ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्ज एप पर मेसेज करें|

परम पू. ज्ञानमती माताजी के सानिध्य में सिद्धचक्र महामंडल विधान (आश्विन शुक्ला एकम से आश्विन शुक्ला नवमी तक) प्रारंभ हो गया है|

आवश्यक शंका-समाधान

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

आवश्यक शंका-समाधान

(गणिनी आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी से आर्यिका चन्दनामती माताजी द्वारा समय-समय पर किये गये कतिपय विषयों पर शंका-समाधान यहाँ प्रस्तुत किए जा रहे हैं। इनका सूक्ष्मता से अवलोकन करने पर श्रद्धालु पाठकों को अनेक विषयों का ज्ञान प्राप्त होगा)

विषय-‘‘विद्यमान बीस तीर्थंकर कहाँ-कहाँ?’’'

चन्दनामती माताजी-पूज्य माताजी! वन्दामि, मैं आपसे बीस विद्यमान तीर्थंकरों के बारे में कुछ प्रश्न पूछना चाहती हूँ। जनसामान्य के ज्ञान हेतु उत्तर देने की कृपा करें।

श्री ज्ञानमती माताजी-विषय तो बहुत अच्छा है, पूछो।

चन्दनामती-मंदिरों में प्राय: प्रतिदिन पूजा करने वाले स्त्री-पुरुष बीस तीर्थंकरों की पूजा करते अथवा अघ्र्य चढ़ाते देखे जाते हैं। ये तीर्थंकर आज इस पृथ्वीतल पर तो दिखते नहीं हैं फिर भी इनके साथ ‘‘विद्यमान’’ शब्द क्यों लगा रहता है?

श्री ज्ञानमती माताजी-इस भरतक्षेत्र के आर्यखण्ड में इस समय पंचमकाल चल रहा है अत: वर्तमान में यहाँ कोई तीर्थंकर नहीं हैं किन्तु विदेहक्षेत्रों में सदैव चतुर्थकाल ही रहता है, वहाँ तीर्थंकर हमेशा विद्यमान रहते हैं इसीलिए विद्यमान बीस तीर्थंकरों की पूजा की जाती है। आज भी विदेहक्षेत्र में तीर्थंकर हो रहे हैं।

चन्दनामती-उन तीर्थंकरों की संख्या बीस ही निश्चित क्यों है? या तो भरतक्षेत्र के तीर्थंकरों के समान २४ होनी चाहिए अथवा ३२ विदेह क्षेत्रों के हिसाब से ३२ होनी चाहिए?

श्री ज्ञानमती माताजी-भरतक्षेत्र और विदेहक्षेत्र की सभी व्यवस्थाओं में समानता नहीं है। भरतक्षेत्र के आर्यखण्ड में षट्काल परिवर्तन होता है अत: वहाँ मात्र चतुर्थकाल में हमेशा २४ तीर्थंकर होते हैं। वहाँ की यह संख्या निश्चित है इसलिए भूतकाल में वहाँ अनन्त चौबीसी तो हो चुकी हैं आगे भी अनन्तों चैबीसी होती रहेंगी। विदेह क्षेत्र में ऐसा कोई क्रम नहीं है। वहाँ की व्यवस्था मैं बतलाती हूँ कि बीस तीर्थंकर कहाँ-कहाँ रहते हैं- ढाई द्वीप के पाँच मेरु संबंधी पाँच महाविदेहों में ये बीस तीर्थंकर सतत विहार करते रहते हैं अत: इन्हें ‘‘विहरमाण बीस तीर्थंकर’’ भी कहते हैं।

चन्दनामती-तो क्या इन तीर्थंकरों की आयु कभी समाप्त ही नहीं होेती है अथवा उन्हीं के स्थान पर उसी नाम वाले दूसरे तीर्थंकर हुआ करते हैं?

श्री ज्ञानमती माताजी-आयु तो सभी जीवों की एक न एक दिन समाप्त होती ही है विदेह क्षेत्र में उत्कृष्ट आयु एक कोटि वर्ष पूर्व की है। अत: वे तीर्थंकर भी अपनी आयु पूरी करके जब मोक्ष चले जाते हैं तब वहीं विदेह क्षेत्र में दूसरे तीर्थंकर का जन्म होता है। हाँ, नाम वे ही होने से यही अनुमान लगता है कि इन तीर्थंकरों के जो नाम निश्चित हैं वे ही हमेशा रहते हैं इस विषय में कोई विशेष खुलासा नहीं मिलता है।

चन्दनामती-आपने बताया कि पाँच महाविदेहों में ये बीसों तीर्थंकर होते हैं, सो इनका क्रम किस प्रकार है?

श्री ज्ञानमती माताजी-प्रत्येक विदेह क्षेत्रों में भी भरतक्षेत्र के समान ६-६ खण्ड होते हैं। उनमें भी आर्यखण्डों में ही तीर्थंकरों का जन्म होता है। सर्वप्रथम जम्बूद्वीप में ही सुमेरुपर्वत के पूर्व पश्चिम में सीता-सीतोदा नदी के द्वारा विदेह क्षेत्र के ४ भेद हो जाते हैं। उनमें से पूर्व विदेह में सीता नदी के उत्तर तट पर ‘‘पुुंडरीकिणी’’ नगरी में ‘‘सीमन्धर’’ नाम के तीर्थंकर हैं एवं दक्षिण तट पर विजया नगरी में ‘युगमन्धर’ तीर्थंकर हैं। इसी प्रकार पश्चिम विदेह में सीतोदा नदी के उत्तर तट की अयोध्या नगरी में ‘बाहु’ जिनेन्द्र हैं तथा दक्षिण तट पर स्थित सुसीमा नाम की नगरी में ‘सुबाहु’ तीर्थंकर का समवसरण है। ये जम्बूद्वीप संबंधी ४ तीर्थंकर हुए इसी प्रकार पूर्वधातकी खण्ड के विजय मेरु संबंधी चार तीर्थंकर हैं जिनकी नगरी और तीर्थंकर के नाम इस प्रकार हैं- विजय मेरु के पूर्व में सीता नदी के उत्तर तट पर ‘‘अलकापुरी’’ नगरी में ‘संजातक’ तीर्थंकर हैं, दक्षिण तट पर विजया नगरी में ‘‘स्वयंप्रभ’’ तीर्थंकर हैं। विजयमेरु के पश्चिम विदेह में सीतोदा नदी के दक्षिण तट पर सुसीमा नगरी में ‘‘ऋषभानन’’ तीर्थंकर तथा उत्तर तट पर ‘अयोध्या’ नगरी में ‘अनन्तवीर्य’ तीर्थंकर विराजमान हैं। पश्चिमधातकी खण्डद्वीप के अचलमेरु संबंधी चार तीर्थंकरों के नगर और तीर्थंकर के नाम निम्न प्रकार हैं- सीता नदी के उत्तर तट पर विजयानगरी में ‘सूरिप्रभ’ तीर्थंकर एवं दक्षिण तट की ‘‘पुंंडरीकिणी’’ नगरी में ‘विशालकीर्ति’ जिनेन्द्र का समवसरण है। सीतोदा नदी के दक्षिण तट पर ‘सुसीमा’ नगरी में ‘‘श्रीवङ्काधर’’ तीर्थंकर तथा उत्तरतट की ‘पुंडरीकिणी’ नगरी में ‘‘चन्द्रानन’’ भगवान विराजमान हैैं। इसी प्रकार आगे पूर्व पुष्करार्ध द्वीप में मन्दरमेरु संबंधी ४ तीर्थंकर एवं दक्षिण तट की विजया ‘नगरी में ‘‘भुजंगम’’ तीर्थंकर का सतत विहार हो रहा है। सीतोदा नदी के दक्षिण तट की ‘‘सुसीमा’’ नगरी में ‘‘ईश्वर’’ जिनेन्द्र तथा उत्तर तट पर ‘अयोध्या’ नगरी में ‘‘नेमीप्रभु’’ तीर्थंकर हैं। पश्चिम पुष्करार्धद्वीप में विद्युन्माली मेरु संबंधी ४ तीर्थंकर हैं- पश्चिम पुष्कर के पूर्व विदेह में सीता नदी के उत्तर तट पर ‘‘पुण्डरीकिणी’’ नगरी में ‘वीरसेन’’ तथा दक्षिण तट पर ‘‘विजया’’ नगरी में ‘‘महाभद्र’’ तीर्थंकर हैं। पश्चिम पुष्कर के पश्चिम विदेह में सीतोदा नदी के दक्षिण तट पर ‘‘सुसीमा नगरी’’ में ‘‘देवयश’’ तीर्थंकर तथा उत्तर तट पर ‘‘अयोध्या’’ नामक नगरी में ‘‘अजितवीर्य’’ तीर्थंकर समवसरण सहित विराजमान हैं। इस प्रकार पाँच मेरु संबंधी इन बीस तीर्थंकरों का क्रम मैंने बतलाया है। कम से कम इतने तीर्थंकर तो विदेहक्षेत्रों में सतत रहते ही हैं तथा अधिक से अधिक यदि एक साथ होवें तो ३२ विदेहों की प्रत्येक नगरियों में १-१ तीर्थंकर हो सकते हैं तब पाँचों मेरु संबंधी ३२-३२ विदेहों में ३२²५·१६० तीर्थंकर एक साथ विदेहक्षेत्रों में रह सकते हैं।

चन्दनामती-जैसे हमारे भरतक्षेत्र के तीर्थंकरों की पहचान के लिए चिन्ह होते हैं क्या वहाँ के तीर्थंकरों के भी उसी प्रकार चिन्ह होते हैं अथवा नहीं?

श्री ज्ञानमती माताजी-हाँ, चिन्ह तो वहाँ भी होते हैं। बिना चिन्ह के तीर्थंकर की पहचान वैâसे हो सकती है। मैंने उन तीर्थंकरों की जन्म नगरियों के नाम तो बताए ही हैं अब उनके चिन्ह और माता-पिता के नाम और बताती हूँ- तीर्थंकर नाम चिन्ह माता का नाम पिता का नाम १. सीमंधर बैल सती श्रेयांस २. युगमंधर हाथी सुतारा दृढ़रथ ३. श्रीबाहु हिरण ४. सुबाहु बन्दर ५. संजातक सूर्य देवसेना देवसेन ६. स्वयंप्रभ चन्द्रमा सुमंगला मित्रभूति ७. ऋषभानन सिंह वीरसेना नृपकीर्ति ८. अनन्तवीर्य हाथी सुमंगला मेघरथ ९. सूरिप्रभ सूर्य भद्रा नागराज १०. विशालकीर्ति चन्द्रमा विजया विजय ११. वङ्काधर शंख सरस्वती पद्मरथ १२. चन्द्रानन बैल १३. चन्द्रबाहु कमल रेणुका देवनन्दि १४. भुजंगम चन्द्रमा जिनमती महाबल १५. ईश्वर सूर्य ज्वाला गलसेन १६. नेमीप्रभ बैल १७. वीरसेन ऐरावत हाथी भानुमती भूपाल १८. महाभद्र चन्द्रमा उमा देवराज १९. देवयश स्वस्तिक गंगा देवी श्रीभूति २०. अजितवीर्य कमल कनकमाला सुबोध

चन्दनामती-पूज्य माताजी! आज विहरमाण बीस तीर्थंकरों के विषय में आपसे पर्याप्त ज्ञान प्राप्त हुआ है। हमारे पाठकों को भी इस चर्चा से ज्ञान प्राप्त होगा। क्योंकि आज बहुत से लोगों को मैंने यह पूछते देखा है कि पूजा तो हम रोज विद्यमान बीस तीर्थंकरों की करते हैं किन्तु यह पता नहीं है कि ये होते कहाँ हैं?

श्री ज्ञानमती माताजी-पूजन का अभिप्राय आदि समझते हुए पूजा करने से पुण्य अधिक मिलता है तथा स्वाध्याय का लाभ भी प्राप्त होता है। मैं तो यही चाहती हूँ कि आगम के अनेक छोटे-बड़े विषयों का ज्ञान जनसामान्य को प्राप्त होता रहे। इसके लिए मुझे यदि परिश्रम भी करना पड़ता है तो मन को बड़ा संतोष मिलता है।

चन्दनामती-आपकी इस उदार भावना के लिए मैं किन शब्दों में आपके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करूँ समझ में नहीं आता है। शायद आपके गुरुदेव आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज ने इसीलिए आपका ‘ज्ञानमती’ नाम सार्थक ही रखा है। आपके श्रीचरणों में पुन: नमन करते हुए मैं आज के विषय को यहीं सम्पन्न करती हूँ। नोट-(पूज्य गणिनी आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित बीस तीर्थंकर विधान में से तीर्थंकरों के चिन्ह, मात-पिता और नगरी के नाम लिए गए हैं। इसमें बाहु, सुबाहु, चन्द्रानन एवं नेमीप्रभु इन ४ तीर्थंकरों के माता-पिता के नाम नहीं मिल पाए हैं। यदि किन्हीं स्वाध्यायी महानुभावों को उनके नाम कहीं किसी ग्रंथ में प्राप्त हों, तो हमें सूचित करें।)

विषय-‘‘जिनेन्द्र देव की अष्टविधि पूजा में स्थापना करना आवश्यक क्यों?’’

चन्दनामती-पूज्य माताजी! मैं आपसे जिनेन्द्र पूजा से संबांqधत कुछ जानकारी श्रद्धालुभक्तों के समक्ष प्रस्तुत करना चाहती हूँ।

श्री ज्ञानमती माताजी-ठीक है, पूछो।

चन्दनामती-आगम के अनुसार पूजा की सही विधि क्या है? कृपया बताने का कष्ट करें।

श्री ज्ञानमती माताजी-पूजा विधि के परिज्ञान हेतु श्रावकों को श्रावकचार ग्रंथों का अध्ययन अवश्य करना चाहिए। जैसे उमास्वामी श्रावकाचार में आचार्यश्री उमास्वामी ने पूजा विधि बहुत अच्छी तरह बतलाई है-

आह्वाननं च प्रथमं, तत: संस्थापनम् परम्।

सन्निधीकरणं कृत्वा, पूजनं तदनन्तरम्।।१४७।।
ततो विसर्जनं कार्यं, तत: क्षमापणा मता।
पंचोपचारोपचिति:, कर्तव्याहर्निशं जनै:।।१४८।।

देखो! इन श्लोकों में स्पष्ट कहा है कि पूजा में सर्वप्रथम आह्वान, स्थापन और सन्निधीकरण करके अष्टद्रव्य से पूजन करें, पुन: विसर्जन करें। इस प्रकार प्रतिदिन पंचोपचारी पूजा करनी चाहिए। भगवान का अभिषेक पूजा के पहले किया जाता है अर्थात् अभिषेकपूर्वक पूजन करने से षट्प्रकारी पूजा हो जाती है।

चन्दनामती-लेकिन कुछ लोग यह कहते हैं कि जब भगवान की प्रतिमा सामने विराजमान ही है तो उनकी स्थापना चावलों से करने की क्या जरूरत है?

श्री ज्ञानमती माताजी-पूजा तो किसी न किसी भगवान के सामने ही मंदिर में की जाती है। घर में बैठकर फोटो आदि के सामने द्रव्य चढ़ाने से पूजा नहीं होती है। इसी उमास्वामी श्रावकाचार में पृष्ठ नं. ५९ पर इस विषय पर विशेष खुलासा भी है- ‘‘पूजा करने के पहले आह्वानन, स्थापन, सन्निधीकरण अवश्य करना चाहिए। जो लोग आह्वानन नहीं करते हैं वे गहरी भूल करते हैं। ऐसे लोग कहते हैं कि जब भगवान की प्रतिमा सामने विराजमान हैं तब फिर आह्वानन करने की क्या आवश्यकता है परन्तु ऐसे लोग आह्वानन का अर्थ नहीं समझते हैं। जैन शास्त्रों में एक स्थापना निक्षेप माना है। साकार या निराकार पदार्थ में किसी के गुण का आरोपण करना स्थापना निक्षेप है, जैसे सामने की विराजमान प्रतिमा में किसी तीर्थंकर की स्थापना है परन्तु आह्वानन स्थापन में जो स्थापना है वह स्थापना निक्षेप नहीं है, वह तो पूजा का एक अंग है।

जैसे किसी बड़े आदमी या छोटे आदमी को बुलाते हैं और वह बुलाया हुआ व्यक्ति जब सामने आ जाता है, तो उसके आदर-सत्कार के लिए कहा जाता है कि आइए साहब! अच्छे तो हैं आइए! यहाँ बैठिए। इस प्रकार कहना आदर सत्कार का एक अंग है। उसी प्रकार आह्वानन स्थापन सन्निधिकरण भी पूजा या आदर सत्कार के अंग है। यदि बुलाने वाला मनुष्य आए हुए अतिथि को आइए, बैठिए इत्यादि वचन न कहे तो वह आया हुआ व्यक्ति अपना अनादर समझता है। उसी प्रकार यदि पूजा के पहले आह्वानन स्थापन न किया जाए, तो वह भी एक प्रकार से भगवान का अनादर समझना चाहिए। आह्वानन स्थापन का अर्थ भी ‘आइए यहाँ विराजिए’ यही होता है और इसीलिए वह पूजा का अंग माना जाता है। प्राचीन एवं अर्वाचीन जितनी भी पूजाएँ हैं उन सबमें आह्वानन स्थापन है इसलिए पूजा में आह्वानन स्थापन न करना पूजा शास्त्र के विपरीत चलना है।’’

चन्दनामती-आजकल श्रावकों की पूजा पद्धति में बहुत विवाद चलता है, इस विषय में आपका क्या अभिमत है?

श्री ज्ञानमती माताजी-बात यह है कि इस युग में आगम-जिनवाणी ही हम सबके लिए आधार है, उसके अनुसार यदि श्रावक और साधु क्रियाएँ करें तो कभी विवाद की स्थिति ही नहीं आ सकती है। जैसे-रयणसार, वसुनन्दि श्रावकाचार, उमास्वामी श्रावकाचार, रत्नकरण्ड श्रावकाचार आदि श्रावकाचार ग्रंथों में ही पूजा पद्धति का वर्णन है। इनका स्वाध्याय श्रावकों को अवश्य करना चाहिए।

चन्दनामती-क्या मुनि एवं आर्यिका आदि भी श्रावकों को पूजा का उपदेश दे सकते हैं? मैंने तो पुरुषार्थ सिद्धयुपाय में पढ़ा है कि मुनि को मुनिधर्म का उपदेश ही देना चाहिए। यदि वे पहले गृहस्थधर्म का उपदेश देते हैं, तो दोष के भागी होते हैं।

श्री ज्ञानमती माताजी-पुरुषार्थ सिद्ध्युपाय में आचार्यश्री अमृतचन्द्र जी ने यह श्लोक कहा है-

यो यतिधर्ममकथयन्नुपदिशति गृहस्थधर्ममल्पमति:।

तस्य भगवत्प्रवचने प्रदर्शितं निग्रहस्थानम्।।

अर्थात् जो साधु अपने पास आए हुए भव्य श्रावक को पहले यति-मुनिधर्म का उपदेश न देकर गृहस्थ धर्म का उपदेश देता है वह जिनागम के अनुसार प्रायश्चित्त का भागी होता है। इसका अभिप्राय यही खोला है कि यदि आगन्तुक भक्तश्रावक मुनिधर्म ग्रहण करने में सक्षम है तो पहले श्रावक धर्म का उपदेश देने से वह वहीं तक सीमित रह जावेगा। जैसे ग्राहक के आने पर दुकानदार पहले तो अच्छा कीमती माल दिखाता है, तब ग्राहक यदि अर्थ सम्पन्न है तो ऊँची वस्तु खरीद लेता है अन्यथा उससे कम कीमत का माल दिखाने का अभिप्राय व्यक्त करता है, तब दुकानदार उसे दूसरा कम कीमत वाला माल दिखाकर संतुष्ट करता है। ठीक इसी प्रकार मुनि को तो श्रावक के लिए पहले मुनिधर्म का ही उपदेश देना चाहिए यदि वह गृहस्थ उसे धारण करने में असमर्थता व्यक्त करता है तो बाद में उसके लिए श्रावक धर्म का उपदेश देना चाहिए। जैसा कि पद्मपुराण के अनुसार अयोध्या के राजा श्री रामचन्द्र के भाई भरत के लिए ‘‘द्युति’’ नामक जैनाचार्य ने गृहस्थ धर्म का उपदेश देते हुए कहा था कि ‘‘हे भरत! गृहस्थ धर्म भी मुनिधर्म का लघुभ्राता है।’’

यहाँ तो केवल सबसे पहले अपने पास आए हुए श्रावक को उपदेश देने का क्रम बताया है, जिसका रहस्य तुमने समझ ही लिया है। आगे एक प्रमाण मैं प्रवचनसार का बताती हूँ उसमें आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी छठे-सातवें गुणस्थानवर्ती आचार्यों के लिए जिनेन्द्रपूजा के उपदेश का अधिकार बताया है। देखें गाथा नं. २४८-

दंसणणाणुवदेसो, सिस्सग्गहणं च पोसणं तेसिं।

चरिया हि सरागाणं, जिणिन्द पूजोवदेसो य।।

अर्थात् दर्शन और ज्ञान का उपदेश देना, शिष्यों का संग्रह करना, उनका पोषण करना तथा जिनेन्द्रदेव की पूजा का उपदेश देना, यह सब सरागी मुनि-शुभोपयोगी मुनियों की चर्या है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि कुन्दकुन्दाचार्य की दृष्टि में मुनियों के द्वारा दानपूजा आदि का उपदेश देना दोषास्पद नहीं है। किन्तु उपदेश पूर्वाचार्यों की परम्परानुसार ही देना चाहिए, अपने मन से या प्रान्तीय परम्परा के हठाग्रह से युक्त होकर आगम का अपलाप नहीं करना चाहिए। देखो! मैना सुन्दरी ने मुनिराज के उपदेश से ही सिद्धचक्र आराधना करके अपने पति एवं समस्त कुष्टियों का कष्ट रोग दूर किया था। ऐसे कई उदाहरण ग्रंथों में मिलते हैं।

चन्दनामती-पूजा करने वालों को मुख्यरूप से किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

श्री ज्ञानमती माताजी-सबसे पहले तो पूजक के लिए उमास्वामी आचार्य ने निर्देश दिया है कि ‘‘खण्डितवस्त्र (वस्त्र का टुकड़ा), गला हुआ वस्त्र, फटा हुआ वस्त्र और मैला वस्त्र पहन कर दान, पूजा, जप, होम और स्वाध्याय नहीं करना चाहिए। क्योंकि ऐसे वस्त्र पहनकर किया गया दान-पूजन आदि सब निष्फल हो जाता है।’’ दूसरी बात शुद्ध जल से अष्टद्रव्य धोकर पूजन करनी चाहिए। तभी अशुभ कर्मों की निर्जरा होती है। आठों द्रव्यों में से किसी भी द्रव्य के चढ़ाने में हिंसा या सावद्य की कल्पना नहीं करनी चाहिए क्योंकि आचार्यों ने कहा है कि-‘जिस वायु से पर्वत के समान बड़े-बड़े हाथी उड़ जाते हैं उस वायु के सामने क्या डांस, मच्छर टिक सकते हैं? कभी नहीं। उसी प्रकार जिस पूजा से जन्म जन्मान्तर के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं उस पूजा से क्या उसी से उत्पन्न होने वाली थोड़ी सी िंहसा नष्ट नहीं होगी? अवश्य होगी, इसमें कोई संदेह नहीं है।

मेरा तो कहना यही है कि उत्तम कुल में जन्म लेकर जब तक साधु बनने की शक्ति नहीं है, तब तक श्रावक-श्राविकाओं को खूब दान पूजा कर करके पुण्यार्जन करना चाहिए।

तीसरी बात पूजकों के लिए यह है कि अपने शरीर को शुद्ध करने के लिए भगवान् का गन्धोदक लेना चाहिए, चन्दन से तिलक लगाना चाहिए और सन्तति की वृद्धि के लिए शेषाक्षत ले लेना चाहिए।

चन्दनामती-शेषाक्षत किसे कहते हैं?

श्री ज्ञानमती माताजी-पूजा करने के बाद बचे हुए अक्षतों को शेषाक्षत कहते हैं। पूजा के बाद उन अक्षतों को मस्तक पर लगाना चाहिए। आजकल इसकी परम्परा नहीं है किन्तु शास्त्रों में ऐसा उल्लेख आया है कि सुलोचना अपने पिता के पास शेषाक्षत लेकर गई थी।

इसकी जगह वर्तमान में यह परम्परा देखी है कि ठोना में जो स्थापना के चावल या लौंग होते हैं उन्हें लोग मस्तक पर चढ़ाते हैं, लेकिन इसका आगम में कहीं उल्लेख नहीं मिलता है। इस शेषाक्षत वाले प्रकरण से मुझे तो यही समझ में आता है कि जैसे चौके में साधुओं को आहार देने के पश्चात् थाली में बचे हुए भोजन को लोग पवित्र प्रसाद मानकर खाते और खिलाते हैं उसी प्रकार जिन द्रव्यों से भगवान् की पूजा की गई है उन बचे हुए चावल आदि को शेषाक्षत-पवित्र मानकर उन्हें मस्तक पर चढ़ाने का उल्लेख है। ऐसा ही मेरे गुरु आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज भी कई बार कहा करते थे।

चन्दनामती-आज आपसे चर्चा करने में यह निष्कर्ष निकला कि पूजा के प्रारंभ में स्थापना करना अति आवश्यक है क्योंकि आगम का विधान है।

श्री ज्ञानमती माताजी-हाँ, यह तो मैंने जो कुछ भी बताया है श्रावकाचारों के आधार से ही है, मेरे मन का कुछ नहीं है। आह्वानन, स्थापन और सन्निधीकरण करने की भी अपनी एक विधि होती है, उसे उमास्वामी श्रावकाचार में देखना चाहिए, जहाँ पूजन संबंधी अन्य और भी निर्देश आचार्यश्री ने दिये हैं।

चन्दनामती-वंदामि माताजी! इस विषय को मैं यही विराम देती हूँ। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपके द्वारा प्रतिपादित पूजन पद्धति के विषय से श्रावक-श्राविकाएं अवश्य लाभ प्राप्त करेंगे। पुन: पुन: आपके श्रीचरणों में वंदामि।

विषय-‘‘जैनागम में वर्णित हवन विधि आवश्यक क्यों?’’

चन्दनामती-पूज्य माताजी! वंदामि, आपने श्रावकों को पूजा के विषय में जो आगम प्रमाण बताए, उनसे श्रद्धालुजन अवश्य संतुष्ट होंगे। अब मैं आपसे हवन विधि के बारे में कुछ समयोचित बातें पूछना चाहती हूँ।

श्री ज्ञानमती माताजी-पूछो।

चन्दनामती-पूजा विधानों के समापन में एवं पंचकल्याणक प्रतिष्ठाओं में अग्निकुण्डों में हवन क्यों किया जाता है?

श्री ज्ञानमती माताजी-ऐसा आगम का विधान है कि प्रत्येक पूजा-विधानों के अन्त में हवन अवश्य करना चाहिए अन्यथा वह यज्ञ अधूरा कहलाता है। सभी विधानों के शुभारंभ में विधानाचार्य पण्डित जी उस विधान के मूलमंत्र का जाप्यानुष्ठान सभी पूजकों से करवाते हैं, जो कि पूरे विधान तक किया जाता है। अन्त में सभी के मंत्रों का कुल जोड़ लगाकर उसकी दशमांश आहुति अग्नि में कराने की प्राचीन परम्परा है। इसी प्रकार पंचकल्याणकों में भी प्रतिष्ठाचार्य इन्द्र-इन्द्राणियों से कई दिन पूर्व से ही पूजा-पाठ और मंत्र अनुष्ठान प्रतिष्ठा स्थल पर शुरू करवा देते हैं और विधिवत् उन मंत्रों की आहुतिपूर्वक हवन कराते हैं इसकी पूरी विधि जानने हेतु आचार्यश्री नेमिचन्द्र स्वामी द्वारा रचित प्रतिष्ठा तिलक आदि प्रतिष्ठा ग्रंथ देखना चाहिए।

चन्दनामती-हवन की वास्तविक (शास्त्रोक्त) विधि क्या है?

श्री ज्ञानमती माताजी-प्रतिष्ठा शास्त्रों के अनुसार हवन की विधि निम्न प्रकार है- मंडप के सामने वेदी के सम्मुख चौकोर, गोल और त्रिकोण ऐसे तीन कुण्ड बनवाना चाहिए। यदि तीन कुण्ड बनवाने में असुविधा हो तो एक चौकोर कुण्ड बना लें। हवन करने वालों की संख्या यदि अधिक हो, तो अलग से स्थण्डिल बना लेना चाहिए। पं. पन्नालाल जी साहित्याचार्य द्वारा संपादित ‘‘मंदिर वेदी प्रतिष्ठा-कलशारोहण विधि’’ नामक पुस्तक में भी उन्होंने हवन से संबंधित प्रारंभिक जानकारी देते हुए उपर्युक्त बातें भी बताई हैं तथा पृ. नं.-७४ पर हवन करने वालों के लिए विशेष नियम भी बताए हैं। जैसे-हवन के लिए साकल्य (धूप) आदि और समिधाएं (लकड़ी के टुकड़े) पहले से तैयार करके रखें। हवन करने वाले दो वस्त्र पहनकर हवन करें इसके बाद थोड़ी सी हवन क्रिया बताकर पृ.७७ पर उल्लेख किया है- ‘‘ॐ ह्रीं होमार्थं अग्नित्रयाधारभूतां समिधां स्थापयामि’’ इत्यादि मंत्र बोलते हुए कुण्डों के अंदर समिधा (लकड़ी) स्थापित करें पुन: ॐ ॐ ॐ ॐ रं रं रं रं’’ यह मंत्र बोलकर कपूर जलाकर हवनकुण्ड में डालें अनंतर ‘‘ॐ ह्रीं श्रीें रं रं रं रं दर्भपूलेन ज्वालय ज्वालय नम: फट् स्वाहा’’ इस मंत्र का उच्चारण करते हुए डाभ के पूले से हवन कुण्ड की अग्नि संधुक्षित करें। इसके बाद पण्डित पन्नालाल जी ने प्रतिष्ठाशास्त्रों के अनुसार तीनों कुण्डों को अलग-अलग मंत्रों द्वारा अघ्र्य चढ़ाने का नियम बताया है तथा पीठिका मंत्र, जाति मंत्र, निस्तारक मंत्र, ऋषि मंत्र, सुरेन्द्र मंत्र, परमराजादि मंत्र एवं परमेष्ठि मंत्रों से आहुतियाँ देना बताया है और जिस मंत्र का अनुष्ठान किया गया है उसकी दशांश आहुतियाँ भी देने के लिए लिखा है। स्वाहा बोलते हुए हवनकुण्डों में धूप, घी, लौंग, सप्तधान्य समिधा आदि की आहुतियाँ दी जाती हैं।

चन्दनामती-पूज्य माताजी! ये तीन कुण्ड किस अभिप्राय से बनाए जाते हैं। कृपया इस विषय में बताने का कष्ट करें।

श्री ज्ञानमती माताजी-आचार्यश्री जिनसेन द्वारा रचित आदिपुराण के द्वितीय भाग (भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित) में ४०वें पर्व में उत्तरचूलिका रूप क्रियाओं के कथन में हवन विधि भी खूब अच्छी तरह बताई है। इसमें पृ. ३०१ श्री जिनसेन स्वामी कहते हैं।

कुण्डत्रये प्रणेतव्यास्त्रय एते महाग्नय:।

गार्हपत्याहवनीय दक्षिणाग्निप्रसिद्धय:।।८४।।

अर्थात् गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि नाम से प्रसिद्ध तीनों महाअग्नियों को तीनों कुण्डों में स्थापित करना चाहिए। इसका अभिप्राय यह है कि चौकोर कुण्ड तीर्थंकर कुण्ड कहलाता है, गोलकुण्ड गणधर कुण्ड के नाम से प्रसिद्ध है तथा त्रिकोण कुण्ड सामान्य केवली कुण्ड के नाम से जाना जाता है। शास्त्रों में वर्णन आता है कि तीर्थंकर, गणधर और सामान्य केवलियों के निर्वाण होने पर अग्नि कुमार इन्द्र आकर उन-उन नाम वाले चौकोर, गोल और त्रिकोण कुण्ड बनाकर अपने मुकुट से अग्नि जलाकर उनके परमौदारिक शरीर का संस्कार करते हैं इसीलिए चौकोर कुण्ड जिसमें तीर्थंकरों के शरीर का संस्कार होता है उसकी अग्नि को गार्हपत्य अग्नि कहा है, गोल कुण्ड जिसमें गणधरों के शरीर का संस्कार होता है उसे आहवनीय कुण्ड एवं उसकी अग्नि को आहवनींय अग्नि कहते हैं तथा त्रिकोणकुण्ड जो सामान्य केवलियों के अंतिम संस्कार से पवित्र है उसमें जलाई जाने वाली अग्नि दक्षिणाग्नि कहलाती है। इन अग्नियों के लिए जिनसेन स्वामी ने पुन: कहा है-

न स्वतोऽग्ने: पवित्रत्वं, देवतारूपमेव वा।

किन्त्वर्हद्दिव्यमूर्तीज्या-सम्बन्धात् पावनोऽनल:।।८८।।

अर्थात् ‘‘अग्नि में स्वयं पवित्रता नहीं है और न वह देवतारूप ही है। किन्तु अरहन्तदेव की दिव्यमूर्ति की पूजा के संबंध से वह अग्नि पवित्र हो जाती है। इसीलिए ही द्विजोत्तम लोग इसे पूजा का अंग मानकर इसकी पूजा करते हैं। अतएव निर्वाणक्षेत्र की पूजा के समान अग्नि की पूजा करने में कोई दोष नहीं है। (आदिपुराण, द्वितीय भाग, पर्व-४०, पृ. ३०)

चन्दनामती-यदि अग्नि में हवन न करके पीले चावलों से हवन विधि कर ली जावे तो क्या हानि है?

श्री ज्ञानमती माताजी-पीले चावलों से पुष्पांजलि हो सकती है, हवन नहीं। हवन का अभिप्राय ही यह है कि अग्नि में आहुति डालना। यदि पुष्पों से हवन किया जा सकता तो पूर्व के आचार्य और विद्वान् अग्नि में हवन करने की विधि क्यों बताते?

चन्दनामती-आजकल कुछ लोग कहते हैं कि धूप से हवन नहीं करना चाहिए क्योंकि पूर्वकाल में राजा वङ्काजंघ और रानी श्रीमती का धूप के धुएं में दम घुटने के कारण मरण हो गया था। हवन के धुएँ से भी छोटे-छोेटे अनेकों जीवों का घात संभव है अत: हवन-हिंसा का कारण माना जाता है। इस बारे में आपका क्या अभिप्राय है?

श्री ज्ञानमती माताजी-देखो! अपने स्वार्थ की पूर्ति करने हेतु लोग किसी भी शब्द और कथानक का अर्थ कैसा बदल देते हैं यह बड़े आश्चर्य की बात है। राजा वङ्काजंघ और रानी श्रीमती के मरण में धूप का निमित्त ही नहीं था किन्तु कर्मचारियों की असावधानी उसमें प्रबल निमित्त था कि वे धूप जलाने के बाद खिड़कियाँ खोलना भूल गए थे जिससे कमरे में धूएं की गैस भर गई और दोनों का मरण हो गया। दूसरी बात पंचेन्द्रिय विषय भोगों के निमित्त आचार्य ने स्वयं धिक्कारा है किन्तु भगवान की पूजा से उस कथन का तात्पर्य कथमपि नहीं है। जिन आचार्यश्री जिनसेन ने आदिपुराण के पर्व ९ के छंद ३० में भोगों को बुरा कहा है उन्हीं जिनसेन स्वमी ने तो पर्व ४० में हवनविधि का विस्तृत वर्णन किया है। अज्ञानी और सरल प्रवृत्ति वाले श्रावक-श्राविकाओं को अपने मन की एक पंक्ति दिखाकर उन्हें पुण्यक्रिया से वंचित करना अपराध नहीं तो क्या है? मेरा तो श्रावकों से भी यही कहना रहता है कि प्राचीन आचार्यों द्वारा रचित ग्रंथों को तुम स्वयं पढ़ो ताकि दिग्भ्रमित होेने की गुंजाइश ही न रहे। अरे भाई! यदि भोजन करते हुए किसी की मृत्यु हो जाती है तो सभी भोजन का त्याग कर देते हैं? नहीं, उसी प्रकार हवन आदि क्रियाओं का निषेध तो कभी किया ही नहीं जा सकता। हाँ, विवेकपूर्वक इन क्रियाओं को करने का उपदेश अवश्य देना चाहिए। तुमने दूसरी बात कही कि ‘‘हवन हिंसा का कारण माना जाता है’’ सो इस बारे में तो आचार्यश्री समन्तभद्र स्वामी ने अपने वृहत्स्वयंभूस्तोत्र के अन्तर्गत भगवान वासुपूज्य की स्तुति करते हुए कहा है-

पूज्यं जिनं त्वार्चयतो जनस्य, सावद्यलेशो बहुपुण्यराशौ।

दोषायनालं कणिका विषस्य, न दूषिका शीतशिवाम्बुराशौ।।३।।

इसका अर्थ यह है कि ‘‘हे भगवन्! आप पूज्य हैं, जिन हैं। आपकी पूजा करने वाले मनुष्य के जो आरंभजनित थोड़ा सा पाप होता है वह बहुत बड़ी पुण्य की राशि में उसी प्रकार दोष का कारण नहीं है, जैसे शीतल जल से युक्त बहुत बड़े समुद्र में विष की कणिका डाल देने पर भी वह जल को दूषित नहीं कर सकती है।’’ अर्थात् हवन करना, पूजन विधान, मंदिर निर्माण आदि प्रत्येक शुभ कार्य करने में जो थोड़ी बहुत हिंसा होती है वह उन्हीं कार्यों से संचित हुई महान पुण्यराशि में विलुप्त हो जाती है अत: जिनेन्द्रभक्ति संबंधी कार्यों में कभी हिंसात्मक भावना भी नहीं लानी चाहिए। इस बारे में पं. नाथूलाल जी शास्त्री-इंदौर वालों ने अपनी ‘‘जैन संस्कार विधि’’ नामक पुस्तक में अच्छा खुलासा किया है। देखें पृ. नं. २-३ पर- ‘‘संस्कार विधि’’ में प्रत्येक संस्कार में हवन करने का विधान है। लगभग १० वर्ष से यह विचारधारा प्रचारित की जा रही है कि ‘‘हवन हिंसा का कारण है’’ जबकि मंदिरों में बिजली, पंखे और बिम्ब प्रतिष्ठाओं में बड़े-बड़े भोज व बिजली आदि में उससे भी अधिक हिंसा होती है। ‘‘गृहस्थ को सभी धार्मिक कार्य सावधानी और मर्यादापूर्वक करना चाहिए।’’ क्योंकि वह संकल्पी हिंसा का सर्वथा त्यागी है। इसके पहले तो कभी किसी ने इस संबंध में किसी ग्रंथ का प्रमाण देकर हवन का निषेध नहीं बताया बल्कि सभी प्रतिष्ठा पाठों व महापुराण में हवन के मंत्र और अग्नि स्थापन के मंत्र तथा गोल, चौकोर व त्रिकोण कुण्डों का विधान बताया है। कोई भी शांतिमंत्र जपने पर जयसेन प्रतिष्ठापाठ के श्लोक ३५९-४२१ के अनुसार अग्निसंस्कार पूर्वक बिना दशांश हवन के पूर्ण नहीं माना जाता है। हवन के द्रव्यों व घृत को अग्नि में क्षेपण से वैज्ञानिकों ने अनेक लाभ बताए हैं। विविध रोगों की चिकित्सा और वातावरण की शुद्धि हवन से होती है। अभी हरिद्वार में हवन से बड़े-बड़े रोग दूर करने हेतु शोध संस्थान की स्थापना भी हो चुकी है।’’

चन्दनामती-पूज्य माताजी! इस संबंध में एक प्रश्न और है कि हवन में प्रयुक्त होने वाली समिधा वैâसी होनी चाहिए? इस बारे में भी क्या कोई प्रमाण है?

श्री ज्ञानमती माताजी-हाँ, प्रतिष्ठातिलक में एक श्लोक आया है-

क्षीरद्रुमाणां च पलाशकानां, नवांगुलायामसमिद्भिरद्य।

द्वित्रयंगुलप्रमितनाहमयी भिरग्नौ करात्करोम्यष्टशतेन होमम्।।

अर्थात् आम्रपलाशादि वृक्षों की ९ अंगुल लम्बी एवं २-३ अंगुल मोटी लकड़ियों से १०८ बार आहुति देना चाहिए (यह समिधाहुति कहलाती है) अन्यत्र कहीं १२ अंगुल लम्बी समिधा से आहुति करना भी बताया है।

चन्दनामती-आपके श्रीचरणों में वंदामि। आपने अपना अमूल्य समय देकर आज बहुत सारी ज्ञान की बातें बताई हैं। आशा है पूजा-विधान करने वाले इस चर्चा से अवश्य लाभान्वित होंगे।

विषय-‘‘कुर्वेऽहं या करोम्यहं?’’

चन्दनामती-पूज्य माताजी! इस परिचर्चा में मैं आपसे दिगम्बर जैन साधुचर्या और उनके प्रतिक्रमण संबंधी कुछ प्रश्न पूछना चाहती हूँ।

श्री ज्ञानमती माताजी-पूछो, क्या पूछ रही हो?

चन्दनामती-हम लोग जो प्रतिदिन दैवसिक-रात्रिक प्रतिक्रमण और चतुर्दशी को पाक्षिक प्रतिक्रमण करते हैं, उसमें सिद्ध, चैत्य आदि भक्तियाँ पढ़ने से पूर्व जो प्रतिज्ञा की जाती है जैसे-

‘‘दैवसिक प्रतिक्रमण क्रियायां................सिद्धभक्तिकायोत्सर्गं करोम्यहं’’ इत्यादि पाठ पढ़ते हैं। पिछले कुछ वर्षों से कतिपय नई पुस्तकों में ‘‘कायोत्सर्गं कुर्वेऽहं’’ पाठ छप रहा है, जबकि आप हम लोगों को ‘करोम्यहं’ ही पढ़ने को कहती हैं। इस विषय में जानना चाहती हूँ कि आप कुर्वेऽहं क्यों नहीं पढ़ती हैं तथा इस विषय में आगम प्रमाण क्या है?

श्री ज्ञानमती माताजी-डुकृञ्-करणे धातु से करोमि और कुर्वे ये दोनों क्रिया उत्तम पुरुष के एक वचन में बनती हैं। जिसमें ‘करोमि’ परस्मैपदी है और ‘कुर्वे’ आत्मनेपदी है। अहं कर्ता के साथ करोमि या कुर्वे क्रिया का प्रयोग किया जाता है। इस विषय में आगम प्रमाण जो मुझे प्राप्त हुए हैं उनमें से अति प्राचीन ग्रंथ ‘आचारसार’ जो सिद्धान्तचक्रवर्ती श्री वीरनन्दि आचार्य द्वारा रचित है उसमें ‘करोम्यहं’ पाठ ही है। जैसे-‘‘क्रियायामस्यां व्युत्सर्गं, भत्तेâरस्या: करोम्यहं।’’ इसका अर्थ यही है कि अस्यां क्रियायां अस्या: भत्तेâ: व्युत्सर्गं करोम्यहं अर्थात् इस क्रिया को करने में मैं इस भक्ति का कायोत्सर्ग करता हूँ। जहाँ जिस क्रिया में जो भक्ति पढ़ते हैं वहाँ उस क्रिया का नाम और भक्ति का नाम पढ़ते हैं।

दूसरा प्रमाण अनगार धर्मामृत में पाक्षिक प्रतिक्रमण के पाँच श्लोकों की स्वोपज्ञ टीका में ‘करोम्यहं’ शब्द का प्रयोग पन्द्रह बार टीकाकार ने किया है। जैसे-‘‘सर्वातिचार

>
विशुद्ध्यर्थं.................सिद्धभक्ति कायोत्सर्गं करोम्यहं’’

तीसरा प्रमाण दैवसिक और पाक्षिक प्रतिक्रमण जो कि ‘‘क्रियाकलाप’’ के आधार से सभी पुस्तकों में छपे हुए हैं उसमें पं. पन्नालाल जी सोनी ने प्राचीन हस्तलिखित प्रतियोें के अनुसार ‘करोम्यहं’ पाठ ही सभी जगह दिया है।

चतुर्थ प्रमाण चारित्रसार ग्रंथ के पृष्ठ १४६-१४७ पर मिलता है। जैसा कि देवतास्तवन क्रिया में लिखा है-

>
‘‘चैत्यभक्तिकायोत्सर्गं करोमीति विज्ञाप्य..............’’

‘‘पंचगुरुभक्तिकायोत्सर्गं करोमीति विज्ञाप्य..................’’

इसी प्रकार श्री प्रभाचन्द्राचार्य की टीका सहित सामायिकभाष्य नामक पुस्तक जो कि सोलापुर से प्रकाशित है। उसमें बड़ी सामायिक में भी ‘करोमि’ पाठ ही आता है। प्रतिष्ठातिलक ग्रंथ में भी ‘‘करोम्यहं’’ पाठ ही है।

मेरा तो कहने का तात्पर्य यही है कि सामायिक और प्रतिक्रमण की रचना करने वाले प्राचीन आचार्य निश्चित ही संस्कृत ज्ञान से परिपूर्ण थे उन्हें भी आत्मनेपदी और परस्मैपदी क्रियाओं का पूर्ण ज्ञान था उनके ग्रंथों में ‘‘करोमि’’ क्रिया मिलती है अत: ‘‘कुर्वे’’ क्रिया अपने मन से लगाने का अधिकार हम लोगों को नहीं है। यह परिवर्तन किसने किया है मुझे पता नहीं। देखो! मेरी नीति तो यह है कि कहीं कोई पाठ यदि अपने को नहीं जंचता है या शास्त्र से उसमें कुछ अशुद्धि प्रतीत होती है तो उस भिन्न पाठ को टिप्पण में देना चाहिए, उसी में परिवर्तन-परिवद्र्धन नहीं करना चाहिए। स्वरचित अपनी कृति में कोई वैâसा भी पाठ रख सकता है किन्तु दूसरे की कृति में परिवर्तन करना एक नैतिक अपराध भी है। जो लोग उपर्युक्त समस्त ग्रंथों का स्वाध्याय नहीं करते हैं वे तो पुराना, नया पाठ समझ ही नहीं सकते हैं। मेरा तो सभी विद्वानों से भी यही कहना रहता है कि किसी की कृति में अपने मन से कोई संशोधन न करें, ईमानदारीपूर्वक किसी भी भिन्न पाठ को टिप्पण में ही देवें, ताकि पाठक संशोधित पाठ को ही असली पाठ न समझ लेवें।

चन्दनामती-पूज्य माताजी! मेरा द्वितीय प्रश्न आपसे साधुओं की आहार चर्या के विषय में है। आपने तो हम लोगों को बतलाया है कि आहार शुरू करने से पूर्व चौके में ही प्रत्याख्यान निष्ठापन करके सिद्धभक्ति पढ़ो पुन: आहार शुरू करो किन्तु कुछ संघों में मैंने देखा है कि साधुगण आहारचर्या को निकलने से पूर्व ही गुरु के पास प्रत्याख्यान निष्ठापन कर लेते हैं। इस संबंध में आगम प्रमाण क्या है? कृपया बताने का कष्ट करें।

श्री ज्ञानमती माताजी-इस विषय में अनगार धर्मामृत और आचारसार इन दो ग्रंथों में बहुत स्पष्ट खुलासा है कि साधु को चौके में पहुँचने के पश्चात् श्रावकों द्वारा नवधाभक्ति के अनंतर ही पूर्व दिन के ग्रहण किए गए प्रत्याख्यान की निष्ठापना करके लघु सिद्धभक्ति पढ़े पुन: करपात्र की अंजुलि बनाकर भोजन ग्रहण करें। क्योंकि सिद्धभक्तिपूर्वक प्रत्याख्यान निष्ठापना के पश्चात् तो समस्त अन्तरायों का पालन करना भी आवश्यक होता है।

अनगार धर्मामृत के पृ. ६४९ पर लिखा है-

‘‘हेयं-त्याज्यं साधुना। निष्ठाप्यमित्यर्थ:। किं तत्? प्रत्याख्यानादि-प्रत्याख्यानमुपोषितं वा। क्व? अशनादौ-भोजनारंभे। कया? सिद्धभक्त्या। किंविशिष्ट्या? लघ्व्या।’’

अर्थात् चौके में नवधाभक्तिपूर्ण हो जाने पर जब श्रावक मुनि से आहार ग्रहण करने के लिए प्रार्थना करते हैं तब वे मुनि अपने खड़े होने की जगह और दातार के खड़े होने की जगह को ठीक से देख लेते हैं कि कोई विकलत्रय आदि जीव जन्तु तो नहीं है। पुन: शुद्ध गरम प्रासुक जल से श्रावक द्वारा हाथ धुलाए जाने पर वे '‘‘पूर्व दिन के ग्रहण किए गए प्रत्याख्यान या उपवास का सिद्धभक्तिपूर्वक निष्ठापन करके आहार शुरू करते हैं।’’'

इसी प्रकार आचारसार ग्रंथ में भी कहा है-

दातार के द्वारा पादप्रक्षाल आदि क्रियाओं के होने के बाद, उनके द्वारा प्रार्थना की जाने पर साधु सिद्धभक्ति करके प्रत्याख्यान का निष्ठापन करते हैं और समचतुरंगुल पाद से (पैरों में चार अंगुल का अन्तर रखकर) खड़े होकर नाभि से ऊपर हाथ रखते हुए करपात्र में दातार द्वारा प्रदत्त आहार ग्रहण करते हैं।

पुन: अनगार में वर्णन है कि आहार करने के पश्चात् साधु वहीं (चौके में) लघु सिद्धभक्तिपूर्वक प्रत्याख्यान ग्रहण कर लें, इसके बाद गुरु के पास आकर लघुसिद्धभक्ति और योगभक्ति पढ़कर पुन: गुरु के पास प्रत्याख्यान ग्रहण करके लघु आचार्यभक्तिपूर्वक गुरु की वंदना करें। वे पंक्तियाँ अनगार धर्मामृत के पृ. ६४९ पर इस प्रकार हैं-

‘‘आदेयं च-लघ्व्या सिद्ध भक्तया प्रतिष्ठाप्यं साधुना। किं तत्? प्रत्याख्यानादि।

क्व? अंते प्रव्रâमाद् भोजनस्यैव प्रान्ते। कथं? आशु-शीघ्रं भोजनांतरमेव। आचार्यासन्निधावेतद्विधेयं।’’ सूरौ-आचार्यसमीपे पुनग्र्राह्यं प्रतिष्ठाप्यं साधुना। किं तत्? प्रत्याख्यानादि। कया? लघ्व्या सिद्धभक्त्या लघुयोगिभक्त्या। तथा वंद्य: साधुना। कोऽसौ? स सूरि:। कया? सूरिभक्त्या। िंकविशिष्ट्या? लघ्व्या।

चंदनामती-माताजी! जैसे आहार के बाद गुरु के पास प्रत्याख्यान ग्रहण करने की बात है वैसे ही आहार से पहले भी यदि गुरु के पास आहार प्रत्याख्यान निष्ठापन करके साधु आहार को जाते हैं? तो क्या बाधा है?

श्री ज्ञानमती माताजी-सबसे बड़ी बाधा तो आगम आज्ञा का उलंघन है। जैसा कि ऊपर आगम पंक्तियाँ दी ही गई हैं। पहले गुरु के पास प्रत्याख्यान निष्ठापन इसलिए नहीं किया जाता है कि सिद्धभक्तिपूर्वक प्रत्याख्यान निष्ठापन के पश्चात् समस्त अन्तरायों का पालन आवश्यक हो जाता है तथा मान लो किसी कारण से आहार की विधि नहीं मिली तो अगले दिन आहार लेने तक उनको अप्रत्याख्यान में ही रहना पड़ेगा। अथवा किसी साधु का मार्ग में मरण हो जावे तो प्रत्याख्यानरहित मरण कहलाएगा किन्तु चौके में प्रत्याख्यान निष्ठापन करने पर इन दोषों की संभावना नहीं रहती है।

भोजन के अंत में वहीं (चौके में) प्रत्याख्यान ग्रहण करने में हेतु दिया है कि यदि कदाचित् गुरु के पास आते हुए मार्ग में मरण भी हो जाये तो वह प्रत्याख्यानपूर्वक होगा। बाद में दुबारा गुरु के पास भी विधिवत् प्रत्याख्यान ग्रहण करने का आदेश भी दिया है।

यहाँ यह बात ध्यान देने की है कि आहार से पूर्व गुरु के पास प्रत्याख्यान निष्ठापन न करने से गुरु का कोई अपमान नहीं है बल्कि यह परम्परा कब से, किसने और किस आधार से चालू की है मुझे समझ में नहीं आता। साधु की तो प्रत्येक क्रिया के लिए आगम के आधार भरे पड़ें हैं। क्रियाकलाप में भी यही विधि है एवं हमें गुरुपरम्परा से भी यही विधि प्राप्त हुई है।

बात यह है कि अनगारधर्मामृत, मूलाचार और आचारसार आदि चरणानुयोग के ग्रंथों का स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए, उसी से इन सब क्रियाओं का ज्ञान होता है।

चंदनामती-वंदामि माताजी! आपसे आज इन दो प्रश्नों का समाधान पाकर बड़ी प्रसन्नता हुई। आपका ज्ञानरूपी वरदहस्त हम सबके मस्तक पर सदैव बना रहे, इसी कामना के साथ लेखनी को विराम देती हूँ।

विषय-‘‘णमोकार मंत्र एवं चत्तारिमंगल’’

चन्दनामती-पूज्य माताजी! जिस णमोकार महामंत्र को सभी जैन लोग उच्चारण करते हैं उसके बारे में मैं आपसे कुछ पूछना चाहती हूँ।

श्री ज्ञानमती माताजी-पूछो, क्या पूछना है?

चन्दनामती-णमोकार मंत्र के प्रथम पद में कोई तो ‘णमो अरिहंताणं’’ पढ़ते हैं तथा कुछ लोगों को ‘‘णमो अरहंताणं’’ भी पढ़ते देखा है। इस विषय में आगम का क्या प्रमाण है?

श्री ज्ञानमती माताजी-आगम-सूत्र ग्रंथ धवला की प्रथम पुस्तक में इस विषय का अच्छा खुलासा है। उसी के आधार से मैं तुम्हें बताती हूँ।

णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं।

णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।।

धवला के मूल मंगलाचरण में यही मंत्र आया है जिसमें। ‘‘अरिहंताणं’’ पाठ ही लिया है। आगे टीकाकार श्री वीरसेनस्वामी ने और टिप्पणकार ने ‘अरहंताणं’ पद को भी शुद्ध माना है। इसी का स्पष्टीकरण-‘‘अरिहननादरिहंता’’

१. केवलज्ञानादि संपूर्ण आत्मगुणों के आविर्भाव को रोकने में समर्थ होने से मोह प्रधान अरि-शत्रु है और उस शत्रु के नाश करने से ‘अरिहंत’ यह संज्ञा प्राप्त होती है।

२. ‘‘रजो हननाद्वा अरिहन्ता’’ अथवा रज अर्थात् आवरण-कर्मों के नाश करने से अरिहंत हैं। ज्ञानावरण और दर्शनावरण कर्मधूलि की तरह बाह्य और अंतरंग स्वरूप समस्त त्रिकाल गोचर अनंत अर्थपर्याय और व्यंजनपर्याय स्वरूप वस्तुओं को विषय करने वाले बोध और अनुभव के प्रतिबंधक होने से रज कहलाते हैं, उनका नाश करने वाले अरिहंत हैं।

३. ‘‘रहस्याभावाद्वा अरिहन्ता’’ अथवा रहस्य के अभाव से भी अरिहंत होते हैं। रहस्य अन्तराय कर्म को कहते हैं। अन्तराय कर्म का नाश शेष तीन घातिया कर्मों के नाश का अविनाभावी है और अन्तराय कर्म के नाश होने पर अघातिया कर्म भ्रष्ट बीज के समान नि:शक्त हो जाते हैं। ऐसे अन्तराय कर्म के नाश से अरिहंत होते हैं।

४. ‘‘अतिशयपूजा र्हत्वाद्वार्हन्त:’’ अथवा सातिशयपूजा के योग्य होने से अर्हन्त होते हैं। क्योंकि गर्भ, जन्म, दीक्षा, केवल और निर्वाण इन पाँचों कल्याणकों में देवों द्वारा की गई पूजाएं देव, असुर और मनुष्यों को प्राप्त पूजाओं से अधिक अर्थात् महान हैं, इसलिए इन अतिशयों के योग्य होने से अर्हन्त होते हैं। यहाँ अर्हं धातु पूजा अर्थ में है उससे ‘अरहन्त’ बना है।

इस प्रकार आगम के आधार से तो णमो अरिहंताणं और णमो अरहंताणं दोनों ही पद ठीक हैं इनके उच्चारण में कोई दोष नहीं है। फिर भी मूलपाठ अरिहंताणं है अत: हम लोग अरिहंताणं ही पढ़ते हैं।

चन्दनामतीइसका समाधान तो हो गया। एक दूसरा प्रश्न भी आज हम सबके सामने है कि जो चत्तारिमंगल का पाठ पढ़ा जाता है उसमें बहुत सारे लोग तो विभक्तियाँ लगाकर पढ़ते हैं। जैसे-अरिहंता मंगलं, सिद्धा मंगलं, अरिहंता लोगुत्तमा या अरिहंते सरणं पव्वज्जामि इत्यादि। आप तो बिना विभक्ति का पाठ पढ़ती हैं तथा हम लोगों को भी बिना विभक्ति वाला पाठ ही पढ़ने को कहती हैं, किन्तु इसमें आगम प्रमाण क्या है? कृपया बताने का कष्ट करें।

श्री ज्ञानमती माताजी -इस विषय में आगम प्रमाण जो मेरे देखने में आया वह क्रियाकलाप नामक ग्रंथ है। जिसे पण्डित श्री पन्नालाल जी सोनी ब्यावर वालों ने संपादित करके छपवाया था। उस क्रियाकलाप की उन्हें कई हस्तलिखित प्राचीन प्रतियाँ भी उपलब्ध हुई थीं। उन प्रतियों के आधार पर पण्डित जी ने क्रियाकलाप ग्रंथ के पृ. ८९ पर पाक्षिक प्रतिक्रमण का दंडक दिया है। जिसमें बिना विभक्ति वाला पाठ ही छपा है, जो कि बहुत प्राचीन माना जाता है। इसी क्रियाकलाप में सामायिक दण्डक की टीका में श्री प्रभाचन्द्राचार्य ने बिना विभक्ति का ही पाठ लिया है। जैसे-अरिहंतमंगलं, सिद्धमंगलं, अरिहंतलोगुत्तमा, सिद्धलोगुत्तमा, अरिहंत सरणं पव्वज्जामि, सिद्धसरणं पव्वज्जामि, केवलिपण्णत्तो धम्मो सरणं पव्वज्जामि।’ इससे यह स्पष्ट होता है कि ग्रंथ के टीकाकार को भी बिना विभक्ति वाला प्राचीन पाठ ही ठीक लगा था। इसी प्रकार ज्ञानार्णव, प्रतिष्ठातिलक, प्रतिष्ठासारोद्धार आदि ग्रंथों में भी बिना विभक्ति के ही पाठ देखे जाते हैं।

चन्दनामती-माताजी! पहले एक बार आपने मुझसे ब्रह्मचारिणी अवस्था में चत्तारिमंगल विषयक कुछ पत्राचार भी कराए थे। उसमें विद्वानों के क्या अभिमत आए थे?

श्री ज्ञानमती माताजी-हाँ, सन् १९८३ में तुम्हारे द्वारा किए गए पत्राचार के उत्तर में भी विद्वानों के उत्तर आए थे जिन्हें मैंने ‘मेरी स्मृतियाँ’ में दिया भी है। पं. पन्नालाल जी साहित्याचार्य ने लिखा था कि ‘‘श्वेताम्बरों के यहाँ विभक्ति सहित पाठ प्रचलित है। उसमें व्याकरण की दृष्टि से कोई अशुद्धि नहीं है अत उसे दिगम्बर जैनियों ने भी अपना लिया है। ब्र. सूरजमल जी प्रतिष्ठाचार्य एवं पं. शिखरचंद प्रतिष्ठाचार्य ने भी बिना विभक्ति वाले प्राचीन पाठ को ही मान्यता दी है। स्व. पं. मोतीलाल जी कोठारी फल्टण वालों से एक बार दरियागंज- दिल्ली में मेरी चर्चा हुई थी, उन्होंने प्राचीन विभक्ति रहित पाठ को प्रामाणिक कहा था। पं. सुमेरचंद दिवाकर-सिवनी वालों से भी दिल्ली में इस विषय पर वार्ता हुई थी तब उन्होंने भी प्राचीन पाठ को ही मान्यता दी थी।

चन्दनामती-यदि व्याकरण से विभक्ति सहित पाठ शुद्ध है तो उसे पढ़ने में क्या बाधा है?

श्री ज्ञानमती माताजी-बात यह है कि मंत्रशास्त्र का व्याकरण अलग ही होता है, आज उसको जानने वाले विद्वान् नहीं हैं। अत: मेरी मान्यता तो यही है कि प्राचीन पाठ में अपनी बुद्धि से परिवर्तन, परिवद्र्धन नहीं करना चाहिए। सन् १९५८ में ब्यावर चातुर्मास में मैंने पं. पन्नालाल जी सोनी से इस विषय में चर्चा की थी, तब उन्होंने कहा था कि- हमारे यहाँ सरस्वती भवन में बहुत प्राचीन यंत्रों में भी बिना विभक्ति वाला प्राचीन पाठ ही है, हस्तलिखित प्रतियों में भी वही पाठ मिलता है। विभक्ति सहित चत्तारिमंगल का पाठ शास्त्रों में देखने को नहीं आया है अत: प्राचीन पाठ ही पढ़ना चाहिए। आजकल के विद्वानों द्वारा संशोधित पाठ नहीं अपनाना चाहिए। उन्होंने भी इस बात पर जोर दिया था कि मंत्रों का व्याकरण अलग ही होता है, आज हम लोगों को उसका ज्ञान नहीं है अत: मूलमंत्रों में अपने मन से विभक्तियाँ नहीं लगानी चाहिए। एक पत्र सन् १९८३ में क्षुल्लक श्री सिद्धसागर जी का मौजमाबाद से प्राप्त हुआ था। उससे मुझे बहुत संतोष हुआ था। उन्होंने लिखा था- ‘‘अ आ इ उ ए तथा ओ कोे व्याकरण सूत्र के अनुसार समान भी माना जाता है। ‘एदे छ च समाणा’ इस प्राकृत सूत्र के अनुसार अरहंता मंगलं के स्थान पर अरहंत मंगलं, सिद्धा मंगलं के स्थान पर सिद्ध मंगलं तथा साहू मंगलं के स्थान में साहूमंगलं और केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगलं है। ‘आ’ तथा ‘अ’ को समान मानकर अरहंत के ‘आ’ के स्थान में ‘अ’ पाठ रखा गया है यह व्याकरण से शुद्ध है। इसी प्रकार ‘अरहंत लोगुत्तमा’ इत्यादि पाठ भी शुद्ध है। ‘अरहंते सरणं पव्वज्जामि’ के स्थान पर ‘अरहंत सरणं पव्वज्जामि’ पाठ शुद्ध है क्योंकि ‘एदे छ च समाणा’ इस व्याकरण सूत्र के अनुसार ‘ए’ तथा ‘अ’ को समान मानकर ‘ए’ के स्थान में ‘अ’ पाठ शुद्ध है। इसलिए जो चत्तारिमंगल पाठ विभक्ति रहित है, प्राचीन काल से चला आ रहा है वह शुद्ध है। शास्त्रों और यंत्रों में भी विभक्ति रहित ही जो पाठ देखे जाते हैं, वे शुद्ध हैं और लाघवयुक्त हैं।

चन्दनामती-इससे निष्कर्ष क्या निकालें?

श्री ज्ञानमती माताजी-निष्कर्ष तो यही निकलता है कि प्राचीन पाठ ही पढना चाहिए। क्योंकि खोज करने से यही प्रतीत होता है कि समस्त पूर्वाचार्यों की प्राचीन पद्धति के अनुसार बिना विभक्ति वाला पाठ ही पढ़ते और लिखते आए हैं। अत: हम लोगों को इस विषय में अपनी बुद्धि न लगाकर प्राचीन पाठ का ही अनुरण करना चाहिए।

चन्दनामती-आपके श्रीचरणों में बारम्बार वंदामि। णमोकार मंत्र और चत्तारिमंगल पर आपके द्वारा जो समुचित समाधान प्राप्त हुआ है, उससे समस्त जनमानस को अवश्य ही मार्गदर्शन प्राप्त होगा।