ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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आरती संग्रह-

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आरती संग्रह के विषय में
प्रकाशक दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर
लेखक प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी
पुस्तक के विषय में भगवान की भक्ति करने के अनेक माध्यम हैं जैसे पूजन करना, भजन गाना, आरती करना, चालीसा का पाठ करना आदि। उन्हीं में से मानव अपने मोहरूपी अंधकार को नाश करने की कामना से दीपकों को प्रज्ज्वलित करके प्रभु की आरती करके कर्म निर्जरा करते हैं। इस पुस्तक में पूज्य प्रज्ञाश्रमणी चंदनामती माताजी द्वारा रचित चौबीसों तीर्थंकरों की, उनकी १६ जन्मभूमियों व ५ निर्वाण क्षेत्रों की तथा अन्य पंचकल्याणक भूमियों की आरती का संग्रह किया है। जंबूद्वीप, तेरहद्वीप, तीनलोक, सुदर्शन मेरू, समवसरण, हीं प्रतिमा, सहस्रवूâट जिनबिम्ब आदि अन्य विशेष आरतियाँ भी हैं। इन्द्रध्वज, कल्पद्रुम, सर्वतोभद्र आदि बड़े तथा शांति विधान, भक्तामर, कर्मदहन आदि लघु विधानों की २५-३० आरतियाँ हैं। सरस्वती माता, लक्ष्मीमाता, चा. च. आचार्य श्री शांतिसागरजी, आचार्य श्री वीरसागर जी, गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी इन गुरुओं की आरती तथा दशधर्म की आरती भी है। देव, शास्त्रगुरु तीनों की आरतियों से समन्वित यह पुस्तक सभी के लिये अत्यन्त उपयोगी बन गई है। इसी पुस्तक में जिनशासन देव-देवी की भी कुछ आरतियों का संकलन करके दे दिया गया है जिससे यह पुस्तक अपने आप में सभी प्रकार से परिपूर्ण हो गई है।

१३२ पृष्ठों की इस पुस्तक में पृ. ६९ पर प्रकाशित पंचपरमेष्ठी एवं चौबीस भगवान की आरती सर्व जनप्रिय बन गई है। जो यह है—

घृत दीपक का थाल ले, उतारूँ आरतिया मैं तो पाँचों परमेष्ठी की........।

पाँचों परमेष्ठी की एवं चौबीसों जिनवर की।। घृत..............................।।टेक।।

गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की मंगल आरती में कामना की है—

गणिनी माता ज्ञानमती की, आरति है सुखकारी।

इनके दर्शन से नश जाता, मोह तिमिर भी भारी।।
बोलो जय-जय-जय .............।।

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