ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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नीया वि समत्थेहिं गहिया उच्चं लहंति संठाणं।

धूलिकणा पुहवीए चरंति गयणम्मि वाएण।।

—गाहारयणकोष : १२०

नीच व्यक्ति भी यदि बड़ों का सहारा लेते हैं तो ऊँचे पद तक पहुँच जाते हैं। जैसे पृथ्वी के धूलि—कण हवा का आश्रय पाकर आकाश में गमन करते हैं।