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राग दोस मोह के पासे, आप वणाए हितधर।

जैसा दाव परे पासे का, सारि चलावे खिलकर।।

—आनंदघन ग्रंथावली, पद : ५६

आत्मा ने स्वयं प्रसन्न होकर संसार रूप चौपड़ को खेलने के लिए राग—द्वेष और मोह रूप पासे बना लिए हैं। जैसे पासा आता है, उसी के अनुसार आत्मा रूप कर्म खिलाड़ी द्वारा सार (गोट) चलाई जाती है। तात्पर्य यह कि चतुर्गति रूप चौपड़ में आत्मा को राग—द्वेष और मोह पासे के कारण ही विभिन्न शरीर धारण करना पड़ता है। आत्म राग—द्बेष—मोह की जैसी-जैसी प्रवृत्तियां करता है, तद्वत् उसे विभिन्न गतियों एवं उत्पत्ति—स्थानों में जाना पड़ता है।