ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर, रविवार से ११ दिसंबर २०१६, रविवार तक प्रातः ६ बजे से ७ बजे तक सीधा प्रसारण होगा | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

आश्चर्यजनक शिल्पकला का एक संक्षिप्त इतिहास

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१०८ फुट उत्तुंग भगवान ऋषभदेव मूर्ति निर्माण स्थली मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र

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मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र ९९ करोड़ महामुनियों की निर्वाणस्थली के रूप में विश्व प्रसिद्ध है, जिसे दक्षिण के लघु सम्मेदशिखर पर्वत के रूप में भी जैन समाज में मान्यता प्राप्त है। यह तीर्थ ९ लाख वर्ष पूर्व भगवान मुनिसुव्रतनाथ के तीर्थ काल से पूज्यता को प्राप्त है क्योंकि ९९ करोड़ महामुनियों ने जैनेश्वरी दीक्षा धारण करके दक्षिण भारत के इस पर्वत से कठोर तपश्चरण के साथ मोक्षधाम प्राप्त किया था। अत: तभी से सिद्धक्षेत्र के रूप में आज तक मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र की महिमा जन-जन के द्वारा गाई जाती है। इस पर्वतराज पर २ चूलिकाएँ हैं, जिनमें एक मांगीगिरि और दूसरी तुंगीगिरि के नाम से प्रसिद्ध है। इस पर्वत पर हजारों वर्ष प्राचीन जिनप्रतिमाएँ, यक्ष-यक्षणियों की मूर्तियाँ, शुद्ध-बुद्ध मुनिराज के नाम से दो गुफाओं में भगवान मुनिसुव्रतनाथ एवं भगवान नेमिनाथ की प्रतिमाएँ आदि विराजमान हैं। साथ ही तलहटी में भी भगवान पार्श्वनाथ जिनमंदिर, मूलनायक भगवान आदिनाथ जिनमंदिर, भगवान मुनिसुव्रतनाथ जिनमंदिर, मानस्तंभ आदि निर्मित हैं।

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आश्चर्यजनक शिल्पकला का एक संक्षिप्त इतिहास

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ऐसे महापुरुष और वर्तमान युग में इस सृष्टि पर जैनधर्म का प्रवर्तन करने वाले प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव और उनके सिद्धांतों से जन-जन को परिचित कराने हेतु पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी ने सन 1996 में अपने मांगीतुंगी चातुर्मास के मध्य 26 अक्टूबर 1996, शरद पूर्णिमा के दिन विश्व की सबसे ऊंची भगवान ऋषभदेव प्रतिमा के निर्माण की प्रेरणा प्रदान की और 3 मार्च 2002 को मूर्ति निर्माण कमेटी के द्वारा मांगी पर्वत के एक पूर्वाभिमुख भाग में प्रतिमा निर्माण का स्थान निश्चित करके पाषाण में शिलापूजन सम्पन्न किया गया | मूर्ति निर्माण हेतु कमेटी द्वारा 1996 से 2002 तक, 6 साल की कड़ी मेहनतपूर्वक पर्वत का यह पूर्व भाग सरकारी कार्यवाही के द्वारा कमेटी के नाम कराया गया पश्चात कार्य का शुभारम्भ हुआ |
क्रमश: सन 2003, 2004, 2005, 2006 में प्रतिमा निर्माण के लिये पर्वत को कांटने-छांटने का व रास्ता बनाने का अदभुत सहासिक कार्य सफलतापूर्वक कमेटी द्वारा किया गया | पश्चात 2007 से पर्वत को कांटने-छांटने के साथ शिला उकेरने का कार्य प्रारम्भ किया गया | इस प्रकार सर्वप्रथम पर्वत पर सन 2012 में एक आयताकार ब्लाक (अखण्ड पाषाण शिला) का आकार निर्मित हुआ, जिस पर धीरे धीरे सन 2012 से प्रतिमा निर्माण का कार्य प्रारम्भ हुआ |

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सर्वप्रथम इस आयताकार ब्लाक (अखण्ड पाषाण शिला) पर वसुनन्दि प्रतिष्ठापाठ आदि ग्रंथों की आधार से मूर्ति निर्माण हेतु नवताल की प्रतिमा का आकार (आउट लाइन पेंटिंग) किया गया | पश्चात विशेष पूजा-अनुठानपूर्वक 25 दिसम्बर 2012 से मूर्ति निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया गया | शिला पर की गयी स्केच के आधार पर इस शिला को कांटते-छांटते सर्वप्रथम प्रतिमा के मस्तक भाग से कार्य का शुभारम्भ हुआ और मस्तक की गोलाई और भगवान के सिर पर केश बनाने का कार्य किया गया | धीरे-धीरे मुखाकृति हेतु आंख, नाक, होंठ व गालों का आकार देने का कार्य किया गया और कंधों के निर्माण हेतु पत्थर की कटिंग की गई | पुन: इस कार्य की प्रगति करते-करते मूर्तिकारों ने वक्षस्थल तक प्रतिमा सुन्दर आकार दिया | इसी क्रम में यह कार्य प्रगति को प्राप्त हुआ और प्रतिमा के पैरों को बनाने हेतु शिला की गोलाई पूर्वक कटाई-छटाई-घिसाई करके जंघा, घुटने व नीचे के पैरों तक आकार दिया गया | अंत में प्रतिमा के दोनों चरण व पैरों की अंगुलियों को आकार दिया गया और इसके उपरांत भगवान का बैल चिन्ह तथा प्रतिमा के बायें हाथ की तरफ भगवान ऋषभदेव की शासन देवी चक्रेश्वरी माता व दायें हाथ की तरफ शासन देव गोमुखदेव की प्रतिमा भी उत्कीर्ण की गईं | अंत में दिनांक 24 जनवरी 2016 को वह दिन आया, जब प्रात: 9 बजे 10 बजे के मध्य भगवान के नेत्र खोले गये और विशेष शिल्पी द्वारा प्रतिमा के आंखों में गोलाकार बनाया गया, जिसके उपरांत इस प्रतिमा की पूर्णता घोषित हुई और 24 जनवरी 2016 के शुभ दिन सारी सृष्टि पर इस प्रतिमा की दिव्य दृष्टि पड़ी, जिससे उस दिन सभी भक्तजनों ने साक्षात अत्यंत सुख, शांति, हर्ष और अनुकूल मौसम की अनुभूति करके भगवान के दिव्य नेत्रों को जी भरकर देखा तथा अपने ऊपर सदा भगवान की कृपा दृष्टि रहने हेतु प्रार्थना की |