ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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आर्यिकाओ के मुलगुण

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आर्यिकाओं के मूलगुण

प्रस्तुति- पंकज जैन शाह- पुणे ( महाराष्ट्र )
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प्र. आ. चंदनामती माताजी : आज कल आर्यिकाओं के मूलगुण, उद्दिष्ट दोष, इत्यादी के बारे में बहोत प्रश्न उठ रहे है. कृपया इस बारे में हमें आगम सम्मत समाधान दीजिये

ग.प्र.आ.शि.ज्ञानमती माताजी : ऐसी चर्चाये आज कल ही नहीं किन्तु आ. वीर सागर महाराज के संघ में भी आई थी. आज तुम्हे सिर्फ आगम सम्मत ही नहीं पर गुरु का आदेश भी सुनाती हूँ
सन १९५६ के चातुर्मास के बाद आ. वीरसागर महाराज संघ सहित खजांची की नशिया (जयपुर) में आ गये थे
आचार्यदेव के सानिध्य में नित्य ही एक घण्टा स्वाध्याय चलता था।
उस समय आचार्यदेव स्वयं ही शास्त्र पढ़कर उसका अर्थ करके सुनाते थे। जिसे सुनकर मैं तो अपना बहुत बड़ा अहोभाग्य समझ रही थी।
अन्य समय में आचार्यश्री के मुखारविंद से अनुपम सूक्तिरत्नों के कणों का लाभ मिलता रहता था।
मैं कभी-कभी आचार्यदेव के चरण सानिध्य में बैठकर अनेक शंकाओं के समाधान प्राप्त कर लिया करती थी। वे समाधान आज हमारे मोक्ष पथ में दीप स्तम्भ बने हुए हैं।

एक बार एक आर्यिका सिद्धमती जी ने कहा-‘‘हम आर्यिकाओं के २६ ही मूलगुण हैं। चॅूंकि हमारे पास वस्त्र हैं और हम लोग बैठकर आहार लेती हैं।’’

तब मेरे मन में आशंका होने से मैंने आचार्यदेव के समक्ष समाधान चाहा। मैंने जाकर प्रश्न किया-‘‘गुरुदेव! हमारे कितने मूलगुण हैं?’’
आचार्यश्री ने कहा-‘‘तुम्हारे २८ मूलगुण हैं।
देखो! दीक्षा के समय मुनिदीक्षा के ही सारे संस्कार हम आर्यिकाओं के मस्तक पर करते हैं, उन्हें २८ मूलगुणो को देते हैं।
जो उनके पास साड़ी हैं वह उनका मूलगुण ही है क्योंकि वे वस्त्र छोड़ नहीं सकती हैं। हाँ, यदि वे दो साड़ी के बजाए तीन साड़ी रख लें तो उनका मूलगुण अवश्य ही भंग हो जायेगा तथा
बैठकर करपात्र में आहार करना भी उनका मूलगुण ही है, चूँकि वैसी ही आगम में उनके लिए आज्ञा है।
इसलिए तुम्हारे २८ मूलगुण ही हैं।
दूसरी बात यह है कि प्रायश्चित्त ग्रन्थ में आर्यिकाओं के लिए मुनियों के बराबर प्रायश्चित्त देने का विधान है, जबकि क्षुल्लकों को उससे आधा प्रायश्चित्त देने की आज्ञा है।
तीसरी बात शास्त्रो में आर्यिकाओं को मुनियों के सदृश ही पूजा के लिए योग्य अर्थात् पूज्य माना है।’’

यह समाधान प्राप्त कर मुझे बहुत ही प्रसन्नता हुई।
एक समय उद्दिष्ट दोष को लेकर मैंने आचार्यदेव से जिज्ञासा व्यक्त की। तब उन्होंने कहा-
‘‘यदि साधु आहार के लिए कृत, कारित या अनुमोदना करता है तो वह दोष का भागी है अन्यथा नहीं।
श्रावक यद्यपि उनको निमित्त करके आज शुद्ध आहार तैयार करता है फिर भी साधु को दोष नहीं है।
देखो! क्या चतुर्थ काल में सारे श्रावक गरम जल पीते थे?
क्या रोगी साधु के लिए औषधि और पथ्यरूप आहार तैयार नहीं करते थे?
तथा पंचम काल के अन्त तक जब निर्दोष मुनि-आर्यिका रहेंगे तब आज ही उनकी चर्या निर्दोष नहीं बन सके यह केसे मान लिया जाये?
इसलिए अपने को आचार्य शांतिसागर जी को सच्चे महासाधु मानना ही चाहिए।
उनकी चर्या को निर्दोष मानकर उसी के अनुसार प्रवृत्ति करनी चाहिए। स्वयं शंका नहीं करनी चाहिए और दूसरों को भी समाधान करने के लिए आगम प्रमाण दिखा देना चाहिए।’’

एक बार रात्रि में मुझे दीर्घ शंका का प्रसंग आया। तब मैंने प्रातःकाल आचार्यश्री से प्रायश्चित्त माँगा और भविष्य के लिए मार्गदर्शन चाहा, तब आचार्यदेव ने कहा-
‘‘रात्रि में दीर्घशंका की बाधा होने पर पास में रहने वाली श्राविका या ब्रह्मचारिणी को साथ में लेकर उजाले में जाना चाहिए।
यदि कदाचित् कोई न हो और पास में लालटेन जलती हुई हो तो हाथ से उठाकर रास्ते में साथ ले जाना चाहिए, जिससे अंधेरे मे गिरने पड़ने का भय न रहे इसमें कोई दोष नहीं है।

कफ या दाँतों से खून बार-बार आने पर पास में लकड़ी आदि के छोटे पात्र में (ग्लास में) राख डालकर रख लेना चाहिए।’’

इत्यादि अनेक समयोचित समस्याओं का समाधान मैंने गुरु से प्राप्त किया था और आज उसी के अनुरूप अपनी चर्या में मैं सतत सावधान रहने का प्रयास करती रहती हूँ।