ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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आनंदपूर्ण हो जाओ ताकि अपना बचपन फिर से पा सको।

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आनंदपूर्ण हो जाओ ताकि अपना बचपन फिर से पा सको ।

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यह स्मरण रहे: अपना बचपन फिर से प्राप्त करो। बचपन को लौटा लाने की अभीप्सा सभी करते हैं, लेकिन उसे पाने के लिए करता कोई कुछ भी नहीं। अभीप्सा सभी करते हैं। लोग कहे चले जाते हैं कि बचपन तो स्वर्ग था, और कवि बचपन के सौंदर्य पर कविताएं लिखे चले जाते हैं। तो तुम्हें रोक कौन रहा है ? पा लो फिर से ! बचपन को फिर से प्राप्त करने का यह अवसर मैं तुम्हे देता हूँ।

आनंदपूर्ण ही रहो। आनंदित होना कठिन तो होगा। क्योंकि बहुत ज्यादा तुम ढ़ांचे में ढले हुए हो। तुमने चारों ओर एक कवच ओढ़ा हुआ है, जिसे छोड़ना या उतार कर रखना मुश्किल है। न तुम नाच सकते हो, न गा सकते हो, न कूद सकते हो, न यूं ही चीख सकते हो, न हंस और मुस्कुरा सकते हो। अगर तुम हंसना भी चाहो, तो पहले तुम चाहते हो कि कोई चीज हो जिस पर हंस सको। तुम यूं ही नहीं हंस सकते हो ।कोई कारण हो, तभी तुम हंस सकते हो। कोई कारण हो, तभी तुम रो सकते हो।

ज्ञान को एक ओर रख दो, गंभीरता को परे कर दो । इन दिनों के लिए बिलकुल हलके—फुल्के हो जाओ। खोने को तो तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है! अगर कुछ न भी मिले तो भी खोओगे तो कुछ भी नहीं। लेकिन मैं तुमसे कहता हूँ— तुम फिर वही नहीं रहोगे जो हो।

इसी कारण आनंदपूर्ण होने पर मेरा जोर है। मैं तुम्हें वापस उस बिंदु पर फेक देना चाहता हूं जहां से तुमने विकसित होना बंद कर दिया था। तुम्हारे बचपन में एक ऐसा बिंदु आया था जब तुम्हारा विकास रूक गया और तुम नकली होना शुरू हो गए। हो सकता है तुम क्रोधित हुए होओ— छोटा सा बच्चा हठ कर रहा है , क्रोध कर रहा है— और तुम्हारे पिता या तुम्हारी मां ने तुमसे कहा, ‘‘क्रोध मत करो! यह अच्छा नहीं है। ’’ तुम स्वाभाविक थे, लेकिन एक विभाजन निर्मित कर दिया गया और तुम्हारे सामने यह चुनाव आ गया: यदि तुम स्वाभाविक होना चाहते हो तो फिर तुम्हें तुम्हारे माता—पिता का प्रेम नहीं मिलेगा।

इन आठ दिनों में मैं तुम्हें वापस उस बिंदु पर फेक देना चाहता हूं जहां तुम स्वाभाविक होने के विपरीत ‘‘अच्छे’’ होने शुरू हो गए। आनंदपूर्ण हो जाओ ताकि अपना बचपन फिर से पा सको। यह कठिन तो होगा, क्योंकि तुम्हें अपने मुखौटे, अपने चेहरे सब उतार कर रखने होंगे, तुम्हें अपने व्यक्तित्व को एक किनारे पर छोड़ना होगा। लेकिन याद रखो, मूल तत्व तभी स्वयं को प्रकट कर सकता है जब तुम्हारा व्यक्तित्व वहां न हो, क्योंकि तुम्हारा व्यक्तित्व एक कारागृह बन गया है। उसे एक ओर हटा दो! यह पीड़ादायी होगा, लेकिन यह पीड़ा झेलने जैसी है क्योंकि उससे तुम्हारा पुनर्जन्म होगा। और कोई भी जन्म बिना पीड़ा के नहीं होता। यदि सच में ही तुम पुनरुज्जीवित होना चाहते हो तो यह जोखिम उठा लो।

निर्देश:—

बॉर्न अगेन के लिए ओशो का मार्गदर्शन इस प्रकार है :

पहला चरण:—

पहले एक घंटे के लिए बच्चे जैसा व्यवहार करो, अपने बचपन में प्रवेश कर जाओ। जो भी तुम करना चाहते थे, करो—नााचना, गाना, उछलना, चीखना, रोना—कुछ भी, किसी भी मुद्रा में। दूसरे लोगों को स्पर्श करने को छोड़कर और कुछ भी प्रतिबंधित नहीं है। इस रुप में किसी और को मत छुओ, कोई नुकसान न पहुंचाओ।

दूसरा चरण:—

दूसरे एक घंटे के लिए बस मौन बैठ जाओ। तुम अधिक ताजे व अधिक सरल हो जाओगे, और ध्यान तुम्हारे लिए आसान हो जाएगा।

सात दिन के लिए दो घंटे प्रतिदिन:—

यह निर्णय कर लो कि इन दिनों तुम उतने ही अबोध रहोगे जितने तुम पैदा होते समय थे— बिलकुल नवजात शिशु जैसे, जो न कुछ जानता है, न कुछ पूछता है, न कुछ चर्चा करता है न तर्क । यदि तुम छोटे बच्चे हो सको, तो बहुत कुछ संभव है। जो असंभव लगता है वह भी संभव है।


आर.आर. बुलेटिन
६ नवम्बर २०१४