ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.png
Whatsappicon.png
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें |


पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर २०१६- रविवार से सीधा प्रसारण चल रहा है | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

आपकी इच्छा शक्ति पर कार्य का परिणाम निर्भर है

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

[सम्पादन]
आपकी इच्छाशक्ति पर निर्भर है कार्य का परिणाम

DT9bEk9T7.jpg
DT9bEk9T7.jpg

जीवन की गाड़ी आगे बढ़ाने के लिए काम तो सभी करते हैं, लेकिन वह कितना फलीभूत होगा, यह उस कार्य के पीछे की भावना पर निर्भर करता है, संभवत: आपने किसी से यह बात सुनी होगी कि मैं भी दफ्तर में उतने ही घंटे कार्य करता हूँ, जितना अमुक सहयोगी करता है, लेकन उसे पदोन्नति मिल गयी, जबकि मुझे नजर अंदाज कर दिया गया, दरअसल सच तो यही है कि किसी कार्य के पीछे आपका अच्छा सोच और प्रबल इच्छाशक्ति ही उसकी गुणवत्ता तय करते हैं और यही लोगों की नजरों में आपको ऊपर उठाता है। एक आश्रम में तीन शिष्य शिक्षा प्राप्त कर रहे थ, संत समय-समय पर अपने शिष्यों की परीक्षा लेते रहते थे, एक दिन उन्होंने शिष्यों को एक मंदिर बनाने के लिए कहा, तीनों शिष्य मंदिर बनाने लगे, जब मंदिर बन कर तैयार हो गया, तब संत ने तीनों को अपने पास बुलाया, पहले शिष्य से पूछा—जब मंदिर बन रहा था, तब तुम्हें वैâसा अनुभव हो रहा था ? उसने उत्तर दिया—गुरुदेव ! मुझे पूरे दिर काम करना पड़ता था, लगता था कि मुझमें और एक गधे में कोई अंतर नहीं रह गया है, मंदिर के निर्माण का काम करते-करते मैं तो परेशान हो गया। संत ने दूसरे शिष्य से भी यही प्रश्न पूछा, तो वह बोला—गुरूदेव! मैं भी सारा दिन कार्य करता रहा, मंदिर के निर्माण कार्य के दौरान मेरे मन में तो यही विचार आ रहा था कि जल्द से जल्द मंदिर बने और मेरा कल्याण हो जाये, संत ने तीसरे शिष्य से पूछा तो उसने भाव भरे हृदय से जवाब दिया—गुरुदेव ! मैं तो प्रभु की सेवा कर रहा था, निर्माण कार्य के दौरान मैं प्रतिदिन प्रभु का धन्यवाद करता था क्योंकि उन्होंने मेरी मेहनत का कुछ अंश स्वीकार किया मैं स्वयं को बहुत भाग्यशाली मानता हूँ, यह सुनकर संत ने उस शिष्य को गले से लगा लिया, फिर उन्होंने अन्य शिष्यों को समझाते हुये कहा तुम तीनों के कार्य करने के ढंग में अंतर था। मंदिर तो तुम तीनों ही बना रहे थे, एक गधे की तरह कार्य कर रहा था, भावों का अंतर तुम्हारे कार्य की गुणवत्ता में भी देखा जा सकता है, क्या किया जा रहा है, वह महत्वपूर्ण नहीं, उसे किस भावना के साथ किया जा रहा है, यह महत्वपूर्ण है।

आज का आनंद २६ जुलाई २०१६