट है।

अन्तरानुगम-किसी विवक्षित गुणस्थानवर्ती जीव का उस गुणस्थान को छोड़कर अन्य गुणस्थान में चले जाने पर पुन: उसी गुणस्थान की प्राप्ति के पूर्व तक के काल को अन्तर काल या विरह या उच्छेद या परिणामान्तरगमन काल कहते हैं। सबसे छोटे अन्तर काल को जघन्य अन्तर तथा सबसे बड़े अन्तर काल को उत्कृष्ट अन्तर कहते हैं। ‘सिद्धान्तचिंतामणिटीका’ में पूज्य माताजी ने अन्तरानुगम अनुयोग द्वार को ओघ एवं आदेशरूप दो महाधिकारों मेें विभक्त किया है। ओघ का अर्थ सामान्य या अभेद है तथा आदेश का अर्थ विशेष अथवा भेद रहा है। उसमें विवक्षित विषय का विचार प्रथमत: ओघ (सामान्य) से मिथ्यात्व आदि चौदह गुणस्थानों के आधार से प्रथम महाधिकार में बीस (२०) सूत्रों में वर्णित किया है। तत्पश्चात् आदेश से गति, इन्द्रिय आदि १४ (चौदह) मार्गणाओं के आश्रय से प्रतिपाद्य विषय की प्ररूपणा करने वाले द्वितीय अधिकार में तीन सौ सतत्तर (३७७) सूत्र हैं, उसमें भी गतिमार्गणा में अस्सी (८०) सूत्र हैं, इन्द्रिय मार्गणा में उनतीस (२९) सूत्र हैं, कायमार्गणा में तेईस (२३) सूत्र हैं, योगमार्गणा में पच्चीस (२५) सूत्र हैं, वेदमार्गणा में पैंतालीस (४५) सूत्र हैं, कषायमार्गणा में छह (६) सूत्र हैं, ज्ञानमार्गणा में उनतीस (२९) सूत्र हैं, संयम मार्गणा में चौबीस (२४) सूत्र हैं, दर्शनमार्गणा में चौदह (१४) सूत्र हैं, लेश्यामार्गणा में बत्तीस (३२) सूत्र हैं, भव्यमार्गणा में तीन (३) सूत्र हैं, सम्यक्त्वमार्गणा में अड़तालीस (४८) सूत्र हैं, संज्ञीमार्गणा मेें पाँच (५) सूत्र हैं और आहारमार्गणा में चौदह (१४) सूत्र हैं। ग्रंथ के प्रारंभ में इस प्रकार समुदायपातनिका द्वारा पूज्य माताजी ने प्रतिपाद्य विषय का बोध करा दिया है।

नाना जीवों की अपेक्षा मिथ्यादृष्टियों में कभी अन्तर नहीं होता, वे सदा विद्यमान रहते हैं, एक जीव की अपेक्षा मिथ्यात्व का जघन्य अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त प्रमाण है तथा उत्कृष्ट अन्तरकाल कुछ कम दो छ्यासठ (६६²२) अर्थात् १३२ सागरोपम प्रमाण होता है। मार्गणाओं में आठ मार्गणाएँ ही होती हैं, जिनका अन्तर होता है, शेष सब निरन्तर रहती हैं।

भावानुगम-इस भाव प्ररूपणा में विभिन्न गुणस्थानों और मार्गणा स्थानों में होने वाले भावों का निरूपण किया गया है। कर्मों के उदय, उपशम आदि के निमित्त से जीव के उत्पन्न होने वाले परिणाम विशेषों को भाव कहते हैं। ये भाव औदयिक, औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक और पारिणामिक कुल पाँच प्रकार के हैं, भावानुगम नामक सातवें अनुयोग द्वार में पूज्य माताजी ने गुणस्थान वाले तृतीय महाधिकार मेें नौ (९) सूत्रों की टीका में बताया है कि किस गुणथान में कौन सा भाव होता है। चतुर्थ महाधिकार में गति आदि चौदह (१४) मार्गणास्थान में कौन सा भाव होता है इसका वर्णन कुल चौरासी (८४) सूत्रों में किया गया है, जिनमें गति आदि मार्गणाओं में क्रमश: बीस, एक, एक, नौ, दो, दो, चार, सात, तीन, तीन, दो, पच्चीस, दो और तीन सूत्र हैं।

सिद्धान्तचिंतामणि टीकाकत्र्री पूज्य माताजी ने जीव भावों की प्ररूपणा पूर्व पद्धति के अनुसार प्रथमत: ओघ की अपेक्षा तत्पश्चात् आदेश की अपेक्षा सुव्यवस्थित व क्रमबद्ध रूप में तृतीय एवं चतुर्थ महाधिकारों में की है।

अल्पबहुत्वानुगम-अल्पबहुत्व का अर्थ हीनाधिकता है। विवक्षित गुणस्थानवर्ती जीव अन्य गुणस्थानवर्ती जीवों से अल्प हैं या अधिक हैं इत्यादि का विचार जीवस्थान नामक प्रथम खण्ड के आठवें एवं अंतिम अनुयोगद्वार में पूर्व पद्धति के अनुसार ओघ की अपेक्षा और तत्पश्चात् आदेश की अपेक्षा किया गया है, सिद्धान्तचिंतामणि टीका में ओघ नामक पंचम महाधिकार में नौ स्थलों में छब्बीस (२६) सूत्रों की व्याख्या में गुणस्थानों की अपेक्षा जीवों का अल्पबहुत्व बतलाया गया है। तत्पश्चात् आदेश नामक छठे महाधिकार में चौदह अन्तराधिकारों में गति आदि चौदह मार्गणाओं के आश्रय से क्रमश: छियत्तर (७६), एक, एक, उनतालीस, त्रेपन, उन्नीस, अट्ठाईस, बयालीस, चार, अड़तीस, दो, पच्चीस, तीन और पच्चीस कुल तीन सौ छप्पन (३५६) सूत्रों की टीका में गति, इन्द्रिय आदि चौदह मार्गणाओं में जहाँ जो गुणस्थान संभव है, उनमें वर्तमान जीवों के अल्पबहुत्व को प्रकट किया गया है।

इस प्रकार महान ग्रंथराज षट्खण्डागम के प्रथम खण्ड जीवस्थान के अंतिम तीन अनुयोग द्वारों में से पाँचवें भावानुगम की टीका आश्विन शुक्ला ६, दिनाँक १८-१०-१९९६ को मांगीतुंगी तीर्थ पर प्रारंभ कर अल्पबहुत्वानुगम नामक आठवें अनुयोगद्वार की टीका पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी ने अंकलेश्वर (गुजरात) में मगसिर कृष्णा ७, दिनाँक २ दिसम्बर १९९६ को पूरी की। इस पंचम ग्रंथ में कुल ८७२ सूत्रों की सिद्धांतचिंतामणि टीका सरल संस्कृत भाषा में, श्री वीरसेनाचार्य कृत संस्कृत प्राकृत मिश्रित धवला टीका के आधार पर तथा अन्य ग्रंथों के उद्धरणों के साथ करके पूज्य माताजी ने हम सब पर बहुत उपकार किया है और भारतीय साहित्य भण्डार को अमूल्य निधि प्रदान की है। पूज्य माताजी की ही सुशिष्या प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी ने इसका हिन्दी अनुवाद करके सभी पाठकों के लिए ग्रंथराज की विषय वस्तु को बोधगम्य बना दिया है।

प्रस्तावना लेखन के निमित्त से बीसवीं-इक्कीसवीं सदी की महान लेखिका, सरस्वती की प्रतिमूर्ति, युगप्रवर्तिका, चारित्रचन्द्रिका, सिद्धान्तचव्रेश्वरी द्वारा कृत सिद्धान्तचिंतामणि टीका को पढ़ने का मुझे भी सौभाग्य प्राप्त हुआ। आप भी आचार्य पुष्पदन्त भूतबलि के साक्षात वचन रूप सूत्रों को पढ़कर असंख्य कर्मों की निर्जरा करें तथा उनके बीजरूप भावों को अभिव्यक्त करने वाली इस सिद्धान्तचिंतामणि टीका का स्वाध्याय करके अपने सम्यग्ज्ञान की वृद्धि करते हुए अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग एवं बहुश्रुतभक्ति भावना का फल प्राप्त करें। वर्तमान की सरस्वती माता के रूप में विराजमान विश्व की अमूल्य निधि पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की सतत् प्रवाहमान दिव्य लेखनी से प्रसूत सत्साहित्य चिरकाल तक उन्हीं की प्रेरणा से संस्थापित दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर की वीर ज्ञानोदय ग्रंथमाला से प्रज्ञाश्रमणी पूज्य आर्यिका श्री चंदनामती माताजी के मार्गदर्शन एवं पीठाधीश क्षुल्लक श्री मोतीसागर जी महाराज के निर्देशन में कर्मयोगी ब्र.रवीन्द्र कुमार जैन जी के सम्पादकत्व में प्रकाशित होकर देश-विदेश में तीर्थंकरों की वाणी का प्रसार कर विश्व में शाश्वत सुख शक्ति का मार्ग प्रशस्त करे, यही भगवान जिनेन्द्र से प्रार्थना है।