ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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आर्यिकाओं की नवधाभक्ति आगमोक्त है

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आर्यिकाओं की नवधाभक्ति आगमोक्त है

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अरिहन्तो मंगलं कुर्यु:, सिद्धा: कुर्युश्च मंगलम्।
आचार्या: पाठकाश्चापि साधवो मम मंगलम्।।

भव्यात्माओं! मैं आर्यिका की चर्या के बारे में आपको बताती हूँ। आर्यिकाएँ यद्यपि उपचार से महाव्रती हैं फिर भी वे अट्ठाईस मूलगुणों को धारण करती हैं, नवधाभक्ति की पात्र हैं और सिद्धांत ग्रंथ आदि को पढ़ने का, लिखने का उन्हें अधिकार है। इस विषय पर मैं आपको आगम के परिप्रेक्ष्य में बताती हूँ-

चारित्रचक्रवर्ती आचार्यश्री शांतिसागरजी महाराज की परम्परा में जो दीक्षाविधि मुनियों की मानी है, वही दीक्षा विधि आर्यिकाओं की भी मानी है। जिस प्रकार मुनियों के २८ मूलगुण होते हैं, उसी प्रकार आर्यिकाओं के भी २८ मूलगुण माने हैं। दीक्षा के समय जो संस्कार मुनियों पर किए जाते हैं, वही आर्यिकाओं पर भी किए जाते हैं। एक बार किसी ने आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज से प्रश्न किया कि आर्यिकाओं के तो २६ मूलगुण ही हैं क्योंकि वे वस्त्र रखती हैं और बैठकर आहार करती हैं। तब आचार्यश्री ने कहा कि बैठकर आहार करना और दो साड़ी मात्र परिग्रह रखना यह उनका मूलगुण है अत: आर्यिकाओं के २६ मूलगुण न होकर २८ मूलगुण ही हैं।

आचारसार ग्रंथ में लिखा है-

देशव्रतान्वितैस्तासामारोप्यन्ते बुधैस्तत:।
महाव्रतानि सज्जाति ज्ञप्त्यर्थमुपचारत:।।८९।। (आचारसार)

गणधर आदि देवों ने आर्यिकाओं की सज्जाति आदि को सूचित करने के लिए उनमें उपचार से महाव्रत का आरोपण करना बताया है। यही कारण है कि ग्रंथों में महाव्रत पवित्रांगा, संयता, संयतिका आदि शब्दों का प्रयोग आर्यिका के लिए आया है और उन्हें मुनियों के समान पूज्य माना है।

सागारधर्मामृत में आया है-

कौपीनेऽपि सम्मूर्च्छत्वान्नार्हत्यार्यो महाव्रतम्।
अपि भाक्तममूर्च्छत्वात् साटकेऽप्यार्यिकार्हति।।३६।।
(सागारधर्मामृत, पृ. ५१८)

अहो! आश्चर्य है, ऐलक लंगोटी में ममत्व परिणाम होने से उपचार से महाव्रती नहीं हो सकता किन्तु आर्यिकाएं साड़ी मात्र परिग्रह होते हुए भी उसमें ममत्व रहित होने से उपचार से महाव्रती कहलाती हैं। आर्यिकाएं ऐलक के द्वारा पूज्य मानी गई हैं। ऐलक देशव्रती ही माने गए हैं। आगम के परिप्रेक्ष्य में जैसा गुरुओं ने मुझे बताया है उसी का मैंने प्रमाण दिया है।

मूलाचार ग्रंथ में भी लिखा है-

एसो अज्जाणं पिय सामाचारो जहाक्खिओ पुव्वं।
सव्वह्मि अहोरत्ते विभासिदव्वो जधाजोग्गं।।१८७।।(मूलाचार)

जितनी समाचारी विधि का वर्णन मुनियों के लिए किया है, उतनी ही समाचारी विधि आर्यिकाओं के लिए भी है। अहोरात्र, सभी काल में उन्हें ये सभी क्रियाएं विधिवत् करनी चाहिए। ‘जहा जोग्गं’ का अर्थ टीकाकार ने किया है ‘यथायोग्य’ अर्थात् वर्षा ऋतु में वृक्ष के नीचे आतापन आदि जो योग हैं इन योगों को छोड़ करके तथा दिन में सूर्य की तरफ मुख करके खड़े होना, प्रतिमायोग आदि धारण करना, इन्हें छोड़कर बाकी सभी क्रियाएँ मुनियों के समान हैं।

आचारसार में भी कहा है-

लज्जाविनय-वैराग्य-सदाचार-विभूषिते।
आर्याव्राते समाचार: संयतेष्विव किन्त्विह।।८१।।(आचारसार पृ. ४२)

लज्जा,विनय, वैराग्य और सदाचार से विभूषित आर्यिकाओं के समूह में समाचार विधि मुनियों के समान ही सारी समझ लेना चाहिए। किन्तु कुछ अन्तर है,वह बताते हैं

साधूनां यद्वदुद्दिष्टमेवमार्यागणस्य च।
दिनस्थान त्रिकालोनं प्रायश्चित्तं समुच्यते।। (प्रायश्चित्त ग्रंथ)

मुनियों के लिए जो क्रियाएँ बताई हैं, वही सब आर्यिकाओं के लिए भी बताई हैं अन्तर इतना है कि ‘दिनप्रतिमायोग’ आर्यिकाओं के लिए वर्जित है। इन्हीं आधार से आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज, आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज हमेशा आर्यिकाओं के लिए पूरी विधि मुनि के समान मानकर, वे नवधाभक्ति के लिए पात्र हैं, ऐसा हमेशा प्रतिपादन करते थे। यही कारण है कि इस परम्परा में आर्यिकाओं की नवधाभक्ति, पूजा आदि चल रही है।

प्रथमानुयोग में भी अनेक प्रकरण आए हैं-

श्री रामचन्द्र जी जैसे महापुरुषों ने भी ‘वरधर्मा’ नाम की महागणिनी की पूजा की है। दूसरी बात यह है जैसे समवसरण में मुनियों में प्रमुख ‘गणधर’ माने गए हैं उसी प्रकार आर्यिकाओं में प्रमुख ‘गणिनी’ भी मानी गई हैं। तिलोयपण्णत्ति ग्रंथ में जहाँ २४ तीर्थंकरों के एक-एक गणधर के नाम हैं, वहीं एक-एक गणिनी के नाम भी प्रसिद्ध हैं। गणधर यानि गणों के नायक आचार्य के समान महान उसी प्रकार से ‘गणिनी’ यानि आर्यिकाओं में प्रधान, शिक्षा, दीक्षा, प्रायश्चित्त आदि देने के लिए सक्षम मानी गई हैं। गणिनी आचार्यों के समान पद को धारण करने वाली मानी गई हैं।

आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज और भी प्रमाण दिया करते थे।

प्रायश्चित्त ग्रंथ में मुनियों और आर्यिकाओं का प्रायश्चित्त समान माना है। पुनर्दीक्षा, छेद, पारंचिक ये प्रायश्चित्त आर्यिकाओं के लिए नहीं माने हैं। क्षुल्लक, क्षुल्लिकाओं के लिए उससे आधा प्रायश्चित्त माना है। ब्रह्मचारी, ब्रह्मचारिणियों के लिए उससे आधा माना है। इससे भी ज्ञात होता है कि मुनियों की चर्या के समान, आर्यिकाओं की चर्या शास्त्र विहित है। अब मैं आपको बताती हूँ कि जो यह चर्चा आती है कि क्या आर्यिकाएँ सिद्धान्त ग्रंथ पढ़ सकती हैं, उनकी टीका आदि लिख सकती हैं। मैं इसके लिए भी आपको प्रमाण बताती हूँ।

वसुनन्दिश्रावकाचार में आया है-

दिण पडिमवीरचरिया तियालजोगेसुणत्थि अहियारो।
सिद्धंत रहस्साण वि अज्झयणं देसविरदाणं।। (वसुनंदि श्रा.पृ. ११२)

पहली प्रतिमा से लेकर ग्यारहवीं प्रतिमा तक सभी देशविरत माने हैं, इनके लिए जिनप्रतिमा, वीर चर्या, त्रिकालयोग, आतापन, वृक्षमूल आदि योग करने का अधिकार नहीं है और सिद्धान्तग्रंथों के पढ़ने का और प्रायश्चित्त ग्रंथों के पढ़ने का भी अधिकार नहीं है। अब मैं मूलाचार की पंक्ति आपको दिखाती हूँ, जिसमें आर्यिकाओं को सिद्धान्त ग्रंथ पढ़ने का अधिकार है-

तं पढिदुमसज्झाये णो कप्पदि विरद इत्थिवग्गस्स।
एत्तो अण्णोगंथो कप्पदि पढिदुमसज्झाये।।९७।। (मूलाचार)

अस्वाध्याय काल में ‘विरद’ यानि संयत-मुनियों के लिए और ‘इत्थि वग्गस्स’ से स्त्रीवर्ग यानि आर्यिकाओं के लिए कहा है। टीकाकार ने लिखा है कि तत्सूत्रं पठितुं अस्वाध्याये न कल्प्यते न युज्यते।’ अर्थात् अस्वाध्यायकाल में सूत्र ग्रंथों का पढ़ना युक्त नहीं है, स्वाध्यायकाल में उसे पढ़ सकते हैं। इसका मतलब यह निकलता है कि आर्यिकाएं स्वाध्यायकाल में सिद्धांत ग्रंथ पढ़ सकती हैं, उन्हें सिद्धांत ग्रंथ पढ़ने का पूरा अधिकार है।

अब आप पुराणों के और भी उदाहरण देखिए-

द्वादशांगधरोजात: क्षिप्रं मेघेश्वरो गणी।
एकादशांग भृज्जाता सार्यिकापि सुलोचना।।५२।। (हरिवंश पुराण पृ. २१३)

मेघेश्वर यानि जयकुमार भगवान के समवसरण में दीक्षित होकर भगवान के गणधर बन गए और शीघ्र ही द्वादशांग के धारी हो गए। सुलोचना भी आर्यिकादीक्षा लेकर ग्यारह अंग की धारिणी हो गर्इं। दिगम्बर सम्प्रदाय में वर्तमान में ग्यारह अंग और चौदहपूर्व ग्रंथ नहीं हैं, उनका अंश धवला ग्रंथ को माना गया है।

इस प्रकार देखा जाये जब आर्यिका ११ अंग की पाठी हो सकती हैं, तो आज सिद्धान्तग्रंथ पढ़ने और लिखने की पात्र क्यों नहीं हो सकतीं? शास्त्र में ऐलक और क्षुल्लक को अंग, पूर्व पढ़ने का अधिकार नहीं दिया है। आजकल कोई-कोई साधु, आर्यिकाओं को सिद्धान्त ग्रंथ पढ़ने का तो निषेध करते हैं और अव्रती पण्डितों के और अव्रती श्रावक-श्राविकाओं के बीच षट्खण्डागम ग्रंथ की वाचना करते हैं। मैं सोचती हूँ यह कहाँ तक उचित है? आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज की आज्ञा से विद्वानों ने इन ग्रंथों को पढ़ा और इसका हिन्दी अनुवाद भी किया है। ताड़पत्री से, मूल कन्नड़ लिपि से हिन्दी में अनुवाद करके उसको प्रकाशित कराया है।

'आचार्यों ने सिद्धान्त ग्रंथों को पढ़ने में दिक्शुद्धि मानी है।

अव्रती श्रावकों के बीच में जब इसकी वाचना होती है तो दिक्शुद्धि नहीं होती है जबकि दिक्शुद्धि होना आवश्यक है। दिक्शुद्धि का अर्थ मूलाचार में भी बताया है और षट्खण्डागम की धवला टीका में नवमीं पुस्तक में इसका विस्तार से वर्णन आया है-

‘पच्छिम रत्ति सज्झायं...................(धवला पृ. ९)

णवसत्त पंचगाहा, परिमाण दिसि विभाग सोधीये।

पुव्वण्हे अवरण्हे, पदोसकाले य सज्झाये।।९२।।(मूला.)

मूलाचार में बताया है पश्चिम रात्रि में स्वाध्याय को विसर्जित करके पुन: पूर्वाण्ह के स्वाध्याय के लिए दिक्शुद्धि करें। दिक्शुद्धि की विधि यह है कि चारों दिशाओं में ३-३ श्वासोच्छ्वासपूर्वक एक बार णमोकार मंत्र यानि २७ श्वासोच्छ्वासपूर्वक ९-९ बार णमोकार मंत्र का जाप्य करके दिक्शोधन विधि करें। पश्चिम रात्रि में सिद्धान्त ग्रंथों को पढ़ने का सामान्य मुनियों के लिए निषेध किया है। ऋद्धिधारी मुनियों के लिए छूट की है।

‘दिगम्बर मुनि’ और ‘आर्यिका’ नामक पुस्तक में मैंने दिग्शोधन विधि को बहुत स्पष्टरूप में लिखा है

अथ पौर्वाण्हिक वाचना क्रियायां पूर्वदिक्शुद्धिं करोम्यहं।’ऐसा बोलकर खड़े होकर पूर्व दिशा में २७ श्वासोच्छ्वासपूर्वक ९ बार णमोकारमंत्र का जाप्य करें, पुन: इसी विधि से दक्षिण, पश्चिम और उत्तर में भी श्वासोच्छ्वासपूर्वक ९-९ बार णमोकार मंत्र पढ़कर दिक्शुद्धि करें। पुन: पूर्वाण्हकाल में स्वाध्याय करें। पूर्वाण्हकाल के स्वाध्याय के समापन के बाद अपराण्हकाल के स्वाध्याय के लिए ७-७ बार श्वासोच्छ्वासपूर्वक णमोकार मंत्र पढ़कर दिक्शुद्धि करें। पूर्वाण्ह में सायंकाल के स्वाध्याय के लिए दिक्शुद्धि कर ली जाती है पुन: अपरान्हकाल में स्वाध्याय को विसर्जित करके पूर्वरात्रि स्वाध्याय के लिए श्वासोच्छ्वासपूर्वक ५-५ बार णमोकार मंत्र पढ़कर चारों दिशाओं में दिक्शुद्धि की जाती है।

जब से मैंने मूलाचार ग्रंथ में और नवमीं पुस्तक धवला में दिक्शुद्धि की विधि पढ़ी है, तब से बराबर मैं षट्खण्डागम के लेखन के समय और षट्खण्डागम के स्वाध्याय के समय स्वयं दिक्शुद्धि करती हूँ और अपनी शिष्याओं से भी कराती हूँ। मैंने देखा है आजकल कोई-कोई साधु भी दिग्शुद्धि नहीं करते हैं। अस्वाध्यायकाल में जो सिद्धान्तग्रंथों के स्वाध्याय को वर्जित कहा है उसमें अष्टमी, चतुर्दशी, पूर्णिमा और अमावस को, आष्टान्हिक पर्व में, सामायिक काल में भी वर्जित कहा है। मैंने देखा है कुछ विद्वान जो प्रात: सामायिक का काल है उसमें भी धवला, समयसार आदि का स्वाध्याय करते रहते हैं। सूर्योदय के २ घड़ी पहले और २ घड़ी पीछे स्वाध्याय के लिए अकाल है। इस समय षट्खण्डागम आदि ग्रंथों का स्वाध्याय नहीं करना चाहिए। इसी तरह मध्यान्ह में १२ बजे के २ घड़ी पहले और २ घड़ी पीछे तक का काल स्वाध्याय के लिए अकाल माना है। इसी तरह सायंकाल में सूर्यास्त के २ घड़ी पहले और २ घड़ी पीछे तक अस्वाध्याय काल माना है। मैंने देखा है कहीं-कहीं वाचना करने वाले इन बातों का ध्यान नहीं रखते हैं जबकि उन्हें इस बात का ध्यान रखना चाहिए और भी स्वाध्याय के अकाल माने गए हैं, जैसे-दिग्दाह, उल्कापात, किसी का मरण, राजनैतिक क्षेत्र में किसी विशेष का मरण, साधुओं के मरण आदि में भी अकाल माना गया है और उसके लिए ग्रंथों में दिन की व्यवस्था बताई गई है, जैसे संघ में आचार्य का समाधिमरण हो तो संघ में तीन दिन का स्वाध्याय वर्जित है। सामान्य मुनि का मरण हो तो एक दिन का स्वाध्याय वर्जित है।

संघ में हम लोगों ने आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज की आज्ञा से ही सिद्धान्त ग्रंथ पढ़ा है, सुना है। ब्यावर में पं. पन्नालाल जी सोनी के सामने किसी से यह चर्चा आई थी, तब उन्होंने भी अनेक प्रमाण दिखाए थे। मूलाचार में एक और पंक्ति आई है। टीका में-तपस्विनीनां साटकमात्र परिग्रहेऽपि तत्र ममत्व परित्यागादुपचारत्वे नैग्र्रन्थ्य व्यवहरणानुसरणात्।.....(मूलाचार पृ. २१०)

तपस्विनी अर्थात् आर्यिकाओं में साड़ी मात्र परिग्रह होते हुए भी उनका उनमें ममत्व का परित्याग होने से उपचार से उनमें निर्ग्रंथ का व्यवहार पाया जाता है। आचार्यों ने आर्यिकाओं के लिए दो साड़ी अंग को प्रक्षादन करने के लिए माने हैं। आचार्यों ने पुराणों में आर्यिकाओं के लिए संयता शब्द दिया है। देखिए, पद्मपुराण तृतीय भाग में-‘‘त्यक्ताशेषगृहस्थवेषरचना मन्दोदरी संयता’’। मन्दोदरी गृहस्थ के वेश को छोड़कर आर्यिका बन गर्इं। पद्मपुराण में और भी आया है-

‘‘साहं दु:ख क्षयाकांक्षा दीक्षां जैनेश्वरी भजे।’’ (पद्मपुराण तृतीय भाग पृ. २८४) सीता ने श्रीरामचंद्र जी से कहा-दु:ख के क्षय की आकांक्षा से मैं जैनेश्वरी दीक्षा को ग्रहण करती हूँ।

‘महाव्रत पवित्रांगा महासंवेगसंगता।’ (पद्मपुराण तृतीय भाग) पद्मपुराण में महाव्रत से पवित्र है अंग जिसका, ऐसे महासंवेग से संगत महासती सीता आर्यिका का वर्णन किया है। ऐसे अनेक वर्णन शास्त्रों में आए हैं अत: यह निश्चित समझना चाहिए कि आर्यिकाएं उपचार से महाव्रती हैं। भले ही इनका गुणस्थान पाँचवां-देशसंयत है, लेकिन ये देशव्रती नहीं हैं व्यवहार में मुनिवत् सारी चर्या मानी है और वे पूर्णरूपेण नवधाभक्ति की पात्र हैं।

आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज एवं आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज ने आगम के परिप्रेक्ष्य में विद्वानों की सभा में बैठकर एक-एक छोटे-छोटे विषयों को अच्छी तरह से विचार-विमर्श करके ही प्रत्येक प्रक्रिया लागू की है अत: इनकी परम्परा में आर्यिकाओं की चर्या में नवधाभक्ति बराबर चली आ रही है और चलती रहेगी।

'एक विषय और आता है

मुनियों को नमस्कार करते समय आर्यिकाएं, महिलाएं तीन हाथ दूर से नमस्कार करें। मूलाचार ग्रंथ में आया है कि ३, ४, ५ हाथ दूर से नमस्कार करें। मैंने मूलाचार ग्रंथ, आचारसार, भगवती आराधना आदि अनेक ग्रंथों के आधार से ‘आराधना’ नाम की पुस्तक लिखी है। संक्षेप में ४४४ श्लोकों में उसे बनाया है। उसका अध्ययन करते हुए एक विद्वान ने प्रश्न किया कि जब आर्यिकाओं को ३,४,५ हाथ दूर से आचार्य, उपाध्याय, साधुओं को नमस्कार करने का विधान है, तो वे मुनियों के चरण नहीं छू सकती हैं। इस पर मैंने उन्हें समाधान दिया कि नमस्कार करने की व्यवस्था अलग है और चरण छूने की व्यवस्था अलग है। भगवान की वंदना में भगवान का स्पर्श न करते हुए दूर से वंदना करने की विधि बतलाई है इसलिए कि उस समय आसादना न हो। बाकी हर बातें विवेक से काम लेने की हैं।

मुनियों को ३,४,५ हाथ दूर से नमस्कार करने के लिए शास्त्र में लिखा है, तो इस बात पर कुछ लोग कह देते हैं कि मुनियों को आहार भी दूर से देना चाहिए लेकिन आहार देते समय ३,४,५ हाथ दूर से आहार देना संभव नहीं है। किसी महिला का हाथ मुनि के हाथ तक ग्रास देने में इतनी दूर से सक्षम नहीं हो सकता है। यह हास्यास्पद विषय है। नमस्कार की व्यवस्था केवल नमस्कार के समय लागू होगी, अन्य समय नहीं लागू होगी। आज महिलाएँ सभी मुनियों को आहार देती हैं, जिसे आप सभी स्वीकार करते हैं। सन् १९५६-५७ में एक शिवजी रामजी नाम के पण्डित जी ने कह दिया था कि महिलाएँ मुनियों को आहार नहीं दे सकती हैं, तब काफी हंगामा हुआ था, बहुत ही विवाद उठा था। यह सुनकर उस समय मुम्बई में नेमिसागर महाराज ने, उपवास कर लिया था। तब आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज ने उन्हें आहार लेने की आज्ञा भिजवाई थी। अनन्तर खानिया-जयपुर में आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज के संघ में उन विद्वान को बुलाया गया और उन्हें मूलाचार की पंक्तियाँ दिखाई थी कि सूती यानि प्रसूती आदि महिलाएं आहार नहीं दे सकती हैं इसका मतलब यह हुआ कि बाकी समय वे शुद्ध हैं और आहार दे सकती हैं। आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज ने और आचार्यश्री महावीर कीर्ति जी महाराज ने उन्हें और भी अच्छे समाधान दिए थे।

आचार्य शांतिसागर जी की परम्परा में मुनियों की वैय्यावृत्ति-घी आदि से मालिश, पैर धोना आदि आर्यिकाएं नहीं करती हैं किन्तु श्राविकाओं के लिए नवधाभक्ति में पादप्रक्षाल आवश्यक है और पादप्रक्षाल बिना हाथ लगाए संभव ही नहीं है। चरण पर ऊपर से जल डालना अविनय का सूचक है। आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज का कहना था कि चौके में श्राविकाओं को मुनियों के चरण प्रक्षाल हाथ लगाकर करना चाहिए और श्रावक भी आर्यिकाओं के पाद प्रक्षाल करते समय हाथ से चरण स्पर्श करके पाद प्रक्षाल करें, इसमें कोई दोष नहीं है। आचार्यश्री कहते थे कि चौके में अगर श्रावक पूरी नवधाभक्ति न करें, तो उस चौके से निकल जाना चाहिए। जहाँ चौके में पाद प्रक्षाल करके गंधोदक न लें,वहाँ से भी निकल जाना चाहिए। ऐसा वे हम लोगों को आदेश देते थे। तो यह सब व्यवस्थाएँ अलग हैं।

हमारे संघ में नवधाभक्ति के समय मुनियों के चरण स्पर्श की बराबर छूट रही है। चरण स्पर्श करने में मैं भी कोई दोष नहीं मानती हूँ। मैंने स्वयं आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज के, आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज के कभी-कभी विशेष प्रसंगों में चरण स्पर्श किए हैं और उन्होंने मस्तक पर पिच्छी रखकर आशीर्वाद भी दिया है। दीक्षाविधि करते समय आचार्यश्री मस्तक पर हाथ रखकर संस्कार करते हैं, यह दोष नहीं है। ३,४,५ हाथ दूर से दीक्षाविधि संभव नहीं है। स्पर्श करने मात्र से ब्रह्मचर्य में दोष नहीं आता है बल्कि मैंने जहाँ तक समझा है कि अगर कोई स्पर्श न भी करें, लेकिन उसकी दृष्टि ठीक नहीं है कटाक्षपूर्ण दृष्टि है, मान लीजिए कोई साधु किसी महिला के प्रति आसक्त है, कोई ब्रह्मचर्य में स्खलित हो गया है तो उसकी कटाक्षपूर्ण दृष्टि से दूर से भी उसे दोष लग रहा है।

'राजवार्तिक ग्रंथ में भी लिखा है

कोई भी स्त्री, पुरुष आदि मिलकर देववंदना, पूजा आदि करते हैं, भाई-बहन मिलकर पूजा करते हैं, तो वह दोषास्पद नहीं है। ब्रह्मचर्य में दोष तो भावों से ही लगता है। केवल चरणस्पर्श मात्र से ब्रह्मचर्य में दोष नहीं लगता है। इन सभी बातों को विवेकपूर्ण दृष्टि से देखना चाहिए। मैंने देखा है कुछ संघों में जब ब्रह्मचारिणियाँ हाथ में भगवन्तों की, गुरुओं की फोटो ले लेती हैं, तो कुछ लोग कह देते हैं कि जब तुम इनके चरण छूते नहीं तो हाथ में कैसे ले लिया? तब वे कह देतीं कि ये अचेतन हैं, चेतन नहीं।

लेकिन चेतन मुनि के मन में चरण छूते ही विकार आ जाए, इस बात को मैं नहीं स्वीकार करती। कहने को तो एक व्यक्ति ने यहाँ तक कह दिया कि जो महिलाएँ या बालिकाएँ भगवान का अभिषेक करती हैं उन्हें ब्रह्मचर्य में दोष लग जाता है जबकि यह तो बहुत ही मूर्खतापूर्ण कथन है। भगवन्तों की मूर्तियाँ नग्न दिगम्बर, निर्विकार वेष में खड़ी हैं, कोई महिला अभिषेक करते समय विकारी हो जाये, ऐसा तीन काल में संभव नहीं है। यह सब हास्यास्पद पूर्ण कथन है। इन सब बातों को विवेक से ही सोचना चाहिए। महिलाओं के लिए अभिषेक करना, नवधाभक्ति करना, गुरुओं के चरण स्पर्श करना आदि सब शास्त्रों में वर्णित है। रानी चेलना ने भी मुनि के गले से मरा हुआ सर्प निकाला आदि ऐसे अनेक स्पष्ट उदाहरण देखे जाते हैं।

इस प्रकार इन सब बातों को मैंने आगम के परिप्रेक्ष्य में और गुरु परम्परा में जो देखा है और जो सुना है उसी के अनुसार समाधान दिया है। आप सभी विद्वानों को, सभी श्रावक-श्राविकाओं को इन सभी समाधानों को प्राप्त करके अपनी बुद्धि सही, समीचीन रखनी चाहिए और श्रद्धापूर्वक मुनियों की, आर्यिकाओं की नवधाभक्ति आदि करके अपने जीवन को भी सार्थक करना चाहिए, यही मेरा कथन है, यही मेरा आदेश है, उपदेश है और मंगल प्रेरणा है।

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