ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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आरोग्य वद्र्धक दोहे

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आरोग्य वर्द्धक दोहे

१. यम नियम पालन करैं, साधै जो नर योग।

परहित का साधन करैं, निकट न आवै रोग।।

२. नाशै रोग मिटै सब पीरा,
जो प्रभु भजन करैं नित धीरा।।

३. जो नर बाई करवट सोये,
उसका काल बैठकर रोये।।

४. औषध नही व्यायाम समाना,
व्यय नहीं कोई लाभ महाना।।

५. आसन, सत्संग, ध्यान समाधि,
दूर करैं तन मन की व्याधि।।

६. वेयि स्वर भोजन करो, वेयि पीओ नीर।
वेयि करवट सोइये, रहे निरोग शरीर।।

७. कम खाना खूब चबाना,
तंदुरूस्ती का यही खजाना।।

८. लघु शंका और क्रोध में, कबहु न मुख से बोल।
शौच समय सिर बाँधिये, भोजन में सिर खोल।।

९. चाय तम्बाकू डालडा, जो नहीं करे प्रयोग।
उस नर को छूते नहीं, भाँति—भाँति के रोग।।

१०.मैथी बथुआ आँवला, जो खावे मन लाय।
भूख बढ़ै कब्जी मिटे, खून साफ हो जाय।।

११.हरड़ बहेड़ा आँवला, चौथी नीम गिलोय।
पंचम मिश्री डालिये, निर्मल काया होय।।

१२.गर कमजोर दिमाग है, तो कर इतना काम।
ब्राह्मी शंख पुष्पी चखो, खा भीगे बादाम।।

१३.खीरा, खरबुज गौखरू, खाये नित्य सलाद ।
गुर्दे की पथरी खतम, साठ दिनों के बाद।।

१४.किसमिस धोकर दीजिए, पानी बीच डुबोय।
चबा चबाकर खाईये, तन फुर्तीला होय।।

१५.पीस चिरौंजी लीजिये, कच्चे पय के संग।
सोते समय लगाईये, निखरे मुँह का रंग।।

१६.ठण्डे जल से हाथ पग, सोते पहले धोय।
तो फिर निश्चय जानिये, स्वप्न दोष ना होय।।

१७.धातु करण अर जल धारण जो कोऊ पूछे मोय।
पथ समान इस जगत में नहिं दूसरा कोय।।

१८.सोंठ, कुलंजन, काली मिर्च,राई पीपल, पान।
इतने की गोली करें, कोकिल कंठ समान।।

१९.क्वाथ गोखरू वीज को जवाखार लेय।
मूत्र कृच्छ अतिजोर को, तुरंत दूर कर देय।।

२०.अर्क सुदर्शन पत्र का, गरम कान में डाल।
कानन के सव दर्द को, तुरंत दूर कर देय।।

२१.वनवसा मुलेठी, खत्मी, विसौले, मंगाकर बाजार से थोड़े—थोड़े।
पकाकर पीवे सुवह अरू शाम, कहाँ की सर्दी कहाँ का जुकाम।।

२२.गर सुनना चाहे सौ साल,
कडुआ तेल कान में डाल।

२३.कडुआ तेल नित नाक लगावे,
रोग नाक के पास न आवे।।

२४.बाल सफेद न वाके होय,
जो त्रिफला जल से सिर धोय।

२५.किसी शस्त्र से तन कट जावे,
चूना भरे पक नहीं पावे।।

२६.जाहि नींद नहीं आवे, वे न रहें उदास।
भांग भून तलवा मले, निंदिया आवे पास।।

२७.त्रिफला त्रिकुटी तूतिया, पाँचों नमक पतंग।
दांत वङ्का के होत है, माजू फल के संग।।

२८.मूंगीफल, बादाम का छिलका देय जलाय।
पीसे अधिक महीन कर, मंजन लेय बनाय।।

२९.सब रोग की चार दवा,
मिट्टी, पानी, धूप, हवा।।

३०.कील मुहाँसो पर मलो,दूध गधी का रोज।
मिटे हमेशा के लिए, रहे न बिलकुल खोज।।

३१.गर्म नीर में घोल कर हींग करो यह काज।
खूब गरारे कीजिये, खुल जाये आवाज।।

३२.सरसों तेल पकाईये दूध आक का डाल।
मालिस करिये छान कर, खुश्क खाज का काल।।

३३.कान शूल और पीव में नीम तेल टपकाय।
रोज रात को डालिये, बहरापन मिट जाय।।

३४.चना, चून विन नोन के जो चौंसठ दिन खाय।
दाद,खाज और सेहुऑ जड़ मूल से जाय।।

३५.गीले कपड़े से रगड़, दूध आक का लाय।
जीर्ण दाद कुछ रोज में , जड़ मूल से जाय।।

३६.नींबू रस में घोल कर, गंधक टंकण राल।
मलते रहिये दाद पर, जड़ से मिटे बवाल।।

३७.तेल अरण्डी का मिला, पिये दूध जो शूर।
दर्द पिण्डलियों का मिटे, गैस कब्ज हो दूर।।

३८.दूध आक का लीजिये, तलवो माहि रमाय।
दिन चालीस लगाईये, मिर्गी रोग नशाय।।

३९.राल कूट सैंधा नमक, पीसे सरसों संग।
जो तन पर उबटन करे, निखर जाये सब अंग।।

४०.पागल पन उन्माद की औषधि है अनूकूल।
शक्कर सीरा साथ ले, खा चंपा के फूल।।

४१.पाँच ग्राम तिल पीस कर, ले बकरी का क्षीर।
खांड डालकर पीजिये, मिटे पेट की पीर।।

४२.वर्र ततैया खाग तो, करो नहीं परवाह।
दूध लगावे आक का, मिट जावै जब दाह।।

४३.सूखी पत्ती नीम की, चूरन लेओ बनाय।
सप्ताह भर तक लीजिये, पेट कृमि मिट जाय।।

४४.लहसुन दूध मदार, दोनों संग मिलाय।
विच्छू काटे पै धरै, जहर विष तुरंत मिट जाय।।

मुनि जिनानंद सागर
(सत्यार्थी मीडिया मासिक)