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डिप्लोमा इन जैनोलोजी कोर्स का अध्ययन परमपूज्य प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी द्वारा प्रातः 6 बजे से 7 बजे तक प्रतिदिन पारस चैनल के माध्यम से कराया जा रहा है, अतः आप सभी अध्ययन हेतु सुबह 6 से 7 बजे तक पारस चैनल अवश्य देखें|

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२५ अप्रैल प्रातः ६:४० से प्रतिदिन पारस चैनल पर पूज्य श्री ज्ञानमती माताजी के द्वारा षट्खण्डागम ग्रंथ का सार प्रसारित होगा |

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आवागमन :

राग दोस मोह के पासे, आप वणाए हितधर।

जैसा दाव परे पासे का, सारि चलावे खिलकर।।

—आनंदघन ग्रंथावली, पद : ५६

आत्मा ने स्वयं प्रसन्न होकर संसार रूप चौपड़ को खेलने के लिए राग—द्वेष और मोह रूप पासे बना लिए हैं। जैसे पासा आता है, उसी के अनुसार आत्मा रूप कर्म खिलाड़ी द्वारा सार (गोट) चलाई जाती है। तात्पर्य यह कि चतुर्गति रूप चौपड़ में आत्मा को राग—द्वेष और मोह पासे के कारण ही विभिन्न शरीर धारण करना पड़ता है। आत्म राग—द्बेष—मोह की जैसी-जैसी प्रवृत्तियां करता है, तद्वत् उसे विभिन्न गतियों एवं उत्पत्ति—स्थानों में जाना पड़ता है।