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परित्यक्त्वा परभावं, आत्मानं ध्यायति निर्मलस्वभावम्।

आत्मवश: स भवति खलु, तस्य तु कम्र्म भणन्ति आवश्यकम्।।

—समणसुत्त : ४१७

परभाव का त्याग करके निर्मल—स्वभावी आत्मा का ध्याता आत्मवशी होता है। उसके कर्म को ‘आवश्यक’ कहा जाता है।