ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.png
Whatsappicon.png
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें |


पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर, रविवार से ११ दिसंबर २०१६, रविवार तक प्रातः ६ बजे से ७ बजे तक सीधा प्रसारण होगा | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

आर्यिका दीक्षा के चातुर्मास

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


विषय सूची

[सम्पादन]
प्रथम चातुर्मास (सन् १९५६, जयपुर खानिया-राजस्थान)

Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Flowers 76.jpg
Flowers 76.jpg

आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज अत्यन्त मृदुभाषी थे। जब भी आर्यिका ज्ञानमती जी आचार्यश्री के पास जातीं, तो आचार्यश्री माताजी के ज्ञान के क्षयोपशम एवं पठन-पाठन की शैली से बहुत ही प्रसन्नचित्त होते थे।

यहाँ पर पूज्य आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी ने अपनी शिष्या क्षुल्लिका जिनमती जी को सागार धर्मामृत, गोम्मट्टसार, परीक्षामुख और न्यायदीपिका का अध्ययन करा दिया।

चातुर्मास के बाद-आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज के संघ का विहार जयपुर में ही प्रमुख मंदिर एवं कॉलोनियों में चलता रहा। जयपुरवासियों ने आचार्यश्री को जयपुर से आगे प्रस्थान ही नहीं करने दिया। समाज की असीम भक्ति देखकर अगला चातुर्मास पुन: खानिया ही करने का आचार्यश्री ने निर्णय करके घोषणा कर दी। फिर तो जयपुर समाज के हर्ष का ठिकाना ही न रहा।


[सम्पादन]
दूसरा चातुर्मास (सन् १९५७, जयपुर खानिया-राजस्थान)

खानिया में इस वर्ष आचार्य श्री वीरसागर महाराज संघ सहित एवं आचार्यश्री महावीरकीर्ति जी महाराज संघ सहित ऐसे २ संघों का एक साथ चातुर्मास होने से बहुत ही आनन्द की वर्षा हुई।

चातुर्मास के मध्य ही आश्विन वदी अमावस्या को आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज की समाधि हो गई और समाधि के अनन्तर मुनि श्री शिवसागर महाराज को इस महान संघ के नेतृत्व को संभालने के लिए आचार्यपट्ट प्रदान किया गया।

चातुर्मास के अनन्तर आचार्यश्री शिवसागर जी महाराज के संघ का विहार गिरनार जी की यात्रा के लिए हो जाता है।

खानिया चातुर्मास के बाद गिरनार यात्रा-आचार्यश्री शिवसागर महाराज के संघ की गिरनार यात्रा कराने के लिए परम गुरुभक्त संघपति सेठ हीरालालजी पाटनी-निवाई (राज.) वालों ने कदम उठाया। मार्ग में ब्यावर, अजमेर, आबू, सिरोही, सोनगढ़ आदि अनेक स्थानों से विहार करता हुआ संघ गिरनार जी पहुँच जाता है और कुछ दिन गिरनार जी की तीर्थ वंदना में रहकर पश्चात् तारंगा, पालीताना आदि तीर्थों की वंदना करता हुआ संघ का पदार्पण वापस ब्यावर होता है तथा अगला चातुर्मास भी ब्यावर ही करने का निर्णय हो जाता है। गिरनार यात्रा के मध्य मार्ग के विहार में ही देवागमस्तोत्र, समाधिशतक, आत्मानुशासन आदि का अध्ययन पूज्य माताजी ने क्षुल्लिका जिनमती जी को कराया और स्वयं तथा जिनमती जी ने इन सभी ग्रंथों के श्लोकों को कण्ठस्थ कर लिया।


[सम्पादन]
तीसरा चातुर्मास (सन् १९५८, ब्यावर-राजस्थान)

ब्यावर का चातुर्मास भी अपना कुछ महत्व रखता है क्योंकि जिन ग्रंथों का अध्ययन पूज्य माताजी ने किसी गुरुमुख से नहींr किया, उनका अध्यापन स्वयं ही क्षुल्लिका जिनमती जी एवं कई आर्यिकाओं को तथा ब्र. राजमल जी को कराया। ग्रंथों में प्रमुख हैं-राजवात्र्तिक अध्याय २ से १० तक एवं गोम्मटसार कर्मकांड आदि। वास्तव में अध्यापन से स्वयं में अध्ययन हो जाता है। इस चातुर्मास के मध्य पं. पन्नालाल जी सोनी एवं पं. श्री खूबचंद जी आदि विद्वानों को पूज्य माताजी से तत्त्वचर्चा आदि का अवसर प्राप्त हुआ। यह चातुर्मास सेठ चम्पालाल जी की नसिया ब्यावर में हुआ था। ब्यावर चातुर्मास के बाद-ब्यावर में चातुर्मास पूर्ण करके संघ का विहार जयपुर के लिए होता है और आचार्यश्री के सानिध्य में ही जयपुर में श्री दीवान जी की नसिया के मानस्तंभ की प्रतिष्ठा विविध कार्यक्रमों के साथ सम्पन्न होती है। पश्चात् संघ आसपास नगरों में विहार करता हुआ अजमेर समाज के विशेष आग्रह को न टाल सका और अगला चातुर्मास अजमेर (राज.) करने का निर्णय हुआ।


[सम्पादन]
चौथा चातुर्मास (सन् १९५९, अजमेर-राजस्थान)

पूज्य माताजी को अध्ययन-अध्यापन एवं शिष्यानुग्रह में रुचि थी, सो वह कार्य यहाँ भी चालू रहा और पंचाध्यायी का स्वाध्याय चला। सबको माताजी ने पात्रकेसरी स्तोत्र का अध्ययन कराया। ब्र. विद्यावती बाई को सर्वार्थसिद्धि का अध्ययन कराया। अजमेर में अंगूरीबाई (वर्तमान आर्यिका आदिमती) को अध्ययन कराना प्रारंभ किया और बाद में ज्ञान एवं त्याग की वृद्धि की भावना से अपने साथ में ही रख लिया।

इस चातुर्मास में एक दुर्भाग्य की बात यह रही कि पूज्य माताजी को शारीरिक कष्ट ‘संग्रहणी’ का प्रकोप प्रारंभ हो गया, जो आज तक विद्यमान है। परन्तु धन्य हैं ऐसी माता, जिन्होंने भेद-विज्ञान के बल से आत्मज्ञान को प्राप्त कर शारीरिक वेदना को कुछ नहीं गिना। इसीलिए पठन-पाठन में निरत रहकर अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग प्राप्त किया।


[सम्पादन]
पाँचवॉँ चातुर्मास (सन् १९६०, सुजानगढ़-राजस्थान)

आचार्यश्री शिवसागर जी महाराज के विशाल संघ का चातुर्मास पूर्ण होकर संघ सहित अजमेर से विहार होता है और अनेक नगरों में विहार करते हुए संघ का मंगल आगमन सुजानगढ़ होकर यहीं चातुर्मास होता है। यहाँ पर क्षुल्लिका जिनमती जी को जैनेन्द्र प्रक्रिया व्याकरण और मूलाचार आदि ग्रंथों का अध्ययन कराया। सुजानगढ़ चातुर्मास के बाद-सुजानगढ़ से संघ लाडनू (राज.) पहुँचा। वहाँ पर श्री चंद्रसागर स्मारक की विशाल पंचकल्याणक प्रतिष्ठा हुई और आचार्यश्री के सानिध्य में ही मानस्तंभ निर्माण के लिए शिलान्यास कार्यक्रम भी सम्पन्न हुआ। पश्चात् संघ का विहार सीकर होता है और बाद में संघ सानिध्य में ही फतेपुर शेखावाटी में वेदी प्रतिष्ठा सम्पन्न होती है। वहाँ से पुन: संघ सीकर आता है और समाज के विशेष आग्रह पर विशाल संघ का अगला चातुर्मास कराने का सौभाग्य सीकर नगरवासियों को ही प्राप्त हो जाता है।


[सम्पादन]
छठा चातुर्मास (सन् १९६१, सीकर-राजस्थान)

जिस नगर में इतने विशाल संघ का चातुर्मास हो जाये, वास्तव में वहाँ की धरती धन्य हो जाती है, वहाँ का हर नागरिक कुछ न कुछ रूप में र्धािमक-आत्मिक क्रियाओं से आबद्ध हो ही जाता है। फिर जहाँ पर श्रद्धा, ज्ञान और त्याग इन तीनों की त्रिवेणी बह रही हो, वहाँ का क्या कहना! सीकर में विशाल ‘दीक्षा समारोह’ का आयोजन हो गया। ब्र. राजमल जी की मुनि दीक्षा हुई, उनका नाम अजितसागर रखा गया और क्षुल्लिका जिनमती जी की आर्यिका दीक्षा हुई तथा ब्र. अंगूरीबाई की आर्यिका दीक्षा तथा ब्र. रतनीबाई की क्षुल्लिका दीक्षा पूज्य माताजी की प्रेरणा से सम्पन्न हुई और क्रमश: नामकरण आर्यिका आदिमती जी एवं क्षुल्लिका श्रेयांसमती जी इस प्रकार किया गया। सीकर नगर में ही पूज्य श्री ज्ञानमती माताजी ने अपनी प्रमुख शिष्या आर्यिका जिनमती जी को प्रमेयकमल मार्तण्ड, लब्धिसार आदि ग्रंथों का अध्ययन कराया। आज प्रमेयकमलमार्तण्ड का अनुवाद होकर प्रकाशित हो चुका है।

सीकर चातुर्मास के बाद-जिस प्रकार से किसी को अनुपम निधि (कोई रत्नों का खजाना) प्राप्त हो जाये, तो वह उसे छोड़ना नहीं चाहता है और बार-बार उसे संभालकर रखता है, उसी प्रकार लाडनू नगर निवासियों का संघ सानिध्य से अभी मन संतुष्ट नहींr हुआ था। परिणामस्वरूप सीकर जाकर पुन: संघ को लाडनू लाते हैं और आचार्यश्री के सानिध्य में पुन: मानस्तंभ का विशाल पंचकल्याणक महोत्सव करके भी संतुष्टि प्राप्त नहीं करते हैं, अगला चातुर्मास करने की भी स्वीकृति प्राप्त कर लेते हैं-


[सम्पादन]
सातवाँ चातुर्मास (सन् १९६२, लाडनू-राजस्थान)

इस चातुर्मास के मध्य पूज्य ज्ञानमती माताजी ने जिनमती जी को शब्दार्णव चन्द्रिका, गद्य चिंतामणि, धर्म शर्माभ्युदय आदि ग्रंथों का अध्ययन कराया। यहींr पर टिकैतनगर से आपकी अनुजा कुमारी मनोवती माँ के साथ यात्रार्थ आर्इं थीं। उन्हें आचार्य शिवसागर जी महाराज से १ वर्ष का ब्रह्मचर्य व्रत दिलाकर अध्ययन कराने के निमित्त से कुछ दिन के लिए साथ में रख लिया। पश्चात् कुछ वर्षों बाद तो वह आर्यिका अभयमती बन गर्इं।

लाडनू चातुर्मास के बाद-लाडनू चातुर्मास के बाद पूज्य माताजी की प्रबल भावना सम्मेदशिखर तीर्थराज की यात्रा की होती है। आचार्यश्री शिवसागर जी से आप आज्ञा मांगती हैं, लेकिन आचार्यश्री शिवसागर महाराज एक ज्ञानपुंज को संघ से जाने नहीं देना चाहते, इस कारण आज्ञा देने में विचार करते हैं। फिर भी आपके ऊपर आचार्यश्री का विशेष अनुग्रह होने के कारण आज्ञा प्राप्त हो जाती है और आप अपनी शिष्याएं

(१) जिनमती जी

(२) आदिमती जी

(३) पद्मावती जी

(४) श्रेयांसमती जी को साथ लेकर यात्रार्थ प्रस्थान कर देती हैं।

संघ संचालन का भार ब्र. सुगनचंद जी एवं ब्र. मनोवती जी द्वारा सहर्ष स्वीकार करने के पश्चात् अनंतानंत मोक्षगामियों की पवित्र भूमि के लिए संघ जयपुर-आगरा-मथुरा-फिरोजाबाद-मैनपुरी-कानपुर-लखनऊ-टिकैतनगर-अयोध्या-वाराणसी-पावापुरी-राजगृही-कुण्डलपुर-गुणावां-नवादा-चम्पापुर आदि तीर्थों की वंदना करता हुआ सम्मेदशिखर पहुँच जाता है। सम्मेदशिखर में इस आर्यिका संघ का अवस्थान १ माह तक रहा। कुछ दिन संघ ईसरी भी रहता है। कलकत्ता समाज का विशेष आग्रह होने पर अत्यन्त अल्प समय-मात्र १० दिन में ईसरी से कलकत्ता पहुँचकर पूज्य माताजी का अगला मंगल चातुर्मास कलकत्ता में होता है।


[सम्पादन]
आठवाँ चातुर्मास (सन् १९६३, कलकत्ता-प. बंगाल)

कलकत्ता नगरी को कई वर्षों से किसी भी साधु के चातुर्मास कराने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ था। पूज्य माताजी जैसे विशिष्ट ज्ञानी साधु को पाकर कलकत्ता के श्रावकगण खुशी में नाच रहे थे और दिन-रात पूज्य संघ से लाभान्वित होने की चेष्टा करते रहते थे। यहाँ पर पूज्य माताजी के प्रतिदिन प्रवचन हुए। ब्र. प्यारेलाल भगत जी की पूज्य माताजी के प्रति अगाढ़ श्रद्धा एवं भक्ति रही। प्रवचनों में पूज्य माताजी ने हर जिज्ञासु की शंकाओं का समाधान करने का समय दिया और शास्त्राधार से हर प्रश्न का समाधान करके आर्षपरम्परा को दृढ़ किया। यहाँ पर आचार्यकल्प श्री श्रुतसागर जी की सुपुत्री कु. सुशीला ने पूज्य माताजी के ज्ञान से प्रभावित होकर माताजी से ही ५ वर्ष के लिए ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण कर लिया और भाइयों के अत्यन्त मना करने पर पर भी संघ में रहने का दृढ़ निश्चय कर लिया। पूज्य माताजी ने कलकत्ता चातुर्मास में शिष्याओं को पंचसंग्रह, न्यायकुमुदचन्द्र आदि ग्रंथों का अध्ययन कराया। कलकत्ता चातुर्मास के बाद-कलकत्ता से विहार करके संघ का सम्मेदशिखर पुन: आगमन होता है। नंदीश्वर पंचकल्याणक के समय संघ सम्मेदशिखर ही रहा। पश्चात् विहार करते हुए पुरलिया, चाईबासा, कटक आदि होते हुए खण्डगिरि- उदयगिरि की यात्रा करके विशाखापट्टनम् आदि होते हुए संघ का अगला चातुर्मास आंध्रप्रदेश की राजधानी हैदराबाद में होता है।


[सम्पादन]
नवमाँ चातुर्मास (सन् १९६४, हैदराबाद-आंध्रप्रदेश)

हैदराबाद में पूज्य माताजी का स्वास्थ्य बहुत ही प्रतिकूल रहा। फिर भी प्रवचन एवं धर्मप्रभावना, पूजन-विधान आदि समय-समय पर होते रहे। चातुर्मास के मध्य पूजन-विधान ५०-६० की संख्या में हुए।

विशेष-हैदराबाद मुसलमानी रियासत होने के कारण यहाँ पर जैन मंदिर पर शिखर बनाने पर प्रतिबंध था, लेकिन अब धर्मनिरपेक्ष जनतंत्र शासन होने के कारण ऐसा प्रतिबंध तो होना नहीं चाहिए अत: १ दिन पूज्य माताजी ने अपने प्रवचन में श्री मंदिर जी के ऊपर शिखर बनाने के महत्व पर प्रकाश डालते हुए शिखर बनवाने की प्रेरणा की। तत्काल ही श्री जयचंद जी लुहाड़े ने केशरबाग के मंदिर में शिखर के निर्माण का निर्णय लिया और अतिशीघ्र शिखर का निर्माण भी कराकर उसमें भगवान शांतिनाथ स्वामी की प्रतिमा विराजमान कराके उसकी वेदी प्रतिष्ठा भी धूमधाम से सम्पन्न करा दी।

हैदराबाद से ब्र. सुरेश कुमार जी की दीक्षा के भाव देखकर पूज्य माताजी ने उन्हें आचार्यश्री शिवसागर महाराज के संघ में भेजकर क्षुल्लक दीक्षा दिला दी, जिनका नाम संभवसागर रखा। कालान्तर में यह मुनि बने और अब उनकी समाधि भी हो चुकी है। आचार्यश्री की आज्ञा मंगाकर माताजी ने ब्र.मनोवती को स्वयं ही हैदराबाद में क्षुल्लिका दीक्षा प्रदान की। अब यहाँ से संघ में ५±१·६ साध्वी हो गयीं।

हैदराबाद चातुर्मास के बाद-यहाँ से पूज्य आर्यिका संघ का विहार अनंतपुरी होते हुए मैसूर की ओर होता है और अगला चातुर्मास भगवान बाहुबली के पावन चरणों में श्रवणबेलगोला होने का निर्णय हो जाता है।


[सम्पादन]
दसवाँ चातुर्मास (सन् १९६५, श्रवणबेलगोला-कर्नाटक)

यहाँ पर पूज्य माताजी ने कन्नड़ भाषा का १५ दिवस में अभ्यास करके अपनी शिष्याओं को भी कन्नड़ लेखन-वाचन में कुशल बना दिया। चातुर्मास के मध्य १५ दिन मौन साधना से पहाड़ पर ही भगवान बाहुबली स्वामी के चरण सानिध्य में रहकर पूज्य माताजी ने ध्यानाभ्यास किया। यहीं पर ध्यान में मध्यलोक के तेरहद्वीपों के ४५८ अकृत्रिम चैत्यालयों का दृश्य झलकने के बाद उसकी रचना मस्तिष्क में आई, जो कि अब हस्तिनापुर में साकार हुई है। श्रवणबेलगोला में ही भगवान बाहुबली की अत्यन्त मधुर काव्य में संस्कृत स्तोत्र की रचना की और हिन्दी पद्य में भगवान बाहुबली चरित्र का निर्माण किया और भी कई गुरु स्तुतियाँ संस्कृत व कन्नड़ भाषा में निर्मित कीं। यहाँ से कु. शीला ने (वर्तमान आर्यिका शिवमती जी) भी साथ में रहकर पूज्य माताजी से ज्ञानाभ्यास प्रारंभ किया।

श्रवणबेलगोला का रम्य स्थान, भगवान बाहुबली की विशाल प्रतिमा एवं अन्य प्रभावशील जिनचैत्य के आकर्षण से पूज्य माताजी संघ सहित यहाँ पर १ वर्ष तक रहीं और ग्रंथ, स्तुति रचना तथा ध्यान आदि का विशेष क्षयोपशम भी भगवान बाहुबली के चरण-प्रसाद से प्राप्त किया। श्रवणबेलगोला चातुर्मास के बाद-यहाँ से विहार करके पूज्य माताजी ने मूडबिद्री, हुबली, बीजापुर, सहस्रफणा पारसनाथ आदि की यात्राएं कीं और अगला चातुर्मास सोलापुर करने का निर्णय कर दिया।


[सम्पादन]
ग्यारहवाँ चातुर्मास (सन् १९६६, सोलापुर-महाराष्ट्र)

सोलापुर श्राविका संस्थान की संस्थापिका पद्मश्री ब्र. सुमतिबाई जी शाह, सुश्री बाल ब्र. विद्युल्लता जी शाह एवं पं. वर्धमान पाश्र्वनाथ शास्त्री आदि विद्वान व श्रीमानों के विशेष आग्रह पर पूज्य माताजी ने सोलापुर के श्राविकाश्रम में चातुर्मास की स्वीकृति प्रदान की तथा सोलापुर शहर में आचार्यश्री विमलसागर जी महाराज के संघ का चातुर्मास होने से बहुत ही प्रभावना हुई। सोलापुर चातुर्मास में प्रतिदिन पूज्य माताजी के विभिन्न विषयों पर प्रवचन होते रहे। १ दिन प्रवचन में पूज्य माताजी अकृत्रिम चैत्यालयों का विस्तृत वर्णन कर रही थीं। प्रवचन के मध्य ही ब्र. सुमतिबाई जी इतनी आनन्द विभोर हो गर्इं कि सभा के मध्य ही बोलीं कि जिस प्रकार आज हमारे देश में नंदीश्वर द्वीप की रचनाएं, समवसरण की रचनाएं आदि बनी हुई हैं, उसी प्रकार यह मध्यलोक की रचना भी निर्मित होवे, तो कितना अच्छा लगेगा! बाद में सुमतिबाई जी की बहुत प्रेरणा रही कि यह रचना सोलापुर आश्रम में ही बना दी जाये, लेकिन पूज्य माताजी का वहाँ से शीघ्र विहार का निर्णय श्रवण कर उन्हें बहुत ही खेद रहा। वही रचना आज हस्तिनापुर में साकार हो चुकी है। सोलापुर में द्रव्यसंग्रह-सामायिक विधि आदि विषयों पर एक शिक्षण शिविर का पूज्य माताजी ने आयोजन किया। यहाँ पर कई पुस्तकों का प्रकाशन भी पण्डित वर्धमान पाश्र्वनाथ शास्त्री के सम्पादकत्व में हुआ।

[सम्पादन]
सोलापुर चातुर्मास के बाद-

चातुर्मास समाप्त करके पूज्य माताजी ने संघ सहित विहार करके कुंथलगिरि, तेर, पैठण आदि की यात्राएं करते हुए औरंगाबाद, एलोरा की यात्राएं की और नांदगांव, मांगीतुंगी, गजपंथा आदि की यात्रा करते हुए बड़वानी-ऊन होकर मध्यप्रदेश के सनावद नगर में पदार्पण किया। सनावद से पूज्य माताजी का विहार सिद्धवरकूट से होते हुए इंदौर हुआ। इंदौर में एक शिक्षण-शिविर का आयोजन किया गया, जिसमें अनेक प्रौढ़ पुरुष- महिलाओं ने भाग लिया। आलाप पद्धति का संक्षिप्त अनुवाद सहित प्रकाशन हुआ और पात्रकेशरी स्तोत्र का पद्यानुवाद भी प्रकाशित हुआ। यहाँ पर इंदौर निवासी पूज्य माताजी के चातुर्मास हेतु बहुत ही दृढ़ता से लगे हुए थे, उधर सनावदवासियों के प्रयास से आचार्य श्री शिवसागर जी ने सनावद के लिए आज्ञा प्रदान कर दी अत: अगले चातुर्मास का सौभाग्य सनावद नगरवासियों को प्राप्त हुआ।

[सम्पादन]
बारहवाँ चातुर्मास (सन् १९६७, सनावद-मध्यप्रदेश)

‘सिद्धवरकूट’ जैसे रम्यतीर्थ की वंदना करने वालों को सनावद नगर का ज्ञान अनायास ही हो जाता है। मैं (मोतीसागर) स्वयं उस चातुर्मास की देन हूँ कि पूज्य माताजी ने मुझे घर से निकालकर अपना शिष्य बनाया। उनके आदेशानुसार जम्बूद्वीप रचना आदि के निर्माण में मैंने पूरा मनोयोग लगाया और क्षुल्लक दीक्षा धारण कर वर्तमान में आपकी छत्रछाया में रत्नत्रय साधना चल रही है। चातुर्मास के मध्य यहाँ एक शिक्षण शिविर का आयोजन हुआ, जिसमें प्रौढ़ वर्गों ने बड़ी श्रद्धाभक्ति से भाग लिया। उसी शिविर के एक विद्यार्थी यशवंत कुमार थे, जो कि पुरुषार्थ सिद्धिउपाय पढ़ रहे थे। पूज्य माताजी के साथ आकर ब्रह्मचारी बन गये और बाद में मुनि वर्धमानसागर बनकर वर्तमान में आचार्य बनकर चतुर्विध संघ का संचालन कर रहे हैं।

[सम्पादन]
सनावद चातुर्मास के बाद-

ब्र. मोतीचंद (मैं), यशवंत कुमार आदि अनेक श्रावकों के साथ पूज्य माताजी ने सनावद से विहार करके मुक्तागिरि की यात्रा की। पश्चात् सलुम्बर के पास आचार्यश्री शिवसागर जी के संघ में शीघ्र पदार्पण की भावना से उधर की तरफ विहार किया। मार्ग में बांसवाड़ा में पूज्य माताजी का मंगल आगमन होता है। वहाँ पर सेठ पन्नालाल ने अपनी सुपुत्री कु. कला व कु. कनक को पूज्य माताजी को अध्ययन हेतु प्रदान किया। पूज्य माताजी ने दोनों कुमारिकाओं को ५-५ वर्ष का ब्रह्मचर्य व्रत देकर साथ में रखकर अध्ययन कराया। उसमें से कु. कला ने पूज्य माताजी से शास्त्री कोर्स तक अध्ययन करके शास्त्री की परीक्षा पास कर ली और आजीवन ब्रह्मचर्यव्रत ग्रहण कर लिया। वर्तमान में वह आर्यिका कैलाशमती माताजी के रूप में धर्मप्रभावना कर रही हैं। पश्चात् शीघ्र ही पूज्य माताजी ने अपने शिष्य-शिष्याओं के साथ आचार्यश्री शिवसागर महाराज के संघ में पुन: पदार्पण किया। उस समय आचार्यश्री शिवसागर जी एवं समस्त संघ को बहुत ही प्रसन्नता हुई तथा अगला चातुर्मास आचार्यश्री के साथ ही प्रतापगढ़ करने का निश्चय हुआ।

[सम्पादन]
तेरहवाँ चातुर्मास (सन् १९६८, प्रतापगढ़-राजस्थान)

प्रतापगढ़ राजस्थान का अच्छा नगर है। यहाँ चातुर्मास में प्रवचनादि से खूब धर्मप्रभावना हुई। पूज्य माताजी ने संघस्थ शिष्य मोतीचंद जैन (मुझे), यशवंत कुमार जैन एवं अपनी शिष्याओं को शास्त्री कोर्स का अध्ययन प्रारंभ कराया और सोलापुर बोर्ड से परीक्षाएं भी दिलवायीं।

प्रतापगढ़ चातुर्मास के बाद-इसी वर्ष फाल्गुन माह में श्री महावीर जी क्षेत्र पर पंचकल्याणक प्रतिष्ठा के विशेष आमंत्रण को न टालकर आचार्यश्री शिवसागर महाराज ने संघ सहित महावीर जी क्षेत्र की ओर विहार कर दिया और कोटा, सवाई माधोपुर, इन्दरगढ़ आदि होते हुए संघ का आगमन श्री महावीर जी क्षेत्र पर हो जाता है।

श्री महावीर जी में आचार्यश्री शिवसागर जी की आकस्मिक समाधि हो जाने से संघनेतृत्व का एक भीषण संकट उत्पन्न हुआ। पश्चात् मुनि श्री धर्मसागर जी महाराज को समस्त संघ एवं श्रावकों के मध्य आचार्यपट्ट प्रदान करके संघ के नेतृत्व की बागडोर प्रदान की गई, जो अपने निर्मल चारित्र के द्वारा मुनि परम्परा को अक्षुण्ण रखते हुए सारे देश की आँख के सितारे बने और समस्त जैन समाज आपके त्याग और निस्पृह जीवन से प्रभावित हुआ।

महावीर जी से आचार्यसंघ का विहार अजमेर निवासियों के चातुर्मास की प्रार्थना पर अजमेर के लिए हुआ परन्तु मार्ग में ही जयपुर निवासियों ने किसी तरह संघ को आगे बढ़ने ही न दिया और अंत में निराश होकर अजमेरवासियों को वापस जाना पड़ा। इस प्रकार अगला चातुर्मास जयपुर ही होने का निर्णय हो जाता है।


[सम्पादन]
चौदहवाँ चातुर्मास (सन् १९६९, जयपुर-राजस्थान)

जयपुर चातुर्मास के मध्य सभी शिष्य-शिष्याओं को पूज्य माताजी अष्टसहस्री, राजवात्र्तिक, जैनेन्द्र प्रक्रिया, शब्दार्णव चंद्रिका, गद्यचिंतामणि आदि शास्त्री, न्यायतीर्थ कोर्स के विषयों का दिन में ६ घण्टे अध्ययन कराती थीं। इसके अलावा सामूहिक रूप से अनेक आर्यिकाएं और मुनिगण पूज्य माताजी से अध्ययन का लाभ प्राप्त कर रहे थे। यहीं पर पूज्य माताजी ने अष्टसहस्री ग्रंथ की हिन्दी टीका करना प्रारंभ किया और टीका द्रुतगति से चलती रही। पं. सत्यंधर कुमार जी सेठी उज्जैन वाले भी माताजी से बहुत प्रभावित रहे। जयपुर चातुर्मास के मध्य ‘‘जैन ज्योतिर्लोक’’ नामक विषय पर एक शिक्षण-शिविर का आयोजन हुआ। आयोजन काफी सफल रहा। जैन ज्योतिर्लोक, उषा वंदना, शांति भक्ति का प्रत्यक्ष फल, जिन स्तवन माला आदि पुस्तकों का प्रकाशन भी जयपुर में किया गया। जयपुर चातुर्मास के बाद-जयपुर से संघ का विहार होकर निवाई आदि होते हुए अगला चातुर्मास टोंक (राज.) में होने का निर्णय हुआ।


[सम्पादन]
पन्द्रहवाँ चातुर्मास (सन् १९७०, टोंक-राजस्थान)

टोंक चातुर्मास के मध्य भी अध्यापन कार्य एवं हिन्दी टीका का कार्य निरन्तर चलता रहा। टोंक में पूज्य माताजी को पुन: दूसरा शारीरिक कष्ट ‘नजला’ प्रारंभ हो गया, जिसने कार्य में बड़ा व्यवधान उपस्थित किया और कई माह तक इस रोग से माताजी को बहुत परेशानी रही, फिर भी ज्ञानोपयोग में ढिलाई नहीं आने दी और शीघ्र ही अष्टसहस्री जैसे दुरूह ग्रंथ की हिन्दी टीका पूर्ण कर दी।

टोंक चातुर्मास के बाद-संघ अनेक नगरों में विहार करते हुए टोडारायसिंह में मंगल पदार्पण करता है। यहाँ पर पूज्य माताजी द्वारा अष्टसहस्री ग्रंथ की हिन्दी टीका पूर्ण हो जाती है। आचार्यश्री के चरण सानिध्य में हिन्दी टीका की विधिवत् पूजन की गई। पश्चात् आचार्यश्री धर्मसागर जी महाराज के जन्मदिवस पर रथयात्रा के जुलूस के साथ अष्टसहस्री टीका को पालकी में विराजमान कर उसका भी जुलूस निकालकर प्रभावना की गई।

टोडारायसिंह से संघ का आगमन पुन: टोंक में होता है। यहाँ पर विशाल पंचकल्याणक का आयोजन आचार्यश्री के सानिध्य में हुआ। यहाँ टोंक में प्रतिष्ठा को देखने हेतु पूज्य माताजी के ज्येष्ठ भ्राता श्री कैलाशचंद जी के साथ रवीन्द्र कुमार आये थे। यहीं से उन्हें पूज्य माताजी से ज्ञानार्जन का सानिध्य प्राप्त हुआ। कई वर्षों से अजमेर निवासी आचार्यश्री के संघ का चातुर्मास कराने के लिए बहुत ही लालायित थे अत: टोंक पंचकल्याणक के बाद संघ पीपलू, मालपुरा, लावा, पचेवर, सोडा, दूदू आदि होता हुआ किशनगढ़ पहुँचता है। किशनगढ़ में कई वर्षों के बाद आचार्यश्री धर्मसागर जी संघ एवं आचार्यश्री ज्ञानसागर जी के संघ का मंगल मिलन होता है। पश्चात् संंघ चातुर्मास से पूर्व ही अजमेर पहुँचकर अजमेर में चातुर्मास की घोषणा हो जाती है।


[सम्पादन]
सोलहवाँ चातुर्मास (सन् १९७१, अजमेर-राजस्थान)

अजमेर चातुर्मास में पूज्य माताजी का समयसार, अष्टसहस्री आदि का स्वाध्याय एवं प्रवचन चला। यहाँ जैन ज्योतिर्लोक विषय पर मोइनिया इस्लामिया हाई स्कूल के हॉल में एक प्रभावशाली प्रवचन हुआ, जिसमें अनेक पत्रकार एवं विशिष्ट जैन-अजैन हजारों की प्रबुद्ध जनता उपस्थित हुई थी। सर सेठ सा. भागचंद जी सोनी पूज्य माताजी से तत्त्वचर्चा में बड़ा ही समय निकालकर लाभ प्राप्त करते रहते थे। अजमेर चातुर्मास के बाद अजमेर में ही पूज्य माताजी की जन्मदात्री माँ मोहिनी जी एवं अन्य ब्रह्मचारिणी बाइयों की दीक्षाएं बड़े ही धूमधाम से सम्पन्न हुर्इं, जिसमें पच्चीसों हजार की जनता एकटक दीक्षा समारोह के वैराग्य-परक दृश्य को देखकर अपने नेत्रों को सफल कर रही थीं। कु. माधुरी ने यहीं पर सुगंधदशमी के दिन १३ वर्ष की उम्र में आजन्म ब्रह्मचर्यव्रत धारण किया। वर्तमान में वे आर्यिका चंदनामती माताजी के रूप में पूज्य माताजी के संघ में रत्नत्रयसाधनारत हैं। चातुर्मास के बाद-अजमेर चातुर्मास के बाद संघ का विहार होता है। स्वास्थ्य ठीक न होने से मध्य में पूज्य माताजी अपनी कुछ शिष्य-शिष्याओं के साथ ब्यावर रुक जाती हैं। ब्यावर के शास्त्र भंडार से १ हस्तलिखित प्रति अष्टसहस्री की प्राप्त होने से टिप्पणी एवं पाठांतर का कार्य भी प्रारंभ हुआ। राय सा. चांदमल जी पाण्ड्या-गोहाटी, सेठ माणिकचंद वीरचंद गांधी-फलटण, परसादीलाल पाटनी-दिल्ली, पारसदास मोटर वाले आदि महानुभावों की विशेष प्रेरणा होने से ब्यावर से विहार कर पूज्य माताजी अपने शिष्य-शिष्याओं सहित जयपुर होते हुए भारत की राजधानी दिल्ली में पदार्पण करती हैंं।


[सम्पादन]
सत्रहवाँ चातुर्मास (सन् १९७२, पहाड़ीधीरज-दिल्ली)

पहाड़ी धीरज-दिल्ली में २ मुनिराज (मुनि श्री संभवसागर जी एवं मुनि श्री वर्धमानसागर जी) एवं ४ माताजी, ऐसे ६ त्यागियों के संघ का चातुर्मास स्थापित हुआ। चातुर्मास के मध्य ही दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान की स्थापना पूज्य माताजी की प्रेरणा से हुई, जिसके प्रथम अध्यक्ष-डॉ. कैलाशचंद जैन राजाटॉयज-दिल्ली एवं प्रधानमंत्री-वैद्य शांतीप्रसाद जी-दिल्ली (फर्म-राजवैद्य शीतल प्रसाद एण्ड संस) मनोनीत किये गये। संस्थान के अन्तर्गत ही ‘वीर ज्ञानोदय ग्रंथमाला’ स्थापित की गई। अष्टसहस्री के अलावा त्रिलोकभास्कर नामक मौलिक ग्रंथ भी माताजी ने इसी चातुर्मास के मध्य लिखा। जिसमें त्रिलोकसार, तिलोयपण्णत्ति, जम्बूद्वीपपण्णत्ति आदि ग्रंथों के आधार से योजन को मील आदि सरल आधुनिक परिवेश में प्रस्तुत किया गया। यहाँ पर डॉ. कैलाशचंद जी ‘राजा टॉयज’ वालों ने माताजी के प्रवचन समयसार, तत्त्वार्थसूत्र आदि पर रिकार्ड किये। पूज्य माताजी ने दिल्ली की मीनाबाई एवं ब्र. मनोवती बाई को आचार्य देशभूषण जी से दीक्षा दिलाई। उनके क्रम से यशोमती और संयममती नामकरण हुए, उन दोनों ने ३ वर्ष तक पूज्य माताजी के सानिध्य में ध्यान-अध्ययन किया है।


[सम्पादन]
अठारहवाँ चातुर्मास (सन् १९७३, नजफगढ़-दिल्ली)

नजफगढ़-दिल्ली के इस चातुर्मास के मध्य विविध कार्यक्रमों के साथ ही पूज्य माताजी ग्रंथ रचना में सतत संलग्न रहीं और न्यायसार नामक तर्कशास्त्र के एक ग्रंथ का निर्माण किया तथा भावसंग्रह, भावत्रिभंगी, आस्रव त्रिभंगी का अनुवाद करके कातंत्र व्याकरण का अनुवाद प्रारंभ किया। चातुर्मास के बाद संघ का विहार दिल्ली के विभिन्न स्थानों पर होकर अगला चातुर्मास पुन: आचार्यश्री धर्मसागर जी महाराज के साथ ही दिल्ली में होता है।


[सम्पादन]
उन्नीसवाँ चातुर्मास (सन् १९७४, लाल मंदिर-दिल्ली)

भगवान महावीर स्वामी का निर्वाण महोत्सव वर्ष होने के कारण सारे देश में भगवान महावीर के अहिंसात्मक संदेशों की धूम चल रही थी और देश की राजधानी दिल्ली में आचार्यश्री धर्मसागर जी का संघ सहित चातुर्मास, आचार्य श्री देशभूषण जी का संघ सहित चातुर्मास, मुनि श्री विद्यानंद जी का चातुर्मास एवं आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी का चातुर्मास होने से जो प्रभावना हुई है, वह भी आने वाली भावी परम्परा के लिए एक प्रेरणा और आदर्श का विषय रहेगा। इस चातुर्मास के मध्य पूज्य माताजी द्वारा लिखित और अनुवादित १३ पुस्तकों का प्रकाशन सम्पन्न हुआ, जिसमें भगवान महावीर के जीवन पर लिखी गई सचित्र पुस्तक (भगवान महावीर कैसे बने) भी निर्वाण महोत्सव में एक अनूठी पुस्तक सिद्ध हुई और प्रेस से आते ही २५००० पुस्तके समाप्त हो गर्इं अत: १० हजार पुस्तकों का १ माह के अन्दर पुन: प्रकाशन किया गया। बच्चों के प्रारंभिक ज्ञान हेतु बालविकास के प्रथम भाग का प्रकाशन भी दिल्ली में इसी समय हुआ था।

निर्वाण महोत्सव के इस पुनीत वर्ष में ही पूज्य माताजी द्वारा अनुवादित अष्टसहस्री ग्रंथ एवं अन्य कतिपय पुस्तकों का एक विशाल समारोहपूर्वक माननीय साहू शांतिप्रसाद जी के सम्मुख गणमान्य राजनेताओं एवं समस्त दिगम्बर, श्वेताम्बर आचार्य-उपाध्याय संघ सानिध्य में विमोचन किया गया। इसी वर्ष दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान के एवं समीचीन धर्मज्ञान के प्रचार हेतु संस्थान के अंतर्गत ही एक मासिक पत्रिका ‘‘सम्यग्ज्ञान’’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ, जो कि आज देश के कोने-कोने एवं हर प्रांत में अपनी अनूठी शैली से प्रशंसित हो चुकी है।

[सम्पादन]
चातुर्मास के बाद-

दिल्ली से आचार्य श्री धर्मसागर जी महाराज संघ सहित, उपाध्यायमुनि श्री विद्यानंद जी महाराज एवं आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी का विहार होकर मेरठ होता हुआ ऐतिहासिक तीर्थ क्षेत्र हस्तिनापुर में मंगल पदार्पण होता है। यहाँ पर नवनिर्मित ३ विशाल जिनबिंबों की आचार्य, उपाध्याय एवं समस्त साधुओं के सानिध्य में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा सम्पन्न होती है। पुन: आचार्यश्री धर्मसागर जी महाराज का चातुर्मास सहारनपुर, पूज्य माताजी का चातुर्मास हस्तिनापुर और उपाध्याय विद्यानंद जी का चातुर्मास जगाधरी होने से उत्तर भारत में धर्मप्रभावना कायम रही।


[सम्पादन]
बीसवाँ चातुर्मास (सन् १९७५, हस्तिनापुर-उत्तरप्रदेश)

हस्तिनापुर में एकांत एवं शांतिप्रिय स्थान होेने से पूज्य माताजी का अध्ययन-अध्यापन पूर्व समय से भी तीव्र गति से चला। कई ग्रंथों के अनुवाद किये और सामूहिक स्वाध्याय से अनेक भव्य जीवों को बहुत ही लाभ प्राप्त हुआ। प्रकाशन में बालविकास के चारोें भागों का प्रकाशन प्रमुख रहा।


[सम्पादन]
इक्कीसवाँ चातुर्मास (सन् १९७६, खतौली-उत्तरप्रदेश)

यहाँ पर चातुर्मास से पूर्व ही एक शिक्षण शिविर का आयोजन पूज्य माताजी की प्रेरणा से हुआ, जिसमें लगभग ५०० स्त्री-पुरुष, बालक-बालिकाओं ने भाग लिया। उस शिविर में सरल रीति से विषय समझने की दृष्टि से द्रव्यसंग्रह, समाधिशतक एवं इष्टोपदेश का पूज्य माताजी ने पद्यानुवाद करके बड़ा ही उपकार किया। इन पुस्तकों के प्रकाशन के साथ ही अन्य कतिपय ‘आर्यिका’ आदि पुस्तकों का भी प्रकाशन कार्य सम्पन्न हुआ। इस चातुर्मास की एक उपलब्धि यह रही कि पूज्य माताजी ने इन्द्रध्वज विधान हिन्दी भाषा में लिखना प्रारंभ किया और ३ माह के अल्प समय में ५० पूजाओं से युक्त इस वृहद् ग्रंथ का निर्माण करके एक अद्भुत कार्य कर दिखाया है। इस इन्द्रध्वज विधान का जब से प्रकाशन हुआ है, तब से लेकर आज तक भारत के कोेने-कोने में यह विधान हर वर्ष महती धर्मप्रभावना के साथ सम्पन्न किया जाता है।

[सम्पादन]
गुजरात में शिक्षण शिविर-

गुजरात प्रदेश के धर्मनिष्ठ महानुभावों के विशेष निवेदन पर पूज्य माताजी के आशीर्वाद से दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, हस्तिनापुर द्वारा ३१ मई से ८ जून १९८७ तक अहमदाबाद में एक विशाल शिक्षण शिविर का आयोजन पूरे गुजरात प्रदेश के स्तर पर आयोजित किया गया। जिसमें अनेक नगरों से १००० से अधिक स्त्री-पुरुषों तथा बालक- बालिकाओं ने भाग लिया। उसमें माताजी की शिष्या कु. माधुरी (वर्तमान आर्यिका श्री चंदनामती माताजी) के साथ अनेक विद्वानों ने वहाँ जाकर शिक्षण प्रदान किया। उस शिविर को तथा चंदनामती माताजी को आज भी गुजरात वाले याद करते हैं। वैसा शिविर न उससे पहले न उसके बाद आज तक हुआ। उस शिविर के माध्यम से हस्तिनापुर के वीरसागर विद्यापीठ में १५-२० विद्यार्थी पढ़ने के लिए आये थे।



[सम्पादन]
बाईसवाँ चातुर्मास (सन् १९७७, हस्तिनापुर-उत्तरप्रदेश)

स्वास्थ्य की प्रतिकूलता रहने से पूज्य माताजी ने पुन: हस्तिनापुर के प्राचीन मंदिर में चातुर्मास करके मूलाचार का शब्दश: हिन्दी अनुवाद करने का संकल्प किया। यह ग्रंथ भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हो चुका है। अन्य कई पुस्तके सम-सामयिक विषयों पर लिखीं-जिसमें दिगम्बर मुनि, धरती के देवता एवं ३-४ पूजन-विधान की पुस्तके प्रमुख हैं।


[सम्पादन]
तेईसवाँ चातुर्मास (सन् १९७८, हस्तिनापुर-उत्तरप्रदेश)

२ जुलाई सन् १९७८ को अखिल भारतीय दिगम्बर जैन शांतिवीर सिद्धान्त संरक्षिणी सभा के माननीय मंत्री श्री गणेशीलाल जी रानीवाला एवं श्री त्रिलोकचंद जी कोठारी-कोटा आदि महानुभावों ने पूज्य माताजी के पास उपस्थित होकर पूज्य माताजी के सानिध्य में एक प्रशिक्षण शिविर लगाने के भाव व्यक्त किये, उसकी रूपरेखा तैयार की गई और पूज्य माताजी की स्वीकृति प्राप्त कर सभी लोग उस कार्य को विधिवत् संचालन करने में संलग्न हो गये। यह शिविर हस्तिनापुर में ही ७ अक्टूबर से १६ अक्टूबर तक सम्पन्न हुआ।। इस शिविर में प्रशिक्षण हेतु एक ‘प्रवचन निर्देशिका’ नामक २५० पृष्ठ की पुस्तक को पूज्य माताजी ने लगभग ५०-६० ग्रंथों के आधार से सप्रमाण अगस्त माह में लिखी थी, जिसका विमोचन शिविर के उद्घाटन के दिन हुआ था।

सन् १९७८ का चातुर्मास दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर पर हो रहा था। उसके मध्य ७ से १६ अक्टूबर तक देश भर के उच्चकोटि के विद्वानों का प्रशिक्षण शिविर रखा गया था। तदनुसार ६ अक्टूबर को विद्वानों तथा श्रेष्ठियों का आना प्रारंभ हो गया था, तभी बड़े मंदिर की कमेटी ने विद्वानों को ठहराने से मना कर दिया। कमरों में ताले डाल दिये, जिससे अचानक समस्या उत्पन्न हो गई। यह चर्चा श्वेताम्बर मंदिर जैन बालाश्रम तक पहुँच गई। बालाश्रम के कार्यकर्ताओं ने आकर माताजी से करबद्ध निवेदन किया कि माताजी! किसी प्रकार की चिंता न करें। प्रशिक्षण शिविर बालाश्रम में लगावें, सभी श्रेष्ठी तथा विद्वान भी वहीं ठहरें, वहीं सभी के भोजनादि की भी व्यवस्था करें, पूरा परिसर आपके लिए समर्पित है। इस प्रस्ताव पर माताजी ने सभी से विचार-विमर्श किया। पुन: सभी ने एकमत से स्वीकृति प्रदान की। निर्णय होते ही वहाँ दो घंटे में संपूर्ण व्यवस्था हो गई। ७ अक्टूबर को प्रात: शिविर का उद्घाटन हुआ, जिसमें पं. मोतीचंद जी कोठारी-फल्टण को कुलपति बनाया गया। शिविर में शास्त्री परिषद के महामंत्री पं. बाबूलाल जी जमादार संचालक थे जिन्होंने माताजी के आदेशानुसार पूर्ण अनुशासन से १० दिन शिविर चलाया। शिविर में डॉ. लालबहादुर शास्त्री, पं. मक्खनलाल जी शास्त्री जैसे उच्चकोटि के ८० विद्वान पधारे थे। पूज्य माताजी ने स्वयं विद्वानों को प्रवचन शैली के बारे में प्रशिक्षित किया। शिविर अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। आज भी कई युवा विद्वान उस शिविर की उपलब्धियों को याद करते हैं। इस चातुर्मास में सुदर्शन मेरु का निर्माणकार्य द्रुतगति से चल रहा था। पंचकल्याणक प्रतिष्ठा कराने पर विचार-विमर्श प्रारंभ हो गया था। चातुर्मास समापन के पश्चात् माताजी ने ससंघ दिल्ली जाने का निश्चय किया।

[सम्पादन]
चातुर्मास समापन के पश्चात्-

हस्तिनापुर का चातुर्मास पूर्ण करके माताजी ने ससंघ भीषण सर्दी में विहार किया। पूज्य आर्यिका श्री रत्नमती माताजी का स्वास्थ्य अनुवूâल न होते हुए भी उन्हें साथ ही ले जाया गया। १९ दिसम्बर को संघ का दिल्ली में पदार्पण हुआ। वहाँ जैन बालाश्रम दरियागंज में प्रवास के मध्य सुदर्शन मेरु की प्रतिमाओं की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा २९ अप्रैल से ३ मई १९७९ तक ‘‘श्री सुदर्शन मेरु जिनबिंब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं गजरथ महोत्सव’’ हस्तिनापुर (मेरठ) उ.प्र. में होगा, इसके लिए प्रतिष्ठा समिति का गठन किया गया। प्रतिष्ठाचार्य के रूप में ब्र. सूरजमल जी को रखने का निर्णय किया गया।

पुन: दिल्ली से विहार करके संघ वापस हस्तिनापुर आया। निर्धारित तिथि में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा सानंद एवं निर्विघ्न सम्पन्न हुई। इस प्रतिष्ठा महोत्सव में आचार्यकल्प श्री श्रेयांससागर महाराज के ससंघ पधारने से और अधिक विशेषता आ गई। पूज्य माताजी की भावनानुसार पंचकल्याणक प्रतिष्ठा के मध्य यह निर्णय लिया गया कि जम्बूद्वीप स्थल पर ‘‘आचार्य वीरसागर संस्कृत विद्यापीठ’’ प्रारंभ किया जावे। तदनुसार श्रावण शुक्ला एकम् के शुभ दिन विद्यापीठ का उद्घाटन हुआ, जिसमें प्रथम विद्यार्थी के रूप में सूर्यकांत (सुरेश) कोटड़िया का प्रवेश हुआ। वह प्रथम विद्यार्थी वर्तमान में मुनि श्री रविनंदी जी के रूप में धर्म की आराधना तथा धर्म की प्रभावना कर रहे हैं। इसी प्रकार नरेश कुमार जैन, प्रवीणचंद जैन ने भी इस विद्यापीठ से विद्यार्थी बनकर अध्ययन किया। वे प्रतिष्ठाचार्य के रूप में आज भी खूब धर्मप्रभावना करते हुए संस्थान की सेवा कर रहे हैं। प्रतिष्ठा सम्पन्न होने के पश्चात् माताजी ने पूज्य रत्नमती माताजी की अनिच्छा होते हुए भी ज्येष्ठ माह की भयंकर गर्मी में पुन: दिल्ली के लिए विहार कर दिया।

[सम्पादन]
चौबीसवाँ चातुर्मास (सन् १९७९, मोरीगेट-दिल्ली)

८ जुलाई १९७९ को दि. जैन मंदिर मोरीगेट, दिल्ली में चातुर्मास की स्थापना हुई। प्रतिदिन प्रात: प्रवचन तथा स्वाध्याय से महती धर्मप्रभावना हुई। स्त्री-पुरुषों, बालक-बालिकाओं को धर्माध्ययन भी कराया गया। उस समय संघ में आर्यिका श्री रत्नमती माताजी तथा आर्यिका श्री शिवमती माताजी थीं। सब्जी मण्डी-दिल्ली की जैन समाज के निवेदन पर श्रावण शुक्ला ७ को सब्जी मण्डी जाकर भगवान पाश्र्वनाथ के निर्वाणलाडू चढ़ाने के उत्सव में मंगल प्रवचन किया। उक्त कार्यक्रम में मुनि श्री मल्लिसागर जी (आ. श्री विद्यासागर जी महाराज के पिता) भी पधारे थे।

महिला समाज मोरीगेट ने दशलक्षण पर्व में इन्द्रध्वज मंडल विधान किया, जिसमें अनेक स्त्री-पुरुषों ने भाग लिया। दिल्ली में प्रथम बार इन्द्रध्वज विधान हो रहा था। इसीलिए दिल्ली के कोने-कोेने से जैन समाज के महानुभाव विधान देखने आये।

[सम्पादन]
आश्विन मास में शिक्षण-प्रशिक्षण शिविर का भव्य आयोजन-

चूँकि मोरीगेट में स्थान पर्याप्त नहीं था इसलिए जैन बालाश्रम दरियागंज में २३ से ३० सितम्बर तक दि. जैन त्रिलोक शोध संस्थान,हस्तिनापुर तथा दि. जैन सिद्धांत संरक्षिणी सभा के संयुक्त तत्त्वावधान में शिक्षण-प्रशिक्षण शिविर भव्यता के साथ सम्पन्न हुआ। इसमें भी प्रो. मोतीचंद कोठारी-फल्टण को कुलपति बनाया गया। पं. पन्नालाल साहित्याचार्य-सागर भी पधारे थे। डिप्टीगंज में पुन: इन्द्रध्वज महामण्डल विधान का आयोजन ३ से १४ अक्टूबर तक माताजी के ससंघ सानिध्य में सम्पन्न हुआ, जिसमें शताधिक स्त्री-पुरुषों ने भाग लिया, महती धर्मप्रभावना हुई। विधान समापन के पश्चात् माताजी ससंघ वापस मोरीगेट पधारीं। जहाँ जैन समाज दिल्ली के अग्रणी कार्यकर्ता मुनिभक्त श्रेष्ठी श्री रमेशचंद जैन ‘पी.एस. जैन मोटर्स’-राजपुर रोड ने १५ से १७ अक्टूबर तक सपरिवार पंचपरमेष्ठी विधान भक्तिविभोर होकर किया, पुन: दीपावली के दिन चातुर्मास समापन हुआ।

[सम्पादन]
मोरीगेट चातुर्मास के पश्चात्-

चातुर्मास समापन के पश्चात् माताजी जैन बालाश्रम, दरियागंज पधारीं। यहाँ श्री भारतवर्षीय अनाथरक्षक जैन सोसाइटी, जैन बालाश्रम दरियागंज के ७५वर्ष की पूर्णता पर हीरक जयंती महोत्सव का आयोजन किया गया, जिसमें पूज्य माताजी ने सभी कार्यकर्ताओं को आशीर्वाद प्रदान किया। हीरक जयंती महोत्सव में तत्कालीन भाजपा नेता श्री अटल बिहारी वाजपेयी पधारे, उन्होंने भी माताजी से आशीर्वाद प्राप्त किया। उन्हें मैंने माताजी द्वारा लिखित साहित्य भेंट किया था। श्री राजेन्द्र प्रसाद कम्मोजी जैन बालाश्रम, दरियागंज-दिल्ली के मंदिर में इन्द्रध्वज विधान कराना चाहते हैं। यह बात मैंने माताजी को बताई, तब माताजी मोरीगेट में विराजमान थीं। कम्मोजी जब मोरीगेट आये, तब उनके आते ही माताजी ने मुझे आदेश दिया कि ‘‘इन्हें विधान सामग्री की सूची दे दो।’’ साथ में यह भी कहा कि कार्तिक आष्टान्हिका में विधान होगा, मैं समय पर पहुँच जाऊँगी।

कम्मोजी ने सामग्री की सूची हाथ में ली तथा माताजी के विहार की तथा विधान की रूपरेखा बनाने लगे। उठते-उठते हंसकर उन्होंने कहा कि ‘‘मैं तो विधान न कर सकने के लिए कहने आया था किन्तु आपके भावों को देखकर मना नहीं कर सका, प्रत्युत् पक्का करके जा रहा हूँ।’’ यह बात सुनकर माताजी भी खूब हंंसी तथा वे भी हँसे। २८ अक्टूबर से ४ नवम्बर तक कार्तिक अष्टान्हिका में बहुत धूमधाम से विधान सम्पन्न हुआ। दरियागंज से विहार कर माताजी ससंघ २५ नवम्बर को दि. जैन मंदिर, ग्रीन पार्वâ पहुँची, वहाँ २९ नवम्बर से ९ दिसम्बर तक ‘‘ध्यान-साधना शिविर’’ का आयोजन हुआ। संघस्थ कु. माधुरी ने सबको सामायिक विधि सिखाई तथा माताजी ने ‘‘ह्री ँ’’ का ध्यान सिखाया। ध्यान करने में सभी स्त्री-पुरुषों को बहुत आनंद आया। शीतकाल में संघ का प्रवास लगभग ढाई माह ग्रीनपार्क में रहा। यहाँ मंदिर में प्रात: प्रतिदिन द्रव्यसंग्रह की कक्षा चलाई जाती थी। उसके पश्चात् माताजी का प्रवचन होता था। यहाँ पर श्री निर्मल कुमार सेठी-सीतापुर वालों से परिचय हुआ। उनकी धर्मरुचि तथा उत्साह देखकर माताजी ने उन्हें अ.भा.दि. जैन महासभा का अध्यक्ष बनने की प्रेरणा दी। तदनुसार उन्हें कोटा (राज.) में महासभा की मीटिंग में अध्यक्ष पद पर मनोनीत किया गया। माताजी ने उन्हें खूब आशीर्वाद दिया। तब से माताजी के पास आकर मार्गदर्शन तथा आशीर्वाद प्राप्त करते रहते हैं।

माताजी ने मुझे सेठ हीरालाल जी रानीवाला के सुपुत्र श्री सुरेन्द्र कुमार जी रानीवाला के यहाँ इन्द्रध्वज विधान कराने वर्धा (महा.) भेजा था। २६ नवम्बर से ७ दिसम्बर तक खूब प्रभावनापूर्वक विधान हुआ। मैं पहली बार संंघ से बाहर विधान कराने गया था। ग्रीनपार्क में ही साहू शांतिप्रसाद जी के सुपुत्र साहू अशोक कुमार जी से निकट से परिचय हुआ। उन्हें माताजी ने समाज में आगे आने के लिए पुरजोर प्रेरणा दी। जब दो-चार बार साहू अशोक जी का ग्रीनपार्क में माताजी के पास आना हुआ, तब उन्हें हस्तिनापुर में बनने वाली जम्बूद्वीप रचना के द्वितीय चरण का शिलान्यास करने की प्रेरणा दी गई, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया। तदनुसार माघ शुक्ला पूर्णिमा- ३१ जनवरी १९८० को साहू श्रेयांसप्रसाद जी, साहू अशोक जी व उनकी ध.प. श्रीमती इन्दु जी ने हस्तिनापुर पधारकर हजारों जनसमूह के मध्य समारोहपूर्वक शिलान्यास किया।

ग्रीनपार्क से दि. जैन मंदिर राजाबाजार-कनॉट प्लेस नई दिल्ली में ६ फरवरी १९८० को माताजी का ससंघ पदार्पण हुआ। यहॉँ २३ फरवरी से २ मार्च तक लाला श्यामलाल जी ठेकेदार परिवार की ओर से इन्द्रध्वज विधान का आयोजन फाल्गुन की आष्टान्हिका में हुआ। दिल्ली जैन समाज के अनेक विशिष्ट महानुभावों ने विधान-पूजन में भाग लेकर पुण्योपार्जन किया। श्री छोटीशाह (प्रद्युम्न कुमार जैन) टिवैâतनगर के विशेष आग्रह पर वहाँ से १० से १९ फरवरी तक आयोजित इन्द्रध्वज विधान कराने के लिए माताजी ने कु. माधुरी को टिवैâतनगर भेजा। मैंने भी वहाँ जाकर विधान के मध्य प्रवचन किये। अवध प्रांत में पहली बार यह इन्द्रध्वज विधान हुआ था, जिससे महती धर्मप्रभावना हुई। कनॉट प्लेस से संघ सहित माताजी मंटोला पहाड़गंज पधारीं। यहाँ ७ से १६ मार्च तक शिक्षण शिविर में द्रव्यसंग्रह पढ़ाया गया, बीच में पंचपरमेष्ठी विधान हुआ। चैत्र वदी ९ को ऋषभदेव जयंती मनाई गई। प्रतिदिन प्रवचन भी होते रहे। खूब लाभ समाज ने लिया।

कार्यक्रमों के साथ-साथ माताजी का लेखन कार्य भी चलता रहा। रत्नकरण्ड के पद्यों की हिन्दी श्लोकों में रचना, शांति विधान आदि ग्रंथ बनाये। पुन: संघ का आगमन साइकिल मार्ट-चाँदनी चौक में हुआ। महावीर जयंती के संदर्भ में २३ मार्च को प्रात: हीरालाल हायर सेकेण्ड्री स्कूल, पहाड़ी धीरज में तथा उसी दिन मध्यान्ह में महावीर उद्यान कैलाश नगर के पंडाल में माताजी के ओजस्वी प्रवचन हुए। चैत्र शु. ११ से १३ तक सुभाष मैदान चाँदनी चौक में प्रतिदिन प्रात: एवं मध्यान्ह में माताजी के प्रभावी प्रवचन हुए। इनके अतिरिक्त और भी कई स्थानों में महावीर जयंती संंबंधी माताजी के प्रवचन हुए। कम्मोजी की धर्मशाला में १३ से २८ जून तक १६ दिवसीय शांतिविधान माताजी के सानिध्य में श्री विजेन्द्र कुमार जैन सर्राफ ने किया। इससे पूर्व २७ मई से ६ जून तक उसी धर्मशाला में सम्यग्ज्ञान शिक्षण शिविर का आयोजन किया गया, जिसमें बाल विकास, द्रव्यसंग्रह, रत्नकरण्ड श्रावकाचार आदि का शिक्षण दिया गया। सभी वर्ग के लोगों ने लाभ लिया। ज्येष्ठ की भयंकर गर्मी के कारण पूज्य आर्यिका श्री रत्नमती माताजी को पीलिया हो गया। ९७ वर्षीय हकीम अतरसेन जैन के यूनानी नुस्खे से पीलिया ठीक हुआ। पुन: दूसरी व तीसरी बार पीलिया हुआ। बीच में स्वास्थ्य बहुत नाजुक हो गया था किन्तु उसी कासनी के बीज की ठंडाई वाले नुस्खे से ठीक हो गर्इं।


[सम्पादन]
पच्चीसवाँ चातुर्मास

(सन् १९८०-कूचा बुलाकी बेगम, साइकिल मार्कट, चाँदनी चौक-दिल्ली)

२६ जून १९८० आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी को कम्मोजी की धर्मशाला में चातुर्मास की स्थापना हुई। मेरु मंदिर में २० से २९ जुलाई तक माताजी के सानिध्य में इन्द्रध्वज विधान का आयोजन किया गया। इस मंदिर में नंदीश्वर के ५२ जिनालयों की भव्य रचना बनी हुई है। फरवरी १९८१ में श्रवणबेलगोला में होने वाले ‘‘भगवान बाहुबली सहस्राब्दि महामस्तकाभिषेक’’ की तैयारियाँ एक वर्ष पूर्व से जोरों से प्रारंभ हो गई थीं अत: माताजी ने भगवान बाहुबली के संंबंंध में साहित्य का निर्माण प्रारंभ कर दिया। उपन्यास की शैली में ‘‘योग चव्रेâश्वर बाहुबली’’ पुस्तक लिखी, ‘‘कामदेव बाहुबली’’ नाम से लघु पुस्तिका लिखी, जिसका पांच भाषाओं में हजारों की संख्या में प्रकाशन किया गया। ‘बाहुबली नाटक’ लिखा, भरत-बाहुबली नाम से चित्रकथा (कॉमिक्स) का प्रकाशन हुआ। भगवान बाहुबली विषयक माताजी द्वारा लिखित हिन्दी-संस्कृत की स्तुतियों का, बाहुबली स्तोत्र, बाहुबली पूजा आदि का लाखों की संख्या में प्रकाशन किया गया। ‘भगवान बाहुबली’ काव्य रचना की ऑडियो वैâसेट भी बड़ी संख्या में तैयार कराकर वितरित की गई।

दशलक्षण पर्व में माताजी के प्रवचन प्रात: कम्मोजी की धर्मशाला में तथा मध्यान्ह में कूचा सेठ के बड़े मंदिर में हुए। भगवान बाहुबली सहस्राब्दि महामस्तकाभिषेक श्रवणबेलगोला के प्रचार-प्रसार के लिए लालकिला मैदान से जनमंगल महाकलश प्रवर्तन का उद्घाटन २९ सितम्बर १९८० को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरागांधी के करकमलों से हुआ। उस सभा में पूज्य माताजी के भी आशीर्वचन हुए। यह महाकलश पूरे देश के विभिन्न अंचलों में घूमकर फरवरी १९८१ में महामस्तकाभिषेक के अवसर पर श्रवणबेलगोला पहुँचा था।

श्री पन्नालाल सेठी-डीमापुर ने सपरिवार माताजी के सानिध्य में इन्द्रध्वज महामण्डल विधान ९ से १९ अगस्त तक कम्मोजी की धर्मशाला में किया। इस विधान को विधानाचार्य के रूप में मैंने सम्पन्न कराया था। अनेकों महानुभावों ने विधान में भाग लेकर खूब पुण्योपार्जन किया। आसोज (क्ंवार ) शुक्ला १५ (शरदपूर्णिमा) २३ अक्टूबर १९८० को माताजी का ४७वाँ जन्मदिवस माताजी के मना करने के बावजूद भी विशेष समारोहपूर्वक महावीर वाटिका, दरियागंज में विशाल पंडाल बनाकर मनाया गया। तत्कालीन केन्द्रीयमंत्री श्री प्रकाशचंद जैन सेठी तथा ए.पी. शर्मा ने भाग लिया। प्रमुख अतिथियों में साहू अशोक कुमार जैन, अमरचंद पहाड़िया-कलकत्ता आदि ने विनयांजलि समर्पित की। इस अवसर पर श्री पन्नालाल सेठी-डीमापुर की ओर से वृहद् प्रीतिभोज का आयोजन किया गया था, जिसमें लगभग ५००० स्त्री-पुरुषों ने भोजन किया।

इससे पहले माताजी के दीक्षित जीवन में सन् १९६६ के सोलापुर चातुर्मास में माताजी के मना करने पर भी आ. श्री विमलसागर जी महाराज के विशेष आग्रह से उन्हीं के सानिध्य में ब्र. सुमतिबाई शाह ने शरदपूर्णिमा पर माताजी के जन्मदिन को भव्यरूप में मनाया था। जन्मदिवस के अगले दिन २४ अक्टूबर से समयसार वाचना शिविर प्रारंभ हुआ। इसमें डॉ. पन्नालाल जी साहित्याचार्य को कुलपति बनाया गया था। इसमें पं. वैâलाशचंद जी सिद्धांतशास्त्री-बनारस भी पधारे थे। शिविर में ८५ विद्वान एवं श्रीमान पधारे थे। शिविर में स्वयं माताजी ने प्रतिदिन समयसार पर डेढ़ घंटे तक प्रवचन किया। २ नवम्बर १९८० को लाल मंदिर में शिविर समापन समारोह की सभा में श्री रमेशचंद जैन ‘पी.एस. जैन मोटर्स’ ने माताजी द्वारा लिखित एवं मुद्रित भगवान ऋषभदेव, संस्कार, प्रभावना, जीवनदान, उपकार तथा नियमसार पद्यावली पुस्तकों का विमोचन किया।

बाहुबली मस्तकाभिषेक के संदर्भ में फरवरी १९८१ का सम्यग्ज्ञान ‘‘भगवान बाहुबली’’ विशेषांक के रूप में निकाला गया जिसमें माताजी द्वारा लिखित अनेक स्तुतियों तथा लेखों का प्रकाशन किया गया। मैं और रवीन्द्र कुमार ९ फरवरी से ५ मार्च तक श्रवणबेलगोला रहे। भगवान बाहुबली का मस्तकाभिषेक किया, समारोह का पूरा आनंद लिया। माताजी दिल्ली में रहकर पत्र-पत्रिकाओं तथा रेडियो, टी.वी. के माध्यम से समारोह की जानकारी लेती रहीं। २२ फरवरी १९८१ को १००८ कलशों से महामस्तकाभिषेक सम्पन्न हुआ। २४ फरवरी को श्रवणबेलगोला में दि. जैन त्रिलोक शोध संस्थान का अधिवेशन हुआ जिसमें माताजी द्वारा लिखित ‘‘जैन भारती’’ ग्रंथ का विमोचन हुआ। इस ग्रंथ की अनेकों महानुभावों तथा साधुओं ने बहुत प्रशंसा की, क्योंकि इसमें चारों अनुयोगों का संक्षेप में बहुत सुन्दर विवेचन किया गया है, जिससे जैनधर्म को सरलता से समझा जा सकता है। इसे अनेक भाषाओं में प्रकाशित करने का कार्य भी चल रहा है।

दि. जैन लाल मंदिर चाँदनी चौक में प्रेमचंद जैन (दाने वालों) ने ९ से १६ मार्च तक इन्द्रध्वज विधान माताजी के सानिध्य में कराया। विधान के समापन पर १६ मार्च को दिल्ली में प्रथम बार गजरथ निकाला गया। इन्हीं प्रेमचंद दाने वालों ने सन् १९८५ में जम्बूद्वीप की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा के अवसर पर एक रथ बनवाकर भेंट किया। इन्होंने लाल किले के सामने सुभाष मैदान में बैठकर पक्षियों के लिए अनाज बेचकर उसके लाभ से अनेक रथ बनवाकर भिन्न-भिन्न मंदिरों में भेंट करके एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया।

[सम्पादन]
दिल्ली से हस्तिनापुर के लिए प्रस्थान-

१६ मार्च को लालमंदिर की विशाल सभा में सभी को मंगल आशीर्वाद प्रदान करते हुए माताजी ने मोरीगेट में आष्टान्हिक पर्व करके २४ मार्च को हस्तिनापुर के लिए विहार किया। ९ अप्रैल को हस्तिनापुर में जम्बूद्वीप स्थल पर पदार्पण हुआ। यहाँ अब तक दो धर्मशालाओं का निर्माण हो चुका था। वैशाख शुक्ला ७, दिनाँक १० मई १९८१ को तीनमूर्ति मंदिर तथा रत्नत्रय निलय (त्यागी भवन) का शिलान्यास सम्पन्न हुआ। प्रतिदिन प्रात:-मध्यान्ह ग्रंथों का स्वाध्याय माताजी के समक्ष चलता रहा, माताजी ग्रंथों का लेखन करती रहीं तथा निर्माणकार्य भी द्रुतगति से चलते रहे। इसी मध्य हस्तिनापुर तथा जम्बूद्वीप रचना के प्रचार-प्रसार के लिए ‘‘जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति’’ के नाम से एक रथ पूरे भारत में भ्रमण कराने की रूपरेखा बनाई गई।


[सम्पादन]
छब्बीसवाँ चातुर्मास (सन् १९८१, जम्बूद्वीप स्थल-हस्तिनापुर-उ.प्र.)

८ से १८ जुलाई तक श्री निर्मल कुमार सेठी तथा श्री पन्नालाल सेठी-डीमापुर ने इन्द्रध्वज विधान माताजी के सानिध्य में भक्तिभावपूर्वक सम्पन्न हुआ। इसी मध्य १६ जुलाई (आषाढ़ शुक्ला १४) को चातुर्मास की स्थापना हुई। यह जम्बूद्वीप स्थल पर पहला चातुर्मास स्थापित किया। इस चातुर्मास में निर्माण कार्यों की प्रगति के साथ-साथ ‘‘जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति’’ रथ प्रवर्तन के विषय में चर्चा-विचार चलता रहा। ११ से १५ अक्टूबर तक ‘जम्बूद्वीप सेमिनार’ का आयोजन किया गया। पं. पन्नालाल जी साहित्याचार्य-सागर को इस संगोष्ठी का कुलपति मनोनीत किया गया। इस संगोष्ठी के मध्य शास्त्री परिषद द्वारा प्रकाशित ‘‘पं. बाबूलाल जमादार अभिनंदन ग्रंथ’’ का विमोचन हुआ तथा उन्हें समर्पित किया गया। माताजी ने भी उन्हें उनकी कर्मठता तथा दि. जैन त्रिलोक शोध संस्थान के प्रति समर्पित भावनाओं के लिए बहुत-बहुत मंगल आशीर्वाद दिया।

१३ अक्टूबर, शरदपूर्णिमा के दिन माताजी के ४८वें जन्मदिवस के शुभ अवसर पर आगत समस्त विद्वानों, श्रीमानों तथा नवयुवकों ने माताजी के प्रति श्रद्धासुमन अर्पित किये। अनेक विद्वानों के विचारों को लेकर पं. बाबूलाल जमादार ने माताजी का अभिनंदन ग्रंथ प्रकाशित करने की योजना बनाई। जब यह बात माताजी को ज्ञात हुई, तो उन्होंने कहा कि मुझमें जो कुछ भी योग्यता है, उसका श्रेय आर्यिका रत्नमती माताजी को है। उन्होंने ही मुझमें बाल्यकाल से धर्म के संस्कार भरे थे, अत: उनका अभिनंदन ग्रंथ तैयार करें। तदनुसार ‘‘आर्यिका रत्नमती अभिनंदन ग्रंथ’’ तैयार करके नवम्बर १९८३ में रत्नमती माताजी को समर्पित किया गया।

जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति रथ का प्रवर्तन दिल्ली से प्रारंभ करने के लिए अनेक महानुभावों ने माताजी से आग्रहपूर्ण निवेदन किया, जिसमें प्रमुख थे राजेन्द्रप्रसाद कम्मोजी। साथ में यह भी कहा कि माताजी आपको भी दिल्ली चलना पड़ेगा। अनेक महानुभावों के अत्यधिक आग्रह के कारण माताजी को दिल्ली जाने का कार्यक्रम बनाना पड़ा। १३ फरवरी को हस्तिनापुर से दिल्ली के लिए माताजी ने ससंघ विहार किया। २७ फरवरी को दिल्ली मोरीगेट में पदार्पण हुआ। २ मार्च १९८२ से आष्टान्हिक पर्व में इन्द्रध्वज विधान उत्साहपूर्वक सम्पन्न हुआ। आचार्य श्री धर्मसागर जी अभिवंदन ग्रंथ का अनेक साधु-साध्वियों के सानिध्य में विमोचन हुआ, उसमें पूज्य माताजी के सानिध्य में भी मोरीगेट में राजेन्द्र प्रसाद कम्मोजी से विमोचन करवाया गया। दिल्ली की विभिन्न कालोनियों में महावीर जयंती पर माताजी के प्रवचन हुए।

१७ अप्रैल को लाल मंदिर में माताजी के सानिध्य में ज्ञानज्योति कार्यालय का उद्घाटन हुआ। इसके साथ ही बस चेचिस खरीदकर रथ निर्माण का कार्य तेजी से प्रारंभ हो गया। रथ प्रवर्तन का उद्घाटन करने के लिए प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरागांधी से स्वीकृति लेने के लिए श्री जे.के. जैन सांसद (राज्यसभा सदस्य) से मिला गया। उनके प्रयास से ४ जून १९८२ को उद्घाटन के लिए श्रीमती इन्दिरागांधी की स्वीकृति २८ मई को प्राप्त हो गई। स्वीकृति मिलते ही रथ तैयार करने की तथा उद्घाटन की तैयारियाँ बहुत तेजी से प्रारंभ हो गर्इं। धुआंधार प्रचार किया गया। पं. बाबूलाल जी जमादार पूर्ण निष्ठा तथा तन्मयता के साथ में लगे हुए थे। रवीन्द्र कुमार तथा मैंने तैयारी में रात-दिन एक कर दिया और जिनेन्द्रप्रसाद जैन ठेकेदार, कैलाशचंद जैन-करोलबाग, डॉ. कैलाशचंद जैन राजा टॉयज, हेमचंद जैन-पहाड़गंज, गणेशीलाल रानीवाला-कोटा आदि कई लोग कार्यों में जुटे हुए थे। माताजी ने शुभ मुहूर्त में जम्बूद्वीप रचना के मॉडल की मंत्रों से शुद्धि की तथा उसमें यंत्र स्थापित किया।

४ जून १९८२ को लालकिला मैदान में बनाये गये विशाल पंडाल में प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरागांधी ने शाम को ४ बजे पधारकर अत्यंत हर्ष एवं उत्साहपूर्ण वातावरण में दसों हजार की भीड़ में माताजी से आशीर्वाद लेकर मंत्रोच्चारपूर्वक रथ पर पुष्पांजलि क्षेपण करके स्वस्तिक बनाकर श्रीफल चढ़ाया। रथ के देश भ्रमण के लिए शुभकामनाएं दीं। शाम को ५ बजे से रथ की शोभायात्रा चांदनी चौैक से प्रारंभ होकर रात्रि में ९ बजे करोलबाग पहुँचकर समाप्त हुई। अगले दिन ग्रीनपार्क होकर रथ राजस्थान भ्रमण के लिए तिजारा पहुँचा। रथ संचालक के रूप में पं. बाबूलाल जी जमादार रथ के साथ में गये। बड़ी भक्तिभाव से राजस्थान के गाँव-गाँव में रथ का स्वागत हो रहा था। हस्तिनापुर में जम्बूद्वीप रचना का निर्माण कार्य चल रहा था।

दिल्ली जैन समाज के प्रमुख महानुभावों के विशेष आग्रहपूर्ण निवेदन को स्वीकार करके सन् १९८२ का चातुर्मास वूâचा सेठ चाँदनी चौक में करने की स्वीकृति प्रदान कर दी।


[सम्पादन]
सत्ताइसवाँ चातुर्मास

(सन् १९८२-कूचा बुलाकी बेगम, साइकिल मार्केट, दिल्ली)

५ जुलाई, आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी की रात्रि में ८ बजे समाज के सैकड़ों लोगों की उपस्थिति में वर्षायोग की स्थापना की गई। भादों सुदी दूज, २० अगस्त को चारित्रचक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर महाराज की पुण्यतिथि के अवसर पर वेदवाड़ा में माताजी का प्रवचन हुआ। १३ सितम्बर से २१ सितम्बर तक श्री उग्रसेन हेमचंद जैन-पहाड़गंज की ओर से मंटोला की जैन धर्मशाला में माताजी के सानिध्य में इन्द्रध्वज मण्डल विधान हुआ। २६ सितम्बर से १० अक्टूबर तक माताजी के सानिध्य में एक साथ दो विधान हुए। धर्मशाला में प्रात: इन्द्रध्वज विधान तथा दोपहर में प्रेमचंद जैन-महमूदाबाद वालों की तरफ से तीस चौबीसी विधान हुआ। महती धर्मप्रभावना हुई। शाहदरा में और भी कई छोटे-छोटे विधान हुए।

भोगल में माताजी के सानिध्य में १८ अक्टूबर को मंदिर का शिलान्यास सम्पन्न हुआ। २१ अक्टूबर १९८२ को जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति सेमिनार का उद्घाटन फिक्की ऑडिटोरियम नई दिल्ली में तत्कालीन संसद सदस्य श्री राजीव गांधी के करकमलों से हुआ। २२ अक्टूबर से २ नवम्बर तक सेमिनार कम्मोजी की धर्मशाला साइकिल मार्वेâट में सम्पन्न हुआ, जिसमें एक जापानी विद्वान भी आये थे। प्रत्येक सत्र के समापन पर माताजी ने शंकाओं का समाधान किया। १ नवम्बर को दि. जैन त्रिलोक शोध संस्थान का अधिवेशन, ज्ञानज्योति प्रवर्तन पूर्वांचल समिति की तथा अ.भा.दि. जैन युवा परिषद की बैठक हुई। २ नवम्बर को सेमिनार का समापन समारोह बहुत अच्छे रूप में हुआ। १ नवम्बर १९८२ शरदपूर्णिमा के दिन माताजी का उन्चासवाँ जन्मदिवस विद्वानों तथा दिल्ली जैन समाज के महानुभावों द्वारा उत्साहपूर्वक मनाया गया। चातुर्मास के पश्चात्-१८ नवम्बर १९८२ को कम्मोजी धर्मशाला से माताजी ने ससंघ विहार हस्तिनापुर के लिए किया। २९ नवम्बर कार्तिक शुक्ला तेरस को जम्बूद्वीप स्थल हस्तिनापुर में मंगल प्रवेश हुआ। कार्तिक पूर्णिमा पर हस्तिनापुर के वार्षिक मेले में २०-२५ हजार जैन-अजैन आते हैं। यह मेला ‘गंगा स्नान’ के मेले के नाम से भी प्रसिद्ध है। १९७९ में सुमेरु पर्वत के निर्माण के पश्चात् सुमेरु पर्वत भी जनता के आकर्षण का केन्द्र बन गया था। हजारों लोगों ने सुमेरु पर्वत पर चढ़कर उसमें निर्मित १६ चैत्यालयों के दर्शन के साथ-साथ चारों तरफ के प्राकृतिक सौंदर्य का भी आनंद लेने लगे थे। जम्बूद्वीप स्थल पर तीन मूर्ति मंदिर, रत्नत्रय निलय (त्यागी भवन), भोजनशाला आदि के निर्माण के साथ-साथ जम्बूद्वीप रचना में हिमवान आदि पर्वतों का निर्माणकार्य द्रुतगति से चल रहा था। दूसरी तरफ माताजी के सानिध्य में त्रिलोकसार, राजवार्तिक आदि ग्रंथों का स्वाध्याय संघ के शिष्यवर्ग के लिए चालू किया गया। माताजी द्वारा साहित्य लेखन का कार्य भी चल रहा था। दिन में एक या दो बार माताजी रचना निर्माण के कार्य को भी देख लेती थीं, जिससे कार्य करने वालों को संतोष हो जाता था कि पर्वतों आदि का निर्माण सही रूप में हो रहा है।

उधर राजस्थान में भारी धर्मप्रभावनापूर्वक जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति रथ का प्रवर्तन चल रहा था। बीच-बीच में जब पं. बाबूलाल जी जमादार घर आते, तो रथ संचालन के लिए मैं चला जाता था। बड़े शहरों में कमेटी के पदाधिकारी भी पहुँच जाते थे तथा प्रभावना देखकर हर्षित होते थे। २० दिसम्बर १९८२ को राजस्थान प्रवर्तन का समापन अति उत्साहपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ। राजस्थान के पश्चात् बंगाल-बिहार में रथ प्रवर्तन हुआ। पुन: उड़ीसा होकर रथ का प्रवर्तन १७ से २९ अप्रैल १९८३ तक बम्बई में भारी धर्मप्रभावना के साथ हुआ। हस्तिनापुर में माताजी के सानिध्य में समय-समय पर अनेक विधान सम्पन्न हुए। ६ मार्च १९८३ को नवनिर्मित डाइनिंग हॉल का उद्घाटन हुआ। १५ मई १९८३ को श्री उग्रसेन हेमचंद जैन-पहाड़गंज दिल्ली द्वारा निर्मित ‘रत्नत्रय निलय’ का उद्घाटन उन्हीं के करकमलों से हुआ। ५ जून से १५ जून तक तत्त्वार्थसूत्र तथा दशधर्म पर एक प्रशिक्षण शिविर जम्बूद्वीप स्थल पर सम्पन्न हुआ, जिसमें ५० विद्वानों ने प्रशिक्षण लिया। शिविर के कुलपति पं. पन्नालाल जी साहित्याचार्य थे। देखते-देखते १९८३ के वर्षायोग का समय आ गया। पूज्य आर्यिका श्री रत्नमती माताजी की अस्वस्थता को देखते हुए दि. जैन त्रिलोक शोध संस्थान के सदस्यों के विशेष निवेदन पर माताजी ने आगामी वर्षायोग जम्बूद्वीप स्थल पर ही स्थापित करने का निर्णय किया।


[सम्पादन]
अट्ठाइसवाँ चातुर्मास (सन् १९८३, जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर, उ.प्र.)

आषाढ़ की अष्टान्हिका में नवनिर्मित डाइनिंग हॉल में एक साथ दो सिद्धचक्र विधान हुए। एक तेरहपंथ विधि से हुआ तथा दूसरा बीसपंथ आम्नाय से हुआ। यह सामंजस्य बहुत अच्छा लगा। किसी को भी किसी प्रकार की शिकायत नहीं रही, बल्कि सबको बहुत आनन्द आया। आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी, २३ जुलाई को वर्ष १९८३ के चातुर्मास की स्थापना हुई। जम्बूद्वीप स्थल पर जम्बूद्वीप रचना के साथ-साथ अन्य धर्मशाला आदि के निर्माण कार्य चल रहे थे। माताजी अपने लेखन तथा पठन-पाठन में संलग्न थीं। आने वाले भक्तों तथा दर्शनार्थियों को धर्मोपदेश के साथ-साथ जम्बूद्वीप रचना से भी परिचित कराती थीं। उधर ज्ञानज्योति का भ्रमण महाराष्ट्र में चल रहा था। वहाँ की प्रभावना के समाचार जब माताजी को प्राप्त होते, तो वे बहुत हर्षित होती थीं। दैनिक धार्मिक क्रियाओं, सामायिक-प्रतिक्रमण के अतिरिक्त ज्योतिरथ के निराबाध प्रवर्तन के लिए खूब माला जाप भी करती थीं। जम्बूद्वीप रचना की पूर्णता को नजदीक देखते हुए जम्बूद्वीप रचना के लगभग २०० जिनबिंबों की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा को सम्पन्न कराने के लिए निवेदन करने हेतु संस्थान का एक प्रतिनिधिमण्डल ब्र.रवीन्द्र कुमार एवं कु. माधुरी के साथ २८ अक्टूबर १९८३ को राजस्थान गया, वहाँ विभिन्न नगरों में विराजमान आचार्य श्री धर्मसागर जी, उपाध्याय श्री अजितसागर जी, मुनि श्री दयासागर जी, मुनि श्री अभिनंदनसागर जी आदि १० संघों में जाकर नारियल चढ़ाया। औरंगाबाद में चातुर्मास कर रहे आचार्यश्री विमलसागर महाराज को भी प्रतिष्ठा पर हस्तिनापुर पधारने के लिए मैंने, श्री निर्मल कुमार सेठी आदि ने श्रीफल चढ़ाया।

११ से २१ सितम्बर १९८३ तक दशलक्षण पर्व में श्री आनंद प्रकाश जैन ‘सोरम वालों’ ने तथा ७ से १५ नवम्बर तक श्री जयकुमार जैन विनायका-भागलपुर वालों ने जम्बूद्वीप स्थल पर पूज्य माताजी के सानिध्य में इन्द्रध्वज विधान किये। शरदपूर्णिमा के दिन माताजी का ५०वाँ जन्मदिवस सादगी से मनाया गया। इस चातुर्मास के मध्य पूज्य आर्यिका श्री रत्नमती माताजी के अभिनंदन ग्रंथ को प्रकाशित करने की तैयारी हुई, ग्रंथ तैयार हो गया। कार्तिक शुक्ला पूर्णिमा, २० नवम्बर १९८३ को विशाल समारोह के मध्य पूज्य रत्नमती माताजी को अभिनंदन ग्रंथ भेंट किया गया। उक्त समारोह में श्री अमरचंद पहाड़िया-कलकत्ता, श्री निर्मल कुमार सेठी, लाला श्री श्यामलाल ठेकेदार, श्री गणेशीलाल रानीवाला आदि गणमान्य महानुभाव पधारे थे। सांसद श्री जे.के. जैन ने ग्रंथ विमोचन किया था। इस प्रकार अनेक प्रकार से धर्मप्रभावनापूर्वक १९८३ को चातुर्मास सम्पन्न हो गया।

[सम्पादन]
चातुर्मास के पश्चात्-

ज्ञानज्योति रथ का प्रवर्तन तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल के पश्चात् १ फरवरी १९८४ से मध्यप्रदेश का प्रवर्तन जबलपुर से प्रारंभ हुआ। म.प्र. के अनेक मंत्री तथा नेताओं के साथ-साथ मध्यप्रदेश जैन समाज के प्रमुख सेठ देवकुमार सिंह कासलीवाल, श्री कैलाशचंद चौधरी-सनावद, श्री इन्दरचंद जैन चौधरी-सनावद आदि महानुभाव वहाँ पहुँचे थे, मैं भी गया था।

जम्बूद्वीप रचना के जिनबिंबों की पंचकल्याणक वैशाख शुक्ला ८ से१२ तदनुसार दिनाँक २८ अप्रैल से ३ मई १९८४ तक करने की घोषणा माताजी ने की। ११ मार्च १९८४ को दि. जैन त्रिलोक शोध संस्थान की बैठक पूज्य माताजी के सानिध्य में हुई, जिसमें प्रतिष्ठा समिति का गठन किया गया। १७ मई को सनावद नगर में ज्ञानज्योति रथ का भव्य स्वागतपूर्वक प्रवेश हुआ। यहाँ त्रिदिवसीय कार्यक्रम रखा गया था। दिल्ली, इंदौर आदि से अनेक गणमान्य महानुभाव तथा पं. बाबूलाल जी जमादार, डॉ. लालबहादुर शास्त्री आदि अनेक विद्वान भी उस समय सनावद पधारे थे। विशाल जनसभा के पश्चात् आकर्षक शोभायात्रा निकाली गई। सभा में सेठ अमोलकचंद जी सर्राफ को अभिनंदन पत्र भेंट किया गया।

कई दिनों से पं. जमादार जी के न जा पाने के कारण एक सुयोग्य विद्वान पं. सुधर्मचंद जी शास्त्री-तिवरी (जबलपुर) म.प्र. को स्थाई संचालक के रूप में नियुक्त किया गया। १४ मई १९८३ को ज्योतिरथ संचालक पं. बाबूलाल जी जमादार बिहार प्रदेश से अपने घर आये थे, उसके बाद १७ मई को केवल सनावद के कार्यक्रम में आये थे। ९ जून १९८४ को बड़ौत में उनके निवास पर ही पंडित जी का स्वर्गवास हो गया। पुन: एक माह पश्चात् १४ जुलाई को पंडित जी की धर्मपत्नी का भी स्वर्गवास हो गया। पंडित जी के असामयिक निधन से संस्थान के सभी सदस्यों को हार्दिक दु:ख हुआ। पंडित जी का वात्सल्यपूर्ण व्यवहार आज भी याद आ जाता है।


[सम्पादन]
उन्तीसवाँ चातुर्मास (सन् १९८४, जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर, उ.प्र.)

५ से १४ जुलाई १९८४ तक श्री निर्मल कुमार सेठी, श्री सुमेरचंद पाटनी-लखनऊ तथा श्री मांगीलाल पहाड़े-हैदराबाद ने मिलकर माताजी के सानिध्य में जम्बूद्वीप स्थल पर इन्द्रध्वज विधान किया। चूंकि जम्बूद्वीप की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा अगले वर्ष होना निश्चित हो गया था। उससे पहले रचना का निर्माण भी पूरा होना था अत: माताजी ने संस्थान के पदाधिकारी व सदस्यों के निवेदन को स्वीकार करके हस्तिनापुर में ही चातुर्मास की स्थापना १२ जुलाई, आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी को संघ सहित की।

जम्बूद्वीप रचना के निर्माण कार्य में जयपुर के मूर्ति वेदी निर्माण करने वालों के निमित्त से बीच-बीच में व्यवधान आ जाता था उसका यथोचित निराकरण किया जाता था। उधर रथ प्रवर्तन चल रहा था, उसे भी देखना होता था। प्रतिष्ठा पर यात्रियों को ठहराने के लिए धर्मशालाओं का निर्माण कार्य भी तेजी से चल रहा था। पंचकल्याणक प्रतिष्ठा शानदार रूप से सम्पन्न हो, उसके लिए माताजी के पास भी विचार-विमर्श चलता रहता था। जम्बूद्वीप रचना की भव्यता को देखकर कुछ अकारणिक विद्वेषीजन झूठी भ्रांतियाँ भी फैलाते रहते थे, उनका भी समय-समय पर निराकरण किया गया।

जम्बूद्वीप रचना पूर्णरूप से शास्त्रोक्त बने, इस बात पर माताजी पूरा ध्यान रखती थीं। उनका ग्रंथ लेखन तथा स्वाध्याय भी निराबाध रूप से चल रहा था। भव्य समारोहपूर्वक ९ अगस्त से गुजरात में रथ प्रवर्तन प्रारंभ हुआ। १४ अक्टूबर से आसाम में ज्ञानज्योति का प्रवेश हुआ। आसाम में मैं (ब्र. मोतीचंद), रवीन्द्र कुमार, कु. माधुरी तथा सुधर्मचंद जी-तिवरी (म.प्र.) रथ प्रवर्तन में साथ में थे। प्रभावनापूर्वक नगर-नगर में प्रवर्तन हो रहा था। उसी मध्य राजधानी दिल्ली में ३१ अक्टूबर १९८४ को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी जी को उनके ही निवास पर उनके ही अंगरक्षक ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी, जिससे सारे देश में हाहाकार मच गया। साधुवर्ग को भी इस घटना से आघात पहुँचा ाqकन्तु होनहार को कौन टाल सकता है। अगले दिन इन्दिरा गांधी के पुत्र श्री राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद पर आसीन किया गया। इस घटना से एक सप्ताह तक रथ प्रवर्तन में भी मायूसी का वातावरण रहा।

२४ नवम्बर १९८४ से उत्तरप्रदेश में ज्योति प्रवर्तन का शुभारंभ माताजी की जन्मभूमि टिकैतनगर से हुआ। ज्योतिरथ का स्वागत करने के लिए उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री नारायणदत्त तिवारी अपने वरिष्ठ सहयोगी मंत्री प्रो. वासुदेव सिंह के साथ हेलीकॉप्टर से पधारे। विशाल पंडाल में आकर रथ पर स्वस्तिक बनाकर, श्रीफल चढ़ाकर, आरती उतारकर स्वागत किया। सभा समापन पर उन्होंने कहा कि ‘‘मुझे ज्ञानमती माताजी के उस घर के दर्शन करना है, जहाँ विश्व की माता, अवध की अनमोल मणि ज्ञानमती माताजी ने जन्म लिया था। उनके कहते ही बिना पूर्व सूचना तथा व्यवस्था के उनको उस घर में ले जाया गया। वहाँ उन्होंने उस पवित्र भूमि को नमन किया, अतीव हर्ष व्यक्त किया, थोड़ा प्रसाद भी खाया। हस्तिनापुर में रत्नमती माताजी तथा ज्ञानमती माताजी इस समाचार को सुनकर अतीव हर्षित हुर्इं। उनका आशीर्वाद टिकैतनगर की विशाल सभा में उस समय पढ़कर सुनाया गया था।

[सम्पादन]
चातुर्मास के पश्चात्-

नियमसार ग्रंथ की स्याद्वाद चन्द्रिका नामक संस्कृत टीका-माताजी ने सन् १९७८ में वैशाख शुक्ला ३ (अक्षय तृतीया) के शुभ दिन आचार्य कुन्दकुन्दकृत नियमसार की संस्कृत टीका लिखना प्रारंभ किया था किन्तु फरवरी १९७९ में छूट गई। मात्र ७४ गाथाओं की टीका हुई थी। पाँच वर्ष के अन्तराल के पश्चात् २१ मई १९८४ को पुन: टीका लिखना प्रारंभ कर दिया और १५ नवम्बर १९८४ को मात्र साढ़े ५ माह में टीका पूर्ण कर दी। इस दिन मैं (ब्र. मोतीचंद) यहीं था। अत: उक्त टीका की हस्तलिखित प्रति को पालकी में विराजमान करके जुलूस निकाला।

[सम्पादन]
पूज्य आर्यिका श्री रत्नमती माताजी की सल्लेखना-

मगसिर शुक्ला चतुर्थी, २६ नवम्बर १९८४ से रत्नमती माताजी का स्वास्थ्य विशेष रूप से ढीला होने लगा। धीरे-धीरे स्वास्थ्य गिरता गया। पूज्य बड़ी माताजी ने समझ लिया कि अब इनकी विशेषरूप से देखभाल करना आवश्यक है। अब इनका शरीर जवाब दे रहा है। अस्वस्थ होते हुए भी रत्नमती माताजी अपनी दैनिक क्रियाओं में सावधान थीं। आहार छूटता जा रहा था। उन्हें निरन्तर स्वाध्याय-भक्तिपाठ आदि सुनाया जा रहा था। माघ वदी ९ दिनाँक १५ जनवरी १९८५ को णमोकार महामंत्र सुनते-सुनते अत्यंत शांत परिणामों से स्वर्गसिधार गर्इं। १३ संतानों को जन्म देने के बाद १३ वर्ष तक १३ प्रकार के चारित्र का अच्छी तरह पालन करते हुए स्त्रीपर्याय को सार्थक कर लिया।

पूज्य रत्नमती माताजी की समाधि के पश्चात् अप्रैल १९८५ में होने वाली जम्बूद्वीप पंचकल्याणक प्रतिष्ठा निर्र्विघ्न एवं सानंद सम्पन्न हो, इसके लिए माताजी ने १५ अप्रैल १९८५ से २१ अप्रैल १९८५ तक प्रतिदिन अनेक विधान कराये। इस मध्य माताजी ने अनेक पूजाओं की रचना की। जम्बूद्वीप पूजा, हस्तिनापुर पूजा, आदिनाथ पूजा आदि। और भी बहुुत सारा लेखन कार्य किया। बीच-बीच में प्रतिष्ठा समिति की बैठके भी होती रहीं। प्रतिष्ठा के चार माह पूर्व से हस्तिनापुर में कार्योें की अधिकता से ज्ञानज्योति प्रवर्तन में मेरा व रवीन्द्र कुमार का जाना कम हो गया तो संघस्थ ब्र. कु. माधुरी ने अनेकों स्थानों पर जाकर कुशल संचालन किया। इससे पहले भी कुमारी माधुरी (वर्तमान आर्यिका श्री चंदनामती माताजी) ने अनेकों नगरों, शहरों में जाकर अपने ओजस्वी प्रवचनों से महती प्रभावना की। स्थाईरूप से संचालन पं. सुधर्मचंद जी शास्त्री कर ही रहे थे।

[सम्पादन]
उ.प्र. के मुख्यमंत्री का जम्बूद्वीप स्थल पर आगमन-

४ मार्च १९८५ को उ.प्र. के मुख्यमंत्री श्री नारायणदत्त तिवारी जम्बूद्वीप स्थल पर पधारे। उत्तर भारत के इस एकमात्र विशाल पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव को शानदार बनाने के लिए उन्होंने रत्नत्रय निलय में बैठकर माताजी से आशीर्वाद लिया। प्रतिष्ठा में बिजली, पानी, सुरक्षा आदि सरकार की तरफ से सुनिश्चित किया। नशिया मार्ग को पक्का बनाकर उसका डामरीकरण कराया। महोत्सव के लिए शासन की तरफ से मंत्री प्रोपेसर वासुदेव सिंह जी को प्रभारी बनाया। सुमेरु पर अभिषेक के लिए सरकार की तरफ से फोल्डिंग पाइप की सीढ़ियाँ बनाई गर्इं।

[सम्पादन]
मुनिसंघ पदार्पण तथा पंचकल्याणक प्रतिष्ठा का झण्डारोहण-

आचार्यश्री धर्मसागर जी संघस्थ कुछ मुनि-आर्यिकावृंद २२ अप्रैल को जम्बूद्वीप स्थल पर पधारे। उसी दिन झण्डारोहण हुआ तथा रथयात्रापूर्वक भगवान पाण्डाल में विराजमान किये गये। २२ अप्रैल से ही प्रतिष्ठा का कार्यक्रम प्रारंभ हो गया। २६ से २८ अप्रैल तक अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया। २८ अप्रैल को ज्ञानज्योति रथ की शोभायात्रा निकालकर रथ प्रवर्तन का समापन जम्बूद्वीप स्थल पर हुआ। उसी दिन जम्बूद्वीप रचना के सामने तत्कालीन रक्षामंत्री श्री पी.वी. नरसिंहाराव ने ज्ञानज्योति की अखण्ड स्थापना की।

२८ अप्रैल से २ मई तक बहुत भारी प्रभावनापूर्वक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई जिसका वर्णन शब्दों में करना कठिन है। ३० अप्रैल १९८५ को प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री नारायणदत्त तिवारी ने पूज्य माताजी से आशीर्वाद प्राप्त कर जम्बूद्वीप रचना का उद्घाटन किया।

[सम्पादन]
पूज्य माताजी गणिनी पद से विभूषित-

१ मई १९८५ को भगवान ने केवलज्ञान कल्याणक के पश्चात् माताजी की शिष्या आर्यिका श्री जिनमती माताजी ने ‘गणिनी’ पद की क्रियाएं करवाकर ‘गणिनी’ पद से विभूषित किया। यह आर्यिकाओं में सर्वोच्च पद होता है। २ मई को जम्बूद्वीप रचना के सामने अखण्ड ध्वज की स्थापना हुई, तब से निरंतर वह ध्वज लहराता रहता है। ११ वर्ष पूर्व पूज्य माताजी ने जिसका बीजारोपण किया था, वह आज २ मई १९८५ को वृक्ष बनकर फलित हुआ, जिसे देखकर माताजी तथा हम सबको अपार हर्ष हुआ। बीच में कुछ विघ्न आये भी और चले गये। उनसे कार्य रुका नहीं, प्रत्युत् अतीव प्रभावना हुई।

२ मई को जम्बूद्वीप रचना में समस्त प्रतिमाएँ विराजमान होने के पश्चात् माताजी ने समस्त कार्यकर्ताओं को बहुत-बहुत मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। २४ जून से ३ जुलाई तक तीन मूर्ति मंदिर में एक साथ ३ इन्द्रध्वज मण्डल विधान हुए, तीन मण्डल मांडे गये, तीनों के अलग-अलग यजमान थे।

[सम्पादन]
तीसवाँ चातुर्मास (सन् १९८५, जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर, उ.प्र.)

१ जुलाई १९८५, आषाढ़ शुक्ला १४ को माताजी ने जम्बूद्वीप स्थल पर वर्षायोग की स्थापना की। जम्बूद्वीप स्थल पर जम्बूद्वीप रचना के अवशेष कार्य तथा अन्य निर्माण कार्य चल रहे थे। स्वाध्याय, पठन-पाठन भी चल रहे थे। १ अगस्त-भादों कृ. दूज से माताजी ने जम्बूद्वीप विधान बनाना प्रारंभ किया। कुछ ही पूजाएँ शेष रह गर्इं थीं कि भादों शुक्ला १२ को माताजी को बुखार आना प्रारंभ हो गया। धीरे-धीरे हालत बिगड़ती गर्ई। कई वैद्य बुलाये गये किन्तु स्थिति और नाजुक हो गई। गंभीर स्थिति को देखते हुए १९ नवम्बर को मेरठ से डॉ. ए.पी. अग्रवाल को बुलाया गया। उन्होंने ठीक से जांच करके पीलिया घोषित कर दिया।

अगले दिन से उल्टी तथा बुखार की दवाई बंद करके पीलियासंबंधी दवाई प्रारंभ की गई। जो कासनी के बीज, सौंफ आदि की ठंडाई लीवर को ठीक करने के लिए आर्यिका रत्नमती माताजी को पहले दी गई थी, वह देना प्रारंभ किया गया। उसके बाद थोड़ा-थोड़ा गन्ने का रस भी दिया गया। धीरे-धीरे उल्टी होना बंद हुई। पेट में आहार रुकने लगा। स्वस्थता आते-आते पूरा चातुर्मास बीत गया। जिस कासनी के बीज आदि की ठंडाई से माताजी को पुनर्जीवन प्राप्त हुआ, वह ठंडाई अभी भी उन्हें आहार में दी जाती है। लीवर को ठीक रखने में यह ठण्डाई रामबाण औषधि है।

माताजी की अस्वस्थता के मध्य ही माताजी के परमभक्त संस्थान के मंत्री श्री अमरचंद जैन होमब्रेड-मेरठ ने १८ से २७ अक्टूबर १९८५, आश्विन शुक्ला ५ से १५ (शरदपूर्णिमा) तक इन्द्रध्वज मण्डल विधान का विशाल आयोजन किया। इस शरदपूर्णिमा पर माताजी के जन्म के ५१ वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में स्वर्ण जयंती महोत्सव के रूप में बहुत उत्साह के साथ मनाया किन्तु अत्यन्त कमजोरी के कारण माताजी पांडाल में नहीं जा सकीं। सभी ने माताजी के पास त्यागीभवन में ही जाकर आशीर्वाद लिया। १३ अक्टूबर १९८५ को अ.भा.दि. जैन युवा परिषद की कार्यकारिणी की बैठक पूज्य माताजी के सानिध्य में हुई, जिसमें ब्र. रवीन्द्र कुमार को युवा परिषद का राष्ट्रीय अध्यक्ष मनोनीत किया गया। माताजी ने धर्म, धर्मात्मा तथा धर्मायतनों की रक्षा के लिए अपना आशीर्वाद प्रदान किया।

कार्तिक अष्टान्हिका में १७ से २७ नवम्बर १९८५ तक श्री मदनलाल जैन, टिकैतनगर ने यहाँ तीन मूर्ति मंदिर में इन्द्रध्वज विधान किया। १९ नवम्बर को ही ‘पीलिया’ रोग घोषित हुआ था। विधान में माताजी की स्थिति उठकर बैठने की नहीं थी अत: अपने कमरे में लेटकर ही पूजाएँ सुनती थीं। वे पूजाएं तथा उनकी जयमालाएं औषधि का काम कर रही थीं।

[सम्पादन]
इक्तीसवाँ चातुर्मास (१९८६-जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर में)

१४ जुलाई से २२ जुलाई तक होने वाले इन्द्रध्वज विधान के मध्य २० जुलाई को माताजी ने चातुर्मास की स्थापना की। इसमें दो मंडल एक साथ बनाये गये। एक आनंदप्रकाशजी (सोरम वाले) दिल्ली वालों की ओर से तथा दूसरा प्रकाशचंद- सुभाषचंद जैन टिवैâतनगर की तरफ से। सौ. श्रीमती जैन ध.प. प्रेमचंद जैन बहराइच वालों ने भादों वदी ३ से १२, तदनुसार २२ अगस्त से १ सितंबर तक बहराइच में इन्द्रध्वज विधान कराया उसमें माताजी ने मुझे (ब्र. मोतीचंद) रवीन्द्र कुमार तथा माधुरी को भेजा। वहाँ अच्छी धर्मप्रभावना हुई। सन् १९८३ से कई बार माताजी के भाव ‘कल्पद्रुम’ विधान बनाने के हुए। उसमें लिखी जाने वाली पूजाओं की रूपरेखा भी माताजी ने लिखी किन्तु पहले व्यस्तता के कारण तथा बाद में अस्वस्थता के कारण वह कार्य संभव नहीं हो सका। एक दिन अस्वस्थ अवस्था में माताजी ने माधुरी से कहा कि मेरे बाद तुम इस विधान को बनाना। माधुरी ने कहा-माताजी! आप जल्दी स्वस्थ होकर आप ही बनावेंगी। विधान तो क्या, और भी बहुत सारे धर्मप्रभावना के कार्य आपके द्वारा होना है।

थोड़ी स्वस्थता प्राप्त होते ही माताजी के मस्तिष्क में ८ जुलाई १९८६ आषाढ़ शु. १ की रात्रि में रूपरेखा प्रस्पुâटित हुई और ९ जुलाई को प्रात: ५:४५ पर रत्नत्रय निलय में ‘’ऊँ नम: सिद्धेभ्य:’’ लिखकर विधान पूजा लिखना प्रारंभ कर दिया और मन में यह सोचा कि जब भक्तामर स्तोत्र की रचना से मानतुंगाचार्य के ४८ ताले टूट गये, एकीभावस्तोत्र की रचना से वादिराज मुनिराज का कुष्ठ रोग दूर हो गया, तो इस महान कल्पद्रुम विधान की रचना से मेरा शरीर स्वस्थ हो जावे, तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है! और हुआ ऐसा ही, १७ अक्टूबर१९८६ की शरदपूर्णिमा के दिन रचना पूर्ण हो गई, माताजी के हर्ष का पार नहीं रहा, वह दिन माताजी का ५३वाँ जन्मदिन था, उसी दिन माताजी ने तीनलोक विधान की रचना प्रारंभ कर दी।

१७ से १९ अक्टूबर तक त्रिदिवसीय जन्मदिवस का कार्यक्रम आयोजित किया गया। दिल्ली तथा आसपास के अनेक नगरों से बसें आयीं। मध्य प्रदेश तथा अवध प्रांत से अनेक भक्तगण पधारे, अनेक विद्वान भी आये। उल्लासपूर्ण वातावरण में माताजी का जन्मदिन मनाया गया। अनेकों वक्ताआें ने माताजी के प्रति विनयांजलि समर्पित करते हुए उनके दीर्घ जीवन की मंगल कामना की। माताजी ने सभी को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। इस प्रकार विविध उपलब्धियों के साथ वर्षायोग पूर्ण हुआ।

[सम्पादन]
आचार्य श्री विमलसागर जी महाराज का ससंघ हस्तिनापुर में मंगल पदार्पण-

मुझे दीक्षा प्रदान करने के लिए तथा पंचकल्याणक प्रतिष्ठा सम्पन्न कराने के लिए वात्सल्यरत्नाकर आचार्य श्री विमलसागर जी महाराज का ससंघ १ मार्च १९८६ फाल्गुन शुक्ला दूज को जम्बूद्वीप स्थल हस्तिनापुर में मंगल पदार्पण हुआ। संघ के आगमन से माताजी तथा हम लोगों को अतीव हर्ष हुआ। माताजी की प्रेरणा से नवनिर्मित तीन लोक विधान २० फरवरी से मैंने प्रारंभ किया था, वह १ मार्च को आचार्यश्री के समक्ष पूर्ण हुआ।

२ मार्च से पंचकल्याणक प्रतिष्ठा प्रारंभ हो गई। झण्डारोहण से पंचकल्याणक के समस्त कार्यक्रम माताजी तथा आचार्यसंघ के सानिध्य में क्रमश: सम्पन्न होने लगे। ८ मार्च रविवार, फाल्गुन शुक्ला ९ का वह शुभ दिन आ गया। प्रात: पंचकल्याणक प्रतिष्ठा के अंतर्गत जन्मकल्याणक मनाया गया। सुमेरू की पांडुकशिला पर जन्माभिषेक हुआ। मध्यान्ह में श्रीविमल मंडप में विशाल जनसमूह के मध्य आचार्यश्री ने मेरी क्षुल्लक दीक्षा की विधि प्रारंभ की, दीक्षा संस्कार करके ‘‘क्षुल्लक मोतीसागर’’ नाम घोषित किया। समारोह के मुख्य अतिथि तत्कालीन केन्द्रीय रेलमंत्री श्री माधवराव सिंधिया थे।

दीक्षा के अवसर पर गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी ने बहुत ही मार्मिक उद्गार व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि- ‘‘मैंंने सनावद में अमोलकचंद जैनरूपी सागर से मोती को लिया था, आज आचार्यश्री ने पुन: मोती को सागर से जोड़कर ’’क्षुल्लक मोतीसागर’’ बना दिया।’’ ९ मार्च को माँ रूपाबाई तथा संघस्थ कु. माधुरी ने आचार्य श्री विमलसागर जी, उपाध्याय श्री भरतसागर जी, गणिनी ज्ञानमती माताजी तथा (मुझे) नवदीक्षित क्षुल्लक मोतीसागर आदि ९ साधुओं का पड़गाहन कर आहार दिया। ११ मार्च-फाल्गुन शु. ११ को मोक्षकल्याणकपूर्वक प्रतिष्ठा विधि सम्पन्न हुई। पूज्य माताजी की भावनानुसार मुझे हस्तिनापुर में ही छा़ेडकर १७ मार्च १९८७, चैत्र कृष्णा दूज को आचार्यसंघ का मेरठ की तरफ मंगल विहार हो गया। आचार्यसंघ के साथ ३४ साधु-साध्वी थे।

२२ अप्रैल-वैशाख कृष्णा ९ को सीकर (राज.) में चारित्र चक्रवर्ती आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज की परम्परा के तृतीय पट्टाधीश आचार्य श्री धर्मसागरजी महाराज का समाधिपूर्वक स्वर्गारोहण हो गया। उसके अगले दिन माताजी के सानिध्य में हस्तिनापुर में उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की गई। अनंतर ६ मई, वैशाख शु. ८ को उपाध्याय श्री अजितसागर जी महाराज के लिए आचार्यपद की घोषणा की गई। ७ जून, ज्येष्ठ शुक्ला १० को उदयपुर में विशाल जनसमुदाय तथा चतुर्विध संघ के सानिध्य में चतुर्थ आचार्यपट्ट प्रदान किया गया। आचार्य श्रीधर्मसागर जी महाराज की समाधि के एक माह बाद ही आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी महाराज की उनकी जन्मभूमि कोथली में ही (२८ मई १९८७ ज्येष्ठ शुक्ला १ को) समाधि होने के समाचार अचानक प्राप्त कर पूज्य माताजी तथा संघ के सभी लोग हतप्रभ रह गये। समाचार प्राप्त होने पर पूज्य माताजी के सानिध्य में उनके प्रति भी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की गई । आचार्यश्री ने पूज्य माताजी को १९५३ में श्री महावीर जी में क्षुल्लिका दीक्षा देकर ‘’क्षुल्लिका वीरमती’’ नाम प्रदान किया था।

[सम्पादन]
गुजरात में शिक्षण शिविर-

गुजरात प्रदेश के धर्मनिष्ठ महानुभावों के विशेष निवेदन पर पूज्य माताजी के आशीर्वाद से दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, हस्तिनापुर द्वारा ३१ मई से ८ जून १९८७ तक अहमदाबाद में एक विशाल शिक्षण शिविर का आयोजन पूरे गुजरात प्रदेश के स्तर पर आयोजित किया गया। जिसमें अनेक नगरों से १००० से अधिक स्त्री-पुरुषों तथा बालक- बालिकाओं ने भाग लिया। उसमें माताजी की शिष्या कु. माधुरी (वर्तमान आर्यिका श्री चंदनामती माताजी) के साथ अनेक विद्वानों ने वहाँ जाकर शिक्षण प्रदान किया। उस शिविर को तथा चंदनामती माताजी को आज भी गुजरात वाले याद करते हैं। वैसा शिविर न उससे पहले न उसके बाद आज तक हुआ। उस शिविर के माध्यम से हस्तिनापुर के वीरसागर विद्यापीठ में १५-२० विद्यार्थी पढ़ने के लिए आये थे।

[सम्पादन]
इन्द्रध्वज विधान एवं प्रशिक्षण शिविर-

ज्येष्ठ शु. १२ दिनाँक १९ जून से श्री अमरचंद जैन-होमब्रेड ने तीसरी बार माताजी के सानिध्य में इन्द्रध्वज विधान कराया। इसी मध्य अमरचंद जी ने विद्वानों के लिए प्रशिक्षण शिविर का भी आयोजन रखा, जिसमें ५० विद्वानों ने तत्त्वार्थसूत्र तथा दशधर्मों पर प्रवचनों का प्रशिक्षण प्राप्त किया। इस शिविर के कुलपति प्राचार्य श्री नरेन्द्र प्रकाश जी-फिरोजाबाद को बनाया गया था।

माताजी के आदेशानुसार १४ से २१ मई १९८६ तक निकटवर्ती सरधना नगर में शिक्षण शिविर का आयोजन किया गया, जिसमें मैंने (ब्र. मोतीचंद ने) भी वहाँ जाकर बालक-बालिकाओं तथा प्रौढ़ वर्ग में धर्म के संस्कार डाले। अभी तक जम्बूद्वीप रचना के अवशेष कार्य पूरे किये जा रहे थे। वेदियों में शीशे के पल्ले लगाकर १७ जुलाई तक तीन बार में समस्त प्रतिमाएँ विराजमान कर दी गर्इं, जिससे माताजी के मन में बड़ा संतोष हुआ।

[सम्पादन]
चातुर्मास के पश्चात्-

दीक्षा के लिए श्रीफल चढ़ाकर प्रार्थना-मैंने (ब्र. मोतीचंद ने) २१ फरवरी १९८६- माघ शु०१२ को पूज्य माताजी के समक्ष श्रीफल चढ़ाकर निवेदन किया कि माताजी! मैं क्षुल्लक दीक्षा लेना चाहता हूँ, मुझे आज्ञा प्रदान कीजिये। माताजी ने कुछ देर सोच -विचार करके उचित समय जानकर सहर्ष स्वीकृति प्रदान कर दी। उस समय माताजी ने वात्सल्यवश यह भी कहा कि ’‘आचार्यसंघ को हस्तिनापुर लाकर यहीं दीक्षा लो।’’ माताजी के आदेशानुसार रवीन्द्र कुमार, जिनेन्द्र प्रसाद ठेकेदार तथा कैलाशचन्द करोलबाग आदि श्रावकजन विमलसागर जी महाराज से निवेदन करने २७ फरवरी को इन्दौर गये। आचार्यश्री से निवेदन करके २ मार्च को वापिस आकर माताजी को बताया कि ‘’आचार्यश्री इन्दौर से फिरोजाबाद जाकर वहाँ से चातुर्मास करने के पश्चात् हस्तिनापुर आकर दीक्षा प्रदान करेंगे।’’ अर्थात् एक वर्ष बाद दीक्षा हो सकेगी। फिरोजाबाद चातुर्मास के मध्य मैं भादों वदी १२, १ सितम्बर को रवीन्द्र कुमार तथा पं. सुधर्मचंद जी के साथ फिरोजाबाद गया। आचार्यश्री के समक्ष श्रीफल चढ़ाया। आचार्यश्री ने कहा-फाल्गुन (मार्च) में दीक्षा का मुहूर्त है। दीक्षा के लिए एक वर्ष का समय निकालना भारी महसूस हो रहा था, फिर भी समय निकालना ही पड़ा। ५ सितम्बर-भादों सुदी १ को पिता श्री अमोलक चन्द जी सर्राफ का स्वर्गवास हो गया। पिता के वियोग का दुःख तो हुआ ही, उसके अतिरिक्त मन में कई दिन तक यह भी खेद रहा कि ’‘मैं उनके सामने दीक्षा नहीं ले सका’। ५ सितम्बर भादों सुदी १ से १६ सितंबर भादों सुदी १३ तक श्री पल्टूमल जैन दिल्ली व उनके दामाद श्रीराजकुमार जैन वीरा बिल्डर्स दिल्ली ने पूज्य माताजी के सानिध्य में तीनमूर्ति मन्दिर में इन्द्रध्वज विधान किया। मध्य के समय का सदुपयोग करते हुए मैंने तीर्थयात्रायें की पुन: १२ अक्टूबर १९८६ आश्विन शु. १० (विजयादशमी) को फिरोजाबाद जाकर दीक्षा की तिथि सुनिश्चित करने के लिए आचार्यश्री विमलसागरजी महाराज के समक्ष श्रीफल चढ़ाया। आचार्य महाराज ने ८ मार्च-फाल्गुन शुक्ला ९, रविवार को दीक्षा का शुभ मुहूर्त बतलाया। मेरे साथ वहाँ रवीन्द्र कुमार, जिनेंद्र प्रसाद ठेकेदार, राजेन्द्र प्रसाद कम्मोजी दिल्ली एवं सुरेश चंद गोटे वाले गये थे। बीच-बीच में मैं यात्राएँं करता रहा। १९ अक्टूबर को माताजी का ५३वाँ जन्मदिन विशेष समारोहपूर्वक मनाया गया। मेले का आयोजन किया गया था। २० अक्टूबर को हस्तिनापुर से हरिद्वार होकर बद्रीनाथ की यात्रा करके २५ अक्टूबर को वापस सकुशल हस्तिनापुर आ गये।

[सम्पादन]
कमल मंदिर का शिलान्यास-

२६ अक्टूबर १९८६ दिन रविवार, भादों वदी ८ के शुभ दिन श्री राजकुमार जैन वीराबिल्डर्स एवं श्रीपल्टूमल जैन दिल्ली ने कमल मंदिर का शिलान्यास किया, यहीं पर प्रारंभ में एक कमरा बनाकर भगवान महावीर स्वामी की कल्पवृक्षस्वरुप सवा नौ फुट उत्तुंग खड़्गासन प्रतिमा विराजमान की गयी थीं, इसी को घेरकर चारों तरफ कमलाकार मंदिर बनाया गया। प्रतिमा जहाँ की तहाँ खड़ी रहां, कमरे के चारों तरफ की दीवारें हटा दी गयां। रवीन्द्र कुमार जी ने मेरी दीक्षा के साथ पंचकल्याणक प्रतिष्ठा की भी घोषणा कर दी। भगवान नेमिनाथ तथा पाश्र्वनाथ की विशाल प्रतिमाएँ लाई गयीं। २५ फरवरी से यात्राओं का सिलसिला बंद हुआ। ८ फरवरी १९८७ माघ शुक्ला १० को माताजी ने तीनलोक विधान लिखकर पूरा किया, उसका नाम ‘‘सर्वतोभद्र विधान’’ रखा गया।



[सम्पादन]
बत्तीसवाँ चातुर्मास (१९८७- जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर में)

१० जुलाई १९८७ आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी को माताजी ने ३५वाँ चातुर्मास जम्बूद्वीप स्थल पर स्थापित किया। उस समय १५ जुलाई से २४ जुलाई-श्रावण कृ. ५ से श्रावण कृ. १४ तक श्रीमती हीरामणी जी महमूदाबाद तथा श्री कमलचंद जैन, खारी बावली दिल्ली ने तीन मूर्ति मंदिर में दो अलग-अलग मंडल मांडकर बहुत उत्साह के साथ इन्द्रध्वज विधान किये। विधान पूजन के अतिरिक्त मध्यान्ह में छहढाला आदि की कक्षाएँ भी चलाई गर्इं।

वर्ष १९८७ में माताजी ने विविध प्रकार का लेखन कार्य किया। ‘‘कल्याण कल्पतरू स्तोत्र‘’ नाम से स्वरचित संस्कृत की चतुर्विंशति स्तुति का अन्वय अर्थ हिन्दी में, आचार्य पूज्यपादकृत संस्कृत पंचामृत अभिषेक का हिन्दी पद्यानुवाद, सकलीकरण- हवन आदि की विधि के संस्कृत श्लोकों का भावरूप पद्यानुवाद करके ‘‘मण्डल विधान प्रारम्भ विधि तथा हवनविधि’’ नाम से पुस्तक का सृजन, भगवान नेमिनाथ उपन्यास आदि का लेखन किया। इन दिनों में ‘‘मेरी स्मृतियाँ’’ नाम से एक सुंदर आत्मकथा का लेखन भी चल रहा था।

स्वास्थ्य लाभ होने के बाद माताजी का चिंतन चल रहा था कि साधु जीवन के ६ काल माने हैं-

(१) दीक्षा

(२) शिक्षा

(३) गणपोषण

(४) आत्म संस्कार

(५) सल्लेखना

(६) उत्तमार्थ।

इनमें से प्रारंभ के तीन कार्य अच्छी तरह हो चुके हैं, अब आगे चौथे का नम्बर आ रहा है अत: दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान की भावी गतिविधियों के सुदृढ़ संचालन हेतु एक नवीन रूपरेखा बनाई।

[सम्पादन]
क्षुल्लक मोतीसागर को पीठाधीश बनाया-

२ अगस्त १९८७, रविवार श्रावण शुक्ला सप्तमी को दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान की बैठक आहूत की गई, जिसमें माताजी की आज्ञा से तीन वर्ष के लिए नवीन कार्यकारिणी का मनोनयन किया गया। जिसके अन्तर्गत ब्र. रवीन्द्र कुमार को अध्यक्ष, श्री जिनेंद्रप्रसाद ठेकेदार दिल्ली को कार्याध्यक्ष, श्री गणेशीलाल रानीवाला कोटा को महामंत्री तथा कु. माधुरी को मंत्री पद का भार सौंपा गया। अब तक संस्थान के कार्योें में प्रेरणा तथा मार्गदर्शन माताजी देती रहती थीं किन्तु अब आगे से क्षुल्लक मोतीसागर पर यह भार डाला जा रहा है, उन्हें स्थाईरूप से ‘‘पीठाधीश’’ पद पर प्रतिष्ठापित किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त संस्थान की गतिविधियों को सुचारूरूप से देखने व चलाने के लिए एक ‘‘स्थाई समिति’’ का भी गठन किया गया, जिसमें सात व्यक्तियों को स्थाईरूप में लिया गया। इस भावी व्यवस्था की उपस्थित सभी महानुभावों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की। अगले दिन स्थाई समिति के सदस्यों ने पीठाधीश क्षुल्लक मोतीसागर का पादप्रक्षाल करके नूतन वस्त्र-चादर-लंगोट अर्पित किये। पूज्य माताजी ने नवीन पिच्छी प्रदान कर मंगल आशीर्वाद दिया।

[सम्पादन]
इस वर्ष का दशलक्षण पर्व-

इस वर्ष १९८७ में माताजी ने रवीन्द्र कुमार को डॉ. श्रेयांस कुमार बड़ौत के साथ तलौद (गुजरात), कु. माधुरी को बड़ौदा तथा पं. सुधर्मचंद, पं. प्रवीण चंद, पं. नरेश कुमार को भी गुजरात ही दशलक्षण पर्व में प्रवचन करने के लिए भेजा, अच्छी प्रभावना हुई। हस्तिनापुर में मैंने तत्वार्थसूत्र तथा दशधर्मोंं पर प्रवचन किये। आश्विन कृष्णा ७ से आश्विन शुक्ला १, दिनाँक १४ से २४ सितम्बर तक श्री पुतानचंद जैन फतेहपुर वालों ने सपरिवार इन्द्रध्वज विधान किया।

आश्विन कृष्णा १४ (दि. २१ सितम्बर १९८७) को मेरा ४८वाँ जन्मदिन था। उस समय सनावद (म.प्र.) से (माँ) रूपाबाई तथा (बहन) किरणबाई चौधरी यहाँ आई हुई थीं। उन्होंने स्नेहवश जन्मदिवस का एक छोटा सा कार्यक्रम पूज्य माताजी से आज्ञा लेकर रख दिया। मैंने कहा-माताजी के समक्ष मेरे जन्मदिवस का कार्यक्रम अच्छा नहीं लगता। इस पर माताजी ने कहा कि-बेटे-बेटियों का माता के सामने गुणगान होता है, तो अच्छा ही है, होने दो।

शरदपूर्णिमा आ रही थी ७ अक्टूबर बुधवार को किन्तु दिल्ली तथा आसपास के शहर वालों की सुविधा को देखते हुए ४ अक्टूबर रविवार आश्विन शुक्ला १२ को ही पूज्य माताजी के ५४ वें जन्मजयंती महोत्सव का कार्यक्रम आयोजित किया गया। दिल्ली, पूर्वी उत्तरप्रदेश, पश्चिमी उत्तरप्रदेश, म.प्र., राजस्थान, महाराष्ट्र, आसाम, हरियाणा आदि अनेक प्रदेशों के नगरों व शहरों से हस्तिनापुर आकर भक्तों ने जन्मजयन्ती समारोह में भाग लिया। पूज्य माताजी अपने प्रत्येक जन्मदिवस पर यह अवश्य बताती हैं कि शरद पूर्णिमा के दिन केवल मेरे शरीर का ही जन्म नहीं हुआ प्रत्युत् त्याग और संयम का भी आज ही जन्म हुआ था। सन् १९५२ में बाराबंकी (उ.प्र) में शरदपूर्णिमा के दिन ही आजीवन ब्रह्मचर्यव्रत तथा गृहत्यागरूप सप्तम प्रतिमा के व्रत प्राप्त किये थे पुन: ७ अक्टूबर शरदपूर्णिमा को संघ के ब्रह्मचारी-ब्रह्मचारिणी शिष्यों ने तथा संस्थान के सदस्यों ने माताजी के पादप्रक्षाल करके पूजन की तथा ५४ दीपकों से आरती उतारी। उसी दिन संस्थान की ‘‘स्थाई समिति’’ के सदस्यों ने पीठाधीश क्षुल्लक मोतीसागर को (मुझे) रजत प्रशस्ति पत्र भेंट की, जिसे रत्नत्रय निलय-त्यागीभवन में लगा दिया गया।

जन्म जयंती के पावन अवसर पर श्री पुरुषोत्तमदास जैन जगाधरी (हरियाणा) वालों ने २ अक्टूबर-आश्विन शुक्ला १० से ११ अक्टूबर कार्तिक वदी ५ तक इन्द्रध्वज विधान किया। २० अक्टूबर १९८७ कार्तिक वदी १३ को महावीर मंदिर में विराजमान छोटी प्रतिमाओें को वहाँ से लाकर तीन मूर्ति मंदिर में अस्थाई अलमारी बनाकर उसमें लोहे का मजबूत दरवाजा लगाकर उसमें विराजमान किया गया। वे प्रतिमाएँ अभी भी उसी अस्थाई अलमारी में विराजमान हैं।

इस अक्टूबर माह में यहाँ के अतिरिक्त लखनऊ में श्री कैलाशचंद सर्राफ टिकैतनगर वालों ने, आश्विन शुक्ला में श्री वीरेन्द्र कुमार जैन ने, उसके बाद निकटवर्ती दरियाबाद में इन्द्रध्वज विधान हुये। देश में अन्यत्र भी अनेकों नगरों में इन्द्रध्वज विधान हो रहे थे। इन्द्रध्वज विधानों की सर्वत्र धूम सुनकर माताजी को बहुत प्रसन्नता होती थी क्योंकि वह उनके द्वारा ही भक्ति से रचे गये पदों की रचना थी।

[सम्पादन]
अद्वितीय जम्बूद्वीप मंडल विधान पूजन-

देश में सर्वत्र मंदिर या पंडाल में मंडल विधान की रचना करके पूजा की जाती है किन्तु यहाँ जम्बूद्वीप स्थल पर साक्षात् जम्बूद्वीप रचना के सामने पंडाल बनाकर उसमें पूजा करते हुए जम्बूद्वीप रचना में यथास्थान १००८ अघ्र्य व जयमाला में श्रीफल चढ़ाये गये। यह विधान २७ अक्टूबर १९८७ कार्तिक शुक्ला ५ से प्रारंभ होकर कार्तिक शु. १४ दिनाँक ४ नवम्बर तक हुआ। इसके आयोजनकर्ता परमगुरुभक्त श्रीआनंद प्रकाश जैन (सोरम वाले) गांधी नगर दिल्ली थे, उनके साथ अनेक श्रावकों ने भी विधान-पूजन में भाग लिया। इस प्रकार के विधान का पहला ही अवसर था, बहुत ही आनंद आया। उसके बाद फिर उस प्रकार का विधान जम्बूद्वीप रचना के सामने नहीं हो सका।

[सम्पादन]
चातुर्मास के पश्चात्-

प्रतिदिन माताजी के सानिध्य में हम लोग स्वाध्याय पढ़ते थे। यात्रियों के लिए प्रात:-मध्यान्ह में प्रवचन भी होते थे। माताजी विभिन्न विषयों के लेखन में लगी रहती थांr। मेरे पास ग्रंथों की प्रूफरीडिंग का विशेष कार्य रहता था। निर्माण कार्यों को कराने, बाहर जाने-आने में, ऑफिस के कार्यों में रवीन्द्र कुमार व्यस्त रहते थे। कु. माधुरी संघ की परिचर्या के अतिरिक्त माताजी के आदेशानुसार नूतन रचनाओं का सृजन तथा प्रतिमाह सम्यग्ज्ञान पत्रिका के लिए लेख-कविताएँ लिखती रहती थीं।

[सम्पादन]
जम्बूद्वीप स्थल पर पहली बार कल्पद्रुम विधान का आयोजन-

सन् १९८६ की आश्विन शुक्ला १५ (शरदपूर्णिमा) के शुभ दिन मात्र साढ़े तीन माह में यह कल्पद्रुम विधान लिखकर माताजी ने तैयार कर दिया था। इस समय छोटीसा टिकैतनगर उस हस्तलिखित प्रति को अपने हाथ में रखकर रथ में बैठे थे, तभी उन्होंने कह दिया था कि- ‘‘माताजी! मैं ही इस विधान को छपवाऊंगा और मैं ही सबसे पहले आपके सानिध्य में जम्बूद्वीप स्थल पर कराऊंगा।’’ तदनुसार उन्हें ही जम्बूद्वीप स्थल पर माताजी के सानिध्य में पहली बार इस विधान को करने का अवसर प्राप्त हुआ। २४ फरवरी १९८८ फाल्गुन शुक्ला ८ से १५ तक यह विधान तीनमूर्ति मंदिर में बहुत ठाठ-बाट के साथ सम्पन्न हुआ। छोटीसा सहित ५ महानुभावों को चक्रवर्ती बनाया गया। गोलाकार सुंदर समवसरण की रचना की गई। धातु से नवनिर्मित गंधकुटी, मानस्तंभ, तोरणद्वार, ध्वजाएं, चैत्यवृक्ष, सिद्धार्थवृक्ष आदि मंडल पर पहली बार रखे गये जिससे अद्भुत शोभा व्याप्त हो गई। विधान में लिखित विधि के अनुसार चारों प्रकार का दान लगातार ८ दिन तक खूब बांटा गया, इस अवसर पर योगीराज फूलचंद जैन छतरपुर (म.प्र.) को बुलाया गया था, वे प्राणयाम तथा योग में पूर्ण निष्णात हैं, उन्होंने अनेक प्रकार के रोगों के लिए अनेक प्रकार के योग तथा प्राणायाम सिखाये। उससे सीखने वालों को स्वास्थ्य लाभ हुआ। सन् १९८८ में चैत्र वदी ९ को प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की जन्मजयंती मनाने की विशेष प्रेरणा माताजी ने जनमानस को दी और उसका कारण यह बताया कि इससे आम जनता की यह भ्रांत धारणा दूर होगी कि २४ वें तीर्थंकर भगवान महावीर जैनधर्म के संस्थापक हैं क्योंकि चौबीसवें तीर्थंकर संस्थापक नहीं हो सकते, भगवान महावीर से पहले २३ तीर्थंकर हो चुके हैं। जम्बूद्वीप स्थल पर भी ऋषभदेव जन्मजयंती मनाई गई।

[सम्पादन]
समय-समय पर विशेष प्रवचन-

जम्बूद्वीप स्थल पर यदा-कदा होमगार्ड, एन.सी.सी., केडेट, मिलिट्री के जवानों के समूह आते रहते थे। उन्हें माताजी को उपदेश देने में विशेष आनंद इसलिए आता था क्योंकि उन्हें मांस-मदिरा का त्याग करने की प्रेरणा दी जाती थी और जब उनमें से अधिक या थोड़े लोग त्याग कर देते थे, तब अपार हर्ष होता था। प्रतिदिन कई अजैन भी दर्शनार्थ आते रहते थे, उन्हें भी अंडे, मांस, मदिरा का त्याग करवाकर छोटा मंत्र ‘‘ॐ नम:’’ सुख-शांति के लिए देती रहती थीं। यह क्रम अब भी चलता रहता है। वर्ष के अंतर्गत आने वाले अनेक छोटे-बड़े पर्वों को माताजी यहाँ भी मनवातीं तथा आने वाले यात्रियों को भी प्रेरणा देती थीं तथा अब भी देती हैं जिससे धर्म की प्रभावना सदैव होती रहे तथा नई पीढ़ी को भी उन पर्वों की महत्ता का परिचय होता रहे।

अक्षय तृतीया मेला-भगवान ऋषभदेव का एक वर्ष के उपवास के बाद हस्तिनापुर में वैशाख शु. तीज को प्रथम आहार हुआ था, वह तिथि अक्षय तृतीया के नाम से प्रसिद्ध हो गई। उस उपलक्ष्य में श्वेताम्बर जैन समाज में वर्षीतप करने की परंपरा है। वर्षीतप करने वाले एक दिन भोजन, अगले दिन केवल पानी, यह क्रम पूरे वर्ष भर तक चलाते हैं। उस क्रम में वैशाख शु. तृतीया को वे वर्षीतप करने वाले उस दिन यहाँ अंतिम पारणा करते हैं, उस दिन प्रतिवर्ष श्वेताम्बर समाज का बड़ा मेला लगता है। माताजी की तीव्र भावना रही कि इस अवसर पर दिगम्बर समाज भी हस्तिनापुर आकर अच्छे स्तर से इस पर्व को मनावे किन्तु उनकी वह भावना अब तक भी सफल नहीं हो पाई। फिर भी माताजी की प्रेरणा से जम्बूद्वीप स्थल पर अक्षय तृतीया के दिन प्रतिवर्ष रथयात्रा निकाली जाती है। प्रसादरूप में इक्षुरस बांटा जाता है। अभी यहाँ ९ फुट उत्तुुंग खड्गासन भगवान ऋषभदेव की आहारदान की प्रतिमा तीन कल्याणकों से प्रतिष्ठित विराजमान है और साथ में राजा श्रेयांस आहार देते हुए खड़े किये हैं। उसी उपलक्ष्य में अक्षयतृतीया के दिन भगवान को इक्षुरस का आहार देकर प्राचीन राजा श्रेयांस द्वारा दिये गये प्रथम आहार के दिवस को याद कर श्रद्धालु कृतकृत्य होते रहते हैं।

[सम्पादन]
आचार्यकल्प श्रुतसागर जी का समाधिमरण-

जब पूज्य माताजी ने यह समाचार सुना कि लूणवा (सीकर) राज. में आचार्यकल्प श्री श्रुतसागर जी महाराज ने २८ अप्रैल को चतुर्विध आहार का त्याग कर दिया है, शीघ्र ही समाधिमरण की तैयारी है अत: यहाँ स्वाध्याय बंद करके तीन दिन तक प्रात: सायं णमोकार मंत्र का पाठ कराया। यहाँ से गये रवीन्द्र कुमार तथा कु. माधुरी ने ६ मई १९८८ शुक्रवार जेष्ठ वदी ५ को फोन से सूचना दी कि आ.क. श्री श्रुतसागरजी महाराज का समाधिमरण हो गया,तभी यहाँ सभा का आयोजन करके श्रद्धांजलि अर्पित की गई। आ.क. श्रुतसागर महाराज संघ के वरिष्ठतम साधु थे। क्षुल्लक अवस्था से ही माताजी के प्रति विशेष वात्सल्य था। उन्होंने १२वर्ष की समाधि ले रखी थी।

[सम्पादन]
आचार्य मुनि श्री दर्शनसागरजी महाराज हस्तिनापुर पधारे-

सहारनपुर में सन् १९८८ में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा कांजीपंथी विद्वानों के द्वारा हो रही थी। उन विद्वानों ने धूप खेने से मना कर दिया अत: वहाँ की समाज ने उन विद्वानों का बहिष्कार कर दिया। दिल्ली से आचार्य श्री दर्शनसागर जी महाराज को ले गये। उनके सानिध्य में प्रतिष्ठाचार्य पं. फतहसागर जी उदयपुर वालों से प्रतिष्ठा करवाई। उन्हीं दिनों में दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर हस्तिनापुर में कांजीपंथ का शिविर लगने वाला था । बड़ौत, सहारनपुर, खतौली, दिल्ली आदि आसपास की जैन समाज के विशेष आग्रह से आचार्य श्री दर्शनसागर जी महाराज १३ मई १९८८ ज्येष्ठ शु. १२ को हस्तिनापुर आये ओर बड़े मंदिर में ठहरे। बड़े मंदिर की कमेटी वालों को कांजीपंथी शिविर न लगाने के लिए कहा, जब वे नहीं माने, तो आसपास व दिल्ली की मुनिभक्त समाज ने खुले आम विरोध कर दिया। अंततोगत्वा हस्तिनापुर में शिविर न लगकर उन लोगों को मवाना में लगाना पड़ा। वे मुनिराज जम्बूद्वीप में दर्शन तथा आहार के लिए भी आते थे। माताजी से चर्चा-वार्ता, विचार-विमर्श भी करते थे। आचार्यश्री दर्शनसागर जी महाराज की निर्भीकता को देखते हुए उन्हें जम्बूद्वीप स्थल पर माताजी की प्रेरणा से आसपास की जनता ने मिलकर ‘धर्मकेसरी’ की उपाधि से अलंकृत किया।

[सम्पादन]
समयसार की दोनों टीकाओं का हिन्दी अनुवाद-

ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी (श्रुत पंचमी) १९ जून १९८८ को जिनवाणी की पूजा के अनंतर पूज्य माताजी ने समयसार ग्रंथराज की आचार्य अमृतचन्द्र तथा आचार्य जयसेनकृत संस्कृत टीकाओं का हिन्दी अनुवाद करना प्रारंभ किया। टीका के साथ-साथ विषय को स्पष्ट करने के लिए उनमें भावार्थ तथा विशेषार्थ भी दिये जिससे पढ़ने वालों को विषय हृदयंगम करने में सरलता हो गई। इस ग्रंथ की दोनों टीकाओं के हिन्दी अनुवाद करने में जो भाव आये, वह माताजी ने ‘‘मेरी स्मृतियाँ ग्रंथ’’ में इन शब्दों में लिखा है। ‘‘इस ग्रंथ के अनुवाद में मुझे जो आनंद आया, वह शब्दों से परे है।’’

ज्येष्ठ शुक्ला तीज- १७ जून १९८८ से २१ जून १९८८ तक श्री शांतिलाल जी गंगवाल इम्फाल वालों ने तीन मूर्ति मंदिर में इन्द्रध्वज विधान कराया। उसमें माताजी ने प्रतिदिन प्रवचन दिया। कु. माधुरी ने सामायिक विधि सिखाई तथा ‘ह्रीं’ का ध्यान कराया, सबको बहुत आनंद आया। ग्रीष्मावकाश में अवध प्रांत से आये हुए बालक-बालिकाओं के लिए शिक्षण- शिविर लगाया गया। उसमें मैंने, कु. माधुरी, पं. प्रवीणचंद, पं. नरेशकुमार आदि ने उनको अनेक विषयों का अध्ययन कराया। विधि विधान प्रारंभ विधि तथा हवन विधि भी सिखाई। माताजी ने प्रवचन दिये। बच्चों ने खूब लाभ लिया। छुट्टियों में गुरु के पास आना सार्थक हो गया। आषाढ़ की अष्टान्हिका में एक साथ दो इन्द्रध्वज विधान- श्रीमती शांतिदेवी ध.प. श्री राजकुमार जैन डालीगंज तथा उनके सुपुत्र सुशील कुमार जैन ने सपरिवार आकर तथा श्री विजेन्द्र कुमार जैन शालीमारबाग दिल्ली ने सपरिवार आकर इन्द्रध्वज विधान किया। एक ने बीसपंथ से, दूसरे ने तेरहपंथ से विधान किया। ऐसी समन्वयात्मक दृष्टि अन्यत्र देखने को बहुत कम मिलेगी। बहुत ही भक्तिविभोर होकर आनंद से दोनों ग्रुप अपनी-अपनी विधि से पूजा करते थे। माताजी के प्रवचन प्रतिदिन सुनते थे।

[सम्पादन]
आचार्य वीरसागर संस्कृत विद्यापीठ-

विद्यापीठ के एक विद्यार्थी कमलेश कुमार ने २५ जुलाई १९८८ को पूज्य माताजी से आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण किया, जिससे माताजी को प्रसन्नता हुई। इस विद्यापीठ के विद्यार्थी ब्र. सुरेश जैन कोटड़िया एवं सुभाष जैन बंडा ने मुनि दीक्षा लेकर जीवन सार्थक किया है जिसका माताजी को व हमें विशेष गौरव है।


[सम्पादन]
तैंतीसवाँ चातुर्मास (१९८८-जम्बूद्वीप हस्तिनापुर में)

संस्थान के पदाधिकारी तथा सदस्यों एवं आसपास के जैन समाज के महानुभावों के निवेदन पर वर्ष १९८८ का चातुर्मास हस्तिनापुर में ही २७ जुलाई को स्थापित किया। चातुर्मास में अनेक छोटे-बड़े विधान होते रहे। पूज्य माताजी द्वारा लेखन कार्य भी सतत चलता रहा। समय-समय पर प्रवचन भी होते रहते थे। दशलक्षण पर्व में अहमदाबाद से चंदूभाई, दिनेशभाई आदि कुछ श्रावक-श्राविकायें आ गये थे, अन्य स्थानों के भी श्रावक आ गये थे। पर्व पूजाओं के अतिरिक्त दस धर्म, तत्त्वार्थसूत्र पर मेरे व माताजी के प्रवचन होते थे। कु. माधुरी तथा रवीन्द्र कुमार पर्व में बड़ौत में आयोजित कल्पद्रुम विधान कराने गये थे। आश्विन कृष्णा में हापुड़ में इन्द्रध्वज विधान हुआ, उसमें कु. माधुरी को ले गये थे। वहाँ बहुत उत्साह था।

[सम्पादन]
कल्पद्रुम विधान-

१६ अक्टूबर १९८८, आसौज शुक्ला ५ से जम्बूद्वीप स्थल पर श्री मांगीलाल जी पहाड़े हैदराबाद ने सपरिवार उत्साहपूर्वक कल्पद्रुम विधान किया। विधानपर्यन्त चारों प्रकार के दान भी बांटे गये। शरद पूर्णिमा-२५ अक्टूबर को पूज्य माताजी का ५४वाँ जन्मदिवस समारोहपूर्वक मनाया गया। श्री बाबूलाल जी, मांगीलालजी पहाड़े परिवार की पुत्रवधुओं तथा बालक-बालिकाओं ने मिलकर पूज्य माताजी के जीवन पर एक छोटा सा एकांकी प्रस्तुत किया, बहुत ही रोमांचक रहा। यह पहाड़े परिवार सन् १९६४ से पूज्य माताजी का परम भक्त है। जब तक श्री मांगीलाल जी जीवित रहे, तब तक प्रतिवर्ष माताजी के दर्शनार्थ आते रहे। कई बार माताजी की जन्मजयंती पर प्रीतिभोज किया। उनके भाई श्री बाबूलालजी पहाड़े भी बराबर आते रहते हैं तथा संस्थान की प्रगतिशील योजनाओं में आर्थिक योगदान भी करते रहते हैं। इस विधान के मध्य स्वस्ति श्री भट्टारक चारुकीर्ति जी (श्रवणबेलगोल) भी पधारे थे उन्होंने इस विधान को श्रवणबेलगोल में भी कराने का निर्णय लिया। संगीतकार तथा मंडल विधान पर रखे जाने वाले मानस्तंभ, तोरणद्वार आदि उपकरण भी यहाँ से ले जाने का भाव व्यक्त किया। १६ नवम्बर से श्रवणबेलगोल में बहुत भारी उत्साह के साथ कल्पद्रुम विधान सम्पन्न हुआ। वहाँ कन्नड़भाषी अनेक भक्तों ने माताजी का बहुत गुणानुवाद किया क्योंकि माताजी ने सन् १९६५ में श्रवणबेलगोल में चातुर्मास किया था। ८ नवम्बर १९८८, कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी की पिछली रात्रि को आगमोक्त विधि से वर्षायोग की निष्ठापना माताजी ने ससंघ की, तदनंतर भगवान महावीर का निर्वाणलाडू चढ़ाया गया। उसी दिन शाम को दीपावली पूजन संघस्थ ब्रह्मचारी-ब्रह्मचारिणियों तथा स्टाफ वालों ने की। जम्बूद्वीप में दीपमालिका लगाई गयी।

[सम्पादन]
चातुर्मास के बाद-

कार्तिक अष्टान्हिका में श्री वीरेन्द्र कुमार जैन टिकैतनगर तथा श्री बिजेन्द्र कुमार जैन दिल्ली ने हस्तिनापुर सपरिवार आकर सर्वतोभद्र मंडल विधान किये। दो अलग-अलग मंडल बने थे। इस विधान में माताजी ने १०८ जयमालाएँ लिखी हैं प्रत्येक जयमाला में चांदी का एक स्वस्तिक चढ़ाने का लिखा है। दोनों ग्रुप ने धातु के १०८ स्वस्तिक चढ़ाये। कु. माधुरी ने भी पहली बार पूरा विधान अपने हाथ से करके मण्डल पर १०८ स्वस्तिक चढ़ाये। आचार्य सुमतिसागर जी महाराज हस्तिनापुर में बड़े मंदिर पर ठहरे थे, विधान के मध्य जम्बूद्वीप स्थल पर पधारे। तेरहपंथ-बीसपंथ का समन्वय देखकर प्रसन्नता व्यक्त की और कहा कि ‘‘जम्बूद्वीप के बारे में जैसी अफवाहें लोगों ने पैâला रखी थीं, वैसा कुछ भी यहाँ देखने में नहीं आया, सब गलत निकला, यहाँ पर बहुत ही अच्छा लगा।’’

समयसार का स्वाध्याय भी माताजी के समक्ष सामूहिक रुप में चल रहा था तथा माताजी उसकी टीकाओं का अनुवाद भी कर रही थांr। ३ जनवरी १९८९ को समयसार पूर्वार्ध छपने दे दिया मेरठ में सुमन प्रिंटर्स को। इसी मध्य माताजी ने आचार्य कुन्दकुन्द के ग्रन्थों से मक्खनस्वरुप निश्चय-व्यवहारसमन्वयात्मक १०८ गाथाएँ संकलित करके गाथाओं का अर्थ तथा भावार्थ देकर ‘‘कुन्दकुन्द मणिमाला’’ नाम से एक पुस्तक तैयार कर दी, उस पुस्तक का प्रकाशन भी हो गया। मई में यहाँ आचार्य श्री कुंथुसागर महाराज का ससंघ मंगल पदार्पण हुआ। ४० दिन तक संघ हस्तिनापुर में रुका, सभी ने संघ की खूब सेवा की और पूज्य माताजी ने संघस्थ साधुओं को अनेक विषयों का अध्ययन कराया।

२० जून से श्री प्रकाशचंद जैन टिकैतनगर ने सपरिवार आकर त्रैलोक्य विधान किया। माताजी ने तीन लोक विधान तीन साइज के बनाये-बड़ा सर्वतोभद्र, मध्यम तीनलोक तथा छोटा त्रैलोक्य विधान नाम से बनाया। तन्मयता से भक्तिपूर्वक विधान पूजन की। विधान के मध्य प्रतिदिन माताजी के प्रवचन भी हुए, पूरे परिवार ने भक्ति व ज्ञान का पूरा लाभ लिया। श्री ताराचंदजी (नरपत्या) भरतपुर (राज.) ने हस्तिनापुर आकर ‘‘जम्बूद्वीप विधान’’ किया। विधान के मध्य १६ जुलाई १९८८, आषाढ़ शुक्ला १३ को ब्र. रवीन्द्र कुमार, गणेशीलाल रानी वाला, जिनेन्द्र प्रसाद ठेकेदार आदि महानुभावों के द्वारा माताजी के पास बैठकर जम्बूद्वीप स्थल की प्रगति तथा १९९० में जम्बूद्वीप महोत्सव करने के बारे में विचार-विमर्श चल रहा था, तभी माताजी ने उचित समय देखकर सहसा घोषित कर दिया कि ब्र. कु. माधुरी की दीक्षा होगी, १३ अगस्त, श्रावण शुक्ला ११ का मुहूर्त है। यह बात सुनते ही रवीन्द्र कुमार कुछ देर के लिए हतप्रभ रह गये, जब यह देख लिया कि-माताजी का निर्णय व घोषणा दृढ़ है, तब कहा कि-‘‘दीक्षा ठाठ बाट से होगी, उत्साहपूर्वक कार्यक्रम बनाया जावेगा।’’


[सम्पादन]
चौंतिसवाँ चातुर्मास (१९८९- जम्बूद्वीप हस्तिनापुर में)

दीक्षा हेतु ब्र. कु. माधुरी ने प्रार्थना की-१७ जुलाई आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी के दिन चातुर्मास स्थापना हेतु उपस्थित जनसमुदाय श्रीफल चढ़ाकर प्रार्थना कर रहे थे, उसी समय ब्र. कु. माधुरी ने दीक्षा के लिए श्रीफल चढ़ाकर माताजी से निवेदन किया। माताजी ने सहर्ष स्वीकृती प्रदान की। यह जानकारी पूरे देश की दि. जैन समाज को प्राप्त होते ही हर्ष का वातावरण व्याप्त हो गया। कुछ लोगों को विषाद इसलिये हुआ कि अब कु. माधुरी जी अपने सुमधुर कंठ से विधान कराने नहीं आ सकेगी। यह उनके वात्सल्य भाव का द्योतक था। जगह-जगह से दीक्षा पूर्व बिनोरी (शोभायात्रा) निकालने के लिए तेजी से मांग आने लगी। दीक्षा तिथि में एक माह से भी कम का समय था अत: कई जगह एक दिन में दो-दो जगह बिनोरी निकाली गयी। बिनोरी के लिए अनेक नगरों के भक्तों को मना भी करना पड़ा।

१३ अगस्त, श्रावण शुक्ला ११ रविवार को दीक्षा पूर्व भी शोभायात्रा निकाली गई। वह शोभायात्रा जम्बूद्वीप स्थल पर बने विशाल पंडाल में सभा के रूप में परिणत हो गई। सभा में १०,००० से अधिक जनसमुदाय उपस्थित था। अनेक प्रदेशों के भक्तगण पधारे थे उसके पश्चात् पूज्य माताजी ने अपने हाथों से दीक्षा विधि प्रारंभ करते हुए दीक्षार्थी कु. माधुरी के लम्बे-लम्बे बालों का केशलोंच प्रारंभ किया। उस केशलोंच के दृश्य को देखकर सारी जनता के नेत्र अश्रुपूरित हो रहे थे किन्तु माधुरी के चेहरे पर मुस्कान थी। उस समय दीक्षा का दृश्य बड़ा ही रोमांचक था। २८ मूलगुणों का संस्कार करके पिच्छी, कमंडलु तथा शास्त्र प्रदान करने से पूर्व पहने हुए सभी वस्त्रों का त्याग करवाकर मात्र दो स़ाडी प्रदान कीं। एक उसी दिन के लिए तथा दूसरी अगले दिन के लिए। दीक्षित नाम ‘आर्यिका चंदनामती’ घोषित करते ही पंडाल जयकार के नारों से गूंज उठा। कु. माधुरी बन गयीं जगत्माता। मेरे सहित सभी ने उन्हें नमोस्तु किया। आज भी अनेक भक्त उस दृश्य को याद करके रोमांचित हो जाते हैं। दीक्षा के पश्चात् विगत वर्षों से चंदनामती माताजी के द्वारा भी धर्म की महती प्रभावना हो रही है। माताजी के आदेशानुसार खूब लेखन किया, भजन व पूजाएँ लिखीं, अनेकों विधान अपने मधुर कंठ से कराये, ओजस्वी प्रवचन किये, खूब पदयात्रायें की। दशलक्षण पर्व में इन्द्रध्वज विधान सम्पन्न हुआ, जिसमें अनेक नगरों के भक्तों ने भाग लिया। प्रात:, मध्यान्ह तथा रात्रि में खूब धर्मामृत की वर्षा हुई।

शरदपूर्णिमा पर माताजी का ५६वाँ जन्म दिवस त्रिदिवसीय कार्यक्रम के साथ वृहद् स्तर पर मनाया गया। शरद पूर्णिमा के ८ दिन पूर्व संघस्थ वयोवृद्ध ब्रह्मचारिणी श्यामाबाई टिकै तनगर ने माताजी के समक्ष श्रीफल चढ़ाकर क्षुल्लिका दीक्षा देने के लिए प्रार्थना की थी तदनुसार १५ अक्टूबर शरदपूर्णिमा के शुभ दिन माताजी के जन्मजयंती समारोह के मध्य माताजी ने उन्हें क्षुल्लिका दीक्षा प्रदान कर ‘‘क्षुल्लिका श्रद्धामती’’ नाम घोषित किया। उनकी समाधि कुण्डलपुर (नालंदा) बिहार में २००४ के चातुर्मास में हो गई। इसी शुभ अवसर पर माताजी के ससंघ सानिध्य में प्रतिष्ठाचार्यों की एक त्रिदिवसीय संगोष्ठी १५ से १७ अक्टूबर १९८९ तक सम्पन्न हुई, अनेक प्रतिष्ठाचार्य पधारे थे। माताजी ने तीनों दिन प्रतिष्ठाचार्यों को सम्बोधित किया। बहुत सफल संगोष्ठी रही। इसी समारोह के मध्य प्रथम जम्बूद्वीप पंचवर्षीय महोत्सव तथा पंचकल्याणक प्रतिष्ठा ३ मई से ७ मई १९९० वैशाख शुक्ला ९ से १३ तक करने की घोषणा की गयी। इस प्रकार विविध उपलब्धियों के साथ आसौज कृष्णा १४ को वर्षायोग का समापन हो गया।

[सम्पादन]
चातुर्मास के बाद-

बड़ौत में २७ नवम्बर से १४ दिसम्बर तक वृहद् तीन लोक विधान का आयोजन रखा गया था। बड़ौत जैन समाज के महानुभावों के विशेष आग्रह एवं निवेदन पर माताजी ने जाने की स्वीकृति प्रदान कर दी थी। यहाँ से संघ सरधना पहुँचा। वहाँ माताजी का स्वास्थ्य खराब हो गया। मवाना में णमोकार मंत्र वाले बाबा आचार्य कल्याणसागर जी से भेंट हुई थी। सरधना में स्वास्थ्य सुधार होने पर बड़ौत जाते हुए बिनौली में उपाध्याय श्री ज्ञानसागर महाराज से भेंट हुई। २६ नवम्बर को बड़ौत शहर में पदार्पण हुआ। दिगम्बर जैन अतिथि भवन में गणधराचार्य श्री कुंथुसागर जी महाराज का संघ ठहरा हुआ था। उनका चातुर्मास यहीं हुआ था। माताजी संघ सहित अतिथि भवन के निकट गेस्ट हाउस में ठहरीं। विधान का झंडारोहण २७ को तथा विधान पूजन २८ से प्रारंभ हुई। चंदनामती माताजी ने व मैंने प्रतिदिन १-२ घंटा विधान, पूजन पढ़ी। संघ सानिध्य में स्वाध्याय आदि भी हुआ, पूज्य माताजी ने यहाँ उपाध्याय श्री कनकनंदी आदि मुनियों के आग्रह से सभी मुनिराजों को अष्टसहस्री आदि ग्रंथों का अध्ययन भी कराया। यहाँ सर्दी बहुत अधिक हो गयी थी। यहाँ से ५ जनवरी १९९० को विहार करके मोदीनगर में १८ जनवरी से २७ जनवरी तक इन्द्रध्वज विधान कराया।

२९ जनवरी को मोदीनगर से विहार करके संघ का पदार्पण ३१ जनवरी को कमला नगर मेरठ में हुआ। १ फरवरी से १२ फरवरी तक श्री प्रेमचंद जी तेलवालों ने कमलानगर मंदिर के सामने पंडाल बनाकर बहुत ठाठ-बाट से कल्पदु्रम विधान कराया, चारों प्रकार का दान खूब बांटा, पूर्ण उदारता से विधान किया। कमलानगर से १४ फरवरी को हस्तिनापुर की तरफ विहार करके मेरठ में कुछ श्रावकों के घर एक-एक दिन के विधान कराते हुए रास्ते में ठहरने के स्थानों पर, स्कूल में प्रवचन करते हुए मवाना पधारकर यहाँ भी कुछ श्रावकों के घरों में सुख-शांति के लिए छोटे विधान कराये। २२ फरवरी को हस्तिनापुर में माताजी का ससंघ मंगल पदार्पण हुआ। कार्तिक शुक्ला १ से फाल्गुन शुक्ला तक का विहार मंगलमय रहा, विविध प्रकार से धर्मप्रभावना हुई। इस प्रवास में माताजी के साथ आर्यिका श्री चंदनामती माताजी, मैं तथा क्षुल्लिका श्रद्धामती के अतिरिक्त ब्र.कु. बीना व कु. आस्था थीं। दीक्षा के पश्चात् मेरा तथा चंदनामती माताजी का यह प्रथम विहार था।

[सम्पादन]
जम्बूद्वीप महामहोत्सव की तैयारियाँ-

जम्बूद्वीप स्थल पर आते ही संघ की दिनचर्या विधिवत् प्रारंभ हो गई। दैनिक सामूहिक स्वाध्याय भी प्रारंभ हो गया। माताजी का अपना लेखनकार्य चल रहा था। महोत्सव से पूर्व मंदिरों तथा धर्मशालाओं में रंगाई-पुताई का कार्य भी चल रहा था। पीतल की ह्नीं बनाकर उसमें २४ तीर्थंकरों की प्रतिमा विराजमान करने के लिए पहले माताजी ने मिट्टी से ह्रीं का नमूना बनवाया। अनंतर मुरादाबाद में पीतल की ह्रीं तथा उसके नीचे पीतल का ही कमल बनने का ऑर्डर दिया गया। उसी के साथ पीतल के ५ मेरु बड़े-बड़े एवं तेरहद्वीप के ३७८ मंदिरों के बनाने का ऑर्डर दिया। जयपुर में प्रतिमाओं का ऑर्डर दिया गया।

फाल्गुन की अष्टान्हिका में तीस चौबीसी विधान श्री शिखरचंद जैन हापुड़ तथा श्री जिनेन्द्र प्रसाद ठेकेदार व उनकी बहन सरलाजी ने आकर सम्पन्न किया। जम्बूद्वीप पंचवर्षीय महोत्सव के साथ पंचकल्याणक प्रतिष्ठा करने का भी निर्णय पूर्व में किया गया था अत: ४ मार्च को प्रतिष्ठा समिति की मीटिंग करके प्रतिष्ठा- संबंधी कार्यभार सौंपे गये। सभी ने उत्साहपूर्वक जिम्मेदारी ली।

[सम्पादन]
आचार्य पद की चर्चा-

चााqरत्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की परम्परा के चतुर्थ पट्टाधीश आचार्य श्री अजितसागर जी महाराज के असाध्य क्षयरोग को देखते हुए भावी आचार्य के बारे में चर्चा प्रारंभ हो गई। अधिकांश मुनि-आर्यिका आचार्यकल्प श्री श्रेयांससागर जी महाराज को भावी आचार्य बनाने का निर्णय कर चुके थे। यहाँ माताजी को भी यह उचित निर्णय सुनकर प्रसन्नता हुई थी किन्तु आचार्य श्री अजितसागर जी महाराज की समाधि के पश्चात् आचार्यपद का निर्णय गंभीर विवाद में पड़ गया ।

[सम्पादन]
व्रतों की साधना-

पूज्य माताजी ने रुग्ण तथा अशक्त शरीर से भी मनोबल के द्वारा रस-अन्न आदि त्याग करके अनेक व्रत किये। कौन-कौन से व्रत कब किये? इसका विस्तृत विवेचन माताजी ने स्वयं ‘मेरी स्मृतियाँ’ ग्रंथ में किया है। वर्षों तक एक अन्न-चावल लिया। बाद में दो अन्न लेना प्रारंभ किया, वह अब भी चल रहा है। इसी प्रकार वर्षों तक विविध प्रकार के रसों का त्याग रखा। आचार्य श्री वीरसागर महाराज की समाधि के पश्चात् गुड़, शक्कर तथा दही व तेल का भी त्याग कर दिया था। नमक का त्याग ३० वर्ष तक रहा है। वर्तमान में भी पूज्य माताजी केवल दो अन्न एवं दो ही रस आहार में ग्रहण करती हैं।

[सम्पादन]
जम्बूद्वीप महामहोत्सव से पहले महान ग्रंथों का प्रकाशन-

समयसार ग्रंथ का पूर्वार्ध छपकर आ जाने से माताजी सहित सभी को अतीव प्रसन्नता हुई। अष्टसहस्री के प्रथम भाग की प्रतियाँ समाप्त हो जाने से उसके द्वितीय संस्करण का भी प्रकाशन कर दिया गया। इसी प्रकार माताजी की भावनानुसार आचार्य श्री वीरसागर स्मृतिग्रंथ का प्रकाशन भी दिन रात एक करके किया गया। इन सभी ग्रंथों के विमोचन मई १९९० में होने वाले महोत्सव में होकर जन-जन तक पहुँचाए गये।

मेरठ में उ.प्र. की नगरपालिकाओं के अध्यक्ष, सदस्य तथा मेयरों के सम्मेलन से अनेक लोग ५ अप्रैल १९९० को जम्बूद्वीप स्थल पर आये, देखकर बहुत प्रसन्न हुए। मेरे, बड़ी माताजी के प्रवचन हुए। इसी प्रकार प्रतिदिन मेरठ संभाग, प्रदेश तथा देश के विभिन्न भागों से दर्शनार्थी बड़ी संख्या में यहाँ आते हैं, उन्हें माताजी का उपदेश सुनने का भी पुण्य अवसर प्राप्त होता रहता है।

क्षेत्र पर चल रहे निर्माण कार्यों की देखरेख विगत ७-८ वर्षों से सेवानिवृत्त इंजी. श्री कैलाशचंद जैन तोपखाना मेरठ वाले कर रहे हैं, अवैतनिक सेवा दे रहे हैं। उनकी ध.प. वैâलाशवती जी भी भक्तिपूर्वक उनके साथ यहीं रहती हैं। दोनों की दान तथा सेवावृत्ति में विशेष रुचि रही। सन् १९७५ से १९८७ तक जम्बूद्वीप स्थल पर चार पंचकल्याणक प्रतिष्ठाएं हो चुकी थीं। मई में महोत्सव के साथ पांचवीं प्रतिष्ठा होगी। प्रतिष्ठा से पूर्व १२ अप्रैल १९९० वैशाख कृष्णा दूज को एक विधान का प्रात: हवन हो रहा था, उसी दिन दूसरी तरफ मवाना के श्रीपालजी तथा उनके पुत्र ज्ञानचंद जैन इन्द्रध्वज विधान का झंडारोहण कर रहे थे। यह विधान २२ अप्रैल को सम्पन्न हुआ। १२ अप्रैल-वैशाख वदी दूज को माताजी का ३४ वाँ आर्यिका दीक्षा दिवस था, उस दिन जम्बूद्वीप स्थल पर माताजी के पादप्रक्षाल, आरती के द्वारा संघ के सदस्यों ने अपने भक्तिसुमन अर्पित किये, माताजी के गुणानुवाद गाये। इस अवसर पर माताजी ने भी अपने गुरू आचार्य श्री वीरसागर महाराज, दीक्षा दिवस तथा अब तक किये कार्यों का स्मरण किया। अपने शिष्यों द्वारा अहर्निश किये जा रहे कार्यों को भी याद कर अति संतोष एवं हर्ष व्यक्त किया। देखते-देखते पंचवर्षीय महोत्सव व पंचकल्याणक प्रतिष्ठा का समय नजदीक आ गया। २८ अप्रैल से २ मई तक शिक्षण-प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया।

[सम्पादन]
'पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं प्रथम पंचवर्षीय जम्बूद्वीप महोत्सव ३ मई से ७ मई १९९० तक-

समय आ गया चिरप्रतीक्षित प्रथम पंचवर्षीय जम्बूद्वीप महोत्सव का। तिथि थी वैशाख शु. तीज (अक्षय तृतीया), तारीख थी २७ अप्रैल १९९०। कार्यक्रम प्रारंभ हुआ जम्बूद्वीप महोत्सव तथा पंचकल्याणक प्रतिष्ठा के आचार्य निमंत्रण, गुरु आज्ञा तथा झंडारोहण से। ब्र. रवीन्द्र कुमार जैन ने संघ सानिध्य में आचार्य निमंत्रण देते हुए तिलक लगाकर वंâकण बंधन किया, माला पहनाई तथा वस्त्र भेंट किये-प्रतिष्ठाचार्य पं.फतेहसागर जी, सहयोगी पं. प्रदीप कुमार कुसुंबा (महा.) पं. सुधर्मचंद जी तिवरी को। प्रतिष्ठाचार्यों तथा समिति पदाधिकारियों ने मिलकर पूज्य माताजी से श्रीफल चढ़ाकर प्रार्थना की पूरे कार्यक्रम में सानिध्य प्रदान करने के लिये। माताजी ने सहर्ष स्वीकृति प्रदान करते हुए सभी को आशीर्वाद प्रदान किया। अनंतर ‘’सिद्धार्थ मंडप‘’ के सामने बने ऊँचे ध्वजदण्ड पर झंडारोहण किया माताजी के परमभक्त श्री कमलचंद जैन खारी बावली दिल्ली ने सपरिवार। झंडारोहण के पश्चात् रथयात्रा एवं घटयात्रा के साथ पंडाल में बनी वेदी की शुद्धि हुई तथा उस पर विराजमान की गईं प्रतिष्ठित प्रतिमाजी, इसी के साथ प्रारंभ हो गये विविध अनुष्ठान, मंत्रजाप्य, मंडल विधान आदि।

कार्यक्रम की अगली कड़ी के रूप में २८ अप्रैल १९९० को ‘’ज्ञानज्योति शिक्षण/प्रशिक्षण शिविर‘’ का उद्घाटन हुआ। शिविर का कुलपति मुझे मनोनीत किया गया। शिविर के आयोजन का सुझाव श्री हीरालालजी अहमदाबाद ने दिया था। शिविर में अन्य स्थानों के अतिरिक्त गुजरात से भी २५-३० लोग पधारे थे। शिविर ३ मई तक चला। संघस्थ ब्रह्मचारी-ब्रह्मचारिणियों, पूज्य चंदनामती माताजी तथा मैंने शिक्षण प्रदान किया। गणिनी माताजी के प्रतिदिन प्रवचन हुए। २ मई को सबकी परीक्षा ली गई। ३ मई को समापन पर सभी को प्रमाणपत्र दिये गये।

पंचकल्याणक प्रतिष्ठा में भगवान के माता-पिता बने श्री जिनेंद्र प्रसाद जैन ठेकेदार दिल्ली व उनकी ध.प. श्रीमती विमला देवी। सौधर्म इन्द्र बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ श्री मोतीचंद जैन कासलीवाल जौहरी दरीबा दिल्ली को। ३ मई की रात्रि में डी.पी कौशिक मुजफ्फरनगर द्वारा जैन रामायण पर आधारित ‘’सीता स्वयंवर‘’ नाटिका का मंचन किया गया। दर्शकों ने खूब सराहना की। अनंतर गर्भकल्याणक की बहिरंग व अंतरंग क्रियाएँ सम्पन्न हुर्इं। प्रतिष्ठा में ५ फुट ऊँचे धातु के ह्रीं में विराजमान होने वाली २४ प्रतिमाओं की, इन्द्रध्वज विधान में तेरह द्वीप में स्थापित करने के लिए ४५८ प्रतिमाओं तथा बाहर से भी आई हुई प्रतिमाओं की प्रतिष्ठाविधि प्रारंभ हुई। ४ मई को प्रात: जन्मकल्याणक के दृश्य प्रस्तुत हुए। जन्मकल्याणक के अवसर पर ऐरावत हाथी पर शोभायात्रा निकाली गई। सुमेरु की पांडुकशिला पर जन्माभिषेक हुआ। केन्द्रीय उद्योगमंत्री चौधरी अजितसिंह ने जम्बूद्वीप पर आते हुए हेलीकॉप्टर से पुष्पवृष्टि की एवं उतरकर माताजी का आशीर्वाद ग्रहण किया। तदनंतर सभामंडप में पहुँचकर मंच पर आसीन हुए। आज के इस कार्यक्रम को ‘’अष्टमूलगुण सम्मेलन‘’ नाम दिया गया था। चौधरी अजितसिंह जी के स्वागत के अनंतर मैंने व पूज्य श्री चंदनामती माताजी ने अष्टमूलगुणों तथा उसकी जीवन में महत्ता पर प्रकाश डाला। पूज्य गणिनी माताजी द्वारा अनुवादित समयसार ग्रंथ का विमोचन उद्योगमंत्री जी ने किया। मंडप के पास लगाई गई अष्टमूलगुण प्रदर्शनी का उद्घाटन भी चौधरी अजितसिंह जी ने किया, प्रदर्शनी बहुत ही आकर्षक थी। शाम को भगवान का पालना झुलाया गया।

५ मई को प्रात: बालक्रीडा दिखाई गई। मध्यान्ह में राज्याभिषेक के पश्चात् भगवान वर्धमान कुमार की दीक्षा का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। रात्रि में दिल्ली की सुप्रसिद्ध्र गायिका चैताली ने जैन भजन प्रस्तुत किये। वे स्वयं स्त्री-पुरुष की आवाज में गाकर जनता के आकर्षण का केन्द्र बन गई थीं। ६ मई को प्रात: भगवान की आहारचर्या कराने का पुण्य श्री अमरचंद जी पहाड़िया कलकत्ता को प्राप्त हुआ। आज पंचवर्षीय महोत्सव के उपलक्ष्य में सुमेरुपर्वत की पांडुकशिला पर अभिषेक करने के लिए देश भर से आये भक्तों की भीड़ प्रात: से एकत्रित होना प्रारंभ हो गई। एक अनहोना शुभ संयोग प्राप्त हो गया आज के दिन। ५ वर्ष पूर्व भी आज के दिन वैशाख शुक्ला १२ की तिथि थी। वाद्यों की मंगल ध्वनि के साथ मंगल चौक पर स्थापित कलशों से हार-मुकुट धारण किये हुए केशरिया परिधान में सुसज्जित इन्द्र-इन्द्राणियों ने भक्ति-विभोर होकर अभिषेक करना प्रारंभ कर दिया।

६ मई को अपरान्ह ३ बजे उत्तर प्रदेश के राज्यपाल श्री सत्यनारायण रेड्डी एक भक्त के रुप में समारोह में पधारे। सभामंडप में जनसमुदाय एकत्रित था। राज्यपाल महोदय के मंच पर पधारते ही सभी ने करतल ध्वनि से उनका स्वागत किया। सभा की अध्यक्षता श्री वीरेन्द्र कुमार जैन चीफ जस्टिस लखनऊ ने की। श्री रेड्डी जी एवं चीफ जस्टिस का स्वागत पुष्पहार, शॉल, श्रीफल से किया गया। मैंने महोत्सव की महिमा पर विचार प्रस्तुत करते हुए बताया कि पुण्ययोग से जम्बूद्वीप रचना की पावन प्रेरिका गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का पावन सानिध्य प्रथम जम्बूद्वीप महोत्सव को प्राप्त हो रहा है। पूज्य आर्यिका श्री चंदनामती माताजी ने पूज्य गणिनी माताजी द्वारा अनुवादित महान ग्रंथ अष्टसहस्री के तीनों भागों के विमोचन से पूर्व उक्त ग्रंथ की टीका की महत्ता पर प्रकाश डाला। नारी शक्ति के विषय में ओजस्वी प्रवचन किया। तीनों भागों का विमोचन करके राज्यपालजी ने पूज्य माताजी के करकमलों में प्रदान किये। माताजी ने ग्रंथ पर आशीर्वाद लिखकर रेड्डी जी को प्रदान किये। पूज्य माताजी के दीक्षागुरु आचार्य श्री वीरसागर महाराज के स्मृतिग्रंथ का विमोचन भी श्री मांगीलालजी पहाड़िया, हैदराबाद ने राज्यपाल से करवाया।

राज्यपाल श्री रेड्डी जी ने अपने भाषण में कहा कि-हस्तिनापुर की धरती महान है। यहाँ की भूमि पर हुआ महाभारत का युद्ध धर्म की विजय तथा अधर्म की पराजय बताता है। मुझे पहली बार इस पवित्र तीर्थ पर आने का अवसर मिला है। ज्ञानमती माताजी जैसी महान साध्वी यहाँ त्याग और तपस्या का श्रोत बहा रही हैं। इनसे ऐसा आशीर्वाद प्राप्त करना है कि हमारा देश शक्तिशाली एवं धर्मसहिष्णु बने। मेरी शुभकामनाएँ आप सब स्वीकार करें।

पूज्य माताजी ने दूर-दूर से आये समस्त नर-नारियों को तथा राज्यपाल महोदय को अपना मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। अंत में सभाध्यक्ष जस्टिस श्री वीरेन्द्र कुमार जैन ने अपने संक्षिप्त उद्बोधन में कहा कि ऐसे उत्सव यहाँ प्रतिवर्ष होते रहें जिससे हमें व आप सबको यहाँ प्रतिवर्ष आने का मौका मिलता रहे। दोनों अतिथियों ने मंच पर विराजमान प्रतिमाओं तथा ह्रीं के दर्शन किये अनंतर जम्बूद्वीप दर्शन करते हुए प्रोटोकोल को मद्देनजर करके सुमेरुपर्वत की १३६ सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर तक जाकर चारों तरफ का प्राकृतिक सौंदर्य देखते रहे, नौकाविहार भी किया। अंत में कमल मंदिर के उद्घाटन के रूप में शिलापट्ट का अनावरण कर मंदिर के दर्शन करके दिल्ली के लिए रवाना हो गए, पूरे ढाई घंटे रुके। १२ बजे से ३ बजे तक केवलज्ञान कल्याणक की क्रियाएँ हुई। समवसरण की रचना दिखाई गई। पूज्य माताजी का मंगल प्रवचन भी हुआ। रात्रि में ‘’महाराज कृष्ण कुमार कत्थक कला केन्द्र’’ दिल्ली द्वारा जैन शास्त्रों के आधार से महाभारत की काव्य में नाटिका दिखाई गई, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा।

७ मई को प्रात: पावापुरी की रचना बनाकर भगवान महावीर का मोक्षगमन दिखाया गया। कमल मंदिर पर कलशारोहण तथा ध्वजारोहण किया श्रीमती उर्मिला देवी संतोष कुमार जैन दिल्ली ने। इन्हीं की तरफ से कमल मंदिर में भगवान महावीर स्वामी की प्रतिमा स्थापित की गई थी। मध्यान्ह में समापन पर रथयात्रा निकाली गई। समस्त आगत विद्वानों, श्रीमानों तथा लगनशील कार्यकर्ताओं का समिति की ओर से स्वागत तथा अभिनंदन किया गया। समस्त प्रतिमाएँ यथास्थान विराजमान कर दी गई। महोत्सव सानंद तथा निर्विघ्न सम्पन्न हुआ।

[सम्पादन]
आचार्यकल्प श्री श्रेयांससागर जी महाराज को पंचम पट्टाचार्य पद पर प्रतिष्ठापित किया गया-

चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की परम्परा के चतुर्थ पट्टाचार्य श्री अजितसागर जी महाराज की समाधि के पश्चात् पंचम पट्टाचार्य के विषय में काफी प्रयास के बाद भी जब एकमत नहीं बन पाया, तब दो पट्टाचार्य बनाये गये। उनमें से एक आचार्यकल्प श्री श्रेयांससागर जी महाराज को बनाया गया। उन्हें लोहारिया (राज.) में १० जून १९९० को ३४ पिच्छीधारी मुनि, आर्यिका, क्षुल्लक, क्षुल्लिकाओं, पचासों व्रतियों तथा २५ हजार श्रावक-श्राविकाओं की विशाल उपस्थिति में पंचम पट्टाचार्य के पद पर प्रतिष्ठापित किया गया। इस समारोह में हस्तिनापुर से कर्मयोगी ब्र. रवीन्द्र कुमार को माताजी ने अपनी सहमति के साथ भेजा था। उक्त समारोह में देश के सैंकड़ों नगरों से भक्तगण पधारे थे। आचार्यपद के संस्कार उपाध्याय श्री अभिनंदनसागर जी महाराज ने किये। समस्त विधि-विधान ब्र. श्री सूरजमलजी बाबाजी ने कराये। यह कार्यक्रम प्रात: ८:३० से प्रारंभ होकर १.३० बजे तक-५ घंटे चला।


[सम्पादन]
पैंतिसवाँ चातुर्मास (१९९०- जम्बूद्वीप हस्तिनापुर में)

पूज्य माताजी ने ६ जुलाई १९९० आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी को जम्बूद्वीप स्थल पर संघसहित वर्षायोग की स्थापना की। आषाढ़ शु. पूर्णिमा को आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज की जन्मजयन्ती, श्रावण कृष्णा एकम् को वीरशासन जयंती के कार्यक्रम सम्पन्न हुए एवं श्रावण शुक्ला ७ को भगवान पाश्र्वनाथ के निर्वाण कल्याणक के उपलक्ष्य में अभिषेक-पूजापूर्वक माताजी के सानिध्य में निर्वाणलाडू चढ़ाया गया।

वैसे तो माताजी विविध प्रकार के लेखन में संलग्न रहती थीं फिर भी समय निकालकर कार्यक्रमों में सानिध्य एवं धर्मोपदेश भी देती रहती थीं। दशलक्षण पर्व में श्री मनोज कुमार जैन हस्तिनापुर ने इन्द्रध्वज मंडल विधान बहुत हर्षोल्लास से सपरिवार किया। प्रात: विधान पूजन, मध्यान्ह में दशधर्म तथा तत्वार्थसूत्र पर प्रवचन तथा रात्रि में भक्ति, भजन, आरती, नृत्य तथा प्रवचन, प्रश्न-मंच हुए। विद्यापीठ के विद्यार्थी ब्र. धरणेन्द्र कुमार (तमिलनाडु वाले) विधानाचार्य थे। भादों सुदी दूज को चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की ३५वीं पुण्यतिथी मनाई गई।

२५ सितम्बर, आसोज शुक्ला ६ से ७ अक्टूबर, आसौज शुक्ला १५ (शरदपूर्णिमा) तक जम्बूद्वीप स्थल पर तीनलोक मंडल विधान का आयोजन किया गया जिसमें मेरठ, दिल्ली, हाप़ुड़ से भक्त महानुभावों ने पधारकर भक्ति गंगा में अवगाहन कर पुण्योपार्जन किया। देश के विभिन्न नगरों के अशांत वातावरण को देखते हुए माताजी का ५७ वाँ जन्मदिवस २ अक्टूबर (शरद पूर्णिमा) के दिन सादगी से मनाया गया।

१ अगस्त १९९० को सुप्रसिद्ध विद्वान श्री मोतीचंद गौतमचंद कोठारी, फल्टन (महा.) का उनके गृहनगर फल्टन में ९० वर्ष की आयु में समाधिमरण हो गया। आपने संस्थान द्वारा आयोजित शिक्षण- प्रशिक्षण शिविरों में कुलपति के पद को गौरवान्वित किया था। उन्हें संस्थान की ओर से श्रद्धांजलि अर्पित की गई। पूज्य माताजी का ५७ वाँ जन्म दिवस शरदपूर्णिमा के दिन श्रीमती संतोषकुमारी के नेतृत्व में नागौर (राज.) में जैन समाज ने हर्षोल्लास के साथ मनाया। माताजी की पूजन करके उनके चित्र के समक्ष ५७ दीपकों से आरती उतारी।

[सम्पादन]
सरधना (मेरठ) उ.प्र. में प्रथम बार विशाल कल्पदु्रम विधान का भव्य आयोजन-

कार्तिक अष्टान्हिका के अवसर पर २४ अक्टूबर से २ नवम्बर १९९० तक विधान किया गया। विधान से पूर्व जैन समाज के वरिष्ठ महानुभावों ने हस्तिनापुर आकर पूज्य माताजी से ससंघ सानिध्य प्रदान करने के लिए सरधना पधारने हेतु निवेदन किया। माताजी ने अपनी शिष्या आर्यिका श्री चंदनामती माताजी तथा क्षुल्लिका श्री श्रद्धामती माताजी को भेज दिया। चंदनामती माताजी का समाज ने भव्य स्वागत किया। उनके वहाँ पधार जाने से समाज में अभूतपूर्व उत्साह जागृत हो गया। पं. प्रवीणचंद शास्त्री एवं ब्र. धरणेन्द्रकुमार विधानाचार्य के रूप में थे। विधान करने वालों को बहुत आनंद आया। विधान सम्पन्न करवाकर श्री चंदनामती माताजी वापस हस्तिनापुर पधार गर्इं। दीपावली १९९० के दिन माताजी ने ससंघ चातुर्मास प्रात: समापन किया तदुपरांत कमलमंदिर में भगवान महावीर के निर्वाण के उपलक्ष्य में निर्वाणलाडू चढ़ाया गया। शाम को दीपमालिका लगाई गई, दीपावली पूजन की गई।

[सम्पादन]
चातुर्मास के पश्चात्-

२१ दिसम्बर १९९० को पंचम पट्टाचार्य श्री श्रेयांससागर जी महाराज की ७२ वीं जन्मजयंती पर माताजी के सानिध्य में सभा का आयोजन करके उनके प्रति विनयांजलि अर्पित की गई।९ जनवरी १९९१ माघ कृष्णा ९ को आर्यिका श्री रत्नमती माताजी की छठी पुण्यतिथी मनाई गई, उनके चरणों का प्रक्षाल करके पूजन की गई तथा सभा में श्रद्धांजलि समर्पित की गई। सन् १९८५ में उनकी जम्बूद्वीप स्थल पर ही समाधि हुई थी।

आर्यिका पवित्रश्री एवं पावनश्री माताजी का जम्बूद्वीप स्थल पर ढ़ाई माह तक प्रवास रहा। उन्होंने पूज्य माताजी से खूब ज्ञान अर्जित किया, अनुभव सुने। उपाध्याय श्री ज्ञानसागर जी महाराज भी तीन दिन रुके। माताजी से आध्यात्मिक चर्चाएँ कीं। पूज्य माताजी की शिष्या आर्यिका श्री श्रेष्ठमती माताजी का चित्तौड़-रेनवाल (राज.) में फाल्गुन वदी अमावस्या सन् १९९१ को सामान्य अस्वस्थता के बाद अचानक समाधिमरण हो गया। वे पूज्य मुनि श्री गुणसागर जी तथा आर्यिका श्री आदिमती माताजी के साथ थीं। समाधि का समाचार सुनकर यहाँ गणिनी माताजी को खेद हुआ। उनके प्रति यहाँ सबने श्रद्धांजलि अर्पित की।

पूज्य गणिनी माताजी की आज्ञा से १५ फरवरी १९९१ को चंदनामती माताजी ने मवाना पहँुचकर फाल्गुन के अष्टान्हिक पर्व में श्री सिद्धचक्र मंडल विधान कराया। २० फरवरी से २५ फरवरी तक मुझे भी माताजी ने मवाना भेजा। वहाँ जाकर मैंने भी पूजाएं पढ़ीं तथा प्रवचन किये। विधान में ब्र. रवीन्द्र जी, ब्र. कमलेश, ब्र. धरणेन्द्र, ब्र. जवेरचंद तथा ब्र. कु. बीना आदि भी पहुँचे थे, मैं २५ को वापस हस्तिनापुर आ गया। जिस दिन विधान का पूर्णाहुति हवन हुआ, उसी दिन खाड़ी युद्ध समाप्ति की सूचना से पूरे नगर में हर्ष छा गया। पूूज्य चंदनामती माताजी २ मार्च को वापस हस्तिनापुर पधार गर्इं।

[सम्पादन]
हस्तिनापुर में होली मेला-

प्रतिवर्षानुसार इस वर्ष (१९९१में) होली मेले पर जम्बूद्वीप स्थल से रथयात्रा पूज्य गणिनी माताजी के ससंघ सानिध्य में निकाली गई। माताजी का प्रवचन भी हुआ। आसपास के विभिन्न नगरों से ६-७ हजार श्रावक-श्राविकाओं ने आकर जम्बूद्वीप के दर्शन किये। अप्रैल १९९१ में पूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का अभिनंदनग्रंथ प्रकाशित करने की रूपरेखा बनाई गई। ९ मार्च १९९१, चैत्र वदी ९ को भगवान ऋषभदेव की जयंती के उपलक्ष्य में जम्बूद्वीपस्थल पर विविध कार्यक्रम सम्पन्न हुए। प्रात: प्रभातपेâरी तथा १०८ कलशों से तथा पंचामृत अभिषेक, मध्यान्ह में धर्मसभा में गणिनी माताजी व संघ के साधुओं के प्रवचन हुए। इस शुभ अवसर पर सेंट्रल टाउन हस्तिनापुर के विद्यालयों में से सात विद्यालयों के छात्र-छात्राओं के द्वारा ऋषभदेव सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये गये। उनमें प्रथम, द्वितीय, तृतीय तथा सांत्वना पुरस्कार दिये गये। कार्यक्रम में ४-५ हजार छात्र-छात्राएं तथा निकटवर्ती अनेक नगरों से जैन बंधु पधारे थे। कार्यक्रम बहुत रोचक थे। सभी ने प्रशंसा की। आर्यिका श्री पवित्रश्री एवं पावनश्री माताजी का ७ मार्च को जम्बूद्वीपस्थल से विहार हुआ। विगत ढाई माह से जम्बूद्वीपस्थल पर प्रवास करके पूज्य गणिनी ज्ञानमती माताजी से खूब ज्ञान लाभ तथा अनुभव ज्ञान प्राप्त किया।

नांदणी (जिला- कोल्हापुर) महा. के भट्टारक श्री जिनसेन स्वामी का ७ मार्च १९९१ को मठ में समाधिमरण हो गया। आपने अंतसमय में आ. श्री सुबलसागर जी महाराज से मुनि दीक्षा ले ली थी। आपने पूर्व में हस्तिनापुर पधारकर पूज्य माताजी से fिवविध विषयों पर धार्मिक चर्चा की थी। आप क्षुल्लक पद का निर्वाह करते थे। जम्बूद्वीपस्थल पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई। उनके स्थान पर क्षुल्लक श्री चन्द्रभूषणजी (शिष्य- आचार्य श्री देशभूषणजी) को भट्टारक पद पर क्षुल्लक वेश में प्रतिष्ठापित किया गया। मुनि श्री निर्वाणसागर जी महाराज का इन्दौर में १२ मार्च १९९१ को समाधिमरण हो गया। उनके प्रति संस्थान की ओर से श्रद्धांजलि अर्पित की गई। पूज्य मुनि श्री १३ वर्ष पूर्व हस्तिनापुर पधारे थे। उन्होंने जम्बूद्वीप संस्थान के विकास के लिए जो सहयोग श्रावकों से करवाया, वह चिरस्मरणीय रहेगा।

आचार्य श्री वीरसागर महाराज के शिष्य ब्र. सुगनचंदजी अजमेर का अपने गृहनगर में २४ मार्च १९९१ चैत्र शु. ९ को ८५ वर्ष की अवस्था में समाधिमरण हो गया। उनके प्रति संस्थान के द्वारा श्रद्धांजलि अर्पित की गई। उन्होंने माताजी की प्रेरणा से सप्तम प्रतिमा के व्रत ग्रहण किये थे, सन् १९६२ से १९६७ तक माताजी के संघ के साथ रहे थे। कलकत्ता, कटक, श्रवणबेलगोल, सोलापुर तथा सनावद तक की यात्रा में समय-समय पर जाकर यात्रा में सहयोग दिया था। पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के आशीर्वाद से स्थापित ब्राह्मी आश्रम जबलपुर की २७ बालब्रह्मचारिणी बहनें २० अप्रैल को पूज्य गणिनी माताजी के दर्शनार्थ पधारी थीं। ५ दिन तक माताजी के पास रहकर अनेक प्रकार के अनुभव तथा मार्गदर्शन आर्यिकाचर्या के विषय में तथा अन्य धार्मिक विषयों में प्राप्त किये। शंकाओं का समाधान भी प्राप्त किया तथा विविध विषयों पर मार्मिक प्रवचन भी सुने।

बारामती (महाराष्ट्र) में वयोवृद्ध आर्यिका श्री अजितमती माताजी का २९ अप्रैल सन् १९९१ को महामंत्र श्रवण करते हुए समाधिमरण हो गया। अजितमती माताजी ने अब से ६३ वर्ष पूर्व सन् १९२८ में चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर महाराज से क्षुल्लिका दीक्षा धारण की थी। आपने १२ वर्ष की सल्लेखना ले रखी थी, उसका यह अंतिम वर्ष था। ७ जनवरी १९९१ को आचार्य बाहुबलीसागर महाराज ने आपको आर्यिका दीक्षा प्रदान कर दी। समाधिपर्यंत आचार्य बाहुबली सागर जी महाराज वहीं रहे। समाधि होने की सूचना प्राप्त होने पर जम्बूद्वीपस्थल पर सभा करके श्रद्धांजलि अर्पित की गई। पूज्य माताजी ने संस्मरण सुनाते हुए कहा कि आचार्य श्री शांतिसागर महाराज का अंतिम दीपक बुझ गया। आर्यिका अजितमती माताजी की समाधि आर्यिकाआें के लिए अनुकरणीय है।

दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश श्री मिलापचंदजी जैन ने १२ मई १९९१ को जम्बूद्वीप स्थल पर पधारकर माताजी से आशीर्वाद प्राप्त किया। १६ मई को जम्बूद्वीप स्थल पर पूज्य माताजी के ससंघ सानिध्य में अक्षयतृतीया पर्व मनाया गया, रथयात्रा निकाली गई, इक्षुरस का प्रसाद वितरित किया गया। २१ मई १९९१ को पूर्व प्रधानमंत्री तथा कांग्र्रेस अध्यक्ष श्री राजीव गांधी की हत्या मद्रास के निकट पेरम्बदूर में मानव बम के द्वारा कर दी गई। देश के लिए दुखद घटना रही। इस घटना से माताजी व संघ को भी हार्दिक क्षोभ हुआ। संस्थान की ओर से उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की गई। पूज्य माताजी के सानिध्य में वैशाख शु. ७ को सुदर्शनमेरु स्थापनादिवस, वै.शु.१२ को जम्बूद्वीप प्रतिष्ठापना दिवस तथा ४ जून को ज्ञानज्योति प्रवर्तन की वर्षगांठ मनाई गई।

जैनसमाज सरधना के विशेष निवेदन को स्वीकार करके माताजी ने ससंघ १३ जुलाई १९९१ को सरधना के लिए मंगल विहार किया। २० जुलाई को भव्य स्वागत के साथ संघ का सरधना नगर में मंगल पदार्पण हुआ।


[सम्पादन]
छत्तीसवाँ चातुर्मास (१९९१- सरधना, जि.-मेरठ- उ.प्र. में)

२५ जुलाई आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी को चातुर्मास की स्थापना उल्लासपूर्ण वातावरण में हुई। श्रावण मास में विविध कार्यक्रम-गुरुपूर्णिमा, वीरशासन जयंती, भगवान पाश्र्वनाथ निर्वाणदिवस आदि आयोजित किये गये। प्रतिदिन आर्यिका श्री चंदनामती माताजी, क्षुल्लक मोतीसागर (मेरे) एवं गणिनी माताजी के प्रवचन हुये। ११ अगस्त को महिला मण्डल स्थापना, श्रा.कृ.१४ से श्रा.शु. ७ तक प्रतिदिन एक-एक विधान हुए। १३ अगस्त को आर्यिका श्री चंदनामती माताजी का दीक्षा दिवस मनाया गया। उसी दिन दिगम्बर जैन बालिकासंघ की स्थापना की गई। १५ अगस्त को स्वतंत्रता दिवस पर विशेष प्रवचन सभा हुई ‘‘अहिंसा से ही विश्वशांति संभव है’’ विषय पर भाषण प्रतियोगिता हुई जिसमें जैनेतर वक्ताओं ने भी भाग लिया। २४ अगस्त को जैन कन्या इन्टर कालेज में रक्षाबंधन पर्व पर विशेष प्रवचन हुए। २५ अगस्त को रक्षाबंधन पर्व का धार्मिक एवं राष्ट्रीय महत्त्व पर सार्वजनिक प्रवचन हुए।

११ सितम्बर से २४ सितम्बर तक सर्वतोभद्र महामंडल विधान सम्पन्न हुआ। २०० से अधिक स्त्री-पुरुषों ने भाग लेकर पूजन की । ११ सितम्बर को अ.भा. दि. जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी के अध्यक्ष साहू श्री अशोक कुमार जैन ने सरधना पधारकर पूज्य माताजी का आशीर्वाद प्राप्त किया। १६ से २२ अक्टूबर तक शिक्षण शिविर का आयोजन हुआ जिसमें सभी वय के लोगों ने भाग लेकर ज्ञानार्जन प्राप्त किया, माताजी के धर्मोपदेश सुने। २३ अक्टूबर शरदपूर्णिमा के दिन पूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की ५८ वीं जन्म जयंती विशाल समारोहपूर्वक मनाई गई जिसमें मुख्यअतिथि के रुप में भा.ज.पा. के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री मुरली मनोहर जोशी पधारे थे। श्री जोशी जी ने माताजी द्वारा संकलित ‘’मुनिचर्या‘’ नामक ग्रंथ का विमोचन किया।

२२ अक्टूबर को अ. भा. दि. जैन युवा परिषद की कार्यकारिणी की बैठक में आगामी तीन वर्ष के लिए बा.ब्र. श्री रवीन्द्र कुमार जैन को अध्यक्ष, मनोज कुमार हस्तिनापुर को महामंत्री सहित १६ पदाधिकारी एवं सदस्यों का चयन किया गया। २६ अक्टूबर को माताजी का ससंघ लश्करगंज में पदार्पण हुआ, वहाँ एक सप्ताह का प्रवास रहा। प्रतिदिन प्रात: से शाम तक प्रवचन, प्रश्नमंच, सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए। २ नवम्बर को संघ का गांधीनगर कालोनी में आगमन हुआ। पूरे चातुर्मास में सरधना नगर धर्ममय हो गया था। धर्मामृत की खूब वर्षा हुई।

१३ नवम्बर को माताजी का सरधना नगर से पुन: हस्तिनापुर के लिए मंगल विहार हुआ। अनेकों स्त्री-पुरुष कह रहे थे कि हम माताजी के बिना कैसे रहेंगे? माताजी का स्नेह वात्सल्य आगे कब कैसे मिलेगा? १४ नवम्बर को संघ सलावा पहुँचा। श्री अमरचंद होमब्रेड मेरठ वालों ने जैन समाज सलावा के साथ अपनी जन्मनगरी में भावभीना स्वागत किया। तीन दिन तक प्रात:, मध्यान्ह तथा रात्रि में प्रवचन आदि के विविध कार्यक्रम हुए। जैनेतर समाज ने भी सभी कार्यक्रमों में उत्साहपूर्वक भाग लिया। सलावा से महलका, मवाना होते हुए १९ नवम्बर को माताजी का ससंघ जम्बूद्वीप स्थल हस्तिनापुर में बैंडबाजों के साथ मंगल पदार्पण हुआ।

[सम्पादन]
चातुर्मास के पश्चात्-

२० नवम्बर कार्तिक शुक्ला चतुर्दशी को पूज्य माताजी के ससंघ सानिध्य में वार्षिक रथयात्रा निकाली गई। २१ नवम्बर कार्तिक शुक्ला पूर्णिमा को लगभग २०-२५ हजार जैन-अजैन श्रद्धालुओं ने जम्बूद्वीप दर्शन का लाभ लिया। पूज्य माताजी के सानिध्य में प्रतिदिन धवला ग्रंथ का स्वाध्याय प्रात: चलता रहा, माताजी का लेखनकार्य चलता रहा, शिष्यों का पठन-पाठन होता रहा। समय-समय पर सामयिक विषयों पर कार्यक्रम भी कराती रहीं। देश के विभिन्न प्रदेशों से आने वाले भक्तों तथा दर्शनार्थियों को धर्मोपदेश देकर कृतकत्य करती रहीं।

२८ जनवरी १९९२ माघ वदी ९ को आर्यिका श्री रत्नमती माताजी की ७वीं पुण्यतिथि पर उनकी चरणछत्री पर चरणों का प्रक्षाल करके पूजन की गई। श्रद्धांजलि सभा में उनके गुणों का स्मरण करते हुए संघ के साधुओं ने तथा अन्य वक्ताओं ने श्रद्धांजलि अर्पित की। गणिनी माताजी ने भी उनके जीवन की विशेषताओं से सभी को परिचित कराया। वे वास्तव में मोहिनी से निर्मोहिनी बन गर्इं, वे रत्नों की खान थीं।

चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर महाराज की परम्परा के पंचमपट्टाचार्य श्री श्रेयांससागर जी महाराज का बांसवाड़ा (राज०) में १९ फरवरी १९९२ को समाधिमरण हो गया। उन्होंने सन् १९९३ में श्रवणबेलगोल में होने वाले भगवान बाहुबली के मस्तकाभिषेक में सम्मिलित होने के लिए ५ फरवरी १९९२ को सलुम्बर (राज.) से विहार किया था। भीमपुर (राज.) में पहुँचने पर आहार के बाद स्वास्थ्य बिगड़ गया। दो दिन में कई दस्त-उल्टी हो गए, तब भी आगे विहार कर दिया। अंततोगत्वा १९ फरवरी को बांसवाड़ा में समाधिमरण हो गया। हस्तिनापुर में सूचना मिलते ही श्रद्धांजलि सभा में उनके प्रति संघ के साधुओं व व्रतियों ने श्रद्धांजलि समर्पित की। गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी ने भी कहा कि संघ परम्परा का एक निर्भीक एवं तपस्वी साधु अचानक चला गया। होनी को कौन टाल सकता है ? २४ फरवरी से ४ मार्च १९९२ तक सरधना निवासी श्री नरेन्द्र कुमार सुनील कुमार (मे.सुनील टेक्सटाईल्स) ने पूज्य माताजी के ससंघ सानिध्य में जम्बूद्वीपस्थल पर इन्द्रध्वज विधान किया।

हस्तिनापुर में भारत विकास परिषद के दो दिवसीय सम्मेलन का उद्घाटन करने पधारे उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री कल्याणसिंह जी ने १५ फरवरी को जम्बूद्वीप स्थल पर बने हेलीपेड पर हेलीकॉप्टर से उतरते ही त्यागीभवन पधारकर पूज्य गणिनी माताजी से आशीर्वाद प्राप्त किया। माताजी ने देश तथा प्रदेश को अहिेंसा के रास्ते पर चलाने की प्रेरणा दी। १६ फरवरी को कल्पवृक्ष सदृश कमलमंदिर में विराजमान भगवान महावीर की प्रतिमा का १७वाँ प्रतिष्ठापना दिवस माताजी की छत्रछाया में मनाया गया। यह प्रतिमा १७ वर्ष पूर्व १९७५ में माघ शु . १३ को एक छोटे कमरे में विराजमान की गई थी। बाद में उसी जगह भव्य कमल मंदिर बनाया गया।

चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की परम्परा के पंचम पट्टाचार्य श्री श्रेयांससागर जी महाराज के स्वर्गारोहण के पश्चात् उसी संघ परम्परा के वरिष्ठ मुनिराज उपाध्याय श्री अभिनंदनसागर जी महाराज को पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी तथा अन्य कई साधुओं की सहमति से ८ मार्च १९९२ को खांदू कालोनी बांसवाड़ा में चतुर्विध संघ के सानिध्य में षष्ठम पट्टाचार्य के पद पर प्रतिष्ठापित किया गया। उक्त समारोह में माताजी ने यहाँ से ब्र. रवीन्द्र कुमार को भेजा था।

पूज्य माताजी के सानिध्य में होली मेले पर वार्षिक रथयात्रा निकाली गई। चैत्र वदी ९ को ऋषभ जयंती २७ मार्च को तथा चैत्र शुक्ला १३, १५ अप्रैल को महावीर जयंती मनाई गई। वैशाख शु. ३ को अक्षय तृतीया पर्व मनाया गया, इसी दिन भगवान ऋषभदेव का प्रथम आहार हस्तिनापुर में हुआ था।

जैन समाज के शीर्ष नेता साहू श्री श्रेयांसप्रसाद जी का १७ मार्च को निधन हो गया। उनके प्रति संस्थान के पदाधिकारियों व सदस्यों ने १९ मार्च को श्रद्धांजलि समर्पित की। साहूजी ने सन् १९८० में जम्बूद्वीप के द्वितीय चरण का शिलान्यास किया था। भगवान बाहुबली के १९८१ में सहस्राब्दि महोत्सव के विषय में उन्होंने समय-समय पर पूज्य माताजी से मार्गदर्शन भी प्राप्त किया था।

कलकत्ता के कर्मठ कार्यकर्ता श्री कल्याणचंद पाटनी का १४ मार्च १९९२ को सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्र पर ह्रदयगति रुक जाने से निधन हो गया। सन् १९६३ में जब माताजी का चातुर्मास कलकत्ता में हुआ था तभी से पाटनी जी की माताजी के प्रति अनन्य भक्ति रही। १४ मार्च को ही करुणादीप के यशस्वी संपादक श्री जिनेद्र प्रकाश जैन का एटा (उ.प्र) में आकस्मिक निधन हो गया। इनकी भी पूज्य माताजी के प्रति अपार भक्ति थी। दोनों महानुभावों के प्रति संस्थान की ओर से श्रद्धांजलि समर्पित की गई।

श्री अमरचंद जैन होमब्रेड परिवार मेरठ ने २९ मई से ९ जून तक इन्द्रध्वज विधान किया। पूज्य गणिनी माताजी के प्रतिदिन विधान के मध्य प्रवचन हुए। मध्य में ३१ मई ज्येष्ठ कृष्णा चतुर्दशी को भगवान शांतिनाथ के निर्वाण कल्याणक के उपलक्ष्य में निर्वाणलाडू चढ़ाया गया तथा रथयात्रा निकाली गई। आषाढ़ अष्टान्हिका में श्री सुधीरकुमार, सुभाषचंद जैन मुजफ्फरनगर ने श्री सिद्धचक्र विधान हर्षोल्लास से किया। ब्र. धरणेन्द्र विधानाचार्य थे। विधानों में आर्यिका श्री चंदनामती माताजी एवं क्षुल्लक श्री मोतीसागर (मेरे) तथा आर्यिका श्री अभयमती माताजी के समय समय पर प्रवचन हुए।


[सम्पादन]
सैंतिसवाँ चातुर्मास (१९९२-जम्बूद्वीप हस्तिनापुर में)

१३ जुलाई १९९२- आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी को जम्बूद्वीपस्थल पर गणिनी माताजी ने ससंघ वर्षायोग की स्थापना की। वर्षायोग स्थापना के अगले दिन पूज्य माताजी के दीक्षागुरु आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज का स्मरण करते हुए गुरूपूर्णिमा के रुप में उनका जन्मदिन मनाया गया। श्रावण कृ. एकम को भगवान महावीर की प्रथम दिव्यध्वनि खिरी थी। उसका स्मरण करते हुए उसे ‘‘वीर शासन जयंती’’ के रूप में मनाया गया। सम्मेदशिखर से मोक्ष प्राप्त करने वाले भगवान पाश्र्वनाथ अंतिम तीर्थंकर थे, उनका श्रावण शु. ७ को मोक्षकल्याणक मनाया गया। सम्मेदशिखर पर्वत की कृत्रिम रचना बनाकर निर्वाणलाडू चढ़ाया गया। भादों शुक्ला दूज- २९ अगस्त को बीसवीं शताब्दि के प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की ३७वीं पुण्य तिथी उनकी पूजा भक्ति तथा गुणानुवाद करके मनाई गई। समस्त कार्यक्रमों में पूज्य गणिनी माताजी का ससंघ सानिध्य प्राप्त रहा। दशलक्षण पर्व में श्री मनोजकुमार जैन हस्तिनापुर ने सपरिवार कल्पदु्रम विधान सम्पन्न किया। श्री अमरचंद होमब्रेड ने भी द्वितीय चक्रवर्ती बनकर पूजा की। विधान पूजन के अतिरिक्त पर्व सम्बंधी प्रवचनों का भी लाभ सबको मिला। विधान की विधि के अनुसार विधानपर्यंत प्रतिदिन चारों प्रकार का दान बांटा गया।

८ से १२ अक्टूबर १९९२ तक जम्बूद्वीप स्थल पर ‘’चारित्र निर्माण संगोष्ठीr‘’ का आयोजन पूज्य माताजी के ससंघ सानिध्य में जम्बूद्वीपस्थल पर किया गया। इस संगोष्ठीr में देश भर से १०० से अधिक उच्चकोटि के विद्वानों के अतिरिक्त सेठ श्री देवकुमारसिंह जी कासलीवाल इंदौर जैसे अनेक श्रेष्ठीगण भी पधारे थे। बहुत सफल संगोष्ठी रही। ११ अक्टूबर १९९२-आसौज शुक्ला १५ (शरदपूर्णिमा) के शुभ दिन पूज्य गणिनी प्रमुख माताजी की ५९वीं जन्मजयंती विशाल समारोहपूर्वक मनाई गई। मुख्य अतिथि के रुप में केन्द्रिय ग्रामीण विकास राज्यमंत्री श्री उत्तम भाई पटेल पधारे थे। राज्य सभा सदस्य चन्द्रिका केनिया भी पधारी थीं। अनेकों प्रदेशों के भक्त भी बड़ी संख्या में पूज्य माताजी के प्रति अपने भक्ति सुमन समर्पित करने के लिए पधारे थे। उसी दिन पूज्य माताजी को उनका अभिनंदनग्रंथ मंत्री महोदय ने विमोचित करके उनके करकमलों में समर्पित किया। ‘’गणिनी ज्ञानमती अभिवंदन ग्रंथ‘’ के संपादक मंडल में कई विद्वानों के नाम हैं किन्तु उसके तैयार करने में सर्वाधिक परिश्रम आर्यिका श्री चंदनामती माताजी ने किया। कई महीनों का समय उसमें लगाया। यह बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य हुआ है। सदियों तक यह ग्रंथ ज्ञानमती माताजी की महिमा को प्रद्योतित करता रहेगा।

राजस्थान की राजधानी गुलाबी नगरी जयपुर में १७ से २९ सितम्बर १९९२ तक पूज्य माताजी द्वारा रचित कल्पदु्रम महामंडल विधान का आयोजन विशालरूप में किया गया था। जिसमें १३०० स्त्री-पुरुषों ने पूजन की तथा प्रतिदिन ५ से १० हजार स्त्री-पुरुष विधान देखने तथा सुनने आते थे। विधान की निर्विघ्न एवं सानंद सम्पन्नता से हर्षित होकर जयपुर से ४५ बसों द्वारा ३००० श्रावक-श्राविकाओं ने १८ अक्टूबर १९९२ को आकर विशाल सभा में विधान की महिमा को बताते हुए पूज्य गणिनी माताजी को ‘‘आर्यिका शिरोमणी’’ की उपाधि प्रदान करते हुए सम्मानित किया। संस्थान की ओर से आगत समस्त महानुभावों का स्वागत किया गया। १४ अक्टूबर कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी को पिछली रात्रि में पूज्य माताजी ने वर्षायोग का समापन किया अनंतर भगवान महावीर के निर्वाण के उपलक्ष्य में निर्वाणलाडू चढ़ाकर दीपावली मनाई गई।

[सम्पादन]
चातुर्मास के पश्चात्-

सनावद (म.प्र.) में सम्पन्न पंचकल्याणक प्रतिष्ठा में क्षुल्लक मोतीसागर जी- धर्मकेशरी आचार्य श्री दर्शनसागर जी महाराज तथा उपाध्याय श्री समतासागर जी महाराज की प्रेरणा एवं सानिध्य में २६ से ३० नवम्बर १९९२ तक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा सानंद सम्पन्न हुई। उसमें सम्मिलित होने के लिए आचार्यश्री ने मुझे (क्षुल्लक मोतीसागर को) सनावद आने के लिए समाज को विशेष प्रेरणा दी। तदनुसार पूज्य माताजी ने मुझे सनावद जाने का आदेश दिया। ब्र. रवीन्द्र कुमार, मनोज कुमार आदि के साथ मैं सनावद गया। १ दिसम्बर को सनावद से वापस प्रस्थान करके सिद्धवरकूट, पावागिरी-ऊन, बड़वानी, बनेड़िया, बजरंगगढ़ के दर्शन करते हुए ५ दिसम्बर को हस्तिनापुर आ गये। माघ वदी ९ दि. १६ जनवरी १९९३ को पूज्य आर्यिका श्री रत्नमती माताजी की ८वीं पुण्यतिथी प्रतिवर्षानुसार, पूजन एवं श्रद्धांजलि सभा करके मनाई गई।

वैसे तो माताजी को धनतेरस-२३ अक्टूबर १९९२ को प्रात: ४ बजे सामायिक के पश्चात् ध्यान करते हुए रायगंज अयोध्या में स्थित भगवान ऋषभदेव की विशालकाय ३१ फुट उत्तुंग प्रतिमा के दर्शन करते हुए अंतर्मन में उस विशाल प्रतिमा का महामस्तकाभिषेक कराने की प्रेरणा प्राप्त हुई, तभी माताजी ने अयोध्या जाने का मन बना लिया था किन्तु अनेक प्रकार से ऊहापोह के पश्चात् अंततोगत्वा अयोध्या के लिए विहार करने का निश्चय हो गया। इससे पहले माताजी ने कभी उस प्रतिमा के साक्षात् दर्शन नहीं किये थे।

[सम्पादन]
जम्बूद्वीप स्थल पर तेरहद्वीप रचना मंदिर का शिलान्यास-

पूज्य गणिनी आर्यिका शिरोमणी श्री ज्ञानमती माताजी के ससंघ मंगल सानिध्य में लाला महावीरप्रसाद जैन बंगाली स्वीट, साउथ एक्स. नई दिल्ली के करकमलों से ‘‘तेरहद्वीप जिनालय’’ का शिलान्यास ५ फरवरी १९९३ माघ शुक्ला तेरस को किया गया। इस विशाल जिनालय में तेरहद्वीप की सुंदर रचना बनाई गई है जिसमें ४५८ अकृत्रिम चैत्यालयों में ४५८ प्रतिमाएं विराजमान के साथ-साथ देवभवनों आदि में २००० से अधिक प्रतिमाएं हैं।

[सम्पादन]
अयोध्या के लिए मंगल विहार-

११ फरवरी १९९३ तिथी फाल्गुन कृष्णा पंचमी गुरुवार को मध्यान्ह १ बजे पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी ने ससंघ अयोध्या तीर्थ के लिए जम्बूद्वीपस्थल से मंगलविहार कर दिया। संघ में आर्यिका श्री चंदनामती माताजी, क्षुल्लक मोतीसागर, क्षुल्लिका श्रद्धामती, ब्र. रवीन्द्र कुमार, ब्र. कु. बीना, कु. आस्था आदि थे। हस्तिनापुर से बहसूमा, मीरापुर, बिजनौर, नहटोर, धामपुर, स्योहरा, काँठ तथा मुरादाबाद में धर्मप्रभावना करते हुए १२ मार्च को भगवान पाश्र्वनाथ की केवलज्ञान कल्याणक भूमि अहिच्छत्र में पदार्पण हुआ। यहाँ संघ ३ दिन रहा। उसी समय इस पुनीत क्षेत्र पर माताजी ने तीस चौबीसी की ७२० प्रतिमाओं को विराजमान करने हेतु ‘‘तीस चौबीसी मंदिर’’ की योजना प्रदान की। यह योजना साकार होकर वहाँ ११ शिखरों वाला अति सुंदर विशाल मंदिर बनकर तैयार हो गया है उसमें ७२० प्रतिमाएं भव्य कमलों पर विराजमान की गई हैं।

अहिच्छत्र से बरेली, शाहजहाँपुर होते हुए महावीर जयंती पर सीतापुर संघ पहुँचा। अहिच्छत्र से पूर्व १ मार्च से ६ मार्च १९९३ तक श्री निर्मल कुमार सेठी की शुगर मिल बिलारी में सिद्धचक्रविधान माताजी के सानिध्य में सम्पन्न हुआ, यहाँ अयोध्या तीर्थविकास के लिए चर्चा प्रारंभ हुई।

४ अप्रैल को महावीर जयंती सीतापुर में उत्साहपूर्वक मनाई गई। वहीं पर पूज्य माताजी का ३७ वाँ आर्यिका दीक्षा जयंती महोत्सव बैसाख वदी दूज-८ अप्रैल १९९३ को भव्य रूप में मनाया गया। यहीं पर अयोध्या में त्रिकाल चौबीसी की ७२ प्रतिमाएं स्थापित करने की योजना ने साकाररूप धारण किया। १५ मिनट में ७२ प्रतिमाओं के दातार सुनिश्चित हो गये। सीतापुर से सिधौैली, बिसवां होते हुए पूज्य आर्यिका श्री रत्नमती माताजी (गणिनी माताजी की जन्मदात्री मां) की जन्मभूमि महमूदाबाद में माताजी के प्रथम बार पदार्पण के मंगल अवसर पर भव्य स्वागत किया। २५ अप्रैल को अक्षय तृतीया पर्व सोल्लास मनाया गया। वहाँ भारी धर्म प्रभावना करके संघ फतेहपुर पहुँचा। फतेहपुर में अपूर्व उत्साह के साथ धर्मामृत की वर्षा हुई।

[सम्पादन]
४० वर्ष के पश्चात् पूज्य माताजी का संघ सहित जन्मभूमि टिकैतनगर में मंगल पदार्पण-

अवध के अनेकों नगरों में महती प्रभावना करते हुए पूज्य माताजी का अपनी जन्मनगरी टिकैतनगर (जिला-बाराबंकी) उ.प्र. में ससंघ ९ मई १९९३ रविवार को मंगल पदार्पण हुआ। भारी गरम जोशी के साथ स्वागत किया गया। स्वागत के लिए प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री कल्याण सिंह पधारे थे। संघ का ८ जून तक टिकैतनगर में प्रवास रहा। ८ जून को अयोध्या तीर्थ के लिए टिकैतनगर से मंगल विहार हुआ। अयोध्या तीर्थ पर १६ जून को माताजी का ससंघ पदार्पण हुआ। १७ जून को त्रिकाल चौबीसी मंदिर का शिलान्यास कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। वैसे तो माताजी ने आने वाला १९९३ का चातुर्मास टिकैतनगर में करने की ९९ प्रतिशत स्वीकृती प्रदान कर दी थी किन्तु अयोध्या तीर्थ की दयनीय स्थिति को देखते हुए उन्होंने १ प्रतिशत छूट का लाभ उठाते हुए अयोध्या में ही १९९३ का चातुर्मास करने की घोषणा कर दी।


[सम्पादन]
अड़तीसवाँ चातुर्मास (१९९३- अयोध्या तीर्थ में)

पूज्य माताजी ने आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी-२ जुलाई १९९३ को संघ सहित रायगंज दि. जैन मंदिर अयोध्या में बड़ी मूर्ति के सामने वर्षायोग की स्थापना की। यहाँ १० माह तक प्रवास रहा। १० माह में पूजा विधान आदि के विविध कार्यक्रम होते रहे। तीन चौबीसी मंदिर का निर्माण कार्य चलता रहा। सन् १९६५ में बड़ी प्रतिमा विराजमान होने के पश्चात २८ वर्षों से या उससे पूर्व बीसवीं शताब्दी में किसी दिगम्बर जैन साधु-साध्वी को चातुर्मास का अवसर नहीं आ पाया। माताजी का यह अयोध्या में प्रथम चातुर्मास था।

[सम्पादन]
पूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की ६०वीं जन्मजयन्ती तथा भारतीय संस्कृति के आद्यप्रणेता भगवान ऋषभदेव पर राष्ट्रीय संगोष्ठी-

२७ से ३१ अक्टूबर १९९३ तक भगवान ऋषभदेव पर एक विशाल संगोष्ठी का आयोजन पूज्य माताजी के ससंघ सानिध्य में रायगंज दि. जैन मंदिर के सामने बड़े भव्य पंडाल में रखी गई थी जिसके विविध सत्रों में अनेकों विद्वानों ने अपने आलेख पढ़े। इस संगोष्ठी में शताधिक जैन तथा जैनेतर विद्वान पधारे थे। यह संगोष्ठी दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान हस्तिनापुर तथा अवध विश्व विद्यालय फैजाबाद के संयुक्त तत्त्वावधान में आयोजित की गई थी। संगोष्ठी के संयोजक डॉ. अनुपम जैन इंदौर थे। संगोष्ठीr का समापन ३१ अक्टूबर को किया गया। ३० अक्टूबर १९९३ आसौज शु. १५ (शरदपूर्णिमा) के शुभ दिन पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी की ६० वीं जन्मजयन्ती का कार्यक्रम प्र्रात: सूर्योदय से पूर्व ही प्रारंभ हो गया था। भक्तों ने आकर माताजी के पादप्रक्षाल कर आरती उतारी, पुष्पवृष्टि की, भजन गाए, नृत्य किये। सर्वत्र खुशी का वातावरण व्याप्त था क्योंकि स्वयं माताजी प्रसन्न मुद्रा में सबको मंगल आशीर्वाद प्रदान कर रही थीं। मध्यान्ह में विशाल विनयांजलि सभा की अध्यक्षता की श्री निर्मल कुमार सेठी ने, तथा मुख्य अतिथि के रूप में पधारे थे श्री आर.के.जैन बंबई। अनेक श्रीमानों, विद्वानों, भक्तों तथा कार्यकर्ताओं ने अपनी विनयांजलियाँ भक्ति विभोर होकर अर्पित कीं। माताजी में विद्यमान अनेक गुणों का वर्णन ५-१० मिनट, घंटे-दो घंटे अथवा दो चार दिनों में करना संभव नहीं था। विनयांजलि केवल प्रतीकात्मकरूप में ही कर पा रहे थे समयाभाव के कारण। पूज्य माताजी द्वारा लिखित ‘’अयोध्या तीर्थ पूजा‘’ पुस्तक का विमोचन श्री त्रिलोक चंद जी कोठारी-कोटा ने किया। और भी अनेक पुस्तकों, पत्र- पत्रिकाओं के विमोचन हुए जिनमें भगवान ऋषभदेवविषयक सामग्री थी। ‘’जैन साहित्य में राम‘’ विषय पर निबंध प्रतियोगिता में प्रथम, द्वितीय, तृतीय पुरस्कार प्रदान किये गये। बाल लेखकों को भी पुरस्कृत किया गया। पुरस्कारों की राशि श्री छोटेलाल जैन पारमार्थिक ट्रस्ट टिवैâतनगर तथा श्रीमती रूपाबाई पारमार्थिक ट्रस्ट सनावद के सौजन्य से प्रदान की गई। ‘’ज्ञानमती चित्रप्रतियोगिता‘’ में ३९ चित्र प्राप्त हुए थे। उन चित्र निर्माताओं को भी प्रथम, द्वितीय, तृतीय तथा शेष को सांत्वना पुरस्कार प्रदान किये गये। अनेक महानुभावों ने इस शुभ अवसर पर ६०-६० वस्तुएं आगत महानुभावों को भेंट में दीं। ‘’ऋषभ जन्मभूमि अयोध्या‘’ पुस्तक, जो कि गणिनी माताजी ने अयोध्या में ही लिखकर तैयार की थी, उसका विमोचन श्री उम्मेदमल पांड्या ने किया।

छोटी छावनी अयोध्या के सुप्रसिद्ध महंत श्री नृत्यगोपालदासजी ने समारोह में पधारकर अपनी विनम्र पुष्पांजलि समर्पित की। दिल्ली, आसाम, नागालैंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अनेक नगरों, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा, हैदराबाद तथा अवध के प्रत्येक जैन आबादी वाले नगरों तथा शहरों से हजारों की संख्या में भक्तों ने पधारकर माताजी की जन्मजयन्ती भारी उत्साहपूर्वक मनाई। पूज्य माताजी का अवध तथा अयोध्या में पहली बार दीर्घकालीन प्रवास तथा चातुर्मास हुआ था।

[सम्पादन]
पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी को ‘’चारित्र चन्द्रिका‘’ उपाधि-

यूं तो माताजी को पूर्व में समय-समय पर अनेक उपाधियों से विभूषित किया गया फिर ‘’चारित्र चन्द्रिका‘’ की उपाधि भी अतीव सार्थक तथा सामयिक रही। सन् १९९२ में आर्यिका श्री चंदनामती माताजी ने शरदपूर्णिमा ११ अक्टूबर को ‘’चरित्र निर्माण संगोष्ठी’’ में आगामी वर्ष को चारित्र उत्थान वर्ष के रूप में मनाने की घोषणा की थी, उसी वर्ष के समापन पर चारित्रचन्द्रिका की उपाधि संघ तथा समस्त जनता ने भक्तिविभोर होकर ३० अक्टूबर १९९३ शरदपूर्णिमा के पावन दिन प्रदान की।

९ नवम्बर को महाराजा इंटर कालेज में पूज्य माताजी के मंगल प्रवचन हुए। कालेज के प्राचार्य श्री सुधांशु जी, विद्यार्थियों तथा अध्यापकों ने सरस्वती वंदना के साथ पुष्प अर्पित करते हुए भव्य स्वागत किया। यह कालेज अयोध्या के राजा साहब द्वारा संचालित है। १६०० छात्र-छात्राओं ने भगवान ऋषभदेव तथा अयोध्या की प्राचीनता का इतिहास रुचिपूर्वक सुना। मेरे व आर्यिका श्री चंदनामती माताजी के भी प्रवचन हुए। इस अवसर पर गुजरात के मुख्यमंत्री चिमन भाई पटेल की ध.प. श्रीमती उर्मिला बेन पटेल भी दर्शनार्थ आ गई थीं। कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी की पिछली रात्रि में आगम की आज्ञानुसार पूज्य माताजी ने ससंघ भक्तिपाठ करके चातुर्मास समाप्ति की घोषणा की, अनंतर भगवान महावीर की पूजा करके निर्वाणलाडू चढ़ाकर दीपावली पर्व मनाया गया। इस प्रकार अयोध्या की पावन भूमि पर वर्ष १९९३ का यह चातुर्मास अनेक महान उपलब्धियों के साथ सम्पन्न हुआ।

[सम्पादन]
चातुर्मास के पश्चात्-

चातुर्मास समाप्ति के साथ जोरदार तैयारियाँ प्रारंभ हो गर्इं भगवान ऋषभदेव की विशाल प्रतिमा के महामस्तकाभिषेक की तथा नवनिर्मित त्रिकाल चौबीसी मंदिर में विराजमान होने वाली त्रिकाल चौबीसी की ७२ जिनप्रतिमाओं की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा की। वैसे तो पूरे चातुर्मास में इस विषय पर अनेकों बैठकें अयोध्या, लखनऊ, दिल्ली आदि में होती रहीं किन्तु अब उसको मूर्तरूप प्रदान करने का समय आ गया। पूरे देश में इस कार्यक्रम की गूंज फैल गई। पूरे अयोध्या का वातावरण ऋषभदेवमय हो गया।

[सम्पादन]
भगवान ऋषभदेव पंचकल्याणक तथा महामस्तकाभिषेक महोत्सव का शुभारंभ-

१३ फरवरी १९९४ रविवार को विशाल पंडाल के सामने दिल्ली निवासी श्री वीरचंद बड़जात्या ने पूज्य गणिनी माताजी का आशीर्वाद प्राप्त करके महोत्सव का शुभारंभ झंडारोहण से किया। प्रतिष्ठाचार्य थे- ब्र.बाबा सूरजमलजी। मुख्य अतिथि के रूप में पधारे थे- केन्द्रीय ग्राम विकास मंत्री उत्तमभाई हरजीभाई पटेल तथा उ.प्र. के पूर्व मुख्यमंत्री भा.ज.पा. नेता श्री कल्याण सिंह जी। अयोध्या के विधायक श्री लल्लूसिंह जी भी पधारे थे। कार्यक्रम की प्रथम सभा ‘’भरत मंडप’’ में हुई जिसका संचालन कर्मयोगी ब्र. श्री रवीन्द्र कुमार जैन ने किया। मेरे, आ. श्री चंदनामती माताजी के तथा गणिनी माताजी के प्रवचन तथा आशीर्वचन हुए। भगवान के माता-पिता बनने का सौभाग्य बाराबंकी निवासी श्री चंदनलालजी व उनकी ध.प. को प्राप्त हुआ। सौधर्म इन्द्र श्री अनिल कुमार जैन प्रीतविहार दिल्ली को बनने का सुअवसर मिला। १३ से १८ फरवरी तक विविध मंडलविधान अनुष्ठान होते रहे। ऋषभदेव पंचकल्याणक तो देश भर में होते रहते हैं, वहाँ उन्हें अपने मंडप को अयोध्यापुरी नाम देना पड़ता है किन्तु यहाँ मणिकांचन संयोग रहा कि ऋषभदेव की नगरी अयोध्या में ही ऋषभदेव पंचकल्याणक हो रहा था।

१९ फरवरी से २३ फरवरी तक क्रमश: पंचकल्याणक हुए। १९ फरवरी को गर्भकल्याणक के दिन केन्द्रीय उपगृहराज्यमंत्री श्री रामलालराही ने पधारकर विशाल प्रतिमा के दर्शन किये तथा माताजी का आशीर्वाद प्राप्त किया। रात्रि में गर्भकल्याणक के बाह्य दृश्य दिखाये गए तथा अंतरंग क्रियाएं हुर्इं।

[सम्पादन]
मुख्यमंत्री श्री मुलायम सिंह यादव पधारे-

२० फरवरी को प्रात: जन्मकल्याणक के अंतर्गत भगवान का जन्माभिषेक हुआ। सैकड़ों नर-नारियों ने पांडुक शिला पर जन्माभिषेक किया। मध्यान्ह में ३ बजे उ.प्र. के मुख्यमंत्री श्री मुलायमसिंह यादव हेलीकॉप्टर से पधारे। मंदिर परिसर में पधारकर सर्वप्रथम पूज्य माताजी के कक्ष में जाकर माताजी का विशेष आशीर्वाद ग्रहण किया तथा कुछ सामयिक चर्चा तथा विशेष मार्गदर्शन प्राप्तकर भगवान ऋषभदेव के दर्शन करते हुए सभा मंच पर पधारे। उपस्थित जनसमुदाय ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ मुख्यमंत्री जी का अभिवादन-स्वागत किया। मुख्यमंत्री के साथ प्रदेश के जेल मंत्री श्री अवधेश प्रसादजी, ग्रामीण विकास मंत्री श्री उमाशंकर कौशिक आदि भी पधारे थे। सभी का समिति की ओर से स्वागत किया गया। सभा की अध्यक्षता कर रहे श्री कैलाशचंद जी चौधरी सनावद का स्वागत मुख्यमंत्री जी ने किया। सभा का संचालन कर्मयोगी ब्र. रवीन्द्र कुमार जैन ने किया।

मुख्यमंत्री श्री मुलायम सिंह जी ने अपने भाषण में स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘’राजनीति में आने से पहले मेरा जीवन जैन समाज के मध्य बीता। जैन स्कूल में पढ़ा तथा जैन स्वूâल में ही पढ़ाया‘’ इस अवसर पर अनेक घोषणाएं भी कीं जिनमें कुछ इस प्रकार से थीं- १-अयोध्या में ऋषभदेव नेत्र चिकित्सालय खोला जावेगा। २-राजघाट राजकीय उद्यान का नाम ‘’ऋषभदेव राजकीय उद्यान’’ कर दिया जावेगा। ३-अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद में ‘‘भगवान ऋषभदेव जैनचेयर’’ की स्थापना के लिए उ. प्र. सरकार की ओर से २५ लाख रु. दिया जावेगा। ४-अयोध्या में ‘‘अवध प्रेस क्लब’’ की स्थापना तथा भवन के लिए १० लाख रु. अनुदान दिया जावेगा इत्यादि मुख्यमंत्री जी ने जो जो घोषणाएं की उनमें से उपरोक्त सभी मूर्तरूप में परिणत हो गई हैं। सभा में मेरे व श्री आ. चंदनामती माताजी के प्रवचनों के अनंतर गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के ओजस्वी प्रवचन हुए। तपकल्याणक के दिन २१ फरवरी को रात्रि में कवि सम्मेलन हुआ,२२ फरवरी को केवलज्ञान कल्याणक के दिन महिलासम्मेलन हुआ। समवसरण की रचना की गई। २३ फरवरी को प्रात: निर्वाणकल्याणक के पश्चात् नवनिर्मित कमल मंदिर में अति सुंदर खिले कमल की गुलाबी पंखुडियों पर क्रमश: त्रिकाल चौबीसी की ७२ प्रतिमाएं दातारों ने अपने हाथों से विराजमान की। प्रतिमाओं के विराजमान होने से कमल की आभा शत गुनी हो गई। २३ फरवरी के मध्यान्ह में उ.प्र. के महामहिम राज्यपाल श्री मोतीलाल वोरा। पूज्य माताजी का आशीर्वाद प्राप्त कर सभा में पधारे। सभा की अध्यक्षता जैन समाज के अग्रणी नेता साहू श्री अशोक कुमार जैन ने की। समिति की ओर से राज्यपाल महोदय का स्वागत किया गया। साथ में पधारीं उनकी ध.प. का भी स्वागत किया गया। साहू श्री अशोक कुमार जी का भी स्वागत हुआ। साहू अशोक जी तीर्थक्षेत्र कमेटी के अध्यक्ष होते हुए भी पहली बार अयोध्या पधारे थे। अयोध्या का मंदिर उन्हीं के पिता श्री साहू शांतिप्रसाद जी ने बनवाया था। मेरे, पूज्य श्री चंदनामती माताजी तथा गणिनी माताजी के प्रवचन हुए। रात्रि में सुप्रसिद्ध संगीतकार रवीन्द्र जैन-बम्बई के भजनों की धूम सभा मंडप में रही। उनका एक भजन बड़ा मार्मिक रहा अयोध्या की महिमा के विषय में-‘’सिर धरने वाली धरती पर पग रखना पड़ते हैं’’ इत्यादि। साहू अशोक कुमार जी ने अपने भाग्य की सराहना करते हुए पूज्य माताजी का भक्तिपूर्वक आभार व्यक्त किया कि मैं जीवन में पहली बार अयोध्या आया हूँ ‘’इस समारोह में मुझे आमंत्रित नहीं किया जाता तो न मालूम कब इस महान शाश्वत तीर्थ के दर्शन होते।‘’ राज्यपाल श्री वोराजी ने भी अपने संक्षिप्त उद््बोधन में कहा कि अयोध्या की प्रसिद्धि अभी तक दुनिया में राम जन्मभूमि के नाम से थी किन्तुु पूज्य माताजी के इस प्रयास से अब जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की जन्मभूमि के नाम से भी जानी जावेगी।

[सम्पादन]
२४ फरवरी का दिन अयोध्या के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गया-

२३ फरवरी को अयोध्या की गली-गली जैन श्रावक-श्राविकाओं से भरी हुई थी। देश के अनेक प्रदेशों से हजारों की संख्या में भक्तगण अयोध्या में पहली बार भगवान ऋषभदेव का महामस्तकाभिषेक देखने तथा करने आये थे। २४ फरवरी को प्रात:काल बहुत बड़ी संख्या में केशरिया परिधान से सुसज्जित होकर अभिषेक करने के लिए तत्पर थे। महामस्तकाभिषेक में प्रथम कलश करने का सौभाग्य दिल्ली के श्रेष्ठी लाला महावीर प्रसाद जैन बंगाली स्वीट, साउथएक्स. नई दिल्ली को प्राप्त हुआ। जल के कलशों से अभिषेक के पश्चात् पंचामृत अभिषेक हुआ। क्रमश: नारियल जल, इक्षुरस, घृत, दूध, दही, सर्वोषधि, कल्कचूर्ण, केशर से अभिषेक की छटा देखते ही बनती थी। भक्तगण भक्ति में सराबोर होकर नृत्य कर रहे थे। वे स्वयं भी अभिषेक के गंधोदक से रंगीन हो रहे थे। इस अवसर पर संगीतकार श्री रवीन्द्र जैन ने भजनों के माध्यम से सभी को भक्ति में सराबोर कर दिया। मंदिर के भीतर भक्तगण भगवान पर पुष्पवृष्टि कर रहे थे तथा बाहर में अयोध्या के राजा विमान से पुष्पवृष्टि करके भगवान के प्रति अपनी भक्ति प्रदर्शित कर रहे थे। आकाशवाणी से कार्यक्रम का सीधा प्रसारण किया जा रहा था। पूज्य गणिनी माताजी व समस्त संघ के हर्ष का पारावार नहीं था, सभी के परिश्रम ने कार्यक्रम में चार चाँद लगा दिये। भगवान की आरती तथा शांतिधारा से महामस्तकाभिषेक कार्यक्रम का समापन हुआ। पूज्य माताजी ने आकाशवाणी के माध्यम से समस्त जनसमुदाय को अपना मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।

समारोह सदियों के लिए अपनी अमिट छाप छा़ेड गया, अयोध्या के इतिहास में एक कीर्तिमान स्थापित कर गया। इससे पहले अयोध्या में जैन समुदाय की इतनी बड़ी भीड़ कभी नहीं देखी गई। पूज्य माताजी ने जिस उद्देश्य को लेकर हस्तिनापुर से विहार किया था, वह शतप्रतिशत सफल रहा। जैन तीर्थ अयोध्या की वीरानियत दूर हो गई। भय के भूत भाग गये, सांप बिच्छू चले गये, गुंडे पलायमान हो गये। बी.बी.सी. लंदन ने अपने प्रसारण में कहा कि अभी तक अयोध्या में दो शक्तियाँ देखी जा रही थीं किन्तु अब तीसरी शक्ति के रूप में जैन उभरकर आये हैं। आगे प्रति पांच वर्ष में इस प्रकार का महामस्तकाभिषेक करने की प्रेरणा पूज्य माताजी ने समिति को प्रदान की जिसे सभी ने विनयपूर्वक स्वीकार किया। १६ जून १९९३ से ६ अप्रैल १९९४ तक के २९५ दिन जैन तीर्थ अयोध्या के इतिहास में स्वर्णिम रहे। केवल पंचकल्याणक अथवा महामस्तकाभिषेक ही नहीं हुआ अपितु क्षेत्र का आमूल चूल विकास हुआ, टोंकों के जीर्णोद्धार हुए। अनेक शिलालेख लगे। यात्रियों की आवासीय सुविधा के लिए ‘‘ज्ञानमती निलय’’ का भव्य निर्माण हुआ।

[सम्पादन]
अयोध्या तीर्थक्षेत्र कमेटी का चुनाव-

पंचकल्याणक प्रतिष्ठा तथा भगवान ऋषभदेव अंतर्राष्ट्रीय महामस्तकाभिषेक महोत्सव २४ फरवरी १९९४ में सम्पन्न होने के पश्चात् चैत्र कृष्णा नवमी ४ अप्रैल १९९४ को भगवान ऋषभदेव जन्मजयंती का वार्षिकोत्सव पूज्य माताजी के ससंघ सानिध्य में रथयात्रा तथा भगवान के अभिषेकपूर्वक सम्पन्न हुआ। उसी दिन अयोध्या तीर्थक्षेत्र कमेटी का चुनाव भी हुआ। जिसमें ब्र. रवीन्द्र कुमार को अध्यक्ष, सरोज जैन फतेहपुर को महामंत्री तथा प्रद्युम्न कुमार जैन (छोटी सा) टिकैतनगर को कोषाध्यक्ष के रूप में चुना गया। उपाध्यक्ष, मंत्री आदि के पदों के लिए योग्य एवं अनुभवी महानुभावों को चुना गया। इस कमेटी के पदाधिकारियों का चुनाव आगामी ३ वर्ष के लिए किया गया। विगत १२ वर्षों से लगभग वे ही पदाधिकारी क्षेत्र की उन्नति कर रहे हैं।

६ अप्रैल १९९४ को माताजी ने ससंघ अयोध्या से लखनऊ के लिए मंगल प्रस्थान किया। २२ अप्रैल को लखनऊ में संघ का पदार्पण डालीगंज में हुआ। दो माह तक लखनऊ की विभिन्न कालोनियों में माताजी का भ्रमण हुआ जिससे अनेक प्रकार के आयोजनों से सर्वत्र ज्ञान की गंगा प्रवाहित हुई। ११ जून से १९ जून तक इन्दिरानगर कालोनी में शिक्षण शिविर, संगोष्ठी तथा श्रावक सम्मेलन आदि सम्पन्न हुए।

पूज्य माताजी के मंगल सानिध्य में चारबाग में महावीर जयंती का समारोह बहुत उत्साहपूर्वक मनाया गया। वैशाख कृष्णा दूज १ मई १९९४ को लखनऊ के सुप्रसिद्ध आडिटोरियम ‘’रवीन्द्रालय‘’ में पूज्य माताजी का ३८वाँ आर्यिका दीक्षा जयंती का कार्यक्रम भी अति उल्लासपूर्वक वातावरण में सम्पन्न हुआ। ९ जून को माताजी ने विशाल जनसमूह के मध्य इन्दिरानगर में वर्ष १९९४ का चातुर्मास टिकैतनगर में करने की घोषणा की जिससे पूरे अवध में हर्ष की लहर दौड़ गई।

२३ जून को माताजी का इन्दिरानगर लखनऊ से विहार होकर २५ जून को बाराबंकी में पदार्पण हुआ। यहाँ १० जुलाई तक सिद्धचक्र विधान, शिक्षण शिविर आदि अनेक धर्मप्रभावना के कार्यक्रम सम्पन्न हुए। ११ जुलाई को बाराबंकी से टिकैतनगर के लिए विहार हुआ।


[सम्पादन]
उन्तालिसवाँ चातुर्मास (१९९४-टिकैतनगर (बाराबंकी-उ.प्र. में)

२१ जुलाई १९९४ आषाढ़ शु. १४ को टिकैतनगर में चातुर्मास की स्थापना-चातुर्मास स्थापना के कार्यक्रम में अवध के अनेक नगरों से भक्तगण पधारे थे। इसी दिन पूज्य माताजी ने केशलोंच भी किये। पिच्छी परिवर्तन भी किया गया। पूज्य माताजी के क्षुल्लिका दीक्षा के पश्चात् प्रथम चातुर्मास सन् १८५३ में आचार्य श्री देशभूषण जी महाराज के साथ टिकैतनगर में हुआ था, तब से ४० वर्षों के बाद टिकैतनगर निवासियों को चातुर्मास कराने का स्वर्ण अवसर प्राप्त हुआ।

आषाढ़ की आष्टान्हिका में पूज्य माताजी के सानिध्य में चार सिद्धचक्र मंडल विधानों का एक साथ आयोजन किया गया। वर्षायोग के साथ कार्यक्रम प्रारंभ हो गये। आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा को आचार्य श्री वीरसागर महाराज की जन्मजयन्ती, श्रावण कृष्णा एकम् को वीरशासन जयंती मनाई गई। १३ अगस्त १९९४ को आर्यिका श्री चंदनामती माताजी का ५वाँ दीक्षा दिवस समारोहपूर्वक मनाया गया। १२,१३,१४ अगस्त को तीर्थराज श्री सम्मेदशिखर एवं भगवान पाश्र्वनाथ पर संगोष्ठीr तथा चित्र प्रतियोगिता का आयोजन किया गया जिसमें स्थानीय बालक-बालिकाओं तथा स्त्री-पुरुषों ने भाग लिया। प्रतियोगियों ने भगवान पाश्र्वनाथ तथा सम्मेदशिखर के सुन्दर-आकर्षक चित्र बनाये। इसी शुभ अवसर पर श्री मदनलाल जैन एवं सुभाषचंद जैन ने १२ से २३ अक्टूबर तक इन्द्रध्वज विधान सम्पन्न किया जिसमें अनेकों स्त्री-पुरुषों ने भाग लेकर पुण्योपार्जन किया।

दशलक्षण पर्व से पूर्व भादों सुदी २, ७ सितम्बर को चारित्रचक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की पुण्य तिथी मनाई गई। उक्त अवसर पर त्रिदिवसीय संगोष्ठीr तथा आचार्यश्री से संबंधित चित्र प्रतियोगिता भी रखी गई थी। ९ सित. भादव सुदी ५ से १८ सित. भादों सुदी १४ तक विविध कार्यक्रमों के साथ दशलक्षण पर्व मनाया गया। दस उपवास, पांच उपवास, तीन उपवास, दो उपवास करने वाले अनेकों बालक-बालिकाओं तथा स्त्री-पुरुषों का स्वागत किया गया। दशधर्म तथा तत्त्वार्थसूत्र पर दोनों माताजी तथा मेरे प्रवचन हुए। २० सित. को क्षमावणी पर्व मनाया गया। २२ सित. को क्षमावणी पर्व के अवसर पर सार्वजनिक सभा में श्री चंदनामती माताजी ने अपनी जन्मभूमि में पहली बार केशलोंच किये।

[सम्पादन]
जन्मभूमि टिकैतनगर में षष्ठिपूर्ति का आयोजन-

पूज्य माताजी के षष्ठीrपूर्ति समारोह के पावन अवसर पर श्री प्रद्युम्न कुमार जैन (छोटी सा) अमर उद्योग टिकैतनगर ने ६ से १७ अक्टूबर को सर्वतोभद्र महामंडल विधान का आयोजन किया। षष्ठीrपूर्ति समारोह का भव्य आयोजन १७ से १९ अक्टूबर तक विशाल समारोहपूर्वक आयोजित किया गया। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल श्री मोतीलाल वोरा, कारागार मंत्री अवधेशप्रसाद जी, फैजाबाद के पूर्व विधायक श्री जयशंकर प्रसाद पांडे आदि अनेक राजनैfितक व प्रशासनिक अधिकारी पधारे। देशभर के (माताजी के निकटस्थ) ६१ श्रेष्ठियों का सम्मान किया गया। ६१ सिलाई मशीनें बांटी गर्इं, ग्रामीण स्त्री-पुरुषों को साड़ियाँ व कम्बल बांटे गये। श्री हंसराज जैन लखनऊ वालों की तरफ से संपूर्ण टिकैतनगर के समस्त जातियों के नरनारियों को व आसपास ग्रामों से आई जनता के लिए भंडारा (प्रीतिभोज) का आयोजन किया गया। टिकैतनगर के इतिहास में एक यादगार कार्यक्रम हुआ। शरदपूर्णिमा के दिन ही श्री महावीर प्रसाद जैन बंगाली स्वीट सेंटर दिल्ली के द्वारा टिकैतनगर में निर्मित ज्ञानमती कीर्तिस्तम्भ का उद्घाटन किया गया। रात्रि में डी.पी. कौशिक आर्ट गु्रप मुजफ्फरनगर द्वारा अतीव आकर्षक रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया। श्री छोटी सा., श्री मदनलाल जैन तथा सुभाष चंद जैन की ओर से समस्त जैन बंधुओं के लिए प्रीतिभोज का आयोजन किया गया था।

वर्षायोग के मध्य टिकैतनगर से मात्र ६ कि.मी. दूर दरियाबाद में २४ से ३० सितम्बर तक आर्यिका श्री चंदनामती माताजी तथा मैंने जाकर अनेक विषयों पर शिक्षण प्रदान करके ज्ञानामृत की वर्षा की । वहाँ के लालबहादुर शास्त्री इन्टर कालेज में भी प्रवचन हुए। चातुर्मास समापन की पावन बेला में वर्षायोग समापन के साथ भगवान महावीर का निर्वाणलाडू चढ़ाया गया, दीपावली मनाई गई। जनमानस में बाहर से उल्लास दिखाई दे रहा था किन्तु चातुर्मास समापन की घोषणा से सबके मन रोने लगे थे कि अब माताजी विहार करने के लिए स्वतंत्र हो गई हैं।

[सम्पादन]
टिकैतनगर से विहार-

विहार के समय मंदिर से निकलते ही स्त्री-पुरुषों, बालक-बालिकाओं की अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी। उसके साथ अनेक लोग जोर जोर से सिसकियाँ भर कर रोने लगे। कह रहे थे माताजी हम आपके बिना कैसे रहेगें? हमारे दिन कैसे व्यतीत होेंगे? कुछ आगे बढ़ने पर सिसकियाँ करुणव्रंâदन में बदल गर्इं। ऐसा लग रहा था मानों नगरनिवासी अश्रुधाराओं से माताजी के पादप्रक्षाल कर रहे हैं। अत्यंत कठोर हृदय करने के बावजूद भी सबके शोक की उमड़ती सरिता देखना पूज्य माताजी तथा समस्त संघ के लिए बहुत कठिन हो रहा था। टिकैतनगर से दरियाबाद जाने तक भी ६ कि.मी. तक सैकड़ों लोगों के आंसू बंद नहीं हो पा रहे थे। यह रुदन जन्मभूमिवासियों के अपनत्व तथा वात्सल्य को बता रहा था। वह दिन था ९ नवम्बर १९९४ का।

[सम्पादन]
चातुर्मास के पश्चात्-

दरियाबाद में ९ नवम्बर को संघ का प्रवेश हुआ और उसी दिन से वहाँ कल्पदु्रम विधान प्रारंभ हो गया जो १९ नवम्बर को पूर्ण हुआ। विधान के मध्य विविध प्रकार के ज्ञानवर्धक कार्यक्रम तथा दोनों माताजी व मेरे समय-समय पर प्रतिदिन प्रवचन भी हुए, दरियाबाद से अतिशय क्षेत्र त्रिलोकपुर के लिए २० नवम्बर को प्रस्थान हुआ। २१ नवम्बर से १ दिसम्बर १९९४ तक कल्पदु्रम विधान प्रभावनापूर्वक सम्पन्न हुआ, अतिशययुक्त भगवान नेमिनाथ की प्रतिमा का मस्तकाभिषेक हुआ। लखनऊ, बाराबंकी, टिकैतनगर, फतेहपुर आदि नगरों से भक्तगण बड़ी संख्या में पधारे थे।

त्रिलोकपुर से प्रस्थान करके माताजी का ससंघ १६ दिसम्बर १९९४ को पुन: अयोध्या में पदार्पण हुआ। रायगंज स्थित बड़ी प्रतिमा वाले मंदिर के एक तरफ समवसरण मंदिर में समवसरण रचना तथा मंदिर के शिखर का तथा दूसरी तरफ गतवर्ष में निर्मित तीन चौबीसी मंदिर के शिखर का निर्माणकार्य तेजी से चल रहा था। माताजी के पहुँचने से ज्ञान की गंगा भी प्रवाहित होने लगी। आर्यिका चंदनामती माताजी, क्षुल्लक मोतीसागर जी तथा स्वयं गणिनी माताजी द्वारा संघ के शिष्यों को अध्ययन कराया जा रहा था। आने वाले श्रावक भी लाभ लेते थे। २९ दिसम्बर १९९४ की शाम को सूचना मिली कि मेरे दीक्षागुरु वात्सल्य रत्नाकर आचार्य श्री विमलसागर जी महाराज का पावन सिद्धक्षेत्र सम्मेदशिखर में आज ही समाधिमरण हो गया, यह समाचार सुनकर संघ में सभी को क्षोभ हुआ। माताजी के सानिध्य में श्रद्धांजलि सभा की गई। ३० दिसम्बर को पूज्य माताजी के सानिध्य में सभा का आयोजन करके साधुओं तथा संघ के व्रतियों तथा आये हुए श्रावकों ने श्रद्धांजलि अर्पित की।

निर्माणाधीन समवसरण मंदिर में विराजमान होने वाली प्रतिमाओं की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा १५ से २० फरवरी १९९५ को होना निश्चित हुआ था उसी की तैयारी जनवरी १९९५ से प्रारंभ हो गई थी। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार १५ फरवरी को झंडारोहण के साथ पंचकल्याणक प्रतिष्ठा का कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। १६ से २० फरवरी तक क्रमश: पंचकल्याणक महती प्रभावनापूर्वक सम्पन्न हुए। २० फरवरी को प्रात: मोक्षकल्याणक के पश्चात् समवसरण मंदिर में यथा- स्थान प्रतिमाएं विराजमान की गर्इं अनंतर त्रिकाल चौबीसी तथा समवसरण मंदिर के शिखरों पर कलशारोहण तथा ध्वजारोहण किये गये।

[सम्पादन]
ऋषभदेव राजकीय उद्यान में भगवान ऋषभदेव प्रतिमा का अनावरण-

एक भव्य शोभायात्रा के साथ पूज्य माताजी ससंघ रायगंज से ऋषभदेव राजकीय उद्यान में पहुँचीं, २१ फुट की प्रतिमा को बनने में एक माह का समय लगा किन्तु राजकीय उद्यान में प्रतिमा स्थापित करने की स्वीकृति पैâजाबाद के तत्कालीन कमिश्नर श्री राधेश्याम कौशिक ने मात्र १५ सेकेड में प्रदान की थी। उन्हीं के करकमलों से प्रतिमा का अनावरण कराया गया। कौशिकजी का भावभीना स्वागत किया गया। पूज्य माताजी ने कमिश्नर महोदय को खूब आशीर्वाद प्रदान किया। वह प्रतिमा उद्यान में आने वालों को सहजरूप में वीतरागता का पावन संदेश देकर पुण्योपार्जन करा रही है, मूर्ति निर्माता श्री महावीर प्रसाद जैन बंगाली स्वीट सेंटर नई दिल्ली द्वारा लगाया गया द्रव्य सार्थक हो गया। उ.प्र. के मुख्यमंत्री श्री मुलायमसिंह यादव गतवर्ष जब महामस्तकाभिषेक महोत्सव में पधारे थे, तब डॉ. राममनोहर लोहिया विश्व विद्यालय में ऋषभदेव जैन शोधपीठ खोलने की घोषणा की थी। तदनुसार ५ फरवरी १९९५ को उ.प्र. के राज्यपाल के प्रमुख सचिव श्री योगेन्द्र नारायण मिश्र ने विश्वविद्यालय परिसर में शोधपीठ का शिलान्यास किया। उक्त अवसर पर गणिनी माताजी, आ.श्री चंदनामती माताजी, क्षु. मोतीसागर महाराज, ब्र. रवीन्द्रकुमार तथा संघ की ब्रह्मचारिणी बहनें उपस्थित थीं। वह शोधपीठ तैयार होकर कार्य कर रही है।

[सम्पादन]
ज्ञानमती माताजी को विश्वविद्यालय द्वारा डी.लिट् की उपाधि-

५ फरवरी १९९५ को विश्वविद्यालय परिसर में शोधपीठ के शिलान्यास में पूज्य माताजी की उपस्थिति का लाभ उठाते हुए तत्कालीन कुलपति के.पी. नौटियाल ने माताजी को विश्व विद्यालय की मानद उपाधि डी.लिट. से सम्मानित किया। यह सम्मान किसी भी दिगम्बर जैन साधु को देश में प्रथम बार प्रदान किया गया। मुख्यमंत्री महोदय की घोषणानुसार भगवान ऋषभदेव नेत्र चिकित्सालय भी अयोध्या तथा आसपास की जनता को लाभ पहुँचा रहा है। ९ मार्च १९९५ को पूज्य माताजी ने अयोध्या में सरयूतट पर स्थित स्फटिक शिला नामक आश्रम में जाकर सर्वधर्म सम्मेलन में ससंघ उपस्थित होकर उपस्थित जनसमुदाय को जैनधर्म की प्राचीनता से अवगत कराया। १९ से २७ मार्च तक नवनिर्मित समवसरण मंदिर में कल्पदु्रम मंडल विधान सम्पन्न हुआ। विधान में अवध के अनेक नगरों से भक्तगण पधारे थे, सभी ने प्रवचनों का लाभ लिया।

[सम्पादन]
२८ मार्च को अयोध्या से माताजी का ससंघ हस्तिनापुर के लिए मंगल विहार-

मंगल विहार से पूर्व की सभा में आ. श्री चंदनामती माताजी ने अपने उद्बोधन के मध्य एक मार्मिक भजन प्रस्तुत किया जिससे सभी उपस्थित जन- समुदाय के नेत्र सजल हो गये, उसकी दो पंक्तियां इस प्रकार से थीं-

निधियाँ कर्इं दे दी हैं अयोध्या को मात ने।

अब तीर्थ को रखना मेरे भक्तों सम्हाल के।।

अयोध्या से भगवान संभवनाथ की जन्मभूमि श्रावस्ती होेकर बहराइच, जरवलरोड, गनेशपुर, त्रिलोकपुर में धर्मप्रभावना करते हुए संघ का १६ अप्रैल को तहसील फतेहपुर में पदार्पण हुआ, जहाँ पूज्य माताजी का १७ अप्रैल वैशाख वदी दूज को ३९ वाँ आर्यिका दीक्षा समारोह भव्यतापूर्वक मनाया गया। फतेहपुर से भीषण गर्मी में विहार करके मार्ग के अनेक नगरों में धर्मामृत एवं ज्ञानामृत की वर्षा की।

[सम्पादन]
२८ मई १९९५ को भगवान शांतिनाथ की जन्मभूमि हस्तिनापुर में पुन: मंगल पदार्पण-

पूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का संघ सहित अवध प्रांत की २० माह की यात्रा प्रभावनापूर्वक सानंद सम्पन्न करके जम्बूद्वीप हस्तिनापुर में मंगल पदार्पण हुआ। दि. जैन त्रिलोक शोध संस्थान के सदस्यों ने भावभीना स्वागत किया। माताजी के आगमन से सभी अतीव हर्षित थे। स्वाध्याय,अध्ययन, पठन-पाठन, लेखन आदि दैनिक कार्यों के साथ-साथ आगामी कार्यक्रमों की रूपरेखा बनना प्रारंभ हो गयी। अक्टूबर में पंचवर्षीय जम्बूद्वीप महोत्सव तथा माताजी का जन्मजयंती उत्साहपूर्वक मनाने की चर्चा चलने लगी।


[सम्पादन]
चालिसवाँ चातुर्मास (१९९५-जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर में)

११ जुलाई १९९५- आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी को संस्थान के पदाधिकारी, सदस्यों तथा दिल्ली, मेरठ, सरधना, खतौली, मवाना आदि के भक्तों के निवेदन पर माताजी ने वर्ष १९९५ का चातुर्मास जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर में करने की घोषणा के साथ आगम विधिपूर्वक भक्तियाँ पढ़कर चातुर्मास की स्थापना की। प्रतिवर्षानुसार पूर्णिमा को पूज्य माताजी के दीक्षागुरु आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज की जन्म जयंती तथा श्रावण कृ. १ को वीरशासन जयंती मनाई गई जिनमें माताजी व अन्य साधुओं का उद्बोधन हुआ।

चातुर्मास स्थापना वाले दिन पूज्य माताजी ने केशलोंच किये। आषाढ़ की अष्टान्हिका में सिद्धचक्र विधान राजकुमार जैन तथा प्रद्युम्न कुमार जैन टिकैतनगर ने किया। विधान के समापन पर बाराबंकी, तहसील फतेहपुर, लखनऊ आदि से भी महानुभाव पधारे थे। कार्यक्रमों की शृंखला में श्रावण शुक्ला ७ को भगवान पाश्र्वनाथ का निर्वाणोत्सव मनाया गया, निर्वाणलाडू संघ के सानिध्य में चढ़ाया गया। भादों शु. दूज को चारित्रचक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की ४१ वीं पुण्य तिथि मनाई गई। दशलक्षण पर्व में पूजा के साथ-साथ दशधर्म तथा तत्त्वार्थसूत्र पर प्रतिदिन गणिनी ज्ञानमती माताजी, आर्यिका श्री चंदनामती माताजी तथा मेरे प्रवचन हुए, रात्रि में प्रश्नमंच तथा भजन-भक्तिनृत्य हुए, इन्द्रध्वज मंडल विधान भी पर्व में सम्पन्न हुआ।

श्रावण शुक्ला पूर्णिमा को सामूहिक रूप से रक्षाबंधन पर्व मनाया गया। अकंपनाचार्य आदि ७०० मुनियों की तथा विष्णुकुमार मुनिराज की पूजन, यज्ञोपवीत परिवर्तन हेतु हवन हुआ। भगवान श्रेयांसनाथ जी का निर्वाणलाडू चढ़ाया गया। श्रावण शुक्ला ११ को आर्यिका श्री चंदनामती माताजी का छठा दीक्षा दिवस तथा आसौज कृष्णा १४ को मेरा ५५ वाँ जन्मदिवस सामान्य रूप से मनाया गया।

विगत दो वर्षों से मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र ट्रस्ट कमेटी के महानुभाव बार-बार मांगीतुंगी पधारकर वहाँ कई वर्षों से बक्सों में बंद प्रतिमाओं की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा कराने हेतु माताजी के पास आते रहे। पूज्य आर्यिका श्री श्रेयांसमती माताजी सैकड़ों पत्र लिखकर गणिनी माताजी से निवेदन करती रहीं कि आप जैसी ‘‘दिव्य शक्ति’’ के आये बिना मांगीतुंगी में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा होना संभव नहीं है, इस विषय पर माताजी ने पूर्व मेंं तथा इस चातुर्मास में भी कई बार सोचा-विचारा किन्तु दूरी देखकर जाने की हिम्मत नहीं हो पा रही थी। चर्चाओं के चलते आसौज माह का शुक्ल पक्ष आ गया।

[सम्पादन]
जम्बूद्वीप पंचवर्षीय महोत्सव-

जम्बूद्वीप महोत्सव की पूर्व बेला में २५ सितम्बर से ३ अक्टूबर १९९५ तक तीन मूर्ति मंदिर जम्बूद्वीप स्थल पर सम्पन्न हुआ। १ अक्टूबर को सरस्वती माता की महाआराधना की गई। जम्बूद्वीप महोत्सव का शुभारम्भ २ अक्टूबर को श्री नरेश बंसल द्वारा किये गये झंडारोहण से हुआ। ४ से ६ अक्टूबर नवनिर्मित ॐ मंदिर, वासुपूज्य मंदिर तथा शांतिनाथ मंदिर में वेदी प्रतिष्ठा होकर भगवान विराजमान करके तीनों मंदिरों पर कलशारोहण तथा ध्वजारोहण हुए। ४ से ७ अक्टूबर तक ‘’ गणिनी आर्यिका श्री ज्ञानमती साहित्य संगोष्ठी‘’ सम्पन्न हुई जिसमें शताधिक विद्वानों ने भाग लिया। ६ अक्टूबर को अ. भा. दि. जैन युवा परिषद का नैमित्तिक अधिवेशन हुआ, ७ अक्टूबर को अ.भा. दि. जैन पत्रकार सम्मेलन, चित्र प्रतियोगिता, विद्वानों के मध्य वाद-विवाद प्रतियोगिता, जम्बूद्वीप प्रदक्षिणा प्रतियोगिता आदि सम्पन्न हुए। ८ अक्टूबर १९९५ को प्रातः सुदर्शन मेरू की पांडुक शिला पर १००८ कलशों से भगवान शांतिनाथ का अभिषेक हुआ। मध्यान्ह में गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के ६२ वें जन्म जयन्ती समारोह की विशाल सभा हुई जिसमें देश के विभिन्न प्रदेशों से हजारों की संख्या में नर-नारी सम्मिलित हुए। केद्रीय खाद्य मंत्री चौधरी श्री अजित सिंह ने जन्मजयंती महोत्सव का उद्घाटन दीप प्रज्ज्वलन करके किया पुन: पूज्य गणिनी माताजी द्वारा रचित समयसार टीका के उत्तरार्ध का विमोचन किया। इस शुभ अवसर पर श्री अजित सिंह जी ने णमोकार महामंत्र बैंक का भी उद्घाटन किया। डॉ. अनुपम जैन-इन्दौर को प्रथम ‘‘गणिनी आर्यिका ज्ञानमती पुरस्कार’’ संस्थान की ओर से प्रदान किया गया, जिसमें एक लाख रुपया, रजत प्रशस्ति, शाल एवं श्रीफल भेंट किया गया। पुरस्कार सौजन्यकत्र्ता श्री अनिल कुमार जैन कमल मंदिर, प्रीत विहार- दिल्ली थे।

महोत्सव के मध्य सन् १९९४ में अयोध्या में सम्पन्न महोत्सव संबंधी ‘‘अयोध्या स्मारिका’’ का विमोचन किया गया। शरीर स्वस्थता के लिए डॉ. देवेन्द्र कुमार जैन भोपाल ने एक्यूप्रेशर चिकित्सा शिविर का आयोजन किया था। इस समारोह में ६२ विद्वानों को सम्मानित किया गया। श्री मदनलाल जैन टिकैतनगर ने ग्रामीण महिलाओं को ६२ साड़ियां तथा श्री उमेशचंद जैन टिकैतनगर ने ६२ कम्बल वितरित किये। चौधरी अजित सिंह जी ने श्रावकों के साथ स्वयं भी माताजी के चरण दूध से प्रक्षालित किये। इस प्रकार शरदपूर्णिमा का दिन विविध कार्यक्रमों से आलोकित करता हुआ माताजी के गुणगान के साथ पूर्ण हुआ। पुनः पूर्णिमा के चन्द्रमा ने समस्त पृथ्वी मंडल को अपनी शुभ एवं शीतल किरणों से आलोकित करते हुए रात्रि के ९:१५ पर सन् १९३४ में जगत जननी गणिनी आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी को जन्म देने का सौभाग्य प्राप्त किया। शरदपूर्णिमा धन्य हो गई।

शरद पूर्णिमा के १५ दिन पश्चात् चातुर्मास समापन की बेला आ गई। कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी की पिछली रात्रि में पूज्य माताजी ने ससंघ भक्तिपाठ करते हुए वर्षायोग की निष्ठापना की। अनंतर कमल मंदिर में भगवान महावीर की प्रतिमा के समक्ष अभिषेक पूजापूर्वक निर्वाणलाडू चढ़ाया गया। शाम को दीपावली मनाई गई। मवाना में पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी के सानिध्य में २६ अक्टूबर से ३ नवंबर तक इन्द्रध्वज विधान सम्पन्न हुआ। वहाँ ३१ अक्टूबर को माताजी के सार्वजनिक सभा में केशलोंच हुए। मवाना प्रवासपर्यंत पूज्य आर्यिका श्री चंदनामती माताजी के प्रवचन हुए। ३ नवम्बर को माताजी का पुनः जम्बूद्वीप स्थल पर पदार्पण हुआ। ६-७ नवम्बर में कार्तिक मेला हुआ जिसमें प्रतिवर्ष की भांति २५ हजार जैन-जैनेतर नर-नारियों ने जम्बूद्वीप के दर्शन किये।

[सम्पादन]
चातुर्मास के पश्चात्-

२५ नवम्बर १९९५ को प्रातः काल पूज्य माताजी ने बिना किसी से विचार-विमर्श किये २७ नवम्बर को मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र (महाराष्ट्र) के लिए विहार की घोषणा कर दी, यह घोषणा सुनते ही संघ के सभी लोग आश्चर्य चकित हो गये। फिर भी सभी ने माताजी के मुखारविंद से निकले हुए शब्दों को शिरोधार्य करके संघ की ब्रह्मचारिणी बहनों ने, संघस्थ साधुओं ने तथा ब्र. रवीन्द्र कुमार ने विहार की तैयारी प्रारंभ कर दी। २७ नवंबर सोमवार को शुभ मुहूर्त में विहार हो गया। संघ में पूज्य गणिनी आर्यिका शिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी, पूज्य आर्यिका श्रीचंदनामती माताजी, मंैं (क्षु. मोतीसागर) क्षु. श्री श्रद्धामती, कर्मयोगी ब्र. रवीन्द्र कुमार, ब्र. श्रीचंद जैन, कु. बीना, कु. आस्था, कु. सारिका, कु. चन्द्रिका, कु. इन्दु, कु. अलका थे।

मांगातुंगी के लिए माताजी के ससंघ विहार की सूचना प्राप्त होते ही न केवल महाराष्ट्र में अपितु रास्ते में आने वाले प्रदेशोें के नगर-नगर, शहर-शहर में हर्ष की लहर दौड़ गई। मवाना, मेरठ, मोदीनगर, गाजियाबाद होते हुए संघ का ८ दिसम्बर १९९५ को राजधानी दिल्ली में ऋषभविहार में मंगल पदार्पण हुआ। ९ दिसम्बर को प्रीतविहार में संघ की अगवानी समाज के महानुभावों ने की। पूज्य गणिनी माताजी, चंदनामती माताजी व मेरे प्रवचन हुए। १० दिसम्बर को मध्यान्ह में संघ का आगमन जैन बालाश्रम में हुआ। बालाश्रम के प्रांगण में साहू श्री अशोक कुमार जैन की अध्यक्षता में विशाल सभा हुई जिसमें साहू जी ने श्रीफल चढ़ाकर संघ के प्रति विनयभाव प्रकट किये। अनेक महानुभावों ने संघ के स्वागत में अपनी विनयांजलि प्रस्तुत की।

हस्तिनापुर से मांगीतुंगी पहुँचने तक का संपूर्ण भार वहन करने वाले लाला श्री महावीर प्रसाद जैन बंगाली स्वीट, साउथ एक्स., नई दिल्ली को संघपति घोषित करते हुए साहू अशोक जी ने उन्हें पगड़ी पहनाकर दिल्ली जैन समाज की ओर से स्वागत किया। पूज्य माताजी का १९८२ के पश्चात् १३ वर्षों के बाद राजधानी में आगमन हुआ था। दिल्ली के विभिन्न क्षेत्रों में धर्मामृत की वर्षा करते हुए १८ दिसम्बर को कुन्दकुन्दभारती में पदार्पण हुआ जहाँ ज्ञान एवं विद्या का अपूर्व मिलन हुआ। २० वर्ष के बाद दो प्रभावक ज्ञानी साधुओं-गणिनी ज्ञानमती माताजी तथा आचार्यश्री विद्यानंद महाराज का मंगल मिलन हुआ। १९ दिसम्बर को प्रात:कालीन प्रवचन सभा में विचारों का आदान-प्रदान हुआ। कुन्दकुन्दभारती से प्रस्थान करते समय आचार्यश्री ने एक ‘‘मंगल कलश’’ भेंट करवाकर मांगीतुंगी यात्रा की मंगल कामना की। २१ दिसम्बर को महरोली स्थित संघपति लाला महावीर प्रसाद जी के फार्महाउस से गुड़गाँवा के लिए विहार हो गया।

३० दिसम्बर १९९५ को संघ तिजारा पहुँचा। क्षेत्र कमेटी ने भावभीना स्वागत किया। ३१ दिसम्बर रविवार को मांगीतुंगी ट्रस्ट कमेटी की मीटिंग हुई जिसमें दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश आदि से सैकड़ों महानुभावों ने सक्रिय सहयोग देने के भाव व्यक्त किये। मांगीतुंगी में होने वाली पंचकल्याणक प्रतिष्ठा समिति में कर्मयोगी ब्र. श्री रवीन्द्र कुमार जैन को अध्यक्ष तथा डॉ. पन्नालाल जैन पापड़ीवाल को महामंत्री पद पर मनोनीत किया गया। अन्य पदों पर भी कर्मठ कार्यकत्र्ताओं का चयन किया गया। प्रतिष्ठा में विशेष सहयोग के रूप में श्री पूनमचंद गजराज जैन गंगवाल ने मांगीतुंगी पंचकल्याणक सहित पूज्य माताजी के मांगीतुंगी प्रवास पर्यंत आने वाले समस्त श्रावकों के लिए प्रीतिभोज की सहर्ष स्वीकृति प्रदान की। अन्य दानी महानुभावों ने भी दान की घोषणाएं की।

जैन बालाश्रम दरियागंज दिल्ली के जैन मंदिर में स्थित मूलनायक भगवान मुनिसुव्रतनाथ के चरणों के निकट से यात्रा प्रारंभ कर मांगीतुंगी स्थित भगवान मुनिसुव्रत के चरणों में समाप्त होगी। मांगीतुंगी यात्रा में प्रथम तीर्थ तिजारा के दर्शन हुए, माताजी ने जीवन में पहली बार तिजारा तीर्थ के दर्शन किये। माताजी के मंगल सानिध्य में तिजारा तीर्थ पर सम्मेदशिखर की विशाल रचना के निर्माण हेतु भूमिपूजन विधिपूर्वक सम्पन्न हुई तथा यंत्र स्थापित किया गया। २ जनवरी १९९६ को तिजारा से मंगल विहार हो गया। राजस्थान के नगरों में धर्माेपदेश देते हुए मांगीतुंगी से जनमानस को अवगत कराते हुए १८ जनवरी १९९६ माघ कृ. १३ को पूज्य माताजी का अपनी क्षुल्लिका दीक्षाभूमि अतिशय क्षेत्र श्री महावीर जी में शुभागमन हुआ। क्षेत्र कमेटी के अध्यक्ष श्री नरेश कुमार सेठी, महामन्त्री आदि ने ब्र. कमलाबाई आश्रम के समक्ष संघ का स्वागत किया। आदर्श महिला विद्यालय की हजारों बालिकाओं ने, विद्यालय की संचालिका ब्र. कमलाबाई ने शोभायात्रा में पधारकर वातावरण को खुशनुमा बना दिया। शांतिवीरनगर गुरुकुल के ८० बच्चे भी जुलूस में अपनी भक्ति प्रस्तुत कर रहे थे। १९ जनवरी माघ कृ. चतुर्दशी को मुख्य मंदिर में भगवान ऋषभदेव का निर्वाणलाडू धूमधाम से चढ़ाया गया। प्रवचन भी हुए। २१ जनवरी को शांतिवीर नगर में पूज्य माताजी की प्रेरणा से ३१ फुट उत्तुंग भगवान शांतिनाथ की विशाल प्रतिमा का बृहत् स्तर पर पंचामृत अभिषेक सम्पन्न हुआ। माताजी की भावनानुसार शांतिवीर नगर में मंदार कल्पवृक्ष स्थापित करने की घोषणा की गई। २२ जनवरी को इंदौर से एक प्रतिनिधिमंडल पद्मश्री बाबूलालजी पाटौदी के नेतृत्व में गोम्मटगिरी पर दशाब्दि समारोह में उपस्थिती प्रदान करने हेतु माताजी से निवेदन करने महावीर जी आये। ११ मार्च को इन्दौर शहर में पदार्पण, १२-१३ मार्च को कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ में तथा १४ से १७ मार्च तक गोम्मटगिरी पर दशाब्दि समारोह में संघ के प्रवास का कार्यक्रम सुनिश्चित हुआ।

यात्रा के चरण आगे बढ़ते हुए २९ जनवरी को अतिशय क्षेत्र चमत्कारजी- सवाईमाधोराजपुर में संघ पहुँचा। ३१ जनवरी को माताजी की भावनानुसार वैâलाश पर्वत की संरचना के लिए शिलान्यास हुआ। ८ फरवरी को अतिशय क्षेत्र केशवराय पाटन, १० से १३ फरवरी तक कोटा में प्रवास रहा। १३ फरवरी को दादाबाड़ी नशिया में तीन लोक रचना का शिलान्यास करवाकर अतिशय क्षेत्र चांदखेड़ी के लिए विहार हो गया। १८ फरवरी को चांदखेड़ी अतिशय क्षेत्र पर पदार्पण हुआ। २१ फरवरी को झालरापाटन पहुँचकर भगवान शांतिनाथ की विशाल प्रतिमा का अभिषेक ठाट-बाट से कराया। २६ फरवरी को संघ सुसनेर पहुँचा यहाँ मुख्य बाजार में प्रवचन सभा हुई। पूज्य माताजी के दर्शन तथा प्रवचन सुनकर श्री निर्मल कुमार जैन लुहाड़िया की सुपुत्री कु. प्रीती विरक्त होकर संघ के साथ हो गई। ३ से ५ मार्च तक भगवान महावीर की उपसर्गभूमि उज्जैन में प्रवास रहा। उज्जैन में उस दिव्यभूमि को तीर्थरूप में विकसित करने के लिए माताजी ने शिलान्यास करवाया। वहाँ भगवान महावीर की विशाल प्रतिमा जयसिंहपुरा में विराजमान की जाने वाली है।

पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ११ मार्च को इन्दौर शहर में १००८ महिलाओं ने सिर पर कलश रखकर विशाल शोभायात्रा के साथ अभूतपूर्व स्वागत किया। इन्दौर के इतिहास में ऐसे स्वागत का पहला अवसर था। १३ मार्च को कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ परिसर में महिलाओं की विशाल सभा में अखिल भारतीय दिगम्बर जैन महिला संगठन का गठन पूज्य माताजी के प्रेरणा व सानिध्य में किया गया। १४ से १७ मार्च तक गोम्मटगिरी में माताजी के ससंघ सानिध्य में विविध कार्यक्रमों के साथ गोम्मटगिरी का दशाब्दि समारोह मनाया गया। इन्दौर में १३ दिन तक संघ का प्रवास रहा।

इन्दौर के अंतिम प्रवास के रूप में छावनी में रुककर विशाल सभा को संबोधित करते हुए २१ मार्च को सिद्धक्षेत्र सिद्धवरकूट के लिए प्रस्थान किया। २६ मार्च को सिद्धवरकूट पहुँचकर दानवीर श्रेष्ठी संघपति श्री महावीर प्रसाद जी दिल्ली के करकमलों से पूज्य माताजी के ससंघ सानिध्य में तेरह द्वीप रचना का शिलान्यास किया गया। शिलान्यास समारोह में नीमाड़ क्षेत्र के अनेक नगरों से सैकड़ों की संख्या में श्रावक पधारे थे।

मेरी (क्षु. मोतीसागर) जन्मभूमि सनावद में पूज्य माताजी का संघ सहित २८ मार्च चैत्र शुक्ला ९ (रामनवमी) को भारी उत्साहपूर्ण वातावरण में २९ वर्षों की चिर प्रतीक्षा के पश्चात् मंगल पदार्पण हुआ। दीक्षा के पश्चात् आर्यिका श्री चन्दनामती माताजी का प्रथम बार सनावद में पधारना हुआ। २८,२९,३० मार्च को दोनों माताजी व मेरे सार्वजनिक प्रवचन हुए। ३० मार्च को संघ में मेरे पास एक चर्चा चली। स्वयं बड़ी माताजी ने कहा कि तुम्हारी बहुत पहले इच्छा थी कि नगर के बाहर एक सुंदर प्राकृतिक सौंदर्य से युक्त धार्मिक स्थल बनाया जावे, इच्छा की पूर्ति अब कर लो। तभी नगर से ३ कि.मी. दूर श्री प्रकाशचंद जैन सुपुत्र श्री अमोलकचंद जैन सर्राफ ने अपनी जमीन उपरोक्त स्थल के लिए प्रदान करने की घोषणा की। उक्त स्थल का नाम गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी ने ‘‘णमोकार धाम’’ दिया। रात की रात में उक्त स्थल को साफ-सुथरा करवाकर प्रातः शिलान्यास के लिए तैयारी की गई। ३१ मार्च रविवार को प्रात: सनावद तथा आसपास के नगरों से हजारों श्रावक-श्राविकाओं के साथ पूज्य माताजी संघ सहित णमोकार धाम स्थल पर पधारीं। अपूर्व उत्साहपूर्ण वातावरण में शिलान्यास विधि सम्पन्न हुई। आज का दिन सनावद नगर के लिए स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया। गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी का नाम भी सनावद के इतिहास के साथ युगों-युगों के लिए जुड़ गया। प्रकाशचन्द जी की मातेश्वरी रूपाबाई जी का हार्दिक अभिनंदन रजत प्रशस्ति, स्मृतिचिन्ह व श्रीफल भेंट करके ब्र. रवीन्द्र जी ने किया।

३१ मार्च की शाम को संघ का प्रस्थान पावागिर-उâन की तरफ हो गया। चार दिन का प्रवास एक अमिट छाप छोड़ गया। निकटवर्ती नगर बेड़ियाँ में महावीर जयंती पर भगवान महावीर का संदेश देते हुए ६ अप्रैल को स्वर्णभद्र आदि चार मुनियों की निर्वाणभूमि पावागिर-ऊन में पूज्य माताजी का ससंघ पदार्पण हुआ। यहाँ बैसाख वदी दूज को गणिनी माताजी का ४० वाँ आर्यिका दीक्षा दिवस धूमधाम से मनाया गया। पूज्य माताजी ने यहाँ से निर्वाण प्राप्त स्वर्णभद्र आदि ४ मुनियों के चरण स्थापित करने की प्रेरणा क्षेत्र कमेटी के पदाधिकारियों को प्रदान की। वे चरण अभी कुछ समय पूर्व वेदीप्रतिष्ठापूर्वक १८ जनवरी २००६ को स्थापित किये गये।

हस्तिनापुर से २७ नवम्बर १९९५ को विहार करके कदम-कदम चलते हुए उ.प्र.,दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश तथा महाराष्ट्र इन ६ प्रदेशों की १६२० कि.मी. की यात्रा ६ खण्ड विजय के समान करते हुए प्रतिदिन १५-२० कि.मी. की पदयात्रा करके पूरे ५ माह पश्चात् २७ अप्रैल १९९६ को हर्षाेल्लासपूर्वक मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र पर पदार्पण हुआ। न सर्दी देखी न गर्मी, चलते ही चले गये और अंततोगत्वा अपने चरम लक्ष्य पर सकुशल पहुंच ही गये। इस पर्वतीय यात्रा ने जन-जन में जागृति उत्पन्न कर दी। पूज्य माताजी ने अपनी गहरी सूझबूझ से अनेकों स्थानों पर नूतन योजनाएं भेंटस्वरूप प्रदान कीं। मांगीतुंगी क्षेत्र पर पहुँचने से पहले ही वहाँ बाधाएं दूर होना प्रारंभ हो गर्इं। सबसे बड़ी बाधा दूर हुई पानी की। क्षेत्र के निकट बोरिंग होते ही भरपूर पानी उपलब्ध हो गया। पानी की समस्या हल हो गई। देश के विभिन्न प्रदेशों में लू-लपट चल रही थी किन्तु मांगीतुंगी में शीतलता थी। समस्त कार्यकत्र्ता प्रतिष्ठा महोत्सव के कार्यों को मूर्तरूप प्रदान करने में जुटे थे। ५५ वर्षों के बाद पंचकल्याणक प्रतिष्ठा की शुभ घड़ी आ गई। देश के विभिन्न भागों से भक्तों की टोलियाँ द्रुतगति से आना प्रारंभ हो गर्इं। मांगीतुंंगी का स्वरूप ही बदल गया, जंगल में मंगल हो गया। मुनि श्री रयणसागर जी महाराज, गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी तथा आर्यिका श्री श्रेयांसमती माताजी तीनों संघों का मंगल मिलन हुआ। सुप्रसिद्ध प्रतिष्ठाचार्य ब्र. श्री सूरजमल बाबाजी तथा उनके समस्त सहयोगी विद्वान आ गये। प्रतिष्ठा के सौधर्म इन्द्र आदि समस्त पात्र आ गये तथा प्रतिष्ठा का शुभ दिन भी आ गया, ३ मई १९९६ वैसाख शुक्ला पूर्णिमा को प्रातः काल की मंगल बेला में तीनों संघों के सानिध्य में झंडारोहण हुआ। ३ मई से ही पंचकल्याणक संबधी क्रियाएं विधि-विधान प्रारंभ हो गये। १९ से २३ मई तक चिरप्रतीक्षित पंचकल्याणक प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई। प्रतिष्ठा महोत्सव में प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री मनोहर जोशी तथा कई राजनेता आये। प्रतिष्ठा के मध्य भी माताजी द्वारा किये जा रहे जाप्य मंत्रों के प्रभाव से प्राकृतिक तथा मानवीय बाधाएं भी आते-आते टल गर्इं, मानों चमत्कार ही हुए। चारों तरफ ओलावृष्टि हो रही थी किन्तु मांगीतुंंगी में निराबाध कार्यक्रम चल रहे थे। जिन लोगों के मिजाज किन्हीं कारणवश गरम हो रहे थे, उनके भी मस्तिष्क में शांति आ गई। प्रतिष्ठा निर्विघ्न एवं सानंद सम्पन्न हो गई। २३ मई ज्येष्ठ शुक्ला षष्ठी को भगवान मुनिसुव्रतनाथ की विशाल प्रतिमा का पंचामृत तथा १००८ कलशों से महामस्तकाभिषेक पूर्वक कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। देखते ही देखते मांगीतुंगी से भक्तों का तेजी से वापसी गमन हो गया। थकान दूर होते-होते वर्षायोग का समय नजदीक आ गया। इन्दौर की जैन समाज का चातुर्मास के लिए निवेदन तथा आग्रह चल रहा था। इधर महाराष्ट्रवासियों को तृप्ति नहीं हुई थी क्योंकि प्रतिष्ठा तक का सारा समय प्रतिष्ठा व्यवस्था में व्यतीत हो गया था अतः निवेदन के साथ सत्याग्रह करने की भी चर्चा सुनाई दे रही थी। ९ जून को प्रतिष्ठा महोत्सव के कार्यकत्र्ताओं का सम्मान समारोह चल रहा था। उस समय महाराष्ट्र वालों ने पुरजोर प्रयास किया। अंततोगत्वा वर्ष १९९६ का चातुर्मास मांगीतुंंगी सिद्धक्षेत्र पर करने की घोषणा कर दी। इस घोषणा से पूरे महाराष्ट्र में हर्ष की लहर दौड़ गई। भक्तों ने मिठाई बाँटी, घी के दीपक जलाए तथा मेघदेवता ने प्रसन्न होकर मूसलाधार वर्षा करके प्रसन्नता व्यक्त की। मांगीतुंगी में चातुर्मास करने की घोषणा के साथ स्वयं माताजी तथा संघ के समस्त साधुगण अपने-अपने लेखन-पठन-पाठन में संलग्न हो गये। देश के विभिन्न भागों से भक्तों के आने का सिलसिला चालू रहा। यात्रीगण क्षेत्र दर्शन के साथ-साथ संघ दर्शन का भी लाभ उठाने लगे। ६ जून १९९६ को मांगीतुंगी में राजकीय आश्रमशाला में दोनों माताजी व मेरे प्रवचन हुए। आज ही ६ जून आषाढ़ कृ. पंचमी को प्राचीन मंदिर के निकट सहस्रवूâट मंदिर की १००८ प्रतिमाओं को विराजमान करने के लिए १०८ पंखुड़ी वाले कमल के लिए कमल मंदिर का शिलान्यास संघ सानिध्य में हुआ। शिलान्यास के पश्चात् मंदिर निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ हो गई। २ जुलाई को मांगीतुंगी से मालेगाँव के लिए विहार हुआ। ७ जुलाई को मालेगाँव प्रवेश, ९ से १२ जुलाई तक वहाँ ध्यान साधना एवं शिक्षण शिविर, अनंतर कवलाना, सोनज, टाकली, चिंचवाड़ होकर संघ चांदवड़ पहुँचा। चांदवड़ में ४ दिन संघ का प्रवास रहा, समाज ने खूब धर्म लाभ लिया। चांदवड़ से सटाणा, तहाराबाद में धर्म प्रवचनों से समाज ने लाभ लिया। २६ जुलाई को संघ का पुनः मांगीतुंगी में पदार्पण हो गया।


[सम्पादन]
इक्तालिसवाँ चातुर्मास (सन् १९९६-मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र महा. में)

२९ जुलाई १९९६, आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी को पूज्य ज्ञानमती माताजी ने संघ सहित चातुर्मास की स्थापना की। पूज्य आर्यिका श्री श्रेयांसमती माताजी ने भी अपने संघ सहित चातुर्मास की स्थापना की। २९ जुलाई से ६ अगस्त तक जैन महिलामंडल मालेगाँव की ओर से ध्यान-साधना एवं शिक्षण शिविर का आयोजन किया गया। आगत समस्त यात्रियों, मालेगाँव तथा आसपास के जैन श्रावक-श्राविकाओं ने ज्ञानामृत का पान किया। चातुर्मास प्रारंभ होते ही वर्षा की झड़ी के साथ-साथ कार्यक्रमों की भी झड़ी लग गई और तो और पूज्य गणिनी माताजी के विराजने से यात्रियों के आगमन की भी झड़ी लग गई। गुरुपूर्णिमा, वीरशासन जयंती, भगवान पाश्र्वनाथ निर्वाणोत्सव, रक्षाबंधन पर्व आदि मनाये गये। केवल कार्यक्रम ही नहीं होते रहे प्रत्युत् निर्माण कार्यों की भी झड़ी लगी हुई थी। इन सबके अतिरिक्त पूज्य माताजी का लेखन कार्य निरंतर जारी था। आगामी कार्यक्रमों की भी योजना बनाई जा रही थी। दिन पर दिन बीतते गये और महापर्व दशलक्षण आ गया। प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी चारित्रचक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की पुण्यतिथी भादों शुक्ला दूज, १४ सितंबर १९९६ को भक्तिपूर्वक मनाई गई। १७ से २७ सितम्बर तक दशलक्षण पर्व में अनेक नगरों से धर्मबंधु पधारे थे। सभी ने पूजा-पाठ के साथ साधुओं के दशधर्म तथा तत्त्वार्थसूत्र पर हुए प्रवचनों का भी भरपूर लाभ लिया। १२ अक्टूबर, आश्विन कृष्णा अमावस्या को पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के दीक्षा गुरू आचार्यश्री वीरसागर महाराज की पुण्यतिथी मनाई गई।

[सम्पादन]
माताजी का ६३वाँ जन्मजयन्ती समारोह-

पूज्य गणिनी माताजी के ६३वें जन्मजयन्ती समारोह के शुभ अवसर पर १७ अक्टूबर से २७ अक्टूबर तक कल्पद्रुम महामंडल विधान का आयोजन किया गया। भक्तों ने भक्ति में निमग्न होकर विधान पूजन का आनंद प्राप्त किया। २२ अक्टूबर से २४ अक्टूबर तक नवनिर्मित कमलमंदिर में वेदी प्रतिष्ठा होकर कमल की १०८ पंखुड़ियों पर सहस्रकूट की १००८ प्रतिमाएं विराजमान की गर्इं। २६ अक्टूबर, आसोज शुक्ला १५ (शरदपूfिर्णमा) के दिन पूज्य माताजी का ६३वाँ जन्म दिवस समारोह महाराष्ट्र की धरती को दूसरी बार प्राप्त हुआ। इससे पहले सन् १९६६ में सोलापुर में आचार्य श्री विमलसागरजी महाराज के सानिध्य में मनाने का सुयोग प्राप्त हुआ था। इस समारोह में दिल्ली से तो संघपति श्री महावीर प्रसाद जी पधारे ही, लाला प्रेमचंद-खारीबावली, श्रीकमलचंद जैन-खारीबावली, राजकुमार जैन वीरा विल्डर्स भी पधारे, देशभर से अनेक भक्त पधारे। सभी का आतिथ्य महाराष्ट्र वालों ने भरपूर किया। डॉ. पन्नालाल जैन पापड़ीवाल पैठण, आमदार (विधायक) श्री जयचंद जैन कासलीवाल, श्री हुकुमचंद गंगवाल, रमेशचंद शाह-मालेगाँव, माणिकचंद एस. पहाड़े-मालेगाँव, श्री शरद पहाड़े- श्रीरामपुर आदि सैकड़ों महाराष्ट्र के भक्तों ने मांगीतुंगी में डेरा डालकर संघ की खूब भक्ति की। भक्ति में सराबोर रहे।

पूज्य गणिनी माताजी द्वारा सिद्धक्षेत्र पर किया गया प्रथम चातुर्मास अभूतपूर्व उपलब्धियों से परिपूर्ण रहा। माताजी का इससे पहले तथा इसके बाद भी अभी तक किसी सिद्धक्षेत्र पर चातुर्मास का यह पहला ही अवसर था। क्षेत्र पर माताजी के विराजने से जो कार्य सदियों से नहीं हुए थे वे अतिअल्प समय में सम्पन्न हो गये। आने वाला प्रत्येक यात्री कह रहा था ाqक माताजी ने क्षेत्र का कायाकल्प कर दिया।श्री जयचंद जी कासलीवाल ने सरकार के सहयोग से पर्वत पर बिजली पहुँचा दी। धर्मशाला से पहाड़ तक पहुँचने के लिए पक्की सड़क तथा पुल का निर्माण करा दिया। समाज के सहयोग से धर्मशालाएं बन गर्इं। अनेक नवनिर्माणों से क्षेत्र की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। यात्रियों की संख्या में भी भारी अभिवृद्धि हुई। माताजी के क्षेत्र पर पदार्पण के बाद से विहारपर्यंत कल्पद्रुम, सिद्धचक्र, इन्द्रध्वज आदि मिलाकर छोटे-बड़े ६० विधान सम्पन्न हुए।

मांगीतुंगी में ही बैठकर प्रयाग तीर्थ की योजना ने साकाररूप धारण किया। प्रयाग-इलाहाबाद में विशाल भूखंड लेकर उस पर सर्व सुविधायुक्त तीर्थ बनाने का निर्णय लिया गया। तीर्थ बनाने की घोषणा को सुनते ही दिल्ली के दानवीर श्रेष्ठी लाला प्रेमचंद प्रदीप कुमार जैन-खारी बावली, दिल्ली बोले-वटवृक्ष मंदिर मेरी तरफ से बना दीजिये, जिसमें तांबे के विशाल वटवृक्ष के नीचे भगवान ऋषभदेव की पिच्छी कमण्डलु सहित दीक्षामुद्रा वाली प्रतिमा रहेगी। लाला महावीर प्रसाद जी संघपति भला पीछे कब रहने वाले थे, कहने लगे- ‘‘भगवान ऋषभदेव की ११ फुट पद्मासन प्रतिमा मेरी ओर से स्थापित करवा दीजिये।’’ आज वह तीर्थंकर ऋषभदेव तपस्थली तीर्थ इलाहाबाद शहर से १३ कि.मी. दूर (संगम से मात्र ५ कि.मी. की दूरी पर) इलाहाबाद-बनारस हाइवे पर अपनी अपूर्व छटा बिखेर रहा है। कम से कम एक बार तो आप भी जाकर अवश्य दर्शन करेंं, फिर तो वहाँ बार-बार जाने का आपका मन करेगा।

[सम्पादन]
पूज्य माताजी का ६३वाँ जन्म जयन्ती समारोह तथा मांगीतुंगी में वर्ष १९९६ का चातुर्मास विश्व के इतिहास में अमर हो गया-

चातुर्मास समापन से लगभग १ माह पूर्व माताजी पर्वतराज पर स्थित सुधबुध की गुफा में ध्यान कर रही थीं तभी पर्वत के मध्य पूर्वाभिमुख चट्टान में विशालकाय १०८ फुट की भगवान ऋषभदेव की मूर्ति बनाने के भाव जागृत हुए। उन्होंने यह भाव वहीं निकट में बैठी हुई आर्यिका श्री चंदनामती माताजी से कहे। यह बात सुनकर भला किसको हर्ष नहीं होगा! उनके पास ही मैं भी बैठा था, ब्र. रवीन्द्र कुमार भी बैठे थे। माताजी के भावों का सभी ने समादर किया, आज्ञा को शिरोधार्य किया और तीनों लोग जुट गए उसके बारे में रूपरेखा बनाने में। २५ अक्टूबर १९९६, आसौज शु.१५-शरदपूर्णिमा के शुभ दिन १०८ फुट ऊँची प्रतिमा बनाने की घोषणा की गई। दान-दातारों ने बढ़-चढ़कर दान राशि की घोषणा प्रारंभ कर दी। इस महान दुरूह कार्य के लिए पूज्य गणिनी माताजी का नाम प्रेरणा तथा आशीर्वाद के रूप में, पूज्य आर्यिका श्री चंदनामती माताजी का नाम मार्गदर्शन के रूप में, मेरा (क्षुल्लक मोतीसागर का) नाम निर्देशन के रूप में, कर्मयोगी ब्र. रवीन्द्र कुमार का नाम मूर्ति निर्माण कमेटी के अध्यक्ष के रूप में, डॉ. पन्नालाल पापड़ीवाल-पैठण का नाम महामंत्री के रूप में घोषित किया गया। वर्तमान में मूर्ति निर्माण के लिए पहाड़ की छटाई का काम चल रहा है।

कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी १० नवम्बर १९९६ को वर्षायोग का समापन भक्तिपाठ के द्वारा किया गया। १५ नवम्बर १९९६ को मांगीतुंगी से संघ का विहार गुजरात होकर दिल्ली की तरफ हो गया। ८ अक्टूबर १९९५ की शरदपूर्णिमा के दिन हस्तिनापुर से पूज्य माताजी ने षट्खंडागम की ‘‘सिद्धांतचिंतामणि’’ नाम से सरल संस्कृत में टीका लिखना प्रारंभ किया था, तब से उनकी कलम टीका लेखन के लिए सतत चल रही है। इस अंतराल में उनकी कई यात्राएं हो गर्इं, अनेक कार्य हो गये। टीका के दो भागों का प्रकाशन भी हो गया। अभी १५वीं पुस्तक की टीका का लेखनकार्य चल रहा है। मांगीतुंगी से विहार के पूर्व ही अहमदाबाद में २६ दिसम्बर से ५ जनवरी १९९७ तक कल्पद्रुम महामंडल विधान तथा विविध संगोष्ठी सम्मेलन आदि की घोषणा हो गई थी।

[सम्पादन]
चातुर्मास के पश्चात्

-१५ नवम्बर को मांगीतुंगी से विहार करके अनेक नगरों में ज्ञान की किरणें विकीर्ण करते हुए १५ दिसम्बर को पावागढ़ सिद्धक्षेत्र में माताजी का ससंघ पदार्पण हुआ। यहाँ तलहटी के मंदिर, निर्माणाधीन ध्यान मंदिर में चौबीस प्रतिमाओं से समन्वित ह्री ँ लाला प्रेमचंद जैन खारीबावली दिल्ली की तरफ से विराजमान करने की स्वीकृती हुई थी, वह ह्री ँ वहां विराजमान हो गई है।

२६ दिसम्बर १९९६ को अहमदाबाद में भव्य शोभायात्रा के साथ पूज्य माताजी का ससंघ मंगल पदार्पण हुआ। शहर के मेयर श्री नंदलाल वागवा तथा पूर्व मुख्यमंत्री गुजरात प्रदेश श्री सुरेश मेहता ने भावभीना स्वागत किया। २७ दिसंम्बर से ४ जनवरी १९९७ तक अनेक आकर्षक कार्यक्रमों के साथ कल्पद्रुम विधान सोला रोड दिगम्बर जैन मंदिर के सामने बने विशाल पंडाल में सम्पन्न हुआ, ४ जनवरी को गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री शंकरसिंह बाघेला ने पधारकर माताजी से आशीर्वाद प्राप्त किया। विधान के मध्य प्रतिदिन दोनों माताजी व मेरे प्रवचन हुए।

नववर्ष १९९७ के प्रथम दिन पूज्य आर्यिका श्री चंदनामती माताजी ने केशलोंच किये। १० वर्ष पूर्व ही अहमदाबाद शहर में ब्र. माधुरी (आ. चदनामती माताजी) अपने ओजस्वी प्रवचनों से गुजरातवासियों को मंत्र मुग्ध कर गई थीं। ४ जनवरी को युवा परिषद का अधिवेशन भी हुआ। विधान के मध्य अनेक छोटे-बड़े राजनेता, विद्वान तथा सामाजिक कार्यकत्र्ता पधारे। श्री हीरालाल मेहता तथा विनोद भाई आदि ने अथक परिश्रम किया। ५ जनवरी को अहमदाबाद शहर से संघ का विहार हुआ। ७ जनवरी को प्रदेश की राजधानी गांधीनगर में संघ का पदार्पण हुआ, जहाँ प्रदेश के राज्यपाल श्री कृष्णपाल सिंह माताजी से आशीर्वाद लेने पधारे। राज्यपाल को लाने का श्रेय श्री वैâलाशचंद जैन चौधरी सनावद को था। वे उनसे पूर्व से चिर- परिचित थे।

विहार के मध्य ईडर में भी पहाड़ी पर ह्री ँ विराजमान कराने की घोषणा माताजी ने की। १५ जनवरी १९९७ को तारंगा सिद्धक्षेत्र पहुंचने पर ९ फुट पद्मासन प्रतिमा ग्रेनाइट पत्थर की विराजमान करने के लिए श्री महिपाल जैन मिल्टन ग्रुप अहमदाबाद वालों को माताजी ने प्रेरणा प्रदान की थी।वह प्रतिमा वहाँ वर्ष २००४ में विराजमान हो चुकी हैं। गुजरात में ज्ञान की ज्योति का प्रकाश फैलाते हुए माताजी का संघ सहित राजस्थान के खेरवाड़ा नगर में २४ जनवरी को पदार्पण हुआ। मंदिर के निकट में वर्षों से खाली पड़ी पहाड़ी को वैâलाश पर्वत नाम देते हुए उस पर ऋषभदेव प्रतिमा तथा २३ तीर्थंकरों के चरण स्थापना की घोषणा हुई तभी वहाँ शिलान्यास भी करा दिया। वहाँ अब उस पहाड़ी पर योजनानुसार सब बनकर तैयार होकर प्रतिष्ठा हो गई है। २४ जनवरी की रात्रि में आ. शांतिसागर छाणी की जन्मभूमि छाणी में रात्रि विश्राम किया। २५ जनवरी को ऋषभदेव केशरिया जी में पूज्य माताजी का प्रथमबार पधारना हुआ। समाज ने बहुत उत्साहपूर्वक भावभीना स्वागत किया। मुख्य मंदिर के सामने पहाड़ी पर अयोध्या नगरी की रचना की प्रेरणा माताजी ने दी। २६ जनवरी को विशाल सभा में योजना की घोषणा की गई तथा शाम को शिलान्यास करवाकर संघ का विहार सलुम्बर के लिए हो गया। ३०-३१ ता. को सलुम्बर संघ रहा, २ फरवरी को देवपुरा होते हुए ५ फरवरी को उदयपुर में आचार्य श्री अभिनंदनसागर जी महाराज के संघ का मिलन हुआ। ८ फरवरी को आयड़, १० को अणिंदा पाश्र्वनाथ अतिशय क्षेत्र, १६ फरवरी को चित्तौड़गढ़, २० को भीलवाड़ा, २ मार्च को मालपुरा तथा ३ मार्च लावा में संघ का प्रवास रहा। लगभग सभी स्थानों पर पूज्य माताजी ने चिंतन करके नूतन-आकर्षक निर्माणों की योजना भेंटस्वरूप प्रदान की। न केवल योजना दी अपितु उस योजना के लिए वहीं दातारों से राशि भी स्वीकृत हो गई।

[सम्पादन]
दीक्षाभूमि माधोराजपुरा में माताजी का पदार्पण-

४१ वर्ष पूर्व सन् १९५६ में बैसाख बदी दूज को इसी माधोराजपुरा में आ. श्री वीरसागर जी महाराज ने क्षुल्लिका वीरमती जी को आर्यिका दीक्षा प्रदानकर ‘‘आर्यिका ज्ञानमती’’ नाम प्रदान किया था। दीक्षा के बाद माताजी के पहली बार पदार्पण से माधोराजपुरा धन्य हो गया। तीन दिन तक महोत्सव जैसा वातावरण था । न केवल आसपास के अपितु दिल्ली के बड़े-बड़े श्रेष्ठी इस छोटीसी नगरी में पधारकर अपना धन्य भाग मान रहे थे। कह रहे थे कि इसी नगरी ने देश को ‘‘ज्ञानमती’’ जैसी महान विभूति प्रदान की। नगर के बाहर एक भूखण्ड पर दीक्षास्थली के रूप में तीर्थ जैसा बनाने की योजना का शिलान्यास किया गया। लाखों रुपयों के दान की तत्काल घोषणा हो गई। माधोराजपुरा वालों का हर्ष हृदय में समा नहीं रहा था। नगर के सभी जातियों के नर-नारी अतीव पुलकित हो रहे थे। ६ मार्च का दिन माधोराजपुरा के इतिहास में स्वर्णिम पृष्ठ के रूप में अंकित हो गया। शिलान्यास ७ मार्च १९९७ को हो गया।

९ मार्च को संघ का पदार्पण अतिशय क्षेत्र पदमपुरा में हुआ। क्षेत्र कमेटी अध्यक्ष भागचंदजी टोंग्या, महामंत्री श्री ज्ञानचंदजी झांझरी सहित समस्त आगत सदस्यों, यात्रियों तथा आसपास नगरों से पधारे श्रावकों ने भावभीना स्वागत किया। क्षेत्र की भारी उन्नति देखकर माताजी गद्गद हो गर्इं। १० मार्च को भगवान पद्मप्रभु की २१ पुâट खड्गासन प्रतिमा का पंचामृत अभिषेक वृहद् रूप में कराया । अतिशयकारी भूगर्भ से निकली पद्मप्रभु की प्रतिमा तथा अन्य प्रतिमाओं का भी अभिषेक कराया, मंगल प्रवचन हुए। खानिया जी की नशिया में सीढ़ी उतरते समय पूज्य माताजी का पैर अचानक मुड़ जाने से पैर में मोच आ गई फिर भी विहार चलता रहा। माताजी ने अपना पूरा जीवन शरीर बल से नहीं, आत्मबल से चलाया है, यही माताजी में विलक्षणता रही है। अब भी यही स्थिति है जयपुर से विहार कर २५ मार्च को रेवाड़ी के मॉडलटाउन में मंदिर निर्माण के लिए निश्चित भूखंड पर वैâलाश पर्वत के आकार की वेदी बनाने के लिए माताजी ने वहाँ शिलान्यास करवाया। २५ मार्च को रेवाड़ी शहर में मंदिरों के सामने सार्वजनिक सभा में पूज्य माताजी का ४४वाँ क्षुल्लिका दीक्षादिवस मनाया गया, उस दिन तिथी चैत्र कृष्णा एकम् थी। वहाँ से धारूहेड़ा नगर में पहुँचकर आहार के पश्चात् विहार हो गया। मांगीतुंगी जाते हुए तथा मांगीतुंगी से वापस आते हुए धारूहेड़ा के अल्प प्रवास में श्री देवेन्द्र कुमार जैन ने पद्मनंदीपंचविंशतिका ग्रंथ प्रकाशन की स्वीकृती प्रदान की थी। धारूहेड़ा से गुड़गांवा होकर २९ मार्च को दिल्ली की सीमा में संघ का मंगल प्रवेश हुआ।

३० मार्च १९९७ को लालकिला मैदान दिल्ली में विशाल शोभायात्रा के साथ शुभागमन हुआ। दिल्ली प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री साहबसिंह वर्मा, सांसद श्री जयप्रकाश अग्रवाल, पूर्णिमा सेठी (विधायिका), विधायक श्री वासुदेव कप्तान तथा जैन समाज दिल्ली के भक्तों तथा कार्यकत्र्ताओं ने माताजी का ससंघ भावभीना स्वागत किया। संघ के साथ-साथ संघपति लाला महावीर प्रसाद जैन बंगाली स्वीट साउथ एक्स तथा सहसंघपति लाला प्रेमचंद जैन खारीबावली का भी गरमजोशी से स्वागत किया तथा आभार माना। दोनों महानुभावों ने संघ को निराबाध यात्रा पूर्ण कराई। कर्मयोगी ब्र. रवीन्द्र जी का भी स्वागत सम्मान किया, जिनके अथक परिश्रम से मांगीतुंगी की यात्रा सानंद एवं निर्विघ्न सम्पन्न हुई। मेरे व पूज्य श्री चंदनामती माताजी के प्रवचनों के अनंतर गणिनी माताजी के सबके लिए आशीर्वचन हुए।

दिल्ली पदार्पण के साथ २ अप्रैल को भगवान ऋषभदेव जयंतीपूर्वक विभिन्न कालोनी में भ्रमण प्रारंभ हो गया तथा कार्यक्रमों की धूम मच गई। २ अप्रैल १९९७ को ऋषभदेव जयंती के उपलक्ष्य में लालमंदिर से रथयात्रा निकाली गई तथा १०८ कलशों से मंदिर में अभिषेक हुआ। उसी समय अ.भा.दि. जैन महिला संगठन की दिल्ली प्रदेश की प्रथम इकाई के रूप में चांदनी चौक इकाई का गठन किया गया जिसकी अध्यक्ष श्रीमती आशा जैन को बनाया गया। इसके बाद बा़हुबली एन्क्लेव, पाश्र्वविहार, पटपड़गंज, प्रीतविहार, सूर्यनगर, ऋषभविहार, सूरजमलविहार में अप्रैल-मई में लगातार माताजी के ससंघ सानिध्य में विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम चलते रहे। सभी जगह महिला संगठन की इकाइयाँ गठित की गर्इं जो कि अब भी सक्रिय रूप में धार्मिक, सामाजिक कार्य कर रही हैं। जगह-जगह माताजी के सानिध्य में महावीर जयंती मनाई गई, विधान आदि हुए।

८ जून से १५ जून १९९७ तक कमलमंदिर प्रीतविहार दिल्ली की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा में संघ का सानिध्य प्राप्त हुआ। श्री अनिलकुमार जैन के डी-१०७ प्रीतविहार स्थित कोठी के प्रांगण में मांगीतुंगी जाते समय पूज्य माताजी ने एक छोटा सा कमलमंदिर बनाने की प्रेरणा देते हुए भूमिशुद्धि के रूप में यंत्र की स्थापना की थी वहाँ शीघ्र ही अति सुंदर कमल मंदिर निर्मित हो गया था उसमें भगवान ऋषभदेव की २५ इंच की अष्टधातु की प्रतिमा पंचकल्याणक प्रतिष्ठापूर्वक विराजमान होनी थी। श्री अनिलजी ने माताजी से पंचकल्याणक प्रतिष्ठा कराने के लिए निवेदन किया। तदनुसार माताजी ने प्रीतविहार पधारकर ८ से १५ जून तक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा अपने संघ के सानिध्य में सम्पन्न कराई। प्रतिष्ठा के मध्य अनेक कार्यक्रम बहुत ही प्रभावनापूर्वक सम्पन्न हुए। यह प्रतिष्ठा व्यक्तिगत थी फिर भी अनिल जी के निवेदन पर जैनसमाज प्रीतविहार तथा जैनसमाज निर्माणविहार का पूर्ण सहयोग प्राप्त हुआ।

[सम्पादन]
राजधानी के लाल मंदिर में चातुर्मास करने की घोषणा-

प्राचीन अग्रवाल दि. जैन पंचायत दिल्ली के अध्यक्ष श्री चव्रेâश जैन, श्री राजेन्द्र प्रसाद जैन कम्मो जी आदि दिल्ली के अनेक प्रतिष्ठित बंधुओं ने २९ जून १९९७ को शालीमारबाग की विशाल सभा में श्रीफल चढ़ाकर माताजी से लालमंदिर चांदनीचौक में चातुर्मास करने की प्रार्थना की। सभी के आग्रह को स्वीकार करके माताजी ने घोषणा कर दी कि वर्ष १९९७ का चातुर्मास दि. जैन लालमंदिर चांदनीचौक दिल्ली में स्थापित होगा तथा संघ का प्रवास लाल मंदिर के निकट साइकिल मार्केट स्थित कम्मोजी की धर्मशाला में रहेगा। इस घोषणा से दिल्ली में सर्वत्र हर्ष की लहर दौड़ गई।


[सम्पादन]
बयालिसवाँ चातुर्मास (सन् १९९७-लालमंदिर, चांदनीचौक दिल्ली में)

१९ जुलाई आषाढ़ शुक्ला १४ को श्री दि. जैन लालमंदिर चांदनीचौक में चातुर्मास की स्थापना पूज्य माताजी ने ससंघ की। सभा में दिल्ली की अनेक कॉलोनियों से भक्त पधारे थे। मेरे, पूज्य आर्यिका चंदनामती माताजी तथा गणिनी माताजी के चातुर्मास की महत्ता पर प्रवचन हुए। चातुर्मास काल में पूरी दिल्ली में भ्रमण के लिए खुला रखा गया। वर्षायोग स्थापना के अगले दिन से कार्यक्रमों की शृंखला प्रारंभ हो गई। प्रतिवर्षानुसार आ. श्री वीरसागरजी महाराज की जन्मजयन्ती, वीरशासन जयन्ती, भगवान पाश्र्वनाथ का निर्वाण कल्याणक, रक्षाबंधन पर्व आदि यथासमय मनाये गये। ४ सितंबर भादों सुदी दूज को पूज्य माताजी के ससंघ सानिध्य में श्री खण्डेलवाल दि. जैन मंदिर वेदवाड़ा में चा.च. आचार्यश्री शांतिसागर महाराज की ४२वीं पुण्यतिथि मनाई गई। वेदवाड़ा में आचार्यश्री की पुण्यतिथि प्रतिवर्ष मनाई जाती है। यमुनापार दिल्ली की सादतपुर कालोनी में पूज्य गणिनी माताजी के ससंघ सानिध्य में दिगम्बर जैन मंदिर का शिलान्यास समारोह सम्पन्न हुआ जिसमें दिल्ली के गणमान्य महानुभावों तथा माताजी के भक्तों ने पधारकर मंदिर निर्माण के लिए सहयोग राशि घोषित की। शिलान्यास श्री राजकुमार जैन वीरा बिल्डर्स ने किया था। अब वहाँ मन्दिर का निर्माण हो चुका है।

[सम्पादन]
दशलक्षण पर्व के प्रवचन परेड ग्राउंड में-

पूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के ससंघ सानिध्य में वर्ष १९९७ का दशलक्षण पर्व विविध कार्यक्रमों के साथ मनाया गया। आ.श्री चंदनामती माताजी व गणिनी माताजी के दशधर्म तथा तत्त्वार्थसूत्र पर प्रवचन प्रतिदिन लालकिले के सामने परेडग्राउंड (ऋषभदेव मैदान) में बने पंडाल में हुए। प्रतिदिन साहू अशोक कुमार जी भी प्रवचन सभा में पधारते थे। स्वास्थ्य खराब होने से मैं प्रवचन सभा में नहीं पहुँच सका । अंतिम दिन क्षमावणी पर्व पर विशेष प्रवचन हुए। तीर्थराज सम्मेदशिखर के विकास के लिए सहयोग की पुरजोर प्रेरणा प्रदान की गई। अनेक दानी महानुभावों ने भक्तिभाव से दान की घोषणाएं कीं। प्रतिदिन उसी सभा में उपाध्याय श्री गुप्तिसागर महाराज के भी प्रवचन होते थे।

[सम्पादन]
चौबीस कल्पद्रुम विधानों का भव्य आयोजन-

मांगीतुंगी से दिल्ली आने के रास्ते में ही माताजी ने संघ में आपस में विचार-विमर्श करना प्रारंभ कर दिया था कि इस बार दिल्ली में चातुर्मास हुआ तो कल्पद्रुम विधान का एक अति विशाल आयोजन करना है। चातुर्मास स्थापना के साथ ही यह निर्णय हुआ कि जैन महिलाश्रम के पास रिंगरोड पर शांतिवन के सामने बड़े मैदान में एक साथ २४ तीर्थंकरों के २४ समवसरण के अलग-अलग मंडल बनाकर कल्पद्रुम विधान का आयोजन ४ से १३ अक्टूबर तक किया जावे। ३ माह पूर्व से ही रूपरेखा बनकर उच्चस्तर पर प्रचार प्रारंभ हो गया। सर्वप्रथम प्रमुख चक्रवर्ती (भरत चक्रवर्ती) बनने का महान पुण्य तथा यश श्री राजकुमार जैन वीरा बिल्डर्स दिल्ली ने प्राप्त किया। अनंतर शेष चक्रवर्तियों का निर्णय भी होता गया। पूरी दिल्ली ही नहीं, पूरे देश में इस कार्यक्रम की चर्चा घर-घर में होने लग गई। कई लोग तो सोच-सोचकर हैरान थे कि इतने बड़े आयोजन की व्यवस्था वैâसे होगी। सब कुछ हुआ, सबके सामने हुआ। समय आने तक ३ हजार स्त्री-पुरुषों के नाम विधान पूजन में भाग लेने के लिए आ गये। उसके बाद स्थानाभाव के कारण मना करना पड़ा। केवल चक्रवर्ती ही नहीं बने, महामंडलीक राजा, मंडलीक राजा तथा सामान्य राजा- रानी भी बने। एक-एक मंडल विधान के सामने १०८-१०८ स्त्री-पुरुषों के बैठने की व्यवस्था की गई थी। आयोजन समिति की ओर से विधान पूजन में भाग लेने वाले सभी स्त्री-पुरुषों के लिए पूजन-सामग्री, भोजन, धोती-दुपट्टा, साड़ी तथा कालोनी से आने-जाने हेतु बसों की व्यवस्था की गई थी।सर्वप्रथम भरत चक्रवर्ती व उनकी पट्टरानी के रूप में श्री राजकुमार जैन वीरा बिल्डर्स एवं उनकी ध.प. श्रीमती आशा जैन का समिति की ओर से स्वर्ण मुकुट तथा हार पहनाकर स्वागत किया गया।समारोह का झंडारोहण श्री वीरचंद बड़जात्या ने किया। चौबीस कल्पद्रुम विधान के २४ मण्डलों पर २४ समवसरणों से सजे विशाल पंडाल में समारोह का उद्घाटन महामहिम डॉ. शंकर दयाल शर्मा (पूर्व राष्ट्रपति भारत सरकार) के कर- कमलों से हुआ। समारोह सभा की अध्यक्षता साहू श्री रमेशचंद जैन ने की। घटयात्रापूर्वक २४ वेदियों तथा पंडाल की शुद्धि मंत्रोच्चारणपूर्वक की गई। केशरिया परिधानों से सुसज्जित ३००० स्त्री-पुरुषों तथा हजारों दर्शकों-भक्तों की भीड़ का एक अभूतपूर्व ही दृश्य था।

प्रातः जब पूजन करने के लिए भक्तगण आते थे, उससे पूर्व उनके बैठने के स्थान के सामने बेंच पर पूजन-सामग्री लगी हुई थालियों को देखकर लोगों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहता था। इसके लिए पुजारियों की एक बड़ी टीम सरकस की तरह जुटी हुई थी। विधान पूजन के मध्य जब पूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी एवं चंदनामती माताजी का उच्च स्वर में प्रवचन होता था तब सचमुच में समवसरण में दिव्यध्वनि जैसा आभास होने लगता था। ५ अक्टूबर को जब दिल्ली प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री साहिबसिंह वर्मा ने पधारकर उस दिव्य दृश्य को देखा तो भाषण में कहने लगे ‘‘आज मेरी आंखें धन्य हो गर्इं, मंैने आज तक ऐसा कोई धार्मिक आयोजन नहीं देखा’’ आयोजन एवं आयोजकों की खूब प्रशंसा की। समय-समय पर अहिंसा शाकाहार सम्मेलन, अ.भा.दि. जैन महिला संगठन का राष्ट्रीय अधिवेशन आदि भी कम प्रभावी नहीं थे। साहू अशोक कुमार जी तो उस विहंगम दृश्य को देखकर अति भावविह्वल हो गए। कहने लगे ‘‘माताजी! ऐसा विधान एक बार सम्मेदशिखर पर पधारकर करा दीजिये जिससे सम्मेदशिखर की सभी समस्याएं दूर हो जावें, क्षेत्र का कायाकल्प हो जावे’’।

श्री कैलाशचंद जैन चौधरी सनावद के प्रयास से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह जी पधारे। उन्होंने इस भव्य आयोजन से प्रभावित होकर विधान समिति की मांग पर म.प्र. की राजधानी भोपाल के एक उद्यान का नाम ‘‘भगवान ऋषभदेव उद्यान’’ कर देने की घोषणा कर दी। अब वहाँ उस उद्यान के नाम के साथ साथ भगवान ऋषभदेव की वाणी से संबंधित सूfिक्तयाँ भी शिलापट्टों पर लगा दी गई हंैं। पूर्व न्यायाधीश श्री मिलापचंद जैन की उपस्थिती में यहीं पर पूज्य माताजी को ‘‘गणिनीप्रमुख’’ की उपाधि से समस्त दिगम्बर जैन समाज की ओर से अलंकृत किया गया। दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, हस्तिनापुर के प्रथम अध्यक्ष डॉ. कैलाशचंद जैन राजा टॉयज दिल्ली का रजत प्रशस्ति भेंट कर सम्मान किया गया। सन् १९७२ में दिल्ली में इस संस्थान की स्थापना की गई थी तभी आपको प्रथम अध्यक्ष के रूप में मनोनीत किया गया था। आपने तबसे अब तक संस्थान एवं संघ की तन-मन और धन से खूब सेवा की। विधान में उल्लिखित विधि के अनुसार चारों प्रकार का दान प्रतिदिन बांटा गया। मुख्यमंत्री श्री साहिबसिंह वर्मा ने विधान के उपलक्ष्य में एक दिन दिल्ली के समस्त बूचड़खाने बंद रखने की घोषणा की थी।

१ करोड़ मंत्र जाप्य पूजा में बैठने वालों ने विधान की अवधि में किये थे १३ अक्टूबर को उसकी दशमांस आहुfित के रूप में हवन कुंडों में पूर्णाहुति की गई। पूर्णाहुति के समय लगभग ५० हजार दर्शकों ने मंडल विधानों के दर्शन कर अपने को धन्य माना। हवन के पश्चात् विशाल शोभायात्रा निकाली गई। सायंकाल में उन सबका सम्मान किया गया जिन्होंने प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष में इस महा अनुष्ठान में तन-मन-धन का सहयोग प्रदान किया। अंत में सभी ने मिलकर संघ के प्रति अपनी विनयभक्ति प्रकट करते हुए विधान समिति के कर्मठ अध्यक्ष कर्मयोगी बाल ब्र. श्री रवीन्द्र कुमार जैन का जोर-शोर से सम्मान किया।

यह चौबीस कल्पद्रुम विधान न केवल दिल्ली में अपितु पूरे देश की जैन समाज के दिल दिमाग पर अमिट छाप छोड़ गया। राजधानी के व्यस्त जीवन में भी इतनी बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने पूजा की, पूजा सुनी, पूजा देखी। विधान पूजन के दिनों में सुबह से शाम तक १६-१६ घंटे तक कार्यक्रम हुए फिर भी किसी को थकावट या आकुलता नहीं हुई। मौसम भी सुहावना रहा। जिन्होंने साक्षात् उन विधानों के दर्शन किये वे उसे भूल नहीं सकते प्रत्युत् उस दृश्य को याद करके रोमांचित हो जाते हैं।

१६ अक्टूबर को पूज्य माताजी का ६४ वाँ जन्मजयंती समारोह जैन बालाश्रम दरियागंज में भव्यता के साथ मनाया गया। अनेक महानुभावों ने अपनी विनयांंजलि प्रस्तुत की, पादप्रक्षाल किये, नूतन पिच्छी भेंट की, कमण्डलु तथा शास्त्र प्रदान किया तथा आरती उतारकर अपनी भक्ति प्रकट की। माताजी अपने प्रत्येक जन्मदिवस पर यह अवश्य बताती हैं कि यह शरदपूर्णिमा शरीर के जन्मदिन के साथ त्याग और वैराग्य का भी जन्मदिन है, सन् १९५२ में शरदपूर्णिमा के दिन ही मैंने आचार्यश्री देशभूषण जी महाराज से आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत लेकर सप्तम प्रतिमा धारण की थी। १८ अक्टूबर सन् १९८७ को दिगम्बर जैन लाल मंदिर में श्री सुबोध कुमार जैन आरा (बिहार) ने आरा में ७५ वर्ष पूर्व सन् १९२१ में स्थापित किये गये जैन बाला विश्राम के अमृत महोत्सव का आयोजन रखा था उसमें पूज्य माताजी की ससंघ उपस्थिति रही, उसमें माताजी ने अपने आशीर्वचनों में ब्र. चंदाबाई आरा का भी स्मरण किया। उनकी कर्मठता की प्रशंसा की।

३१ अक्टूबर कार्तिक कृष्णा १४ की पिछली रात्रि में वर्षायोग की निष्ठापना हुई अनंतर लाल मंदिर में संघ के सानिध्य में निर्वाणलाडू चढ़ाया गया। प्रवचन में पूज्य आर्यिका श्री चंदनामती माताजी तथा गणिनी माताजी ने वीर निर्वाण संवत् पर प्रकाश डाला। ५ नवम्बर १९९७ को दिल्ली से हस्तिनापुर के लिए विहार करने से पूर्व दिगम्बर जैन लाल मंदिर में आयोजित सभा में दिल्लीवासियों तथा कर्मठ कार्यकत्र्ताओं को अपना मंगल आशीर्वाद प्रदान करते हुए सदैव धर्मकार्याें में अग्रणी रहने की प्रेरणा प्रदान की। इसी शृंखला में पू. माताजी ने अपनी सुशिष्या आर्यिका श्री चंदनामती माताजी के लिए ‘‘प्रज्ञाश्रमणी’’ उपाधि प्रदान की तथा मेरे लिए ‘‘धर्म दिवाकर’’ ‘‘क्षुल्लक रत्न’’ की उपाधि प्रदान की। पू. माताजी की त्रिवेणी की तीसरी धारा के रूप में कर्मठ कार्यकत्र्ताओं के अग्रणी कर्मयोगी ब्र. श्री रवीन्द्र कुमार जैन के लिए भी उनके कार्यों की प्रशंसा करते हुए खूब आशीर्वाद प्रदान किया। माताजी का आशीर्वाद उपहार बन गया। इसी शुभ अवसर पर विधान के चक्रवर्तियों, कर्मठ कार्यकत्र्ताओं का स्वागत किया गया। विशेषरूप से कर्मठ व्यक्तित्व के धनी श्री रमेशचंद जैन (पी.एस. जैन मोटर्स) का सम्मान किया गया जिन्होंने पूरे विधानपर्यंत विधान पूजन में भाग लेकर पुण्योपार्जन तो किया ही, साथ ही संघ एवं दि. जैन त्रिलोक शोध संस्थान तथा रवीन्द्रजी की कार्य प्रणाली को नजदीक से देखकर बहुत प्रभावित हुए। वे गुणग्राही थे, उनकी ध.प. सुशीला जी भी प्रबुद्ध महिला हैं, पूज्य माताजी के प्रति अनन्य भक्ति अब भी उनके हृदय में रहती है।

[सम्पादन]
चातुर्मास के पश्चात्-

५ नवम्बर १९९७ को लालमंदिर की सभा में समस्त दिल्लीवासियों को अपना आशीर्वाद प्रदान करते हुए माताजी ने ससंघ हस्तिनापुर के लिए विहार कर दिया। १० नवम्बर को कमलानगर मेरठ में प्रवास रहा, प्रवचन हुए। ११ नवम्बर को सदर में प्रवास रहा, ऋषभएकेडमी में दोनों माताजी व मेरे प्रवचन हुए जिसमें यात्रा के महत्वपूर्ण संस्मरण भी सुनाए। दो वर्ष के पश्चात् हस्तिनापुर में माताजी का ससंघ मंगल पदार्पण-दो वर्ष पूर्व २७ नवंबर १९९५ को जम्बूद्वीप हस्तिनापुर से मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र के लिए ससंघ विहार हुआ था पुन: दो वर्ष बाद १४ नवम्बर १९९७ को हस्तिनापुर पदार्पण हुआ। दो वर्षोंें में जो धर्म प्रभावना के कार्य हुए हैं वे भी चमत्कारिक रहे। उसका विस्तृत विवरण पहले सम्यग्ज्ञान आदि में प्रकाशित किया गया है। जहाँ जो कार्य माताजी के मुख से कराने के लिए निकला, वह वचनसिद्धि के रूप में तत्काल स्वीकृत हो गया। शुभागमन के शुभ अवसर पर संघ के स्वागत के साथ-साथ संघपति लाला महावीर प्रसाद जी, श्री प्रेमचंदजी खारी बावली तथा चौबीस कल्पद्रुम विधान के प्रमुख ‘‘भरतचक्रवर्ती’’ श्री राजकुमार जैन वीरा बिल्डर्स का भी भावभीना स्वागत संस्थान की ओर से किया गया। संघ की सकुशल वापसी पर सभी ने हर्ष व्यक्त किया।

वार्षिक कार्तिक मेले के अवसर पर कार्तिक शुक्ला चतुर्दशी १३ नवम्बर को जम्बूद्वीप स्थल से वार्षिक रथयात्रा निकाली गई १४ नवम्बर कार्तिक शुक्ला पूर्णिमा को २०-३० हजार जैन-अजैन नर-नारियों ने जम्बूद्वीप दर्शन के साथ-साथ पूज्य माताजी के ससंघ दर्शनों का लाभ भी प्राप्त किया। माघ कृष्णा चतुर्दशी २७ जनवरी १९९८ को भगवान ऋषभदेव का निर्वाणकल्याणक निर्वाण लाडू चढ़ाकर मनाया गया। १४ दिसम्बर १९९७ को पूज्य गणिनी माताजी ने धवला ग्रंथ की संस्कृत टीका स्याद्वाद चिंतामणि के दूसरे भाग को पूर्ण किया तदुपलक्ष में हस्त- लिखित टीका का जम्बूद्वीप परिसर में पालकी का जुलूस निकाला गया। २२ जनवरी १९९८ माघ कृष्णा ९ को पूज्य आर्यिका श्री रत्नमती माताजी की १३वीं पुण्य तिथी मनाई गई। १ फरवरी १९९८ को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्याय मूर्ति श्री मारकण्डे काटजू दर्शनार्थ पधारे। जम्बूद्वीप दर्शन के साथ पूज्य माताजी से भी आशीर्वाद प्राप्त किया। फाल्गुन कृष्णा एकादशी, २२ फरवरी १९९८ को ससंघ सानिध्य में भगवान ऋषभदेव का केवलज्ञान कल्याणक उत्सव मनाया गया। जम्बूद्वीप स्थल पर नवनिर्मित ॐ मंदिर में पंचपरमेष्ठी की प्रतिमाएं ॐ में विराजमान करने के लिए वेदी प्रतिष्ठा का कार्यक्रम ९ फरवरी को झंडारोहण- पूर्वक प्रारंभ हुआ। ११ फरवरी १९९८ को प्रातः १० बजे ॐ में पंचपरमेष्ठी की पांच प्रतिमाएं विराजमान की गर्इं अनंतर मंदिर के शिखर पर कलशारोहण तथा ध्वज स्थापना मंदिर निर्माता श्री प्रेमचंद प्रदीप कुमार जैन खारीबावली दिल्ली के हाथों से किया गया।

[सम्पादन]
पुन: हस्तिनापुर से राजधानी दिल्ली के लिए विहार-

भगवान ऋषभदेव के प्रचार-प्रसार के लिए राजधानी दिल्ली से २२ मार्च १९९८ को पूरे देश में समवसरण रथ का भ्रमण कराने के लिए माताजी का ससंघ ४ मार्च १९९८ को हस्तिनापुर से पुनः दिल्ली के लिए विहार हुआ। १२ मार्च को संघ का मंगल पदार्पण राजधानी दिल्ली के लालमंदिर में हुआ। २२ मार्च तक संघ कम्मोजी की धर्मशाला साइकिल मार्वेâट में विराजमान रहा। वहीं पर रथ प्रवर्तन संबंधी व्यापक तैयारियाँ चलती रहीं।

[सम्पादन]
‘‘समवसरण श्रीविहार रथ’’ का उद्घाटन-

सांसद श्री वी. धनंजय कुमार जैन के करकमलों से विशाल जनसभा के मध्य ‘‘समवसरण श्रीविहार रथ’’ का उद्घाटन ऋषभदेव जयंती के शुभ दिन चैत्र कृ. ९ को लालकिला मैदान दिल्ली में ाqकया गया। सभा की अध्यक्षता साहू श्री रमेशचंद जैन (न.भा.टा.) ने की। सानिध्य प्रदान किया गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी, आर्यिका श्रीचंदनामती माताजी, मंैने, क्षु. श्रद्धामती जी ने, हजारों नर-नारी की सभा में उपस्थिती थी। उद्घाटन के पश्चात् बोली लेने वाले महानुभावों को रथ पर बैठाकर भव्य शोभायात्रा निकाली गई। शोभायात्रा की शोभा देखते ही बन रही थी। सैकड़ों इन्द्राणियां केशरिया परिधान में कलश लेकर, सैकड़ों बालक-बालिकाएं हाथ में मंत्र लिखित रंग-बिरंगी ध्वजा-पताकाएं लेकर, ऐरावतहाथी वाले रथ पर सर्वाण्हदेव धर्मचक्र लेकर, हाथी पर श्री, ह्री आदि ८ देवियाँ अष्टमंगल द्रव्य हाथ में लेकर ऐरावत हाथी के रथ पर बैठी थींं, अन्य राजा-महाराजा ३२ बग्घियों पर बैठकर ३२ हजार राजाओं का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। बैंड बाजे, झांकियाँ, हाथी-घोड़े, शहनाईवादक आदि शोभायात्रा की शोभा द्विगुणित कर रहे थे। चाँदनी चौक से खारीबावली होते हुए शोभायात्रा पहाड़ीधीरज पर समाप्त हुई। रास्ते में जगह-जगह भक्तों ने जलपान आदि की व्यवस्था कर रखी थी। सभी जातियों के महानुभाव समवसरण रथ का स्वागत कर रहे थे, नमन कर रहे थे। हेलीकॉप्टर से पुष्पवृष्टि हो रही थी। स्वयं माताजी के ससंघ शोभायात्रा में रहने से शोभायात्रा गरिमापूर्ण बन गई। मेघदेवता ने भी वर्षा की दो-चार बूँदें बरसा कर अपनी भक्ति प्रकट की। पहली शोभायात्रा प्रथम नंबर जैसी ही थी। माताजी स्वयं पहाड़ी धीरज पर ठहर गर्इं, रथ भी रात में वहीं खड़ा रहा। प्रात: पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्री जगदीश टाइटलर ने पूज्य माताजी से आशीर्वाद लेकर समवसरण रथ का दर्शन कर स्वागत किया। पहाड़ी धीरज के पश्चात् १ अप्रैल से ४ अप्रैल तक दिल्ली की विभिन्न कालोनियों में प्रतिदिन रथ का प्रवर्तन चलता रहा।

[सम्पादन]
प्रधानमंत्री द्वारा समवसरण श्रीविहार का भारत भ्रमण हेतु प्रवर्तन-

चैत्र शुक्ला त्रयोदशी-९ अप्रैल १९९८ महावीर जयंती के शुभ दिन प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयी ने देश भ्रमण के लिए समवसरण रथ के प्रवर्तन का शुभारंभ किया। महावीर जयंती के शुभदिन तालकटोरा स्टेडियम में भारत के प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी समवसरण रथ का देशव्यापी भ्रमण प्रारंभ करने के लिए पधारे। सर्वप्रथम माताजी से आशीर्वाद प्राप्त किया अनंतर विशाल जनसभा के मध्य पधारकर जनता का-जैन समाज का अभिवादन स्वीकार किया। सभा की अध्यक्षता पूर्व केन्द्रीय मंत्री तथा वर्तमान सांसद श्री धनंजय कुमार जैन ने की। प्रधानमंत्री जी, सभाध्यक्ष तथा अन्य अतिथियों का भावभीना स्वागत प्रवर्तन समिति की ओर से किया गया। मेरे, प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी तथा गणिनी माताजी के प्रवचन तथा आशीर्वचन हुए, कर्मयोगी ब्र. श्री रवीन्द्र कुमार जैन सहित अन्य वक्ताओं के भाषण हुए। पूज्य माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि जिस देश का आश्रय लेकर साधुजन जो तपस्या करते हैं, उसका छठा भाग पुण्य राजा को स्वयमेव प्राप्त हो जाता है। आज महावीर जयन्ती के शुभ दिन जो इस समवसरण रथ का प्रवर्तन भारत भ्रमण के लिए हो रहा है, यह पूरे देश के शासकों तथा समस्त जनता के लिए मंगल तथा क्षेम को करने वाला होगा।

प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने अपने भाषण में कहा कि मेरा अहोभाग्य है कि भगवान ऋषभदेव के इस समवसरण रथ का प्रवर्तन करने के लिए मुझे यहाँ आमंत्रित किया है। पुन: मुस्कराते हुए अपनी विशिष्ट शैली में कहा कि माताजी की तपस्या के छठे भाग पुण्य से हमारा काम नहीं चलेगा और अधिक भाग पुण्य की हमें आवश्यकता है (उपस्थित सारे नर-नारी भी इस बात से हंस पड़े) उन्होंने कहा कि मंै यह आश्वासन देता हूँ कि विश्वबंधुत्व का पाठ पढ़ाने वाले इस रथ को सभी प्रदेशों में राजकीय सम्मान प्राप्त होगा। मंैं आज मुख्य रूप से ज्ञानमती माताजी का आशीर्वाद लेने आया था, वह मुझे मिल गया।

स्टेडियम के बाहर प्रांगण में खड़े रथ पर उन्होंने स्वस्तिक बनाया, अर्घ तथा श्रीफल चढ़ाकर आरती उतारी तथा देशव्यापी प्रवर्तन के लिए अपनी शुभकामनाएं प्रदान की। पूर्ण निश्चिंतता से २ घंटे तक कार्यक्रम में उपस्थित रहे। सांसद श्री धनंजय कुमार जैन ने प्रधानमंत्री का आभार ज्ञापित किया। ३० अप्रैल तक माताजी का ससंघ दिल्ली में प्रवास रहा । रथ प्रवर्तन २ मई तक दिल्ली की विभिन्न कालोनियों में होता रहा। कहीं-कहीं माताजी का ससंघ सानिध्य भी प्राप्त होता रहा। ३ मई को रथ का प्रवेश हरियाणा में हुआ।

१९ अप्रैल १९९८ को नजफगढ़ में पूज्य माताजी की प्रेरणा से उनके ससंघ सानिध्य में जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र निर्माण का शिलान्यास हुआ। २९ अप्रैल, वैशाख शुक्ला तीज के शुभ दिन प्रीतविहार की धर्मसभा में परम गुरुभक्त श्री राजेन्द्र प्रसाद जी (कम्मोजी) का दि. जैन त्रिलोक शोध संस्थान, हस्तिनापुर की ओर से रजत प्रशस्ति, शॉल, श्रीफल भेंट कर सम्मान किया गया। चंदनामती माताजी तथा गणिनी माताजी ने कम्मोजी की गुरुभक्ति का उल्लेख करते हुए उनके कार्यों की प्रशंसा की तथा उनके दीर्घ तथा स्वस्थ जीवन के लिए आशीर्वाद प्रदान किया।

राजधानी से पुन: हस्तिनापुर के लिए मंगल विहार-१ मई १९९८ को प्रीतविहार से माताजी ने ससंघ हस्तिनापुर के लिए विहार किया। सूर्यनगर, साहिबाबाद, गाजियाबाद, ऋषभांचल, मोदीनगर, मेरठ तथा मवाना में धर्मप्रभावना करते हुए १२ मई को जम्बूद्वीप स्थल, हस्तिनापुर में शुभागमन हुआ।


[सम्पादन]
तिरालिसवाँ चातुर्मास (१९९८, जम्बूद्वीप स्थल-हस्तिनापुर में)

वर्ष १९९८ का चातुर्मास ८ जुलाई १९९८, आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी को पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने ससंघ जम्बूद्वीप स्थल हस्तिनापुर में आगम की विधिपूर्वक, भक्तियों का पाठ करते हुए स्थापित किया। जहाँ से रक्षाबंधन पर्व प्रारंभ हुआ, वहाँ प्रथम बार श्रावण शुक्ला पूर्णिमा को जम्बूद्वीप स्थल पर विशिष्टरूप से यह पर्व मनाया गया। प्रात: अकंपनाचार्य आदि ७०० मुनियों की पूजा, विष्णुकुमार मुनिराज की पूजा, भगवान श्रेयांसनाथ के निर्वाणकल्याणक के उपलक्ष्य में भगवान की पूजा करके निर्वाणलाडू चढ़ाया गया। आहार के पश्चात् खीर का प्रसाद वितरित किया गया। मध्यान्ह में मैंने रक्षाबंधन पर्व की कथा पढ़ी। दोनों माताजी के पर्व की महत्ता पर प्रवचन हुए। अंत में सभी स्त्री-पुरुषों ने ध्वजदण्ड पर रक्षासूत्र बांधकर प्रतिज्ञा ली कि ‘‘हम अपने शरीर में प्राण रहते तक धर्म तथा धर्मायतनों की तन-मन-धन से रक्षा करेंगे पुन: सभी स्त्री-पुरुषों ने आपस में भी रक्षासूत्र बांधे।

भगवान ऋषभदेव के प्रथम आहार से पवित्र हस्तिनापुर की पावन धरा पर ४ से ६ अक्टूबर १९९८ तक ‘भगवान ऋषभदेव राष्ट्रीय कुलपति सम्मेलन’ का अभूतपूर्व आयोजन तथा गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी का ६५वाँ जन्मजयंती समारोह-भगवान ऋषभदेव के प्रचार-प्रसार को ध्यान में रखते हुए पूज्य माताजी ने कई माह पहले से हस्तिनापुर में देश के संपूर्ण विश्वविद्यालयों के कुलपतियों का सम्मेलन रखने का निर्णय किया था। तभी से विश्वविद्यालयों से पत्राचार प्रारंभ कर दिया गया था, इसके लिए विशेष परिश्रम किया गया। कार्यक्रम की महत्ता को समझाने/बताने के लिए साहित्य भेजा गया। देश के उच्च शिक्षाविदों के सम्मेलन का शुभ समय आ गया ४ से ६ अक्टूबर १९९८ का। उक्त सम्मेलन दि. जैन त्रिलोक शोध संस्थान, हस्तिनापुर तथा चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया। सानिध्य प्राप्त हुआ पूज्य गणिनी आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी, आर्यिका श्री अभयमती माताजी, प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी, क्षुल्लिका शांतिमती जी, क्षुल्लिका श्रद्धामती जी। मैं भी कार्यक्रम में उपस्थित रहा। कार्यक्रम के सौजन्यकर्ता थे-श्री राजकुमार जैन ‘वीरा बिल्डर्स’, दिल्ली। कर्मयोगी ब्र.रवीन्द्र जी समस्त समारोह के प्रमुख कत्र्ता-धत्र्ता थे। उद्देश्य था यह बताने का कि भगवान महावीर जैनधर्म के संस्थापक नहीं हैं, वे तो जैनधर्म के चौबीसवें तीर्थंकर थे, उनसे पहले तेईस तीर्थंकर हो चुके हैं। उनमें सबसे पहले तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव थे। कार्यक्रम में कई वर्तमान कुलपति, कुछ पूर्व कुलपति, प्रोपेâसर तथा १०० से अधिक जैन विद्वान पधारे थे। ४ अक्टूबर के उद्घाटन सत्र में स्वागत भाषण किया मेरठ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. के. दुर्गाप्रसाद जी ने। प्रमुख अतिथि थे राजेश पायलट (पूर्व केन्द्रीय मंत्री), श्री धनंजय कुमार जैन (पूर्व केन्द्रीय मंत्री)। संचालन किया डॉ. अनुपम जैन-इंदौर ने। देश में जैन समाज के इतिहास में इस प्रकार का कुलपति सम्मेलन पहली बार था। अनेक सत्रों के माध्यम से सबने अच्छी तरह समझ लिया कि भगवान महावीर को जैनधर्म का संस्थापक मानना, लिखना अथवा बताना बड़ी भारी भूल है। इतिहास की पुस्तकों में इस भूल को दूर करना अति आवश्यक है। आगत कुलपतियों को जम्बूद्वीप स्थल का प्राकृतिक वातावरण बहुत ही सुहावना लगा। विभिन्न सत्रों में पूज्य गणिनी माताजी, आर्यिका श्री अभयमती माताजी, आर्यिकाश्री चंदनामती माताजी तथा मेरे उद्बोधन हुए। सभी को जैनधर्म से भलीभांति परिचित कराया गया, साहित्य दिया गया। सबका यथोचित सम्मान किया गया।

५ अक्टूबर १९९८, आसोज शुक्ला १५ (शरदपूर्णिमा) के दिन पूज्य गणिनीश्री ज्ञानमती माताजी का ६५वाँ जन्मजयंती समारोह आयोजित किया गया। जन्मजयंती समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में पधारे थे-श्री धनराज यादव (सिंचाई राज्यमंत्री-उत्तरप्रदेश सरकार) तथा अध्यक्षता की-श्री वैâलाशचंद जैन (पूर्व सचिव मुख्यमंत्री-उ.प्र.)। संघ के साधुओं, विद्वानों, भक्तों तथा कार्यकर्ताओं ने पूज्य माताजी के गुणानुवाद प्रस्तुत करते हुए विनयांजलि अर्पित की। माताजी की ज्ञान गरिमा से प्रभावित होकर कुलपति भी पीछे नहीं रहे। उन्होंने भी अपनी विनयांजलि भक्तिभावपूर्वक समर्पित की। सभी कुलपतियों तथा विद्वानों ने माताजी से पुनीत आशीर्वाद ग्रहण किया। ६ अक्टूबर को समापन सत्र में प्रो. डी.पी. तिवारी-मेरठ, मेजर प्रो. बलवीर सिंह भसीन-गया तथा डॉ. के. नलिन शास्त्री-बोधगया की त्रिसदस्यीय समिति द्वारा तैयार किया गया ‘‘जम्बूद्वीप घोषणा पत्र’’ सदन के सम्मुख डॉ. अनुपम जैन-इंदौर ने प्रस्तुत किया। जिसे सभी ने सर्वानुमति से स्वीकृत किया। यह समारोह अपना एक विशेष प्रभाव छोड़ गया। पूरे देश में इसकी सर्वत्र सराहना हुई तथा आगे भी ऐसे शिक्षाविदों के सम्मेलन की आवश्यकता महसूस की गई।

[सम्पादन]
चातुर्मास के पश्चात्-

कमलानगर-मेरठ के मंदिर में पूज्य माताजी की प्रेरणा से श्री प्रेमचंद जैन ‘तेल वाले’-कमलानगर, मेरठ ने २४ तीर्थंकर तथा विद्यमान २० तीर्थंकरों की प्रतिमाएँ विराजमान करने के लिए भव्यकमलों का निर्माण कराया। उन प्रतिमाओं की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा कराने के लिए पूज्य माताजी ने आर्यिका श्री चंदनामती माताजी, क्षुल्लक मोतीसागर जी तथा ब्र. बहनों सहित १० नवम्बर १९९८ को मेरठ के लिए मंगल विहार किया। १६ नवम्बर को कमलानगर में संघ का पदार्पण हुआ। १६ से २१ अक्टूबर तक कमलानगर में संघ का प्रवास रहा। २२ से २५ तक शास्त्रीनगर में संघ के पधारने से ज्ञानामृत की वर्षा हुई। २६ नवम्बर को पुन: कमलानगर संघ आ गया। २७ नवम्बर को पंचकल्याणक प्रतिष्ठा का झण्डारोहण हुआ, जिसमें जैनसभा मेरठ के गणमान्य महानुभाव पधारे। २८ नवम्बर से ३ दिसम्बर तक यथाक्रम से पंचकल्याणक प्रतिष्ठा हुई। यह प्रतिष्ठा श्री प्रेमचंद जैन ‘तेल वाले’ की तरफ से आयोजित थी। प्रतिष्ठाचार्य वाणीभूषण पं. नरेश कुमार जैन-जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर थे। प्रतिष्ठा के समापन पर समस्त सहयोगी कार्यकर्ताओं का प्रेमचंद जी ने सम्मान किया। जैन समाज मेरठ ने प्रेमचंद जी के समस्त परिवार का स्वागत सम्मान किया। पूज्य माताजी ने प्रेमचंद जी, उनकी ध.प. सब्जी देवी तथा प्रतिष्ठा समिति के प्रमुख पदाधिकारियों को आशीर्वादस्वरूप उपाधियाँ प्रदान की। ३ दिसम्बर को मोक्षकल्याणक के पश्चात् कमलानगर मंदिर में नवनिर्मित कमलों पर प्रतिमाएँ विराजमान की गर्इं। ९ दिसम्बर तक मेरठ की अन्य कॉलोनियों में प्रवचनों के माध्यम से धर्मामृत की वर्षा हुई। सर्वत्र संघ का भावभीना स्वागत किया गया।

निकटवर्ती हापुड़ शहर की जैन समाज के विशेष आग्रह से माताजी ने संघ सहित ९ दिसम्बर को हापुड़ की तरफ विहार किया। १२ दिसम्बर को हापुड़ शहर मेेंं मंगल पदार्पण के अवसर पर विशाल शोभायात्रापूर्वक नगर प्रवेश हुआ। जगह-जगह पादप्रक्षाल कर आरती उतारी गई, पुष्पवृष्टि की गई। १२ से १६ दिसम्बर तक प्रात:, मध्यान्ह तथा रात्रि में प्रवचनों के अतिरिक्त विविध कार्यक्रम हुए। भीषण सर्दी के बावजूद भी दिनभर मेला सा लगा रहता था। १७ दिसम्बर को पाश्र्वनाथ मंदिर के शिखर पर विधिपूर्वक ध्वजारोहण हुआ। उसी दिन हापुड़ से विहार करके २३ दिसम्बर को संघ का सकुशल जम्बूद्वीप स्थल पर पदार्पण हुआ। मेरठ प्रवास के मध्य २५ नवम्बर को चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ में पूज्य माताजी का ससंघ पदार्पण हुआ। विश्वविद्यालय के आडिटोरियम में एक संगोष्ठी हुई, जिसमें पूज्य माताजी का समसामयिक मंगल उद्बोधन हुआ। आर्यिका श्री चंदनामती माताजी व मेरे प्रवचन हुए। संगोष्ठी में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डॉ. डी.पी. तिवारी भी पधारे। जम्बूद्वीप संस्थान के अध्यक्ष ब्र. रवीन्द्र कुमार जैन ने मेरठ विश्वविद्यालय एवं जम्बूद्वीप संस्थान के संयुक्त तत्त्वावधान में पूर्व में सम्पन्न संगोष्ठियों का उल्लेख अपने भाषण में किया।

[सम्पादन]
ऋषभदेव श्रावक संस्कार शिविर का आयोजन-

शास्त्रीनगर-मेरठ के श्रावक-श्राविकाओं ने शिविर में विशेष रूप से भाग लिया। २६ को ४ सत्रों तथा २७ को ३ सत्रों के माध्यम से अनेक विषयों का ज्ञान प्रवचनों तथा शिक्षण के माध्यम से गणिनी माताजी, पूज्य श्री अभयमती माताजी, आर्यिका श्री चंदनामती माताजी तथा मेरे द्वारा कराया गया, प्रश्नमंच भी हुए। श्रावकोचित क्रियाओं का ज्ञान भी कराया गया। २७ को समापन सत्र में सभी को धार्मिक पुस्तकों के साथ प्रमाणपत्र दिये गये।

[सम्पादन]
साहू श्री अशोक कुमार जैन का असामयिक निधन-

जैन समाज ही नहीं अपितु समस्त भारत की प्रबुद्ध समाज को यह जानकर दुख हुआ कि जैन समाज के शीर्षस्थ नेता, भा.दि. जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी के अध्यक्ष, बेनेट कोलमेन वंâ. (टाइम्स ऑफ इण्डिया) के चेयरमैन साहू श्री अशोक कुमार जैन का निधन ४ फरवरी १९९९ को अमेरिका में हो गया। वे ६५ वर्ष के थे। पिछले एक वर्ष से वे हृदयरोग से पीड़ित चल रहे थे। वे सच्चे ‘‘तीर्थरक्षा शिरोमणि’’ थे। पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी के पास भी कई बार आकर आपने मार्गदर्शन प्राप्त किया था। साहूजी के निधन के समाचार ज्ञात होने पर जम्बूद्वीप स्थल पर पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के सानिध्य में तथा ब्र. श्री रवीन्द्र कुमार जैन की अध्यक्षता में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन करके उनके प्रति संस्थान के पदाधिकारियों ने श्रद्धांजलि समर्पित की। पूज्य गणिनी माताजी ने बताया कि वे सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्र के साथ आत्मसात् हो गये थे। जैन साहित्य के प्रकाशन में भी उनका अमूल्य योगदान रहा। उन्होंने अपने पिता साहू शांतिप्रसाद जी तथा ताऊ श्रेयांसप्रसाद जी के पदचिन्हों पर चलकर जैन समाज की, जैन संस्कृति की चहुँमुखी उन्नति के अनेक प्रकार के कार्य किये। उनका निधन जैन समाज की अपूरणीय क्षति है।

माघ वदी नवमी को पूज्य आर्यिका श्री रत्नमती माताजी की १४वीं पुण्यतिथि मनाई गई। उनके गुणों का स्मरण करते हुए उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की गई। माघ कृष्णा चतुर्दशी, १६ जनवरी १९९९ को जम्बूद्वीप स्थल पर पूज्य माताजी के ससंघ सानिध्य में भगवान ऋषभदेव का निर्वाणोत्सव मनाया गया, जिसमें धर्मसभा में पूज्य माताजी व अन्य साधुओं के प्रवचन हुए। भगवान के पूजा-अभिषेक के साथ निर्वाणलाडू चढ़ाया गया। जम्बूद्वीप संस्थान के पदाधिकारियों के अतिरिक्त बड़े मंदिर की कमेटी के बाबू सुकुमालचंद जैन, जयप्रकाश जैन-वकील, जैन प्रकाश जैन, ऋतुराज जैन, प्रेमचंद जैन ‘तेल वाले’-मेरठ आदि भी पधारे थे। अनेक वक्ताओं ने कहा कि पंथभेद को भुलाकर सामाजिक एकता की आवश्यकता है। हस्तिनापुर में भविष्य में होने वाले कार्यक्रम मिलकर मनाने की बात श्री जयप्रकाश जैन एडवोकेट ने कही।

जम्बूद्वीप स्थल पर नवीन विशाल भोजनालय का शिलान्यास २ मार्च १९९९ को अष्टान्हिका पर्व के समापन पर होली के दिन पूज्य गणिनी ज्ञानमती माताजी के ससंघ सानिध्य में अवध के प्रमुख दानी श्रेष्ठी नेमकुमार जैन-गनेशपुर (बाराबंकी-उ.प्र.) के सुपुत्र श्री अशोक कुमार जैन के करकमलों से किया गया। संस्थान की ओर से श्री अशोक जैन, उनकी ध.प. तथा उनके साथ पधारे श्री उमेश जैन-टिवैâतनगर का स्वागत किया गया।

जम्बूद्वीप दर्शन के लिए देश-विदेश के यात्री तो हस्तिनापुर आते ही रहते हैं किन्तु जैनधर्म तथा दिगम्बर जैन साध्वियों की चर्या की शास्त्रीय जानकारी प्राप्त करने के लिए अमेरिका स्थित केलिफोर्निया की रिसर्च स्कॉलर (शोध छात्रा) मिस सेरीफोर १२ जनवरी १९९९ को जम्बूद्वीप स्थल पर पधारीं। १२ दिन तक लगातार माताजी के पास बैठकर विभिन्न विषयों का ज्ञान प्राप्त किया, बहुत प्रसन्न रहीं। संस्थान की ओर से उनका स्वागत किया गया। उनका शोधपत्र शीघ्र ही प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने हस्तिनापुर प्रवास का तथा पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का अत्यंत श्रद्धापूर्वक उल्लेख किया।

१८ अप्रैल १९९९ अक्षयतृतीया पर्व पर प्रथम बार जम्बूद्वीप स्थल पर भगवान ऋषभदेव के आहार का दृश्य प्रस्तुत किया गया। जम्बूद्वीप पर एक कक्ष में विराजमान भगवान ऋषभदेव की आहार मुद्रा वाली प्रतिमा के करपात्र में भक्तों ने इक्षुरस प्रदान किया। इक्षुरस का प्रसाद भी वितरित किया गया। भगवान ऋषभदेव का प्रथम आहार इसी हस्तिनापुर में राजा श्रेयांस के द्वारा इसी तीर्थ पर हुआ था। आहार के पश्चात् पंचाश्चर्य की वृष्टि की गई।

भगवान ऋषभदेव समवसरण श्रीविहार रथ का प्रवर्तन विगत १ वर्ष से दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान में महती धर्मप्रभावना के साथ चल रहा था। प्रवर्तन का संचालन युवा कार्यकर्ता विजय कुमार जैन-कानपुर कर रहे हैं। राजस्थान प्रवर्तन का समापन ४ अप्रैल १९९९ को अतिशय क्षेत्र ऋषभदेव-केशरिया जी में हुआ था। पहले सन् १९८२ में प्रवर्तित जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति रथ के राजस्थान प्रवर्तन के समापन का श्रेय भी इसी अतिशय क्षेत्र को प्राप्त हुआ। संयोग से यह तीर्थ भी ऋषभदेव के नाम से ही प्रसिद्ध है। राजस्थान प्रवर्तन में सर्वाधिक बोलियाँ आनंदपुरकालू के भक्तों ने ली। ज्ञानज्योति प्रवर्तन में भी राजस्थान में आनंदपुरकालू वालों की ही थी। राजस्थान के पश्चात् मध्यप्रदेश में समवसरण रथ का प्रवर्तन ५ अप्रैल १९९९ को नीमच शहर से प्रारंभ हुआ।

हस्तिनापुर में जन्मे तथा सम्मेदशिखर से निर्वाणप्राप्त भगवान शांतिनाथ की जन्मजयंती तथा निर्वाणोत्सव ज्येष्ठ कृष्णा चतुर्दशी, १४ मई १९९९ को मनाया गया। प्रतिवर्षानुसार इस वर्ष भी ज्येष्ठ वदी १४ को भगवान शांतिनाथ का निर्वाणोत्सव निर्वाणलाडू चढ़ाकर मनाया गया, रथयात्रा भी निकाली गई। विभिन्न नगरों से सैकड़ों की संख्या में नर-नारी पधारे थे। हस्तिनापुर से प्रकाशित होने वाली हिन्दी मासिक पत्रिका ‘‘सम्यग्ज्ञान’’ के रूपहले २५ वर्ष पूर्ण हुए। जून १९९९ का अंक सम्यग्ज्ञान रजत जयंती वर्ष समापन अंक के रूप में प्रकाशित किया गया था। जुलाई सन् १९७४ में (भगवान महावीर २५००वें निर्वाणकल्याणक के अवसर पर) विशाल संघ के नायक आचार्यश्री धर्मसागर जी महाराज के करकमलों से दि. जैन लाल मंदिर, चाँदनी चौक-दिल्ली में प्रवेशांक का विमोचन हुआ था, तब से नित्य नई साज-सज्जा के साथ पूज्य गणिनीप्रमुख र्आियकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी की जादुई सशक्त लेखनी से प्रसूत चारों अनुयोगों के ज्ञानवर्धक लेख सतत प्रकाशित होते रहे। प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी के लेख, कविताएँ भी प्रकाशित होती रही हैं। दीक्षापूर्व इस महान पत्रिका का संपादक होने का गौरव मुझे तथा ब्र.रवीन्द्र कुमार को प्राप्त होता रहा। दीक्षा के पश्चात् भी मुझे समय-समय पर लेख आदि देने का अवसर मिलता रहता है। अभी भी यह पत्रिका गौरव गरिमा के साथ प्रकाशित हो रही है। ३२ वर्षों का एक लम्बा इतिहास इसके साथ जुड़ा हुआ है। अब भी इसके संपादक कर्मयोगी ब्र.रवीन्द्र कुमार जी हैं।

[सम्पादन]
हस्तिनापुर से दिल्ली के लिए विहार-

पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी, प्रज्ञाश्रमणी र्आियका श्री चंदनामती माताजी, क्षुल्लक मोतीसागर जी महाराज, क्षुल्लिका श्रद्धामती माताजी तथा संघस्थ ८ ब्र. बहनों ने ३० अप्रैल १९९९ को जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर से राजधानी दिल्ली के लिए मंगल विहार किया। १३ मई को श्री ऋषभदेव दिगम्बर जैन कमल मंदिर-डी १०७, प्रीतविहार, दिल्ली में संघ का मंगल पदार्पण हुआ। १४ मई १९९९, ज्येष्ठ कृष्णा चतुर्दशी को पूज्य गणिनी ज्ञानमती माताजी ने केशलोंच किये। इसी दिन भगवान शांतिनाथ की पूजा करके संघ के सानिध्य में भगवान शांतिनाथ के निर्वाणकल्याणक के उपलक्ष्य में निर्वाणलाडू चढ़ाया गया। दिल्ली की अनेक कालोनियों से भक्तगण पधारे थे। इस अवसर पर दोनों माताजी के व मेरे प्रवचन हुए।

पूज्य गणिनी माताजी की प्रेरणा से गठित ‘भगवान ऋषभदेव अंतर्राष्ट्रीय निर्वाण महोत्सव समिति’ की एक प्रारंभिक बैठक पूज्य माताजी के ससंघ सानिध्य में २३ मई १९९९ को रखी गई जिसमें दिल्ली तथा देश के विभिन्न नगरों-शहरों से उच्चकोटि के जैन समाज के नेता व कार्यकर्ता उपस्थित हुए। विशिष्ट दानियों तथा समाजसेवियों का स्वागत किया गया। समिति को आर्थिक सहयोग प्रदान करने वाले लाला महावीर प्रसाद जी संघपति, कमलचंद जी खारीबावली, प्रेमचंद जी-खारीबावली तथा पन्नालाल सेठी-डीमापुर का भी विशेषरूप से स्वागत किया गया। मेरे मंगलाचरण के अनंतर अनेक वक्ताओं ने अपने विचार रखे। ब्र. रवीन्द्र कुमार ने समिति के पदाधिकारियों के नाम की घोषणा की। सभी ने पूर्णरूपेण सहयोग का आश्वासन प्रदान किया। पूज्य श्री चंदनामती माताजी व गणिनी माताजी ने ऋषभदेव निर्वाण महोत्सव की महत्ता पर प्रकाश डाला। सभी को मिलकर महोत्सव को सफल बनाने के लिए प्रेरणा व आशीर्वाद प्रदान किये।

[सम्पादन]
श्रुतपंचमी पर्व, सरस्वती आराधना तथा कमल मंदिर का प्रतिष्ठापना दिवस समारोह-

पूज्य गणिनी माताजी की प्रेरणा से सन् १९९७ में श्री अनिल कुमार जैन ने अपनी कोठी डी-१०७ प्रीतविहार के प्रांगण में एक सुन्दर कमल मंदिर का निर्माण करके माताजी के ही सानिध्य में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा कराई थी, उसी का द्वितीय प्रतिष्ठापना समारोह तथा लघु पंचकल्याणक संघ सानिध्य में १८ से २३ जून तक सम्पन्न हुआ। १८ जून को श्रुतपंचमी पर्व के उपलक्ष्य में सरस्वती आराधना हुई। समाज ने प्रवचनों का लाभ भी लिया। इसी शुभ दिन पूज्य माताजी द्वारा रचित यागमण्डल विधान के प्रथम संस्करण का विमोचन श्री महावीर प्रसाद जैन-भोगल वालों ने किया। वर्ष १९९९ का चातुर्मास राजाबाजार-कनॉट प्लेस में करने की घोषणा भी हुई। पूज्य माताजी के सानिध्य में दिगम्बर जैन मंदिर, मोरीगेट में वेदी प्रतिष्ठा एवं कलशारोहण का कार्यक्रम २६ से २८ जून तक सम्पन्न हुआ।

वर्ष १९९९ का चातुर्मास करने के लिए माताजी का प्रीतविहार से वैâलाशनगर व मोरीगेट होकर ३० जून को श्री अग्रवाल दिगम्बर जैन मंदिर में मंगल पदार्पण हुआ। अग्रवाल दि. जैन मंदिर तथा खण्डेलवाल दि. जैन मंदिर राजाबाजार के पदाधिकारियों तथा दिल्ली की विभिन्न कालोनियों से पधारे महानुभावों ने संघ का भावभीना स्वागत किया। जैन सभा-नई दिल्ली तथा महिला संगठन-दिल्ली के पदाधिकारियों ने भी अपने विचार व्यक्त किये। पूज्य माताजी ने अपने आशीर्वचनों में समस्त दिल्लीवासियों को संघ से धर्मलाभ लेने की प्रेरणा प्रदान की।

१३ जुलाई १९९९ को श्री अग्रवाल दि. जैन मंदिर राजाबाजार कनॉट प्लेस में अ.भा.दि. जैन महिला संगठन, दिल्ली प्रदेश की समस्त पचास इकाईयों की एक संयुक्त बैठक पूज्य गणिनी माताजी के ससंघ सानिध्य में आशातीत सफलता के साथ सम्पन्न हुई। समस्त इकाईयों से लगभग ४०० महिलाओं ने भाग लिया। बैठक की अध्यक्षता श्रीमती आशा जैन, चाँदनी चौक (अध्यक्ष-दिल्ली प्रदेश) ने की। समस्त इकाईयों ने अपनी प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत की। पूज्य आर्यिका श्री चंदनामती माताजी तथा मैंने बैठक को सम्बोधित किया। ४ फरवरी २००० से प्रारंभ होकर १ वर्ष तक चलने वाले भगवान ऋषभदेव अंतर्राष्ट्रीय निर्वाण महोत्सव से संबंधित विशिष्ट कार्यक्रमों से सबको परिचित कराया।


[सम्पादन]
चौवालिसवाँ चातुर्मास (१९९९-राजाबाजार, कनॉट प्लेस, नई दिल्ली)

आगम की आज्ञानुसार आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी (२७ जुलाई १९९९) को मध्यान्ह में चातुर्मास स्थापना की सभा हुई। सभा की अध्यक्षता संघपति श्री महावीर प्रसाद जी ने की। श्री चव्रेâश जैन (अध्यक्ष-अग्रवाल जैन पंचायत) जिनेन्द्रप्रसाद जैन ठेकेदार (महामंत्री-अग्रवाल दि. जैन मंदिर), महेन्द्र कुमार गोधा (अध्यक्ष-खण्डेलवाल दि. जैन मंदिर), दोनों मंदिरों की समितियों के पदाधिकारी, राजाबाजार के श्रावक-श्राविका, दिल्ली की अनेक कालोनियों के भक्तगण, महिला संगठन की अनेक महिलाएँ बड़ी संख्या में उपस्थित हुए। सभी ने श्रीफल आदि चढ़ाकर पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी से चातुर्मास राजाबाजार में स्थापित करने की प्रार्थना की। सभी की प्रार्थना को सुनने के पश्चात् आर्यिका श्री चंदनामती माताजी तथा मैंने चातुर्मास/वर्षायोग की महत्ता पर प्रकाश डाला। गणिनी आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी ने वर्ष १९९९ का चातुर्मास राजा बाजार, कनॉट प्लेस, नई दिल्ली में करने की घोषणा की, जिससे हर्ष की लहर दौड़ गई। मेरठ, मवाना, हापुड़, सरधना, लखनऊ, सलुम्बर (राज.) आदि से पधारे भक्तों ने भी दिल्ली वालों के साथ श्रीफल चढ़ाये। सभा के मध्य श्री कमलचंद जी-खारीबावली, दिल्ली ने ऋषभदेव निर्वाण महोत्सव के फोल्डर का विमोचन किया। सामायिक के पश्चात् माताजी ने रात्रि में भक्तिपाठ करके विधिवत् चातुर्मास की स्थापना की।

प्रतिवर्षानुसार इस वर्ष भी गुरुपूर्णिमा के बाद श्रावण माह में वीरशासन जयंती, भगवान पाश्र्वनाथ निर्वाणोत्सव तथा रक्षाबंधन पर्व मनाये गये। रक्षाबंधन के दिन विशेष कार्यक्रम हुए। प्रात: अकंपनाचार्य आदि सात सौ मुनियों तथा विष्णकुमार मुनिराज की पूजन हुई। मध्यान्ह में रक्षाबंधन की कथा मैंने पढ़ी। दोनों माताजी के प्रवचन हुए। उपस्थित भाई-बहनों ने जैन धर्म के ध्वजदण्ड पर रक्षासूत्र बांधे तथा एक-दूसरे के हाथों में राखियाँ बांधी। पूज्य माताजी ने सभी से प्रतिज्ञा कराई कि ‘‘तन-मन-धन से जिनधर्म तथा जिनधर्मायतनों की रक्षा करेंगे’’। अंत में सभी को खीर का प्रसाद बांटा गया।

कारगिल में शहीद हुए सैनिकों की आत्मा की शांति के लिए पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी के ससंघ सानिध्य में १३ से २८ जुलाई तक शांतिविधान अखिल भारतीय दिगम्बर जैन महिला संगठन दिल्ली प्रदेश द्वारा किया गया। लगभग ५०० महिलाओं ने पूजन-विधान करने का सौभाग्य प्राप्त किया। २० से २९ जुलाई तक सिद्धचक्र मण्डल विधान पूज्य माताजी के सानिध्य में राजाबाजार में श्री सुरेशचंद जैन डिप्टीगंज-दिल्ली ने किया। भादों शुक्ला दूज, ११ सितम्बर १९९९ को चारित्रचक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर महाराज की ४५वीं पुण्यतिथि संघ के सानिध्य में मनाई गई। आचार्यश्री के विषय में पूज्य गणिनी माताजी, आर्यिका श्री चंदनामती माताजी व मैंने विस्तृत जानकारी प्रदान की।

[सम्पादन]
भगवान ऋषभदेव निर्वाण महोत्सव के केन्द्रीय कार्यालय का उद्घाटन-

८ अगस्त १९९९ को पूज्य माताजी के ससंघ सानिध्य में भगवान ऋषभदेव अंतर्राष्ट्रीय निर्वाण महोत्सव के केन्द्रीय कार्यालय का उद्घाटन अग्रवाल दि. जैन मंदिर, राजाबाजार, कनॉट प्लेस, नई दिल्ली में श्री उम्मेदमल पाण्ड्या ने फीता काटकर किया। लालकिला मैदान, दिल्ली में ४ फरवरी २००० को विशाल पैमाने पर निर्वाण लाडू चढ़ाये जाएंगे। आर्यिका श्री चंदनामती माताजी व मैंने सभा को सम्बोधित किया। समिति के कार्याध्यक्ष ब्र. रवीन्द्र कुमार जैन ने महोत्सव की व्यापक रूपरेखा बतलाई। कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए श्री कमलचंद जी-खारीबावली को दिल्ली प्रदेश का अध्यक्ष मनोनीत किया गया। अंत में पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी ने सबको संगठित होकर कार्यक्रम को प्रभावीरूप में करने का आशीर्वाद प्रदान किया।

[सम्पादन]
दशलक्षण पर्व में विविध आकर्षक कार्यक्रम-

१४ सितम्बर से २४ सितम्बर १९९९ तक राजाबाजार मंदिर के बाहर प्रांगण में आयोजित धर्म सभा में प्रतिदिन प्रात: गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के भगवान ऋषभदेव के दशावतारों में से एक-एक अवतार पर प्रवचन हुए। प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी के दशधर्मों पर क्रमश: ओजस्वी प्रवचन हुए। मैंने प्रतिदिन प्रारंभ में मंगलाचरण किया तथा अंत में प्रश्नमंच चलाया। मध्यान्ह में पं. बालमुकुंद जी शास्त्री-मुरैना ने तत्त्वार्थसूत्र पर प्रवचन किये। प्रतिदिन रात्रि में भगवान ऋषभदेव के पूर्व दशभवों पर आर्यिका श्री चंदनामती माताजी द्वारा लिखित दशावतार नाटकों का मंचन किया गया। प्रात: से शाम तक दिल्ली की विभिन्न कालोनियों से श्रोताओं/दर्शकों का आवागमन रहा। क्षमावणी पर्व पर प्रात: जैन हैप्पी स्कूल में विशाल सभा का आयोजन रखा गया, जिसमें संघ की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। मध्यान्ह में खण्डेलवाल दि. जैन मंदिर के प्रांगण में ११ उपवास करने वाले दिल्ली की विभिन्न कालोनियों से पधारे महानुभावों का स्वागत संघ के सानिध्य में श्री विजय कुमार अजय कुमार जैन सरस्वती विहार तथा अनिल जैन (कमल मंदिर), प्रीतविहार की ओर से दीवाल घड़ी तथा रजत कटोरे भेंट करके किया गया। फूलों से सुसज्जित इन्द्रों का जुलूस निकाला गया, भगवान का अभिषेक हुआ, अनंतर फूलमाल की बोली लेने वालों को फूलमाल पहनाई गई। अंत में सभी के लिए प्रीतिभोज की व्यवस्था थी। दशलक्षण पर्व के समस्त कार्यक्रमों का संचालन कर्मयोगी ब्र.रवीन्द्र कुमार जैन ने किया।

२९ अगस्त से ७ सितम्बर तक अशोक विहार पेâस-१ के दि. जैन मंदिर में पूज्य माताजी के ससंघ सानिध्य में श्री इन्द्रध्वज महामण्डल विधान श्री राजेन्द्र कुमार जैन, चाँदी वाला परिवार की ओर से किया गया। प्रतिदिन विधान के मध्य प्रवचन हुए तथा ध्यान का अभ्यास कराया गया। रात्रि में नृत्य, भजन, प्रवचन तथा प्रश्नमंच आदि कार्यक्रम हुए। विधान में अनेक श्रावक-श्राविकाओं ने भाग लिया।

[सम्पादन]
पूज्य माताजी का ६६वाँ जन्मजयंती समारोह-

२४ अक्टूबर १९९९ शरदपूर्णिमा को जैन हैप्पी स्कूल राजाबाजार, कनॉट प्लेस, नई दिल्ली में पूज्य गणिनी आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी का ६६वाँ जन्मजयंती समारोह अत्यंत उत्साहपूर्ण वातावरण में मनाया गया। समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में पधारे थे-श्री वी. धनंजय कुमार जैन (केन्द्रीय वित्तराज्य मंत्री-भारत सरकार), सांसद श्री ताराचंद पटेल-सनावद, अतिरिक्त पुलिस आयुक्त श्री डी.टी.वार्डे जैन। समारोह का उद्घाटन सांसद श्री ताराचंद पटेल ने दीप प्रज्ज्वलित करके किया। अतिथियों का पुष्पहार, शॉल, श्रीफल से स्वागत किया गया। मेरे मंगलाचरण के पश्चात् अनेक महानुभावों तथा विद्वानों ने पूज्य माताजी की ज्ञानगरिमा, दृढ़ संकल्पशक्ति, दूरदर्शिता, जन्मभूमियों के विकास, निस्पृहता आदि गुणों पर प्रकाश डाला। पूज्य आर्यिका श्री चंदनामती माताजी ने बताया कि पूज्य माताजी सन् १९९३ से भगवान ऋषभदेव के प्रचार-प्रसार में हाथ धोकर पीछे पड़ी हैं ताकि दुनिया की यह भ्रांति दूर हो जावे कि भगवान महावीर जैनधर्म के संस्थापक हैं।

पूज्य माताजी प्रतिवर्ष अपने जन्मदिन पर कोई न कोई ग्रंथ पूर्ण कर भगवान जिनेन्द्र के चरणों में समर्पित करती हैं। इस वर्ष भगवान ऋषभदेव पर संस्कृत में ‘ऋषभदेव चरितम्’ हस्तलिखित (लगभग २०० पृष्ठों का) समर्पित किया, जिसका लोकार्पण श्री धनंजय कुमार जैन (वित्त राज्यमंत्री-भारत सरकार) ने किया। भगवान ऋषभदेव पर कुछ अन्य लेखकों द्वारा लिखी गई पुस्तकों तथा कुछ पत्र-पत्रिकाओं के भी विमोचन हुए। ‘‘भगवान ऋषभदेव प्रश्नावली प्रतियोगिता’’ का लकी ड्रा निकाला गया। विजेताओं को अच्छे पुरस्कार दिये गये। अनेक भक्तों ने पूज्य माताजी के ६६वें जन्मदिवस पर विभिन्न प्रकार की ६६-६६ वस्तुएँ बांटी। श्री धनंजय कुमार जैन (केन्द्रीय वित्त राज्यमंत्री) को उनकी धार्मिक क्रियाकलापों में विशेष अभिरुचि को देखकर दि. जैन त्रिलोक शोध संस्थान हस्तिनापुर द्वारा ‘‘जैन रत्न’’ की उपाधि से सम्मानित करते हुए अंगवस्त्र, माला, श्रीफल के साथ ‘रजत प्रशस्ति पत्र’ प्रदान किया गया। णमोकार महामंत्र २५ हजार, ५० हजार अथवा सवा लाख लिखने वाले लेखकों को भी प्रमाणपत्र तथा पदक प्रदान कर सम्मानित किया गया।

६ अक्टूबर १९९८ को गठित ‘‘तीर्थंकर ऋषभदेव जैन विद्वत् महासंघ’’ का अधिवेशन हुआ, जिसमें आगत २५ विद्वानों ने मिलकर कार्यकारिणी की बैठक में वरिष्ठ विद्वान पं. श्री शिवचरनलाल जैन-मैनपुरी को (प्रथम) अध्यक्ष के रूप में मनोनीत किया। अन्य पदाधिकारियों का भी चयन हुआ। रात्रि की सभा में अन्य अनेक महानुभावों ने विनयांजलि अर्पित की तथा भगवान ऋषभदेव निर्वाण महोत्सव में अपना सक्रिय सहयोग प्रदान करने का आश्वासन प्रदान किया। २४ सितम्बर १९९९ को जैन हैप्पी स्वूâल, नई दिल्ली में भारत स्काउट एवं गाइड के वार्षिक कार्यक्रम में पूज्य माताजी ने ससंघ पधारकर आशीर्वचनों में अनुशासनपूर्वक समाज सेवा एवं देशसेवा करने की प्रेरणा प्रदान की। इस अवसर पर दिल्ली प्रदेश के स्वास्थ्य एवं पर्यावरण मंत्री डॉ. ए.के. वालिया ने भी आशीर्वाद प्राप्त किया।

[सम्पादन]
चातुर्मास के पश्चात्-

कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी को वर्ष १९९९ के चातुर्मास के समापन की घोषणा राजाबाजार दि. जैन मंदिर में भक्तिपाठ करके माताजी ने की। प्रात: भगवान महावीर के निर्वाणोत्सव के उपलक्ष्य में निर्वाणलाडू चढ़ाया गया। शाम को दीपावली की पूजन हुई। १४ नवम्बर १९९९ को दीनदयाल उपाध्याय मार्ग नई दिल्ली स्थित अणुव्रत भवन में तेरहपंथ धर्मसंघ के आचार्यश्री महाप्रज्ञ एवं युवाचार्य श्री महाश्रमण के संघ सानिध्य में आयोजित ‘‘अिंहसा एवं शांति प्रयासों पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन’’ में आयोजन समिति के विशेष निवेदन पर पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने अपने संघ सहित पधारकर देश-विदेश से आये प्रतिनिधियों के समक्ष अपने उद्बोधन में कहा कि ‘‘जैनधर्म के पावन सिद्धान्तों का पालन करने से विश्व में शांति की स्थापना हो सकती है। इसके लिए सर्वप्रथम अहिंसा ही प्रमुख आधार है। आचार्य महाप्रज्ञ जी से ऋषभदेव निर्वाण महोत्सव के विषय में माताजी ने विशेष चर्चा की। महाप्रज्ञजी ने माताजी से १९७४ से परिचय के बारे में बताते हुए अपना साहित्य माताजी को भेंट किया।

धर्मपुरा (चाँदनी चौक) स्थित सतघरा दि. जैन मंदिर में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा-पूज्य गणिनी माताजी के ससंघ सानिध्य में सतघरा दि. जैन मंदिर में ह्री ँ की चौबीस प्रतिमाओं तथा भगवान बाहुबली की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा ९ से १३ दिसम्बर १९९९ तक सम्पन्न हुई। ५ दिसम्बर को झण्डारोहण के साथ विधि-विधान प्रारंंभ हो गये थे। प्रतिदिन पूजा एवं कल्याणकों संबंधी क्रियाओं के साथ पूज्य दोनों माताजी व मेरे प्रवचन भी होते रहे। पंचकल्याणक के प्रतिष्ठाचार्य ब्र.श्री धर्मचंद्र शास्त्री तथा संयोजक श्रीमती कमला जैन (गोटे वाली) गली गुलियान तथा श्री धीरेन्द्र जैन थे।

१ जनवरी २००० को प्रात:कालीन प्रवचन में पूज्य गणिनी माताजी ने भारतदेश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, समस्त शासकों, देश की समस्त जनता तथा उपस्थित समस्त नर-नारियों को सुख-समृद्धि का मंगल आशीर्वाद प्रदान करते हुए कहा कि नई सहस्राब्दि विश्व में खुशहाली प्रदान करे, धरती से आतंकवाद की समाप्ति हो, आपस में भाईचारे के संबंध स्थापित हों, यही मेरा संदेश तथा शुभकामना है।

[सम्पादन]
नई सहस्राब्दि के प्रथम दिन लालकिला मैदान में अहिंसा महाकुंभ सम्पन्न-

१ जनवरी २००० शनिवार के मध्यान्ह में कड़कड़ाती सर्दी में लाल किला मैदान दिल्ली में आयोजित विशाल अिंहसा महावुंâभ में विभिन्न धर्म तथा सम्प्रदाय के गुरुओं ने मिलकर सरकार से मांग की कि ‘‘अिंहसाप्रधान भारतदेश से मांसनिर्यात पर प्रतिबंध लगाया जावे तथा गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जावे एवं वर्ष २००० को ‘अहिंसा वर्ष’ घोषित किया जावे। इस कार्यक्रम के प्रमुख सूत्रधार दिगम्बर जैन मुनि श्री तरुणसागर महाराज थे। कार्यक्रम में आचार्यश्री पुष्पदंतसागर जी महाराज सहित अनेक दिगम्बर मुनि, श्वेताम्बर साधु-साध्वी, हिन्दू धर्म के साधु-संत, धर्माचार्य आदि भी पधारे थे। सभी ने सरकार से मांसनिर्यात रोकने की तथा बूचड़खानों, पोल्ट्री फार्मों की तेजी से बढ़ती संख्या पर पाबंदी लगाने की पुरजोर मांग की। इस आयोजन में अपने संघ सहित पधारकर पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी ने अपने वक्तव्य में बताया कि भारतीय संस्कृति के आद्यप्रणेता भगवान ऋषभदेव ने अिंहसा तथा दया को धर्म का मूल बताया, जो कि आज भी प्रासंगिक है। दिल्ली प्रदेश की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने अपने भाषण में कहा कि जैनियों की इतनी बड़ी संख्या यह बता रही है कि वे अिंहसा को अपनाना चाहते हैं, अहिंसा से ही जीवन संतुलित रह सकता है। अंत में भारतीय जैन मिलन के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री सुरेश जैन रितुराज-मेरठ ने सरकार को दिये जाने वाले ज्ञापन का वाचन किया। जयकार तथा तालियों की जोरदार गड़गड़ाहट से उपस्थित जन-समूह ने दिये जाने वाले ज्ञापन का समर्थन किया।

बीसवीं सदी की विदाई तथा इक्कीसवीं सदी का स्वागत करने के लिए पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से उनके ससंघ सानिध्य में अ.भा.दि. जैन महिला संगठन, चाँदनी चौक इकाई द्वारा एक भक्ति का कार्यक्रम कम्मोजी की धर्मशाला में आयोजित किया गया। ३१ दिसम्बर १९९९ की रात्रि में ९ से १२.३० तक कैलाशपर्वत की रचना बनाकर उसके समक्ष भक्तिसंगीत का कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया। १ जनवरी २००० को प्रात: भक्तामर मंडल विधान-पूजन तथा २ जनवरी २००० को चन्द्रप्रभु- पाश्र्वनाथ पूजन तथा नवग्रहशांति विधान हुआ। विधान पूजन के मध्य मेरे, प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी व गणिनी माताजी के मंगल प्रवचन हुए। माघ वदी ९ को पूज्य आर्यिका श्री रत्नमती माताजी की १५वीं पुण्यतिथि मनाई गई।

बहुत भारी प्रचार तथा तैयारियों के साथ आ गया भगवान ऋषभदेव निर्वाण महोत्सव का समय-संघ तथा समाज ने पूज्य गणिनी माताजी के पुरजोर आह्वान तथा प्रेरणा से प्रेरित होकर कई महीनों से रात-दिन एक करके महोत्सव की तैयारी की। निर्वाण महोत्सव कार्यक्रम के ८ माह शेष रह गये थे। तैयारियाँ मंदगति से चल रही थीं, तब अगस्त १९९९ में एक दिन माताजी ने रवीन्द्र कुमार की ओर देखते हुए कहा था कि ‘‘देखो रवीन्द्र! अब सब काम छोड़कर निर्वाण महोत्सव के काम में लग जाओ। यह कार्यक्रम हमारा ही नहींr है अपितु अपने परमपिता भगवान ऋषभदेव का मानकर इसमें जुट जाओ, बस मेरी यही आज्ञा है।’’ मात्र इतने आत्मीय शब्दों ने एक विद्युत शक्ति पैदा कर दी। लालकिला मैदान में जैनधर्म का ध्वज लहराने के लिए ५ सूत्रीय अद्भुत प्रारूप बनाया गया था-

१. कैलाशपर्वत बनाकर उस पर ७२ रत्नप्रतिमाएँ विराजमान की जावें।

२. ७२ रत्नप्रतिमाओं की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा उसी समय हो।

३. कैलाशपर्वत के समक्ष १००८ निर्वाणलाडू चढ़ाये जावें।

४. लालकिला मैदान में उस समय ऋषभदेव मेले का आयोजन किया जावे।

५. केन्द्र सरकार की भावनाओं को जोड़कर भगवान ऋषभदेव को मीडिया के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर पहुँचाया जावे इत्यादि।

प्रथमत: कार्य संचालन के लिए चातुर्मास में केन्द्रीय कार्यालय राजाबाजार कनॉट प्लेस में खोला गया पुन: १० नवम्बर १९९९ को संघ कम्मोजी की धर्मशाला चाँदनी चौक चला गया, तब वहाँ वैâम्प कार्यालय प्रारंभ किया गया।

पूज्य माताजी जो कुछ भी सोचती हैं, वह उससे भी अच्छे रूप में होता है क्योंकि माताजी बहुत हाईफाई नहीं सोचतीं। ७२ रत्नप्रतिमाएँ बनीं, फाइवर ग्लास का विशाल वैâलाशपर्वत बना, पेंिंटग्स व झांकियाँ बनीं। लालकिला मैदान आरक्षित हुआ। प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पधारने की स्वीकृति प्रदान की। १००८ लड्डू बने, लड्डू चढ़ाने के थाल बने। पोस्टर, पम्पलेट, फोल्डर, आमंत्रण कार्ड छपे। इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया से जोरदार प्रचार हुए। देश के सभी प्रदेशों से भक्तगण पधारे। ३ फरवरी २००० की रात्रि में सबकुछ तैयार था लालकिला मैदान में। ४ फरवरी को उषाकाल की बेला में लालकिले पर देश की आन-बान-शान का प्रतीक तिरंगा लहराया और प्रारंभ हो गया निर्वाण महोत्सव भगवान की पालकी शोभायात्रा के साथ। जनमानस में अपार उत्साह था। लालकिला मैदान में वह होने जा रहा था, जो वहाँ पहले कभी नहीं हुआ था।

भगवान की पालकी लालकिला मैदान में पहुँचते ही कार्यक्रम का शुभारंभ पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी के ससंघ सानिध्य में झण्डारोहण से हुआ, जिसका श्रेय श्री प्रेमचंद जैन ‘तेल वाले’-मेरठ को प्राप्त हुआ। झण्डारोहण के बाद पालकी के साथ संघ मंच पर पहुँचा। पहुँचते ही कैलाशपर्वत पर प्रतिष्ठित प्रतिमाजी भगवान ऋषभदेव की तथा त्रिकाल चौबीसी की प्रतिष्ठेय ७२ प्रतिमाएँ विराजमान की गर्इं। उद्घाटन समारोह के प्रमुख अतिथि प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी तथा सभाध्यक्ष श्री धनंजय कुमार जैन (केन्द्रीय वित्त राज्यमंत्री) मंच पर पधारे। सर्वप्रथम मैंने मंगलाचरण करके समारोह की महिमा तथा भगवान ऋषभदेव के विषय में अवगत कराया। अतिथियों का स्वागत किया गया, माला मुकुट पहनाए गए। महोत्सव का उद्घाटनश्री वाजपेयी जी व श्री धनंजय कुमार जी ने दीप प्रज्ज्वलन करके किया। महोत्सव के कार्याध्यक्ष ब्र. रवीन्द्र जी ने महोत्सव का पूरा परिचय प्रदान किया। पूज्य आर्यिका श्री चंदनामती माताजी ने अपने उद्बोधन में कहा कि यह ऋषभदेव निर्वाण महोत्सव अपने विस्मृत प्राचीन इतिहास को नये युग में स्मरण दिलाने वाला ऐतिहासिक स्वर्णिम महोत्सव है। पूज्य गणिनी माताजी द्वारा लिखित स्वाध्याय के लिए सर्वजनोपयोगी ग्रंथ ‘‘ज्ञानामृत’’ तथा सर्वोच्च जैन ग्रंथ षट्खण्डागम पर लिखी गर्इं संस्कृत टीका ‘‘सिद्धान्तचिंतामणि’’ ग्रंथ का विमोचन प्रधानमंत्री जी ने किया। आर्यिका श्री चंदनामती माताजी द्वारा रचित भजनों की वैâसेट ‘‘वैâलाश पर्वत वंदना’’ का विमोचन भी श्री वाजपेयी जी ने किया। पूज्य गणिनी माताजी ने अपने मंगलमयी आशीर्वचनों में कहा कि ‘‘आप और हम सबके द्वारा की जा रही भगवान ऋषभदेव की भक्ति विश्व में शांति की स्थापना करेगी, पर्यावरण शुद्ध होगा, देश का वातावरण स्वस्थ/प्रशस्त होगा।

अंत में प्रधानमंत्री जी ने भक्तिपूर्वक अपने भाषण में अपनी विशिष्ट शैली में कहा कि ‘‘मैं पूज्य माताजी का आशीर्वाद लेने आया था, वह मुझे पर्याप्त मात्रा में मिल गया। अगले कार्यक्रम में आने तक यह मेरे काम आवेगा। इस अवसर पर दिया गया भाषण प्रधानमंत्री जी के चुने हुए भाषणों की पुस्तक में पूरा का पूरा छपा है। भाषणोपरांत अटल जी ने चांदी के थाल में सुंदर मोतीचूर का रखा निर्वाणलाडू श्री धनंजय जी के साथ कैलाशपर्वत के सामने भगवान ऋषभदेव के चरणों में चढ़ाया। अन्य इन्द्रों की तरह प्रधानमंत्री जी को वह रजतथाल भेंट-स्वरूप प्रदान कर दिया गया। लड्डू चढ़ाने से पहले प्रधानमंत्री जी ने अत्यंत आकर्षक एवं विशाल वैâलाशपर्वत का अनावरण करके उसके प्रथमदर्शन मंत्रमुग्ध होकर किये। वे कुछ क्षणों तक पर्वत को निहारते ही रहे।

प्रधानमंत्री के प्रस्थान करते ही ४ घंटे से बंधकर बैठा विशाल जनसमूह निर्वाणलाडू चढ़ाने के लिए उमड़ पड़ा। श्रद्धाभक्ति से भरित भक्तों ने १००८ से अधिक लड्डू कुछ ही देर में चढ़ा दिये। प्रथम सिद्धिनिर्वाणलाडू चढ़ाने का सौभाग्य श्री पवन जैन, आनंद जैन, दीपक जैन तथा संजय जैन, जैन मार्बल-मेरठ वालों को प्राप्त हुआ। इसके पश्चात् श्री राजकुमार जैन, महक वाले, पूसा रोड-दिल्ली को, जो कि इस पंचकल्याणक प्रतिष्ठा के सौधर्म इन्द्र बने थे, उन्होंने एक बड़ा लड्डू सपरिवार चढ़ाकर अपना अहोभाग्य माना। भक्तिगंगा का वह दृश्य भी अपूर्व ही था। लड्डू चढ़ाकर प्रीतिभोज के पश्चात् पंचकल्याणक की पूर्व क्रियाएँ प्रारंभ हो गर्इं। सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी बने श्री राजकुमार जैन, महक वाले, पूसा रोड तथा श्रीमती मधु जैन। भगवान के माता-पिता बने-श्री महेशचंद जैन-कलकत्ता वाले तथा उनकी ध.प. श्रीमती रविकांता जैन। ६ फरवरी से १० फरवरी तक क्रमश: एक-एक कल्याणक शास्त्रोक्त विधि से सम्पन्न हुए। प्रतिष्ठाचार्य थे पं. नरेश कुमार शास्त्री, जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर तथा पं. अकलंक कुमार जैन-लखनऊ। भगवान को आहार कराने का पुण्य अवसर राजा श्रेयांस बनकर संघपति लाला महावीर प्रसाद जी, बंगाली स्वीट सेंटर, साउथ एक्स, दिल्ली को प्राप्त हुआ।१० फरवरी को प्रात: मोक्षकल्याणक के पश्चात् ७२ रत्नप्रतिमाओं का विशेष अभिषेक करने का पुण्य अवसर भक्तों को प्राप्त हुआ। अभिषेक के अंत में शांतिधारा करने का सौभाग्य मिला श्री राजकुमार जैन ‘वीरा बिल्डर्स’ को।

५ फरवरी को वृहद् जैन युवा सम्मेलन हुआ, जिसका आयोजन अ.भा.दि. जैन युवा परिषद द्वारा किया गया। सम्मेलन में अनेक शीर्षस्थ संस्थाओं के युवाओं ने भाग लिया। सम्मेलन में विचार प्रस्तुत करने के लिए विषय रखा गया था ‘‘वर्तमान परिप्रेक्ष्य में युवावर्ग की धर्म के प्रति आस्था एवं कर्तव्य’’। संयोजक थे श्री बिजेन्द्र कुमार जैन, शाहदरा। सम्मेलन को दिल्ली जैन समाज के मंत्री श्री स्वदेशभूषण जैन ने भी सम्बोधित किया। मैंने तथा पूज्य श्री चंदनामती माताजी एवं गणिनी माताजी ने भगवान ऋषभदेव पर देश में सर्वत्र संगोष्ठियाँ रखने की प्रेरणा अपने प्रवचन में प्रदान कीं।

६ फरवरी को ऋषभदेव सर्वधर्म सभा का आयोजन था। सभा की अध्यक्षता पुरातत्त्वविद् श्री डॉ. मुनीशचंद जोशी ने की। मुख्य अतिथि थे श्री दिग्विजय सिंह जैन-इंदौर। अनेक धर्म के वक्ताओं ने भगवान ऋषभदेव तथा उनके जनोपयोगी-जीवनोपयोगी सिद्धान्तों की वर्तमान विश्व को आवश्यकता पर बल दिया। डॉ. आचार्य प्रभाकर मिश्र का भी ओजस्वी भाषण हुआ। मेरे तथा प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी के उद्बोधन के पश्चात् गणिनी ज्ञानमती माताजी के आशीर्वचन हुए। ७ फरवरी को रात्रि में सुप्रसिद्ध गीतकार श्री राजेन्द्र जैन-कलकत्ता का रंगारंग संगीत का कार्यक्रम हुआ।

७ फरवरी को मध्यान्ह में अ.भा.दि.जैन महिला संगठन का नैमित्तिक अधिवेशन हुआ। संगठन की महामंत्री श्रीमती सुमन जैन ने अब तक की प्रगति रिपोर्ट विस्तार से प्रस्तुत की, जिसे सुनकर उपस्थित महिलाओं ने करतल ध्वनि से हर्ष एवं गौरव व्यक्त किया। श्रीमती आशा जैन (अध्यक्ष-दिल्ली प्रदेश) ने भी दिल्ली की समस्त इकाईयों द्वारा प्रारंभ से अब तक किये गये कार्यों/कार्यक्रमों की जानकारी प्रस्तुत की। अनेक महिलाओं ने इस अवसर पर महिलाओं के कत्र्तव्यों पर प्रकाश डाला तथा संगठन के विकास के बारे में अपने अमूल्य सुझाव भी प्रस्तुत किये। सभी वक्ताओं ने भगवान ऋषभदेव से संबंधित कार्यक्रम पूरे वर्ष भर तक चलाने का आश्वासन दिया। मैंने उक्त अवसर पर अपने उद्बोधन में कहा कि युग की आदि से महिलाओं ने धार्मिक तथा सामाजिक कार्यों में न केवल बढ़-चढ़कर भाग लिया है अपितु दिशानिर्देश भी दिया है। आज भी नारीशक्ति को जागृत करने की आवश्यकता है। पूज्य आर्यिका श्री चंदनामती माताजी ने कहा कि महिलाओं में शक्ति तो अपार है किन्तु उसे प्रगट करने से समाज सुसंस्कृत होगा। समाज में महिलाओं तथा पुरुषों की पचास-पचास प्रतिशत शक्ति काम करती है। गणिनी माताजी ने महिलाओं को संगठित होकर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान की। अंत में श्रीमती उषा पाटनी, इंदौर ने सभी का आभार प्रकट किया।

८ फरवरी की रात्रि में गिनीज बुक में अपना नाम लिखाने वाली देश-विदेश में अनेकों कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाली छोटी सी बालिका कु. तन्वी तनेजा ने भरतनाट्यम-नृत्य करके सबकी खूब वाहवाही लूटी। पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्री राजनाथ सिंह तथा सांसद श्री राघव जैन (मध्यप्रदेश) ने पधारकर वैâलाशपर्वत के दर्शन किये तथा पूज्य माताजी के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्तकर भगवान ऋषभदेव के इस महान कार्यक्रम की प्रशंसा की।

रात्रि में विशाल कवि सम्मेलन रखा गया था, जिसमें हरिओम पंवार, ओ.पी. जैन-हरिणावी, ओमप्रकाश आदित्य, हास्यकवि सुरेन्द्र शर्मा आदि ने अपनी कविताओं के माध्यम से भगवान ऋषभदेव के गुणगान किये। अन्य विषयों पर भी विभिन्न रसों में कविता पाठ करके जनता का प्रेम प्राप्त किया। ९ फरवरी की रात्रि में जैनसाहब म्यूजिकल ग्रुप दिल्ली द्वारा ‘माँ पद्मावती जागरण’ तथा सांस्कृतिक संध्या का कार्यक्रम रखा गया था। १० फरवरी को प्रात: १० बजे दिल्ली प्रदेश के उपराज्यपाल श्री विजय कपूर तथा प्रख्यात विधिवेत्ता श्री एल.एम. सिंघवी पधारे। सभा की अध्यक्षता श्री सिंघवी जी ने की। दोनों अतिथियों का स्वागत किया गया। मैंने उन्हें माताजी का चित्र तथा दोनों माताजी ने साहित्य प्रदान किया। श्री सिंघवी जी ने पूज्य माताजी के क्रियाकलापों की भूरि-भूरि प्रशंसा की तथा कहा कि मुझे पूज्य माताजी के दर्शन बहुत देर से हुए। बहुत पहले हो गये होते तो कुछ और ही बात होती। इस सभा के साथ ऋषभदेव महोत्सव का समापन हो गया।

अ.भा.दि. जैन युवा परिषद द्वारा इस राष्ट्रीय मंच पर कर्मठ ७ युवकों को ‘युवारत्न’ की उपाधि प्रदान की गई, वे युवा थे-१. श्री अरुण जैन-दरियागंज २. श्री राकेश कुमार जैन-ऋषभ विहार ३. श्री राजकुमार जैन-महक वाले, पूसा रोड ४. श्री प्रद्युम्न कुमार जैन-ऋषभ विहार ५. श्री अशोक कुमार जैन-गली गुलियान ६. श्री सुधीर जैन-अशोक विहार, पेâस-१ ७. श्री बिजेन्द्र कुमार जैन-शाहदरा।

महोत्सव के मध्य लालकिला मैदान में ४० से अधिक झाँकियाँ भगवान ऋषभदेव तथा अहिंसा के विषय में आकर्षण का केन्द्र रहीं। महिला संगठन इंदौर द्वारा अतिशय क्षेत्र श्री महावीर जी द्वारा चित्र प्रदर्शनी, पुस्तक प्रदर्शनी, लगभग ३०० जैन पत्र-पत्रिकाओं की प्रदर्शनी भी दर्शकों का मन मोहित कर रही थीं। लाखों दर्शकों ने लाभ लिया, व्यसन त्याग की प्रेरणा प्राप्त की, विदेशी पर्यटक भी मेले में देखे गये। महोत्सव में आगंतुक जैन बंधुओं के लिए भोजन की नि:शुल्क सुन्दर व्यवस्था थी। प्रिंट मीडिया तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने भी महोत्सव के खूब समाचार प्रकाशित किये। केवल दिल्ली ही नहीं अपितु राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश तथा बंगाल, महाराष्ट्र के अखबारों में भी प्रतिदिन ऋषभदेव निर्वाण महोत्सव के समाचार मुख्यता से छपते रहे।

प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी की सूझबूझ, कर्मयोगी ब्र.रवीन्द्र कुमार जी की कर्मठता, सैकड़ों कार्यकर्ताओं के परिश्रम तथा भक्तों के सहयोग से यह भी एक ऐतिहासिक कार्यक्रम बन गया। मुझे भी इस महोत्सव में कार्यों को करने/कराने में जो आनंद की अनुभूति हुई, वह अकथनीय है। कार्यक्रम की सफलता का सबसे बड़ा राज रहा-गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का मंगल आशीर्वाद।

[सम्पादन]
वेणूर में ३७ फुट उत्तुंग भगवान बाहुबली का महामस्तकाभिषेक-

केन्द्रीय मंत्री श्री धनंजय कुमार जैन की जन्मभूमि वेणूर (जि.-बैंगलोर) कर्नाटक में ४६ वर्ष के पश्चात् भगवान बाहुबली की ३७ पुâट उत्तुंग प्रतिमा का महामस्तकाभिषेक विशाल जनसमूह के मध्य १० से १८ फरवरी २००० तक किया गया। श्री धनंजय कुमार जैन तथा श्री सुरेन्द्र जी हेगड़े के विशेष आग्रह पर पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का आशीर्वाद लेकर कर्मयोगी ब्र.रवीन्द्र कुमार जैन के नेतृत्व में ८१ यात्रियों का समूह १६ फरवरी को सहारा इण्डिया के विमान से वेणूर गया तथा २० फरवरी को विमान से ही सकुशल यात्रा कर वापस आ गया।१८ फरवरी को ५० हजार स्त्री-पुरुष अभिषेक स्थल पर उपस्थित थे। इस महामस्तकाभिषेक की विशेषता यह रही कि रात्रि में ८ बजे से अभिषेक प्रारंभ होकर प्रात: ३ बजे तक अभिषेक चला। १००८ कलशों में प्रथम कलश संघपति लाला महावीर प्रसाद जैन बंगाली स्वीट, एक्स. दिल्ली को प्राप्त हुआ। दूध के अभिषेक का महान सौभाग्य श्री राजकुमार जैन ‘वीरा बिल्डर्स’-दिल्ली ने प्राप्त किया। १६ से २० फरवरी तक ८१ महानुभावों ने आसपास के समस्त तीर्थों की भी यात्रा का पुण्य प्राप्त किया।

श्री अग्रवाल दिगम्बर जैन मंदिर राजाबाजार, कनॉट प्लेस, नई दिल्ली के प्रांगण में भगवान ऋषभदेव अंतर्राष्ट्रीय निर्वाण महोत्सव की यादगार को चिरस्थाई बनाने के लिए पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी की मंगल प्रेरणा एवं उन्हीं के ससंघ सानिध्य में भगवान ऋषभदेव कीर्तिस्तंभ का शिलान्यास २ मार्च २००० को स्व. श्री महावीर प्रसाद जैन ठेकेदार परिवार के सदस्यों-श्री महेन्द्र प्रसाद ठेकेदार, श्री जिनेन्द्र प्रसाद जैन ठेकेदार, श्री नरेन्द्र ठेकेदार, श्री रवीन्द्र ठेकेदार ने किया। शिलान्यास की विधि ब्र. रवीन्द्र कुमार जैन ने कराई। कुछ ही माह में वह कीर्तिस्तंभ लाल पत्थर का बनकर तैयार हो गया तथा उसमें प्रतिमाएँ भी संघ के सानिध्य में ही विराजमान कर दी गर्इं।

[सम्पादन]
पूज्य माताजी का दिल्ली से हस्तिनापुर के लिए मंगल विहार-

राजधानी दिल्ली से समस्त देश में भगवान ऋषभदेव निर्वाण महोत्सव की धूम मचाते हुए पूज्य गणिनी माताजी ने ३१ मार्च २००० को श्री अग्रवाल दि. जैन मंदिर राजाबाजार, कनॉट प्लेस, नई दिल्ली से हस्तिनापुर के लिए प्रस्थान किया। मार्ग में प्रीतविहार, ऋषभविहार, शिवम् एन्क्लेव, दि. जैन मंदिर घंटाघर, गाजियाबाद, मोदीनगर, शांतिनगर, मेरठ, दि. जैन मंदिर ढोलकी मोहल्ला तथा मवाना में संघ के सानिध्य में ऋषभदेव संगोष्ठियों का आयोजन करते हुए १३ अप्रैल २००० को संघ का जम्बूद्वीप स्थल हस्तिनापुर में मंगल पदार्पण हुआ।

[सम्पादन]
तृतीय जम्बूद्वीप पंचवर्षीय महोत्सव तथा पंचकल्याणक प्रतिष्ठा-

सन् १९८५ में जम्बूद्वीप पंचकल्याणक प्रतिष्ठा के अवसर पर पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी के आदेशानुसार प्रति ५ वर्ष में होने वाले जम्बूद्वीप महोत्सव की शृंँखला में तृतीय जम्बूद्वीप महोत्सव १६ से २३ अप्रैल तक स्वयं माताजी के ससंघ सानिध्य में आयोजित किया गया। इसी शुभ अवसर पर ऋषभदेव पंचकल्याणक प्रतिष्ठा भी आयोजित थी। महोत्सव के प्रमुख यजमान थे-श्री दीपक कुमार जैन सुपुत्र श्री विमलेश कुमार जैन, गुलमोहर पार्क, नई दिल्ली। १६ अप्रैल, चैत्र शुक्ला १३ को महावीर जयंती के शुभ दिन झण्डारोहण तथा भगवान महावीर के पंचामृत एवं १००८ कलशों से अभिषेक के द्वारा महोत्सव तथा पंचकल्याणक का शुभारंभ हुआ। १६ से १८ अप्रैल तक पंचकल्याणकसंबंधी पूर्व क्रियाएँ सम्पन्न हुर्इं। १९ से २३ अप्रैल तक क्रमश: पंचकल्याणक की विधि हुर्इं। पंचकल्याणक के समस्त कार्यक्रम ऋषभदेव मंडप में सम्पन्न हुए। जम्बूद्वीप स्थल पर निर्मित होने वाले सहस्रकूट जिनालय का शिलान्यास महावीर जयंती १६ अप्रैल के शुभ दिन मंदिर निर्माता श्री महेशचंद जैन, मॉडल टाउन, दिल्ली के करकमलों से सम्पन्न हुआ। शिलान्यास के समय गणिनी माताजी ने ससंघ उपस्थित रहकर मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। पंचकल्याणक प्रतिष्ठा के सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी बने गुलमोहर पार्क-दिल्ली निवासी श्री विमलेश कुमार जैन एवं उनकी ध.प. श्रीमती बाला जैन (दीपक जैन के माता-पिता), माता-पिता बने श्री महावीर प्रसाद जैन संघपति एवं श्रीमती कुसुमलता जी, साउथ एक्स., दिल्ली, यज्ञनायक श्री अनिल जैन, कमल मंदिर-प्रीतविहार। धनकुबेर का सौभाग्य-प्रमुख यजमान श्री दीपक जैन को प्राप्त हुआ।

[सम्पादन]
१५ वर्षों के पश्चात् तीन मूर्ति मंदिर के ऊपर शिखर बनकर कलशारोहण हुआ-

सन् १९८५ में तीनमूर्ति मंदिर में प्रतिमाएँ विराजमान हो गई थीं किन्तु शिखर एवं कलशारोहण १५ वर्ष तक नहीं हो पाया। केन्द्रीय मंत्री श्री धनंजय कुमार की उपस्थिति में २३ अप्रैल को कलश निर्माता श्री नरेशचंद जैन-गांधीनगर,दिल्ली को सुयोग प्राप्त हुआ कलशारोहण तथा ध्वजारोहण का। समारोह में प्रमुख अतिथि के रूप में पधारे थे केन्द्रीय उद्योग मंत्री डॉ. रमन सिंह। उनका भावभीना स्वागत किया गया। २० अप्रैल २००० वैशाख कृष्णा दूज को पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का ४५वाँ आर्यिका दीक्षा दिवस मनाया गया। विनयांजलि सभा की अध्यक्षता श्री महावीर प्रसाद जैन संघपति ने की तथा मुख्य अतिथि थे श्री बाबूलाल पहाड़े-हैदराबाद। अनेक भक्तों ने अपनी विनयांजलि प्रस्तुत की। मैंने तथा पूज्य आर्यिका श्री चंदनामती माताजी ने अपने उद्बोधन में माताजी द्वारा किये जा रहे महान कार्यों की महिमा बतलाई। पूज्य गणिनी माताजी ने अपने दीक्षाप्रदाता गुरु आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज का स्मरण करते हुए उनके द्वारा प्रदत्त शिक्षाओं का उल्लेख अपने आशीर्वचनों में किया। आगत भक्तों ने पूज्य माताजी के पादप्रक्षालन करके नूतन पिच्छिका व शास्त्र भेंट किये। अंत में श्रावकों तथा संघस्थ ब्रह्मचारिणी बहनों ने माताजी की आरती उतारी।

[सम्पादन]
ऋषभदेव कीर्तिस्तंभ का शिलान्यास-

२१ अप्रैल २००० को जम्बूद्वीप स्थल पर पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ के मंगल सानिध्य में भगवान ऋषभदेव कीर्तिस्तंभ का शिलान्यास संघपति लाला महावीर प्रसाद जी बंगाली स्वीट, साउथ एक्स. नई दिल्ली के करकमलों से सम्पन्न हुआ। कीर्तिस्तंभ का निर्माण भी संघपति जी की ओर से हुआ। सभा की अध्यक्षता लाला प्रेमचंद जैन-खारीबावली, दिल्ली ने की। मुख्य अतिथि के रूप में केन्द्रीय वित्त राज्यमंत्री श्री धनंजय कुमार जैन पधारे थे। मैंने जम्बूद्वीप रचना निर्माण तथा जम्बूद्वीप स्थल के विकास का गौरवपूर्ण इतिहास बताया। श्री धनंजय कुमार जी ने अपने भाषण में कहा कि मुझे इस स्थल पर तीसरी बार आने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। यहाँ आकर बड़ी शांति प्राप्त होती है। पूज्य माताजी ने जैन संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए बड़े-बड़े कार्य किये हैं तथा कर रही हैं। उन्होंने कहा कि मुझे माताजी की प्रेरणा से कई धार्मिक कार्यक्रमों में सम्मिलित होने का पुण्ययोग प्राप्त होता रहा है। श्री महावीर प्रसाद जी ने पूज्य माताजी की प्रेरणा से अन्यत्र भी कीर्तिस्तंभों का निर्माण कराया है। पूज्य गणिनी माताजी ने अपने आशीर्वचन में सभी को आशीर्वाद प्रदान करते हुए भगवान ऋषभदेव के प्रचार-प्रसार में सक्रिय योगदान के लिए प्र्रेरित किया। २३ अप्रैल को ७ पुâट उत्तुंग भगवान ऋषभदेव की धवल प्रतिमा का पंचामृत अभिषेक हुआ। इस प्रतिमा का निर्माण संघपति श्री महावीर प्रसाद जी की ओर से हुआ है। जम्बूद्वीप महोत्सव के उपलक्ष्य में जम्बूद्वीप रचना के मध्य स्थित सुदर्शन मेरुपर्वत की पांडुक शिला पर समवसरण रथप्रवर्तन में बोली लेने वाले भाग्यशाली महानुभावों को अभिषेक करने का अवसर प्राप्त हुआ। महोत्सव के समापन के अवसर पर रथयात्रा निकाली गई।

[सम्पादन]
सनावद में निर्माणाधीन णमोकारधाम स्थल पर भगवान ऋषभदेव चैत्यालय की स्थापना-

सनावद (म.प्र.) में पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी के सानिध्य में स्थापित णमोकार धाम स्थल पर १३ अप्रैल २००० को वेदी शुद्धिपूर्वक एक कक्ष में भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा विराजमान की गई। कार्यक्रम में संघ से कु. चन्द्रिका बहन को भेजा गया था। ४ जून २०००-ज्येष्ठ शुक्ला दूज से १२ जून २००० ज्येष्ठ शुक्ला एकादशी तक पूज्य माताजी के ससंघ सानिध्य में जम्बूद्वीप स्थल पर डॉ. पन्नालाल जैन पापड़ीवाल (पैठण) महा. एवं श्री प्रकाशचंद जैन-टिवैâतनगर एवं श्री आनंद जैन, जैन मार्बल-मेरठ द्वारा इन्द्रध्वज मंडल विधान सोल्लास सम्पन्न किया गया। ६ जून २००० ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी को पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी के ससंघ सानिध्य में ‘श्रुतपंचमी’ पर्व विविध कार्यक्रमों के साथ मनाया गया। जिनवाणी को ऐरावत हाथी पर विराजमान करके परिसर में शोभायात्रा निकाली गई। जिनवाणी की पूजा की गई। पूज्य माताजी ने ‘श्रुतपंचमी’ पर्व की महत्ता पर प्रकाश डाला।

[सम्पादन]
मनीषी इतिहासकारों का सफल सम्मेलन-

जैन तीर्थंकर परम्परा की समुचित जानकारी प्रदान करने के लिए तथा इतिहास की पुस्तकों में जैनधर्म के विषय में लिखी गई भ्रामक बातों का निराकरण करने के लिए पूज्य गणिनी माताजी की प्रेरणा से जम्बूद्वीप स्थल पर देश के इतिहासकारों, पुरातत्त्वविदों तथा विद्वानों का एक सम्मेलन ११ जून २००० को संघ के सानिध्य में रखा गया था। इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में एन.सी.ई.आर.टी. दिल्ली द्वारा प्रकाशित ‘प्राचीन भारत’ नामक इतिहास की पुस्तक में डॉ. आर.एस. शर्मा-पटना (बिहार) के जैनधर्मविषयक भ्रामक लेख पर विशेष चर्चा हुई। संगोष्ठी के संयोजक श्री खिल्लीमल जैन-अलवर (राज.) थे। संगोष्ठी में यह भी बताया गया कि प्रो.आर.एस. शर्मा ने पाठ संशोधित करके ऋषभदेव का नया पाठ जोड़ने की इच्छा व्यक्त की है। सम्मेलन में एन.सी.ई.आर.टी. के प्रतिनिधि के रूप में डॉ. प्रीतिश आचार्य (रीडर) विशेषरूप से पधारे थे। विद्वान वक्ताओं के अतिरिक्त मैंने, प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी व गणिनी माताजी ने सम्मेलन को सम्बोधित किया। समागत विद्वानों का संस्थान की ओर से भावभीना स्वागत किया गया। हस्तिनापुर से विहार से पूर्व २० जून को प्रात: श्री कमलचंद जैन-खारीबावली, दिल्ली की ओर से निर्मित होने वाले कैलाशपर्वत के हाल का शिलान्यास श्री कमलचंद जी जैन सपरिवार ने किया।

[सम्पादन]
दिल्ली के लिए मंगल विहार-

२० जून २००० को पूज्य माताजी ने हस्तिनापुर से दिल्ली के लिए ससंघ विहार कर दिया। संघ में पूज्य प्रज्ञाश्रमणी र्आियका श्री चंदनामती माताजी, मैं, क्षुल्लिका श्री श्रद्धामती माताजी तथा ८ ब्रह्मचारिणी बहनें थीं। १० जुलाई २००० को कमल मंदिर, प्रीतविहार-दिल्ली में मंगल पदार्पण हुआ। श्री अनिल कुमार जैन तथा प्रीतविहार की दिगम्बर जैन समाज तथा दिल्ली की विभिन्न कॉलोनियों के भक्तों ने संघ का श्रद्धाभक्ति से स्वागत किया। पादप्रक्षाल तथा आरती करके पुष्पवृष्टि की। कमल मंदिर में विराजमान भगवान ऋषभदेव की अष्टधातु की अति मनोज्ञ प्रतिमा के दर्शन कर सबका मन प्रफुल्लित हो गया।श्री अनिल जी ने वर्ष २००० का चातुर्मास कमल मंदिर में करने की प्रार्थना की, जिसे माताजी ने सहर्ष स्वीकार किया।


[सम्पादन]
पैंतालिसवाँ चातुर्मास (सन् २०००-कमल मंदिर, प्रीतविहार-दिल्ली में)

२० जून २००० को पूज्य ज्ञानमती माताजी ने ससंघ हस्तिनापुर से दिल्ली की ओर मंगल विहार किया। ाqवहार के मध्य में आने वाले मेरठ व गाजियाबाद नगर में पूज्य माताजी का प्रवास रहा। भगवान ऋषभदेव अंतर्राष्ट्रीय निर्वाण महोत्सव के उपलक्ष्य में १००८ संगोष्ठियों को करने की घोषणा हुई थी जिसमें से कुछ संगोष्ठियाँ मेरठ की कुछ कालोनियों में व गाजियाबाद में पूज्य माताजी के सानिध्य में हुर्इं।

१५ जुलाई २००० को पूज्य माताजी ने ससंघ कमल मंदिर प्रीतविहार-दिल्ली में इस सदी के अंतिम चातुर्मास की स्थापना की। आषाढ़ का महीना पर्व मास के रूप में प्रसिद्ध है क्योंकि इस माह में साधु-साध्वी स्थान-स्थान पर चातुर्मास की स्थापना करते हैं तथा वहाँ की जनता को धर्मलाभ प्राप्त होता है। पूज्य माताजी के इस वर्ष के चातुर्मास का लाभ प्रीतविहार जैन समाज को प्राप्त हुआ। चातुर्मास स्थापना की सभा का शुभारंभ मंगलाचरण द्वारा श्री महावीर प्रसाद जैन (संघपति), बंगाली स्वीट सेंटर ने किया। चातुर्मास की सभा प्रीतविहार के दिगम्बर जैन मंदिर में हुई। सभा मेंश्री चव्रेâश जैन-दिल्ली, डॉ. अनुपम जैन-इंदौर तथा श्रीमती आशा जैन-अध्यक्षा अखिल भारतीय महिला संगठन दिल्ली ने अपने विचार प्रस्तुत किये। इसी अवसर पर पूज्य प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी द्वारा लिखित ‘‘ऋषभदेव दशावतार नाटक’’ और ‘‘संस्कृत साहित्य के विकास में गणिनी ज्ञानमती माताजी का योगदान’’ पुस्तक का भी विमोचन हुआ। मैंने चातुर्मास के मध्य होने वाले विभिन्न धार्मिक, शैक्षणिक कार्यक्रमों में समाज के सभी लोगों को भाग लेने की प्रेरणा दी। पूज्य चंदनामती माताजी ने कहा कि यह पूज्य माताजी का ४८वाँ चातुर्मास है। जिस प्रकार आचार्य मानतुंंग स्वामी ने ४८ काव्य रचकर ४८ ताले तोड़ दिये थे, उसी प्रकार से पूज्य माताजी का ४८वाँ चातुर्मास भगवान ऋषभदेव की भक्ति में समर्पित होकर कर्मशृंखला को तोड़ने के साथ नूतन इतिहास बनाएगा। जैन समाज के नेता उम्मेदमल जी पाण्ड्या ने पूज्य माताजी से चातुर्मास में पूरी दिल्ली भ्रमण को खुला रखने की तथा भगवान महावीर के २६००वें जन्मकल्याणक महोत्सव में अपना सानिध्य प्रदान करने की प्रार्थना की। पूज्य माताजी ने सभी को अपना मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। जैन समाज प्रीतविहार के अध्यक्ष श्री सागरचंद जैन तथा महामंत्री-श्री अतुल कुमार जैन का इस कार्यक्रम में पूरा सहयोग रहा। पूज्य माताजी ने कहा कि यह प्रथम अवसर है, जब किसी श्रावक के आग्रह पर मैंने किसी कालोनी में चातुर्मास स्थापना की स्वीकृति दी। श्री अनिल कुमार जैन कागजी का यह पुण्य है, जो उनके आग्रह को पूज्य माताजी ने स्वीकार किया, पर उनके निमित्त से संपूर्ण प्रीतविहार की जैन समाज ने ४ महीने तक धर्मामृत का पान कर अपने को धन्य माना।

[सम्पादन]
अनिल कुमार जैन की भक्तिभावना

-विरले ही ऐसे व्यक्ति होते हैं, जब उनके भाव अपने घर में चैत्यालय बनाने के होते हैं। पूज्य माताजी के मांगीतुंगी विहार के समय सन् १९९५ में पूज्य माताजी के सानिध्य में अनिल जी ने अपने गृह चैत्यालय का शिलान्यास करवाया, जिसने एक विशाल कमल मंदिर का रूप ले लिया। कई दिनों से उनकी भावना थी कि एक बार पूज्य माताजी का चातुर्मास यहाँ हो। वही भावना फलीभूत हुई और वह अवसर भी आ गया। अनिल जी की उदार भावना देखिए, उन्होंने अपनी पूरी कोठी खाली कर पूरे संघ को उसमें ठहराया और स्वयं अपने परिवार के साथ फ्लैट में रहे। इस कार्य में उन्हें अपनी धर्मपत्नी श्रीमती अनिता जी का भी पूरा सहयोग मिला। तीनों बच्चों-पुत्र अतिशय और पुत्रियों अनामिका (अनु) और अंतिमा ने भी पूरे चातुर्मास में पूज्य माताजी के संघ की सेवा वैय्यावृत्ति की। पूरे परिवार ने हर्षपूर्वक संघ की भक्ति की और आगंतुुक अतिथियों का भी खूब स्वागत सत्कार किया। अनिल जी ने सपरिवार पूरे समय आहारदान व गुरु सेवा कर असीम पुण्य अर्जित किया।

[सम्पादन]
चातुर्मास के मध्य विभिन्न आयोजन-

चातुर्मास के मध्य होने वाले प्रत्येक कार्यक्रमों में समाज के प्रत्येक व्यक्ति ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। भगवान पाश्र्वनाथ निर्वाण दिवस, रक्षाबंधन पर्व, संगोष्ठियॉं, अनेक प्रतियोगिताएँ सम्पन्न हुर्इं। दशलक्षण पर्व में प्रतिदिन दि. जैन मंदिर में पूज्य माताजी के दशधर्मों पर मंगल प्रवचन हुए और रात्रि में भगवान ऋषभदेव के दशावतार पर नाटक का मंचन और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए।

[सम्पादन]
कैलाश मानसरोवर यात्रा-

पूज्य माताजी की मंगल प्रेरणा से प्रीतविहार जैन समाज की ओर से विकासमार्ग पर कॉफी होम के निकट ३० सितम्बर से ७ अक्टूबर तक विशाल मैदान में कैलाश पर्वत की रचना कर ‘‘कैलाश मानसरोवर यात्रा’’ का सुंदर आयोजन किया गया। जिसकी यात्रा कर दिल्ली तथा अनेक नगरों से पधारे जनसमूह ने साक्षात् कैलाशपर्वत की यात्रा का आनंद प्राप्त किया। आयोजन के मध्य में १ अक्टूबर को पर्वत पर विराजमान भगवान ऋषभदेव एवं ७२ रत्नप्रतिमाओं का मस्तकाभिषेक किया गया। २ अक्टूबर को ४८ भक्तामर महामण्डल विधानों को एक साथ ४८ मंडल बनाकर सम्पन्न करने का अवसर भी प्राप्त हुआ। पूज्य माताजी के ४८वें चातुर्मास के उपलक्ष्य में ये ४८ विधान एक ही पाण्डाल में आयोजित होकर विशाल विश्वशांति यज्ञ का दृश्य उपस्थित कर रहे थे। इस समारोह का उद्घाटन दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित द्वारा किया गया।

[सम्पादन]
पूज्य माताजी का ६७वाँ जन्मजयंती समारोह-

१३ अक्टूबर २०००, आश्विन शुक्ला पूर्णिमा को प्रीतविहार दिल्ली में विशाल पाण्डाल बनाकर पूज्य माताजी का ६७ वाँ जन्मदिवस समारोह मनाया गया। शरदपूर्णिमा की पावन बेला में सभी ने पूज्य माताजी के प्रति अपनी विनयांजलि अर्पित की। इस अवसर पर ‘दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर की ओर से कुछ पुरस्कार निम्न महानुभावों को प्रदान किये गये-‘जम्बूद्वीप रिलीजियस एवार्ड’-मेरठ निवासी श्री कैलाशचंद जैन इंजीनियर, ‘गणिनी ब्राह्मी पुरस्कार’-श्रीमती आशा जैन (अध्यक्षा-दिल्ली प्रदेश महिला संगठन) को, ‘आर्यिका रत्नमती पुरस्कार’-प्रो. टीकमचंद जैन, शाहदरा-दिल्ली को। धार्मिक क्षेत्र में अपनी उल्लेखनीय सेवाओं के लिए इन्हें इन पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

[सम्पादन]
षष्ठीपूर्ति समारोह-

प्रारंभ से ही पूज्य माताजी ने अपने शिष्यों को हर क्षेत्र में आगे बढ़ाकर उनका उत्साहवर्धन किया है तथा उनको अपना वात्सल्य प्रदान किया है। सन् १९६७ में मेरी जन्मनगरी सनावद (म.प्र.) में पूज्य माताजी का चातुर्मास हुआ, तभी माताजी के संबोधन से मैंने घर छोड़कर संघ में प्रवेश किया। संघ में रहकर अध्ययन किया तथा पूज्य माताजी की प्रेरणा से कराये गये प्रत्येक कार्य को पूर्ण मनोयोग से सम्पन्न करके पुण्यार्जन किया है। इतना लम्बा समय पूज्य माताजी के सानिध्य में रहकर व्यतीत हो गया। २६ सितम्बर २०००, आश्विन वदी १४ को मैंने (क्षुल्लक मोतीसागर) अपने जीवन के ६० वर्ष पूर्ण किये। उसी उपलक्ष्य में कमलमंदिर, प्रीतविहार में षष्ठिपूर्ति समारोेह मनाया गया। अनेक लोगों ने ६१-६१ वस्तुएँ अपनी ओर से वितरित कीं। पूज्य माताजी ने मुझे तथा आगन्तुक जनों को अपना मंगल आशीर्वाद दिया तथा मुझे पूज्य माताजी ने नई पिच्छी प्रदान की। पूज्य माताजी ने मुझे संसाररूपी कुंए से निकालकर मोक्षमार्ग में लगाया है। इनके उपकारों को मैं कभी नहीं भूल सकता।

[सम्पादन]
विश्वशांति शिखर सम्मेलन-

संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा आयोजित विश्वशांति शिखर सम्मेलन में धर्माचार्य के रूप में कर्मयोगी ब्र.रवीन्द्र कुमार जैन ने दिगम्बर जैन समाज का प्रतिनिधित्व किया। यह सम्मेलन युनाइटेड नेशन्स द्वारा न्यूयार्क (अमेरिका) में २८ से ३१ अगस्त २००० तक आयोजित था। संपूर्ण भारत से निमंत्रित १०० से भी अधिक सम्प्रदाय के धर्माचार्यों ने इसमें भाग लिया। दिगम्बर जैन धर्म का प्रतिनिधित्व करते हुए ब्र. रवीन्द्र जी ने पूज्य माताजी की आज्ञा से वहाँ जाकर विश्वभर में जैनधर्म के प्राचीन एवं अिंहसामयी सिद्धान्तों का प्रचार-प्रसार इस माध्यम से किया।

[सम्पादन]
शिलान्यास समारोह-

प्रयाग-इलाहाबाद में ‘‘तीर्थंकर ऋषभदेव तपस्थली तीर्थ’’ का शिलान्यास समारोह ४ अक्टूबर २००० को सम्पन्न हुआ। जहाँ पूज्य माताजी की प्रेरणा से इलाहाबाद-बनारस हाइवे पर दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, हस्तिनापुर द्वारा भूमि क्रय कर नूतन तीर्थ का निर्माण किया गया। प्रीतविहार में सन् २००० के ऐतिहासिक चातुर्मास का पूज्य माताजी ने दीपावली के दिन अपनी आगमोक्त विधि से निष्ठापन किया। इस चातुर्मास के मध्य भगवान ऋषभदेव की दीक्षा एवं केवलज्ञानभूमि प्रयाग-इलाहाबाद में नूतन तीर्थ निर्माण की रूपरेखा बनी और अनेक कार्य सम्पन्न हुए। बीसवीं सदी का यह ऐतिहासिक चातुर्मास स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा।

[सम्पादन]
मंगल विहार-

नूतन तीर्थ ‘तपस्थली’ पर ४ से ८ फरवरी २००१ तक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं भगवान ऋषभदेव के १००८ महाकुंभों से मस्तकाभिषेक महोत्सव में अपना पावन सानिध्य प्रदान करने हेतु पूज्य गणिनी माताजी ने संघ सहित १ नवम्बर २००० को प्रात: कमलमंदिर प्रीतविहार-दिल्ली से प्रयाग की ओर मंगल विहार किया। विहार के मध्य में अनेक नगरों में पूज्य माताजी के आगमन पर संघ का भव्य स्वागत हुआ। पूज्य माताजी ने जन-जन को भगवान ऋषभदेव के सिद्धान्तों का प्रचार-प्रसार कर जैनधर्म की प्राचीनता को सिद्ध करने की प्रेरणा दी। पूरे रास्ते महती धर्मप्रभावना हुई तथा सबने अपने नगर में पूज्य माताजी के चरण पड़ने पर अपने को धन्य माना।

[सम्पादन]
नई सदी का नव उपहार-तीर्थ प्रयाग हुआ साकार-

५३ दिवसीय अपनी यात्रा के पश्चात् पूज्य माताजी ने प्रयाग में मंगल प्रवेश किया, वह दृश्य अनूठा था। १ जनवरी २००१ की शुभबेला में पूज्य माताजी ने नवनिर्मित हो रहे तीर्थ ‘‘तीर्थंकर ऋषभदेव तपस्थली’’ में जब प्रवेश किया, तो मात्र १ महीने में कुछ कार्य ही हो पाया था परन्तु पूज्य माताजी के चरण पड़ते ही मात्र २ माह के अल्पकाल में ही उस भूमि पर तीर्थ परिसर में निर्मित ५१ फुट ऊँचे वैâलाशपर्वत पर १४ फुट उत्तुंग पद्मासन भगवान ऋषभदेव की लालवर्णी प्रतिमा विराजमान हो गर्इं। पर्वत के दाहिनी ओर भगवान के दीक्षाकल्याणक के प्रतीक में ‘दीक्षाकल्याणक तपोवन’ मंदिर में विशाल धातु के वटवृक्ष के नीचे भगवान ऋषभदेव की ५ फुट खड्गासन प्रतिमा स्थापित की गर्इं तथा पर्वत के बार्इंं ओर ज्ञानकल्याणक के प्रतीक में ‘समवसरण रचना’ में चतुर्मुखी प्रतिमा विराजमान की गर्इं। इन सभी प्रतिमाओं की प्राणप्रतिष्ठा कर उन्हें जगत्पूज्य बनाने के लिए पूज्य माताजी की प्रेरणा से ४ से ८ फरवरी २००१ तक भगवान ऋषभदेव पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं महाकुंभ मस्तकाभिषेक का विराट आयोजन किया गया। भगवान ऋषभदेव की उत्तुंग प्रतिमा का १००८ महाकुंभों से विश्व में प्रसिद्ध कुंभनगरी में महामस्तकाभिषेक किया गया। इसी कार्यक्रम के साथ ‘भगवान ऋषभदेव अंतर्राष्ट्रीय निर्वाण महामहोत्सव वर्ष’ का समापन हुआ और भगवान महावीर २६००वां जन्मकल्याणक महोत्सव कार्यक्रम के शुभारंभ की घोषणा हुई।

[सम्पादन]
विश्वशांति महावीर विधान-

मंगल विहार के मध्य पूज्य माताजी ने भगवान महावीर के २६००वें जन्मजयंती समारोह के उपलक्ष्य में २६०० मंत्रों से समन्वित ‘विश्वशांति महावीर विधान’ नामक नूतन कृति की रचना की, जिसे भगवान ऋषभदेव के चरणों में प्रयाग तीर्थ पर पूर्ण कर भगवान महावीर के प्रति भक्ति सुमन समर्पित किये। उस हस्तलिखित कृति का लोकार्पण मुख्य अतिथि श्री धनंजय जी द्वारा किया गया।

[सम्पादन]
नवम धर्म संसद में पूज्य माताजी-

स्वर्णिम इतिहास का निर्माण करते हुए प्रयाग के विश्वप्रसिद्ध १२ वर्षीय महाकुंभ मेले में प्रथम बार ‘जैनधर्म’ का प्रतिनिधित्व पूज्य माताजी एवं संघ ने किया। विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष श्री अशोक सिंघल एवं अन्य कार्यकर्ताओं के आग्रह पर पूज्य माताजी वहाँ पधारीं और त्रिदिवसीय आयोजन में ‘भगवान ऋषभदेव सनातन संस्कृति संगम’ मंडप में भगवान का अभिषेक, पूजन, विधान आदि कार्यक्रम हुए तथा भगवान ऋषभदेव के निर्वाणदिवस की पूर्व संध्या पर २१ जनवरी को इसी मण्डप में विशिष्ट अतिथियों के बीच १००८ निर्वाणलाडू चढ़ाये गये। नवम धर्मसंसद की सभा में पूज्य गणिनी ज्ञानमती माताजी व पूज्य चंदनामती माताजी ने भगवान ऋषभदेव और उनके सर्वोदयी सिद्धान्तों को विश्वशांति के लिए महत्वपूर्ण बताया, जिसे वहाँ उपस्थित साधु-संतों ने व जनसमूह ने स्वीकार किया। भगवान ऋषभदेव के जयकारों से समस्त परिसर गुंजायमान हो गया।

[सम्पादन]
पूज्य माताजी के सानिध्य में महावीर जयंती-

प्रयागवासियों को पूज्य माताजी के सानिध्य में २६००वें जन्मजयंती समारोह को मनाने का अवसर प्राप्त हुआ। इस वर्ष को ‘अहिंसावर्ष’ के रूप में मनाये जाने की घोषणा हुई, जिसके अंतर्गत पूरे देश में वर्ष भर विभिन्न कार्यक्रम करने की पूज्य माताजी ने प्रेरणा दी। इस महोत्सव के मंगलाचरण रूप में पूज्य माताजी द्वारा रचित ‘विश्वशांति महावीर विधान’ का भव्य आयोजन १ से ९ अप्रैल तक उन्हीं के ससंघ सानिध्य में किया गया। प्रथम बार इलाहाबाद के नवनिर्मित ‘महावीर जयंती भवन’ में सुमेरुपर्वत के आकर्षक मांडले से युक्त इस विधान में २६०० मंत्रों से समन्वित २६०० रत्न मांडले पर चढ़ाये गये। इस अद्भुत मण्डल विधान में अनेक धर्मनिष्ठ श्रद्धालुओं ने भाग लेकर पुण्यार्जन किया। महावीर जयंती के अवसर पर ६ अप्रैल को पूज्य माताजी के सानिध्य में अिंहसा रैलीरूप २६०० बच्चों का ध्वजा लेकर चलना, ऐरावत हाथी, रथ, इंद्राणियों की मंगल कलश यात्रा, भगवान ऋषभदेव समवसरण श्रीविहार रथ आदि का जुलूस बैंड-बाजे के साथ भव्यरूप में निकाला गया। जगह-जगह प्रसाद वितरण हुआ। धर्मसभा में नगर के अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। पांडुकशिला पर १००८ कलशों से न्हवन शुरू हुआ तथा रात्रि में भी पालना झुलाना आदि अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए।

[सम्पादन]
कौशाम्बी का इतिहास जीवंत हुआ-

पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से उनके मंगल सानिध्य में २ से ७ मई २००१ तक भगवान पद्मप्रभु के गर्भ-जन्म-तप-ज्ञानकल्याणक से पवित्र कौशाम्बी-प्रभासगिरी तीर्थ पर सवा सात फुट उत्तुंंग भगवान पद्मप्रभ की लालवर्णी मनोहारी पद्मासन प्रतिमा एवं ढाई फुट ऊँची मूलनायक पद्मप्रभ भगवान की पद्मासन प्रतिमा तथा नवनिर्मित मानस्तंभ में विराजित होने वाली चतुर्मुखी प्रतिमाओं की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई।

इस प्रतिष्ठा की ऐतिहासिक विशेषता यह रही कि २५६५ वर्ष पूर्व के इतिहास को साकार करते हुए भगवान महावीर २६००वें जन्मकल्याणक महोत्सव वर्ष के अंतर्गत पूज्य माताजी की प्रेरणा से महामुनि महावीर एवं उनको आहार प्रदान करते हुए महासती चंदना की प्रतिमा स्थापित की गई। जनसमूह के मध्य महामुनि महावीर को आहारदान देने का दृश्य दिखाया गया, जिसमें संघपति श्री महावीर प्रसाद जैन, बंगाली स्वीट्स दिल्ली ने इस प्रतिमा की स्थापना एवं प्रथम आहार देने का पुण्य प्राप्त किया।

[सम्पादन]
मंगल विहार-

भगवान ऋषभदेव की दीक्षा एवं केवलज्ञान कल्याणक भूमि को ‘तीर्थंकर ऋषभदेव तपस्थली प्रयाग’ के भव्य निर्माण द्वारा वास्तविक तीर्थ का स्वरूप प्रदान कर पूज्य गणिनी माताजी ने ससंघ २२ अप्रैल २००१ को तपस्थली तीर्थ से राजधानी दिल्ली की ओर मंगल विहार किया। अशोक विहार दिल्ली की जैन समाज के पदाधिकारी पूज्य माताजी के मंगल विहार के मध्य पधारे, उनके अतीव आग्रह पर पूज्य माताजी ने अशोक विहार पेâज-१-दिल्ली में चातुर्मास की स्वीकृति प्रदान कर दी।


[सम्पादन]
छियालिसवाँ चातुर्मास (सन् २००१-अशोक विहार-फैस-१-दिल्ली में)

४ जुलाई को श्री दिगम्बर जैन मंदिर, अशोक विहार, फैज-१ में मध्यान्हकालीन सभा में पूज्य माताजी ने अपने चातुर्मास स्थापना की घोषणा की। भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री साहिब सिंह वर्मा मुख्य अतिथि तथा श्री दीपचंद बंधु (विधायक) विशिष्ट अतिथि रहे एवं सभा की अध्यक्षता साहू श्री रमेशचंद जैन ने की। रात्रि में पूज्य माताजी ने अपने संघस्थ साधुओं के साथ मंत्रोच्चार एवं भक्तिपाठपूर्वक चारों दिशाओं में पुष्प क्षेपण कर विधिपूर्वक चातुर्मास की स्थापना की। १५ जुलाई २००१ को अशोक विहार में दिल्ली जैन समाज के प्रमुख कार्यकर्ताओं की मीटिंग में भगवान महावीर २६००वें जन्मकल्याणक महोत्सव वर्ष के अन्तर्गत होने वाले प्रथम महाआयोजन के रूप में होने वाले ‘विश्वशांति महावीर विधान’ की नवगठित समिति का अध्यक्ष कर्मयोगी ब्र.रवीन्द्र कुमार जैन को मनोनीत किया गया। यह आयोजन २१ से २८ अक्टूबर २००१ तक होना निश्चित हुआ। एक ही पाण्डाल में २६ मण्डल बनाकर प्रत्येक मांडले पर १०० व्यक्तियों को २६०० मंत्रों के साथ रत्न चढ़ाकर भगवान महावीर की पूजन हेतु ‘विश्वशांति महावीर विधान’ के इस अपूर्व आयोजन का सुअवसर प्राप्त हो, ऐसी व्यवस्था की रूपरेखा बनी।

[सम्पादन]
भक्ति महाकुंभ की शृँखला में प्रथम राष्ट्रीय आयोजन-

दिल्ली के ऐतिहासिक फिरोजशाह कोटला मैदान के ‘भगवान महावीर मंडप’ में २१ से २८ अक्टूबर तक ‘विश्वशांति महावीर विधान’ का विराट आयोजन किया गया। ६ अप्रैल को आयोजित उस भव्य कार्यक्रम के पश्चात् पूज्य माताजी की प्रेरणा से राजधानी दिल्ली में २६ मण्डल बनाकर विश्वशांति की कामना से रत्नों द्वारा भगवान महावीर की आराधना करने वाला यह प्रथम राष्ट्रीय आयोजन था। उद्घाटन सभा की अध्यक्षता केन्द्रीय टेक्सटाइल राज्यमंत्री श्री वी.धनंजय कुमार जैन ने की तथा मुख्य अतिथि टाइम्स ग्रुप की अध्यक्षा श्रीमती इन्दु जैन थीं। इस अवसर पर ‘कुण्डलपुर के राजकुमार भगवान महावीर’ के चित्र का एवं नूतन कृति ‘विश्वशांति महावीर विधान’ का विमोचन दोनों महानुभावों ने किया। इस विधान के २६ मण्डलों में से प्रथम मण्डल में राजा सिद्धार्थ एवं रानी त्रिशला के रूप में श्रेष्ठी श्री कमलचंद जी जैन-खारीबावली, दिल्ली एवं उनकी धर्मपत्नी श्रीमती मैनासुन्दरी ने सपरिवार पूजन करने का सौभाग्य प्राप्त किया। इस विधान का मुख्य आकर्षण थे सुमेरु के आकार के बने प्रत्येक मण्डल पर चढ़ने वाले २६००-२६०० रत्न, जिन्हें देखने के लिए देश के कोने-कोने से लोग आ रहे थे और पूज्य माताजी की प्रशंसा करते नहीं थकते थे। यह विधान रत्नों द्वारा पूजा के कारण समस्त विधानों से अलग ही सुशोभित हो रहा था। इस विधान की जाप्य में मंत्रित किये गये रत्नों को धनकुबेर श्रद्धालुओं में वितरित करता था, जिसे प्राप्त करने के लिए लोगों में होड़ लगी रहती थी, यह दृश्य भी अभूतपूर्व होता था। भगवान महावीर के जन्मकल्याणक के प्रतीक में प्रतिदिन रात्रि में पालना झुलाया जाता था एवं विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोेजित हुए। प्रतिदिन विधान के पश्चात् २ घंंटे तक ‘‘ॐ ह्रीं विश्वशांतिकराय श्री महावीरजिनेन्द्राय नम:’’ इस मंत्र का अखण्ड जाप्य होता था, जिसमें देश में व विश्व में शांति की कामना की जाती थी। पूर्णाहुति के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। २६ मण्डलों के भगवन्तों, सुमेरुपर्वत की २६ प्रतिकृतियों का महाभिषेक, शांतिधारा एवं मंगल आरती हुई।

[सम्पादन]
‘गणिनी ज्ञानमती पुरस्कार’ सम्मान-

२५ अक्टूबर को सायंकालीन सभा में जैन साहित्य में अपना विशेष योगदान प्रदान करने वाले पं. श्री शिवचरनलाल जैन-मैनपुरी को दि. जैन त्रिलोक शोध संस्थान का प्रमुख पुरस्कार श्री अनिल कुमार अतिशय कुमार जैन, कमल मंदिर-प्रीतविहार-दिल्ली के सौजन्य से ‘गणिनी ज्ञानमती पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। विभिन्न उपाधियों से माताजी का सम्मान-पूज्य माताजी को समय-समय पर आचार्यों, समाज, विश्वविद्यालय व गुरुओं के द्वारा अनेक उपाधियाँ प्रदान की गर्इं। उसी शृँखला में महाराष्ट्र प्रांत के प्रतिनिधियों ने ‘राष्ट्रगौरव’, अवध प्रांत द्वारा ‘धर्ममूर्ति’ एवं दिल्ली के प्रतिनिधि मण्डल ने ‘विश्वविभूति’ की उपाधि से विभूषित कर अपने-अपने प्रांत का गौरव माना। इस महाआयोजन के अवसर पर प्रथम मण्डल के प्रमुख भक्त राजा सिद्धार्थ श्री कमलचंद जैन-खारीबावली, दिल्ली को पूज्य माताजी की प्रेरणा एवं ससंघ सानिध्य में दि. जैन त्रिलोक शोध संस्थान द्वारा ‘दानवीर-समाजरत्न’ की उपाधि से अलंकृत किया गया।

[सम्पादन]
पावापुरी की रचना बनी-

पूज्य माताजी की प्रेरणा से उनके ससंघ सानिध्य में राजधानी दिल्ली के कनॉट प्लेस-राजाबाजार स्थित श्री अग्रवाल दि. जैन मंदिर के प्रांगण में पावापुरी सिद्धक्षेत्र की स्थाई एवं विशाल रचना बनाकर ‘‘दीपावली’’ के शुभ दिन १५ नवम्बर को प्रात: २६०० निर्वाण लाडू चढ़ाने का भव्य आयोजन किया गया।

[सम्पादन]
मौन यात्रा एवं सर्वधर्म सम्मेलन-

भगवार महावीर २६००वाँ जन्मकल्याणक महोत्सव एवं दिल्ली प्रदेश समिति के तत्त्वावधान में भगवान महावीर के निर्वाणोत्सव के उपलक्ष्य में तथा हिंसा एवं आतंकवाद के विरोध में एक विशाल जैन पदयात्रा विजय चौक से इण्डिया गेट तक १८ नवम्बर को आयोजित की गई, जिसमें हजारों स्कूली बच्चों ने तथा गणमान्य लोगों ने अपने हाथ में लिए बैनरों से अहिंसा एवं भाईचारे का संदेश दिया। पदयात्रा के पश्चात् इण्डिया गेट पर आयोजित सभा में दिगम्बर जैन समाज की ओर से पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की शिष्या प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी ने अपना उद्बोधन दिया। यह प्रथम अवसर था, जब ‘इण्डिया गेट’ से जैन समाज द्वारा अहिंसा एवं शांति का संदेश प्रसारित किया गया।

[सम्पादन]
भगवान महावीर दीक्षा कल्याणक दिवस-

१० दिसम्बर २००१ को राजधानी दिल्ली के तालकटोरा इंडोर स्टेडियम में जैन समाज के सभी संप्रदायों के २०० से भी अधिक साधु-साध्वियों के सानिध्य में ‘जप तप महाकुंभ’ के रूप में भगवान महावीर का दीक्षाकल्याणक महोत्सव एक विलक्षण रूप में सम्पन्न हुआ। जिसमें पूज्य माताजी ने भी अपना ससंघ सानिध्य प्रदान किया और उपस्थित जनसमूह को सम्बोधित किया।


[सम्पादन]
रजत जयंती समारोह-

६ जनवरी २००२ को राजधानी दिल्ली के फिक्की ऑडिटोरियम में पूज्य माताजी एवं संघ के सानिध्य में अखिल भारतवर्षीय दि. जैन युवा परिषद का रजत जयंती समारोह-राष्ट्रीय युवा सम्मेलन का वृहद् आयोजन हुआ, जिसे दिल्ली प्रदेश शाखा ने आयोजित किया, जिसका मुख्य विषय था ‘‘भगवान महावीर २६००वें जन्मजयंती महोत्सव वर्ष में युवाओं की भूमिका’’। समारोह के मुख्य अतिथि थे प्रख्यात विधिवेत्ता एवं सांसद डॉ.एल.एम.सिंघवी एवं विशिष्ट अतिथि श्री डॉ. वाचस्पति उपाध्याय (कुलपति-डॉ. लालबहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ) थे। समारोह की अध्यक्षता युवा परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष कर्मयोगी ब्र.रवीन्द्र कुमार जी ने की। समारोह में ‘‘कुण्डलपुर के राजकुमार भगवान महावीर’’ के चित्र का अनावरण किया गया। कुण्डलपुर (नालंदा) बिहार ही भगवान महावीर की वास्तविक जन्मभूमि है और उसका विकास किया जाये। इस विषय पर सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया। समारोह में विभिन्न प्रांतों के पदाधिकारियों ने भाग लिया। पूज्य माताजी ने सभी युवाओं को अपना मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।

[सम्पादन]
तीर्थ विकास की ओर बढ़े कदम-

भगवान महावीर जन्मभूमि कुण्डलपुर (नालंदा) बिहार के विकास का संकल्प लेकर पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का इण्डिया गेट fिदल्ली से २० फरवरी २००२ को मंगल विहार हुआ। यात्रा के संघपति बनने का सौभाग्य प्राप्त किया श्री महावीर प्रसाद जैन, बंगाली स्वीट सपरिवार एवं सहयोगी श्री प्रेमचंद जी जैन-खारीबावली-दिल्ली ने। पूज्य माताजी के हृदय में तीर्थंकर भगवन्तों की कल्याणक भूमियों के विकास की भावना हर क्षण विद्यमान रहती है। जिन भगवान महावीर के शासनकाल में हम रह रहे हैं तथा जिनका २६००वाँ जन्मकल्याणक मनाया जा रहा है, उन भगवान की जन्मभूमि वीरान पड़ी हो, जहाँ कोई एक दीपक जलाने वाला न हो, ऐसी भूमि का विकास अवश्य होना चाहिए, इसी भावना को मन में लेकर पूज्य माताजी के चरण उस तीर्थ की ओर चल पड़े। पूज्य माताजी के इस संकल्प को पूर्ण करने के लिए सभी दिल्लीवासी और पूरा देश उनके पीछे चल पड़ा। जन-जन को एक नारा दिया गया-‘तीरथ विकास क्रम जारी है अब कुण्डलपुर की बारी है।’ यात्रा के प्रथम पड़ाव के रूप में ‘मथुरा’ सिद्धक्षेत्र के दर्शन कर जंबूस्वामी के चरणों में अपने भक्ति सुमन अर्पित किये। उसके पश्चात् आगरा, फिरोजाबाद, एटा आदि महानगरों में भगवान महावीर जन्मभूमि के विकास की गूंज करते हुए संघ आगे बढ़ रहा था।

[सम्पादन]
मांगीतुंगी में शिलापूजन समारोह-

भगवान ऋषभदेव की परम्परा में अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर के २६००वें जन्मकल्याणक महोत्सव वर्ष में ९९ करोड़ महामुनियों की निर्वाणभूमि महाराष्ट्र प्रांत के मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र के पर्वत की अखण्डशिला में भगवान ऋषभदेव १०८ फुट विशालकाय मूर्ति निर्माण हेतु शिलापूजन समारोह ३ मार्च २००२ को श्री महावीर प्रसाद जैन संघपति, बंगाली स्वीट सेंटर, दिल्ली सपरिवार द्वारा सानंद सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर दूर-दूर से हजारों श्रद्धालु भक्तों ने पधारकर अपना अहोभाग्य माना। पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने सन् १९९६ में मांगीतुंगी चातुर्मास के मध्य शरदपूर्णिमा के दिन इस प्रतिमा निर्माण की प्रेरणा प्रदान की थी, तब से आज तक लगातार मूर्ति निर्माण कार्य जारी है।

[सम्पादन]
कीर्तिस्तंभ का शिलान्यास-

२४ मार्च २००२, फाल्गुन शु. १० को भगवान महावीर स्वामी की जन्मभूमि कुण्डलपुर (नालंदा-बिहार) में महावीर स्वामी कीर्तिस्तंभ का शिलान्यास सानंद सम्पन्न हुआ। शिलान्यास ‘समाजरत्न-दानवीर’ श्री कमलचंद जैन-खारीबावली, दिल्ली ने अपने परिवार सहित किया।

[सम्पादन]
महिला सम्मेलन-

३१ मार्च २००१ को २६००वें जन्मकल्याणक महोत्सव के अंतर्गत पूज्य माताजी की प्रेरणा से अ.भा. दि. जैन महिला संगठन, दिल्ली प्रदेश के तत्त्वावधान में राष्ट्रीय प्रतिभाशाली महिला सम्मान, त्रिशला माता सम्मान समारोह एवं ५वाँ वार्षिकोत्सव फिक्की ऑडिटोरियम,नई दिल्ली में सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ।

[सम्पादन]
महावीर जयंती एवं दीक्षा दिवस-

२५ अप्रैल २००२ को फिरोजाबाद (उ.प्र.) में पूज्य माताजी के ससंघ सानिध्य में महावीर जयंती कार्यक्रम की विशाल रथयात्रा निकाली गई, धर्मसभा हुई एवं रात्रि में २६०० दीपकों से भगवान की मंगल आरती की गई। राजधानी दिल्ली में भगवान महावीर जन्मकल्याणक वर्ष की समापन सभा सिरीफोर्ट ऑडिटोरियम नई दिल्ली में हुई। प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने समापन सभा में कहा कि इस समारोह का समापन न मानकर भगवान महावीर के सिद्धान्तों के प्रचार-प्रसार की शृँखला जारी रहनी चाहिए। पूज्य माताजी ने भी अपना मंगल आशीर्वाद नेताओं के लिए व जनता के लिए प्रेषित किया। २८ अप्रैल, वैशाख कृष्णा दूज को भारी भीड़ के मध्य माताजी का ४७वाँ आर्यिका दीक्षा दिवस समारोह मनाया गया। इस अवसर पर सकल दिगम्बर जैन समाज फिरोजाबाद ने पूज्य माताजी को ‘युगनायिका’ की उपाधि से अलंकृत किया।


[सम्पादन]
सैंतालिसवाँ चातुर्मास (२००२, प्रयाग-इलाहाबाद में)

दिल्ली राजधानी से २० फरवरी २००२ को कुण्डलपुर (नालंदा) तीर्थ के लिए मंगल विहार करते हुए पूज्य माताजी ससंघ १२ जून २००२ को प्रयाग तीर्थ पर पुन: पधारीं।

[सम्पादन]
लोकार्पण एवं उद्घाटन

-ऋषभदेव तपस्थली पर निर्मित अत्यंत सुंदर ५१ फुट ऊँचे कैलाशपर्वत का निर्माण १ वर्ष की अल्प अवधि में किया गया। फव्वारों एवं झरनों के प्राकृतिक सौंदर्य से समन्वित इस कैलाशपर्वत पर ७२ जिनमंदिर स्थापित किये गये। इन ७२ जिनमंदिरों में २४ जून,