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आधुनिक विज्ञान के सापेक्ष: मार्गदर्शक,आनंददायी, वीतरागी कर्म विज्ञान

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आधुनिक विज्ञान के सापेक्ष: मार्गदर्शक,आनंददायी, वीतरागी कर्म विज्ञान

अजित जैन ‘जलज’
अध्यापक, वीर मार्ग, ककरवाहा जिला टीकमगढ़ (म. प्र.)
सारांश'

पुरुषार्थ और प्रारब्ध, भौतिकता तथा आध्यात्मिकता का द्वंद्व सदा से रहा है। भौतिकवाती जीवन दर्शन के चलते ही आधुनिक विज्ञान के अनवरत अनुसंधान के बाद भी प्राचीन जीवन विज्ञान से आज का विज्ञान कोसों दूर दिखता है।

जीव विज्ञान, जीव विज्ञान के नूतन ज्ञान क्लोिंनग तथा जीन मेिंपग के द्वारा वैज्ञानिक सब कुछ जानने तथा करने का भ्रम पालने लगे हैं, जबकि इनकी सीमाएँ सुनिश्चित तथा परिणाम भयावह हैं।

कभी जातिवादी नस्लवाद को बढ़ावा देने वाले बुद्धिजीवियों की सोच की ही शृंखला में जीन की सर्वोच्चता को प्रतिष्ठितता करने के प्रयास नि:सन्देह रूप से खतरनाक हैं।

प्रस्तुत शोधालेख में आधुनिक शोधों का तथ्यात्मक आंकलन कर यह सिद्ध करने का प्रयास है कि ये सब (नूतन ज्ञान) जैन कर्म सिद्धान्त के कर्मोदय, उदीरणा, क्षपोपशम, संक्रमण इत्यादि के विचारों तक भी नहीं पहुँच पाये हैं, जबकि जैन धर्म तो इन जड़ कर्मों के आस्रव, बन्ध को संवर एवं निर्जरा से निर्मूलन करने के उपाय का अनुपम वीतराग विज्ञान है।

विज्ञान जड़ भौतिक शरीर की सूक्ष्मतम गुत्थियों को सुलझाने के अन्तिम चरण में है, अत: यही सबसे बड़ अवसर है कि अब वह इसके आगे शरीर को प्रभावित करने वाले कारकों पर अपने अनुसंधान को केन्द्रित करे और इस कार्य में जैन कर्म सिद्धान्त उसे प्रेरणा, मार्गदर्शन तथा समुचित दिशा दे सकता है।

धर्म और विज्ञान के सम्मिलन का यही सर्वोत्तम समय है जब विज्ञान अपनी सीमाओं को समझ कर आध्यात्मिक अनुसंधान की ओर उन्मुख हो जिससे आधुनिकता से उत्पन्न विभिन्न समस्याओं का निराकरण कर अप्राकृतिक उत्तेजना तथा सुखाभास के स्थान पर सहज सुख तथा अनंत आनन्द की संभावना साकार हो सके।

इसी भाव से जीवन विज्ञान के आवश्यक अंगों शरीर विज्ञान, मनोविज्ञान, जीवविज्ञान, पर्यावरण विज्ञान के सन्दर्भ में कार्माण वर्गणाओं के महत्व की विवेचना करके जैन कर्म सिद्धान्त को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में वैज्ञानिक रूप से प्रस्तुत करने का प्रारंभिक प्रयास किया गया है।

बीसवीं शताब्दी में जन्में वंश विज्ञान (आनुवंशिकी) ने अपना वर्चस्व एवं विस्तार इस प्रकार किया है कि इक्कीसवीं शताब्दी में इसकी शाखाओं जैव प्रौद्योगिकी, आनुवंशिक, अभियांत्रिकी ने समस्त विज्ञान जगत में प्रभुत्व कायम कर प्रकृति पर प्रभुता पाने का मिथ्या अभियान पाल लिया है। एक ओर जहाँ शताब्दियों से कतिपय व्यक्ति एवं वर्ग विशेष की विशिष्टता के बल पर दूसरे अधिकांश आदमियों को दूसरे दर्जे का जीवन यापन करने के लिये मजबूर किया जाता रहा है। वहीं अब इस वंशाणुवाद के द्वारा एक बार फिर नये नस्लवाद को विकसित करने के अवसर बनाये जा रहे हैं। ऐसे में जहाँ जैन कर्म सिद्धांत सदा से व्यक्ति के स्थान पर कर्मों को प्रधानता देकर सब व्यक्तियों एवं सब जीवों को स्वतंत्रता के समान अधिकार देता रहा है वहीं कर्म सिद्धान्त आज के वंशानुवाद के कोसों आगे व्यवस्थित वैज्ञानिक एवं सर्वहितकारी है।

जैन कर्म विज्ञान ना केवल आध्यात्मिक उन्नति हेतु सर्वोत्तम सत्य है वरन् भौतिक, शारीरिक एवं मानसिक स्तरों पर भी इसकी र्तािककता एवं उपयोगिता अचूक है। इसका गहन अध्ययन, मनन तथा वैज्ञानिक अनुसंधान समग्र मानवता, जीव जगत तथा प्राकृतिक पर्यावरण के लिये मंगलमय है जिस पर समस्त विद्वानों एवं वैज्ञानिकों का ध्यान अपेक्षित है।

भौतिक वंशाणु एवं कर्म परमाणु

जिस प्रकार से प्राचीन नास्तिक जड़ वस्तुओं के उपभोग को सर्वोच्च समझकर शरीर को भौतिक वस्तु मानते थे उसी प्रकार आधुनिक भौतिकवादी यंत्रों की उपलब्धि के लिये न केवल दूसरे जीवों तथा मनुष्यों को अपनी स्वार्थर्पूित हेतु कलपुर्जे मान रहा है वरन इस अंधी दौड़ में वह स्वयं भी एक यंत्र मात्र बनकर रह गया है। ऐसे में जब विज्ञान हमें बताता है कि हमारे शरीर को नियंत्रित करने वाले तत्वों का पता लगा लिया गया है तो लोगों को यह बहुत बड़ी उपलब्धि नजर आती है। आज जेनेटिक मेिंपग के द्वारा मनुष्य के विभिन्न गुणों को निर्धारित करने वाले विभिन्न जीनों के क्रमों को खोज लिया गया है तथा नित नूतन शोध हमें हमारे विभिन्न गुणों को निर्धारित करने वाले जीनों के बारे में जानकारी दे रहे हैं।[१] फिर भी अभी तक मनुष्यों के पूरे गुणों की गुत्थी सुलझ नहीं पाई है जबकि जैन कर्म सिद्धांत सभी जीवों के गुणों को निर्धारित करने वाले कर्म परमाणुओं के संबंध में विस्तार से विवेचना करता है जिसके अनुसार जीव के न केवल शरीर के गुण वरन उसके सुख, दुख, दर्शन, आयु, गोत्र आदि का निर्धारण भी कर्म करते हैं।

वस्तुत: जिस जीन एवं जेनेटिक कोड को वैज्ञानिक सर्वेसर्वा मान रहे हैं वह कार्माण वर्गणाओं के समकक्ष अथवा उसके अधीनस्थ कार्य करने वाले अणुमात्र हैं। जिस पर गहन शोध बोध की आवश्यकता है। क्योंकि जहाँ विज्ञान मात्र शारीरिक गुणों पर ही आकर रूक गया है वहीं कर्म सिद्धांत इसके बहुत आगे है। वंशाणु विज्ञान मात्र ये बताता है कि हमारे गुणों को निर्धारित करने वाले अणुओं को उस ने जान लिया है जबकि कर्म सिद्धांत न केवल शरीरेतर बहुतेरे गुणों की विवेचना करता है वरन् यह भी बताता है कि यह गुण किस प्रकार से हमारे साथ संलग्न होते हैं, (आस्रव) किस प्रकार से इन विभिन्न गुणों/कर्मों को रोका जा सकता है (संवर) तथा कैसे इन कर्मों को हटाकर अनंत आनंद पाया जा सकता है (निर्जरा)। इस प्रकार भौतिक स्तर पर भी भौतिक सुख सुविधाओं को निर्धारित करने वाले यांत्रिक वंशानुवाद (जीव थ्योरी) से जैन कर्म सिद्धान्त अधिक र्तािकक तथा उपयोगी हैं।

शरीर विज्ञान, स्वास्थ्य और कर्मावरण—

दुनिया में बहुत से समझदार व्यक्ति अध्यात्म एवं आत्मा को ना मानते हुये भी शारीरिक सुख तथा स्वास्थ्य को सर्वोच्च स्थान देते हैं। वैसे भी सारी दुनिया यांत्रिक विलासिताओं की प्राप्ति में यंत्र बनने को अभिशिप्त सिर्प शरीर सुख की आशा में ही लगी हुई हैं। प्राचीन काल में चिकित्साशास्त्र जहाँ शारीरिक स्वास्थ्य के लिये तन, मन और आत्मा तीनों पर बल देता था वहाँ आधुनिक चिकित्सा विज्ञान एलोपैथी मात्र शरीर पर ही ध्यान देकर दोषों को दबाकर स्थिति को और भी जटिल बना रहा है। इसी कारण से संसार भर में अनेकों विख्यात चिकित्सक एलोपैथ छोड़कर अिंहसक प्राकृतिक चिकित्सा को अपनाकर मात्र पानी, मिट्टी, हवा, खानपान के द्वारा असंख्य लोगों का स्थायी उपचार कर चुके हैं।

आधुनिक शरीर विज्ञान यह स्पष्ट रूप से मानता है कि हमारे शरीर, हमारे विभिन्न तंत्रों तथा विभिन्न अंगों की क्षमतायें अद्भुत तथा असीम हैं, जिसकी तुलना मानव र्नििमत किसी भी, कितनी भी महंगी मशीन से नहीं की जा सकती है। हमारा रोग प्रतिरक्षा तंत्र इतना मजबूत है कि हम तमाम रोगों से बखूबी बचे रह सकते हैं। आधुनिक शोध भी यह लगातार बता रहे हैं कि संतुलित खानपान से विशेषकर साग सब्जियों, फलों के द्वारा रोगों को दूर भी किया जा सकता है तथा रोगों को दूर भी रखा जा सकता है। जैन कर्म सिद्धांत कर्मों को बाधक, घातक, आवरण के रूप में मानता है जो कि जीव के विभिन्न गुणों के ऊपर पर्दा डाले रखता है तथा इन कर्मावरणों को काटने के लिये अिंहसा मूलक आचार विचार आहार पर बल देता है। यही कारण है कि आज अधिकांश जैन धर्मावलम्बी शाकाहारी, स्वस्थ तथा सम्पन्न हैं। आधुनिक विज्ञान के पूर्ण जानकार, अत्यन्त अनुभवी प्राकृतिक चिकित्सकों की तो यह मूल धारणा ही रहती है कि हमारे शरीर में रोग निवारण की असीम शक्ति है तथा इसके विकारों/दोषों को हटाकर इसकी शक्ति को पून: प्राप्त किया जा सकता है अत: वे अपने उपचार में प्राकृतिक परिवेश, प्राकृतिक साधनों जैसे फल, सब्जी तथा उपवास आदि के द्वारा सफलतापूर्वक लोगों को पूर्णत: सक्षम एवं स्वस्थ बना देते हैं।

होम्योपैथी, नेचुरोपैथी, आयुर्वेद आदि सभी चिकित्सा पद्धतियाँ विकारों को हटाने पर जोर देते हैं। ऐलोपैथी भी शल्य क्रिया के द्वारा विकारों को हटाकर रोग मुक्त करती हैं। उपरोक्त सन्दर्भ में जैन कर्म सिद्धांत की आत्मा की असीम शक्ति के ऊपर कर्मावरण की अवधारणा को देखा एवं लागू किया जा सकता है। कर्म बंध रोकने एवं हटाने के उपायों में मद्य मांसादि का त्याग, सात्विक शाकाहार का उपयोग तथा एकासन उपवास आदि के महत्व को भी भलीभाँति रेखांकित किया जा सकता है। अधिकांश औषधियाँ वनस्पतिजन्य होती है तथा अधिकांश वनस्पतियाँ रोग निवारक होती है। इनके विभिन्न तत्व विभिन्न रोगों को हटाते हैं तथा उपवास से स्वास्थ्य सुधरता है, इन सबके बारे में विभिन्न वैज्ञानिक निष्कर्ष हमारे सामने हैं। जैन श्रमणचर्या तो प्राकृतिक चिकित्सकों तथा शरीर वैज्ञानिकों के लिये प्रेरणा तथा शोध का विषय है ही।

मनोविज्ञान और कर्म विज्ञान—

मृत वस्तुओं से ऊपर तन और तन को नियंत्रित करने वाले मन के महत्व को आधुनिक मनोविज्ञान ने अच्छी तरह समझा है। आज बहुत से चिकित्सक एवं मनोवैज्ञानिक यह मानते हैं कि दुनिया के तमाम विकार तथा शरीर के अधिकांश रोग मन से ही उत्पन्न होते हैं तथा समुचित नियंत्रण से स्वस्थ शरीर तथा सबल समाज का सृजन संभव है। जैन कर्म विज्ञान के अनुसार जीव की शक्तियों को उभारने के लिये कर्मों को रोकना एवं हटाना अत्यावश्यक है। इसके लिये वह मन पर अत्यधिक ध्यान केन्द्रित करता है। क्रोध, मान, माया, लोभ—इन कषायों को कम करने के उपाय बताये गये हैं। इनको तीव्रता मंदता के अनुसार अंनतानुबंधी, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान तथा संज्वलन कषायों में बांटकर दुष्प्रभावों की विशद् विवेचना की गई है।

आधुनिक मनोविज्ञान कहता है कि आप स्वयं को जैसा समझते हैं वैसा ही आप बन जाते हैं अत: जब जैन धर्म कहता है कि तुम्हारी आत्मा सर्वशक्तिमान सर्वगुण सम्पन्न है तो नि:संदेह, इस सत्य को अपनाकर सुखी होने का कत्र्तव्य सभी मनुष्यों का हो ही जाता है। वैलिर्फोिनया विश्वविद्यालय के प्रोपेसर हॉवर्ड प्रिडमेन ने रिवरसाइड में ऐसे सौ वैज्ञानिक शोध पत्रों का विश्लेषण किया जिनमें व्यक्ति के मन की स्थिति और शारीरिक अवस्था के संबंधों का विवेचन किया गया था। उन्होंने पाया कि अगर आप हताश िचतित लगातार निराशावादी रहने वाले, क्रोध या उत्तेजना से भरे जाने वाले हैं तो किसी गंभीर रोग के शिकार हो जाने की आशंका दोगुनी हो जाती है, मन की इस नकारात्मक अवस्था के कारण दिमाग से जो रसायन निकलकर शरीर में फैल जाते हैं उनके कारण शरीर को स्वस्थ रखने की क्षमता घट जाती है।

आधुनिक मनोवैज्ञानिक एवं चिकित्सक इस बात को प्रामाणिक रूप से सिद्ध करते हैं कि विभिन्न विचारों को दबाने से ही मन दब कर बीमार होता है जिससे आधियाँ, व्याधियाँ उत्पन्न होती है तथा इन विकारों को उभार कर निकाल देने से शान्ति प्राप्ति की जा सकती है। इसके लिये विभिन्न क्रियाकलापों के द्वारा अवदमित विचारों, मनोभावों को जब बाहर निकाल दिया जाता है तभी शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य प्राप्त होता है। जैन कर्म विज्ञान भी हमें बताता है कि हमें अपने बंधे सभी कर्मों को भोगना ही पड़ेगा। अस्तित्व में आये (उदय) कर्मों को दबाया भी जा सकता है (उपशम), कम (अपकर्षण) या अधिक (उत्कर्षण) भी किया जा सकता है, परिर्वितत (संक्रमण) भी किया जा सकता है, परन्तु कर्मों की निर्मुक्ति सामान्यत: उसके फल को भोगे बिना नहीं हो सकती है। विभिन्न मानसिक विकारों के निर्मोचन के लिये ही जैन कर्म सिद्धान्त में स्वाध्याय, सामायिक, प्रतिक्रमण, कायोत्सर्ग आदि का मनोवैज्ञानिक विधान किया गया है।

पर्यावरण विज्ञान तथा जैन कर्मवाद—

हमारे तन, मन तथा जीवन को पूरी तरह प्रभावित करने वाला प्रमुखतम तत्व पर्यावरण है। आज भयंकर प्रदूषण से हर कोई परेशान है। प्राकृतिक असंतुलन, जैव विविधता विनाश से पर्यावरणविद् प्रलयंकारी परिस्थितियों की भविष्यवाणी कर रहे हैं ऐसे में जैन कर्मवाद एक प्राकृतिक, संतुलित पर्यावरण बनाने में सदा से सचेष्ट दिख रहा है, सब जीवों के प्रति दयाभाव के द्वारा वह सदा से जीव विविधता संरक्षण का कार्य करता चला आ रहा है। इस वाद में कर्मोच्छेदन हेतु सुझाये समस्त आचार विचार जीव मात्र के लिये अभ्यंकर है जिस का अनुकरण करके ही पृथ्वी पर प्रकृति तथा जीव का संरक्षण संभव है। कार्माण वर्गणायें पूरे पर्यावरण में बिखरी पड़ी हैं जिनके शरीर के साथ बंधने से ही समस्त दु:खों की उत्पत्ति होती है तथा आदर्श आचरण करने वाले व्यक्तियों के आभामण्डल से भी पूरा वातावरण पवित्र तथा सुखकर होता है अत: हर कोई व्यक्ति अपने आचरण को संयमित करके ना केवल अपना जीवन आनंदमय बना सकता है बल्कि पूरे वातावरण के प्रति भी अपना अमूल्य योगदान दे सकता है।

अनंत आनंद पाने का अनुपम उपाय : जैन कर्म सिद्धांत—

भौतिक, शारीरिक तथा मानसिक सुखों से ऊपर आध्यात्मिक सहजानंद पाने का जैसा क्रमबद्ध वर्णन जैन कर्म सिद्धांत में उपलब्ध है वैसा अन्यत्र अलभ्य है। जहाँ अलग—अलग मनोभावों को लेश्याओं से समझाया गया है वहीं क्रमिक उन्नति के लिये चौदह गुणस्थानों को विस्तार से बताया गया है। श्रावक से श्रमण और श्रमण से अर्हत् व सिद्ध बनने के उपायों का ही नाम तो जैन कर्म सिद्धान्त और जैन धर्म है। जब व्यक्ति दूषित आचरण (पाप) करता है तो दुखदायी कर्मों का बंध हो जाता है। जबकि अच्छे आचार विचार से सुखदायी कर्मों का बंध होता है परन्तु दोनों स्थितियों में बंध होता है जिसके इनके बुरे एवं अच्छे फलों को भोगना भी अनिवार्य हो जाता है। परन्तु हमारी आत्मा से जड़ कर्म ‘परमाणु अपने आप नहीं चिपकते हैं वरन् आत्मा के राग भाव से प्रमाद वश कार्माण वर्गणायें चुम्बकीय आकर्षण से आकर चिपक जाती हैं।५ ‘‘पमाय मूलों बंधों भवति’’ कर्म बन्ध का मूल प्रमाद है। अत: अगर अप्रमत्त भाव से राग, मोह को कम से कम कर शून्य पर लाया जा सके तो कर्म बंधन बन्द हो जायें और इस प्रकार से कर्म कलंक मिटते ही आत्मा के सहज गुणों अनंतसुख, अनंतज्ञान, अनंतदर्शन एवं अनंतवीर्य का आदिर्भाव हो सकेगा। पाप पुण्य से परे, भूत भविष्य से दूर, आत्मा में रमण से वीतरागता के द्वारा वर्तमान में तत्काल ही सहज सुख पाया जा सकता है। यही कारण है कि जैन धर्म में प्रमाद और रागमुक्ति पर सर्वाधिक बल दिया गया है तथा जिनेन्द्र भगवान को वीतरागी माना गया है। जैन कर्म सिद्धांत में निर्दिष्ट वीतरागता का भाव वास्तव में गीता में बताये गये अनासक्ति योग से किसी भी रूप में कम नहीं है बल्कि व्यवस्थित तथा वैज्ञानिक है, परन्तु इस तथ्य पर अभी तक अधिकांश देशी विदेशी विद्वानों का ध्यान नहीं जा पाया है। अनंत सुखादि वाली आत्मा की जैन अवधारणा को कोरी हवाबाजी समझने वालों को इस वैज्ञानिक सत्य से प्रेरणा लेनी चाहिये कि हमारे शरीर एवं मस्तिष्क में अत्यधिक क्षमताएँ हैं तथा हमारा मस्तिष्क इन क्षमताओं में से अधिकतम १० प्रतिशत का ही उपयोग कर पाता है।६ आइंस्टीन जैसा महामनीषी भी अपने मस्तिष्क की तीन चौथाई क्षमताओं का प्रयोग नहीं कर सका था। ऐसे में आत्मा की क्षमताओं को तो छोड़िये मात्र मस्तिष्क के समुचित सदुपयोग से ही वर्तमान से हजारों गुना सुख सृजन संभव है।

वैज्ञानिकों हेतु वीतराग विज्ञान—

जीनों के मानसिक बौद्धिक गुणों के प्रकटीकरण पर अनिवार्य रूप से मनुष्य के जन्म के पूर्व के आन्तरिक परिवेश तथा जन्म के बाद उसे उपलब्ध बाह्य परिवेश (हवा, ताप, प्रकाश, नमी, पोषण आदि) का गहन प्रभाव पड़ता है। इस वैज्ञानिक तथ्य की व्याख्या करने के लिये कार्माण वर्गणाओं पर विस्तृत शोध सहायक सिद्ध हो सकता है। समरूपी जुडवाँ बच्चों को यदि विभिन्न बाह्य परिस्थितियों में रखा जाये तो उनके शारीरिक गठन, व्यक्तित्व, मानसिक गुणों आदि में भारी अंतर दिखता है जबकि इनकी जीनीय संरचना व भ्रूणीय विकास की परिस्थितियाँ समान है। समरूपी जुडवाँ को बाह्य और आन्तरिक समान परिस्थितियों में रखने पर भी उनका मूल स्वरूप एक दूसरे से विभिन्न होता है। ये तथ्य शरीर के नियंत्रक तत्वों कर्मों और आत्मा के अस्तित्व की ओर स्पष्ट इशारा करते हैं जिस पर जैन कर्म सिद्धान्तानुसार शोध करने पर अपेक्षित परिणाम प्राप्त हो सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र स्वास्थ्य एजेंसी की अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार भरपूर फल सब्जी खाने से कैंसर का खतरा कम हो जाता है८ इसी प्रकार मांसाहार से सैकड़ों बीमारियाँ होती हैं जबकि शाकाहार की महिमा दिनोंदिन सिद्ध होती जा रही है अत: कर्म निर्युक्ति के सर्वोत्तम उपयों अिंहसक आहार विहार के संबंध में व्यापक शोध कार्य होना चाहिये। जैन दर्शन के अनुसार यह जीव चैतन्य स्वरूप है, जानने देखने उपयोग वाला है, प्रभु है, कत्र्ता है, भोक्ता है और अपने शरीर के बराबर है तथा कर्मों से संयुक्त है। दुखदायी कर्मों से मुक्ति के लिये वैज्ञानिक निम्नानुसार शोध कर सकते हैं—‘पक्शनल मेग्नेटिक रिजोनेन्स इमेिंजग’ (एफ. एम. आर. आई.) नाम की तकनीक की मदद से अब हम उसी वक्त दिमाग की गतिविधियों का अवलोकन कर सकते हैं जब व्यक्ति किसी घटना का अनुभव कर रहा हो। इस तरह के एफ. एम. आर. आई. विश्लेषण से पता चला है कि दिमाग के जो दो हिस्से (एन्टीरियर िंसगुलेट कॉर्टेक्स और प्रीप्रन्टल कार्टेक्स) शारीरिक दर्द के समय सक्रिय होते हैं वही हिस्से सामाजिक वंचना के कारण उत्पन्न भावनात्मक दर्द के दौरान भी जाग जाते हैं। उपरोक्त अनुसंधानानुसार वैज्ञानिक निम्नानुसार कार्य कर सकते हैं।

१. विभिन्न विचारों एवं कार्यों का उसके शरीर एवं मनोमस्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ता है?

२. सदाचार एवं शाकाहार तथा कदाचार एवं मांसाहार का दिलो दिमाग पर क्या असर होता है?

३. परोपकार समाजसेवा तथा दुष्टता एवं अपराध का तन, मन पर क्या प्रभाव पड़ता है ?

४. स्वाध्याय, प्रतिक्रमण, सामायिक आदि करते समय मस्तिष्क में किस प्रकार के रसायन निसृत होते हैं तथा उनका क्या असर होता है ?

५. कर्म सिद्धान्तानुसार आचार व्यवहार से शारीरिक, सामाजिक, र्आिथक पर्यावरणीय प्रभावों पर भी व्यवस्थित शोध आवश्यक है।


टिप्पणी

  1. .A group of researchers led by Paul Thomson of the university of California at Los-Angels has given clear evidence that intelligence is largely determined before birth, invention Intelligence, Sep-Oct. 2002 N.R.D.C. 20-22 Kailash Colony extension New Delhi-p. 251.



अर्हत् वचन जनवरी—मार्च २००५ पेज नं ५८-६७'