ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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आद्य वक्तव्य (हिन्दी टीकाकर्त्री की कलम से)

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हिन्दी टीकाकत्र्री की कलम से आद्य वक्तव्य

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षट्खण्डागम ग्रंथ की सिद्धान्तचिंतामणि टीका से समन्वित संस्करण का यह चतुर्थ ग्रंथ आपके हाथों में आ रहा है। जीवस्थान नाम से षट्खण्डागम का प्रथम खण्ड माना गया है। इस जीवस्थान की पूर्व प्रकाशित तीन पुस्तकों में पाठकों ने सत्प्ररूपणा (प्रथम ग्रंथ में), सत्प्ररूपणा के अन्तर्गत आलाप अधिकार (द्वितीय ग्रंथ में) तथा संख्याप्ररूपणा में द्रव्यप्रमाणानुगम एवं तृतीय क्षेत्रप्ररूपणा के अंदर क्षेत्रानुगम (तृतीय ग्रंथ में) की विषय वस्तु पढ़ी है। पुनश्च इस चतुर्थ ग्रंथ में चतुर्थ एवं पंचम प्ररूपणानुसार स्पर्शनानुगम और कालानुगम का वर्णन है। यद्यपि धवला टीका वाले षट्खण्डागम ग्रंथों में क्षेत्रानुगम, स्पर्शनानुगम और कालानुगम को एक ही चतुर्थ ग्रंथ में समाविष्ट किया गया है किन्तु गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी ने अपने द्वारा रचित सिद्धांतचिंतामणि टीका युक्त षट्खण्डागम ग्रंथों में द्रव्यप्रमाणानुगम के साथ तृतीय गं्रथ मेें क्षेत्रानुगम को भी समाविष्ट किया है अत: इस चतुर्थ ग्रंथ में स्पर्शनानुगम और कालानुगम नाम के दो अनुयोगद्वारों का ही वर्णन किया जा रहा है।

स्पर्शनप्ररूपणा में यह बतलाया गया है कि भिन्न-भिन्न गुणस्थान वाले जीव तथा गति आदि भिन्न-भिन्न मार्गणास्थान वाले जीव तीनों कालों में कितना क्षेत्र स्पर्श कर पाते हैं। इससे स्पष्ट है कि क्षेत्र और स्पर्शन प्ररूपणाओं में विशेषता इतनी ही है कि क्षेत्रप्ररूपणा तो केवल वर्तमानकाल की ही अपेक्षा रखती है, किन्तु स्पर्शन प्ररूपणा में अतीत और अनागतकाल का भी, अर्थात् तीनों कालों का क्षेत्रमान ग्रहण किया जाता है। उदाहरणार्थ-क्षेत्रप्ररूपणा में सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों का क्षेत्र लोक का असंख्यातवाँ भाग बताया गया है। यह क्षेत्र वर्तमानकाल से ही संबंध रखता है, अर्थात् वर्तमान में इस समय स्वस्थानादि यथासंभव पदों को प्राप्त सासादनसम्यग्दृष्टि जीव लोक के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र को व्याप्त करके विद्यमान हैं। यही बात स्पर्शनप्ररूपणा में वर्तमानकालिक स्पर्शन को बताते समय कही है। उसके पश्चात् दूसरे सत्र में अतीतकालसंबंधी स्पर्शनक्षेत्र बतलाया गया है कि सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों ने अतीतकाल में देशोन आठ बटे चौदह (८/१४) और बारह बटे चौदह (१२/१४) भाग स्पर्श किये हैं। इसका अभिप्राय जान लेना आवश्यक है। तीन सौ तेंतालिस घनराजू प्रमित इस लोकाकाश के ठीक मध्य भाग में वृक्ष में सारके समान एक राजु लम्बी चौड़ी और चौदह राजु ऊँची लोकनाली अवस्थित है। इसे त्रसनाली कहते हैं, क्योंकि त्रसजीवोें का संचार इसके ही भीतर होता है। केवल कुछ अपवाद हैं, जिनमें कि इसके भी बाहर त्रसजीवों का पाया जाना संभव है। इस त्रसनाली के एक-एक राजु लम्बे, चौड़े और मोटे भाग बनाए जावें तो चौदह भाग होते हैं। उनमें से जो जीव जितने घनराजुप्रमाण क्षेत्र को स्पर्श करता है, उसका उतना ही स्पर्शनक्षेत्र माना जाता है। जैसे प्रकृत में सासादनसम्यग्दृष्टियों का स्पर्शनक्षेत्र आठ बटे चौदह (८/१४) या बारह बटे चौदह (१२/१४) भाग बताया गया है। इनमें से विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिकसमुद्धातगत सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों ने उक्त त्रसनाली के चौदह भागों में से आठ भागों को स्पर्श किया है, अर्थात् आठ घनराजुप्रमाण त्रसनाली के भीतर ऐसा एक प्रदेश नहीं है कि जिसे अतीतकाल में सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों ने (देव, मनुष्य, तिर्यंच और नारकी, इन सभी ने मिलकर) स्पर्श न किया हो। यह आठ घनराजु प्रमाण क्षेत्र त्रसनाली के भीतर जहाँ कहीं नहीं लेना चाहिए, किन्तु नीचे तीसरी वालुका पृथिवी से लेकर ऊपर सोलहवें अच्युतकल्प तक लेना चाहिए। इसका कारण यह है कि भवनवासी देव स्वत: नीचे तीसरी पृथिवी तक विहार करते हैं और ऊपर सौधर्मविमान के शिखरध्वजदंड तक। किन्तु उपरिम देवों के प्रयोग से ऊपर अच्युतकल्प तक भी विहार कर सकते हैं। उनके इतने क्षेत्र में विहार करने के कारण उक्त क्षेत्र का मध्यवर्ती एक भी आकाश-प्रदेश ऐसा नहीं बचा है कि जिसे अतीतकाल में उक्त गुणस्थानवर्ती देवों ने स्पर्श न किया हो। इस प्रकार इस स्पर्श किये गये क्षेत्र को लोकनाली के चौदह भागों में से आठ भागप्रमाण स्पर्शनक्षेत्र कहते हैं। मारणान्तिक समुद्धात की अपेक्षा उक्त गुणस्थानवर्ती जीवों ने लोकनाली के चौदह भागों में से बारह भाग स्पर्श किये हैं। इसका अभिप्राय यह है कि छठी पृथिवी के सासादनगुणस्थानवर्ती नारकी मध्यलोक तक मारणान्तिकसमुद्धात कर सकते हैं और सासादनसम्यग्दृष्टि भवनवासी आदि देव आठवीं पृथिवी के ऊपर विद्यमान पृथिवीकायिक जीवों में मारणान्तिकसमुद्धात कर सकते हैं, या करते हैं। इस प्रकार मेरुतल से छठी पृथिवी तक के ५ राजु और ऊपर लोकान्त तक के ७ राजु, दोनों मिलाकर १२ राजु हो जाते हैं। यही बारह घनराजुप्रमाण क्षेत्र त्रसनाली के बारह बटे चौदह (१२/१४) भाग अथवा त्रसनाली के चौदह भागों से बारह भाग प्रमाण स्पर्शनक्षेत्र कहा जाता है।

इस उक्त प्रकार से बतलाये गये स्पर्शनक्षेत्र को यथासंभव जान लेना चाहिए। ध्यान रखने की बात केवल इतनी ही है कि वर्तमानकालिक स्पर्शनक्षेत्र तो लोक के असंख्यातवें भाग प्रमाण होता है, किन्तु अतीतकालिक स्पर्शनक्षेत्र त्रसनाली के चौदह भागों में से यथासंभव १/१४, २/१४ को आदि लेकर १२/१४ तक होता है। मिथ्यादृष्टि जीवों का मारणान्तिक, वेदना, कषायसमुद्धात आदि की अपेक्षा सर्वलोक स्पर्शनक्षेत्र होता है, क्योंकि सारे लोक में सर्वत्र ही एकेन्द्रिय जीव ठसाठस भरे हुए हैं और गमनागमन कर रहे हैं, अतएव उनके द्वारा समस्त लोकाकाश वर्तमान में भी स्पर्श हो रहा है और अतीतकाल में भी स्पर्श किया जा चुका है।

इन एकेन्द्रिय मिथ्यादृष्टि जीवों के अतिरिक्त सयोगिकेवली भगवान भी प्रतरसमुद्धात के समय लोक के असंख्यात बहु भागों को और लोकपूरणसमुद्धात के समय सर्व लोकाकाश को स्पर्श करते हैं तथा उपपाद और मारणान्तिकसमुद्धात वाले त्रसनाली के बाहर अस्तित्व पाया जाता है। वह इस प्रकार से कि लोक के अंतिम वातवलय में स्थित कोई जीव मरण करके विग्रहगति द्वारा त्रसनाली के अन्त:स्थित त्रसपर्याय में उत्पन्न होने वाला है वह जीव जिस समय मरण करके प्रथम मोड़ लेता है, उस समय त्रसपर्याप्त को धारण करने पर भी वह त्रसनाली के बाहर है अतएव उपपाद की अपेक्षा त्रसजीव त्रसनाली के बाहर रहता है। इसी प्रकार त्रसनाली में स्थित किसी ऐसे त्रसजीव ने जिसे कि त्रसनाली के बाहर रहना है। इसी प्रकार त्रसनाली में स्थित किसी ऐसे त्रसजीव ने जिसे कि त्रसनाली के बाहर मरकर उत्पन्न होना है मारणान्तिकसमुद्धात के द्वारा त्रसनाली के बाहर के आकाश-प्रदेशों का स्पर्श किया, तो उस समय भी त्रसजीव का अस्तित्व त्रसनाली के बाहर पाया जाता है। उक्त तीन अवस्थाओं को छोड़कर शेष त्रसजीव त्रसनाली के बाहर कभी नहीं रहते हैं।

इस प्रकार चौदह गुणस्थानों और चौदह मार्गणास्थानों में उक्त स्वस्थानादि दश पदों को प्राप्त जीवों का स्पर्शनक्षेत्र इस स्पर्शनप्ररूपणा में बतलाया गया है।

सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों का क्षेत्र निकालते हुए प्रसंगवश असंख्यात द्वीप-समुद्रों के ऊपर आकाश में स्थित समस्त चंद्रों के प्रमाण को भी गणितशास्त्र के अनेक अदृष्टपूर्व करणसूत्रों के द्वारा निकाला गया है और साथ ही यह बताया गया है कि एक चंद्र के परिवार में एक सूर्य, अठासी ग्रह, अट्ठाईस नक्षत्र और छ्यासठ हजार नौ सौ पचहत्तर कोड़ाकोड़ी (६६९७५००००००००००००००) तारे होते हैं। इन चारों प्रकार के परिवार के प्रमाण से चन्द्र बिम्बों की संख्या को गुणा कर देने पर समस्त ज्योतिष्क देवों का प्रमाण निकल आता है।

इसी बीच में धवलाकार ने ज्योतिष्क देवों के भागहार को उत्पन्न करने वाले सूत्र से अवलम्बित युक्ति के बल से यह सिद्ध किया है कि चूँकि-स्वयंभूरमणसमुद्र के परभाग में भी राजु के अर्धच्छेद पाये जाते हैं, इसलिए स्वयंभूरमण समुद्र के परभाग में भी असंख्यात द्वीप-समुद्रों के व्यास-रुद्र योजनों से संख्यात हजार गुने योजन आगे जाकर तिर्यग्लोक की समाप्ति होती है, अर्थात् स्वयंभूरमणसमुद्र की बाह्यवेदिका के परे भी पृथिवी का अस्तित्व है, वहाँ भी राजु के अर्धच्छेद उपलब्ध होते हैं, किन्तु वहाँ पर ज्योतिषी देवों के विमान नहीं हैं।

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कालानुगम

उक्त प्ररूपणाओं के समान कालप्ररूपणा में भी ओघ और आदेश की अपेक्षा काल का निर्णय किया गया है, अर्थात् यह बतलाया गया है कि यह जीव किस गुणस्थान या मार्गणास्थान में कम से कम कितने काल तक रहता है और अधिक से अधिक कितने काल रहता है। उत्तर में बतलाया गया है कि नानाजीवों की अपेक्षा तो मिथ्यादृष्टि जीव सर्वकाल ही मिथ्यात्व गुणस्थान में रहते हैं, अर्थात् तीनों काल में ऐसा एक भी समय नहीं है, जबकि मिथ्यादृष्टि जीव न पाये जाते हों। किन्तु एक जीव की अपेक्षा मिथ्यात्व काल तीन प्रकार का होता है-अनादि-अनंत, अनादि-सान्त और सादि-सान्त। जो अभव्य जीव हैं, अर्थात् त्रिलोक में भी जिनको सम्यक्त्व की प्राप्ति नहीं होना है, ऐसे जीवों के मिथ्यात्व का काल अनादि-अनन्त होता है, क्योंकि उनके मिथ्यात्व का कभी आदि हैं, न अन्त। जो अनादिमिथ्यादृष्टि भव्य जीव हैं, उनके मिथ्यात्व का काल अनादि-सान्त है, अर्थात् अनादिकाल से आज तक सम्यक्त्व की प्राप्ति न होने से तो उनका मिथ्यात्व अनादि है, किन्तु आगे जाकर सम्यक्त्व की प्राप्ति और मिथ्यात्व का अन्त हो जाने से वह मिथ्यात्व सान्त है। धवलाकार ने इस प्रकार के जीवों में से वर्धनकुमार का दृष्टान्त दिया है, जो कि उस पर्याय में सर्वप्रथम सम्यक्त्वी हुए थे। इस प्रकार सर्व प्रथम सम्क्त्व को उत्पन्न करने वाले जीवों के सम्यक्त्व प्राप्ति के पूर्व समय तक उनके मिथ्यात्व का काल अनादि-सान्त समझना चाहिए। जिन जीवों ने एक बार सम्यक्त्व को प्राप्त कर लिया, तथापि परिणामों के संक्लेशादि निमित्त से जो फिर भी मिथ्यात्व को प्राप्त हो जाते हैं, उनके मिथ्यात्व का काल सादि-सान्त माना जाता है, क्योंकि उनके मिथ्यात्व का आदि और अन्त ये दोनों पाये जाते हैं। इस प्रकार के जीवों में भी श्रीकृष्ण का दृष्टान्त पाया जाता है।

प्रकृत में अनादि-अनन्त और अनादि-सान्त मिथ्यात्व के काल को छोड़कर सादि-सान्त मिथ्यात्वकाल की ही विवक्षा की गई है और उसी की अपेक्षा मिथ्यादृष्टि गुणस्थान का जघन्य और उत्कृष्टकाल बतलाया गया है।

मिथ्यादृष्टि गुणस्थान का जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्त बतलाया गया है, जिसका अभिप्राय यह है कि यदि कोई सम्यग्मिथ्यादृष्टि या असंयतसम्यग्दृष्टि या संयतासंयत या प्रमत्तसंयत जीव परिणाम के निमित्त से मिथ्यात्व को प्राप्त हुआ और मिथ्यात्वदशा में सबसे छोटे अन्तर्मुहूर्तकाल तक रहकर पुन: सम्यग्मिथ्यात्व को या असंयतसम्यक्त्व को या संयमासंयम अथवा अप्रमत्तसंयम को प्राप्त हो गया, तो ऐसे जीव के मिथ्यात्व का जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्तप्रमाण पाया जाता है। ऐसे मिथ्यात्व को सादि-सान्त कहते हैं, क्योंकि उसके आदि और अन्त दोनों पाये जाते हैं। इस सादि-सान्त मिथ्यात्व का उत्कृष्टकाल कुछ कम अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण है। इसका अभिप्राय यह है कि जब कोई जीव प्रथम बार सम्यक्त्वी होकर पुन: मिथ्यात्वी हो जाता है तो वह अधिक से अधिक अर्धपुद्गलपरिवर्तनकाल के भीतर अवश्य ही पुन: सम्यक्त्व प्राप्त कर मोक्ष चला जाता है। इस ग्रंथ में प्रसंगोपात्त धवला ग्रंथ में दिये गये चार्ट के अनुसार गुणस्थानों की अपेक्षा एवं मार्गणाओं की अपेक्षा क्षेत्र, स्पर्शन और काल का प्रमाण दिखाया गया है, उन दोनों चार्टों से एक जीव तथा नाना जीवों की त्रैकालिक स्थिति पाठकों की दृष्टि में आएगी।

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षट्खण्डागम की धवला आदि टीकाएँ

षट्खण्डागम की धवला टीका नौवीं सदी के प्रारंभ में आचार्यश्री वीरसेन स्वामी द्वारा लिखी गई थी। श्री वीरसेनाचार्य तत्वज्ञानी और धार्मिक दिव्यपुरुष थे। शोधकर्ता बताते हैं कि वे वस्तुत: गणितज्ञ नहीं थे अत: जो गणितशास्त्रीयसामग्री धवला टीका के अन्तर्गत है, वह उनसे पूर्ववर्ती लेखकों की कृति कही जा सकती है और मुख्यतया पूर्वगत टीकाकारों की, जिनमें से पाँच का इन्द्रनन्दी ने अपने श्रुतावतार में उल्लेख किया है। ये टीकाकार कुन्दकुन्द, शामकुंड, तुंबुलूर, समन्तभद्र और बप्पदेव थे, जिनमें से प्रथम लगभग सन् २०० के और अंतिम सन् ६०० के लगभग हुए। अत: धवला की अधिकांश गणितशास्त्रीयसामग्री सन् २०० से ६०० तक के बीच के समय की मानी जाती है। इस प्रकार भारतवर्षीय गणित शास्त्र के इतिहासकारों के लिए धवला प्रथम श्रेणी का महत्वपूर्ण ग्रंथ हो जाता है, क्योंकि उसमें हमें भारतीय गणितशास्त्र के इतिहास के सबसे अधिक अंधकारपूर्ण समय, अर्थात् पाँचवी शताब्दी से पूर्व की बातें मिलती हैं। विशेष शोध एवं अध्ययन करके विद्वानों के द्वारा यह बात और भी पुष्ट की गई है कि धवला की गणितशास्त्रीय सामग्री सन् ५०० से पूर्व की है।

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अनन्त का वर्गीकरण

षट्खण्डागम की चतुर्थ पुस्तक की धवलाटीका में अनन्त का वर्गीकरण पाया जाता है। साहित्य में अनन्त शब्द का उपयोग अनेक अर्थों में हुआ है। जैन वर्गीकरण में उन सबका ध्यान रखा गया है। जैन वर्गीकरण के अनुसार अनन्त के ग्यारह प्रकार हैं। जैसे-

(१) नामानन्त-नाम का अनन्त। किसी भी वस्तु-समुदाय के यथार्थत: अनन्त होने या न होने का विचार किये बिना ही केवल उसका बहुत्व प्रगट करने के लिए साधारण बोलचाल में अथवा अबोध मनुष्यों द्वारा या उनके लिए अथवा साहित्य में उसे अनन्त कह दिया जाता है। ऐसी अवस्था में ‘अनन्त’ शब्द का अर्थ नाम मात्र का अनन्त है। इसे ही नामानन्त कहते हैं।

(२) स्थापनानन्त-आरोपित या आनुषंगिक, या स्थापित अनन्त। यह भी यथार्थ अनन्त नहीं है। जहाँ किसी वस्तु में अनन्त का आरोपण कर लिया जाता है, वहाँ इस शब्द का प्रयोग किया जाता है।

(३) द्रव्यानन्त-तत्काल उपयोग में न आते हुए ज्ञान की अपेक्षा अनन्त। इस संज्ञा का उपयोग उन पुरुषों के लिए किया जाता है जिन्हें अनन्त-विषयक शास्त्र का ज्ञान है, जिसका वर्तमान में उपयोग नहीं है।

(४) गणनानन्त-संख्यात्मक अनन्त। यह संज्ञा गणितशास्त्र में प्रयुक्त वास्तविक अनन्त के अर्थ में आई है।

(५) अप्रदेशिकानन्त-परिमाणहीन अर्थात् अत्यन्त अल्प परमाणुरूप।

(६) एकानन्त-एकदिशात्मक अनन्त। यह वह अनन्त है जो एक दिशा में सीधी एक रेखारूप से देखने में प्रतीत होता है।

(७) विस्तारानन्त-द्विविस्तारात्मक अथवा पृष्ठदेशीय अनन्त। इसका अर्थ है प्रतरात्मक अनन्ताकाश।

(८) उभयानन्त-द्विदिशात्मक अनन्त। इसका उदाहरण है कि एक सीधी रेखा जो दोनों दिशाओं में अनन्त तक जाती है।

(९) सर्वानन्त-आकाशात्मक अनन्त। इसका अर्थ है त्रिधा-विस्तृत अनन्त अर्थात् घनाकार अनन्ताकाश।

(१०) भावानन्त-तत्काल उपयोग में आते हुए ज्ञानकी अपेक्षा अनन्त। इस संज्ञा का उपयोग उस पुरुषके लिए किया जाता है जिसे अनन्त-विषयक शास्त्र का ज्ञान है और जिसका उस ओर उपयोग है।

(११) शाश्वतानन्त-नित्यस्थायी या अविनाशी अनन्त।

पूर्वोक्त वर्गीकरण बहुत व्यापक है, जिसमें उन सब अर्थों का समावेश हो गया है जिन अर्थों में कि ‘अनन्त’ संज्ञा का प्रयोग जैन साहित्य में हुआ है।

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सिद्धान्तचिंतामणि संस्कृत टीका युग की महान देन है-

पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने मेरे नम्र निवेदन को निमित्त मानकर ८ अक्टूबर सन् १९९५ को शरदपूर्णिमा के दिन मंगलाचरणपूर्वक षट्खण्डागम के सूत्रों पर संस्कृत टीका रचना प्रारंभ की और ४ अप्रैल २००७ को वैशाख कृ. द्वितीया को अपने आर्यिका दीक्षा के ५१वें वर्ष के समापन पर सोलहों पुस्तकों की टीका लिखकर पूर्ण की। अर्थात् ११ वर्ष ६ माह में उन्होंने ३१०७ पृष्ठों की हस्तलिखित प्रतियाँ हम लोगों को प्रदान की हैं। साहित्य जगत के लिए यह उनकी अभूतपूर्व देन है। उनमें से इस चतुर्थ पुस्तक की टीका का लेखन उन्होंने सन् १९९६ में मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र पर वर्षायोग के मध्य बहुत ही अल्पसमय में किया है, जिसके प्रकाशन का संयोग अब बना है।

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हिन्दी टीका के संदर्भ में-

यद्यपि पूज्य माताजी के कठोर परिश्रम को निरन्तर ३९ वर्षों से (सन् १९६९ से) मैं अपनी आँखों से देखकर काफी प्रेरणा प्राप्त करती हूँ कि अपने जीवन का कोई क्षण व्यर्थ न जाने पावे, किन्तु बुद्धि के मंद क्षयोपशमवश उनकी समानता तो जनम-जनम में भी नहीं की जा सकती है। फिर भी उनके ज्ञानामृत से सिंचित मेरे शुष्क जीवन-उपवन में कुछ ज्ञान के अंकुर प्रस्फुटित हुए अर्थात् पूज्य माताजी ने सन् १९६९ से (११ वर्ष की उम्र में) मुझे धर्मग्रंथों का अध्ययन कराकर त्यागमार्ग में अग्रसर किया और सन् १९८९ में आर्यिका दीक्षा प्रदान कर ‘‘चन्दनामती’’ बनाया, तब से अहर्निश उनकी छत्रछाया में रत्नत्रय साधना और ज्ञान की आराधना करने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है। उसी के फलस्वरूप मुझे भी कुछ साहित्य सेवा का पुण्यार्जन हो जाता है।

मुझे इस बात का महान गौरव है कि पूज्य माताजी ने इस संस्कृत टीका का हिन्दी अनुवाद करने हेतु मुझे आदेश दिया, इसलिए अपने टूटी-फूटी भाषा में उनके गरिमापूर्ण शब्दों का शाब्दिक अर्थ करने का मैंने यह प्रयास किया है। मेरे हिन्दी अनुवाद करने पर सन् १९९८ में हिन्दी ‘‘टीकायुक्त’’ षट्खण्डागम का प्रथम ग्रंथ प्रकाशित हुआ, पुन: सन् २००५ में द्वितीय ग्रंथ प्रकाशित हुआ और सन् २००७ में तृतीय ग्रंथ हिन्दी अनुवाद सहित प्रकाशित ह्ुआ। अब यह चतुर्थ ग्रंथ हिन्दी अनुवाद सहित प्रस्तुत हो रहा है। दरअसल इन ग्रंथों के अनुवाद का कार्य यद्यपि मुझे शीघ्र करना चाहिए था किन्तु अपनी आर्यिका चर्या के परिपालन के साथ-साथ हजारों किलोमीटर की पदयात्रा, विशाल प्रभावनात्मक महोत्सव, अनेक अन्य ग्रंथों के सम्पादन, संघस्थ शिष्याओं के अध्ययन आदि की व्यस्तता के कारण मेरा यह कार्य मंदगति से अभी तक हो पाया है किन्तु आगे द्रुतगति से अनुवाद करने की भावना है जो पूज्य माताजी के शुभाशीर्वाद से ही संभव है।

इस आद्य वक्तव्य लेख के समापन पर सिद्धान्त ग्रंथ के पाठक बंधुओं से मेरा यही कहना है कि निष्पक्ष और निश्छद्म भावना से इसका अध्ययन कर अपने ज्ञान को परिमार्जित एवं वृद्धिंगत करें तथा वर्तमान की सरस्वती माता के रूप में विराजमान देश की अमूल्य निधि पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी हम सभी को चिरकाल तक इसी प्रकार का साहित्य प्रदान करती रहें, यही भगवान जिनेन्द्र से प्रार्थना है। जैनधर्म के अलंकार ग्रंथ (वाग्भट्टालंकार) में रचनाकार लेखकों एवं कवियों के गुण-अवगुणों का वर्णन करते हुए लिखा है कि-

प्रतिभाकरणं तस्य व्युत्पत्तिस्तु विभूषणाम्।

भृशोत्पत्तिकृदभ्यास इत्याद्यकविसंकथा।।

अर्थात् प्राचीन कवियों का मत है कि ‘‘प्रतिभा’’ काव्योत्पत्ति का हेतु है, ‘‘व्युत्पत्ति’’ से उस काव्य में शोभा का आधान होता है और अभ्यास से शीघ्र ही काव्यरचना संभव होती है। इसी में और भी बातें बताई हैं कि- अनर्थक, श्रुतिकटु, व्याहतार्थ, अलक्षण, स्वसंकेतप्रक्ऌप्तार्थ, अप्रसिद्ध, असम्मत और ग्राम्य ये आठ दोष जिस पद में आ जायें उसका प्रयोग नहीं करना चाहिए। किन्तु यदा-कदा कहीं पर ये दोष रहने पर भी दोष नहीं माने जाते। उपर्युक्त गुणों से सहित तथा दोषों से रहित गद्य-पद्य रचना का भाव ही पूज्य माताजी की कृतियों में स्पष्ट झलकता है। यही कारण है कि उनके साहित्य में कभी कोई विद्वान भी किसी प्रकार की छोटी-मोटी त्रुटि भी नहीं निकाल पाते हैं। यह उनकी विशेष प्रतिभाशक्ति ही माननी होगी कि बालोपयोगी साहित्य में उनका बच्चों के प्रति आकर्षण झलकता है, युवाओं के लिए उपयोगी साहित्य को पढ़कर उनकी युवा भावना का परिचय मिलता है कि कैसे युवाओं को धर्म के प्रति आकर्षित किया जा सकता है पुन: जब आगे बढ़कर प्रौढ़ ग्रंथों को देखते हैं तो माताजी का जहाँ विद्वानों के प्रति प्रौढ़ दृष्टिकोण झलकता है, वहीं ज्ञान का अथाह सागर उनके अंदर हिलोरें भरते नजर आता है। ग्रंथ रचने वालों के ज्ञान की चरमसीमा संस्कृत-प्राकृत रचनाओं के द्वारा ज्ञात होती है जिसे कि आप प्रस्तुत टीका ग्रंथ में साक्षात् देख सकते हैं अत: अब शोधकर्ताओं को दिग्भ्रमित होने की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती है।

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किन पूर्वाचार्यों की झलक है इस टीका में-

सबसे पहले सन् १९७२ में समयसार ग्रंथ की श्रीजयसेनाचार्यकृत ‘‘तात्पर्यवृत्ति’ नामक संस्कृत टीका का अध्ययन माताजी ने जब हम लोगों को करवाया तो उसकी सरल शैली के कारण अत्यन्त ऊँचा आध्यात्मिक विषय भी समझ में आने लगा। पुन: सन् १९७६ में ‘‘बृहद्द्रव्यसंग्रह’’ में श्री ब्रह्मदेव सूरि की टीका में तो आशातीत आनंद की अनुभूति हुई, धीरे-धीरे प्रवचनसार, पंचास्तिकाय, सर्वार्थसिद्धी, राजवार्तिक, अष्टसहस्री, परमात्मप्रकाश, समयसार, नियमसार आदि ग्रंथों का अध्ययन चला, उनकी टीकाएँ पढ़कर जो जिनागम का रहस्य खुलता है वह वास्तव में अकथनीय है।

इस ‘‘सिद्धांतचिंतामणि’’ टीका का हिन्दी अनुवाद करते समय मैंने सूक्ष्मता से अवलोकन किया तो लगा कि श्री जयसेनाचार्य एवं ब्रह्मदेवसूरि की टीका शैली की पूरी-पूरी छाप इसमें देखने को मिलती है। ठीक उसी प्रकार से अधिकारों के प्रारंभ में सूत्रों की समुदायपातनिका, टीका में पदखण्डना रूप से व्याख्या, पुन: मूलसूत्र में वर्णित एक-एक शब्द की व्युत्पत्ति आदि देकर अन्त में भावार्थ में टीका का सम्पूर्ण सार स्पष्ट किया गया है। इसकी हिन्दी टीका करने में मुझे जो ज्ञानामृत का रसास्वादन प्राप्त हुआ है वह लेखनी में निबद्ध नहीं किया जा सकता है। हाँ, इतना अवश्य है कि हिन्दी अनुवाद में विलम्ब होने के कारण इन ग्रंथों का प्रकाशन काफी देरी से हो पा रहा है।

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संघस्थ शिष्यों की अनुकूलता भी सराहनीय रही-

साहित्य सृजन आदि कार्यों में संघस्थ परिकर की अनुकूलता भी महत्वपूर्ण होती है, उनकी प्रतिकूलता कार्य में व्यवधान उत्पन्न करती है। जिस प्रकार से पूज्य माताजी के टीका लेखन में संघ के प्रत्येक सदस्य का योगदान रहा है। किसी ने समय पर उन्हें चौकी, बस्ता, कागज और पेन दिया तो किसी ने विद्युत प्रकाश आदि की समुचित व्यवस्था की, कोई लेखन के बाद बस्ते को व्यवस्थित करता तो कोई साथ-साथ पैदल चलकर माताजी के ज्ञान का लाभ उठाता पुन: कोई ब्रह्मचारिणी बहनें चौके आदि की व्यवस्था से सबको निद्र्वन्द्व रखतीं तो कोई वैय्यावृत्ति करके हम लोगों की थकान उतारतीं जिससे लेखन कार्य सुलभतया होने में कोई बाह्य या अन्तरंग विघ्न उपस्थित नहीं हुआ। इसी प्रकार से संघस्थ सभी लोगों ने मुझे भी हिन्दी अनुवाद करने में पूर्ण सहयोग प्रदान किया जिसके कारण यह हिन्दी अनुवाद मेरे द्वारा समयसीमा में पूर्ण हो सका है।

अनुकूलता के प्रसंग में जब मैं सूक्ष्मता से अवलोकन करती हूँ तो लगता है कि जम्बूद्वीप धर्मपीठ के पीठाधीश धर्मदिवाकर क्षुल्लकरत्न श्री मोतीसागर महाराज का सर्वाधिक योगदान रहा है इन ग्रंथों के सृजन में। सन् १९९० से रास्ते में उनका पूरा पद विहार हमारे साथ हुआ, उसकी थकान के बावजूद भी वे सदैव मेरा उत्साह ही बढ़ाया करते और कहा करते कि चंदनामती माताजी की हिम्मत से यह यात्रा हो रही है। प्रात;काल से ही बाहर की व्यवस्थाओं का खुद ध्यान रखकर मुझे निश्चिन्त करके बोलते कि अभी विहार में देरी है थोड़ा लेखन और कर लो। जहाँ गृहस्थों से ज्यादा शंका-समाधान, बोल-चाल के प्रसंग आते वहाँ भी वे स्वयं बिना आराम किये मुझे ही आराम करने को कहकर गृहस्थों से वार्तालाप करते। इतना ही नहीं, मोतीसागर महाराज ने सुबह से शाम तक हम लोगों की पूरी अनुकूलता करके भी कभी उलाहना नहीं दिया, बल्कि उनकी गुणग्राहकता हम सबके लिए विशेष अनुकरणीय रही है। मैं उनका किन शब्दों में आभार व्यक्त करूँ समझ में नहीं आता, उनसे आगे भी मुझे यही अपेक्षा है कि मेरा एवं अगली पीढ़ी के शिष्यों का उत्साहवर्धन इसी प्रकार करते रहें और जिनधर्म की प्रभावना में चार-चाँद लगाते रहें।

दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान के अध्यक्ष एवं वीर ज्ञानोदय ग्रंथमाला के सम्पादक मेरे गृहस्थावस्था के अग्रज बाल ब्र. कर्मयोगी रवीन्द्र कुमार जी की कर्मठता तो बेमिसाल है ही। सर्वांगीण योग्यता को प्राप्त कर लेने के बावजूद भी उन्हें कभी अपना पृथक् अस्तित्व प्रदर्शित करने की भावना नहीं दिखती है। यद्यपि वे भी अपने ज्ञान के उपयोग से इस प्रकार के ग्रंथों की हिन्दी टीका करने में पूर्णतया सक्षम हैं, तथापि पूज्य माताजी की निर्माणात्मक एवं प्रभावनात्मक योजनाओं को साकाररूप देने में अहर्निश परिश्रम करते हुए साहित्य संपादन का कार्य भी कुशलतापूर्वक करके आप सभी पाठकों को लाभान्वित करते हैं। यह उनका योगदान हम सभी को साहित्य सृजन में संबल प्रदान करता है।

संघस्थ ब्रह्मचारिणी बहनों में कु. बीना, आस्था, सारिका, चन्द्रिका, इन्दू, अलका, प्रीति, स्वाति, मंजू आदि सभी ने अपने-अपने योग्य कर्तव्य का पूर्णतया निर्वाह किया है, ये सभी बालब्रह्मचारिणी बहनें पूज्य माताजी की ज्ञानवाटिका की सुरभित कलियाँ हैं जो पुष्पित और पल्लवित होकर भविष्य में खूब सुगंध फैलावें तथा त्यागमार्ग में आगे बढ़कर निज-पर का कल्याण करें, यही उन सबके लिए मेरा मंगल आशीर्वाद है।

प्रस्तुत ग्रंथ के प्रूफ संशोधन आदि में प्रमुखरूप से कु. बीना एवं कु. आस्था ने सहयोग प्रदान किया है उन्हें अभीक्ष्णज्ञानोपयोग की प्राप्ति का विशेष आशीर्वाद है।

ग्रंथ का सुन्दर मुद्रण करने वाले पारस प्रिन्टर्स के संचालक श्री विजय कुमार जैन-दरियागंज, दिल्ली के लिए मंगल आशीर्वाद है एवं ग्रंथ को प्रकाशन की श्रेणी तक पहुँचाने में सहयोग प्रदान करने वाले युवा शिष्य चिरंजीव जीवन प्रकाश जैन के लिए शुभाशीर्वाद है। साथ ही ज्ञानमती नेटवर्क के कम्प्यूटर आपरेटर अंशुल मित्तल एवं मनोज जैन को आशीर्वाद है।

अपने विषय का उपसंहार करते हुए मैं आज (श्रावण शु. ११) अपने दीक्षित अवस्था के १९ वर्ष पूर्ण करके २०वें वर्ष में प्रवेश कर रही हूँ और अपने गुरु की छत्रछाया में पावन तीर्थ हस्तिनापुर की धरती पर बैठकर भगवान शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरहनाथ और गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी से इस शुभाशीर्वाद की याचना करती हूँ कि षट्खण्डागम ग्रंथ की अगली पुस्तकों की संस्कृत टीका का हिन्दी अनुवाद भी मैं शीघ्र कर सवूँâ तथा मेरा यह अल्पज्ञान पूर्णश्रुतज्ञान और परम्परा से केवलज्ञान प्राप्ति में निमित्त बने, यही पुन:-पुन: याचना करते हुए गुरुचरणों की शाश्वत छाया प्राप्ति की अभिलाषा करती हूँ-

माता तेरे उपकारों का बदला न चुकाया जा सकता।

गुरु एवं माता दोनोें का वात्सल्य सरस तुझमें बहता।।
है जनम जनम का पुण्य मेरा जो मुझे मिली तेरी ममता।
मैंने नहिं देखी अन्य किसी में तुझ जैसी अनुपम क्षमता।।१।।
बालक जैसी निश्छलता है उत्साह युवा सम सदा तेरा।
अनुभव में वृद्ध तथा तीनों में सदा खिला रहता चेहरा।।
जीवन का प्रतिपल है स्वर्णिम हर कदम ऐतिहासिक तेरा।
तुझ जैसी अनुपम माता को पा धन्य हुआ जीवन मेरा।।२।।

षट्खण्डागम चतुर्थ ग्रंथ की संस्कृत टीका में पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने निम्न ग्रंथों का आधार लिया है-

१. धवला टीका-पुस्तक ४

२. तत्त्वार्थवृत्ति

३. तत्त्वार्थसूत्र

४. त्रिलोकसार

५. तिलोयपण्णत्ती

६. सहस्रनाम स्तोत्र

७. गोम्मटसार कर्मकाण्ड

८. पंचसंग्रह

९. गोम्मटसार जीवकाण्ड

१०. ज्ञानार्णव

११. विषापहार स्तोत्र

१२. जिनस्तोत्र संग्रह

१३. वीरभक्ति (दैवसिक प्रतिक्रमण पाठ से)

१४. अष्टसहस्री

१५. निर्वाणभक्ति प्राकृत

१६. निर्वाणभक्ति संस्कृत

श्रावण शु. ११, वीर नि. सं. २५३४ आर्यिका चंदनामती
१२-८-२००८, जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर