ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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सोलहकारण व्रत की जाप्य - "ऊँ ह्रीं अर्हं संवेग भावनायै नमः"

आर्यिकारत्न श्री अभयमती माताजी की आरती

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आर्यिकारत्न श्री अभयमती माताजी की आरती

लेखिका - ब्र कु॰ : इन्दु जैन (संघस्थ)
अभयमती माताजी की हम करें आरती आज.

रत्नमयी दीपक ले आए शरणा तेरी आज ।।
हो माता हम सब उतारें तेरी आरती - 2 ।। टेक. ।।

पितु श्री छोटेलाल मोहिनी माँ से जन्म लिया है.
ज्ञानमती माता सम भगिनी. का वात्सल्य मिला है ।
माता.................।।1।।
गणिनीप्रमुख ज्ञानमती माताजी के पाकर दर्शन
मिली प्रेरणा त्याग मार्ग की ओर बढ़ाया जीवन ।
माता.................।।2।।
उत्रिस सौ चौंसठ में माताजी से पाकर दीक्षा.
बनी ' क्षुल्लिका अभयमती. देती जन-जन को शिक्षा ।
माता.................।।3।।
उविस सौ उन्हत्तर में श्री महावीर जी तीरथ.
धर्मसिंधु से बनीं आर्यिका. फैलाई जिन कीरत ।
माता.................।।4।।
कुछ दिन गुरा संग रहीं. पुन: चल दी बुन्देलखण्ड की
सार्थक कर निज नाम. दिखाया नई दिशा फिर सबको ।
माता......................।।5।।
ग्रंथ रचयित्री. चारित्र में दृढ. हे चारित्र श्रमणि माँ.
मुक्ति सुपथ की आश लेकर, 'इन्दु' नमे तुम चरणा । ।
माता.................।।6।।