ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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आध्यात्मिक कलशारोहण है यह टीका

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मेरे त्यागमयी जीवन के ज्ञान शिखर पर आध्यात्मिक कलशारोहण है सिद्धान्तचिंतामणि टीका

-गणिनी ज्ञानमती
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श्री षट्खण्डागमं ग्रन्थं, भक्त्या वन्दे पुन: पुन:।

धरसेनमुनीन्द्रादीन्, नित्यं नौमि श्रुताप्तये।।१।।

षट्खण्डागम ग्रंथ के नाम की सार्थकता छह खण्डों से है। इनके नाम हैं-१. जीवस्थान, २. क्षुद्रकबंध, ३. बंधस्वामित्व-विचय, ४. वेदनाखण्ड, ५. वर्गणाखण्ड एवं ६. महाबंध। इस षट्खण्डागम ग्रंथ में वर्तमान में प्रारंभ के पाँच खण्डों पर श्री वीरसेनाचार्यकृत धवलाटीका प्रसिद्ध है। पुन: छठाखण्ड महाधवला नाम से प्रसिद्ध है।

इन धवलाटीका सहित पाँच खण्डों का वर्तमान में हिन्दी अनुवाद सहित सोलह पुस्तकों में प्रकाशन हो चुका है। यह धवलाटीका प्राकृत भाषा में है। कहीं-कहीं संस्कृत मिश्रित है।

मैंने इन्हीं पाँच खण्डों पर धवलाटीका के आधार से एवं यथास्थान अन्य ग्रंथों के भी उद्धरण को लेकर ‘सिद्धांतचिंतामणि’ नाम से संस्कृतटीका लिखी है और इसमें सोलह ग्रंथ विभक्त किये हैं। जहाँ कहीं अन्तर है उसे चार्ट में स्पष्ट किया है। ‘जीवस्थान’ नाम के प्रथम खण्ड में-१. सत्प्ररूपणा,२. द्रव्यप्रमाणानुगम, ३. क्षेत्रानुगम, ४. स्पर्शनानुगम, ५. कालानुगम, ६. अन्तरानुगम, ७. भावानुगम और ८. अल्पबहुत्वानुगम ये आठ अनुयोगद्वार हैं। अंत में नव चूलिकाएँ हैं।

इनमें प्रथम सत्प्ररूपणा में गुणस्थान एवं मार्गणाओं का वर्णन है।

इन आठ अनुयोगद्वार एवं नव चूलिकाओं में विभक्त प्रथमखंड में छह पुस्तके हैं।

द्वितीयखण्ड ‘‘क्षुद्रक बंध’’ में ग्यारह अनुयोगद्वार हैं-

१. जीव की अपेक्षा स्वामित्व, २. एक जीव की अपेक्षा काल, ३. एक जीव की अपेक्षा अन्तर, ४. नाना जीव की अपेक्षा भंगविचय आदि। इन सबका संक्षिप्त वर्णन षट्खण्डागम सार में दिया गया है। यह द्वितीयखण्ड सातवीं पुस्तक में पूर्ण है।

तृतीयखण्ड ‘‘बंधस्वामित्वविचय’’ में-क्या बंध की पूर्व में व्युच्छित्ति है ? क्या उदय की पूर्व में व्युच्छित्ति होती है इत्यादि। यह खंड आठवीं पुस्तक में पूर्ण है। यहाँ तक तीन खण्ड हुए।

आगे चतुर्थ ‘‘वेदनाखण्ड’’ का संक्षिप्त विषय कहते हैं। चौदह पूर्वों में द्वितीय पूर्व ‘अग्रायणीयपूर्व’ है। इसके चौदह अर्थाधिकार हैं-१. पूर्वान्त, २. अपरांत, ३. ध्रुव, ४. अध्रुव, ५. चयनलब्धि, ६. अध्रुवसंप्रणिधान, ७. कल्प, ८. अर्थ,९. भौमावयाद्य, १० कल्पनिर्याण, ११. अतीतकाल,१२. अनागतकाल, १३. सिद्ध और १४. बुद्ध१।

यहाँ पाँचवीं ‘‘चयनलब्धि’’ नाम का पाँचवाँ अर्थाधिकार है। इसमें बीस प्राभृत हैं। इनमें से ‘कर्मप्रकृतिप्राभृत’ चतुर्थ अधिकार माना गया है२। यहाँ ‘‘महाकर्मप्रकृति प्राभृत’’ संग्रहीत है।

इस चतुर्थ ‘‘कर्मप्रकृतिप्राभृत’’ में ‘चौबीस अनुयोगद्वार’ हैं।

१. कृति

२. वेदना

३. स्पर्श

४. कर्म

५. प्रकृति

६. बंधन

७. निबंधन

८. प्रक्रम

९. उपक्रम

१०. उदय

११. मोक्ष

१२. संक्रम

१३. लेश्या

१४. लेश्याकर्म

१५. लेश्यापरिणाम

१६. सातासात

१७. दीर्घ-ह्रस्व

१८. भवधारणीय

१९. पुद्गलात्त

२०. निधत्तानिधत्त

२१. निकाचिता-निकाचित

२२. कर्मस्थिति

२३. पश्चिमस्वंकध

२४ अल्पबहुत्व।

चतुर्थ वेदनाखण्ड में ४ पुस्तके हैं।

पुस्तक ९ में प्रारंभ में मंगलाचरण में श्रीगौतमस्वामी कृत ४४ गणधरवलय मंत्र हैं। पुनश्च प्रथम- ‘कृति अनुयोगद्वार’ का वर्णन है।

श्री भूतबलि आचार्यदेव ने इस वेदनानुयोगद्वार के

१६ भेद किये हैं। इन्हें भी अनुयोगद्वार नाम दिया है। यथा-

‘‘वेदणात्ति। तत्थ इमाणि वेयणाए सोलह अणुयोगद्दाराणि णादव्वाणि भवंति-वेदणाणिक्खेवे....।

आगे वर्गणाखण्ड नाम के पाँचवें खण्ड में शेष

२२ अनुयोगद्वारों का कथन है।

इन चौबीस अनुयोगद्वारों के प्रारंभ में मैंने चौबीसतीर्थंकर-स्तोत्र जो कि ‘कल्याणकल्पतरुस्तोत्र’ नाम से प्रसिद्ध हैं। उस स्तोत्र से एक-एक तीर्थंकर भगवन्तों का स्तोत्र लिया है। इसका कारण यह है कि इन मुख्य अनुयोगद्वारों की पहचान अलग से होना चाहिए।

द्वितीय वेदनानुयोगद्वार में ही वेदनाखण्ड पूर्ण हो गया है। इसमें १०, ११ और १२ ऐसी तीन पुस्तके हैं।

अर्थात् ये वेदनानुयोगद्वार के सोलह अनुयोगद्वार जानने योग्य हैं।

१. वेदनानिक्षेप

२. वेदनानयविभाषणता

३. वेदनानाम-विधान

४. वेदनाद्रव्यविधान

५. वेदनाक्षेत्र-विधान

६. वेदनाकालविधान

७. वेदनाभावविधान

८. वेदनाप्रत्ययविधान

९. वेदनास्वामित्वविधान

१०. वेदनावेदनाविधान

११. वेदनागतिविधान

१२. वेदना-अनंतरविधान

१३. वेदनासन्निकर्षविधान

१४. वेदनापरिमाणविधान

१५. वेदनाभागाभागविधान

१६. वेदनाल्पबहुत्वविधान ।

इनमें आदि के ५ अनुयोगद्वार दशमी पुस्तक में हैं। पुन: छठा और सातवाँ अनुयोगद्वार ग्यारहवीं पुस्तक में हैं एवं आठवें से लेकर १६वें तक ९ अनुयोगद्वारों का विवेचन बारहवीं पुस्तक में है। इनमें भी किन्हीं-किन्हीं भेदों के भी प्रभेद को अनुयोगद्वार से कहा है। जैसे कि-वेदनाकाल विधान में तीन अनुयोगद्वार कहे हैं। इसकी प्रथम चूलिका में सूत्र ३६ में ४ अनुयोगद्वार कहे हैं आदि। अत: प्रमुख २४ अनुयोगद्वारों को और इन भेदरूप अनुयोगद्वारों को पृथक्-पृथक् दिखाने के लिए ही चौबीसतीर्थंकर- स्तोत्रों को प्रमुख २४ अनुयोगद्वारों का मंगलाचरण बनाया है। इस स्तोत्र की रचना मैंने वीर निर्वाण संवत् २५०१, ईसवी सन् १९७५ में हस्तिनापुर में की थी। इसमें भगवन्तों के कल्याणक की तिथियाँ ‘‘उत्तरपुराण’’ ग्रंथ के आधार से हैं। इसमें २१३ पद्य हैं एवं एकाक्षरी छंद से ३० अक्षरी छंद तक १४५ छंदों का प्रयोग है।

आगे भी वर्गणाखंड में तेरहवीं पुस्तक में तृतीय स्पर्शानुयोगद्वार, चतुर्थ कर्मानुयोगद्वार और पाँचवां प्रकृति-अनुयोगद्वार ये मुख्य अनुयोगद्वार तीन हैं। इनमें स्पर्शानुयोगद्वार के भी १६ भेद किये हैं। श्री आचार्यदेव ने इन्हें भी अनुयोगद्वार नाम दिया है तथा कर्मानुयोगद्वार के एवं प्रकृति-अनुयोगद्वार के भी १६-१६ भेद किये हैं। उन्हें भी अनुयोगद्वार नाम से कहा है। यथा-

१. फासेत्ति। २. तत्थ इमाणि अणुयोगद्दाराणि णादव्वाणि१ भवंति-फासणिक्खेवे फासणयविभासणदाए फासणामविधाणे, फासदव्वविधाणे.....इत्यादि।

१. स्पर्शनिक्षेप

२. स्पर्शनयविभाषणा

३. स्पर्शनामविधान

४. स्पर्शद्रव्यविधान

५. स्पर्शक्षेत्र- विधान

६. स्पर्शकालविधान

७. स्पर्शभावविधान

८. स्पर्शप्रत्ययविधान

९. स्पर्शस्वामित्व-विधान

१०. स्पर्शस्पर्शविधान

११. स्पर्शगतिविधान

१२. स्पर्श- अनंतरविधान

१३. स्पर्श सन्निकर्षविधान

१४. स्पर्श परिमाणविधान

१५. स्पर्शभागाभागविधान

१६. स्पर्शाल्पबहुत्वविधान ।

ऐसे ही कर्मानुयोगद्वार के भी-

१. कम्मे त्ति। २. तत्थ इमाणि सोलस२ अणुयोगद्दाराणि णादव्वाणि भवंति-कम्मणिक्खेवे कम्मणयविभासणदाए कम्मणामविहाणे इत्यादि।

१. कर्मनिक्षेप, २. कर्मनयविभाषणा, ३. कर्मनामविधान, ४. कर्मद्रव्यविधान, ५. कर्मक्षेत्रविधान आदि।

इसी प्रकार से प्रकृत्यनुयोगद्वार नाम का जो चौबीस में से पाँचवां मुख्य अनुयोगद्वार है। उसके भी १६ भेद हैं। यथा-

‘‘पयडि त्ति, तत्थ इमाणि सोलस अणुयोगद्दाराणि णादव्वाणि भवंति-पयडिणिक्खेवे पयडिणयविभास-णदाए पयडिणामविहाणे.....इत्यादि। प्रकृति के भी १६ अनुयोगद्वार ज्ञातव्य हैं-प्रकृतिनिक्षेप, प्रकृतिनयविभाषणता, प्रकृतिनामविधान आदि।

आगे चौदहवीं पुस्तक में छठा बंधनानुयोगद्वार है। उसमें अनेक भेद-प्रभेद से विस्तार है।

पंद्रहवीं पुस्तक में सातवें निबंधन अनुयोगद्वार से लेकर ग्यारहवें मोक्षानुयोगद्वार तक वर्णन है।

सोलहवीं पुस्तक में बारहवें संक्रमानुयोगद्वार से लेकर चौबीसवें अल्पबहुत्वानुयोगद्वार तक १३ अनुयोगद्वारों का वर्णन है।

श्रुतभक्ति- श्री पूज्यपाद स्वामी द्वारा रचित ‘‘श्रुतभक्ति’’ का पाठ हम सभी साधु-साध्वीगण हमेशा से करते आये हैं। किन्तु जब मैंने इस षट्खण्डागम ग्रंथराज की टीका लिखी, तब इस भक्ति में कथित विषय बहुत ही अच्छी तरह हृदयंगम हो गया है। अब इस भक्ति को पढ़ने में एक अपूर्व ही आनंद का अनुभव होता है। यथा-

पूर्वगतं तु चतुर्दश-धोदितमुत्पादपूर्वमाद्यमहम्।

आग्रायणीयमीडे, पुरुवीर्यानुप्रवादं च ।।१०।।

संततमहमभिवंदे, तथास्तिनास्तिप्रवादपूर्वं च।
ज्ञानप्रवादसत्यप्रवादमात्मप्रवादं च।।११।।

कर्मप्रवादमीडेऽथ, प्रत्याख्याननामधेयं च।
दशमं विद्याधारं पृथुविद्यानुप्रवादं च।।१२।।

कल्याणनामधेयं, प्राणावायं क्रियाविशालं च।
अथ लोकविंदुसारं, वंदे लोकाग्रसारपदं।।१३।।

दश च चतुर्दश चाष्टा-वष्टादश च द्वर्योिद्वषट्कं च।
षोडश च विंशतिं च, त्रिंशतमपि पंचदश च तथा।।१४।।

वस्तूनि दश दशान्येष्वनुपूर्वं भाषितानि पूर्वाणाम्।
प्रतिवस्तु प्राभृतकानि, विंशतिं विंशतिं नौमि।।१५।।

पूर्वांतं ह्यपरातं धु्रवमधु्रवच्यवनलब्धिनामानि।
अधु्रवसंप्रणिधिं चाप्यर्थं भौमावयाद्यं च।।१६।।

सर्वार्थकल्पनीयं, ज्ञानमतीतं त्वनागतं कालं।
सिद्धिमुपाध्यं च तथा, चतुर्दशवस्तूनि द्वितीयस्य।।१७।।

पंचमवस्तुचतुर्थ-प्राभृतकस्यानुयोगनामानि।
कृतिवेदने तथैव, स्पर्शनकर्मप्रकृतिमेव।।१८।।

बंधननिबंधनप्रक्रमानुपक्रममथाभ्युदयमोक्षौ ।
संक्रमलेश्ये च तथा, लेश्याया: कर्मपरिणामौ।।१९।।

सातमसातं दीर्घं, ह्रस्वं भवधारणीयसंज्ञं च।
पुरुपुद्गलात्मनाम च, निधत्तमनिधत्तमभिनौमि।।२०।।

सनिकाचितमनिकाचितमथ कर्मस्थितिकपश्चिमश्वंधौ।
अल्पबहुत्वं च यजे, तद्द्वाराणां चतुर्विंशम् ।।२१।।

चौदहपूर्वों के नाम और उनकी वस्तुसंख्या इस प्रकार है-

अर्थात् १. उत्पादपूर्व (वस्तुसंख्या-१०), २. अग्रायणीय (वस्तुसंख्या-१४), ३. वीर्यानुप्रवाद (वस्तु- संख्या-८), ४. अस्तिनास्तिप्रवाद (वस्तुसंख्या-१८), ५. ज्ञानप्रवाद (वस्तुसंख्या-१२), ६. सत्यप्रवाद (वस्तु- संख्या-१२), ७. आत्मप्रवाद (वस्तुसंख्या-१६), ८. कर्मप्रवाद (वस्तुसंख्या-२०), ९. प्रत्याख्यान (वस्तु- संख्या-३०), १०. विद्यानुप्रवाद (वस्तुसंख्या-१५), ११. कल्याणानुप्रवाद (वस्तुसंख्या-१०), १२. प्राणावाय (वस्तुसंख्या-१०), १३. क्रियाविशाल (वस्तुसंख्या-१०)और १४. लोकबिंदुसारपूर्व (वस्तुसंख्या-१०)।

इसमें से द्वितीय अग्रायणीयपूर्व में चौदह वस्तु हैं। इन्हें ही षट्खण्डागम पुस्तक ९ में अर्थाधिकार नाम से कहा है। उनके नाम-१. पूर्वान्त, २. अपरांत, ३. ध्रुव, ४. अध्रुव, ५. चयनलब्धि आदि नाम हैं। एक-एक वस्तु में २०-२० प्राभृत माने हैं। अत; इस पाँचवीं ‘चयनलब्धि’ के भी बीस प्राभृत हैं।

इस चयनलब्धि के बीस प्राभृत में चौथे ‘कर्मप्रकृति’ प्राभृत के चौबीस अनुयोगद्वार हैं। जिनके नाम क्रमश:-

१. कृति, २. वेदना, ३. स्पर्श, ४. कर्म, ५. प्रकृति आदि हैं। इनमें से प्रथमकृत्यनुयोगद्वार और द्वितीयवेदनानुयोगद्वार ‘वेदनाखण्ड’ नाम के चतुर्थखण्ड में हैं और शेष स्पर्शानुयोगद्वार से लेकर चौबीसवें अल्पबहुत्वानुयोगद्वार तक ‘वर्गणाखंड’ में वर्णित हैं।

प्रथमकृतिअनुयोगद्वार के अनंतर द्वितीयवेदनानुयोगद्वार१ के १६ भेद करके उनका विस्तार से वर्णन होने से इस चतुर्थखंड का ‘वेदनाखंड’ नाम सार्थक है।

वर्गणाखण्ड में छठे बंधनानुयोगद्वार में बंध, बंधक, बंधनीय और बंधविधान ऐसे चार भेदों में से ‘बंधनीय’ का वर्णन विस्तार से है।२ जो जीव से पृथग्भूत पौद्गलिक कर्म और नोकर्म स्कंध हैं वे ही बंधयोग्य पुद्गलवर्गणाएं हैं। इन वर्गणाओं का वर्णन सूत्र ६८ से लेकर आगे ११८ तक विशेषतया है। अत: इस पाँचवें खंड का ‘वर्गणाखंड’ नाम सार्थक है।

मैंने इस महाग्रंथराज की सिद्धान्तचिंतामणि संस्कृत टीका लिखते हुए समयसार, प्रवचनसार की तात्पर्यवृत्तिटीका लिखने वाले श्रीजयसेनाचार्य का अनुसरण किया है। अत: इस टीका में प्रारंभ में महाधिकार, अधिकार, स्थल और अन्तरस्थल आदि का विभाजन किया है। इस कार्य में मैंने पहले आद्योपान्त ग्रंथ का अवलोकन करके विषय के अनुसार विभाजन किया है। जैसे कि-

प्रथम खण्ड में ६ ग्रंथ हैं। उनमें से-

प्रथम ग्रन्थ-पुस्तक में - तीन महाधिकार हैं और तृतीय महाधिकार में १४ अधिकार हैं।

द्वितीय पुस्तक में - महाधिकार २ हैं, द्वितीय महाधिकार में १४ अधिकार हैं।

तृतीय पुस्तक में - ४ महाधिकार हैं एवं द्वितीय तथा चतुर्थ महाधिकार में १४-१४ अधिकार हैं।

चतुर्थ पुस्तक मे - ४ महाधिकार एवं द्वितीय-चतुर्थ में १४-१४ अधिकार हैं।

पंचम पुस्तक में - ६ महाधिकार एवं द्वितीय, चतुर्थ तथा छठे में १४-१४ अधिकार, ऐसे १४²३·४२ अधिकार हैं।

छठी पुस्तक में - २ महाधिकार एवं प्रथम महाधिकार में ८ अधिकार हैं।

इस प्रकार प्रथम खण्ड में ६ पुस्तकों में २१ महाधिकार एवं १३४ अधिकार विभक्त हैं।

द्वितीय खण्ड में १ ही पुस्तक है जो कि-७वीं हैं।

सातवीं पुस्तक में - १२ महाधिकार हैं एवं १५० अधिकार हैं। १२ महाधिकार में से १०वें महाधिकार में ६ अधिकार एवं १२वें में ३ अधिकार हैं तथा १० महाधिकार में प्रत्येक के १४-१४ अधिकार हैं तथा एक प्रारंभ का अधिकार है। ऐसे १०²१४·१४०±६±३±१·१५० अधिकार हैं।

तृतीय खण्ड में भी १ ही पुस्तक है, जो कि ८वीं हैं।

आठवीं पुस्तक में - दो महाधिकार हैं एवं द्वितीय महाधिकार में १४ अधिकार हैं। चतुर्थ खण्ड में पुस्तक ९, १०, ११ व १२ ऐसे ४ पुस्तके हैं।

नवमीं पुस्तक में - दो महाधिकार हैं।

दशमीं पुस्तक में - ३ महाधिकार हैं। प्रथम महाधिकार में ३ अधिकार हैं। द्वितीय में २ अधिकार हैं।

ग्यारहवीं पुस्तक में - ४ महाधिकार हैं एवं द्वितीय महाधिकार में २ अधिकार तथा चतुर्थ में ३ अधिकार हैं

बारहवीं पुस्तक में - २ महाधिकार हैं। प्रथम में ५ अधिकार एवं द्वितीय महाधिकार में ४ अधिकार हैं।

पंचम खण्ड में भी १३, १४, १५ एवं १६, ऐसी ४ पुस्तके हैं।

तेरहवीं पुस्तक में - ३ महाधिकार हैं।

चौदहवीं पुस्तक में - ३ महाधिकार हैं। प्रथम महाधिकार में २ अधिकार, द्वितीय में ६ अधिकार एवं तृतीय में ३ अधिकार हैं।

पंद्रहवीं पुस्तक में - ३ महाधिकार हैं। द्वितीय महाधिकार में २ अधिकार एवं तृतीय में २ अधिकार हैं।

सोलहवीं पुस्तक में २ महाधिकार हैं। द्वितीय महाधिकार में १२ अधिकार हैं।

इस प्रकार पाँचों खण्ड की १६ पुस्तकों में २१±१२±२±११± ११·५७ महाधिकार हैं एवं १३४±१५०±१४± १९±२७·३४४ अधिकार हैं।

इन ग्रंथों में महाधिकार-अधिकार इनके अन्तर्गत स्थल-अन्तरस्थलों का भी यथास्थान विभाजन है। जिनसे सूत्रों की संख्या व विषयों का स्पष्टीकरण बहुत ही सरलता से हो जाता है। यह पद्धति मैंने समयसार, प्रवचनसार आदि ग्रंथों के तात्पर्यवृत्ति के टीकाकार श्री जयसेनाचार्य के अनुसार ली है। इस ‘सिद्धान्तचिंतामणिटीका’ में मैंने इसी प्रकार से सोलह ग्रंथों में अधिकार आदि का विभाजन किया है। यद्यपि इसमें मुझे मस्तिष्क का व्यायाम (दिमागी कसरत) बहुत ही हुआ है, जिससे मस्तिष्क को खूब ही श्रम हुआ है। फिर भी मुझे थकान नहीं महसूस हुई है प्रत्युत सूत्रों के विषयविभाजन आदि में मुझे एक अभूतपूर्व आनंद का अनुभव हुआ है।

इस षट्खण्डागम में मूल में छह खंडों का ही विभाजन है। फिर भी जो पाँच खडों में सोलह पुस्तकें विभक्त हैं, वे हिन्दी अनुवाद में प्रकाशित ग्रंथ के अनुसार विद्वानों द्वारा ही विभाजित की गई हैं। इसी के अनुसार मैंने भी सोलह ग्रंथों में विभाजन किया है। किन्हीं ग्रंथों में कुछ अंतर किया है। जैसा कि तृतीय- पुस्तक में धवलाटीका में ‘द्रव्यप्रमाणानुुगम’ ही है। मैंने अपने ग्रंथ में ‘द्रव्यप्रमाणानुगम’ और ‘क्षेत्रानुगम’ ऐसे दो अनुयोगद्वार लिये हैं। आगे भी जहाँ अन्तर है, उसे प्रस्तावना में ‘चार्ट’ में दे दिया है।

इस षट्खण्डागम महाग्रंथराज की ‘‘सिद्धान्तचिंतामणि-टीका’’ संस्कृत टीका को लिखते समय मैंने प्रत्येक मास में २ अष्टमी, २ चतुर्दशी, अमावस्या एवं पूर्णिमा ऐसे ६ तिथियों में नहीं लिखा है एवं वर्ष के आषाढ़, कार्तिक एवं फाल्गुन मास के आष्टान्हिक पर्वों में भी नहीं लिखा है। इन्हीं ग्रंथों में से नवमें ग्रंथ में चूँकि इन तिथियों में सिद्धान्त ग्रंथ के अध्ययन का निषेध किया है तथा दशलक्षण पर्व में भी नहीं लिखा है। इस प्रकार मास में ६-६ दिन एवं तीन मास में ११-११ दिन तथा भाद्रपद के व दशलक्षण के १४ दिन ऐसे (८²६·४८, ३²११·३३ एवं १४, ४८±३३±१४·९५) वर्ष में ९५ दिन तो लिखा ही नहीं है।

इसमें चार्ट में जो शरदपूर्णिमा को टीका के प्रारंभ व समापन का लिखा है। उसमें मात्र मंगलाचरण ही लिखा है। जैसे कि-

षट्खण्डागम ग्रंथ की टीका लेखन का शुभारंभ-आश्विन शु. १५, शरदपूर्णिमा, वीर निर्वाण संवत् २५२१ (दिनाँक ८-१०-१९९५) को मात्र मंगलाचरण लिखकर किया है। यथा-

सिद्धान् सिद्ध्यर्थमानम्य, सर्वांस्त्रैलोक्यमूर्धमान्।

इष्ट: सर्वक्रियान्तेऽसौ, शान्तीशो हृदि धार्यते।।१।।

पुन: पुस्तक ९ का प्रारंभ भी शरदपूर्णिमा वीर निर्वाण संवत् २५२५ (दिनाँक २४-१०-१९९९) को किया है तथा इसका समापन भी शरदपूर्णिमा वीर निर्वाण संवत् २५२६ (दिनाँक १३-१०-२०००) को किया है।

पुनश्च इसी दिन दशवीं पुस्तक की टीका का मंगलाचरण करके उसे प्रारंभ किया है। ऐसे ही १४वीं पुस्तक की टीका का प्रारंभीकरण भी शरदपूर्णिमा वीर निर्वाण संवत् २५३० (दिनाँक २८-१०-२००४) को किया है एवं पुस्तक १५वीं की पूर्णता भी शरदपूर्णिमा वीर निर्वाण संवत् २५३२ (दिनाँक ६-१०-२००६) में किया है।

उद्देश्य-इस ग्रंथ की संस्कृत टीका लिखने में मेरा मनोभाव इस सर्वोत्कृष्ट ग्रंथ के रहस्य को अच्छी तरह समझने व हृदयंगम करने का ही रहा है। फिर भी धवलाटीका में बहुत से ऐसे सैद्धान्तिक व गणित के विषय हैं, जो कि मेरी बुद्धि से परे हैं, मैंने उनको छोड़ दिया है और प्राय: वहाँ लिख दिया है कि-इस विषय का अधिक विस्तार ‘धवलाटीका’ में देखना चाहिए।

इस टीका में मैंने अनेक स्थानों पर उस-उस विषय से संबंधित अनेक ग्रंथों के उद्धरण दिये हैं। अनेक जगह अपनी सरल भाषा में विषय को सरल करने का प्रयास किया है।

इस संस्कृत टीका में मैंने जो भी विषय लिये हैं, उनमें भी कुछ ऐसे हैं जो मुझे समझ में नहीं आये, फिर भी शब्दश: ‘प्राकृत’ को संस्कृत कर दिया है।

मुझे एक बात स्मरण में हमेशा आती रही है-

एक बार आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज से प्रश्न किया गया कि-‘‘हे गुरुदेव! जो आप षट्खण्डागम का स्वाध्याय कर रहे हैं, क्या आप इसका सब अर्थ समझ रहे हैं ?

श्री आचार्यदेव ने उत्तर दिया-मैं कहीं-कहीं अर्थ समझ लेता हूँ और कहीं बिल्कुल नहीं। फिर भी इसलिए पढ़ता रहता हूँ कि-इस महान ग्रंथ के पढ़ते समय असंख्यातगुणश्रेणीरूप से कर्मोें की निर्जरा होती है अत: आगे एक न एक दिन तो, इस भव में न सही अगले भव में इन अर्थों का बोध अवश्य होगा।’’

इन्हीं भावों को लेकर अपने ज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम को बढ़ाने के लिए, आत्मा की विशुद्धि और सिद्धि के लिए ही मैंने यह टीका लिखी है।

हस्तिनापुर तीर्थ पर वीर निर्वाण संवत् २५२१ (ईसवी सन् १९९५) में मैंने यह सिद्धांतचिंतामणिटीका प्रारंभ की थी। इस मध्य अनेक तीर्थों की यात्राएँ, अनेक प्रतिष्ठा आदि महामहोत्सव कार्य सम्पन्न हुए हैं। उस मध्य मेरा लेखन कार्य चलता रहा है। पुन: हस्तिनापुर में ही वीर निर्वाण संवत् २५३३ (ईसवी सन् २००७) में मैंने यह टीका पूर्ण की है। उस समय वैशाख कृ. २ को मैंने टीका पूर्ण की और वैशाख शु. १५ को तेरहद्वीप के जिनबिम्बों का पंचकल्याणकमहोत्सव पूर्ण होकर तेरहद्वीपजिनालय के शिखर पर स्वर्ण कलशारोहण हुआ।

तब मैंने अपने जीवन में महत्वपूर्ण दो कलशारोहण अर्थात् एक आध्यात्मिक जीवन में समीचीन ज्ञान का कलशारोहण, दूसरा अतिशायी तेरहद्वीप रचना के जिनालय के शिखर पर स्वर्णिम कलशारोहण।

इन सभी कार्यों की सफलता में एक जिनेन्द्रदेव की भक्ति ही मूलकारण है, ऐसा मेरा विश्वास है तथा मेरे जीवन में जिनवाणी माता की भक्ति एवं गुरुभक्ति भी बहुत बड़ा संबल है।

अतएव आप सभी स्वाध्यायी साधु-साध्वीवर्ग एवं विद्वानों के लिए मेरी यही प्रेरणा है कि आप देव, शास्त्र और गुरु की भक्ति के प्रसाद से ज्ञान के क्षयोपशम को वृद्धिंगत करते हुए अपनी आत्मा में केवलज्ञान को प्रगट करने की भावना भाते रहें, एक न एक दिन-अगले भवों में सफलता अवश्य मिलेगी, ऐसा दृढ़ विश्वास रखें, यही मंगलकामना है।