ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्ज एप पर मेसेज करें|

पूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माता जी के द्वारा अागमोक्त मंगल प्रवचन एवं मुंबई चातुर्मास में हो रहे विविध कार्यक्रम के दृश्य प्रतिदिन देखे - पारस चैनल पर प्रातः 6 बजे से 7 बजे (सीधा प्रसारण)एवं रात्रि 9 से 9:20 बजे तक|
इस मंत्र की जाप्य दो दिन 16 और 17 तारीख को करे |

सोलहकारण व्रत की जाप्य - "ऊँ ह्रीं अर्हं संवेग भावनायै नमः"

आवागमन :

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


आवागमन :

राग दोस मोह के पासे, आप वणाए हितधर।

जैसा दाव परे पासे का, सारि चलावे खिलकर।।

—आनंदघन ग्रंथावली, पद : ५६

आत्मा ने स्वयं प्रसन्न होकर संसार रूप चौपड़ को खेलने के लिए राग—द्वेष और मोह रूप पासे बना लिए हैं। जैसे पासा आता है, उसी के अनुसार आत्मा रूप कर्म खिलाड़ी द्वारा सार (गोट) चलाई जाती है। तात्पर्य यह कि चतुर्गति रूप चौपड़ में आत्मा को राग—द्वेष और मोह पासे के कारण ही विभिन्न शरीर धारण करना पड़ता है। आत्म राग—द्बेष—मोह की जैसी-जैसी प्रवृत्तियां करता है, तद्वत् उसे विभिन्न गतियों एवं उत्पत्ति—स्थानों में जाना पड़ता है।