ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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आयुर्वेदिक चिकित्सा की व्यापकता

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आयुर्वेदिक चिकित्सा की व्यापकता

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वैद्य धर्मचन्द्र जैन- इन्दौर (म० प्र०)

वैद्य धर्मचन्द्र जैन शास्त्री आयुर्वेद के निष्णात विद्वान थे। प्रिंस यशवन्तराव आयुर्वेदिक जैन औषधालय में आपने वर्षों तक अपनी सेवायें दी। साधु संतों के संघों में स्वयं जाकर ये निस्पृह भाव से अमूल्य सेवायें देते थे।


आयुर्वेद या आयुर्विज्ञान शाश्वत अनादिकालीन है। सृष्टि का निर्माण करने के पूर्व ही ब्रह्मा ने इसकी रचना कर ली थी क्योंकि प्राणियों के शरीर के साथ विकारों या रोगों का होना भी अवश्यंभावी है। विश्व में जितनी भी चिकित्सा प्रणालियों का उदय व अस्त हुआ है, जो भी वर्तमान में हैं और भविष्य में होंगी, आयुर्वेद का अंग ही रही हैं, और होंगी। आयुर्वेद का मूल स्रोत अथर्ववेद है। वेद विश्व का प्राचीनतम आगम या शास्त्र है। आयुर्वेद को अथर्ववेद का उपांग माना है। इस विज्ञान को अष्टांग कहा है। सुश्रुत संहिता के मान्यतानुसार १—शल्य २—शालाक्य, ३—कायचिकित्सा, ४—भूतविद्या, ५—कौमार भृत्य, ६—अगदतंत्र, ७—रसायनतंत्र और ८—बाजीकरण ये आठ आयुर्वेद के अंग हैं। महर्षि चरक, वाग्भट्ट तथा अन्य प्राचीन आचार्यों ने भी इन्हीं आठ अंगों को नामान्तर (किंचित्) से स्वीकार किया है।

इन आठ अंगों में से अन्यतम एवं प्रधानतम अंग कायचिकित्सा के विषय में संक्षिप्त विवेचन करना ही इस लेख का उद्देश्य है अत: शेष अंगों को गौण मानकर उनके विषय में कुछ भी नहीं कहा गया है। जैसा कि कहा गया है ‘आयुर्वेद का उद्गम वेद है। वेद परम आस्तिक आगम माने जाते हैं अत: आयुर्वेद भी उपवेद होने से आस्तिकला (लोक, परलोक, कर्मवाद, नित्यानित्यत्व आदि) के बाहर नहीं जा सकता। दार्शनिक दृष्टिकोण से आयुर्वेद की प्राचीनतम संहिता में चरक और सुश्रुत क्रमश: वैशेषिक और सांख्य दर्शन पर आधारित हैं। यही कारण है कि चिकित्सा के अधिष्ठान पुरुष (जीवात्मा) को चरक में ‘षड्धातुक’ और सुश्रुत संहिता में चतुर्विंशतिक या राशिपुरुष कहा गया है।

खादयश्चेतनाषष्ठा धातव: पुरुष: स्मृत:।
चेतना: धातुरप्यंक: स्मृत: पुरुष: संजक:।

यद्यपि निर्विकार पुरुष (चेतनमात्र) अनादि है। अविनाशी है, उसका नवीन उत्पाद व नितान्त विनाश नहीं, किन्तु ‘राशि संज्ञक (षडधातुक) पुरुष जन्म—मरण की परम्परान्तर्गत सादि व नाशमान भी माना गया है। इस जन्म—मरण परम्परा के प्रमुख कारण जीव के मोह, इच्छा, द्वेष तथा विविध प्रकार के कर्म हैं। इसी राशि पुरुष में ही कर्म, उनका फल, नाना भाँति के सुख—दुख, जीवन—मरण, ज्ञान—अज्ञान आदि भी प्रतिष्ठित हैं। राशि संज्ञक पुरुष के अपने पूर्वोपार्जित आयुष्यकाल में होने वाले सुख—दुखों के कारण व उनके नाश करने के उपायों के विवेचन का नाम ही आयुर्वेद है। चरक ने भी यही कहा है :—

हिताहितं सुखं दु:ख मायुस्तस्यहिताहितम्।
मानं च तच्च यत्रोक्तिम् आयुर्वेद: स उच्यते।।

यही कारण है कि स्वास्थ्य और अस्वास्थ्य, रोग और चिकित्सा इन सभी के मूल में भौतिक तत्वों (वात, पित्त, कफ आधुनिक विज्ञान के मत से विविध प्रकार के सेल्स इत्यादि) के अलावा जीव के कर्म को भी प्रधान कारण माना है। बल्कि यों कहिये कि पुरुष के पुरुषार्थजन्य कर्मों के फलानुसार ही इसे स्वास्थ्य स्वास्थकर बाह्य भौतिक सामग्री का सहयोग मिलता है। आयुर्वेद शास्त्र की यही विशेषता है। यही उसकी व्यापकता का ठोस व मौलिक प्रमाण है अत: विश्व की समस्त चिकित्सा प्रणालियाँ आयुर्वेद के बाहर नहीं जा सकतीं। विभिन्न पैथियों में जो भी रोग और उनके प्रतिकार स्वरूप चिकित्सा का मात्र भौतिक प्रतिपादन मिलता है वह अधूरा है किन्तु आयुर्वेद का अंग है। आयुर्वेद के प्रत्येक अंग के विश्लेषण में इसका यह मौलिक सिद्धांत चेतना चेतनामूलक शरीर शास्त्र अक्षुण्ण रहता है।

आयुर्वेद चिकित्सा की व्यापकता एवं उसके भेद—प्रभेद प्रमाणित करने के लिये चिकित्सा के विषयभूत रोगों के विविध स्वरूपों को पहले समझ लेना जरूरी है। आयुर्वेद शास्त्र में रोग और उनकी चिकित्सा का विभिन्न दृष्टिकोणों से अनेक प्रकार से वर्णन मिलता है। सर्वप्रथम रोगों का विश्लेषण संक्षेप में किया जाता है। रोग की परिभाषा आयुर्वेद में इस प्रकार की है—

रोगस्तु दोषवैषम्यं दोषसाम्यमरोगिता

अर्थात् वात—पित्त—कफ इन तीनों दोषों की विषमता का नाम रोग या विकार है और इन तीनों की समानता (निश्चित अनुपात) का नाम ही अारोग्य है। इसी को सुश्रुत ने निम्न शब्दों में कहा है—

‘तददु:ख संयोगा व्याध्य:’
—अर्थात् पुरुष के साथ दु:ख (किसी भी प्रकार) के संबंध का नाम व्याधि है। इस प्रकार के रोगों का अधिष्ठान या आधार सभी ने एक मत से शरीर और मन को माना है। ऐलौपैथी व अन्य आधुनिक विज्ञान, जो जीव की अनादिता स्वीकार नहीं करते, केवल भौतिक तत्व ही जिनका क्षेत्र है, वे आत्मा व मन को रोगों का अधिष्ठान और चिकित्सा में इनकी उपयोगिता को अभी तक नहीं मानते थे, पर अब स्वीकार करने लगे हैं। रोगों के द्विविध आदि विकल्प यहाँ से गिनाये जाते हैं।

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१. द्विविध विकल्प

(१) अधिष्ठान भेद से रोग दो प्रकार के हैं। शारीरिक और मानसिक। ता हि—

तेषां कायमनोभेदादधिष्ठानमतिद्विद्या

शरीरं सत्व संज्ञंच व्याधी नामाश्रयीमल:

एएतेमन: शरीराधिष्ठाना:

(२) वागभट्ट ने निज और आगन्तुक के रूप में एक और विकल्प स्वीकार कर सभी रोगों का अन्तर्भाव उसमें किया है। तथा हि—

निजागन्तु विभागेन तत्र रोगा द्विधा स्मृता:।
निज (त्रिदोयज) और आगन्तुक (बाह्यकारणजन्य)

(३) सुश्रुत में औषधि साध्य और शस्त्रसाध्य के भेद से रोगों के दो प्रकार हैं।

द्विविधास्तु व्याध्य: शस्त्रसाध्या: स्नेहादि क्रिया साध्याश्च

छेदन—भेदन आदि शल्य क्रियासाध्य रोगों को शास्त्र साध्य और स्नेह, स्वेद, वमन, विरेचनादि साध्य रोगों को स्नेहादि क्रिया साध्य माना है। आगे त्रिविध विकल्प के रूप में रोगों का वर्गीकरण इस प्रकार है।

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२. त्रिविध विकल्प भेद

तच्च दु:खं त्रिविधम्—१—आध्यात्मिकम् २—आधिभौतिकम् ३—आधिदैविकमिति

यहाँ पर महर्षि सुश्रुत ने आत्म शब्द से मन सहित शरीर का ग्रहण किया है। अतएव वात, पित्त, कफ से उत्पन्न शरीर संभव ज्वरादिक और रज, तम, सत्व इनकी विषम स्थिति से उत्पन्न मानसिक विकार ये सब आध्यात्मिक रोगों के अन्तर्गत आ जाते हैं। भूत शब्द का अर्थ प्राणी लिया गया है। अत: विविध प्रकार के प्राणियों से उत्पन्न होने वाले रोगों को आधिभौतिक समझना चाहिए। देव शब्द से विविध प्रकार की सुरयोनियाँ (यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, व्यन्तर आदि) स्वीकर की गई है अत: इनके कारण उत्पन्न होने वाले अनेक प्रकार के रोग (भूतबाधा आदि) आधिदैविक माने गये हैं।

(२) वाग्भट्टाचार्य ने दोष, कर्म इन दोनों से स्वतंत्र और दोनों के मिश्रित कारण से उत्पन्न होने वाले ३ प्रकार के रोगों का एक विकल्प और माना है—(१) दृष्टापचारज, (२) पूर्वापराधज (कर्मज), (३) संकरज हारदुष्टापूर्वापराध (कर्मज) अर्थात् जो केवल वर्तमान, मिथ्याहार विहार से उत्पन्न होते हैं वे दृष्टाराज हैं। जो पूर्व कर्मों से उत्पन्न होते हैं वे पूर्वापराधज हैं। जो पूर्वोपाजित कर्म और मिथ्याहार—विहार दोनों कारणों से होते हैं वे संकरज हैं। निश्चित ही वाग्भट्ट की यह अनूठी कल्पना है किन्तु जैन परम्परा की दृष्टि से यह वर्गीकरण युक्तसंगत है।

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३. चतुर्विध विकल्प भेद

ते चतुर्विधा:, आगन्तव:, शरीरा:, मानसा:, स्वाभाविकायश्चेति

अर्थात् (१) आगन्तुक, (२) शारीरिक, (३) मानसिक और (४) स्वाभाविक भेद से रोग ४ प्रकार के हैं। यद्यपि इनमें से शरीर और आगन्तुक ये दो विकल्प पहिले भी आ चुके हैं। किन्तु विवेचक की अपनी कल्पना प्रश्नार्ह नहीं होता अत: इस चतुर्विध विकल्प में भी इन्हें गिनाया है। इन दोनों का स्वरूप कहा जा चुका है। क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, विषाद, हर्ष, दैन्य, मात्सर्य, इच्छा, द्वेष आदि मानसिक रोग हैं। भूख, प्यास, बुढ़ापा, मृत्यु, निद्रा आदि स्वाभाविक व्याधियाँ हैं। ये प्रत्येक प्राणी के लिये स्वाभाविक एवं अनिवार्य हैं। आश्चर्य है कि ये स्वस्थ पुरुष में भी समान रूप से पाई जाती हैं। किन्तु जब मात्रातीत या समय से पूर्व उत्पन्न होती हैं तब निश्चित ही व्याधि रूप में होती हैं अत: इन्हें रोग मानना युक्तिसंगत है।

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४. सप्तविध—विकल्प—भेद

(१) विस्तार रुचि वाले महर्षि सुश्रुत ने सात प्रकार के रोग भी माने हैं तथा हिते पुन: सप्तविधा: व्याधय:। तद्यथा (१) आदि बल प्रवृत्ता:, (२) जन्म बलप्रवृत्ता:, (३) दोषबल प्रवृत्ता:, (४) संघात बलप्रवृत्ता:, (५) कालबल प्रवृत्ता:, (६) दैवबलप्रवृत्ता:, (७) स्वभावबल प्रवृत्ताश्चेति। विस्तार भय से इसका स्वरूप यहाँ नहीं लिखा गया। जिज्ञासु महानुभाव सुश्रुत सूत्र स्थान में देख सकते हैं। इस प्रकार आयुर्वेदसम्मत रोगों का विभिन्न कल्प नामों और दृष्टिकोणों के आधार से संक्षिप्त वर्गीकरण हुआ। चूँकि रोगों के प्रतिकार का नाम चिकित्सा है अब हम चिकित्सा के भेदों पर विचार करेंगे।

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द्विविध विकल्प भेद

(१) संशोधन और संशमन भेद से दो प्रकार की चिकित्सा मानी गई है। पंचकर्म द्वारा शरीरस्थ कुपित दोषों का निर्हरण करना संशोधन चिकित्सा है। युक्तिपूर्वक प्रयोग की गई औषधियों द्वारा दोषों का उपशमन करना संशमन कहा गया है।

(२) बाह्य और आभ्यंतर के भेद से पु्न: दो प्रकार चिकित्सा के माने गये हैं। शस्त्र, क्षार, अग्निप्रयोग, प्रलेपादि के बाह्य प्रयोगों को बाह्य चिकित्सा तथा वमन, विरेचन, आस्थापन, शोणितमोक्षण को अभ्यन्तर चिकित्सा स्वीकार किया है। विविध प्रकार के शारीरिक रोगों का अपहरण इन्हीं प्रयोगों द्वारा होता है।

(३) अधिष्ठान भेद से पुन: दो प्रकार चिकित्सा के होते हैं।

(१) शरीर रोग चिकित्सा और

(२) मानस रोग चिकित्सा के क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, द्वेष, उन्माद, शोक आदि दोषों को त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) का सेवन कर और आत्मा का स्वरूप चिन्तवन आदि आध्यात्मिक प्रयोगों से शमन किया जाता है। जबकि शारीरिक व्याधियों का उपचार युक्तिपूर्वक संयोजित विविध प्रकार की औषधियों के प्रयोग व बलि, मंगल, यज्ञादि को माना है। तथा—

प्रशाम्यत्यौषधै: पूर्वो दैवयुक्ति व्ययाश्रयै:
मानसोज्ञान विज्ञान धेर्यस्मृति समाधिभि:।।

(३) निज (शारीरिक) रोग चिकित्सा और आगन्तुक रोग चिकित्सा के भेद से भी चिकित्सा दो प्रकार की है। आगन्तुक रोगों के प्रतिकार हेतु प्रज्ञापराध (विवेकशून्यता) का परित्याग, इन्द्रियोपशमन, धैर्य, देशकाल के अनुरूप आचार—विचार और सदाचार का पालन अनिवार्य माना गया है।

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३. त्रिविध विकल्प भेद।

त्रिविधं कर्म, पूर्व कर्म, प्रधानकर्म, पश्चात् कर्मच,

सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा को प्रधान माना है। इस आधार पर शल्य क्रिया की दृष्टि से उपरोक्त ३ भेद किये हैं। शल्य के पूर्व नियोजित उपकरणादि स्थानादि की व्यवस्था को पूर्व कर्म, शस्त्र क्रिया को प्रधान कर्म और उसके पश्चात पथ्य सेवन, विश्राम, व्रणबंधन आदि को पश्चात कर्म कहा है। यह विधान औषधीय (चिकित्सा) में भी लागू होता है। औषधादि की योजना (पूर्व कर्म), औषधि प्रयोग (प्रधानकर्म) और हितसेवन अहित परिहार (पश्चात कर्म)। त्रिविधिमौषधम् , १—दैवव्यपाश्रयम् , २—युक्ति व्यपाश्रय, ३—सत्वावजयश्चेति (च. सू. अ. ११)।। मणिधारण, मंगलकार्य, होम, नियम, प्रायश्चित, उपवास आदि करना, दैव व्यपाश्रय चिकित्सा मानी गई है। आहार तथा औषध द्रव्यों की योजना को युक्ति व्यपाश्रय चिकित्सा कहा है। अहित कार्यों से निवृत्ति करना सत्वावजय या मनोनिग्रह माना गया है।

(३) शारीरिक चिकित्सा को ही विधेय मानकर चरक ने पुन: तीन भेद किये है। (१) अन्त: परिमार्जन (अन्तरंग में (भीतर) औषधि प्रयोग) (२) बहि: परिमार्जन (त्वचा पर किये जाने वाले विविध अभ्यंग, आलेप, विलेप, सेंक आदि का प्रयोग) (३) शस्त्र प्रणिधानम (छेदन, भेदन आदि कर्म)।

(४) आचार्य वाग्भट्ट ने दृष्टापचारज, पूर्वापराधज और संकरज (उभयहेतुक) भेद से तीन प्रकार के रोग माने हैं। इनके दृष्टिकोण से उन्होंने ३ प्रकार की चिकित्सा स्वीकार की है—(१) दोष (वातादि), विपरीत आहार औषधि का सेवन (२) कर्म प्रतिकूल धर्मादि का सेवन और (३) दोष (वातादि) कर्म का एक साथ क्षपण (नाश)। तथा—

विपक्ष शीलनात् पूर्व: (दोषज) कर्मज, कर्म संक्षयात्।
गच्छत्युभय जन्मातु दोषकर्मक्षयात्क्षयत्।। (अ. सू. अ. १२)

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४. चतुर्विकल्प भेद

(१) महर्षि सुश्रुत ने चार प्रकार की चिकित्सा मानी है। (१) संशोधन, (२) संशमन, (३) आहार और (४) आचार। तथा—

संशोधन संशमनाहाराचार: सम्यक् प्रयुक्ता: निग्रहहेतव:

इन सबका स्वरूप ऊपर के विकल्पों में किया जा चुका है। इतना ही क्यों, आयुर्वेद में तो रोग उत्पन्न होने के पूर्व ही उसकी संत्रपादि अवस्थाओं में रोग का निर्हरण करने का स्पष्ट आदेश और विधान है। लोकव्यवहार में भी रोग और शत्रु को उत्पन्न या परिपुष्ट होने के पूर्व ही नष्ट कर देने का व्यवहार है। देखिये आचार्य सुश्रुत का कथन—

संचयं च प्रकोपं च प्रसरं स्थान संश्रयम्।

व्यक्ति भेदं च योवेति दोषाणां स भवेद्भिषक।।
संचयऽपहृता दोषा: लभन्तेनोत्तरागति:।

ते सूत्तरासुगतिषु भवन्ति बलवत्तरा।।

अत: जिन—जिन कारणों से रोग उत्पन्न हुए हैं उन—उन कारणों को दूर करने के लिये जिन—जन उपायों का आश्रय लिया जाता है उन—उन आधारों के अनुसार चिकित्सा के भी द्विविध आदि विकल्प भेद से अनेक भेद स्वभावत: हो जाते हैं। उन्हीं का उल्लेख मात्र यहाँ किया जाता है। चिकित्सा शब्द की उत्पत्ति किति रोग प्रतिकारे धातु से सन् प्रत्यय होकर हुई है। जिसका निरुक्त्यर्थ होता है रोगापहरण करने की इच्छा। काय शब्द की व्युत्पत्ति अष्टांग हृदय के टीकाकार अरुणदत्त निम्न प्रकार करते हैं — काय शब्द चिञ्चयने धातु से बना है, जिसका अर्थ होता है इकट्ठा करना या एकत्रित होना। ‘चीयते प्रशस्त धातु मलैरितिकाय:’ अर्थात जो प्रशस्त रस रक्तादि धातुओं और मलों द्वारा जोड़ा जाय, पुष्ट किया जाय वह काय है। कायस्य चिकित्सा इति काय चिकित्सा। चिकित्सा की परिभाषा आचार्यों ने इस प्रकार की है—

चतुर्णां भिषगादीनां शास्तानां धातुवैकृते:।

प्रवृत्ति र्धातुसाम्यार्था चिकित्से त्यभिधीयते।।चरक।।
याभि: क्रियाभिर्जायन्ते शारीरे धातव: समा:।

सा चिकित्सा विकारणां कर्मताद्भिषजांमतम्।।सुश्रुत।।

अर्थात् विकृत हुए रस—रक्तादि धातुओं को पुन: समावस्था में लाने के लिये योग्य चिकित्सक औषधि के प्रयोग को चिकित्सा कहते हैं। चिकित्सकों का कर्तव्य ही चिकित्सा है। सर्व सामान्य की दृष्टि में काय शब्द का अर्थ सप्त धातुमय शरीर यद्यपि होता है जैसा कि ऊपर अरुणदत्त जी की निरुक्ति में बताया गया है किन्तु जहाँ काय चिकित्सा का प्रश्न है प्राय: सभी आचार्यों और टीकाकारों ने काय शब्द का ध्वन्यर्थ या वाच्यार्थ जठराग्नि ही स्वीकार किया है। इसी उद्देश्य को लक्ष्य में रखकर सभी ने कायचिकित्सा का अर्थ शब्दान्तरों में समान ही प्राय: किया है। यथा— कायति शब्दं करोतीतिकाय:, शरीरं तच्च हृदय प्रधानाब्दस्य हृदयस्थानत्वात्, हृदयं हि सर्व शरीरे पोषनाव शिष्टमशुद्धं रत्तं रक्तवाहिनी शिराभ्यो गृहणाति शुद्धयर्थ च तत्फप्फुसे प्रक्षिपति’। अर्थात् शरीर के पोषक प्रधान धातु रक्त ‘धुग—धुग’ ऐसा शब्द करने वाले हृदय द्वारा समस्त शरीर में भेजे जाते हैं। इससे शरीर या काय का आधार हृदय है। वह शब्द करता है अत: आधार में आधेय (काय) का उपचार कर उसे शब्द करने वाला स्वीकार किया है। चिकित्सा भी शरीर की ही जाती है।

काय अन्तराग्रस्तस्य चिकित्साकाय चिकित्सा (चक्रपाणि:)।

चक्रपाणिजी अन्तराग्नि जठराग्नि को शरीर मानते हैं और जठराग्नि की चिकित्सा को काय चिकित्सा कहते हैं। यह रस रक्तादि धातुओं के मूल निर्माता के रूप में अग्नि को स्वीकार करते हैं। अन्य टीकाकार भी इससे सहमत हैं। यह विकल्प भी शरीर के मूलाधार (अग्नि) में शरीर की उपचार से कल्पना कर किया गया है|

काय: सकलं शरीरं तस्य चिकित्सकाय चिकित्सा। प्राय: रसादे: सर्वांगव्यापकस्य दोषादेव ज्तरातिसार रक्त पित्तादय: सम्भवन्ति। किंवा कायतिशब्दं करोतीतिकाय: जठराग्नि:
(शिवदाससेन)।

जठराग्नि से निर्मित होने वाले रसादि धातुओं से ही ज्वरादि की उत्पत्ति होती है इन्हें नाश करने के लिये सर्वप्रथम जठराग्नि की चिकित्सा आवश्यक होती है अत: उसे ही काय माना है।

जठर: प्राणिनामग्नि: काय इत्यभिधीये।
यस्तं चिकित्सेत्सीदन्तं सर्वेकाय चिकित्सक:।।भोज।।

अर्थात् प्राणियों की जठराग्नि ही शरीर है। दुर्बल हुई जठराग्नि की जो चिकित्सा करता है वहीं काय चिकित्सक है।

यदत्रं देहधात्वोजो बलवर्णादिषोषकम्।
तत्रांनाग्निहेनतु राहारान्तह्यपक्काद्रसादय:।।(वाग्भट्ट)

देह के धातु ओज—बल आदि का पोषक अन्न है। उस अन्न का परिपाक जठराग्नि से होता है। अत: जठराग्नि ही काय है, अपक्व आहार से रसादि की उत्पत्ति नहीं हो सकती।

आयुर्वेदो बलं स्वास्थ्यं मुत्सारोपचयौ प्रभा।
ओजस्ते जोऽनय: प्राणाश्चोक्ता देहाग्नि हेतुका:।

इस श्लोक का भी यही आशय है अर्थात् जठराग्नि ही काय है। इस प्रकार जठराग्नि को यथावत् व्यवस्थित रखना ही आयुर्वेद की काय चिकित्सा है। यह कायचिकित्सा व्यापक है। इसके विषय में प्राचीन आचार्यों ने अनेक विकल्पों द्वारा विस्तार से प्रकाश डाला है। यहाँ नाममात्र के रूप में उन विकल्पों को गिनाया जाता है। इस विवेचन में आचार्यों ने चिकित्सा को कहीं ‘कर्म’ कहीं ‘औषध’ कहीं ‘उपचार’ आदि के नाम से निर्दिष्ट किया है।

यहाँ पर चिकित्सा शब्द के वाचक आधार और अर्थ लिखे हैं। इनमें पंचकर्म चिकित्सा यह अध्याय प्रमुख है जिसे अब अन्य पैथालॉजी मानने लगे हैं। वे पांच कर्म निम्न हैं। स्नेह (तेल लगाना), स्वेत (पसीना देना) वमन (उल्टी कराना), विरेचन और वस्ति (ऐनीमा)। इन पाँच कर्मों द्वारा सर्दी के अन्दर विविध प्रकार के रोग अच्छे होते हैं। सारे भारतवर्ष में तथा विदेशों में भी प्रचार हो रहा है। इसका विवेचन यहाँ संभव नहीं यथासमय स्वतंत्र लेख में किया जायेगा।

आयुर्वेद में एक विशेष चिकित्सा विधान मिलता है जिसका पूर्व शास्त्र में विस्तार है, अब इस ओर सभी पैथियों के चिकित्सकों का ध्यान गया है और इसका सभी पैथियों में प्रचार व रुचि बढ़ रही है। इसमें आठ प्रकार की क्रियाएँ होती हैं जिनसे शरीर स्थित चिरकालीन रोग दूर हो जाते हैं। वे पंचकर्म (क्रियाएं) इस प्रकार हैं।

(१) स्नेह, (२) स्वेद, (३) वमन, (४) विरेचन, (५) वस्ति।

(१) स्नेह- इस क्रिया में शरीर की विविध प्रकार के तेलों की मालिश की जाती है, इससे चिरकालीन संचित दोष, वात दोष जिससे शरीर स्थित हड्डियाँ व मोटापा आदि दोषों को बढ़ाने वाला वात दोष ऊपर आ जाता है।

(२) स्वेत—इसका अर्थ होता है। शरीर स्थित दोष को पसीना देकर अलग किया जाना। इसका प्रयोग पित्त दोष व उसी से उत्पन्न रोगों को दूर करने में किया जाता है।

(३) वमन्- इसमें रोग निकालने के लिये उल्टी कराई जाती है। इसका प्रयोग चिरकालीन संचित कफ खांसी ऐसे रोगों को दूर करने में होता है।

(४) विरेचन—इसे दस्त लगाना कहते हैं। इससे चिरकालीन संचित दोष दूर हो जाते हैं और इसका प्रचार चिकित्सा क्षेत्र में बहुतायत से हो रहा है अत: आयुर्वेद काय चिकित्सा का क्षेत्र बहुत विशाल है। इससे बहुत लाभ होता है।

(५) वस्ति—इसमें एनिमा लगाकर मल की सफाई की जाती है। आतों में चिपका मल निकाल दिया जाता है।

आयुर्वेद चिकित्सा की व्यापकता के कारण ही जैनाचार्यों ने इस पर बहुत ध्यान दिया एवं अनेक स्वतंत्र ग्रंथों का सृजन किया। इनके ग्रंथों की मौलिकता एवं विशिष्टता की अलग से चर्चा करेंगे।