ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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आस्रव स्वरूप और कारण

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आस्रव स्वरूप और कारण

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संसार—भ्रमण के प्रमुख हेतु आस्रव और बन्ध हैं। कारण के बिना कार्य की उत्पत्ति नहीं हाती है। इसलिए संसाररूपी कार्य को जानने के लिए उसके कारण आस्रव एवं बन्ध को जानना आवश्यक है। आस्रव पूर्वक बन्ध होता है आस्रव को समझने के लिए आस्रव के कारणों पर विचार किया जा रहा हैं गीले वस्त्र में आने वाली धूल की तरह कषाय के कारण आत्मा में कर्मों का चिपकाव होता है। गीला कपड़ा जैसे हवा के साथ लाई गई धूलि को चारों ओर से चिपटा लेता है उसी प्रकार कषाय से रञ्जित आत्मा योग के निमित्त से आई हुई कर्मरज को संपूर्ण आत्मप्रदेशों द्वारा खींच लेता है। इसे दूसरे उदाहरण द्वारा भी समझा जा सकता है जैसे वह्नि संतप्त लोहे को पानी में डाला जाय तो वह चारों तरफ से जल को अपने में खींचता है उसी प्रकार कषाय से संतप्त आत्मा योग के द्वारा आई हुई कार्मण वर्गणाओं को चारों तरफ से खींचता है। कर्मों का आत्मा द्वारा ग्रहण करना या कर्मों का आकर्षण ही तो आस्रव है। इसी प्रकार आस्रव को तत्त्वार्थर्वाितककार ने उदाहरण सहित इस प्रकार समझाया है—‘‘तत्प्रणालिकया कर्मास्रवणादास्रवाभिधानं सलिलद्म वाहिद्वारवत्। पद्मसर: सलिलवाहि द्वारं तदास्रवकारणत्वात् आस्रव इत्याख्यायते तथा योगप्रणालिकंया आत्मन: कर्म आस्रवतीति योग आस्रव इति व्यपदेशमर्हति’’ अर्थात् जैसे तालाब के जलागमन द्वार से पानी आता है, वह जलागमन द्वार जल के आने का कारण होने से आस्रव कहलाता है, उसी प्रकार योग—प्रणाली से आत्मा में कर्म आते हैं अत: योग को ही आस्रव कहते हैं।

काय, वचन और मन की क्रिया को योग कहते हैं[१]। यही योग आस्रव कहा है[२] मनोवर्गणा, वचनवर्गणा, कायवर्गणा का आश्रय लेकर योग होता है। जो कर्म के आगमन का कारण है उसकी योग संज्ञा है। सभी योगों को आस्रव नहीं कहते हैं। इसी को स्पष्ट करने हेतु आचार्य उमास्वामी ने ‘‘कायवाङ्मन: कर्म योग:’’ और ‘स आस्रव:’’ दो सूत्रों की रचना की जिनसे ज्ञात होता है कि सभी योग आस्रव नहीं है। इस तथ्य को स्पष्ट करने के लिए आचार्य भास्करनन्दि ने लिखा है ‘‘यदि ऐसा अर्थ इष्ट नहीं होता तो ‘‘कायवाङ् मन: कर्म योग आस्रव:’’ ऐसा एक सूत्र बनता और स शब्द नहीं रहने से सूत्र लाघव होता है एव इष्ट अर्थ भी सिद्ध हो जाता है। सभी योग आस्रवरूप नहीं है। इसका अर्थ यह है कि सयोगकेवली जब केवली समुद्घात करते हैं तब दण्ड, कपाट, प्रतर और लोकपूरण रूप आत्मप्रदेशों का फैलना होता है, इस क्रिया स्वरूप जो योग हैं, वह कर्मबन्ध का कारण नहीं है। यहाँ प्रश्न है कि सयोगी जिनके उस केवली समुद्घात अवस्था में कर्मबन्ध का कारण (अर्थात् आस्रव रूप का समय वाला सातावेदनीय कर्म के बंध का कारण) कौन होता है ? इसका समाधान करते हुए कहा गया है कि काय वर्गणा का आलंबन लेकर जो आत्मप्रदेशों में परिस्पन्द हुआ है उस स्वरूप जो योग है, वह सयोगकेवली के समुद्धात काल में बन्ध का कारण है। अत: तीनों योग एक साथ बन्ध में कारण होते हैं ऐसा नहीं है। इस आस्रव व्यवस्था पर जैनाचार्यों ने ही मुख्यरूप से विचार किया है। जैनदर्शन में विशेष वर्णन है जैसे प्रो. योकोबी ने लिखा है कि आस्रव संवर तीनों शब्द जैनधर्म में विशेष वर्णन है जैसे प्रो. योकीबो ने लिखा है कि आस्रव संवर तीनों शब्द जैनधर्म के समान ही प्राचीन है। बौद्धों ने उनमें से अधिक महत्त्व वाले आस्रव को उघार लिया है। वे इसका उपयोग लगभग इसी भाव में करते हैं परन्तु उसके शब्दार्थ में नहीं करते। क्योंकि वे कर्म को एक वास्तविक पदार्थ नहीं मानते हैं और आत्मा को अस्वीकार करते हैं जिसमें आस्रव का होना संभव है। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि कर्मवाद जैनों का एक मौलिक व महत्त्वपूर्ण वाद है और वह बौद्धधर्म की उत्पत्ति की अपेक्षा प्राचीन हैं

आस्रव तत्त्व का विशद् वर्णन संसार व्यवस्था का परिज्ञान का मुख्य कारण है। इसलिए तात्त्विक विवेचना का मुख्य विषय आस्रव है। इसके ज्ञान के बिना कर्मबन्ध से बचना संभव नहीं है यही कारण है कि आस्रव के स्वरूप और कारण पर विचार करना आवश्यक है। आस्रव में कषाय की भूमिका का महत्त्वपूर्ण स्थान है इसलिए जैनाचार्यों ने कषाय सहित और कषाय रहित जीव की आस्रव व्यवस्था को दिखलाया है। इस विषय में तत्त्वार्थसूत्रकार कहते हैं—सकषाय (कषाय सहित) जीवों के साम्परायिक और अकषाय (कषाय रहित) जीवों के ईर्यापथ आस्रव होता है। स्वामी की विवक्षा से आस्रव की दो प्रकार की प्रसिद्धि है। जो कषाय सहित है वे सकषाय है। इनकी सत्ता दशम गुणस्थान तक है तथा जो—कषाय रहित हैं, वे अकषाय हैं ये दशम गुणस्थान के ऊपर होते हैं। अत: आस्रव के अनन्त भेद होने पर भी सकषाय और अकषाय इन दो स्वामियों की अपेक्षा आस्रव के भी दो प्रकार माने गये हैं—साम्परायिक और ईर्यापथ।

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१. साम्परायिक आस्रव

सम्पराय (संसार) ही जिसका प्रयोजन है, वह साम्परायिक है। क्रोधादिक विकारों के साथ होने वाले आस्रव को साम्परायिक आस्रव कहते हैं। यह आस्रव अनादिकाल से आत्मा में चल रहा है। जब तक कषाय का संबंध रहता है तब तक साम्परायिक आस्रव ही होता है। कषाय स्निग्धता का प्रतीक है। जैसे तेल सिक्त शरीर में धूलि चिपककर लम्बे समय तक चिपकी रहती है, वैसे ही कषाय सहित होने वाला यह आस्रव भी दीर्घकाल तक स्थायी रहता है। इसी को भट्टारक अकलंकदेव ने समझाया है कि सम्पराय कषाय का वाची है। मिथ्यादृष्टि से लेकर सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थान तक कषाय के उदय से आद्र्र परिणाम वाले जीवों के योग के द्वारा आये हुए कर्मभाव से उपइिवष्यपान वर्गणाऐं गीले चर्म या वस्त्र पर आश्रित धूलि की तरह चिपक जाती हैं, उनमें स्थिति बन्ध हो जाता है, वही साम्परायिक आस्रव है।[३] यह चार कषायों पांच अव्रतों और सम्यक्त्व आदि पच्चीस क्रियाओं द्वारा जीव निरन्तर करता है।[४]

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२. ईर्यापथ आस्रव

ईर्यापथ अर्थात् योगगति जो कर्म मात्र योग से ही आते हैं, वे ईर्यापथ आस्रव हैं।[५] सकषाय जीव के साम्परायिक और अकषाय जीव के ईर्यापथ आस्रव होता है। उपशान्तकषाय क्षीणकषाय, क्षीणमोह और सयोगकेवली के योग क्रिया से आये हुए कर्मों का संश्लेषण न होने से सूखी दीवाल पर पड़े हुए धूलि की तरह द्वितीय क्षण में ही झड़ जाते हैं। इस प्रकार की क्रिया ईर्यापथ आस्रव है। कषायों का आस्रव हो जाने के कारण यह दीर्घकाल तक नहीं ठहर पाती। इसकी स्थिति एक समय की होती है। ग्यारहवें से लेकर तेरहवें गुणस्थान तक के जीव कषाय रहित हैं इसलिए उनके अकषायरूप ईर्यापथ आस्रव होता है।

दोनों प्रकार के आस्रव में से कोई भी आस्रव की सत्ता जीव के सत्ता में पायी जाती है तो वह संसारी ही है। संसार में रहते हुए अघातिया कर्मों की स्थिति शेष रहने के कारण जीव बद्ध होता हुआ भी अबद्ध ही है। संसारी मुक्त होने के कारण सयोग केवली अवस्था सकल परमात्मा के पद को भी प्राप्त रहती है। आस्रव संसार अवस्था तक है। उसके अभाव होने पर मुक्तावस्था की प्राप्ति निश्चित है।

जीवों के आस्रव की विशेषता भी पायी जाती है। योग प्रत्येक संसारी जीव के होता है। योग होने पर भी संपूर्ण जीवों के आस्रव समान नहीं होता। क्योंकि जीवों के परिणामों के अनन्त भेद हैं जैसा कहा भी गया है ‘‘णाणा जीवा णाणा कम्माणि णाणविह हवे लद्धि’’[६] अर्थात् संसार में अनेक जीव हैं, उनके कर्म भी अनन्त हैं। इसलिए उनकी लब्धियाँ भी नाना प्रकार की होती हैं। आस्रव की विशेषता के कारणों को दर्शाते हुए उमास्वामी आचार्य लिखते हैं ‘‘तीव्रमन्दज्ञाताज्ञातभावादिकरणवीर्यविशेभ्यस्तद्विशेष:।[७]’’ अर्थात् तीव्रभाव, मन्दभाव, ज्ञातभाव, अज्ञातभव, अधिकरण और वीर्य विशेष के भेद से आस्रव की विशेषता होती है।

आस्रव में उक्त कारणों से विशेषता पायी जाती है, क्योंकि कारण पूर्वक ही कार्य होता है जिस आस्रव का जैसा कारण है, उसके अनुसार ही कर्मास्रव की व्यवस्था निश्चित है। अत: द्रव्यकर्मों के निमित्त से होेने वाले आस्रव को दिखलाने के लिए कर्म की मूल आठ प्रकृतियों ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अन्तराय कर्मों के हेतुओं को दिखलाया जा रहा है—

ज्ञानावरण और दर्शनावरण कर्म के आस्रव के कारण—ज्ञान को जो आवृत करता है, वह ज्ञानावरणीय कर्म हैं और दर्शन गुण का आवरण करने वाला दर्शनावरणीय कर्म है। इन दोनों कर्मों के आस्रव के कारण निह्रव, मात्सर्य, अन्तराय, आसादन और उपघात है[८] इन आस्रव निमित्तों के स्वरूप भट्टाकलंकदवे ने विस्तार से समझाये हैं, उन्हीं के अनुसार प्रस्तुत हैं— प्रदोष—किसी के ज्ञानकीर्तन (ज्ञान की महिमा जानने/सुनने) के बाद मुख से कुछ न कहकर अन्तरंग में पिशुनभाव होना, ताप होना प्रदोष है। मोक्ष की प्राप्ति के साधनभूत मति, श्रुत आदि पांच ज्ञानों की अथवा ज्ञान के धारी की प्रशंसा करने पर अथवा उसकी प्रशंसा सुनने पर मुख से कुछ नहीं कह करके मानसिक परिणामों में पैशून्य होता है अथवा अन्त:करण में उसके प्रति ईष्र्या का भाव होता है, वह प्रदोष कहलाता है। ज्ञानावरणकर्म का आस्रव का कारण है।

निह्नव—दूसरे के अभिसन्धान से ज्ञान का अपलाप करना निह्नव है[९]। यात्किञ्जितपरमित को लेकर किसी बहाने से किसी बात को जानने पर भी मैं इस बात को नहीं जानता हूँ इस प्रकार ज्ञान को छिपाना ज्ञान के विषय में वंचन करना निह्नव है। मात्सर्य—किसी कारण से आत्मा के द्वारा भक्ति, देने योग्य ज्ञान को भी योग्य पात्र के लिए नहीं देना मात्सर्य है। अन्तराय—ज्ञान का व्यवच्छेद करना अन्तराय है। कलुषता के कारण ज्ञान का व्यवच्छेद करना, कलुषित भावों के वशीभूत होकर ज्ञान के साथ पुस्तकादि का विच्छेद करना/नाश करना किसी के ज्ञान में विघ्न डालना अन्तराय है।

उपघात—प्रशस्त ज्ञान में दूषण लगाना उपघात है। स्वकीया बुद्धि और हृदय की कलुषता के कारण प्रशस्त ज्ञान भी अप्रशस्त, युक्त भी अयुक्त प्रतीत होता है। अत: समीचीन ज्ञान में भी दोषों का उद्भापन करना, झूठा दोषारोपण करना उपघात कहलाता है सामान्य रूप से दोनों (उपघात और आसादना) आस्रवों का समान स्वरूप प्रतीत होता है, किन्तु इनमें मूलभूत अन्तर है—आसादना में विद्यमान ज्ञान की विनय प्रकाशन न करना। दूसरे के सामने ज्ञानवान् की प्रशंसा न करना आता है किन्तु उपघात में दूसरे के ज्ञान को अज्ञान मानकर उसके नाश करने का अभिप्राय रखा जाता है।

इनके अतिरिक्त आगम विरुद्ध बोलना, अनादर पूर्वक अर्थ का सुनना अध्ययन में आलस्य, शास्त्र बेचना, आचार्य के प्रतिकूल चलना, धर्म में रुकावट डालना, ज्ञानीजनों का तिरस्कार, धूर्तता का व्यवहार करना ये सब ज्ञानावरण कर्म के आस्रव के कारण हैं।[१०]

ज्ञान के विषय में ऊपर कहे गये प्रदोषादिक यदि ज्ञान—ज्ञानी और उसके साधनों के विषय में किये गये हों तो ज्ञानावरण कर्म के आस्रव होते हैं और दर्शन तथा दर्शन के साधनों के विषय में किये गये हों तो दर्शनावरण कर्म के आस्रव होते हैं। इसके अतिरिक्त नेत्रों का उखाड़ना, बहुत काल तक सोना, दिन में सोना, नास्तिकता का भाव रखना, सम्यग्दृष्टि जीव में दूषण लगाना, कुगुरुओं की प्रशंसा करना और समीचीन तपस्वी गुरुओं में ग्लानि करना दर्शनावरण कर्म के आस्रव हैं। वर्तमान में उक्त ज्ञानावरण और दर्शनावरण कर्म के आस्रव के निमित्तों को श्रावक ने तो परिणामों की मलिनता के वशीभूत होकर अपना ही रखा है। खेद है साधु भी ज्ञान होते हुए भी इन आस्रवों से अपने को नहीं बचा रहा है। सभी का प्रयत्न होना चाहिए कि उक्त निमित्तों से अपने को बचावें।

वेदनीय कर्म—

जीव को जो कर्म सुख अथवा दु:ख का वेदन कराता है, वह वेदनीय कर्म है। मिथ्यात्व आदि प्रत्ययों के वश से कर्म पर्याय में परिणत और जीव के साथ समवाय संबंध को प्राप्त सुख—दु:ख का अनुभव करने वाले पुद्गल स्कन्ध ही वेदनीय नाम से कहे जाते हैं।[११] वेदनीय कर्म को समझाने के लिए शहद लिपटी तलवार का उदाहरण दिया जाता है। जिस प्रकार मधुलिप्त खड्ग की धार को चाटने से पहले अल्प सुख और फिर अधिक दु:ख होता है। अर्थात् जिह्वा कट जाने पर तीव्र वेदना होती है। उसी प्रकार पौद्गालिक सुख में दु:खों की अधिकता होती है।[१२] सुख के कारणभूत साता वेदनीय और दु:ख के कारणभूत असाता वेदनीय कर्म है।

असाता वेदनीय कर्म के आस्रव के कारण—अपने या दूसरे में या दोनों में विद्यमान दु:ख, शोक, ताप, आक्रन्दन, वध और परिदेवन ये असातावेदनीय कर्म के आस्रव के कारण हैं। पीड़ा लक्षण परिणाम को दु:ख कहते हैं। अनुग्राहक के संबंध का विच्छेद होने पर वैकल्य विशेष शोक कहलाता है। परिवादादि निमित्त के कारण कलुश अन्त:करण का तीव्र अनुशयताप है। परिताप से उत्पन्न अश्रुपात, प्रचुर विलाप आदि से अभिव्यक्त होने वाला क्रन्दन ही अक्रन्दन है। आयु, इन्द्रिय, बल, श्वासोच्छ्वास आदि का वियोग करना वध है। अतिसंक्लेश पूर्वक स्व—पर अनुग्राहक, अभिलषित विषय के प्रति अनुकम्पा—उत्पादक रोदन परिवेदन है।[१३]

क्रोधादि के आवेश से दु:खादि आत्मा पर उभयस्थ होते हैं। ये दु:ख, शोक, ताप, अक्रन्दन, वध और परिवेदन स्व—पर और उभय में होते हैं। जब क्रोधादि से आविष्ट आत्मा अपने में दु:ख शोकादि उत्पन्न करता है, तब वे क्रोधादि अभ्यस्त होते हैं और जब समर्थ व्यक्ति कषायवश पर ये दु:खादि उत्पन्न करता है, तब वे परस्थ होते हैं और जब साहूकार कर्ज लेने वाले से ऋण वसूल करने आते हैं तब तज्जनित भूख—प्यास आदि के कारण दु:खित होते हैं, वे उभयस्थ होते हैं।

प्रश्न यह है कि असाता वेदनीय के आस्रव निमित्त उक्त ही हैं और भी हो सकते हैं। इसका समाधान करते हुए आचार्य अकलंकदेव लिखते हैं—‘‘इन कारणों के अतिरिक्त अन्य कारण इस प्रकार है—अशुभ प्रयोग, पर परिवाद, पैशून्य, अनुकम्पा का अभाव, परपरिताप, अंगोपांगच्छेद, भेद, ताडन, त्रासन, तर्जन, मत्र्सन, लक्षण, विशंसन, बन्धन, रोधन, मर्दन, दमन, शरीर को रूखा कर देना, परनिन्दा, आत्मप्रशंसा, संक्लेशप्रादुर्भावन, निर्दयता, हिसा, महारम्भ, अधिक परिग्रह का अर्जन, विश्वासघात, कुटिलता, पापकर्म जीवित्व, अनर्थदण्ड, बाण पाश यन्त्र आदि दु:ख शोकादि से गृहीत होते हैं। ये स्व—पर और उभय में रहने वाले दु:खादि परिणाम निश्चित रूप से असाता वेदनीय के आस्रव के कारण हैं।[१४] पर की तरह अपनी बुद्धि से अपनी वस्तु का त्याग करना दान है। उपकार भावना से अपनी वस्तु अर्पण करना दान है।

सातावेदनीय कर्म के आस्रव के कारण—भूतानुकम्पा, व्रत्यनुकम्पा, दान, सराग संयम, योग, क्षान्ति और शौच सातावेदनीय के आस्रव हैं। इनको इस प्रकार समझना चाहिए। आयुकर्म के उदय से होने वाले भूत है अर्थात् संपूर्ण प्राणी भूत कहलाते हैं किसी प्यासे, भूखे, दु:खी प्राणी को देखकर जो वास्तव में जीव का मन दु:खित होता है उसे प्राणियों की कृपा कहते हैं, वही अनुकम्पा है। व्रतियों पर अनुकम्पा रखना व्रत्यनुकम्पा है। सरागी की अशुभ कर्मों से निवृत्ति सराग संयम है। क्रोधादि कषायों की शुभ परिणाम भावनापूर्वक निवृत्ति करना शान्ति है। स्वद्रव्य का ममत्व नहीं छोड़ना, दूसरे के द्रव्य का अपहरण करना, धरोहर को हड़पना आदि लोभ के अन्तर्गत आते हैं। उपर्युक्त लोभ के उपरम (त्याग) को शौच कहा जाता है। इन सभी शुभ क्रियाओं से व्यक्ति सातावेदनीय कर्म का आस्रव करता है जिसके बन्ध से जीव सुखी होता है।

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मोहनीय कर्म के आस्रव के कारण

जिसके द्वारा मोहा जाता है वह मोहनीय कर्म है। जैसे धतूरा, मदिरा, कोदों आदि का सेवन करने से व्यक्ति र्मूिच्छत सा हो जाता है, इसमें इष्ट—अनिष्ट, हेय—उपादेय को जानने का विवेक नहीं रहता उसी प्रकार मोहनीयकर्म प्राणियों को इस प्रकार मोहित कर देता है कि जीव को पदार्थ का यथार्थ बोध होने पर भी वह तदनुसार कार्य नहीं कर पाता। मोहनीयकर्म सभी कर्मों में प्रधान कर्म माना गया है क्योंकि इसके अभाव में शेष कर्मों का सत्त्व असत्त्व के समान हो जाता है। जन्म—मरण की परंपरा रूप संसारोत्पादन की सामथ्र्य मोहनीय के अभाव में अन्य कर्मों की नहीं रहती। यह मोहनीय कर्म दर्शन मोहनीय और चरित्र मोहनीय भेद की विवक्षा से दो प्रकार का है।

आत्मा, आगम या पदार्थों में रुचि या श्रद्धा को दर्शन कहते हैं। उस दर्शन को जो मोहित करता है अर्थात् विपरीत कर देता है उसे दर्शन मोहनीय कर्म कहते हैं। गुणवान् और महत्त्वशालियों में अपनी बुद्धि और हृदय की कलुषता से अविद्यमान दोषों का उद्भावन करना अवर्णवाद है। अथवा जिसमें जो दोष नहीं है उनका उसमें उद्भावन करना अवर्णवाद है। केवली, श्रुत, संघ, धर्म और देवों का अवर्णवाद (अविद्यमान दोषों का प्रचार) दर्शन मोहनीय कर्म के आस्रव के कारण हैं।

इन्द्रिय और क्रम के व्यवधान से रहित ज्ञान वाले केवली होते हैं। मोह राग द्वेषादि दोषों से रहित केवली के द्वारा कथित और बुद्धि आदि ऋद्धियों के अतिशयों के धारी गणधर के द्वारा अवधारित श्रुत कहा जाता है। रत्नत्रय से युक्त मुनियों का समूह संघ कहलाता है। सर्वज्ञ द्वारा प्रतिपादित आगम में उपदिष्ट अिंहसा आदि का आचरण धर्म है। दिव्यता के धारक देव होते हैं। उक्त की निन्दा अवर्णवाद से ही जीव मिथ्यात्व का बन्ध करता रहता है।

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चारित्र मोहनीय के आस्रव के कारण

आत्मस्वरूप में आचरण करना चारित्र है उसका घात करने वाला कर्म चारित्र मोहनीय है। चारित्रमोह का कार्य आत्मा को चारित्र से च्युत करना है। क्योंकि कषायों के उद्रेक से ही आत्मा चारित्र से च्युत होता है कषायों के अभाव में नहीं। कषाय के उदय से होने वाले तीव्र परिणाम चारित्र मोहनीय कर्म के आस्रव के कारण हैं। चारित्र मोहनीय कषाय वेदनीय और अकषाय वेदनीय रूप होता है। कषाय वेदनीय अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान, संज्वलन के भेद से चार प्रकार की है फिर प्रत्येक के क्रोध, मान, माया, लोभ चार प्रकार होने से १६ प्रकार का होता है। अकषाय को नोकषाय भी कहा गया है। यह हास्य, रति अरति शोक, भय जुगुप्सा, पुंवेद, स्त्रीवेद, नपुसंकवेद के भेद से नौ प्रकार का है। जगदुपकारी, शीलव्रती, तपस्वियों की निन्दा करना, धर्म का ध्वंस करना, धार्मिक कार्यों में अन्तराय करना, किसी को शीलगुण, देश संयम ओर सकल संयम से च्युत करना, मद्य—मांस आदि से विरक्त जीवों को उनसे विचकाना, चारित्र और चारित्रधारी में दूषण लगाना, संक्लेश उत्पादक वेषों और व्रतों को धारण करना, स्व—पर में कषायों का उत्पादन आदि क्रियाएं एवं भाव कषाय वेदनीय के आस्रव के कारण हैं। उक्त निमित्तों को व्यक्ति सहज में जोड़ता रहता है जिससे चारित्र मोहनीय कर्म का बन्ध होता है। इन कारणों को जानकर जो सतत इनसे बचने का उपाय सोचता है और बचता है, वही मोक्षमार्ग पर बढ़ पाता है।

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आयुकर्म—

जो कर्म जीव को नरक, तिर्यञ्च, मनुष्य और देव में से किसी शरीर में निश्चित अवधि तक रोके रखता है, उस अवधारण के निमित्त कर्म को आयुकर्म कहते है४। आयुकर्म का उदय जीव को उसी प्रकार रोके रखता है जिस प्रकार एक विशेष प्रकार की सांकल या काष्ठ का फन्दा अपने छिद्र में पग रखने वाले व्यक्ति को रोके रखता है। आयुकर्म के चार भेद हैं नरकायु, तिर्यञ्चायु, मनुष्यायु, देवायु। बहुत आरंभ और बहुत परिग्रह रखने का भाव नरकायु का आस्रव का कारण है।

[१५] इसके अलावा हिसा आदि की निरन्तर प्रवृत्ति, दूसरे के धन अपहरण का भाव इन्द्रियों के विषयों की अति आसक्ति, मरते समय कृष्णलेश्या और रौद्रध्यान का होना आदि भी नरकायु के आस्रव के निमित्त हैं।[१६] चारित्र मोह के उदय से कुटिल भाव होता है, वह माया है। मायाचार करना ही तिर्यञ्चायु के आस्रव में निमित्त बनता है। तत्त्वार्थर्वाितकार ने विस्तार से बताया है ‘‘मिथ्यात्व युक्त अधर्म का उपदेश, अतिवञ्चना, कूटकर्म, छल—प्रपंच की रुचि, परस्पर फूट डालना, अनर्थोद्भावन, वर्ण, रस, गन्ध आदि को विकृत करने की अभिरूचि, जातिकुलशीलसंदूषण, विसंवाद में रुचि, मिथ्या जीवित्व, किसी के सद्गुणों का लोप, असद्गुणख्यापन, नील एवं कापोत लेश्या के परिणाम आत्र्रध्यान और मरणकाल में अत्र्तरौद्र परिणाम इत्यादि तिर्यञ्चायु के आस्रव के कारण हैं।[१७]

अल्प आरंभ और अल्प परिग्रह मनुष्यायु के आस्रव के कारण हैं।[१८] विस्तार से इस प्रकार जानना चाहिए—मिथ्यादर्शन सहित बुद्धि, विनीत स्वभाव, प्रकृतिभद्रता, मार्दव—आर्जव परिणाम, अच्छे आचरणों में सुख मानना रेत की रेखा के समान क्रोधादि सरल व्यवहार, अल्पारंभ, अल्पपरिग्रह, संतोष में रति, िंहसा से विरक्ति, दुष्ट कार्यों से निवृत्ति, स्वांगत तत्परता, कम बोलना, प्रकृति मधुरता, सबके साथ उपकार बुद्धि रखना, औदासीन्यवृत्ति, ईष्र्या रहित परिणाम, अल्पसंक्लेश, गुरु देवता अतिथि की पूजा सत्कार में रुचि, दानशीलता, कापोत—पीतलेश्या के परिणाम सराग संयम से धर्मध्यान परिणति आदि लक्षण वाले परिणाम मनुष्यायु के आस्रव के कारण हैं।[१९]

मनुष्य भव धारण की चाह वालों को उक्त कार्य ही करना चाहिए, जिससे मनुष्यायु का आस्रव हो और बन्ध हो। आयुबन्ध होने पर छूटता नहीं है अत: मनुष्यायु प्राप्त होगी ही होगी। सरागसंयम, संयामासंयम, अकाम, और बालतप ये देव आयु के आस्रव के कारण हैं।[२०] पांच महाव्रतों के स्वीकार कर लेने पर भी रागांश का बना रहना सरागसंयम है। इसका सद्भाव दशवें गुणस्थान तक है। व्रताव्रत रूप परिणाम संयमासंयम है। इसके निमित्त से गृहस्थ के त्रस िंहसा से विरति रूप और स्थावर हिसा से अविरतिरूप परिणाम होते हैं। परवशता के कारण भूख—प्यास की बाधा सहना, ब्रह्मचर्य पालन, जमीन पर सोना, मल—मूत्र को रोकना आदि अकाम कहलाता है और इस कारण जो निर्जरा होती है, वह अकाम निर्जरा है। बाल अर्थात् आत्मज्ञान से रहित मिथ्यादृष्टि व्यक्तियों का पञ्चाग्नितप, अग्निप्रवेश, नख—केश का बढ़ाना, ऊध्र्वबाहु होकर खड़े रहना, अनशन अर्थात् कषायवश भूखे रहना बाल तप है। सम्यक्त्व भी देवायु के आस्रव का कारण है।[२१] अर्थात् सम्यक्त्व के सद्भाव में देवायु का बंध है।

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नामकर्म के आस्रव के कारण

आत्मा के नमाने वाला अथवा जिसके द्वारा आत्मा नमता है, उस कर्म को भी नामकर्म कहा जाता है। नमन रूप स्वभाव के कारण ही यह कर्म जीव के शुद्ध स्वभाव को आच्छादित करके उसका मनुष्यत्व, तिर्यञ्चत्व, देवत्व और नारकादि पर्याय भेद को उत्पन्न करता है। जीव को शुभकार्यों में शुभनामकर्म और अशुभकार्यों से अशुभनामकर्म का आस्रव/बन्ध होता है।मन, वचन और काय की कुटिल वृत्तिरूप योगवक्रता तथा विसंवादन ये अशुभनामकर्म के आस्रव के कारण हैं। मन में कुछ सोचना, वचन से दूसरे प्रकार से कहना और काय से भिन्न से ही प्रवृत्ति कराना, वस्तु के स्वरूप का अन्यथा प्रतिपादन करना अर्थात् श्रेयोमार्ग पर चलने वालों को उस मार्ग की निन्दा करके बुरे मार्ग पर चलने को कहना विसंवादन है।७ जैसे कोई पुरुष सम्यक् अभ्युदय ओर निश्रेयस् की कारणभूत क्रियाओं में प्रवृत्ति कर रहा है। उसे मन वचन, काय के द्वारा विसंवाद कराता है कि तुम ऐसा मत करो, ऐसा करो इत्यादि प्रवृत्ति ही विसंवादन है। ये अशुभनामकर्म के आस्रव के कारण है, इससे शरीर आदि की रचना, वर्ण आदि खोटे मिलते हैं अत: ऐसे कार्यों से बचना चाहिए।

योग की सरलता और अविसंवादन ये शुभनाम के आस्रव है। अथवा मन वचन काय की सरलता और अविसंवादन शुभनामकर्म के आस्रव के कारण है। धर्मात्मा पुरुषों के दर्शन करना, आदर सत्कार करना, उनके प्रति सद्भाव रखना संसारभीरुता, प्रमाद का त्याग, निश्छल चारित्र का पालन आदि भी शुभ नामकर्म के आस्रव के कारण हैं। शुभनामकर्म प्रकृतियों में सर्वश्रेष्ठ तीर्थंकर प्रकृति है अत: इसके आस्रवकारण स्वतंत्र रूप से र्विणत करते हैं—दर्शन विशुद्धि, विनय संपन्नता, शील और व्रतों में अतिचार नहीं लगाना, अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग, संवेग, यथाशक्तित्याग, यथाशक्ति तप, साधुसमाधि, वैयावृत्यकरण, अर्हद्भक्ति, आचार्यभक्ति, बहुश्रुतभक्ति, प्रवचनभक्ति, आवश्यकों को नहीं छोड़ना, जिनमार्ग की प्रभावना करना, और प्रवचन वत्सलता ये तीर्थंकर प्रकृति के आस्रव के कारण कहे गये हैं। इन पर ग्रंथों में विस्तार से चर्चा है। यहाँ स्थान और आलेख विस्तारभय से पृथक्—पृथक् को स्पष्ट नहीं किया जा रहा है। उक्त नामकर्म के आस्रव कारणों को जानकर मानव को अगले भव सुधार हेतु प्रवृत्ति करना ही श्रेयस्कर है।

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गोत्र कर्म के आस्रव के कारण

सन्तान क्रम से चले आने वाले जीव के आचरण को गोत्र संज्ञा दी गई है। जैसे कुम्हार छोटे अथवा बड़े घड़ों को बनाता है वैसे ही गोत्रकर्म जीव को उच्च अथवा नीच कुल में उत्पन्न करता है। नीच और उच्च के भेद से गोत्र दो प्रकार का है।

जिसके द्वारा आत्मा नीच स्थान में पायी जाती है या जिससे आत्मा नीच व्यवहार में आती है, वह नीच गोत्र है। दूसरों की निन्दा करना, अपनी प्रशंसा करना, दूसरों के सद्गुणों का छादन तथा अपने अविद्यमान गुणों का उद्भावन करना, नीच गोत्र के आस्रव के निमित्त है। इनके अतिरिक्त अपनी जाति, कुल,बल, रूप, विद्या, ऐश्वर्य, आज्ञा और श्रुत का गर्व करना, दूसरों की अवज्ञा व अपवाद करना, दूसरों की खोज को अपनी बताना, दूसरों के श्रेय पर जीना आदि ये नीच गोत्रकर्म के आस्रव के कारण हैं। इनको जानकर इनसे बचना श्रेयस्कर है।

नीच गोत्र के आस्रव के कारणों के विपरीत कारण (आत्मनिन्दा[२२], परप्रशंसा[२३], परसद्गुणोंद्भावन, आत्मसद्गुण आच्छादन) गुणीजीवों के प्रति नम्र वृत्ति, अहंकार का अभाव तथा उद्दण्ड स्वभाव नहीं होना, ये सब उच्च गोत्र के आस्रव के कारण हैं।[२४] उपरोक्त कारणों के अतिरिक्त कुछ और उच्च गोत्र के निमित्त हैं—जैसे जाति, कुल, बल, सौन्दर्य, वीर्य, ज्ञान, ऐश्वर्य और तपादि की विशेषता होने पर भी अपने में अहंकार का भाव नहीं आने देना, पर का तिरस्कार नहीं करना, उद्दण्ड नहीं होना, पर की निन्दा नहीं करना, किसी से अशुभ, किसी का उपहास, बदनामी आदि नहीं करना, मान नहीं करना, धर्मात्माओं का सम्मान करना, विशेष गुणी होने पर भी अहंकार नहीं करना, निरहंकार नम्रवृत्ति, भस्म से ढकी हुई अग्नि की तरह अपने ढके हुए माहात्म्य का प्रकाशन नहीं करना और धार्मिक साधनों में अत्यन्त आदरबुद्धि रखना आदि कार्यों से भी उच्च गोत्र का आस्रव होता है। अत: उक्त कार्य की प्रवृत्ति बहुत श्रेष्ठ है, उसे करना चाहिए।

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अन्तराय कर्म के आस्रव के कारण

अन्तराय शब्द का अर्थ विघ्न है। अन्तर अर्थात् मध्य में—विघ्न बनकर आने वाला कर्म अन्तरायकर्म कहलाता है।६ यह कर्म भण्डारी की तरह जीव के दान लाभ आदि कार्यों में बाधक बन जाता है। बाधक बनना या विघ्न डालना अन्तरायकर्म का आस्रव का कारण है।</ref>तत्त्वार्थर्वाितक ६/१५/१३</ref> दान, लाभ, भोग, उपभोग और वीर्य में बाधा अन्तराय के आस्रव हैं। इनके अतिरिक्त ज्ञान का प्रतिषेध, सत्कारोपघात, स्नान, आभूषण, भक्ष्य आदि कार्यों में विघ्न करना, किसी के वैभव समृद्धि में विस्मय करना, द्रव्य का त्याग नहीं करना, द्रव्य के उपयोग के समर्थन में प्रमाद करना, देवता के लिए निवेदित किये गये या अनिवेदित किये गये द्रव्य का ग्रहण करना, देवता का अवर्णवाद करना, निर्दोष उपकरणों का त्याग, दूसरों की शक्ति का अपहरण, धर्म का व्यवच्छेद करना, दीक्षित को दिए जाने वाले दान को रोकना, कृपण, दीन, अनाथ आदि को दिए जाने वाले वस्त्र, पात्र, आश्रय आदि को रोकना, प्राणिवध आदि अन्तरायकर्म के आस्रव के कारण हैं।

उक्त कारणों को जानकर दूसरों के बाधा पहुँचाने वाले कार्यों को नहीं करना चाहिए क्योंकि दूसरों को बाधाकारक कार्यों के करने से स्वयं को अगले भवों में हानि उठानी पड़ती है। यहाँ कर्म की मूल प्रकृतियों के आस्रव के कारणों पर जो विशद चर्चा की है उसका मुख्य ध्येय यह है कि आस्रव और बन्ध दोनों ही संसार के हेतु हैं। इनको जानकर ही प्राणी संसारवृद्धि के कार्यों से अपनी रक्षा कर सकता है।



[सम्पादन] टिप्पणी

  1. कायवाङ् मन:कर्म योग:। तत्वार्थसूत्र ६/१
  2. स: आस्रव: १–तत्त्वार्थसूत्र ६/२
  3. सकषायकषाययो: साम्पराययिकेर्यापथयो:। तत्त्वार्थसूत्र ६/४
  4. तत्त्वार्थर्वाितक ६/४ पृष्ठ २५८ (भाग—२)
  5. इन्द्रियकषायव्रतक्रिया: पञ्चचतु:पञ्चिंवशतिसंख्या पूर्वस्य भेदा:। तत्वार्थसूत्र ६/५
  6. तत्वार्थर्वाितक ६/४/१—१
  7. पंचास्तिकाय
  8. तत्वार्थसूत्र ६/६
  9. तत्प्रदोष निह्नवमात्सर्याऽन्तरायाऽऽसादनोपघातज्ञानदर्शनावरणयो:। तत्वार्थसूत्र ६/१०
  10. ज्ञानव्ययच्छेदकरणम् अन्तराय:। तत्वार्थसेत्र ६/१०/४
  11. प्रशस्तज्ञानदूषणमुपघात:। तत्वार्थ सूत्र ६/१०/६/१
  12. तत्वार्थसार ४/१३/१०
  13. धवला पु. ६ पृ. १०
  14. बृहद् द्रव्यसंग्रह गाथा ३३ की टीका
  15. दु:खशोकतापाक्रन्दनवधपरिदेवनान्यात्मपरोभयस्थन्यसद्वेद्यस्य। तत्त्वार्थसूत्र ६/११
  16. संक्लेशप्रवणं स्वपरानुग्रहाभिलाषविषयमनुकम्पाप्रायं परिदेवनम्।। तत्त्वार्थसूत्र ६/११/१—६
  17. तत्त्वार्थसूत्रर्वाितक ६/११ पृ. ३०१ (हिन्दी टीका आ. सुपाश्र्वश्री भाग—२)
  18. भूतव्रत्यनुकम्पा सरागसंयमादियोग: क्षान्ति: शौचमिति सद्वेद्यस्य। त: सूत्र ६/१२
  19. जन्ममरणप्रबन्धलक्षणसंसारोत्पादसामर्थमन्तरेण तत्सत्त्वस्यासत्त्वसमानत्वात्। धवला पु. भाग १ पृष्ठ—४३
  20. केवली श्रुतसंघधर्मदेवावर्णवादो दर्शनमोहस्य। तत्त्वार्थ सूत्र ६/१३
  21. कर्मग्रंथ प्र. भा. गाथा १३
  22. कार्य चारित्रमोहस्य चारित्राच्युतिरात्मन:। पञ्चाध्ययी उत्तरार्ध श्लोक. ६९०
  23. गोम्मटसार कर्मकाण्ड जीवत्वप्रदीपिका गाथा ३३
  24. . बह्वारम्भपरिग्रहत्वं नारकस्यायुष:। तत्त्वार्थसूत्र ६/१५


डॉ. श्रेयांस कुमार जैन
अध्यक्ष संस्कृत विभाग दिगम्बर जैन कॉलेज बड़ौत (बागपत) उत्तर प्रदेश
अनेकान्त जुलाई—सितम्बर २०१० पेज नं. ५ से १५