ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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आस्था — विश्वास का आधार : स्वाध्याय

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आस्था — विश्वास का आधार : स्वाध्याय

हमने यह जाना है कि स्वाध्याय जानने अथवा ज्ञान का अमोघ साधन तो है ही, इससे हमारी मान्यता अथवा विश्वास भी निर्मल और दृढ़ हो जाता है। अपूर्ण और संशय—युक्त विश्वास हमारे पतन का कारण बन जाता है। जो बात हम किसी महापुरूष अथवा ज्ञानी से सुनते या शास्त्रों में पढ़ते हैं, उसको सत्य स्वीकार कर लेना, उस पर भरोसा करना विश्वास है। विश्वास में कुछ जाना नहीं जाता, अपितु दूसरे के अनुभूत ज्ञान को माना जाता है। सहज स्वीकृति ही विश्वास है। जैसे हमने सुना या पढ़ा कि णमोकार महामंत्र के जाप से सिद्धि मिलती है, कार्य सफल होते हैं, संकट मिटते हैं या हनुमानजी की आराधना से संकट दूर होते हैं और यह विश्वास बना रहता कि हनुमान ही संकट मोचन हैं। णमोकार महामंत्र सर्व—सिद्धि देने वाला है।

यदि मन में यह संशय उठे कि णमोकार मंत्र के जाप से सिद्धि मिलेगी भी या नहीं, कहीं जाप का श्रम व्यर्थ न जाए तो साधक कहीं का नहीं रहेगा, क्योकि संशयात्मक विनश्यति अर्थात् संशय करने वाले का विनाश हो जाता है। निष्कर्ष यह कि हर प्रकार के संशय का निराकरण स्वाध्याय से होता है। स्वाध्याय से हम ऐसे लोगों के बारे में जान जाते हैं, जिनकों महामंत्र के जाप से आशातीत सफलता मिली है।

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संशय: — ज्ञान में सहायक:—

यहाँ एक बात ध्यान देने की है कि संशय या संदेह ज्ञान में, विश्वास में बाधक है तो ज्ञानार्जन या जानने में सहायक भी है। संदेह के बिना सत्य की खोज नहीं होती और सत्य की खोज के बिना ज्ञान नहीं मिलेगा। कहा जाता है—नहि संशयमनारूह्य नरो भद्राणि पश्यति अर्थात् संशय किये बिना मनुष्य कल्याण के मार्ग की पहचान भी नहीं कर सकता। संशय जिज्ञासा का सहोदर है।

दर्शनशास्त्र का उद्गम संशय से ही माना जाता है। एक बार विश्वास कर लेने के बाद यदि संशय घातक है तो संशय हो जाने के बाद सत्य की खोज न करना ज्ञानार्जन में बाधक भी है। संशय से विश्वास की हानि और ज्ञान में सहयोग —दोनों तथ्यों को एक उदाहरण से समझा जा सकता है। अंधेरे के कारण मार्ग में पड़ी रस्सी आपको साँप दिखाई दी। आपने जाना कि यह सर्प है। आपका यह जानना विपरीत निश्चय, भ्रम या गलत जानना है। रस्सी को सर्प समझ आप काटने के भय से वहीं रूक गए, आगे नहीं बढ़ रहे हैं। तभी आपका एक मित्र आया। उसने आपके रुकने का कारण पूछा तो आपने कहा— ‘‘ आगे रास्ते में साँप पड़ा है, देखा नहीं तुमने। ’’ तब आपके मित्र ने ठीक से देखकर कहा— ‘‘अरे भाई यह तो रस्सी है। दो दिन से यहीं पड़ी है।’’

मित्र के इस कथन पर दो प्रतिक्रियाएँ होंगी। अगर आप सरल हृदय के विश्वासी हैं तो आप अपने मित्र की बात पर विश्वास कर लेंगे और कहेंगे कि ‘‘तुम झूठ थोड़े ही बोलोगे। तुम कहते हो तो मुझे विश्वास है कि रस्सी ही होगी। मुझे अब कोई भय नहीं।’’ ऐसा विश्वास करके आप आगे बढ़कर रस्सी को उठा लेंगे।

दूसरी बात यह होगी कि यदि आप विश्वास वाले व्यक्ति नहीं हैं तो आप अपने मित्र की बात को न तो झूठ समझेंगे और न सत्य ही मानेंगे। आप संशय में पड़कर सोचेंगे—‘‘शायद मेरे मित्र की बात सही हो । साँप न होकर रस्सी ही हो या शायद मेरी बात सही हो। साँप ही हो।’’ इस तरह आपका यह संशय सत्य की खोज की प्रेरणा देगा। आप टार्च , लालटेन, लाकर मित्र की बात की परीक्षा करेंगे। खोज करने के बाद आप स्वयं देख लेगें कि आपका जानना गलत था। मित्र का जानना ही सही था। यह तो रस्सी ही है। इस तरह संशय ने आपको खोजने की प्रेरणा दी और खोज के बाद संशय मिटा तथा सत्य जाना।

यहाँ एक बात और समझने की है। वह यह कि विश्वासी यानी मानने वाला पहले मानता है, बाद में जानता है और जानने वाला पहले जानता है, बाद में मानता है। पहली स्थिति में आपने पहले माना कि रस्सी है, साँप नहीं। यानी विश्वास किया और फिर छूकर आये तो जाना कि रस्सी है। दूसरी स्थिति में टार्च, लालटेन से पहले संशय मिटाया, यानि पहले जाना कि रस्सी है। उसके बाद माना कि हमारा मित्र ठीक कहता था, रस्सी ही थी।

इस तरह स्वाध्याय जानने और मानने दोनों का आधार बनता है। ज्यों—ज्यों हमारा स्वाध्याय बढ़ेगा, त्यों—त्यों ज्ञान बढ़ेगा और विश्वास भी दृढ़ होगा। स्वाध्याय केवल ग्रंथों का अवलोकन भर नहीं है। जानने के लिए पूछना, खोजना , छानबीन करना, प्रयत्न करना और सत्य की अंतिम तह तक पहुँचना यह सम्पूर्ण प्रक्रिया ही स्वाध्याय का अंग है। जैन शास्त्र इस बात का समर्थन करते हैं।

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स्वाध्याय के पाँच रूप :

स्वाध्याय क्या है, इसकी परिभाषा देते हुए स्थानांगसूत्र की टीका में कहा गया है— सुष्ठु आ —मर्यादया अधीयते इति स्वाध्याय: अर्थात् सत् शास्त्र को मर्यादा सहित सम्पूर्ण विधिपूर्वक पढ़ने, मनन, करने का नाम स्वाध्याय है। भगवती सूत्र में स्वाध्याय के पाँच प्रकार बताये गए हैं। यथा— सज्झए पंचविहे पण्णत्ते तंजहा—वायणा, पडिपुच्छणा, परियट्टणा, अणुप्पेहा, धम्मकहा। अर्थात् वाचना, प्रतिपृच्छना, परिवर्तना, अनुप्रेक्षा और धर्मकथा।

(१) वाचना — गुरुजनों से आगमों की वाचना लेना ज्ञान की पहली सीढ़ी है। शास्त्रों के पढ़ने , शुद्ध उच्चारण करने और उसके विधि— विधान की ठीक—ठाक जानकारी गुरुजनों को होती है, इसलिए शिष्य गुरुमुख से आगमों की वाचना लेते हैं। ऐसी मान्यता भी है कि गुरुमुख से लिये बिना कोई भी मंत्र सिद्ध नहीं होता। शिष्य कितना ही बुद्धिमान हो, पर शास्त्रों की वाचना वह गुरू से ही लेगा, अन्यथा सम्यग्ज्ञान की उपलब्धि संभव नहीं है। प्राचीन शिक्षा पद्धति में शिष्य पहला पाठ गुरु के मुख से ग्रहण करता था। गुरु उसको शुद्ध उच्चारण का ज्ञान भी देते थे साथ ही शब्दों के उच्चारण में ध्वनि का उतार—चढ़ाव, लय आदि का भी ज्ञान प्रदान करते थे। मंत्र, श्लोक आदि का लयात्मक उच्चारण करने से अनूठे आनन्द और अपूर्व तन्मयता का अनुभव होता है।

(२) प्रतिपृच्छना — पढ़े हुए विषय में शंका और जिज्ञासा होना स्वाभाविक है। ऐसी स्थिति में शिष्य विनयभाव से गुरु से पूछता है— कहमेयं भन्ते—भन्ते! यह कैसे हैं ? इसका क्या अर्थ है? पढ़ने—सुनने के बाद यदि शिष्य के मन में कोई प्रश्न पैदा नहीं होता तो शिष्य की बुद्धि सुप्त बुद्धि मानी जाएगी।

जाग्रत बुद्धि अथवा जिज्ञासु बुद्धि के शिष्य के मन में अनेक शंकाएँ उठेंगी। उनको वह गुरूजी से पूछेगा और वे समाधान करेंगे। गौतम स्वामी स्वयं ज्ञानी थे, फिर भी वे भगवान महावीर से अनेक प्रकार के प्रश्न पूछा करते थे। इससे दूसरे साधुओं की भी ज्ञान वृद्धि होती थी। भगवती सूत्र में गौतम स्वामी द्वारा पूछे गए छत्तीस हजार प्रश्नों का संग्रह है। अत: वाचना के बाद पृच्छना ज्ञानार्जन का दूसरा महत्वपूर्ण अंग है।

(३) परिवर्तना — सीखे हुए, समझे हुए ज्ञान को पुन: देखना, समझना, पढ़ना परिवर्तना कहा जाता है। यदि पढ़े और कण्ठस्थ ज्ञान को फैरा नहीं जाएगा यानि दुहराया नहीं जाएगा तो विस्मृत हो जायेगा । इस संदर्भ में एक लोकोक्ति बहुत प्रसिद्ध है, जिसमें तीनों प्रश्नों का एक ही उत्तर है। यथा— घोड़ा अड़ा क्यों ? पान सड़ा क्यों ? और रोटी जली क्यों ? उत्तर है— फेरा न था। मानसकार ने भी कहा है कि अच्छी तरह चिंतन किए गए शास्त्र को भी बार—बार देखना चाहिए। यथा— शास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ। आज जो भी लिपिबद्ध ज्ञान में हमें उपलब्ध है, उसके मूल में आचार्यों की ज्ञानार्जन परम्परा के वाचना, पृच्छना और परिवर्तना—तीनों अंगों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

(४) अनुप्रेक्षा — बार—बार दुहराना परिवर्तना है तो बार—बार चिंतन—मनन करना अनुप्रेक्षा है। अंग्रेजी में बिटवीन द लाइन्स— पंक्तियों के मध्य का अभिप्राय अनुप्रेक्षा से ही है। पढ़े हुए विषय पर बार—बार विचार करने से नये और गंभीर अर्थ अपने आप निकलते हैं। सूत्रों की व्याख्या में अनुप्रेक्षा से ही मदद मिलती है। परिवर्तना न भूलने में सहायक है तो अनुप्रेक्षा अर्थगांभीर्य को समझने में मदद करती है। अनुप्रेक्षा चिन्तन की गहराई का नाम है।

(५) धर्मकथा — धर्मकथा को प्रज्वलित दीपक कहा गया है। जलते हुए दीपक से सैकड़ों बुझे हुए दीपक पुन: जल जाते हैं। धर्मकथाएँ पढ़ने तथा दूसरों को सुनाने से ज्ञान का स्थायी प्रभाव पड़ जाता है। इस संदर्भ में रोहिणेय चोर की कथा प्रसिद्ध है। भगवान महावीर की धर्मकथा के कुछ शब्द उसके कानों में अनचाहे, अनजाने पड़ थे। उन शब्दों के प्रभाव से यह महापापी चोर वंदनीय साधु बन गया। उपर्युक्त चारों अंगों की तरह ज्ञानार्जन का पाँचवाँ अंग धर्मकथा सोने में सुगंध के समान महत्वपूर्ण है।

स्वाध्याय का महत्व बताते हुए कहा गया है कि अनेक जन्मों के संचित दुष्कर्मों को व्यक्ति स्वाध्याय द्वारा क्षणभर में खपा देता है। आज हमें आगमों की जो ज्ञान—परम्परा उपलब्ध है, वह स्वाध्याय के कारण ही है। स्वाध्याय के अभाव में अनेक आगम नष्ट हो गए। पूर्व का ज्ञान जिसमें लौकिक , भौतिक , निमित्त ज्योतिष तंत्र—मंत्र आदि का भी गंभीर ज्ञान भरा था वह सब स्वाध्याय के अभाव में धीरे–धीरे लुप्त हो गया।

स्वाध्याय सद्ग्रंथों का ही करना चाहिए। सद्ग्रंथ शाश्वत और सनातन होते हैं। सद्ग्रंथों में जीवन का सत्य संचित होता है। निष्कर्ष रूप में स्वाध्याय का महत्व और उसकी उपयोगिता यह है कि इधर—उधर भटकने वाला चंचल मन स्वाध्याय में पूरी तरह रमकर एकाग्र हो जाता है। जैसे—सुखी मीन जहँ जलधि अगाधा— गहरे अगाध सागर में डूबी हुई मछली जैसे सुखी रहती है, वैसे ही स्वाध्याय सागर में डूबा हुआ मन सुखी रहता है।

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बहुत पढ़ने वाला वकील—

स्वाध्याय का महत्व बताने वाली एक सच्ची घटना यहाँ उल्लेखनीय है। एक व्यक्ति ने वकालत पास की। अपना रजिस्ट्रेशन कराया और कोर्ट में बैठने लगा। लेकिन नया वकील होने के कारण कोई मुवक्किल उसके पास नहीं आता था। फिर भी वह वकील नित्य कोर्ट जाता और प्रात: दस बजे से शाम चार बजे तक वकीलों की बार लाइब्रेरी में बैठकर स्वाध्याय करता रहता । उसके इस नियम को पाँच वर्ष हो गए, पर कोई मुकद्दमा नहीं मिला। उसके घरवालों ने उससे कहा— ‘‘ तुम्हारी वकालत न तो चली और न चलेगी। कोई और धंधा करो।’’ इस पर उसने जवाब दिया— ‘‘ मैं निराश नहीं हूँ । असफल भी नहीं हूँ । मेरा स्वाध्याय कभी व्यर्थ नहीं जाएगा। और धंधा करने की बात इसलिए बेमानी है कि खाने—पीने को खेतों में पर्याप्त अन्न पैदा हो जाता है। अत: दूसरा धंधा क्या करूँ और क्यों करूँ ? वकालत नहीं चल रही तो क्या हुआ, मेरा समय व्यर्थ नहीं जा रहा। मेरा स्वाध्याय चल रहा है। यह स्वाध्याय ही मेरी कमाई है। दूसरे वकीलों को स्वाध्याय के लिए समय नहीं मिलता, पर मेरे पास तो समय है।’’ इस तरह आगे भी उस वकील का स्वाध्याय चलता रहा। इस प्रकार उसे बारह वर्ष बीत गए।

बारह वर्ष बाद एक पेचीदा मुकद्दमा लेकर कुछ मुवक्किल वकीलों के पास गए। सभी ने कहा— ‘‘जीत भी सकते हैं और नहीं भी जीत सकते । इस केस में मेहनत बहुत है।’’ तभी एक व्यक्ति ने मजाक में कहा—‘‘ उस पढ़ाकू वकील से भी बात कर लो। मुकद्दमा तो उसने कभी लड़ा नहीं, पर वकील तो है ही। उसका अध्ययन भी है और कोर्ट भी जाता है।

‘‘अरे वह क्या केस लड़ेगा।’’ दूसरे ने बात काटी—‘‘ उसे तो जज के सामने खड़े होकर बोलने का भी अनुभव नहीं है।’’ ‘‘फिर भी बात करने में क्या हर्ज है ?‘‘ पहले ने सुझाव दिया— ‘‘ देखें वह क्या कहता है।’’

इस तरह दो—चार व्यक्ति उस स्वाध्यायकर्ता वकील के पास गए। उसने केस को ध्यान से सुना और बोला— ‘‘ आई विन द केस— मैं यह मुकद्दमा जीतूँगा।’’ सुनते ही लोग चकरा गए। उससे फीस पूछी तो एक लाख रूपये माँगी। उसने केस लड़ा और जज के सामने विभिन्न हाईकोर्ट की नजीरों को इतने सुन्दर प्रमाण सहित प्रस्तुत किया कि जज को भी हैरत में डाल दिया।

मुकद्दमें के समय एक नौकर पुस्तकों का ढेर अदालत में लेकर पहुँचता है। वकील पुस्तके खोलता जाता और जज के सामने हाईकोर्ट के फैसलों का वर्णन रखता जाता। दूसरे वकील भी अचम्भे से देख रहे थे कि इतनी सारी पुस्तके, इनकी पृष्ठ संख्या का ध्यान भी है कि किस हाईकोर्ट की कौन—सी नजीर किस पृष्ठ पर है। विपक्ष से कई वकील मौन खड़े थे।

इस तरह उस वकील ने स्वाध्याय के बल पर बारह साल बाद पहला केस लड़ा। वह जीता और मुँह—माँगी फीस लेकर उस नगर का सबसे बड़ा वकील बना। यह सब स्वाध्याय का कमाल था।

धर्मशास्त्रों का निर्देश है — सत्यं वद, धर्मं चर, स्वाध्यायान् मा प्रमद: अर्थात सत्य बोलो। धर्म का आचरण करो और स्वाध्याय धर्म और सत्याचरण के समान ही जीवन में महत्वपूर्ण है। स्वाध्याय के बिना धर्म के स्वरूप को नहीं जाना जा सकता। यदि हम अपने जीवन को मन—वचन—कर्म से पवित्र करना चाहें तो ध्यान रखें— मन की पवित्रता स्वाध्याय से, वचन की सत्य बोलने से और कर्म की धर्माचरण से होगी। इस तरह पवित्रता यदि तीर्थराज है तो स्वाध्याय, सत्य और धर्म तीर्थराज का संगम है।

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स्वाध्याय से स्वरूप का ज्ञान —

स्वाध्याय का अर्थ है, ‘ख’ यानी अपने स्वयं का अध्ययन और उसे उसके स्वरूप में जानने—समझने का प्रयास। अपने आपको जानना जरूरी भी है और कठिन भी लेकिन जब इसमें रूचि हो जाए तो कोई कठिनाई महसूस नहीं होगी।

सभी के व्यक्तित्व के साथ दो चीजें जुड़ी रहती हैं। एक रूप और दूसरा स्वरूप। रूप बाहरी और दिखावटी होता है और स्वरूप मूल तत्व होता है। जैसे दिवाली पर चीनी के खिलौने बनते हैं— हाथी, घोड़ा आदि। इसमें रूप हाथी, घोड़ा है और स्वरूप चीनी है। इसी तरह खादी का कुर्ता — टोपी तो कपड़े का रूप है और कपास स्वरूप है। ऐसे ही वकील , डॉक्टर , ब्राह्मण, युवा,वृद्ध स्त्री—पुरूष आदि रूप की पहचान है पर स्वरूप आत्मा है। आत्मा यानि शक्ति, ज्ञान, आनन्द, सच्चिदानन्द। हमारा स्वरूप सच्चिदानन्द है। देह हमारा रूप है। अत: अपने सच्चिदानन्द स्वरूप, यानी आत्मा को जानना और इसके जानने के प्रयास हित सद्ग्रंथों का अध्ययन स्वाध्याय हुआ।

मनुष्य यदि अपने शरीर को ही ‘स्व’ माने, उसी की उन्नति करे, इन्द्रियों की तृप्ति में ही रमा रहे तो उसका जीवन व्यर्थ गया। कोई भी मनुष्य सतत सत्संग और सतत स्वाध्याय से ही जान सकता है कि वह शरीर नहीं आत्मा है और आत्मा के लिए उसे क्या करना है। यह सब तभी संभव है, जब शास्त्रों या सद्ग्रंथों का स्वाध्याय किया जाए।

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स्वाध्याय शास्त्रों से भी ऊपर —

मनुष्य दो प्रकार के होते हैं। भावना प्रधान और विचार —प्रधान। भावना प्रधान सरल अन्त:करण वाले व्यक्ति शास्त्रों पर सहज ही विश्वास करके उनका विश्वास, आस्था और मान्यताएँ दृढ़ हो जाती हैं, पर दूसरे विचार—प्रधान व्यक्ति शास्त्रों की बातों को तर्क की कसौटी पर कसते हैं। आपस के विरोधाभास को समझते हैं । उन्हें शास्त्रों के साथ अन्य ऐसे ग्रंथों का स्वाध्याय भी करना पड़ेगा, जो उनकी तार्वकक जिज्ञासाओं को शांत कर सके। ऐसे व्यक्ति विभिन्न धर्मों के दर्शन—ग्रंथों का तुलनात्मक स्वाध्याय कराके ही संतुष्ट हो पाते हैं। ध्यान यह भी रखना है कि स्वाध्याय हमें हठवादी या एकान्तवादी न बनाये। स्वाध्याय हमें अनेकान्तवादी बनाये तभी उसकी सार्थकता है।

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स्वाध्याय और तप —

स्वाध्याय को भी तप कहा है और तप का फल इच्छित और सुखद होता है । लेकिन यह शारीरिक तप से भिन्न है। शारीरिक तप में काया को तपाकर इष्टदेव को प्रसन्न करके अभीष्ट वरदान पाया जाता है। लेकिन स्वाध्याय मन—बुद्धि की साधना कर दीर्घकालीन तप है और इसमें ज्ञान का वरदान पाने के लिए किसी देवी—देव की कृपा पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं । हम स्वयं ही ज्ञान का वरदान पा लेते हैं।

इस संदर्भ में एक पौराणिक कथा है कि ब्राह्मण पुत्र यवक्रीत ने शारीरिक तप करके देवराज इन्द्र को प्रसन्न कर यह वरदान माँगा कि वह बिना पढ़े ही शास्त्रों का ज्ञाता बन जाये। इन्द्र ने कहा कि इसके लिए तो समर्थ गुरू के सम्पर्वâ में रहकर शास्त्रों का स्वाध्याय ही एक मात्र उपाय है। लेकिन यवक्रीत ने हठ ठान लिया कि वे शारीरिक तप से इन्द्र को प्रसन्न करके ही शास्त्रों के ज्ञाता बनेंगे। अत: वे बार—बार इन्द्र को प्रसन्न करते। इन्द्र भी साक्षात् दर्शन देकर स्वाध्याय की ही बात कहते।

अन्त में यवक्रीत को अपना हठ छोड़ना पड़ा और उन्होंने इन्द्र से कहा— ‘‘अब मैं जान गया कि स्वाध्याय स्वयं में एक तप है। अत: शारीरिक तप को छोड़कर अब मैं मन—बुद्धि का तप स्वाध्याय करके ही शास्त्रों का ज्ञाता बनूँगा।

इसके बाद यवक्रीत ने रैभय ऋषि के आश्रम जाकर उनको गुरु बनाया और उनके निर्देशन में स्वाध्याय करके ज्ञानी बने। ‘तैत्तिरीय आरण्यक’ (२—१४) में कहा है— तपोहि स्वाध्याय: अर्थात् स्वाध्याय स्वयं एक तप है। ‘दशवैकालिक ’ (१०/९) के अनुसार— सज्झायरए स भिक्खु अर्थात् जो स्वाध्याय में अनुरक्त है, वह साधु है।

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संतों की आत्मा ग्रन्थों के रूप में जीवित रहती है :

इतना सब कहने—बताने का अभिप्राय यह है कि महापुरुषों , महामानवों और अमर पुरूषों ने अपने विचारों , अनुभवों का खजाना सद्ग्रंथों के रूप में हमें सौंपा है। महापुरूष नश्वर शरीर से चले जाते हैं, पर उनकी पवित्र आत्मा उनकी पुस्तकों में बसती है। संसार में हजारों, लाखों बड़े—बड़े चक्रवर्ती सम्राट और वीर योद्धा हुए। अगणित लक्ष्मीपति हुए परन्तु आज उनका नाम भी हम नहीं जानते, लेकिन वाल्मीकि, व्यास, तुलसीदास, सूरदास, सुधर्मा, जम्बू, सिद्धसेन, हरिभद्र, हेमचन्द्र, यशोविजयजी जैसे ज्ञानियों की आत्मा साहित्य के रूप में हमारे सामने रहता है। विडम्बना यह है कि हम तब भी ज्ञान—दरिद्र बने रहते हैं। हम चाहें तो स्वाध्याय के जरिए ज्ञान का यह खजाना लूटकर अपना ज्ञानकोष भर सकते हैं। ज्ञान का यह खजाना इतना अक्षय है कि हजारों, लाखों, करोड़ो के लूटने पर भी इसमें से कुछ नहीं घटता।

राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध, ईसा अपनी वाणी के रूप में हमारे सामने खड़े हैं। उनसे साक्षात् कार करने और उन्हें सुनने—समझने के लिए स्वाध्याय का सुगम—सरल और सुलभ साधन हमें उपलब्ध है। फिर भी हम अपने जीवन को पवित्र, सरल, सार्थक और सौद्देश्य नहीं बना सकते तो केवल इसलिए कि हम स्वाध्याय में प्रमाद करते हैं।

गांधीजी ने अपने जीवन को अनुकरणीय कैसे बनाया, इसका रहस्य समझाते हुए उन्होंने प्रश्नकर्ता को बताया— ‘‘ भगवान श्री कृष्ण, महापुरुष ईसा, दार्शनिक रस्किन और संत टालस्टाय इन चारों से प्रेरणा लेकर मैंने स्वयं को बनाया है। ’’ गांधीजी के इस कथन पर प्रश्नकर्ता को आश्चर्य हुआ, क्योंकि ये चारों ही महापुरूष गांधीजी के समय नहीं थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि गांधीजी ने उन ग्रंथों का स्वाध्याय किया था, जिनमें इन महापुरूषों के विचार संग्रहीत हैं।

संसार में रहकर कर्म करते हुए भी विरक्त और योगी के समान रहा जा सकता है। यह प्रेरणा गांधीजी को भगवत् गीता से मिली। गांधीजी ने कहा भी कि ‘‘दलितों से प्रेम, उनकी सेवा और उनके उद्धार की प्रेरणा मुझे बाइबिल से मिली। मेरे विचारों में प्रौढ़ता आई। रस्किन के विचारों को पढ़कर और टालस्टाय की पुस्तक ‘द किंगडम ऑफ गाड विद इन यू’ को पढ़कर मैंने अपने जीवन को बदला।’’

इस तरह स्वाध्याय में प्रमाद न करते हुए सद्ग्रंथों के रूप में महापुरूषों द्वारा छोड़े गए खजाने को लेकर अपनी दरीद्रता समाप्त कर मानवता से परिपूर्ण होकर सार्थक मानव बनो। निष्कर्ष यह कि महान दार्शनिकों, अन्वेषी सिद्ध तपस्वियों और महापुरुषों के प्रचण्ड परिश्रम से उपार्जित, उपलब्ध अमूल्य रत्न राशि सहज ही हाथ लग जाना हमारा सौभाग्य है। इस सौभाग्य का लाभ वे ही उठा सकते हैं, जो स्वाध्याय का महत्त्व समझते हैं।

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स्वाध्याय साक्षात् सरस्वती की उपासना—

आप सरस्वती की कितनी ही उपासना करें। ब्राह्मी मंत्र का जाप रात—दिन करते रहें। ब्राह्मी बूटी, शंखपुष्पी और बादाम घोट—घोटकर नित्य पीयें पर स्वाध्याय के बिना सरस्वती की कृपा आप पर नहीं होगी।

सरस्वती वाणी की देवी है। कुछ वक्ता ऐसा धाराप्रवाह बोलते हैं कि सुनने वाले कहते हैं कि उसकी जिव्हा पर सरस्वती विराजमान है अथवा उसे तो वागीश्वरी सरस्वती सिद्ध है। लेकिन इस चमत्कार का कारण सरस्वती की कृपा नहीं, स्वाध्याय है। यदि आप अहमदाबाद जाना चाहते हैं और दिल्ली जाने वाली गाड़ी में बैठ गए तो कभी अहमदाबाद नहीं पहुँच सकते। हैलीकाप्टर उतारने के लिए हैलीपैड बनाना पड़ता है। सरस्वती की कृपा प्राप्त करने के लिए भी स्वाध्याय का आधार अनिवार्य है।

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काव्य शास्त्र विनोदेन कालोगच्छति धीमताम् —

सूक्ति के अनुसार श्रेष्ठ बुद्धिमान पुरूषों का समय काव्य—शास्त्र की चर्चा के विनोद में बीतता है। स्वाध्याय करने वाले जब एक जगह बैठेंगे तो शास्त्र—वाणी और शास्त्र —चिंतन की चर्चा का सत्संग करेंगे और वही चर्चा उनका मनोविनोद भी होगी। तत्व —शोध भी बनेगी। स्वाध्याय एक साथ कई काम करता है। उससे अन्त: करण निर्मल होता है। उससे भीतर के कपाट खुल जाते हैं। स्वाध्याय से अन्तश्चेतना जागती है तो स्वाध्यायकर्ता आत्मा—परमात्मा के प्रति जिज्ञासु बन जाता है। उसकी चेतना ऊध्र्वमुखी होकर उसी ओर बढ़ती है। आध्यात्मिक अनुभूतियों का प्रस्फुटन स्वाध्याय से होता है। स्वाध्याय ऐसा अमृत है जिसे पीकर मनुष्य, मनुष्य बन जाता है।

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स्वाध्याय में नियमितता आवश्यक —

जीवन में बहुत—से काम नियमित होते हैं, जैसे मंजन , स्नान, भोजन आदि। ये सभी काम जीवन की सहज क्रिया बन जाते हैं। उसी प्रकार हमारा स्वाध्याय भी नियमित होना चाहिए। अपनी दिनचर्या में स्वाध्याय को भी जोड़ लेना चाहिए। चौबीस घंटे का समय सभी को मिला है। इस समय में से घंटे दो घंटे का अपनी सुविधा का कोई समय स्वाध्याय के लिए निश्चित कर लें कि भले ही एक दिन का भोजन छूट जाए पर स्वाध्याय न छूटे।

कभी—कभी तो स्वाध्याय का अवसर स्वत: आ जाता है। ऐसे अवसर को कभी न चूके और ऐसे अवसरों पर नियमित स्वाध्याय के अलावा अतिरिक्त स्वाध्याय भी करें। जैसे आप किसी से मिलने गए और वह घर पर नहीं मिला तथा आपको वहाँ बैठकर घंटे भर उसके आने का इंतजार करना है तो इस एक घंटे में आप स्वाध्याय करें। इससे इंतजार का एक घंटा अखरेगा नहीं। एक घंटा यों ही बीत जाएगा और आपको स्वाध्याय का लाभ भी मिलेगा।

यदि सौ काम छोड़कर भोजन जरूरी है तो हजार काम छोड़कर स्वाध्याय जरूरी है। आप हजार काम छोड़कर स्वाध्याय कीजिए। भोजन से बना आपका शरीर तो यहीं रह जाएगा पर स्वाध्याय से प्राप्त ज्ञान आपके साथ जायेगा और दूसरे जन्म में भी आपको लाभ पहुँचाएगा। वहाँ बिना परिश्रम किये आपके ज्ञान की खिड़कियाँ खुलती जायेंगी। विचार कीजिए, भोजन इसी लोक में काम आता है, पर स्वाध्याय से लोक—परलोक दोनों बनते हैं। अभिप्राय यह कि जीवन के सभी कामों से स्वाध्याय ज्यादा जरूरी है। जब आप एक दिन का भोजन नहीं भूल सकते तो एक दिन का स्वाध्याय भी मत भूलिए। इसे जीवन का अभिन्न अंग बना लीजिए। एक स्वाध्याय ही आपको अच्छा वकील, अच्छा वक्ता, अच्छा लेखक, अच्छा कथावाचक, अच्छा पत्रकार, अच्छा विचारक, अच्छा परामर्शदाता, अच्छा अध्यापक, अच्छा साधक, श्रेष्ठ तत्त्वान्वेषी और श्रेष्ठ तत्ववेत्ता बना सकता है। अच्छा भविष्यवेत्ता और अच्छा ज्योतिष स्वाध्याय ही बना सकता है। स्वाध्याय के बल पर ही आप व्याकरणाचार्य और ज्योतिषाचार्य बन सकते हैं। स्वाध्याय से आप सफल व्यक्तित्व के धनी मानव बनेंगे। इस तरह स्वाध्याय मानव—जीवन का सर्वस्व है।

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स्वाध्याय किसका करें—

यहाँ बार—बार इस बात पर ध्यान दिलाया जा रहा है कि स्वाध्याय सद्ग्रंथों का होना चाहिए, क्योंकि सद्ग्रंथों के स्वाध्याय से ही शंका और संशयों का समाधान होगा। जिज्ञासा को तृप्ति मिलेगी। स्वाध्याय से इतना मानसिक बल मिलता है कि विपत्ति और संकटों में भी हँसते—मुस्कुराते जीया जा सकता है। जीवन में चिंता, भय आदि दूर होंगे। स्वाध्याय के सम्बन्ध में योगशास्त्र का कथन है—

स्वाध्यायाद् योगमासीत योगाद् स्वाध्यायमामनेत् ।
स्वाध्याय—योग—सम्पत्या परमात्मा प्रकाशते।।

अर्थात् स्वाध्याय से योग की उपासना करें और योग से स्वाध्याय का अभ्यास करें। स्वाध्याय की सम्पत्ति से परमात्मा का साक्षात्कार होता है। सद्ग्रंथों अथवा आर्ष ग्रंथों के स्वाध्याय से हमारी आत्मा की सोई हुई शक्तियाँ जाग्रत होती हैं और हमारा जीवन सुखप्रद, सार्थक, सरस, उपादेय और मोक्षगामी होगा। महाभारत में व्यासजी ने घोषणा की कि नित्य स्वाध्याय करने वाला व्यक्ति दुखों से पार हो जाता है। यथा —नित्यं स्वाध्यायशीलश्च दुर्गतिं तरन्ति ते।

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स्वाध्याय का आधार: सत्साहित्य और पुस्तके :

पुस्तकों के अभाव में सत्साहित्य और सत्साहित्य के अभाव में स्वाध्याय की कल्पना तक नहीं की जा सकती। यह सही है कि सत्संग, प्रवचन और उपदेश से भी ज्ञानार्जन होता है, लेकिन सत्संग—प्रवचन करने और उपदेश देने वाले ज्ञानी, संत, महात्मा और महापुरूष पहले सद्ग्रंथों का स्वाध्याय करते हैं और तभी वे अपने को इतना योग्य बना पाते हैं कि अपनी अमृतवाणी से श्रोताओं को तृप्त कर सके।

बहुत से योगी ध्यानस्थ होकर अपने अन्त:करण से ज्ञान जाग्रत करके ज्ञानोपदेश देते हैं। वे भी अपने कथन की पुष्टि के लिए सद्ग्रंथों में उद्धृत विचारों का उदाहरण देते हैं। अत: स्वत: जाग्रत ज्ञानियों को भी उदाहरण देने के लिए सद्ग्रंथों का स्वाध्याय करना आवश्यक हो जाता है। अभिप्राय यह कि स्वाध्याय और पुस्तकों की आवश्यकता सभी को होती है।

पुराने समय में श्रुत परम्परा से ज्ञान को सुरक्षित रखा जाता था। इसीलिए वेदों को ‘श्रुति’ कहा गया। इतने पर भी सुनकर याद रखने से ज्ञान सुरक्षित नहीं रह सका और वेदों को भी पुस्तक रूप में लिपिबद्ध करके रखना पड़ा। जैन आगमों को भी ‘श्रुत’ कहा जाता है। तीर्थंकर भगवान प्रवचन करते हैं। वे शास्त्रों की रचना नहीं करते। उनके ज्ञान रूपी फूल वर्षते हैं। उन वचन रूपी फूलों को चुन—चुनकर गणधर देव शास्त्रों की रचना करते हैं। वह तीर्थंकर भगवान की वाणी से सुना होने के कारण ‘श्रुत ज्ञान’ कहलाता है। यदि पुस्तकों का सृजन न हुआ होता तो आज हम सभी ज्ञान से वंचित रह जाते । जब मुद्रण कला का आविष्कार नहीं था तो हाथों से एक पुस्तक की कई कई प्रतियाँ तैयार की जाती थीं।

गीता के महान भाष्यकार लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के जीवन की एक घटना है। किशोर अवस्था में उनका एक समृद्ध— सम्पन्न मराठा परिवार की कन्या के साथ विवाह हो गया। उस समय बड़े श्रीमंत परिवारों में दहेज देने की बड़ी प्रतिस्पर्धा चलती थी। जो जितना ज्यादा दहेज देता उसका उतना ही बड़ा नाम होता।

तिलक जब दूल्हा बनकर बैठे थे तो उनके ससुर ने पूछा—‘‘ आपको दहेज में क्या—क्या चाहिए?’’ युवक तिलक ने कहा— ‘‘कुछ भी नहीं चाहिए।’’ बार—बार आग्रह करने पर उन्होंने कहा— ‘‘ यदि आप देना ही चाहें तो गीता, रामायण , ज्ञानेश्वरी जैसी कुछ अच्छी पुस्तके दे दीजिए। मेरे जीवन को सुखी बनाने के लिए वे ही काफी हैं।

आप क्या पढ़ते हैं ? आप पढ़ते हैं या नहीं, महत्त्व इसका नहीं है। महत्त्व तो इसका है कि आप क्या पढ़ते हैं? यही कारण है कि अश्लील साहित्य और कुसाहित्य ने कितनों को नीचे गिरा दिया और सत्साहित्य के स्वाध्याय से कितने ही व्यक्ति ऊपर उठ गए। बर्नाडशा ने कहा है—‘‘ पढ़ना तो सब जानते हैं, लेकिन क्या पढ़ना है, इसे कोई नहीं जानता।’’ अच्छी पुस्तकों की पहचान बताते हुए एमो.ब्रासन अल्काट ने कहा है—‘‘ अच्छी किताब वह है जो आशा से खोली जाए और लाभ से बन्द की जाए। ’’ ओडोर पार्कर का कथन है—‘‘ जो पुस्तके हमें अधिक विचारने को बाध्य करती हैं, वे ही हमारी सच्ची सहायक है।’’

सत्साहित्य का चुनाव अधिक कठिन नहीं है। अच्छे पाठकों, विद्वानों आदि से परामर्श कर अच्छी पुस्तकों की जानकारी की जा सकती है। श्रेष्ठ प्रकाशकों की सूची देखकर चयन किया जा सकता है। कुछ पुस्तके तो अमर साहित्य के अन्तर्गत आती हैं। उन्हें धर्मग्रंथ , व्याख्या ग्रंथ, टीका, भाष्य आदि धर्म साहित्य के रूप में जाना जाता है। अभिप्राय यह है कि सदा सत्साहित्य ही पढ़ना चाहिए। कूड़ा—कचरा पढ़कर अपने दिमाग को कूड़ादान बनाने से कोई लाभ नहीं। आप अपने घर या ड्राइंगरूम में फूलों के सुगंधित गुलदस्ते सजाना चाहते हैं या रास्ते में पड़ा कूड़ा ? साहित्य के विषय में भी यही समझ होनी चाहिए। घर की अलमारी में श्रेष्ठ और उच्चकोटि की पुस्तके होने पर घर की शोभा है। ड्राइंगरूम की शोभा है और आपके व्यक्तित्व की छवि भी अनूठी बनती है।

जैन जागृति अगस्त , २०१४