ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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आसक्त :

महिलाकरेणुयाणं, लुद्धो घरवाहि—नियल—पडिवद्धो।

अणुहवइ तत्थ दुक्खं पुरिसगओ बम्महासत्तो।।

—पउमचरिउ : ५६६

स्त्री रूपी हथिनियों से लुब्ध, घरबार रूपी जंजीरों से जकड़ा हुआ और काम में आसक्त पुरुष रूपी गज जीव संसार में दु:ख अनुभव करता है।