ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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आर्यिका दीक्षा भूमि माधोराजपुरा का परिचय

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गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी की आर्यिका दीक्षा भूमि माधोराजपुरा-एक धार्मिक स्थल

लेखक-भँवर सेठी ‘झुमर’, माधोराजपुरा
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गुलाबी नगरी जयपुर के निकट बसा माधोराजपुरा कस्बा एक धार्मिक स्थल है। लगभग २०० वर्ष पुराने विशाल और भव्य तीन जैन मंदिर तथा पास ही एक किलोमीटर दूर झराना में स्थित अतिशययुक्त एक पद्मप्रभु जिनालय है शांत और रमणीक उपासना स्थल माधोराजपुरा की एक नशिया के रूप में है। इसके अतिरिक्त विशाल शिवमंदिर और वैष्णव मंदिर इस बात को प्रमाणित करते हैं कि पूर्व में जैन धर्मावलम्बी और वैष्णव धर्मावलम्बी एक साथ मिलजुल कर रहते थे। कहा जाता है कि लगभग दो सदी पूर्व, पास ही के एक छोटे से गाँव में एक राजसिंह नाम के व्यक्ति रहते थे। यह क्षत्रिय एक बहादुर व्यक्ति था। किन्तु आजीविका के उपयुक्त साधन न होने के कारण डाके डालता था। इनकी इस करतूत से जयपुर राज्य के तत्कालीन शासक महाराजा माधोसिंह बहुत चिंतित थे। अवसर देखकर एक बार उन्होंने अपने दरबार में जयसिंह को बुलाया और ऐसा निन्दित कर्म न करने के लिए समझाया। फलस्वरूप जयसिंह ने भी ऐसे घृणित कार्य को न करना स्वीकार किया, किन्तु अपनी आजीविका की मजबूरी जाहिर की, अत: महाराज माधोसिंह ने ग्राम झिराना की रियासत से काटकर एक गाँव उसे जागीर में दिया, जिसका नाम दोनों शासकों के नाम के आधार पर माधोराजपुरा रखा गया। यहाँ पर बसने के लिए आसपास के कुशल व्यापारियों, कृषकों, कारीगरों, पंडितों आदि को आमंत्रित किया गया और उन्हें भूमि व अन्य सहयोग देकर यहाँ बसाया गया। इन लोगों ने सुविधा का लाभ उठाकर यहाँ पर अपने आवास व बाजार बनाये। व्यापारियों में कुशल व्यापारी, कुशल पंडित, कुशल कारीगरों के समूह आज भी इस कस्बे में निवास करते हैं और क्षेत्र में अपना रुतबा रखते हैं। एक और विशेषता इस कस्बे की बसावट में लाई गई, वह है इसे प्रसिद्ध गुलाबी नगरी जयपुर की तर्ज पर बसाना। यह कस्बा एक निर्धारित प्लान के अनुसार बसा हुआ है। जिसमें राजकीय आवास के रूप में एक विशाल किले का निर्माण किया गया है, जिसके चारों ओर मुख्य परकोटे के नीचे गहरी खाई है। किले के सामने सीधा चौड़ा बाजार बनाया गया है और बाजार को २ भागों में विभक्त करते हुए बीच में चोपड़नुमा कटला का निर्माण किया गया है, जिसके बीच में एक विशाल चौक और दो विशाल मंदिर हैं, जो पूर्व स्थापत्य कला के अनुसार मनोहर हैं। मुख्य बाजारों से पूरे कस्बे के चारों ओर के छोरों पर सीधे और चौड़े रास्ते बनाये गये हैं, जो बाजारों से आकर मिलते हैं। ठीक जयपुर की तरह इस कस्बे का निर्माण किया गया है। इसके अतिरिक्त यहाँ हर जाति समूहों के लिए भिन्न-भिन्न ब्लाक काटे गये हैं, जहाँ पर सम्पूर्ण पक्के मकानों और विशाल हवेलियों में विभिन्न जाति के लोग बसे हुए हैं। गाँव के चारों ओर चार कच्चे दरवाजों के साथ-साथ चारों ओर विशाल परकोटे हैं, जिसके नीचे भी गहरी खाई है। किन्तु अब ये काफी जीर्ण-शीर्ण हो चुके हैं, फिर भी अच्छी तरह देखे जा सकते हैं।

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माधोराजपुरा एक विशाल व्यापारिक मण्डी भी रहा है।

जहाँ आस-पास के गाँवों से सैकड़ों गाड़ियाँ रोज आकर बाजार में बिकती थीं। आज के पचास वर्ष पहले तक बाजारों में गाड़ियों की भारी भीड़ रहती थी। किन्तु समय के परिवर्तन के अनुसार अब मण्डी का कार्य भी काफी कमजोर पड़ गया है। यह क्षेत्र जैनियों की आबादी के लिहाज से अति महत्वपूर्ण है। माधोराजपुरा के आसपास फागी, चोरू, मौजमाबाद, रैनवाल, पीपला आदि कस्बों में दिगम्बर जैन समाज की सघन आबादी है और अनेक भव्य मंदिर निर्मित हैं। इसके अतिरिक्त छोटे गाँवों में भी जहाँ दो-चार घर जैनियों के हैं, हर गाँव में जैन मंदिर बने हुए हैं। अधिकांश गाँवों को जैन निवास कहते हैं और जैन मंदिर भी हैं। इस की सूची काफी बड़ी हो सकती है। इस क्षेत्र की एक विशेषता यह भी है कि आसपास के बड़े नगर भी जैन समाज के केन्द्र है, जिनमेें दि. जैन आबादी का बाहुल्य है। ये हैं जैननगर-जयपुर, सांगानेर, अजमेर, टोंक, मालपुरा, चाकसू, निवाई आदि। इन क्षेत्रों में बसने वाले अग्रवाल समाज के ९० प्रतिशत लोग दिगम्बर जैन धर्म को मानने वाले हैं। प्रसिद्ध अतिशय क्षेत्र पद्मपुरा (बाड़ा) भी यहाँ से केवल ४० किमी. दूर है। यहाँ के मंदिरों में जहाँ भव्यता और निर्माणकला का आकर्षण है, वहाँ अनेक मंदिरों में भारी जैन वाङ्गमय भी उपलब्ध है। कई प्राचीन हस्तलिखित शास्त्र मंदिरों में सुरक्षित हैं। एक योजना के अनुसार क्षेत्र के जैन मंदिरों और शास्त्रागारों की सूची तैयार की गई थी, जो एक विशाल पुस्तक के रूप में छपकर आज भी जयपुर में भट्टारक जी की नशियाँ में उपलब्ध है। आज भी याद है हमें वह शुभ और पावन दिन, जिस दिन एक गौरवमयी गाथा का शुभारंभ हुआ था अर्थात् आर्यिका शिरोमणि गणिनीप्रमुख, प्रख्यात विदुषी १०५ श्री ज्ञानमती माताजी का आर्यिका दीक्षा ग्रहण संस्कार अपूर्व उल्लास और समारोह के साथ कस्बा माधोराजपुरा में हुआ था। दीक्षा गुरु थे-मुनिसंघ शिरमौर्य आचार्यप्रवर पूज्य श्री १०८ वीरसागर जी महाराज और संघस्थ मुनिवर थे- १०८ श्री शिवसागर जी महाराज, १०८ श्री धर्मसागर जी महाराज, १०८ श्री नेमिसागर जी महाराज, १०८ श्री पद्मसागर जी महाराज तथा अन्य आर्यिकागण एवं ब्रह्मचारीगण।

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वैशाख का महीना, कृष्ण पक्ष की द्वितीया,

विक्रम संवत् २०१३-आचार्य वीरसागर महाराज, जैन दर्शन और आध्यात्म के परम उत्कृष्ट विद्वान, सम्यक्दर्शन-ज्ञान-चारित्र से विभूषित, महान तपोनिधि, वीतरागी और समताभावी संत, जिन्होंने परखा एक हीरे को, उसके मौलिक गुणों को और तरासी गई आभा को और उसे चुना था आर्यिका दीक्षा के लिए। यह हीरा थीं-टिवैâतनगर, जिला बाराबंकी (उ.प्र.) के प्रसिद्ध व्यवसायी श्री छोटेलाल तथा श्रीमती मोहिनी देवी (धर्मपरायण नारी जो आर्यिका रत्नमती जी के नाम से विख्यात हुर्इं) की सुपुत्री मैना देवी। ये बालपन से ही धर्म आध्यात्म में रुचि रखने वाली एक होनहार बालिका थीं, जिन्होंने १८ वर्ष की अल्पायु में ही संसार का मोह त्याग कर सप्तम प्रतिमा धारण कर ली थी और सन् १९५३ में आचार्य श्री देशभूषण जी महाराज से क्षुल्लिका दीक्षा ले ली थी-नाम रखा गया था वीरमती। इसके बाद सन् १९५६ में ही ये क्षुल्लिका वीरमती बनीं आर्यिकारत्न ज्ञानमती माताजी, आचार्यप्रवर श्री वीरसागर जी महाराज से माधोराजपुरा में दीक्षा प्राप्त कर। यह हीरा जिसकी अद्भुत आभा ने सारे संसार को चमत्कृत कर दिया। जिनको अनेक उपमाओं और नामों से अलंकृत किया गया, जिन्होंने सतत् अध्ययनरत रहकर अनेकों ग्रंथों की रचना कर डाली और कई महत्वपूर्ण अध्यात्म ग्रंथों के सरल अनुवाद किये। जिनकी प्रेरणा से जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर जैसे कई दर्शनीय तीर्थस्थलों का निर्माण और विस्तार हुआ। जिन्होंने कई मंडल विधानों की रचना कर जिनेन्द्र भक्ति के निमित्त अनेकों अनुष्ठानों का विधि-विधान तैयार किया। जिन्होंने ज्ञानज्योति प्रवर्तन कराकर १०४५ दिनों तक सम्पूर्ण भारत में यात्रा आयोजित कर, धर्मप्रभावना के साथ-साथ अद्वितीय ख्याति प्राप्त की। जिनके पद वन्दन के लिए देश के शीर्षस्थ पदासीन राजनेताओं, अनेक धन सम्पन्न सेठ साहूकारों, अनेक विद्वानों, साहित्यकारों और कलाकारों जैसी विभूतियों की भीड़ उमड़ पड़ी।

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माधोराजपुरा (तह. फागी, जिला-जयपुर, राजस्थान)

कस्बे में आसपास का भारी जनसमूह उमड़ रहा था। आसपास का सारा जैन समाज एकत्रित था। मुनिसंघ के दर्शनों के साथ-साथ धर्मप्रभावना का दौर जारी था, इसी के साथ आया माता ज्ञानमती जी की दीक्षा का दिन। दीक्षा के पहले दिन माताजी की विशाल शोभायात्रा आयोजित की गई और नर-नारियों ने उनकी शोभायात्रा पर फूलों की वर्षा करके उल्लास और सम्मान प्रकट किया तथा गाजे-बाजे के साथ भजन-नृत्य करते हुए नगर परिक्रमा की। दूसरे दिन मुख्य बाजार के छोर पर किले के विशाल मैदान में एक विशाल पाण्डाल सजाया गया। हजारों नर-नारियों के बीच पाण्डाल में मुनिसंघ विराजमान था। भजन नृत्य आदि कार्यक्रम सम्पन्न किए जा रहे थे और दीक्षा संंबंधी कार्यक्रम सम्पन्न कराया जा रहा था कि अचानक एक अद्भुत घटना घटी। एक सांड (बैल) आया, जिसके एक सींग में गुड़ की भेली फसी हुई थी। यह भीड़ को चीरता हुआ तेजी से पाण्डाल में मुनिसंघ के समीप मंच तक पहुँच गया। पाण्डाल में खलबली मच गई, क्योंकि सांड जैसे जानवर काफी उद्दण्ड और मारक होते हैं। किन्तु आचार्यश्री के संबोधन से पाण्डाल में बैठे लोग शान्त हो गये और आश्चर्य से साँड की तरफ देखने लगे। साँड मंच के पास तेजी से उद्विग्न अवस्था में पहुँचा किन्तु मंच के पास पहुुँचते ही शान्त होकर खड़ा रहा। सभी मुनिराजों की तरफ देखा। हो रहे दीक्षा संस्कार पर नजर डाली और शान्त कदमों से मंच के एक छोर से दूसरे छोर तक, नतमस्तक होकर पाण्डाल के बाहर निकल गया। सांड के सींग में फसी हुई गुड़ की भेली भी मंच के पास गिर गई, मानों उसने यह गुड़ की भेली भावों से मुनिराजों को समर्पित की हो। यह सब देखकर लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि ऐसा उद्दण्ड जानवर इस प्रकार शान्त होकर कैसे निकल गया? इसी तरह की एक और घटना को भी लोग चमत्कार ही मानते हैं। जो इस प्रकार है-

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दीक्षा संस्कार को देखने के लिए

आसपास के श्रावकों के साथ-साथ टोंक, मालपुरा, केकड़ी, फुलेरा और जयपुर तथा जहाँ-जहाँ स्थानीय लोगों की रिश्तेदारियाँ थीं, वहाँ से काफी संख्या में आकर श्रावक जन एकत्रित हो गये थे। सभी आगन्तुक श्रावकों के लिए सहभोज की व्यवस्था की गई थी। स्थानीय प्रबंधकों को यह आशा नहीं थी कि इतना भारी श्रावक समुदाय इसमें उमड़ पड़ेगा। सामान्यत: ऐसे आयोजन तो होते ही रहते हैं, उतनी ही संख्या का अनुमान लगाकर भोजन की व्यवस्था की गई थी। लेकिन इतनी अधिक संख्या को देखकर स्थानीय व्यवस्थापकों को भोज्य पदार्थों में कमी पड़ जाने की चिंता उत्पन्न हो गई। तुरंत विश्ोष व्यवस्था के लिए प्लान बनाया गया। बात आचार्य वीरसागर जी तक भी पहुँच गई। महाराज ने स्थानीय व्यवस्थापकों को मंच पर बुलाया और एक सफेद चादर की मांग की। चादर लाई गई। आचार्य श्री ने उसे अभिमंत्रित किया और व्यवस्थापकों को सौंपते हुए कहा कि आप इस चादर को भंडार गृह में ले जाकर डाल दें और सारी विशेष व्यवस्था की चिंता छोड़कर आराम से श्रद्धापूर्वक कार्यक्रम को देखें। कोई कमी नहीं आयेगी। आचार्यश्री का आदेश पाकर लोग निश्चिन्त हो गये। फिर भी लोगों के मन में यह शंका थी कि कहीं बात खराब न हो जाये। किन्तु आश्चर्य की बात है कि सारा कार्य आराम से निबट गया। अच्छी तरह भोज का कार्यक्रम सम्पन्न हो गया और किसी भी प्रकार की कमी महसूस नहीं की गई। माताजी का दीक्षा संस्कार मंच पर सम्पन्न कराया जा रहा था और यह दीक्षा मंडप वटवृक्ष के नीचे बना था, जो कि शायद इसी बात का द्योतक था कि आज से करोड़ों वर्ष पूर्व भगवान ऋषभदेव ने वटवृक्ष के नीचे दीक्षा लेकर मुनि परम्परा को जीवन्त किया था, उसी क्रम में वटवृक्ष के नीचे वाली यह दीक्षा भी किसी महत्वपूर्ण तथ्य का संकेत थी और वह था-बीसवीं शताब्दी में उनके द्वारा होने वाला प्रत्येक कार्य अपने आप में अद्वितीय और सर्वप्रथम कार्य होता है, फिर चाहे वह लघु हो अथवा वृहद्। दीक्षा के समय माताजी के चेहरे पर अभूतपूर्व प्रसन्नता और उत्साह झलक रहा था। जय-जयकार के शब्दों से पाण्डाल गुंजायमान हो रहा था। दीक्षा के समय माता-पिता बनाये जाते हैं, इनका स्थान लिया था स्थानीय स्व. सेठ श्री सागरमल रांवका और उनकी श्रीमती ने। जिनके सुपुत्र संतोष कुमार रांवका आज भी सपरिवार माताजी के प्रति अनन्य श्रद्धाभाव रखते हैं और उनके दर्शनार्थ जाते-आते रहते हैं।

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बहुत समय बीत गया। समारोह को

सम्पन्न कराने और शामिल होने वाले अधिकांश श्रावक-श्राविकाएँ दिवंगत हो चुके हैं। किन्तु श्री गुलकंद बाकलीवाल, भँवरलाल सेठी, रतनलाल कासलीवाल, लक्ष्मी नारायण बोहरा, रतनलाल पापड़ीवाल, मोतीलाल चाँदवाड़, रामस्वरूप चौरया वाले तथा चेतनलाल कांगला आदि आज भी मौजूद हैं, जिन्होंने इस दीक्षा समारोह को अपनी आँखों से देखा था और हर कार्यक्रम के सहयोगी भी बने थे। वैसे अगली पीढ़ी के युवकों में भी इसकी धुँधली यादें शेष है। हमें इस बात पर गर्व है कि आज समाज और सम्पूर्ण देश में विख्यात परमविदुषी, गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी का दीक्षा संस्कार यहाँ पर हुआ है। इस पुनीत कार्य से यह स्थान पावन और तीर्थस्थल रूप बन गया है। हमारी अभिलाषा है कि इस स्थान पर माताजी की दीक्षा की स्मृति में एक भव्य जिनालय और स्मृति संस्थान का निर्माण कराया जाये। जिसके लिए आवश्यक प्लान तैयार करके भूमि अधिग्रहण कर ली गई है और निर्माण कार्य की तैयारियाँ चालू है। माधोराजपुरा कस्बे में विशाल और भव्य तीन जैन मंदिर हैं और एक नशियाँ झराना में हैं लगभग ५० घर दिगम्बर जैनों के हैं। क्षेत्र के श्रावकों में माताजी के प्रति पूर्ण श्रद्धा है, जो कि सदैव तक बनी रहेगी और शीघ्र ही दीक्षा स्मृति रूप जिनालय एवं स्मृति संस्थान के निर्माण के साथ यह क्षेत्र एक दर्शनीय तीर्थस्थल के रूप में विख्यात होगा, ऐसी तप:पूत माताजी को वन्दन-अभिवंदन।